सारे संसार का सार शरीर है शरीर नहीं तो आपकी मालक मकान दुकान रिश्ते नाते शरीर तक है शरीर ढला सब ढल गए जैसे सभी वृक्षों का आधार पृथ्वी है ऐसे सारे संबंधों का आधार शरीर लौकिक संबंध शरीर का सार इंद्रियां है इंद्रियों का सार मन है मन का स्वामी प्राण है प्राण का स्वामी चिति शक्ति है चेतना चदा वली चदा का सार जीव है और जीव का सार सच्चिदानंद परमात्मा है इसीलिए उपनिषदों ने कहा कि प्राणायाम करके जिसने अपने चंचलता और पातक का शमन किया है वह इस दिव्य रहस्य को समझ सकता है उपनिषदों में
बड़ा दिव्य ज्ञान है लेकिन संयम सदाचार और साधन के बिना उसका साक्षात्कार नहीं होता दुनिया की सारी विद्या जान ले सारा धन अपने आधीन कर ले सारी सत्ता अपने आधीन कर ले फिर भी पूर्ण संतुष्ट पूर्ण सुखी पूर्ण तृप्ति का अनुभव नहीं होगा क्योंकि दुनिया की जो भी चीजें हैं वह प्रकृति की है माया की है परिवर्तनशील है और य जीवात्मा परमात्मा का है परमात्मा शाश्वत है नित्य है अपरिवर्तनीय शव बदल गया लेकिन जीव वही का कौमार्य बदल गया जीव वही का वही किशोर अवस्था बदल गई जीव वही काव युवावस्था बदल जाती जीव वही का
भाई बुढ़ापा आता है और मौत उसे भी बदल देती है फिर भी जीव वही का वही वही जीव पुण्य के बल से स्वर्ग जाता है पाप के बल से नरक जाता है मिश्रित कर्म होते तो फिर मनुष्य देह में आता है कुछ विलक्षण कर्म होते तो नीच योनियों में जाता है अति नीच कर्म होते तो वृक्ष आदि योनियों में जाता है लेकिन जीव वही का वही तो जीव शाश्वत है उसके शरीर नश्वर है जीव शाश्वत है उसके संबंध सापेक्ष हैं कल्पित है तो अब जीव शाश्वत है तो जीव का स्वभाव क्या है कि जीव सत
है जीव चेतन है और जीव आनंद का प्यासा है क्योंकि जीव की उद्गम स्थान मूल है परमात्मा सच्चिदानंद श्रीमद् भागवत के पहले स्कंध में आया सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हेत वे ताप प्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नमः जो सत है जिस सत की सत्ता से हमारे में क्रिया शक्ति है जो चेतन है जिसकी सत्ता से हमारे में चि शक्ति चेतना की विशेषता दिखती है क्रिया तो जड़ मशीन भी करती और जो परमात्मा है सत है उसकी सत्ता से क्रिया शक्ति चि है उससे चेतना शक्ति और आनंद स्वरूप है इसलिए हमारे में सुख की झलक
आती है तो अब यह जीव की मांग क्या है बोले आज हम नौकरी चाहते हैं हम अपना विद्यालय चाहते हैं हम फलाना चाहते हैं हम बेटा चाहते हैं हम प्रधान मंत्री होना चाहते हैं नहीं यह आपकी मांग नहीं है आपकी मांग है सभी जीवों की मांग है चाहे मांग के साधन अनेक हो लेकिन मांग की गहराई दो है एक है क्या बताए एक है रस आनंद कहो रस कहो सुख कहो एक ही बात दूसरा शांति तो आप सुख और शांति चाहते धन कमा के भी सुख शांति चाहते शत्रु को मिटा के भी सुख शांति चाहते
बेटा पाकर भी सुख शांति चाहते हैं रिजाइन करके भी सुख शांति चाहते उद्योग करके भी सुख शांति चाहते और साधु बनकर भी सुख शांति चाहते तो एक सुख होता है सापेक्ष ऐसा मिल जाए ऐसा मिल जाए अपनी कल्पना के अनुसार हास तो सुख इसमें ऐसी भ्रांति से वह चीज मिलती है थोड़ी देर सुख रहता है फिर दूसरी इच्छा और दूसरा है निरपेक्ष सुख किसी वस्तु के बिना किसी व्यक्ति के बिना जो सच्चिदानंद स्वभाव है उसका पता चल जाए तो सुख और शांति मुठी में तो जिन्होंने उस सुख शांति की ठीक यात्रा कर ली वह बुद्धत्व
