सद जी महाराज स को सुनाते कि एक समय देवऋषि नारद घूमते घाम विशाला पुरी में पहुंचे जहा सनक सनन सनत सनत कुमार चारों भाई बैठे चारों भाईयों की उम्र तो पूर्वजों के पूर्वज थे लेकिन योग बल से सदा पाच साल के लगते थे ज्ञान के पगा थे और अपने परब्रह्म परमात्मा का उनको साक्षात था उन मुनीश्वर ने देखा कि नारद जी इस विशाला नगरी में आ रहे नारद जी को देखकर मुनीश्वर ने पूछा कि नारद जी आज आप अतृप्त पुरुष की नहीं दिखाई दे रहे हैं जैसे किसी का कोई कल कारखाना बंद हो गया हो
अथवा किसी को इनकम टैक्स की रेड पड़ी हो या अथवा और कोई मुसीबत आई हो तो जो आदमी जितना जैसा हताश सा और दौड़ा सा जाता है उस प्रकार नारद की दशा देखकर मुनीश्वर ने पूछा कि अतृप्त आदमी कीना वास्त उलझे हुए जीव कीना नारद जी आप कहां कहा जल्दी जल्दी जा रहे हो नारद जी कहते मुनीश्वर कलयुग का प्रभाव ऐसा तो फैल गया है कि कलयुग का मित्र अधर्म जहां त अपने पैर पसार चुका है शांति सुता और माधुर्य मानो धरती से सूख रहा है मैं पृथ्वी के प्रयाग काशी रंग क्षेत्र पुष्कर हरिद्वार और
बड़े-बड़े तीर्थों में गया वहां भी देखा कि मनुष्य को शांति मिलने की कोई व्यवस्था नहीं वहां भी है धमाधम और पाखंड हों ने वहां वास किया मंदिरों का सत्व यवनों ने नष्ट कर दिया और तीर्थों का सत्व पाखंड ने नष्ट कर दिया कथा का सत्व स्वार्थ ने नष्ट कर दिया और शांति की कोई कीमत समझने वाला व्यक्ति शांति पाने के लिए भटके तो कोई जगह ही नहीं पूरी धरती मैंने छान मारी कहीं सुख और शांति नहीं शांति धन से बड़ी है शांति सत्ता से बड़ी है शांति सौंदर्य से बड़ी है खूब सुंदर हो अंदर में
अशांति की आग हो तो क्या सौंदर्य किस काम का शांति सौंदर्य से बड़ी है शांति सत्ता से बड़ी है सत्ता दीश और अशांत है तो किस काम का उसका जीवन शांति धन से बड़ी है शांति स्वर्ग से बड़ी है स्वर्ग में रहते और अशांति की आग में जले तो ऐसे स्वर्ग को आग लगाओ शांति स्वर्ग से बड़ी है शांति रिद्धि सिद्धियों से बड़ी है यहां तक कि शांति भगवान से भी बड़ी है बोले महाराज कैसे जब तुम्हारा मन शांत होता है तो भगवान प्रकट हो जाता है शांति के बल से भगवान आता है जय राम
जी की चित्त शांत होगा तब भगवान प्रकट होता है शांति भगवान को प्रकट करने वाली है आध्यात्मिक सामर्थ्य प्रकट करने वाली है ऐसी शांति महाराज इस कलयुग में देखने को नहीं मिलती लोग पेट पाल द्वि पाद पशु जैसे हो गए आटा निमक दाल रोजी रोटी और कपड़ा लत्ता की चिंता में भवन के चक्कर में ही पूरे जिसको छोड़ जाना है उन चीजों के लिए तो मरमिट र दिन रात और जो सदा साथ में रहता है उस परमेश्वर शांति के लिए लोगों को समय नहीं और जिस किसी को थोड़ी बुद्धि है समय है तो जहां जाओ
वहां महाराज कलयुग के मित्र अधर्म ने अपने पैर पसा धरती पर विचरण करते करते मैंने आश्चर्य देखा निंद्रा बन में एक महिला है उसके दो बेटे हैं मां तो जुवान है और बेटे बूढ़े और मूर्छित महाराज में चकित हो गया मां विलाप कर रही है दुखी है इर्दगिर्द उसकी परिचारिका है सेविका है कोई पंखा कर र तो कोई पानी चटक रही कोई संस बधा रही महाराज में उधर को गया उस महिला की नजर मेरे पर पड़ी भो भो साधु क्षणम ति हे संत पुरुष सुनो सुनो जरा देर ठहरो आपको देखकर मुझे थोड़ी शांति मिल रही
