एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक रहस्यमई आदमी आया उसने राजा को काठ का एक घोड़ा दिखाया और कहा महाराज यह ना तो कुछ खाता है और ना कुछ पीता है और जहां चाहो वहां यह ले जाता है विक्रमादित्य उस आदमी के हावभाव देखकर समझ गए कि कुछ तो अजीब हो रहा है विक्रमादित्य ने उसी समय दीवान को बुलाया और 1 लाख सोने के सिक्के देने को कहा दीवान आश्चर्य चकित था पर राजा के आदेश के कारण उसने उस व्यक्ति को सोने के सिक्के दे दिए धन लेकर व आदमी वहां से चलता बना पर
चलते-चलते कह गया कि इस घोड़े को कभी कोड़ा मत मारना एक दिन विक्रमा दित्य उस काठ के घोड़े पर बैठकर उसका निरीक्षण कर रहे थे उन्हें उस आदमी की बात याद ना रही और उस घोड़े को कोड़ा मार दिया तभी अचानक ही वह काठ का घोड़ा विक्रमादित्य को आकाश में ले उड़ा और समुद्र पार ले जाकर घोड़े ने विक्रमादित्य को एक भयानक जंगल में गिरा दिया होश संभालकर विक्रमादित्य जब आगे बढ़े तो वह उस भयानक रहस्यमई जंगल में खो गए विक्रमादित्य 15 दिनों तक उस भयानक जंगल में भटकते रहे भटकते भटकते उन्हें एक रहस्यमई गुफा
दिखाई दी उन्होंने देखा कि गुफा के बाहर एक पेड़ है और दो कुएं भी मौजूद है पेड़ के ऊपर एक बंदरिया भी बैठी थी जो कभी नीचे आती तो कभी ऊपर छड़ती विक्रमादित्य छिपकर सब हाल देखने लगे दोपहर होते ही एक तांत्रिक उस गुफा से बाहर आया और कुएं से पानी लिया और उस बंदरिया पर छिड़क दिया तभी वह एक बहुत ही सुंदर स्त्री बन गई तांत्रिक पहर भर उसके साथ रहा और फिर दूसरे कुएं से पानी लेकर स्त्री पर छिड़का की वह फिर से बंदरिया बन गई और पेड़ पर जा बैठी और तांत्रिक वापस
उस गुफा में चला गया यह देखकर विक्रमादित्य को बहुत ही अचंभा हुआ विक्रमादित्य ने भी कुएं के पानी को जब उस बंदरिया पर छिड़का तो वह एक सुंदर स्त्री बन गई उन्होंने जब प्रेम से उस स्त्री की तरफ देखा तो वह बोली हमें हमें ऐसे मत देखो हम तपस्विनी है श्राप दे देंगे तो तुम भस्म हो जाओगे राजा बोला मेरा नाम विक्रमादित्य है मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता नाम सुनते ही वह स्त्री विक्रमादित्य के चरणों में गिर पड़ी और बोली हे राजन आप अभी यहां से चले जाओ नहीं तो ये तांत्रिक आएगा और हम
दोनों को श्राप देकर भस्म कर देगा विक्रमादित्य ने कहा तुम कौन हो और इस तांत्रिक के हाथ कैसे लगे स्त्री बोली मेरे पिता कामदेव और मां पुष्पावती हैं जब मैं 12 बरस की हुई तो मेरे घर वालों ने मुझे एक काम करने को कहा मैंने वह काम नहीं किया तो उन्होंने गुस्सा होकर मुझे इस तांत्रिक को दे दिया वह मुझे यहां ले आया और बंदरिया बनाकर रखा है सच है भाग्य के लिखे को कोई नहीं मिटा सकता विक्रमादित्य ने कहा तुम निश्चिंत रहो मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा तभी वह तांत्रिक वहां आ पहुंचा और