को बुद्धत्व को प्राप्त हो गए जैसे बुद्ध भगवान विश्वामित्र अंगिरा पाराशर आदि शंकराचार्य और जो भी महापुरुष हो गए अथवा सद ग्रहस्ती संत हो गए तो सुख और शांति हमारी मांग है ज विकार से सुख शांति जल्दी दिखती है लेकिन नष्ट भी वैसी हो जाती और आदमी खोखला हो जाता है और संयम से सुख शांति आती है लेकिन देर से आने के कारण सभी लोग नहीं चल पाते हैं अच्छी सूझबूझ के धनी चल पाते हैं जिन्होंने वेदों का स्वाध्याय किया है अथवा कोई पुण्य पुंज है जप ध्यान है वे सच्ची सुख शांति की कीमत जानते
यह मिल गया आखिर क्या मंत्री बन आखिर क्या पायलट बन गए लेकिन पायलटों को एक सिग्नेचर से अदला बदली करने वाले मंत्री का पद तो ऊंचा ऐसे मंत्रियों का भी हाल देखो तो उनकी कुर्सी और उनका सुख शांति भी बरकरार नहीं अटल जी आए थे बोले मैं बापू जी का दर्शन करने गया पानीपत में जो वचन मैंने सुने अभी तक याद है फिर कहते हैं ने दाने दाने पर खाने वाले का होता है नाम सत्संग में जाना भी कोई पुण्य पुंज चाहिए अगले जन्म इस जन्म का तो मैंने कोई पुण्य किया मुझे पता नहीं लेकिन
अगले जन्म का पुण्य है जो मैं यहां पहुंच पाया उज्जैन नहीं जा सका कुछ समय का कोई पुण्य नहीं होगा मैं तो निराश हो गया था अधिवेशन से और 13 दिन की राजनीति के बाद तो स्वाभाविक है प्रधानमंत्री पद से नीचे आ जा मैं तो निराश हो गया था लेकिन सत्संग से बड़ा बल मिला और बापू जी ने चुनाव जीतने की युक्ति भी बता दी और बड़ी शक्ति तो तो व ऐसी बातें करने लग गए कि अभी हमारे को कोई रस नहीं आता है सुख ऐसा वैसा मैं कहा अभी चलो सत्संग में मेरे निवास पर
आए सत्संग में चलो तो सत्संग में चला था कि जहां पुरुषार्थ करने वाला जीव है और ईश्वर की कृपा के साथ ईश्वर के आस्था के साथ जुड़ा है यत्र योगेश्वर कृष्ण यत्र पार्थ धनुर्धर तत्र श्री विजया भूति ध्रुवा नीति में मति जहां भगवान कृष्ण है और पुरुषार्थ करने वाला जीव है वहां श्री है श्री माना संपदा अंदर की श्री है विकारों से बचकर शांति वैभव अंदर की श्री है अंदर की संपदा और बाहर की श्री है यह बाह्य संपदा तो उसे भीतर और बाहर की संपदा मिलती है श्री विजय अंदर विकारों पर विजय और बाहर
शत्रुओं पर विजय तत्र श्री विजय भूति ये भगवान का वैभव है जैसे पानी एक श्री है संपदा है लेकिन पानी से अंगूर का रस बनना यह भगवान का वैभव है चारा ये श्री है लेकिन उससे चारे से गाय दूध बनाती है उस गाय के अंदर जीवात्मा का वैभव है ऐसे आप भोजन करते वह संपदा है रप रुप की थाली लेकिन उस भोजन से आप आंख को पोषित करते बुद्धि को पोषित करते हैं रक्त वाहिनी में रक्त को संचारित करते उसी अन्न से आप ना जाने क्या-क्या अंदर बनाते यह जीवात्मा का वैभव है बाल भी बनाते
नख भी बनाते आप नहीं बनाते बनते तो य जीवात्मा का वैभव है जैसे य जीवात्मा का वैभव शरीर में य बनाता है ऐसे परमात्मा का वैभव सृष्टि में सब बनाता तो आप शरीर के बिना रह सकते लेकिन परमात्मा के बिना नहीं रह सकते बेटे बेटी पत्नी मित्रों के बिना आप रह सकते हैं लेकिन चैतन्य ईश्वर के बिना नहीं रह सकता शरीर मर जाए फिर भी जीवात्मा को परमात्मा तना होती तभी लोक लोका तर में जाता तो जीवात्मा का धोखा यह है कि वह बेचारा बाहर को देखकर उसी से सुख सुखी और शांति होने की दौड़
