एक बूढ़े गिद्द ने बताया कि यह चार बातें आपको बड़ी से बड़ी मुसीबत से बचा सकती हैं दर्शक बंधुओं प्राचीन समय की बात है किसी राजा के राज्य में नगर से बाहर एक कसाई रहता था वही उसका बूचड़ खाना था वह रोजाना जानवरों को काटकर उनका मांस बाजार में बेचा करता था कसाई के बूचड़ खाने के बाहर एक पेड़ पर एक गिद और गिद्धनी रहती थी वहां उनका बहुत अच्छे से गुजारा हो रहा था उन्हें वहां पेट भरने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन मिल जाया करता था गिद्द और गिद्द की पत्नी कभी वो स्थान
छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती थी एक दिन गिद्द की स्त्री कहती है स्वामी आज ठंड बहुत अधिक पड़ रही है रात काटना बड़ा मुश्किल हो रहा है कोई ऐसी कहानी सुनाओ जिससे हमें कुछ ज्ञान मिले और हमारी रात आराम से कट जाए अपनी पत्नी की ऐसी बात सुनकर गिद कहता है हे प्रिय आज मैं तुम्हें आंखों देखी एक ऐसी कहानी सुनाऊंगा जो बहुत ही ज्ञानवर्धक और बहुत ही प्रेरणादायक है इस कहानी में बताई गई चार बातों को अगर मनुष्य अपने जीवन में धारण कर लेता है तो निश्चित मानिए वो कभी संकट में नहीं पड़ेगा और यदि
कभी संकट में पड़ भी जाएगा तो संकट से अतिशीघ्र निकल भी जाएगा यह कहानी बड़ी ही रोचक और जीवन में सीख देने वाली है जरा ध्यान देकर सुनना गिद्ध कहता है हे गिद्धनी यह उस समय की बात है जब मेरा तुमसे विवाह नहीं हुआ था इस पेड़ पर मैं अकेला ही रहता था और मेरे कुछ और साथी गण रहते थे तब यह कहानी मैंने यहां के राजा से सुनी थी और अपनी आंखों से देखी भी थी वही कहानी मैं तुम्हें सुनाता हूं मनुष्य की किस्मत कैसे बदलती है यह तुम्हें इस कहानी से जानने को मिल
जाएगा किसी नगर में एक उत्तम नाम का एक व्यक्ति रहता था एक दिन कुछ काम के सिलसिले में उसका उसके पिता से झगड़ा हो जाता है उत्तम के पिता ने उसे चार सोने की असरफी दी और कहा कि जाओ घर में सारे दिन पड़े रहते हो यह असर पिया ले जाओ और बाहर जाकर कुछ व्यापार करके धन कमा कर लाना उत्तम ने भी असर पिया अपने पिता से ले ली और शाम के समय व्यापार करने के लिए परदेश को रवाना हो गया सोचता जा रहा था कि इन चार असर पियों से वह कोई छोटा मोटा
व्यापार कर लेगा और खूब सारा धन कमाकर वह अपने पिता को दिखाएगा यही उम्मीद लेकर वह चलता चला जा रहा था रास्ते में उसकी भेंट एक साधु से होती है साधु भी अपनी गंतव्य की ओर जा रहा था उत्तम ने सोचा कि क्यों ना साधु से कुछ परिचय किया जाए बातचीत करते हुए जब चलेंगे तो हमारा सफर आराम से कट जाएगा यही सोचकर उत्तम साधु बाबा के के पास जाता है और उन्हें प्रणाम करता है साधु बाबा ने उसे आशीर्वचन दिया और पूछा बेटी तुम कहां जा रहे हो उत्तम ने कहा साधु महाराज मेरे पिता
ने मुझे घर से निकाल दिया है अब कहीं परदेश में जाकर कोई छोटा मोटा व्यापार करूंगा और अपने पिता के लिए बड़ा आदमी बनकर दिखाऊंगा मेरे पिता ने मुझे चार सोने की सर्पिल मित्रों इस प्रकार बातचीत करते हुए साधु और उत्तम दोनों आगे के लिए चले जा रहे थे चलते चलते रास्ते में उत्तम ने साधु से कहा बाबा आप तो परम ज्ञानी है कोई ऐसी कहानी सुनाओ जिससे सफर आसान हो जाए और मुझे कुछ सीख मिल जाए जिससे परदेश में मेरे लिए आसानी हो जाएगी तब साधु बाबा कहते हैं बेटे मैं तुम्हें कहानी तो सुना
दूंगा पर मेरी कहानी का तुम्हें मूल्य चुकाना होगा एक कहानी के बदले में मैं तुमसे एक सोने की असर पी लूंगा बताओ क्या तुम तैयार हो साधु की बात सुनकर उत्तम सोचने लगा कि मेरे पिता ने मुझे चार सोने की असफिया दी है अगर इनमें से एक असरफी में साधु को दे दूंगा तो मैं व्यापार कैसे करूंगा फिर सोचा कि साधु बड़ा बुद्धिमान मालूम पड़ता है और लोग कहते हैं कि विद्या मित्रम प्रवासे स्त्री मित्रम गृहे सुचा वदत औषध मित्रम धर्मो मित्र मृत परदेश में रहने वाले की मित्र विद्या होती है घर में रहने वाले
की मित्र स्त्री होती है रोगी की मित्र दवा होती है मरने वाले का मित्र धर्म होता है और कहा भी है कि विद्वान के लिए कोई जगह परदेश नहीं होती मेहनत करने वाले के लिए कोई काम कठिन नहीं होता साहसी के लिए कोई लक्ष्य दूर नहीं होता मीठा बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं होता अगर आपके पास बुद्धि और विद्या है तो आप परदेश में कहीं भी सुख पूर्वक अपना जीवन बिता सकते हैं यही सोचकर उत्तम ने एक सुर मुद्रा साधु को दे दी और कहा महाराज आप मुझे कहानी सुनाओ मैं आपकी कहानी का
मूल चुकाने के लिए तैयार हूं गिद बोला हे प्रिय तब चलते चलते साधु ने उस युवक उत्तम को कुछ उपदेश देना शुरू किया साधु बोले पुत्र तुम्हें मैं जो बात बताने जा रहा हूं अगर तुमने बात पर अमल कर लिया तो यह तुम्हारे बहुत काम आने वाली है सुनो तुम परदेश में व्यापार करने जा रहे हो तो तुम मेरी एक बात ध्यान रखना यदि परदेश में तुम्हें कोई ठीक ठाक व्यापार ना मिले तो तुम खाली मत बैठना जो भी जैसा भी काम मिले वह काम पकड़ लेना यह प्रदेश में रहने वाले के लिए सबसे पहला