स्त्री को विक्रमादित्य के साथ देखकर उसके क्रोध की सीमा ना रही विक्रमादित्य के पराक्रम से अनजान तांत्रिक ने अपने काले जादू के प्रभाव से नर भक्ष की सेना बुला ली और उन्हें आदेश दिया कि इस व्यक्ति के टुकड़े-टुकड़े कर इसे नोच खाओ नरभक्षी जैसे ही विक्रमादित्य की तरफ बढ़े तो विक्रमादित्य के क्रोध की सीमा ना रही वो अकेला योद्धा नरभक्षी की सेना पर टूट पड़ा और देखते ही देखते विक्रमादित्य ने उन सभी को मौत के घाट उतार दिया एक अकेले योद्धा द्वारा इतनी खूंखार सेना का अंत होते देख तांत्रिक समझ गया कि यह कोई साधारण
मानव नहीं है विक्रमादित्य जैसे ही उस तांत्रिक की तरफ भागे तो वह अंतर्ध्यान हो गया और वापस प्रकट होकर हंसने लगा विक्रमादित्य समझ गए कि यह तांत्रिक मायावी है इसे इस तरह काबू करना संभव ना होगा तभी विक्रमादित्य ने बेताल का आह्वान किया और बेताल प्रकट हो गया पूरा घटनाक्रम जानकर बेताल ने कहा हे राजन आप निश्चिंत रहे इस दुष्ट को तो मैं देखता हूं बेताल की शक्तियों के आगे तांत्रिक की शक्तियां धरी की धरी रह गई और वह विक्रमादित्य के पैरों में आ गिरा और माफी मांगने लगा विक्रमादित्य ने तांत्रिक को पाताल लोक जाने
का आदेश दिया और वह सकुशल उस स्त्री के साथ अपने राज्य लौट आए रात के समय किले की छक पर विश्राम कर रहे राजा विक्रमादित्य को एक महिला की चीख सुनाई पड़ी विक्रमादित्य तुरंत उठ खड़े हुए महिला की पुकार सुनते ही विक्रमादित्य अपने घोड़े पर सवार होकर उसी दिशा में निकल पड़े थोड़ी दूरी तय करने के पश्चात विक्रमादित्य ने देखा कि एक भयभीत महिला प्राण रक्षा हेतु चीखती चिल्लाती दौड़े जा रही है और उसके पीछे एक विशाल काय दैत्य पड़ा हुआ है विक्रमादित्य को अपने समक्ष खड़ा देख महिला विक्रमादित्य के चरणों में गिर पड़ी और
प्राण रक्षा हेतु गुहार लगाने लगी विक्रमादित्य ने कहा बहन तुम राजा विक्रमादित्य की शरण में आई हो मेरे रहते क्षति पहुंचाना तो दूर तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता तभी राक्षस जोर से हंस पड़ा और बोला मूर्ख तू बचाएगा इसे अगर अपनी जान की सलामती चाहता है तो तुरंत यहां से चला जा असहाय अबला नारी के बहते आंसुओं को देख विक्रमादित्य का खून खोल उठा किंतु राक्षस अमर था रक्त वर्णित आंखे लिए विक्रमादित्य उस विशाल काय दैत्य पर टूट पड़े दोनों के बीच भीषण संग्राम हुआ तभी विक्रमादित्य ने तलवार के एक ही बर
से उस दानव का सर धड़ से अलग कर दिया लेकिन उस मायावी राक्षस का सर वापस उस धड़ पर जा लगा यह देख विक्रमादित्य विचलित ना हुए और उन्होंने उस महादान का सर पकड़कर एक पहर तक जमीन पर घसीटा तभी मौका देखकर राक्षस वहां से भाग खड़ा हुआ पीठ दिखाकर भागते हुए पर विक्रमादित्य ने वार नहीं किया और उसे जाने दिया वह उस औरत के पास जाकर बोले बहन अब तुम सुरक्षित हो वह दानव भाग चुका है खतरा अभी टला नहीं है राजन वह राक्षस वापस आएगा और मुझे ढूंढकर वापस इसी स्थान पर ले आएगा