में लगा है तो भटक भटक के थक जाता है भटक मुआ भेदु बिना पावे कोन उपाय खोजत खोजत युग गए इस सुख शांति को खोजते खोजते न जाने कितने तने जन्मों की पत्नियां छूट गई पति छूट गए बच्चे छूट गए वैभव छूट गए जीव बेचारा हर जन्म में इकट्ठा करता करता और अंत में मृत्यु ने सब पराया कर लिया जीवन भर जिस शरीर को खिलाया पिलाया मौत ने उस उसको भी पराया कर लिया लेकिन जीवात्मा को मौत पराया नहीं करती शरीर को पराया कर लेती है मरने के बाद भी स्वर्ग में नरक में या किसी
जन्म में आप रहते हैं तो जो आप रहते हैं उसका मूल है सुख शांति व मूल है सच्चिदानंद जैसे हर तरंग का मूल है पानी हर गहने का मूल है धातु चाहे सोने का गहना हो चाहे किसी धातु का ह हर घड़े का मूल है मिट्टी ऐसे हर जीव का मूल है सच्चिदानंद परमात्मा व जब तक मूल सुख को नहीं पाता है तब तक गुलाब त्रिदोष नाशक है सुगंधिम पुष्टि वर्धन ज्ञान तंतु को पुष्ट कर अच्छा है लेकिन यह आपकी मान्यता के अनुसार य कितनी देर लोगे छोड़ देना पड़ेगा अगर लेकर बैठा ही है तो
पागलों में गिना जाएगा तो जैसे यह आपने नाक के द्वारा सुख लिया ऐसे जीभ के द्वारा कितना खाओगे कितना चबा होगे कान के द्वारा नाक के द्वारा अथवा सेक्स के द्वारा कितनी देर सुख लोगे वह सुख शक्ति का हराश करता है लेकिन बिना साधन के अपने आत्मा में ध्यान और ज्ञान के द्वारा जो सुख मिलता वह शक्ति की अभिव्यक्ति करता है इसीलिए विश्वा मित्र इतना राज वैभव में भी सुख और शांति नहीं देखी तो लात मार दी बन गए फकीर और की साधना और दोनों भाई पैर चपी करते राम और लक्ष्मण विश्वामित्र इतने महान आत्मिक
शक्तियों का खजाना जागृत किया ऐसे ही सुलभ गारगी और दूसरे लोग तो जितना आप अंदर में सुख शांति में आते उतना आपकी शक्तियों का विकास होता है ऐसी कोई प्रवृत्ति नहीं है जिससे शक्ति का हारास ना हो हा निष्काम प्रवृत्ति से कर्म योग बन जाता है सेवा योग बन जाता है और सकाम प्रवृत्ति से भोग में रोग बढ़ जाता है कभी शास्त्रों में या आपने नहीं देखा कि कोई भोगी मुक्त हो गया भोगी होकर सब पछताते हैं यंग पर्सन सेज लाइफ इज फुल ऑफ जॉय बट वाइस पर्सन सेज लाइफ इज फुल ऑफ सार समझते कि
बड़ी बड़ी ऊंची तरंगों पर नाचते कि मैं डॉक्टर बन जाऊंगा मैं वकील बन जाऊंगा मैं मिनिस्टर बन जाऊंगा और वे बन भी गए आखिर देखो मिनिस्टर को रिटायर डॉक्टरों को रिटायर कर्नल को रिटायर जनलो को देखो तो कुछ नहीं समय की धारा में सब जीर्ण शीर्ण हो जाता है तो भगवान ने कहा इंद्रिया थे शु वैराग्य इंद्रियों के द्वारा जो सुखी होने की आदत है उससे वैराग्य करो अन हंकार वच न विद्या का अहंकार ना धन का अहंकार ना पद का अहंकार ना कोई बाहर की परिस्थिति का अहंकार इंद्रिया थे शु वैराग्य अनंता वच जन्म
मृत्यु जरा व्याधि जन्म के दुख को याद करो कितनी पीड़ा सह के आए हो कितनी गंदी नाली से तो आप मां के गर्भ में प्रविष्ट हुए हो और एमसी का ब्लड पी पी के तो शरीर बना है और फिर उसी योनि से निकलते तोब इतना प्रेशर पड़ता है कि अगले जन्म की स्मृति वाली नाड़ी दब जाती है तो जन्म का दुख है फिर बाल्यकाल का जीव शेश का दुख जुवानी के काम क्रोध पास ना पास जॉब प्रॉब्लम फिर बुढ़ापा तो दुखों की खान है और अंत में फिर जीवन भर जो संजोया संभाला व सब छोड़कर
मरते समय कितनी पीड़ा होती जीव को तो सच्चा सुख शांति नहीं पाया तो कच्चे सुख शांति में जीव बेचारा ठगा जाता है तुलसीदास ने अपनी भाषा में कहा लिखी लिखी लिखी जग लिखो पढ़ी पढ़ी पढ़ी क्या कीन तुलसी हृदय रघुवीर न चीना तो रथा जन्म दन अपने हृदय में जो शाश्वत सुख है शाश्वत शांति और सामर्थ्य का जो उसको नहीं जाना तो आपने पढ़ पढ़ के भी क्या कर लिया लिख लिख के क्या कर लिया सेठ और मंत और साधु बनकर भी क्या कर लिया ग्रहस्ती बनकर भी क्या जख मार लिए आत्म लाभा परम लाभ