और अनमोल मूल मंत्र है खाली बैठने से परदेश में अपनी जेब से ही धन खर्च होता है वेतर यही होगा भले ही थोड़े पैसे मिले कुछ काम करके अपना खर्च चलाना चाहिए इससे तुम्हें काम का अनुभव भी होगा और आपका समय भी ठीक से कट जाएगा उत्तम ने कहा ठीक है बाबा मैं तुम्हारे इस उपदेश पर जरूर अमल करूंगा अब आप कहानी सुनाइए महात्मा जी बोले बेटी कहानी तो खत्म हो गई अभी मैंने आपको यह कहानी ही सुनाई थी उत्तम कहने लगा साधु बाबा यह कैसी कहानी थी जो जरा सी देर में खत्म होगी यह
तो आपने मुझ उपदेश दिया है मुझे कोई कहानी सुनाओ ना साधु ने कहा अगर तुम दूसरी कहानी सुनना चाहते हो तो एक स्रण मुद्रा तुम्हें और देनी पड़ेगी मैं तुम्हें दूसरी कहानी सुनाऊंगा मित्रों उत्तम ने कुछ सोच विचार करने के बाद एक सुर मुद्रा साधु के हाथ पर रख दी और कहा बाबा अब मुझे कहानी सुनाइए साधु महाराज ने कहा ठीक है अब मैं तुम्हें दूसरी कहानी सुनाता हूं ध्यान देकर सुनो परदेश में रहकर बेटा क किसी दूसरे की वस्तु पर छल कपट या प्रपंच से अपना अधिकार मत करना दूसरे की वस्तु को हमेशा मिट्टी
के समान समझकर चलना कभी किसी चीज पर नियत खराब मत करना उत्तम ने कहा ठीक है बाबा मैं ऐसा ही करूंगा अब आगे सुनाइए साधु कहने लगा बेटी कहानी तो खत्म हो गई इतनी ही कहानी थी उत्तम ने कहा अरे यह क्या यह तो आपने सिर्फ मुझे उपदेश दिया है बस इतने से उपदेश के आपने मुझसे एक शोण मुद्रा ले ली साधु ने कहा बेटे ज्ञान की कोई कीमत नहीं होती ज्ञान तो अनमोल होता है ज्ञान की कीमत तब पता चलती है जब मनुष्य विपत्ति में पड़ता है और वही ज्ञान उसे विपत्ति से उबार ले
जाता है उत्तम ने कहा ठीक है बाबा उपदेश ही सही मैं तुम्हें एक स्रण मुद्रा और देता हूं तुम मुझे एक उपदेश और दीजिए इतना कहकर उत्तम ने एक सण मुद्रा साधु के हाथ पर रख दी साधु ने तीसरी बात उत्तम को बताई कि बेटी जीवन में कभी किसी का गुप्त भेद पता चल जाए तो उस भेद को कभी तीसरे से मत कहना यह सबसे अनमोल सीख है साधु के तीसरे उपदेश को भी उत्तम ने अपनी गाठ में बांध लिया फिर सोचा कि अब मेरे पास सिर्फ एक ही असर्प रह गई है इस एक असर्प
से व्यापार तो हो नहीं पाएगा क्यों ना साधु बाबा से एक उपदेश और सीख लिया जाए यही सोचकर उत्तम ने व चौथी असर्प भी साधु के हाथ पर रख दी और बोला साधु महाराज अब आप मुझे एक उपदेश और दे दीजिए साधु ने कहा बेटे ठीक है मैं तुम्हें चौथा उपदेश देता हूं और यह उपदेश जिंदगी के लिए बहुत अनमोल है इसे सदैव याद रखना इस प्रकार साधु उत्तम को चौथी बात बताता है कहने लगा पुत्र यदि तुम्हें कभी रास्ते में कोई प्रेम से बुलाकर बैठने को कहे तो आपका चाहे कितना ही कीमती काम हो
उसे छोड़कर आप दो मिनट उसके पास जरूर बैठना उसके साथ दो मिनट बिताया गया समय तुम्हारे बहुत काम आ सकता है इस प्रकार साधु ने उत्तम को चौथा उपदेश दिया उत्तम कहने लगा बाबा तुम्हारे उपदेश वास्तव में बहुत कीमती है अब मेरे पास कोई पैसा नहीं बचा है वरना दो चार उपदेश में तुम्हारे और सुन लेता तब साधु कहता है पुत्र किसी के उपदेश को किसी की शिक्षा को बिना मूल्य चुकाए नहीं ग्रहण करना चाहिए फिर भी तुम कहते हो तो एक उपदेश मैं तुम्हें अपनी तरफ से देता हूं जिसका तुमसे कोई मूल्य नहीं लिया
जाएगा और वो उपदेश है कि परदेश में रहकर किसी दुराचारी स्त्री का भरोसा मत करना दुराचारी स्त्री का कोई पता नहीं होता कि उसके दिमाग में क्या है और दिल में क्या है मित्रों ये पांच उपदेश देकर साधु बाबा ने कहा बेटे हमारा तुम्हारा साथ बस इतनी ही देर का था पास में ही मेरा आश्रम है और अब मैं अपने आश्रम पर जा रहा हूं इतना कहकर साधु अपने आश्रम पर चला जाता है उत्तम बहा से अकेला आगे के लिए बढ़ता है परंतु उसके दिमाग में एक बात चल रही थी कि साधु बाबा ने पांच
उपदेशों के बदले मुझसे चार शरण मुद्राएं ले ली साधु को भला धन से क्या मतलब साधु संत तो बैरागी होते हैं धन दौलत का त्याग करके ही वे साधु बनते हैं फिर साधु ने मुझसे सुण मुद्राएं क्यों ली मैं यह बात जब लौटकर अपने नगर जाऊंगा तब साधु से जरूर पूछूंगा फिर सोचा चलो जो भी है साधु की य पांचों बातें बड़ी ही कीमती मालूम पड़ती हैं मैं इन्ह सदैव याद रखूंगा मित्रों अब उत्तम के पास में कोई पैसा नहीं बचा था अब वह इस चिंता में था कि परदेश में जाकर वह क्या करेगा क्या
खाएगा कैसे अपना व्यापार शुरू करेगा यही सब बातें सोचते सोचते वह एक नगर में पहुंच जाता है नगर में पहुंचकर वो किसी नौकरी की तलाश करने लगता है क्योंकि धन तो उसके पास में था नहीं सोचा कि किसी की नौकरी ही कर लेते हैं क्योंकि साधु बाबा ने भी कहा है कि परदेश में खाली नहीं बैठना चाहिए छोटा मोटा जो भी काम मिल जाए उसे ही करना चाहिए नौकरी की तलाश में उत्तम इधर उधर लोगों से पूछता फिर रहा था तभी उसकी भेंट एक राजा के नौकर से होती है जो राजा के अस्तबल का नौकर
था उसका नाम था अनंगपाल अनंगपाल राजा के यहां रहकर उनके घोड़ों की देखभाल करता था उसने देखा कि एक आदमी नौकरी की तलाश में घूम रहा है तो अनंगपाल ने उसे अपने पास बुलाया और कहा भाई तुम्हें काम की तलाश है और मुझे राजा छुट्टी नहीं दे रहा है घर पर मेरी मां बहुत बीमार है काफी दिनों से मैं अपनी मां को देखने नहीं जा पा रहा हूं राजा ने मुझसे कहा है कि तुम एक शर्त पर घर जा सकते हो अगर तुम अपनी जगह किसी और को काम पर लगा दो तो तुम घर चले