विक्रमादित्य ने कारण पूछा महिला बोली मैं सिंघल द्वीप के एक ब्राह्मण की पुत्री हूं एक दिन मैं अपनी सहेलियों के साथ गांव के पास ही मौजूद तालाब में स्नान कर रही थी कि तभी इस राक्षस ने मुझे देख लिया और मुझ पर मोहित हो गया वहीं से यह मुझे यहां उठा लाया और मुझे अपना पति मानने के लिए कहता है विक्रमादित्य ने राक्षस के पुनः जीवित होने का राज पूछा स्त्री बोली इसके पेट में एक मोहिनी वास करती है जो मरते ही इसके मुंह में अमृत डाल देती है इसी कारण यह जीवित हो जाता है
विक्रमादित्य ने कहा सग है मां भवानी की इस दैत्य का वध किए बिना मैं अपने महल में प्रवेश नहीं करूंगा इतना कहकर उन्होंने उस औरत को सैनिकों के साथ महल बिजवा दिया और खुद राक्षस की खोज में निकल गए राक्षस झाड़ियों में ही छुपा था मौका देखकर उसने विक्रमादित्य पर हमला कर दिया विक्रमादित्य ने तलवार के एक ही बर से उस राक्षस का पेट चीर दिया तभी उसके पेट से मोहिनी निकली और वह अमृत लेने के लिए भागी विक्रमादित्य ने बेताल का आह्वान किया और बेताल ने मोहिनी को पकड़ लिया अमृत के अभाव में राक्षस
तड़पकर मर गया विक्रमादित्य का पराक्रम देखकर मोहिनी उन पर मोहित हो गई और वो विक्रमादित्य से विवाह कर उनके साथ महल लौट आई राजा विक्रमादित्य ने एक महाभोज का आयोजन किया उस भोज में असंख्य विद्वान ब्राह्मण व्यापारी तथा दरबारी आमंत्रित थे भोज के मध्य में इस बात पर चर्चा चली कि संसार में सबसे बड़ा दानी कौन है सभी ने एक स्वर से विक्रमादित्य को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ दानवीर घोषित किया राजा विक्रमादित्य लोगों के भाव देख रहे थे तभी उनकी नजर एक ब्राह्मण पर पड़ी जो अपनी राय नहीं दे रहा था लेकिन उसके चेहरे के भाव
से स्पष्ट प्रतीत था कि वह सभी लोगों के विचार से सहमत नहीं है विक्रमादित्य ने उससे उसकी चुप्पी का कारण पूछा तो वह डरते हुए बोला कि सबसे अलग राय देने पर कौन उसकी बात सुनेगा विक्रमादित्य ने उसे निर्भय होकर अपनी बात कहने को कहा ब्राह्मण ने कहा विक्रमादित्य बहुत बड़े दानी है यह बात सत्य है पर इस भूलोक के सबसे बड़े दानी नहीं है यह बात सुनते ही सभी चौक गए साधु ने कहा समुद्र पार एक तक्षशिला नामक राज्य है जहां का राजा अधिरथ जब तक 1 लाख स्वर्ण मुद्राएं प्रतिदिन दान नहीं करता तब
तक वह अन्न जल ग्रहण नहीं करता है अगर यह बात असत्य प्रमाणित होती है तो मैं कोई भी दंड पाने को तैयार हूं विक्रमादित्य ब्राह्मण की स्पष्ट वादित से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे पारितोषिक देकर सादर विदा किया ब्राह्मण के जाने के बाद विक्रमादित्य ने बेताल का स्मरण किया जब बेताल उपस्थित हुआ तो विक्रमादित्य ने बेताल को समुद्र पार राजा अधिरथ के राज्य में पहुंचा देने को कहा बेताल ने पलक झपकते ही उन्हें वहां पहुंचा दिया अधिरथ के महल के द्वार पर पहुंचकर उन्होंने अपना परिचय उज्जैन के एक साधारण नागरिक के रूप में दिया