न विद्यते आत्म सुखात परम सुखम न विद्यते आत्म ज्ञाना परम ज्ञानम न विद्यते तो अपने आत्मा का अपने मैं का ज्ञान पालो आपको क्या ध्यान में अनुभूति होती है उसका महत्व नहीं है किसको अनुभूति होती है उसका महत्व आप में पूजा पाठ में कौनसे देवी देवता का दर्शन किया उसका महत्व नहीं किसने दर्शन किया जो दर्शन करता है वह कौन है बोले मैं शास्त्री जी हूं तो मैं मैं कहां से उठती है शास्त्री जीय संस्कार है और मैं जहां से उठती है उसको खोजो मैं बाबा जी हूं मैं फलाना हूं तो जो अपनी मैं को
खोजो रमण मर्ष ने खोज ली अपनी मैं को मोरारजी भाई देसाई उनके चरणों में बैठते तो बड़ी शांति बाते थ उन्होंने कहा अमेरिका मेरा प्रवचन था शिकागो में तो मेरे प्रवचन में तो नहीं आए थे कहा था पहले लोगों ने बताया कि य वो कह के गए कि मैं प्रधानमंत्री पद पर भी वह शांति नहीं पा रहा हूं जो रमण महर्षी के चरणों में शांति मिली थी तो सूझबूझ के धनी थे मुरार जी देसाई आईस ऑफिसर से लेकर प्रधानमंत्री तक की मैंने यात्रा की लेकिन जो ब्रह्मण महर्षि के चरणों में सुख शांति मिली वोह और
जगह नहीं तो जो सुख शांति पाता है उनके सानिध्य में चुपचाप बैठे रहे तो उसके तरंग उसके ओरा आभा मिलती है और उस सुख शांति में आप रहो तो प्रकृति में बहुत सारे परिवर्तन हो जा कर सकते उससे सामर्थ्य का सीधा संबंध है प्रसादे सर्व दुखा नाम व अंतरात्मा के ध्यान में जो सुख शांति मिलती उसको प्रसाद कहा कृष्ण ने प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रस उप जाते प्रसन्न चित सया सु बुद्धि पर विष अपना धूलिया डिस्टिक है महाराष्ट्र में दलिया डिस्ट्रिक्ट में शाहजा नगर है छोटा सा नगर है दो तीन एक दो लाख की
बस्ती होगी वहां सत्संग था भीड़ बहुत थी समिति वाले आए बोले य नगर अध्यक्ष है पुरुषोत्तम पाटिल उसका नाम अभी भी कोई फोन करके इंक्वायरी कर सकता है धुलिया डिस्ट्रिक्ट शाहजा नगर पुरुषोत्तम पाटिल नगर अध्यक्ष अभी भूतपूर्व एक्स हो गया बाबा जी यह 72 साल के और बड़ी सेवा किया इन्होंने सत्संग में नगरपालिका की तरफ से सारी सुविधा मिली और उन्होंने खुद 25000 भी दिए तो मैं खुश हो गया कि मैं क्या नेता का हाथ तो दूसरे की जेब में होता है इसने अपनी जेब में हाथ डाला है तो सरप्राइज हुआ मुझे मैंने उससे पूछा
काय पायजे मराठे थे तो 72 साल का बुड्ढा कहता है कि बालक मुला पाइजे मुला मुला बच्चे को अब उसने तो मैंने ऑफर की क्या चाहिए तो हम तो बंद गए मैं कहा अच्छा भाई सूरत आ जाना शिविर में 25 दिसंबर के आसपास शिविर लगती सूरत में और 14 जनवरी 15 जनवरी 16 जनवरी लगती शिबिर अहमदाबाद में तो दो तीन शिबिर अटेंड करने वाले को फिर मनोरथ पूरा हो जाता है तो सचमुच आ ही गया और आ गया तो महाराज पौने दो साल के बाद नासिक आश्रम में जैसे य एकांत में हम आए तो नासिक
में अपना है तो नासिक आश्रम में बुड्ढा बालक लेके आया 72 साल और पौने दो साल पौने 74 साल की उम्र का तो विज्ञान तो इंकार करता है लेकिन ईश्वर शांति में आप रहते तो प्रकृति मदद करती यह बात जैसे मैंने यहां कही ऐसे जाहिर सत्संग में कही तो वो हमारी कैसेट है और सोनी में और दूसरी में आती है तो उसमें आ तो फिर लोग उनको फोन करने लगे शाहजा नगराध्यक्ष पुरुषोत्तम पाटिल डायरी में तो फोन बो कलेक्ट करने वालों ने क तो वो तो फिर दोबारा मिला तो एकदम गलगला हो गया कि बालक