जाओ एक काम करो भैया मेरी जगह पर एक माह के लिए तुम काम कर लो जो भी वेतन मिलेगा वो तुम रख लेना जब मैं अपनी मां को देखकर लौट आऊंगा तब तुम कोई और काम तलाश कर लेना अनंगपाल की बात सुनकर उत्तम ने सोचा कि इधर उधर घूमकर समय नष्ट करने से अच्छा है कि एक माह तक मैं इसकी जगह पर ही काम कर लूं उसके बाद मेरे पास भी कुछ पैसे हो जाएंगे मैं शहर में नया आया हूं एक महीने में मैं यहां के लोगों को समझ भी लूंगा यही सोचकर उत्तम अन पाल
की जगह काम करने के लिए तैयार हो जाता है अनंगपाल उत्तम को लेकर राज महल में जाता है मित्रों वहां के राजा चक्र दत्त बड़े ही बुद्धिमान और प्रतापी राजा थे उनकी एक बेटी थी चंद्र प्रभा चंद्र प्रभा बहुत ही सुंदर थी और अभी-अभी ही उसने जवानी की पहली सीढ़ी पर कदम रखा था राजा अपनी पुत्री से बहुत प्यार करता था क्योंकि चंद्र प्रभा उनकी इकलौती बेटी थी मित्रों राजा को घोड़ा पालने का और घोड़ सवारी करने का बड़ा शौक था एक से बढ़कर एक अच्छी नस्ल वाले उसके यहां हजारों घोड़े पले हुए थे उन
घोड़ों की देखभाल के लिए राजा ने कई नौकर लगा दिए थे उन्हीं में से एक अनंगपाल था प्रत्येक नौकर के हिस्से में द द घोड़े थे उन्हें खिलाने पिलाने के लिए राजा उन्हें बराबर राशन और दाना घास देता था इधर मित्रों उत्तम को लेकर अनंगपाल राजा के पास पहुंचता है और हाथ जोड़कर कहता है महाराज मैं कुछ दिनों के लिए अपनी बी मा को देखने के लिए गांव जा रहा हूं जब तक मैं लौटकर नहीं आता तब तक मेरे स्थान पर यह व्यक्ति काम करेगा इसका नाम उत्तम है और यह बड़ा मेहनती और ईमानदार व्यक्ति
है मुझे आपकी आज्ञा चाहिए राजा ने कहा अनंगपाल इसमें आज्ञा की क्या बात है यदि यह व्यक्ति तुम्हारा भरोसे मंद है तो इसे ले जाकर अपना काम समझा दो और जाओ जाकर अपनी मां को देख आओ लेकिन ध्यान रहे हमारे घोड़े की देखरेख में जरा भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए अगर हमारी घोड़ों की देखरेख में जरा भी लापरवाही हुई तो उसके लिए हम इसे नहीं तुम्हें दंड देंगे अनंगपाल ने कहा ठीक है महाराज आपको शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा मैं इसे सारा काम अच्छे से समझा दूंगा इस प्रकार राजा की आज्ञा लेकर अनंगपाल उत्तम को
लेकर घोड़ों के अस्तबल में जाता है वहां जाकर देखा तो हजारों घोड़े बंदे थे अनंगपाल ने उत्तम से कहा देखो उत्तम मेरे हिस्से में राजा ने 10 घोड़े दिए हैं तुम्हें 10 घोड़ों की देखभाल करनी है इनके लिए दाना खिलाना है और इनकी मालिश करनी है उत्तम ने कहा ठीक है मित्र मैं यह काम बड़ी ईमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ करूंगा उसके बाद अनंगपाल उत्तम को अपना कमरा दिखाता है और कहा कि आज से तुम इसी कमरे में रहोगी इस प्रकार अनंगपाल उत्तम को जिम्मेदारी सौंपकर अपने नगर के लिए चला जाता है इधर घोड़ों
की देखभाल के लिए उत्तम अपने काम में लग जाता है उत्तम रोजाना घोड़ों की मालिश करता था उन्हें नहला धुला था उसके बाद उन्हें दाना खिलाता था मित्रों राजा के यहां से प्रत्येक नौकर के लिए घोड़ों को खिलाने के लिए 20 किलो चना दिए जाते थे उत्तम ने उन चनों को एक पोटली में बांधा और अपने अस्वल में जाकर पानी में भेगो करर उन्हें कूट पीसकर अपने घोड़ों को खाने को डाल दिया जब वह अपने काम से फ्री हो गया तो उसने सोचा कि क्यों ना बाकी नौकरों के साथ बैठकर कुछ बातचीत कर ली जाए
यही सोचकर उत्तम उन नौकरों के पास जाकर बैठ जाता है जो राजा के अनन घोड़ों की देखभाल करते थे उसने देखा कि सारे नौकर इकट्ठे होकर एक कमरे में बैठकर शराब पी रहे थे और उनके घोड़े अभी भी भूखे बंधे थे उत्तम कहने लगा अरे भाई तुमने अभी तक अपने घोड़ों को दाना घास नहीं डाला शराब पीने में लगे हो उन सभी नौकरों ने कहा अरे भाई बिना अपना काम खत्म किए हम कभी नशा पानी नहीं करते हैं हम सब अपने अपने घोड़ों को खुराक डाल चुके हैं उसके बाद ही यहां बैठकर शराब पीने आए
हैं उत्तम ने देखा कि राजा के यहां से घोड़ों के लिए जो चने मिले थे वह अभी भी उन नौकरों के पास में रखे थे उत्तम ने कहा अरे भाई क्यों झूठ बोल रहे हो आपके पास अभी भी बहुत सारे चने कूटने के लिए पड़े हैं और तुम कह रहे हो कि हमने अपने घोड़ों को दाना घास डाल दिया है जवाब दिया भैया हमारे पास जो चने रखे हैं यह चने घोड़ों को खिलाने के लिए नहीं है इनको तो हम बाजार में बेचकर अपनी शराब का इंतजाम करते हैं उत्तम ने पूछा फिर घोड़ों को क्या
खिलाते हो जवाब दिया राजा हमें 20 किलो चना देता है हम पा किलो चना घोड़ों को खिला देते हैं और बाकी के चने बेचकर अपना नशा पानी का इंतजाम करते हैं नौकरों का यह बर्ताव उत्तम को अच्छा नहीं लगा सोचने लगा यह तो राजा के साथ और इन निर्दोष जानवरों के साथ धोखा है तुम सब अपना पेट भरने के लिए नशा करने के लिए इन घोड़ों को भूखा रखते हो वे सब नौकर कहने लगे देखो भाई पेट भरने के लिए यह सब करना पड़ता है राजा से मिलने वाले वेतन से हमारा ठीक से गुजारा नहीं