तथा अधिरथ से मिलने की इच्छा जताई द्वारपाल जब उन्हें राजा के पास लेकर गया तो राजा ने पूछा कि तुम कौन सा काम कर सकते हो विक्रमादित्य ने कहा जो कोई नहीं कर सकता वह काम मैं कर दिखाऊंगा राजा ने विक्रमा दित्य को द्वारपाल के रूप में नियुक्त कर दिया विक्रमादित्य ने देखा कि राजा अधिरथ सच में प्रतिदिन 1 लाख सोने की मुद्राएं दान में देता है उन्होंने यह भी देखा कि राजा अधिरथ रोज शाम अकेला कहीं निकलता है और जब लौटता है तो उसके हाथ में 1 लाख स्वर्ण मुद्राओं से भरी हुई थैली होती
है एक दिन शाम को विक्रमादित्य ने छिपकर राजा का पीछा किया उन्होंने देखा कि राजा समुद्र में स्नान करके एक मंदिर गया और एक प्रतिमा की पूजा अर्चना करके उबलते तेल के कड़ा में कूद गया जब उसका शरीर लकर भुन गया तो कुछ चुड़ैलों वहां आई और भुना शरीर कड़ा से निकालकर नोच नोच कर खा गई और तृप्त होकर चली गई चुड़ैलों के जाने के बाद प्रतिमा से एक देवी प्रकट हुई और अमृत की बूंदे डालकर राजा को जीवित कर दिया देवी ने 1 लाख स्वर्ण मुद्राएं अधिरथ की झोली में डाल दी और वह खुश
होकर महल लौट आया सोने के सिक्कों का रहस्य जानकर विक्रमादित्य नदी में कूद गए और स्नान करके मंदिर में देवी की पूजा की और तेल की कढ़ाई में अपने शरीर का समर्पण कर दिया तभी चुड़ैल आई और विक्रमादित्य का जला भुना शरीर खाकर तृप्त होकर चली गई देवी प्रकट हुई और कढ़ाई में अमृत डालकर विक्रमादित्य को जीवित कर दिया देवी ने विक्रमादित्य को स्वर्ण मुद्राएं देनी चाहि उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनके लिए देवी की कृपा ही सर्वोपरि है और उन्होंने सात बार यह क्रिया दोहराई सातवी बार देवी ने कहा बस करो तुम्हें
जो मांगना है मांग लो विक्रमादित्य इसी अवसर की ताक में थे उन्होंने देवी से वह थैली ही मांग ली जिससे स्वर्ण मुद्राएं निकलती थी ज्यूं ही देवी ने वह थैली विक्रमादित्य को सौंपी तो मंदिर प्रतिमा सब कुछ गायब हो गया अब दूर-दूर तक केवल समुद्र तट दिख रहा था विक्रमादित्य वह चमत्कारी थैली लेकर चले गए अगले दिन जब राजा वहां आया तो वह बहुत दुखी हुआ उसका वर्षों का 1 लाख स्वर्ण मुद्राएं दान करने का नियम टूट गया राजा ने अन्न जल त्याग दिया और अपने कक्ष में असहाय पड़ा रहता अत्यधिक अस्वस्थ राजा मर नाश