तो मिल गया लेकिन मेरी तो इंटरनेशनल प्रसिद्धि हो गई क्योंकि अमेरिका में दूसरे देशों में भी अपनी कैसेट चलती है जैसे यहां चलाते हैं लोग ऐसे दूसरे देशों में भी कैसेट चलते जहां य बोलते हैं अपन तो इस बात से अपने को यह मानना पड़ता है आपके आत्मा में अथाह शक्ति है इसलिए भाई मेरे को बेटा चाहिए तो ऐसे कंकड़ पत्त्र जैसे आत्माएं भटकते ऐसे बेटे हम नहीं देते दो तीन शिबिर अटेंड करे थे फिर कोई दिव्य आत्मा है तब तो बेटा होना ठीक है नहीं तो मुसीबत हो गई कई ऐसे बाप कैसा बेटा कैसा
तो मानना पड़ता है कि हर चीज में ईश्वरी सत्ता मौजूद है इसीलिए जो पत्थर में भगवान को मानते हैं वह कोई गलती नहीं करते हैं जड़ चेतन जीव जग सकल राममय जाने तो जड़ जो चीज हैं उसमें परमात्मा की घन सुषुप्ति है वृक्ष आदि में क्षीण सुषुप्ति है और हम लों में और जीव जंतु में स्वपना और कोई साधना करके अपने परमात्मा मतत्व को जागृत कर ले तो सच्चिदानंद की चार अवस्था है घन सुषुप्ति क्षीण सुषुप्ति स्वप्न अवस्था देवता से लेकर मनुष्य तक ये स्वप्ना में जी रहे हैं मोह निशा सब सोवन हारा देख ही
स्वपने अनेक प्रकारा अभी आप स्वपना देख रहे हैं हम शास्त्री कुछ वर्षों के बाद आप दूसरा स्वपना देखेंगे हम देवता है हम गंधर्व हैं उसके पहले और स्वपने देख के आए लेकिन हम क्या है वो आपने नहीं जाना जब आप अपने को जानोगे तो आप में और ईश्वर में दूरी नहीं रहेगी देखा अपने आप को मेरा दिल दीवाना हो गया ना छेड़ो मुझे यारों में खुद पर मस्ताना हो गया अब स्वर्ग की भी इच्छा नहीं है नरक का भय नहीं यश की इच्छा नहीं और अपयश का भय नहीं जीने की इच्छा नहीं और मरने का
भय नहीं तृप्त हुए स तृप्त भवति स अमृतो भवति सति लोका ऐसा महापुरुष जो सुख और शांति के मूल तक पहुंच गया वह तृप्त होता है अमृतम होता है उसके दर्शन से अपने को शांति ज्ञान पुण्याई मनोकामना आदि बहुत लाभ होते इसीलिए कहते हैं साधु नाम दर्शन पातक नासन कबीरा दर्शन संत के साहिबा आवे याद लेखे में वही घड़ी बाकी के दिन बाद तो बोले महाराज फिर हम क्या करें आप करो भगवान के नाम का जप शब्दों में बहुत बड़ी शक्ति है यह तो जीभ चलाने से ही लोग मिनिस्टर चीफ मिनिस्टर प्राइम मिनिस्टर हो जाते
लेकिन वह शब्द अगर मंत्र है तो आप सूक्ष्म जगत के साथ जुड़ जाते उन्हीं शब्दों में अगर भगवान का नाम है ओमकार है तो बाबा बाप रे बाप आप ईश्वरी सत्ता से सीधे जुड़ने में सक्षम बन जाते तो जीव तो मंत्र करता है तो उसके बल से ही पाएगा लेकिन जब ईश्वर का नाम है और ईश्वर की प्रीति के लिए करता है तो ईश्वरीय प्रीति ईश्वरीय बल उसको मदद रूप हो जाता है इसलिए बिगरी जन्म अनेक की सुधरे अब और आजु तुलसी होई राम को राम भजी तज कु समाज जो विषय विकारों में और बाहर
के आकर्षणों में ले जाने वाले चलचित्र फिल्म बार उससे बचकर आप थोड़ा ईश्वर के होकर ईश्वर का भजन कर मैं तो कहता हूं कि खाली आप 40 40 दिन के दो अनुष्ठान करो आपके जीवन में बरकत आ जाएगी चमत्कारिक बरकत आ जाएगी मैंने किए एक बार 40 दिन का किया था कायाकल्प दूध पीने का और ध्यान भजन करने का किसी से मिलने कर दूसरी बार बे सके बहुत लाभ होता आप चाहते सुख और शांति बस तो देख के सुखी सुं के सुखी सेक्स करके सुखी बच्चा लेकर सुखी टेंपररी सुख है अंत में नश्वरता और सच्चा