हो पाता है फिर धन से किसका पेट भरा है तुम भी ऐसा किया करो तुम्हें कौन रोकता है तुम्हारे लिए अनंगपाल ने यहां रखा है इसलिए हमने यह बात तुम्हें बता दी तुम यह बात किसी और से मत कहना वरना तुम्हारे साथ अच्छा नहीं होगा मित्रों उत्तम उन सब की बातें सुनकर चुपचाप अपने कमरे में लौट आता है सोचने लगा कि वे लोग ठीक कहते हैं कल से मैं भी ऐसा ही करूंगा बेईमानी करके मैं भी खूब सारा पैसा इकट्ठा कर लूंगा मुझे यहां सिर्फ एक महीना ही तो रहना है अनंगपाल के आते ही वह
मुझसे यह काम छीन लेगा तब तक मैं कुछ पैसे कमा लू उसके बाद में कोई व्यापार कर लूंगा मित्रों अपनी चारपाई पर लेटा लेटा उत्तम ऐसा सोच रहा था तभी उसे साधु की दूसरी बात याद आ जाती है कि किसी दूसरे के धन पर छल प्रपंच और कपट से अपना अधिकार नहीं करना चाहिए दूसरे का धन दूसरे की वस्तु मिट्टी के समान समझनी चाहिए उसके ऊपर कभी अपनी नियत खराब नहीं करना चाहिए यह बात याद आते ही उत्तम के विचार बदल जाते हैं सोचने लगा कि मैं भूखा रह लूंगा लेकिन यह पाप का धन कभी
नहीं खाऊंगा मित्रों उसी दिन से उत्तम बड़ी ईमानदारी के साथ अपने घोड़ों को खिलाते हर समय उनकी देखभाल करता है एक महीने के अंदर उत्तम के दसों घोड़े एकदम हस्ट पोस्ट और खूब तंदुरुस्त दिखने लगी और बाकी के नौकर दाने की चोरी करते थे घोड़ों को कम खिलाते थे इसलिए उनके घोड़े कमजोर होते चले गए एक दिन दरबार में राजा ने अपने मंत्री से कहा मंत्री जी बहुत दिन हो गए हैं मैंने अपने घोड़ों की दौड़ नहीं देखी है आप नौकरों को सूचित कर दो कि बे सबब अपने घोड़ों को लेकर मैदान में आ जाएं
कल मैं घोड़ों की दौड़ की प्रतियोगिता रखूंगा राजा ने जैसे कहा था मंत्री ने वैसा ही नौकरों को आदेश कर दिया अस्तबल के सभी नौकर घोड़ों को अच्छी तरह से नहला धुला करर खूब सजाकर अपने अपने घोड़ा लेकर खाली मैदान में पहुंच गए राजा साहब ने जब घोड़ों पर दृष्टि डाली तो देख के सारे तो देखा कि सारे घोड़े कमजोर थे बिल्कुल मरियल से और उत्तम के 10 घोड़े बड़े ही हष्ट पुष्ट और सुडोल थे वे दौड़ने के लिए फुरफुरा रहे थ यह देखकर राजा को क्रोध आ जाता है उन्होंने अपने मंत्री से कहा कि
मंत्री जी हमारे सारे घोड़े बड़े ही स्वस्थ थे लेकिन मैं मात्र 10 घोड़े स्वस्थ देख रहा हूं बाकी के सब घोड़े बहुत कमजोर हो गए हैं ये इतने कमजोर कैसे हो गए क्या नौकर इन्हें खिलाते पिलाते नहीं है मुझे तो ऐसा लगता है कि नौकरों ने इन्हें खिलाने में लापरवाही की है तब राजा ने उत्तम के पास पहुंचकर उत्तम के घोड़े देखे घोड़े एकदम स्वस्थ और फुर्ती ले थे उन घोड़ों को देखकर राजा बड़ा प्रसन्न होता है राजा ने अगले दिन उत्तम को दरबार में बुलाया और कहा कि तुम वही हो जिसे अनंगपाल ने अपने
स्थान पर रखा है उत्तम ने जवाब दिया हां महाराज मैं वही हूं राजा ने पूछा आपके घोड़े एकदम हष्ट पुष्ट है बाकी के घोड़े इतने कमजोर क्यों हैं जबकि मैं घोड़ों की खाद सामग्री बराबर बराबर मात्रा में भिजवा हूं यही जानने के लिए मैंने तुम्हें यहां बुलाया है राजा के पूछने पर उत्तम ने कहा महाराज मैं इस बात का रहस्य तो आपको बता दूंगा लेकिन यह बात मैं तभी बताऊंगा जब अस्तबल के बाकी नौकर यहां मौजूद होंगे राजा ने आदेश देकर फौरन सारे नौकरों को अपने दरबार में बुला लिया तब राजा ने उत्तम से पूछा
अब बताओ बाकी घोड़ों की कमजोर होने के पीछे क्या कारण है तब उत्तम ने कहा महाराज आपके बाकी नौकर बड़े बेईमान और बड़े लालची और नसेड़ी है आप घोड़ों के लिए रोजाना 20 किलो चना देते हैं लेकिन यह पा किलो चना घोड़ों को खिलाते हैं बाकी के 15 किलो चना यह बाजार में बेचकर शराब ले आते हैं घोड़ों को पर्याप्त मात्रा में दाना ना मिलने से सारे घोड़े कमजोर हो गए हैं लेकिन मैंने बड़ी ईमानदारी से आपका दिया हुआ राशन घोड़ों को खिलाया है इसलिए मेरे घोड़े तंदुरुस्त है इतनी बात सुनते ही राजा आग बबूला
हो जाता है और नौकरों पर बिगड़ कर बोला हराम खोरो हम तुम्हें इसी बात की तनख देते हैं कि तुम आराम से घोड़ों का दाना भी खा जाओ सारे नौकर नीचे को गर्दन डालकर चुपचाप खड़े हो गए और डर के मारे थरथर कांपने लगे कहने लगे महाराज हमें क्षमा कर दो हमसे बड़ी गलती हो गई है अब हम दोबारा ऐसा नहीं करेंगे राजा ने कहा नहीं मैं तुम सबकी गर्दन तलवार से अभी उड़ा दूंगा तुमने हमारे साथ धोखा किया है राजा को अत्यंत क्रोध में देखकर उत्तम कहने लगा महाराज इस बार इन्हें आप क्षमा कर
दीजिए मैं उम्मीद करता हूं कि अब ये दोबारा गलती नहीं करेंगे उत्तम के कहने पर राजा ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया मित्रों उत्तम की ईमानदारी को देखते हुए राजा ने उत्तम को साबाशी दी और उसे अस्तबल का मुख निरीक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया और कहा कि आज से तुम्हारा काम इतना है कि तुम इन सब पर नजर रखोगे अगर कोई घोड़े का दाना चोरी करता है तो उसकी खबर तत्काल हमें मिलनी चाहिए इस काम के लिए हम तुम्हें हर महीने द हज असर पिया देंगे राजा ने सख्त निर्देश देकर उन सभी नौकरों