की हालत में अंतिम सांसे गिन रहा था कि तभी विक्रमादित्य राजा के पास आ पहुंचे और उनकी उदासी का कारण पूछा राजा ने विक्रमादित्य को सारा हाल कह सुनाया विक्रमादित्य ने वह चमत्कारी थैली राजा को देते हुए कहा कि रोज-रोज कड़ा में कूदकर आपको प्राण गवाते देख मेरा हृदय विचलित हो गया था इसलिए मैंने देवी से वह चमत्कारी थैली ही सदा के लिए प्राप्त कर ली जिससे सोने के सिक्के निकलते थे राजा अधिरथ तुरंत भाप गए कि उनके साथ सामने खड़ा शख्स कोई साधारण मानव नहीं है उन्होंने विक्रमादित्य से उनका वास्तविक परिचय पूछा तो विक्रमादित्य
ने कहा मैं उज्जैन नगरी का राजा विक्रमादित्य हूं इतना सुनते ही राजा अधिरथ ने विक्रमादित्य को अपने गले लगा लिया और कहा हे राजन इस धरती के सर्वश्रेष्ठ दानवीर आप ही हो कुछ दिन तक शिला नगरी में व्यतीत करने के पश्चात विक्रमादित्य ने राजा अधिरथ से विदा ली और सकुशल उज्जैन लौट आए एक बार विक्रमादित्य के राज्य में एक खूंखार शेर घुस आया शेर के आतंक से पूरे उज्जैन में हाहाकार मच गया जब इसकी खबर राजा विक्रमादित्य तक पहुंची तो वह उस उसी क्षण अपनी प्रजा की रक्षा हेतु उस विशाल काय सिंह के शिकार हेतु
निकल पड़े जंगल में प्रवेश करते ही राजा विक्रमादित्य की नजर उस नरभक्षी शेर पर पड़ी उन्होंने शेर के पीछे अपना घोड़ा लगा दिया थोड़ी दूर पीछा करने के उपरांत शेर घनी झाड़ियों में जा घुसा विक्रमादित्य अपने घोड़े से उतरे और उस शेर की तलाश में निकल पड़े तभी अचानक पीछे से आए शेर ने राजा के घोड़े पर हमला कर दिया घायल घोड़ा दर्द से चिं घाड़ नहीं लगा विक्रमादित्य ने शेर की तरफ बढ़ते हुए तलवार के एक ही बर से उस विशालकाय शेर को धराशाई कर दिया घायल शेर वहां से भाग खड़ा हुआ घोड़े के
घाव से बहता रक्त देख विक्रमादित्य उसे पास ही मौजूद एक नदी के तट पर ले आए परंतु अत्यधिक रक्त बह जाने के कारण घोड़े ने दम तोड़ दिया जंगल में अंधेरा बढ़ने लगा इसलिए विक्रमादित्य ने आगे बढ़ना उचित नहीं समझा वे पास में ही मौजूद एक वृक्ष के नीचे बैठ गए तभी कुछ क्षणों बाद उन्होंने देखा कि नदी में कुछ हलचल हो रही है नदी में तैरता हुआ एक शव आ रहा है और उस शव को एक तांत्रिक और एक बेताल ने पकड़ा हुआ है दोनों आपस में झगड़ रहे हैं वे दोनों झगड़ते झगड़ते किनारे
आ पहुंचे दोनों उस शव पर अपना-अपना अधिकार जता रहे थे तांत्रिक का कहना था कि यह शव उसने तंत्र साधना के लिए पकड़ा है और बेताल उस शव को खाकर अपनी भूख मिटाना चाहता था दोनों में से कोई भी अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं था विक्रमादित्य को सामने देखकर दोनों भागकर उनके पास आ पहुंचे और बोले हे राजन आप न्याय करो कि इस शव पर किसका हक है विक्रमादित्य ने कहा तुम दोनों को न्याय के लिए शुल्क अदा करना होगा तांत्रिक ने उन्हें एक चमत्कारी बटवा दिया जिससे मांगने पर वह कुछ भी दे सकता