है आत्मा जो मरने के शरीर मरने के बाद भी जो नहीं मरता उधर को जाए मन बस अटल जी कई बार आए लेकिन देवता भी आ जाए तो आपको क्या इंद्र भी आ जाए तो आपको अहंकार नहीं होगा कोई धुत का है तो आपको अंदर दुख नहीं होगा आप जानते हैं कि सब स्वपना है खेल है उपनिषद कहती है जत पदम प्रेप सो दीना शक्रादय सर्व देवता अहो ततो योगिक हर्मन उपक जिस पद को पाए बिना इंद्र देव अपने को कंगाल जैसा महसूस करता है उस आत्म पद को पाकर योगी अहंकार नहीं करता है क्या
आश्चर्य है ऐसा आत्म पद मनुष्य जनी में पा सकते देव योनि में तो भोग की प्रधानता होती है असुर योनि में तो असुरी वृत्ति की प्रधानता होती है नर कों में तो कष्ट की प्रधानता होती यह तो सब खिचड़ी साथ में खाते हुए विवेक की प्रधानता कर्म की प्रधानता य है मोक्ष करि द्वारा मनुष्य जीवन मोक्ष का द्वार है मोक्ष का मतलब क्या कि सब दुखों से सब बंधनों से सदा के लिए मुक्त हो गए जैसे प्रकृति को आया मार दिया और तुम घोड़ा बना दिया गधा बना दिया तो बंधन में आप आपकी नहीं चलती
मरने के बाद कर्मों के अनुसार वासना के अनुसार भटकना पड़ता है प्रकृति भटकाती तो य आप बंधन में है मोक्ष का मतलब है कि आपके ऊपर किसी का दबाव ना रहे प्रभाव ना रहे आप मुक्त हो गए अपने आप में तृप्त हो गए कोई व्यक्ति मिले तब खुशी कोई वस्तु मिले तब खुशी नहीं व तो बड़ा कंगाल है कुछ पाकर जो सुखी होना चाहता है व तो कंगाल है भीख मंगा है कुछ छोड़कर सुख चाहता है कुछ पाकर सुख चाहता है कहीं जाकर सुख चाहता है कहीं किसी से मिलकर सुख चाहता है तो ये तो
बेचारा जीव कंगाली कर रहा है अपने आप में तृप्त बहुत ऊंची बात है य तो अनुभव संपन्न महापुरुषों के संपर्क से होता है विद्वता से भी नहीं होता और मूर्खता से भी नहीं होता अगर विद्वता है और यह पद नहीं पाया तो विद्वता से क्या रोटी कमा के खाया रोटि तोड़ी और क्या हुआ और पा लिया तो फिर क्या जरूरत है शंकराचार्य ने कहा अगर आत्म विश्रांति पा ली नहीं पाई तो विद्वता किस काम में आई पेट भरने के लिए मा बरी शब्द भक्त है न मुक्त है अगर पा भी लिया तो फिर सा विद्या
है वि मुक्त है विद्या व है जो हमें मुक्त कर दे बंधनों से मुक्त कर दे विकारों से मुक्त कर दे परेशानियों से मुक्त कर दे और जब तक सच्चा सुख नहीं मिलेगा तब तक कच्चे सुख का आकर्षण नहीं जाएगा य सच्ची बात है यह छोड़ दो ये छोड़ दो ये छोड़ दो लेकिन पहले कुछ पकड़ा हो तब छोड़ेगा दो प्रकार की माताएं होती है ये आम नहीं है मिट्टी का आम है चूसता है पथरी हो जाएगी सब मारूंगी बच्चे को डराया धमकाया बच्चे ने वो खिलौने काम छोड़ दिया डंडे से त्यागा वैराग नहीं हुआ
त्याग हुआ ठीक है ना दूसरी मांग मेरे [संगीत] लाल आम नहीं है य तो खिलौना है र व गई अपना आम धो धा के घोल के उसकी बिंदी तोड़ी जरा सा दो ब बच्चे के होठ पले अब व अपने आप रगड़े का चूसे का रस आएगा व आम चूसने का गुरु खुद ही बन जाएगा फिर सिखाना नहीं पड़ेगा ऐसे ही गुरु दो प्रकार केते करो ऐसा नाना करो ऐसा ना करो ऐसा ना करो नरक होगा पाप होगा ये होगा फिर चाय छोड़ के कॉफी पिएगा कॉफी छोड़ के शरबत पिएगा शरबत छोड़कर पेप्सी पिएगा पेप्सी छोड़कर