को छोड़ दिया और उत्तम कोण पर दृष्टि रखने के लिए नियुक्त कर दिया राजा अपनी उंगली में एक हीरे की अंगूठी पहने था वह अंगूठी उतारकर राजा ने इनाम के रूप में उत्तम को पकड़ा दी और कहा कि जब भी तुम्हें हमसे मिलना हो तो तुमय अंगूठी पहरेदार को दिखाकर हमसे किसी भी समय मिल सकते हो अस्तबल में पहुंचकर उत्तम ने सभी नौकरों को समझाया कि देखो इस बार तो मैंने तुम्हें बचा दिया अगर दोबारा तुम्हारी गलती पकड़ी गई तो राजा साहब तुम्हें जिंदगी भर के लिए जेल में डाल देंगे इसलिए ईमानदारी से अपना काम
कीजिए मित्रों उसी दिन से सारे नौकर ईमानदारी से घोड़ों को खिलाने पिलाने लगते हैं फिर उन्होंने कभी भी बेईमानी नहीं की सारे घोड़ा फिर से स्वस्थ हो गए इधर एक माह का समय बीत चुका था उधर अनंगपाल अपनी मां से मिलकर अपनी नौकरी पर लौटता है जैसे ही अनंगपाल घोड़ों के अस्तबल में पहुंचता है तो सारे नौकरों ने उसे घेरकर उत्तम की करतूत अनंगपाल को बताई कि हमारी चोरी उत्तम ने राजा को पकड़ा दी और राजा ने उसे अस्तबल का मुख निरीक्षक बना दिया है अनंगपाल ने कहा तुम लोग चिंता ना करो मैं वापस आ
गया हूं अब तो उसे यहां से जाना ही पड़ेगा नौकर ने कहा नहीं भाई वो यहां से नहीं जाएगा क्योंकि राजा ने उसे हम सबकी देखभाल करने के लिए नौकरी पर रख लिया है मित्रों उसके बाद में अनंगपाल उत्तम के पास जाता है और उत्तम उस समय कमरे में लेटा हुआ था अनंगपाल को देखकर उत्तम एकदम खुश हो जाता है और कहता है मित्र तुम आ गए तुम्हें देखकर मुझे बड़ी खुशी हुई अनंगपाल उत्तम के पास में बैठ जाता है उसके बाद उत्तम वहां जो घटना घटी थी उसके बारे में अनंगपाल को बताता है अनंगपाल
कहने लगा तुमसे पहले मुझे इस बात का पता लग चुका है उसके बाद दोनों साथ-साथ बैठकर भोजन करते हैं और भोजन करने के बाद अपने अपने बिस्तर पर लेट जाते हैं अनंगपाल मन ही मन उत्तम से बहुत जल रहा था क्योंकि राजा ने उसे उससे भी बड़े पद पर नौकरी दे दी थी और उसने नौकरों की चोरी राजा को पकड़ाई थी इसलिए अनंगपाल उससे जलने लगा था क्योंकि मित्रों आपको बता दें क्योंकि मित्रों आपको बता दें कि अनंगपाल भी चोरी करता था और उसे और उसे उत्तम का ये बर्ताव बिल्कुल पसंद नहीं आया अनंगपाल उत्तम
को नीचा दिखाना चाहता था उससे बदला लेना चाहता था मित्रों अनंगपाल अपने कमरे में लेट जाता है और उत्तम अपने कमरे में चला जाता है क्योंकि राजा ने उसे एक अलग कमरा दे रखा था उस दिन आकाश में बादल छाए हुए थे हल्की हल्की बारिश हो रही थी बिजली कड़क रही थी उधर राजकुमारी चंद्र प्रभा की आंखों में नींद नहीं थी क्योंकि मित्रों आपको बता दे अनंगपाल और राजा की पुत्री के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था राजकुमारी जब तब अनंगपाल से मिलने आया करती थी क्योंकि आज राजकुमारी को पता चल गया था कि
अनंगपाल अपने नगर से लौट आया है उसने सोचा कि उत्तम तो अब चला ही गया होगा राजकुमारी रात में उठकर अपने महल की छत पर टैर रही थी काम की पीड़ा से जल रही थी उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी वह अपने प्रेमी अनंगपाल से मिलने के लिए उसके कमरे में जाती है सहयोग से उसी समय उत्तम किसी काम से उधर ही घूमने आता है अचानक जैसे ही उत्तम अनंगपाल के कमरे के पास पहुंचता है उसे अनंगपाल के कमरे से किसी स्त्री की आवाज सुनाई देती है उत्तम ने कमरे के अंदर झांक कर देखा तो
अनंगपाल के साथ राजकुमारी चंद्र प्रभा को देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गई उत्तम सब देखकर चुपचाप अपने कमरे की ओर चला जाता है उधर अनंगपाल ने राजकुमारी से कहा प्रिय इस समय उत्तम हमारी राहा का सबसे बड़ा कांटा है कुछ भी करके तुम उत्तम को मरवा दो तो हम निश्चिंत हो जाएंगे राजकुमारी ने कहा प्राणनाथ यह कितनी बड़ी बात है तुम चिंता क्यों करते हो मैं पिताजी से कहकर इसे मृत्यु दंड लवा दूंगी मित्रों उधर उत्तम सोच रहा था कि अनंगपाल राजा की आंखों में धूल झोक कर उनकी बेटी से प्रेम कर रहा
है यह तो राजा के साथ धोखा है मुझे यह खबर महाराज को देनी चाहिए उत्तम यही सोचकर राजा को संदेश देने के लिए राज महल की ओर चलने लगता है तभी उसे साधु महाराज की वो तीसरी बात याद आ जाती है साधु ने कहा था कि अगर किसी का गुप्त भेद पता चल जाए तो उसे किसी तीसरे से नहीं कहना चाहिए वरना खुद मुसीबत में पड़ सकते हो यही बात सोचकर उत्तम के कदम थम जाते हैं सोचने लगा कि अगर यह बात मैंने राजा को बताई तो हो सकता है कि राजा साहब मेरी बात का
विश्वास ना करें कहेंगे कि तू मेरी बेटी को झूठ बदनाम कर रहा है उल्टा मैं ही राजा के क्रोध का भोजन बन जाऊंगा यही सोचकर उत्तम अपने कमरे में लौट आता है और चुपचाप अपनी चारपाई पर लेट जाता है उधर राजकुमारी चंद्र प्रभा अनंगपाल से मिलने के बाद अपने कमरे में चली जाती है और अपने कमरे में पहुंचकर उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और जोर जोर से रोने चिल्ला लगी बचाओ बचाओ की चीख पुकार मचाने लगी राजकुमारी का शोर सुनकर राजकुमारी के नौकर चाकर दास दासिया सभी जाग जाते हैं आनन फानन में राजा