महाराज मेरा दुख आपके द्वारा ही दूर होगा जब उसने मीठे वचन विनम्र वचन कहे मैंने देखा पूछा कि देवी तुम कौन हो और यह जो सोए हैं ये स्वेत बाल वाले पुरुष कौन है उस देवी ने कहा ये मेरे पुत्र है मेरे तो बाल काले हैं और इनके बाल सफेद हो गए मैं तो यती हूं और यह बूढ़े हो गए नारद जी ऐसे तो हम अव्यक्त रूप में रहते हैं लेकिन कभी कभार तुम जैसे संत के प्रभाव से हम साकार रूप में दिखाई देते हैं मेरा नाम भक्ति है और इन पुत्रों का नाम ज्ञान और
वैराग्य है कर्नाटक में मैं उत्पन्न हुई बंग देश में मैं बड़ी हुई महाराष्ट्र में मैं सम्मानित हुई द्रवीण देश में मैं भी पुष्ट हुई महाराज गुजरात में मेरा अंग भंग हुआ पाखंड के कारण मैं जीर्ण सन हो गई अब वृंदावन में आया हूं भगवान की लीला स्थली इससे मैं तो थोड़ी पुष्ट हुई युती हूं लेकिन मेरे बेटे तो मूर्छित से जगते ही नहीं है महाराज पुत्र वृद्ध और बेहोश तो मां कितनी दुखी होती होगी महाराज आप मेरे कष्ट का निवारण करो मैंने पूछा यह सब माया कौन है देवया उसने कहा कोई गंगा है तो कोई
यमुना है तो कोई प्रयागराज यह सब तीर्थ है कलयुग का प्रभाव आने से तीर्थ तो चले गए स्वर्ग में अपने पर्व के दिन कभी कबार आते लेकिन मैं तो इस धरती पर ही विचरण करती हूं महाराज मेरा भी ये बुरा हाल कर दिया कल राजा परीक्षित ने कलयुग को क्यों ठहरने दिया और भगवान श्री हरि ने कलयुग कलयुग को बनाया क्यों यहां वो भगवान और परीक्षित में दोष नहीं देखती अपनी व्यथा सुनाती भगवान ने क्यों मनाया जैसे बालक को हर चीज मिल जाती है लेकिन कभी-कभी मां बाप जानबूझ के सोचते हैं कि बालक अपने पुरुषार्थ
से उस जगह को पहुंचे कभी गिरा हुए बालक को तो मां बाप उठाते लेकिन कभी कभार मां बाप सोते हम नहीं उठाते अपने बल से उठे ऐसे ये युग गिराने वाला है और हरि टुकर टुकर देख रहे हैं ये गिराने वाले युग में भी मेरे बेटे मेरे बच्चे कथा कीर्तन सत्संग और पुरुषार्थ करके उठे और मुझसे गले लगे तो और पुरुषार्थी माने जाएंगे और कलयुग को श्री हरि ने क्यों ठहरने दिया परीक्षित ने कलयुग को देखकर परीक्षित ने तो तीर का मन उठाया तेरे को नष्ट करूंगा कलयुग असली रूप में आ गया राजा ऐसा वेश
था फिर असली रूप में प्रकट हुआ महाराज आप मुझे ना मारिए ना मुझे रहने के लिए आपके देश में कहीं जगा दीजिए महाराज मेरे में दोष तो बहुत है लेकिन एक बड़ा भारी गुण है सतयुग में सत्य धर्म का पालन करते हुए 12 वर्ष तप करने से जो मिलता था द्वापर त्रेता में पूजा और यज्ञ करने से जो मिलता था कलयुग में वो केवल हरि नाम कीर्तन हरि नाम की माला से उतना लाभ हो यह मेरे में सदगुण है महाराज इसलिए मुझे रहने दीजिए महाराज ने रहने तो दिया कलयुग दूर दूर जाकर खड़ा हसा बोले
क्यों हसता है रे बोले महाराज एक माला जब घुमाने दू तब चौरस में तो घंटो भर बत जाते हैं ट्रेन में गप सप लगाने में तो घंटों भर बत जाते लेकिन माला लेकर कोई बरले विरले लो जप कर पाते बाकी तो कलयुग उनकी खोपड़ी को खूब घुमा देता है इसलिए पुरुषार्थ कर के कलयुग में जप तप करना चाहिए माला घुमाना चाहिए मैं दुबई गया तो दुबई की फुटपाथ पर मैंने कई मुसलमान जवानों को देखा के हाथ में सुमरनी लेकिन हिंदू जवान के हाथ में कहीं मैंने माला नहीं देखी मुझे बड़ा दुख हुआ चि माला मुझसे
लड़ पड़ी तू क्यों बिसरे मोए बिना शस्त्र के सूरमा लड़ता ना देखा कोई बिना हथियार के सूरमा लड़ नहीं सकता युद्ध में ऐसे माला के बिना तुम्हारा मन उस विकारों से उस अशांति से जूझ नहीं सकता इसलिए तुम्हारे पास एकाद भगवान के याद दिलाने वाली हरि स्मरण करने वाली माला होनी चाहिए और जब जब नियम करो तब तो जपो और भी कभी मौका मिले तो माला लेकर बैठ गए नारद जी कहते हैं कि मैंने जब पूछा तो इन्होंने कहा भक्ति ने कहा ये मेरे सब तीर्थ है देवियां है महाराज आप ही मेरा दुख दूर करोगे