और कुछ पिएगा उसको तो सुख चाहिए ना दूसरे ऐसे गुरु होते हैं भई आ जाना शिविर में आ जाना थोड़ा सा अंदर अपनी थोड़ा उसका पुरुषार्थ करा के अपनी एक जरा सा किरण भेज दी निगाहों के द्वारा संकल्प के द्वारा बस मन को सुख का चस्का लग गया अपने आप चलता है तो ये सारे सत्संग के सारा अर्थ अर्थ ये कि आपका समय कीमती है नकली सुख से आप आप हम वहीं पहुंच जाएंगे जहां और सब खत्म हो गए जहां और लोग गए वहीं हम गुल हो जाएंगे छू हो जाएंगे देर सवेर मूर्ख अंग्रेज बोलते
हैं टाइम इज मनी अंग्रेजों की कहावत है मूर्ख हिंदू उनके सुवाक्य लिखते टाइम इज मनी अरे मूर्ख टाइम देकर तुम मनी कमा सकते हो ज्वेलरी कमा सकते हो यश कमा सकते हो सब कुछ कमा सकते हो लेकिन सब कुछ कमाया हुआ देकर क्या आप टाइम फिर से ला सकते हो क्या आयुष का टाइम इज मनी नहीं है टाइम मनी से कीमती है समय पैसों से कीमती है समय से पैसे तो कमा सकते समय देकर आप खोई हुई इज्जत ला सकते हो खोया हुआ स्वास्थ्य ला सकते हो लेकिन खोया हुआ समय आप फिर नहीं ला सकते
टाइम इज मनी य बड़ी छोटी-छोटी बात है समय सबसे ज्यादा कीमती अभी आपने इतने वर्ष देकर जो विद्वता के सर्टिफिकेट अथवा धन अथवा जो पायलेट या और कुछ वो सब का सब आप देकर जो समय दिया वो वापस आ सकता है क्या आयुष बढ़ सकती है क्या उतनी तो टाइम मनी से ज्यादा कीमती है समय बड़ा कीमती तो कीमती से कीमती आत्मा को खोजने में और आत्मा के रस पाने में लगाना चाहिए समय से बढ़कर और कोई कीमती चीज नहीं है तो फिर वह समय कीमती से कीमती वस्तु को पाने में लगाना चाहिए नारायण हरि
नारायण हरि नारायण हरि होता रहता है चलता रहता है सुख और शांति के लिए युद्ध भी सुख शांति के लिए किया जाता है बोलो नहीं और युद्ध का कंप्रोमाइज का के लिए किया जाता है सुख शांति के लिए शादी भी सुख शांति के लिए और डायवर्ट्स नहीं बनती तो ये चली जाए अथवा इनसे मैं डाइवर्ट दूसरा करूंगी या तो मैं ऐसी रहूंगी सुख शांति के लिए चोरी भी सुख शांति के लिए की जाती है चोरी कर ले आराम से खाएंगे आराम से रहेंगे अ चोरी नहीं करेंगे ईमानदारी ईमानदारी भी सुख शांति का लक्ष्य होता है
सभी का उद्देश्य वही है दुनिया में कोई नास्तिक नहीं है ईश्वर को ना मानो ईश्वर की आकृति को नहीं मानते लेकिन सुख शांति तो ईश्वर सुख शांति स्वरूप है बोले ईश्वर किसको बोलते कृष्ण भगवान है कि राम है कि शिव कि अल्लाह वास्तव में बाबा भगवान कौन है बोले भगवान वह है जो मनुष्य की मांग का नाम है भगवान इंसान की मांग का नाम है अल्लाह मैन की मांग का नाम है गॉड मनुष्य की मांग का नाम है ईश्वर जो सुख शांति क्योंकि सुख और शांति से उत्पन्न हुआ है जो जिससे उत्पन्न होता है वह
उसको पाए बिना चैन नहीं ले सकता है जैसे सागर से पानी उत्पन्न उठा फिर गंगा होकर यमुना होकर कहीं भी तुम्हारे नदी में नाला में लेकिन जाएगा फिर व ही सागर के तरफ क्या ख्याल है और अग्नि चाहे दियासलाई आप ंधी कर दो फिर भी लो ऊपर जाएगी क्योंकि इसका अधिष्ठान सूर्य है अग्नि किसी के घर की हो किसी भी वस्तु से पैदा करो लेकिन उसकी ल ऊपर जाएगी ऐसे जीवात्मा किसी भी जाति का हो लेकिन चाहे सुख और शांति ये सारे धर्मों का सार मिल गया यह पूरे कॉलेज में जिंदगी बिता दो तो नहीं
मिल सकता है इतना माल इधर मिल गया है पायलट शास्त्री जी क्या ख्याल है प्राणी मात्र सुखाय प्रवृति तो एक सुख होता है इंद्रिय गत संयोग जन्य उसको मायावी सुख बोलते हैं बदलने और दूसरा सुख होता है शाश्वत शाश्वत के बल से ही बदलने वाला दिखता है और बदलने वाले में खप जाता आदमी इसी को बोलते माया माया जो हो नहीं और दिखे प्रतिभास सत्ता व्यावहारिक सत्ता और तात्विक सत्ता तात्विक सत्ता तात्विक सुख देगी प्रति भाषिक सता व्यवहारिक सत्ता में व्यवहारिक सुख आभास होता है सुख नहीं मिलता ये सुख का आभास होता है जैसे वो