को खबर दी गई दौड़ते हुए राजा साहब अंतापुर में जाते हैं और अपनी पुत्री से पूछते हैं बेटी क्या हुआ तुम क्यों रो रही हो मित्रों अनंतपाल के कहने पर राजकुमारी चंद्र प्रभा ने त्रिया चरित्र रच दिया था एकदम से कहने लगी पिताजी आपने जिस नौकर को नौकरी पर रखा है तुम्हारे इस नौकर ने मेरे साथ जबरदस्ती की है वो रात में मेरे कमरे में आया और मेरी इज्जत लूटने का प्रयास करता रहा जब मैं चीखी चिल्लाई तब खिड़की से कूद कर भाग गया तुम्हारे द्वारा दी गई अंगूठी का उसने नाजायज फायदा उठाया है अंग
रक्षकों को वो अंगूठी दिखाकर महल के अंदर घुस गया होगा बेटी के मुख से य बात सुनकर राजा एकदम आग बबूला हो जाता है कहने लगा पुत्री तुम चिंता मत करो उस दुष्ट की इतनी हिम्मत कि वो हमारे महल में घुस आया मैं अभी उसे बुलाकर उसकी खबर लेता हूं राजकुमारी ने कहा पिताजी उसकी खबर लेने से कोई फायदा नहीं है उसकी गुस्ताखी के लिए उसे जब तक मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा तब तक मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगी राजा ने कहा बेटी ऐसा ही होगा कल मैं उसे मृत्यु दंड दूंगा राजकुमारी को आश्वासन
देकर राजा अपने महल के लिए चला जाता है इधर राजकुमारी मन ही मन बड़ी प्रसन्न होने लगी सोचने लगी बाजी बा आज मेरा षड्यंत्र सफल हो गया अब मेरे और अनंतपाल के बीच में कोई बाधा नहीं आएगी उसके बाद राजकुमारी निश्चिंत होकर अपने बिस्तर पर सो गई राजा अपने सैन कक्ष में पहुंचे परंतु उनकी आंखों से नींद उड़ चुकी थी वह सोच रहे थे कल सुबह में उत्तम को दरबार में बुलाकर मृत्यु दंड दे दूंगा परंतु तभी उनके दिमाग में एक दूसरा विचार आता है राजा सोचने लगा कि अगर दरबारी लोग मुझसे पूछेंगे किस नौकर
को किस बात का मृत्युदंड दिया गया है तो मैं क्या कहूंगा अगर मैं बताऊंगा कि इसने मेरी बेटी की इज्जत लूटने का प्रयास किया है तो इसमें मेरी ही बदनामी होगी लोग पीठ पीछे मेरी बुराई करेंगे मेरी इज्जत उछा लेंगे तब राजा के दिमाग में एक दूसरा उपाय आता है सोचा कि मैं इसे कानून के तहत तो सजा नहीं दे सकता मैं इसे किसी और के हाथों चुपचाप मरवा दूंगा इससे किसी को पता भी नहीं चलेगा और मेरी बेटी पर बुरी दृष्टि डालने वाला भी अपनी करनी का दंड भोग लेगा तब राजा के दिमाग में
डोंगर कसाई का ध्यान आता है सोचने लगा कि मैं कल इसे कसाई के हाथों मरवा दूंगा यही सब बात सोचते सोचते राजा सो जाता है और अगले दिन जब सोकर उठता है और टहलने के लिए जाता है तो टहलते टहलते नगर से बाहर उस डोंगर कसाई के बूचड़ खाने पर पहुंच जाता है कसाई ने देखा कि राजा स्वयं मेरे पास चलकर आए हैं तो वो एकदम चरणों में गिरकर बोला महाराज आपने यहां आने का कष्ट कैसे किया मुझे खबर भिजवा देती मैं स्वयं तुम्हारे पास चला आता राजा ने कहा नहीं यह काम तो मुझे आकर
ही करना था मुझे तुमसे कुछ जरूरी काम करवाना है तुम्हारे पास एक आदमी को भेजूंगा तुम्हें उसका सर काट देना है और उसके बाद में फिर एक आदमी को भेजूंगा एक कपड़े में बांधकर तुम्हें उसी सर को को उस आदमी को दे देना है इस बात की किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए यह सुनकर कसाई एकदम चौक जाता है कहने लगा महाराज यह आप क्या कह रहे हो राजा ने कहा हां मैं ठीक कह रहा हूं कुछ देर के बाद तुम्हारे कसाई खाने में एक आदमी को भेज रहा हूं तुम उसे अपने बूचड़ खाने के
अंदर ले जाकर मार देना इस काम के बदले हम तुम्हें बहुत इनाम देंगे यदि तुमने यह काम नहीं किया तो हम तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जेल में डलवा देंगे राजा की धमकी सुनकर कसाई डर जाता है बोला महाराज आप चिंता मत करो आप जिसे भेजोगे मैं उसका सर काटकर उसके धड़ को जानवरों के कटे हुए अंगों के साथ मिलाकर बाहर फवा दूंगा और उसके सर को तुम्हारे पास भिजवा दूंगा मित्रों कसाई को आदेश देकर राजा अपने महल को लौटता है उधर कसाई उस राजा के भेजे हुए आदमी की प्रतीक्षा करने लगता है महलों में
पहुंचकर राजा ने सैनिकों के द्वारा उत्तम को बुलवाया और कहा कि उत्तम मैं तुम्ह किसी जरूरी काम से नगर से बाहर भेजना चाहता हूं और मुझे विश्वास है कि यह काम सिर्फ तुम ही कर सकते हो उत्तम ने कहा बताइए महाराज मेरे लिए क्या आज्ञा है मैं आपके लिए कुछ भी करने को तैयार हूं तब राजा कहता है हे उत्तम तुम्हें इसी समय जरूरी काम से एक कसाई के पास जाना है और वह जो चीज तुम्हें चुपचाप दे तुम उसे ले आना लेकिन एक बात का विशेष ध्यान रखना यह काम तुम्हें बिल्कुल गुप्त रूप से
करना है किसी को इस बात का पता नहीं चलना चाहिए उत्तम ने कहा जो आज्ञा महाराज मैं आपके काम के लिए अभी जाता हूं इतना कहकर उत्तम फौरन उस कसाई के पास के लिए चल देता है मित्रों उत्तम के मन में यह विचार आ रहा था कि राजा का इतना जरूरी काम कौन सा आ गया जो राजा मुझसे करवा रहा है फिर सोचा कि चलो जो भी है कम से कम राजा ने मुझे इस लायक समझा तो मैं उसकी कि मैं उसके किसी कार्य को कर पा रहा हूं मित्रों चलते चलते नगर से बाहर निकल