था बेताल ने उन्हें मोहिनी काष्ट का टुकड़ा दिया जिसका चंदन घिसकर अदृश्य हुआ जा सकता था विक्रमादित्य ने बेताल को भूख मिटाने के लिए अपना मृत घोड़ा दे दिया और तांत्रिक को तंत्र साधना के लिए शव इस न्याय से दोनों बहुत खुश हुए और संतुष्ट होकर चले गए रात घिर आई थी और विक्रमादित्य को जोरों की भूख लगी उन्होंने बटुए से भोजन मांगा तरह-तरह के व्यंजन उपस्थित हुए और उन्होंने अपनी भूख मिटाकर मोहिनी काष्ट के टुकड़े को घिसकर अदृश्य हो गए अब उन्हें किसी भी हिंसक वन्य जंतु से खतरा नहीं रहा अगली सुबह उन्होंने बेताल
का स्मरण किया और अपने राज्य की सीमा पर पहुंच गए उन्हें महल के रास्ते में एक भिखारी मिला जो भूखा था विक्रमादित्य ने बिना कुछ सोचे तुरंत वह चमत्कारी बटुआ उसे दे दिया ताकि जिंदगी भर उसे भोजन की कमी ना हो अपने ही सर को काटकर विक्रमादित्य ने क्यों फेंक दिया और फिर क्या हुआ एक बार विक्रमादित्य अपने राज्य के भ्रमण पर निकले थे कि तभी उन्हें एक झोपड़ी से कुछ आवाज सुनाई दी जब उन्होंने ध्यान लगाकर सुना तो एक औरत अपने पति को राजा से सब साफ-साफ बताने को कह रही थी और उसका पति
कह रहा था कि अपने स्वार्थ के लिए वह महान राजा के प्राण संकट में नहीं डाल सकता विक्रमादित्य समझ गए कि उनकी समस्या से उनका कुछ संबंध है उन्होंने द्वार खटखटाया तो एक ब्राह्मण दंपति ने दरवाजा खोला विक्रमादित्य को अपने सामने खड़ा देख वे थरथर कांपने लगे विक्रमादित्य ने ने निर्भय होकर उन्हें सब कुछ स्पष्ट बताने को कहा तो ब्राह्मण ने कहा महाराज शादी के 12 साल बाद भी हम निसंतान है इन 12 सालों में संतान के लिए उन्होंने काफी यत्न किए पर कुछ ना हुआ कुछ दिन पहले मेरी पत्नी ने एक स्वप्न देखा स्वप्न
में एक देवी ने आकर बताया कि यहां से 30 कोस दूर पूर्व दिशा में एक घना जंगल है जहां कुछ साधु सन्यासी शिव की स्तुति कर रहे हैं शिव को प्रसन्न करने हेतु वह हवन कुंड में अपने अंग काट कर डाल रहे हैं देवी ने कहा था कि अगर राजा विक्रमादित्य उस हवन कुंड में अपने अंग काटकर फेंके तो शिव प्रसन्न हो होकर उनसे उनकी इच्छा के बारे में पूछेंगे तो वे शिव से तुम्हारे लिए संतान की मांग कर सकते हैं इतना सुनते ही विक्रमादित्य ने बेताल का आह्वान किया और हवन स्थल पर जा पहुंचे
वहां पर सचमुच साधु अंगों को काटकर अग्निकुंड में फेंक रहे थे विक्रमादित्य भी उन्हीं की तरह अपने अंग काटकर अग्नि को अर्पित करने लगे जब विक्रम सहित वे सारे जलकर राख हो गए तो एक शिव गण वहां पहुंचा तथा सारे तपस्वी को अमृत डालकर जिंदा कर दिया मगर भूल से विक्रम को छोड़ दिया सारे तपस्वी जिंदा हुए तो उन्होंने राख हुए विक्रम को देखा सभी तपस्वी ने मिलकर कर शिव की स्तुति की तथा उनसे विक्रम को जीवित करने की प्रार्थना करने लगे भगवान शिव विक्रमादित्य के परोपकार तथा त्याग की भावना से काफी प्रसन्न हुए और
उन्हें जीवित करके उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली कुछ दिनों बाद ब्राह्मण दंपति को पुत्र प्राप्ति हुई आगे की कहानी जानने के लिए इस वीडियो पर 500 कमेंट पूरे करें