दादर की बीमारी ने खुजला लिया जरा हश ऐसे ही सुख जैसा लगता है सुख नहीं होता थोड़ा सा इच्छा होती है डिजायर वो डिजायर शांत ई तो सुख तो अंदर से आया शादी हो जाए मंगनी हो जाए हो गई ओ शादी के दिन तो लगता था कि आहा अब तो सुख का दरिया छलके लेकिन फिर देखो गुलाम नबीर जा रहा था शू बूट पहर था हाथ में कवर था आसमान से बातें उड़ाने ले रहा था एक पैर इधर तो एक ढाई फुट पर नहीं तो दो फीट की चाल होती है ढाई फीट गया अपनी प्रेसी
को दिया आई लव यू इधर लेटर मेरे अब्बा जान राजी हो गए तेरी मेरी शादी पक्की हो गई बा अब वो चार पाच साल के बाद गुलाम नबीर उसी सड़क से गुजर रहा है शादी तो हो गई ना अब उसी सड़क से गुजर रहा हाथ में तीन थलिया है एक पर ठगड़ा मारा हुआ है दूसरी थोड़ी सी फटी तीसरी ठीक ठाक है प्लास्टिक की केरोसिन का डब्बा है छोटा सा और एक लंबी लिस्ट है पा की मसूर की दाल दो रुपए की प्याज पाच रुप का लहसुन रप के चावल आधा किलो गुड़ और एक किलो
चीनी आधी आधी लिस्ट लग सेठ जी 50 रप अभी ले लेंगे बाकी का मैं पगार में दूंगा आंखें दबी हुई है गाल दबे हुए हैं आंखें दबी हुई है पेंट पे एक थिग लगा हुआ है पीछे क्यों गुलाम नबीर क्या हालत बोले शादी है बर्बाद यारो याद रखियो शादी है बर्बादी यारो याद रखना फिर ना कहना फिर ना रोना शादी शद बहुत दिखेंगे कोई न सुख का दाता है सुख के कारण चमड़ा चाटे फिर भी दुख पाता है यारो शादी है बर्बादी नहीं नहीं शादी बर्बादी नहीं है अति सेक्स बर्बाद पूनम है अमावस्या है अष्टमी
है जन्म दिवस है तवार उस दिन संभोग किया तो जल्दी खत्म हो जाएगा बच्चे विकलांग पैदा होंगे हल्के दिन संभोग करने से तो सुख शांति के लिए तो कर रहा था मिला तो क्या दुख अब दूसरों को सुनाया जा रहा है लेकिन कोई मानता नहीं वह भी उसी रास्ते जा रहे हैं हा यार कहते तो ठीक हो लेकिन मेरी मंगनी हो गई कर देखेंगे सा अपने आश्रम में शिवलाल है वो किसी जवान की शादी की बात चल रही थी तो व आश्रम में आ गया काका तो काका ने उसको समझा कि भाई शादी में कोई
सार नहीं है ऐसा ऐसा काका ने लेक्चर दिया उसको फिर जवान जब उठा तो बोले क्या मेरे उपदेश की कोई असर हुई बोले काका तुम शादी करके बेटे बेटी करके तुम तो बैठे हो और मेरे को मना करते हो मैं तो करने वाला [हंसी] हूं बोले तू भी अपने अपने मनरी काट ले भाया देखले तुम का मले मने काई मल के थाने मले को नारायण हरि नारायण हरि बस भगवान के नाम में प्रीति हो जाए भगवान के गुण में ज्ञान में प्रीति हो जाए तो फिर आसान है ईश्वर प्राप्ति जैसा आसान तरीका और दुनिया में
कुछ नहीं जिनको गुरु मिल गए और प्यास लग ग उनके लिए ईश्वर संसार से तरना तो गोखुर की नाए है गो पद की नाए है राम जी भगवान राम के गुरु कहते हैं राम जी विचार वान के लिए तो संसार सागर से तरना गोपद किनाई और मूर्खों के लिए तो संसार सागर गंभीर है इस कई डूब गए इसमें जो नित्य सत्संग करते हैं और सा सोचते हैं कि अपना मौत आए उसके पहले अमरता को जान ले बुड्ढे हो जाए उसके पहले तत्व को जान ले कान बहरे हो जाए उसके पहले सार बात को जान ले
आंखें ढीली पड़ जाए उसके पहले सार तत्व को समझ ले कुट शमशान में ले जाए उसके पहले कोई सदगुरु मिल जाए और अंतर्यामी राम में ले आए हाए है कल्याण हो जाए [संगीत] ओ हम