गया उसने देखा कि एक कुटिया है और कुटिया के बाहर कुछ साधु संत भगवान का कीर्तन कर रहे थे उत्तम उस कुटिया के पास जाकर खड़ा हो जाता है तब एक साधु ने उत्तम को इशारा देकर अपने पास बुलाया और कहा बच्चा थोड़ी देर यहां बैठकर भगवान का कीर्तन करो सब कुछ यही रह जाएगा केवल यही साथ जाएगा तब उत्तम ने कहा क्षमा करना महाराज मैं किसी जरूरी काम से जा रहा हूं इस समय मैं रुक नहीं सकता इतना कहकर उत्तम आगे बढ़ जाता है तभी अचानक उसके दिमाग में साधु बाबा की चौथी बात गूंजने
लगती है कि चाहे कितना ही जरूरी काम क्यों ना हो लाखों का नुकसान हो जाए अगर रहा चलते कोई प्रेम से दो मिनट बैठने को कहे तो उसके पास दो मिनट जरूर बैठना चाहिए साधु की यह बात मन में आते ही उत्तम उन साधुओं की मंडली में बैठ जाता है और भगवान का भजन कीर्तन करने लगता है उधर अनंगपाल सोचने लगा कि राजा ने सुबह सुबह उत्तम को अपने पास क्यों बुलाया है और वो अभी तक लटकर क्यों नहीं आया मित्रों अनंगपाल राज महल के आसपास ठहर रहा था तभी खिड़की से राजा ने देखा कि
अनंगपाल महल के बाहर ठहर रहा है तब राजा ने अनंगपाल को तुरंत अपने पास बुलवाया और सोचा कि क्यों ना अनंगपाल को ही उत्तम का सर लाने के लिए भेज दू अब तो कसाई ने उसका सर धर से अलग कर दिया होगा राजा ने तत्काल अनंगपाल को आदेश दिया कि तुम इसी क्ण कसाई के बूचड़ खाने पर चले जाओ और कसाई तुम्हें जो चीज भेंट करे उसे चुपचाप लेकर चले आना और लाकर राजकुमारी के कक्ष में रख देना रास्ते में तुम उस सामान को खोलकर देखने की भूल मत करना अनंगपाल ने कहा जैसी आज्ञा महाराज
और इतना कहकर अनंगपाल कसाई के पास को चल देता है मित्रों आपको बता दें कि पहले कसाई के पास उत्तम को जाना था लेकिन उत्तम तो वहां साधु संतों के साथ कीर्तन करने में मस्त हो गया था इधर तब तक अनंगपाल कसाई के पास पहुंच जाता है और बोला भाई मुझे राजा साहब ने भेजा है उन्होंने बताया कि कोई जरूरी चीज तुम्हारे यहां से ले जानी है मित्रों कसाई ने समझ लिया कि मुझे इसी का सर कलम करना है कसाई कहने लगा हां भाई तुम अंदर चलो मैं अभी आता हूं अनंगपाल नहीं जानता था कि
कसाई ने उसे अंदर जाने के लिए क्यों कहा है अनंगपाल राजा की योजना से बिल्कुल अनजान था वो चुपचाप अंदर चला जाता है कसाई ने कहा सामने अलमारी में राजा ने जो वस्तु मंगाई है वो रखी है कृपया निकाल लो मित्रों अनंगपाल जैसे ही अलमारी खोलता है वैसे ही कसाई अपना धारदार गड़ासा अनंगपाल की गर्दन पर चला देता है अनंगपाल की गर्दन धड़ से कटकर अलग जा गिरी कसाई ने उसे एक पोटली में बांधा और रख दिया उसके धड़ को उठाकर गिद चील कौओ को खाने के लिए बाहर फेंक दिया कसाई राजा के दूसरे नौकर
के आने का इंतजार करने लगता है उधर उत्तम साधु संतों के साथ बैठकर भजन कीर्तन करने में मस्त था जब काफी देर हो गई भन कीर्तन में उसे बहुत आनंद आ रहा था सभी साधु कीर्तन बंद करके चले जाते हैं उधर उत्तम भी वहां से चलता है तब उसे ध्यान आया कि राजा ने कसाई के पास मुझे भेजा था एकदम कसाई के घर की तरफ उत्तम दौड़ने लगता है थोड़ी देर में जब वो कसाई के पास पहुंचता है तो कहने लगा कि मैं महाराज के पास से आया हूं उन्होंने कोई चीज मंगाई है कसाई बोला
हां भाई मैं समझ गया कसाई ने वही पोटली उठाकर उत्तम को पकड़ा दी जिसमें अनंगपाल का सर बंधा हुआ था कसाई ने उसे समझाकर भेज दिया कि भाई इसे खोलकर रास्ते में मत देखना वरना राजा साहब तुम्हें फांसी पर चढ़ा देंगे इस तरह से उत्तम अनंगपाल का सर लेकर राजा के पास पहुंचता है राजा और उनकी बेटी उस समय एक ही कक्ष में मौजूद थे राजा कह रहा था बेटी आज उत्तम का काम तमाम हो ही गया कुछ ही देर में अनंगपाल उत्तम का सर लेकर आता होगा मित्रों इतने में उत्तम वो पोटली लेकर राजा
साहब और राजकुमारी के कमरे में दाखिल होता है उत्तम को जीवित देखकर वे दोनों अचंभित रह जाते हैं कहने लगे अरे तुम तुम यहां कैसे जवाब दिया महाराज कैसी बातें करते हो आपने ही तो मुझे कुछ विशेष वस्तु को लाने के लिए कसाई के पास भेजा था कसाई ने जो चीज मुझे दी है वह मैं लेकर सीधा चला आ रहा हूं मैं तो कहीं एक मिनट भी नहीं ठहरा हूं ठहरी महाराज अभी खोल कर दिखाता हूं मित्रों उत्तम ने जैसे ही पोटली खोली तो उसे देखकर राजकुमारी के साथ-साथ उसके कंठ से भी चीख निकल पड़ी
उसने देखा कि अनंगपाल का कटा हुआ सर उस पोटली में बंधा था उत्तम का चेहरा पसीना पसीना हो जाता है राजा को यह समझते देर नहीं लगी उत्तम की जगह कसाई ने अनंगपाल का सर काट दिया है जरूर अनंगपाल उत्तम से पहले वहां पहुंच गया होगा कसाई तो दोनों को पहचानता नहीं था कि किसको मारना है और किसको छोड़ना है तो रोते हुए वो पूछने लगा महाराज यह क्या मामला है आपने अनंगपाल को क्यों मरवा दिया राजा के पास कोई जवाब नहीं था इतने में राजकुमारी अनंगपाल के कटे हुए सर को लेकर जोर-जोर से रोने
लगती है कहने लगी मेरे प्रियतम मैं नहीं जानती थी कि मेरी चाल तुम्हारे लिए ही उल्टी पड़ जाएगी वरना मैं ऐसा खेल कभी नहीं खेलती तुम्हारे कहने से ही मैंने उत्तम पर आरोप लगाया था तुम्हारी खुशी के लिए ही मैं उसे मारना चाहती थी लेकिन उत्तम बड़ा ही खुश किस्मत है वह फिर भी जीवित बच जाता है राजकुमारी पागलों की तरह रो रही थी राजकुमारी के मुख से जब यह बात राजा ने सुनी तो राजा की आंखें फटी की फटी रह गई राजा को पता चल गया कि मेरी बेटी ने निर्दोष उत्तम पर दोष लगाया
था राजा एकदम से क्रोध में आकर अपनी तलवार खींच लेता है और अपनी पुत्री से बोला पुत्री सच सच बताओ क्या उत्तम को जान से मरवाना तुम्हारी एक चाल थी सच सच बताओ वरना मैं तुम्हारी गर्दन उड़ा दूंगा मित्रों डर के मारे राजकुमारी ने सारी बात सच सच अपने पिता को बता दी यह सुनकर राजा सर को पकड़ कर बैठ गया राजा की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा कहने लगा यह मैं क्या करने जा रहा था मैं एक निर्दोष व्यक्ति को अपनी दुराचारी बेटी के कहने पर जान से मारने वाला था भगवान तुमने मुझे
बचा लिया मुझे माफ करना मित्रों इधर राजकुमारी ने देखा कि राजा साहब मुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे तो उसने तलवार लेकर खुद ही अपने पेट में घोंप और मरते मरते कहने लगी पिताजी मुझे माफ कर देना मैंने एक निर्दोष आदमी की जान लेनी चाही भगवान ने मुझे मेरे कर्मों की सजा दे दी है मुझसे मेरा प्रेमी छीन लिया इतना कहते कहते राजकुमारी ने अपने प्राण छोड़ दिए मित्रों उस घटना से राजा को वैराग्य हो जाता है अगले दिन राजा ने दरबार में अपना अपराध स्वीकार कर दिया और कहा कि मैं अपना यह राज त्याग रहा हूं
मैं आपका राजा कहलाने के योग्य नहीं हूं इसलिए मैं अपने स्थान पर अपने नौकर उत्तम को यहां का राजा नियुक्त करता हूं राजा का फैसला सुनकर सभी दरबारी हैरान थे सबने मिलकर राजा को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन राजा फैसला कर चुका था और वह उत्तम को राजगद्दी सौंपकर भजन करने के लिए जंगल को चला गया सब लोगों ने उत्तम को अपना राजा स्वीकार कर लिया नए राजा के रूप में उत्तम बड़ी कुशलता से राजका चलाने लगता है कहते हैं अगर किस्मत में राज शरी लिखी है तो दूसरे देश में जाकर भी तुम राजा
बन जाओगे कहने लगा हे प्रिय पत्नी गिद्धनी यही उस राजा की कहानी है जो ईश्वर का न्याय होते मैंने अपनी आंखों से देखा है दुष्ट दुराचारी को सजा मिलती मैंने अपनी आंखों से देखा है अकारण हमें किसी पर लांछन नहीं लगाना चाहिए वरना ईश्वर का डंडा उल्टा भी चल जाता है मित्रों उत्तम राजा तो बन गया मगर उसके दिमाग में एक बात घूम रही थी कु उन साधु महाराज की उन पांच बातों ने मेरी जान बचाई है यहां तक कि मुझे यहां का राजा भी बना दिया मुझे उ से मिलने जाना चाहिए ऐसा निश्चय करके
राजा उत्तम चंद स सम्मान साधु को भेंट लेकर उनके आश्रम पर जाता है और उन्हें प्रणाम करता है राजा ने पूछा महाराज मैं आपसे एक बात जानना चाहता हूं मुझे पहचानो मैं वही व्यक्ति हूं जो कुछ दिन पहले आपके साथ रास्ते में मिला था और आपने मुझे पांच बातें बताई थी आज मैं एक राजा बन गया हूं आपकी बातें मेरे जीवन में बहुत काम आई मैं यह जानना चाहता हूं कि आप तो एक साधु संत है और मोह माया से अलग कहते कि मोह माया से अलग होने के बाद ही एक साधु बनता है फिर
आपने मुझे पांच बातें बताने के बदले में मुझसे सण मुद्राए क्यों ली आप मुझे उपदेश बिना कीमत लिए भी दे सकते थे परंतु आपने एक एक उपदेश के लिए एक एक सण मुद्रा ली तब साधु कहता है बेटे कहते हैं मुफत की चीज को लोग जीवन में ठीक से उपयोग में नहीं लाते उपयोग में वही लाते हैं जिसमें मेहनत लगी हो जिसमें कठोर श्रम लगा हो जिसम लगा हो मुफ्त की वस्तु को लोग मुफत के धन को पानी की तरह उड़ाते हैं अगर मैं आपको ज्ञान मुफत में देता तो शायद आप उसका पालन नहीं करते
क्योंकि आपके पास से उन बातों के बदले में सोने की चार असफिया गई थी इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह मुक्त की खाने के पीछे ना पड़े सदैव परिश्रम करके ही कमा करर खाए वही फलदाई होता है रही मेरे लोभ की बात तुम तो मेरे अंदर लेस मात्र भी लोभ लालच नहीं है तुमने जो चार स्रण मुद्राएं मुझे दी थी वो आज भी मैंने संभाल कर रखी हैं तुम चाहो तो अब इन्हें ले जा सकते हो यह मेरे किसी काम की नहीं है इन्हें ले जाकर गरीबों में बांट देना साधु से मिलकर राजा उत्तम चंद
अपने नगर में आकर सुचारु रूप से राज काज को चलाने लगता है मित्रों इस कहानी का तात्पर्य यह है कि जीवन में कोई भी चीज मुफ्त की नहीं लेनी चाहिए दूसरी बात हमें किसी के साथ धोखा नहीं करना चाहिए तीसरी बात किसी के द्वारा दिया गया ज्ञान उपदेश को सुनकर हमें भूलना नहीं चाहिए बल्कि उसे जीवन में समय समय पर उपयोग में लाना चाहिए दर्शक बंधु यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट में जरूर बताना मिलते हैं आपसे अगली कहानी में एक और चर्चा के साथ आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद जय श्री कृष्णा