मैंने कहा बाले तू चिंता मत कर मैं तुझे जन जन में स्थापित करूंगा मैं श्री हरि का भक्त हूं हे भक्ति देवी तेरी सब जगह सब हदय में स्थापित स्थापना करूंगा मैं उपाय खोजने लगा कई मंत्र और कई मैंने अपने जो कुछ विद्या थी उसका उपयोग किया लेकिन वो ज्ञान वैराग्य सजा नहीं हो रहे थे आखिर आकाशवाणी हुई के उद्योग करो उपाय खोजो सफल हो जाओगे मैंने सोचा आकाशवाणी भी अस्पष्ट ही कहा उद्योग करे तो कौन सा करे सफलता तो मिलेगी लेकिन कैसे मिलेगी मैं आश्रमों में ऋषिवर में इधर उधर घूमा लेकिन इनके ज्ञान वैराग्य
के पुष्ट होने का कोई उपाय नहीं बता पाए महाराज इसलिए मैं उद्वेग सा हुआ हूं कि मैंने उनको वचन दिया है वचन देने में जल्दबाजी नहीं करा करो आप और वचन पूरा करने में कभी देर नहीं करना चाहिए अपनी जिवान की कीमत रखना चाहिए जिसको जीवा की कीमत नहीं उसको अपने जीवन की क्या कीमत होगा उसको अपनी इज्जत की क्या कीमत होगा जीवा की कीमत होनी चाहिए आजकल आदमी बोलते बोलते झूठ बोल देता है ऐसे से बड़े बड़े लोगों को मैंने देखा सीएम जैसे लोगों को मेरे साथ बात करके बोल के गए ये करेंगे और
फिर द पाच दिन के बाद पूछ वाया इन लोगों का भला कि बोले मैंने तो कुछ बुलाने में ध तेरे की तू का का सीएम रहे जय राम जी की इतना सफेद झूठ बोल देते और अपने को बड़ा मानते नहीं नहीं पब्लिक का विश्वास संपादन करना चाहिए आजकल नेताओं के नाम से लोगों को कभी कोई नेता आ जाता है और मैं बोलता हूं 10 पाच मिनट फलाने भाई बोलेंगे लोग उठ के चल देते हैं मेरे को आश्चर्य होता है फिर नेता लोग मिलते बोले बाबा लोग ये तो आपके कारण इतने लोग बैठे हम लोगों को
तो देख के लोग भागते बाबा क्या पता क्या है क्या पता क्या नहीं है जैसा वाणी हो ऐसा वर्तन करो तो लोग तो तुम्हें सुनेंगे और लो भी तुमको देखकर अपनी प्रसन्नता अभिव्यक्त करेगा ऐसा तुम्हारे साथ मदन मोहन माल को लोग कितना प्रेम से सुनते अभी भी ऐसे लोग है बेचारे र नारद जी कहते हैं के संका ऋषि आप ही बताओ कि उसके उपाय क्या उन्होंने कहा बस इसका उपाय हम जानते हैं ज्ञान वैराग्य लोग समझते हमको भक्ति करनी लेकिन ज्ञान और वैराग्य तो मूर्छित उसका ख्याल नहीं रख पाते जब ज्ञान वैराग्य पुष्ट नहीं होगा
तो आप भक्ति किसकी करोगे अगर ज्ञान नहीं होगा तो भक्ति रोती रहेगी तुम जिसकी भक्ति करते हो उसे ईश्वर के विषय का ज्ञान होना चाहिए और तुम जो हो तुम्हारे को अपने मैं कौन हूं इसका भी तो ज्ञान होना चाहिए और जिस प्रपंच से दुख से मुसीबत से आसक्ति से छूटना है उस प्रपंच से वैराग्य भी होना चाहिए तभी आपकी भक्ति पुष्ट होगी ज्ञान वैराग्य अगर मूर्छित रहेंगे तो भक्ति बेचारी लाचार होगी रो होती रहेगी और आपको लोग भगत बोलेंगे अगर आपकी भक्ति के साथ ज्ञान और वैराग्य पुष्ट है तो आप तो जोगेश्वर की नहीं
पूजे जाएंगे इसलिए आपके जीवन में ज्ञान और वैराग्य भी होना चाहिए तब भक्ति की शोभा है भक्ति की विशेषता सं कादी ऋषियों ने कहा कि उनके ज्ञान वैराग्य की पुष्टि के लिए आप श्रीमद् भागवत की कथा सुनाओ ज्ञान वैराग्य की पुष्टि के लिए भागवत की कथा का आयोजन हुआ बड़े-बड़े ऋषि महर्षि तपस्वी जति जोगी आए गंगा किनार भागवत की कथा सुनते सुनते ज्ञान वैराग्य पुष्ट हुए अर्थात भगवान की कथा से ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होता है और हमारी भक्ति चमकती है ये भागवत की कथा है भागवत से भगवती दृष्टि उत्पन्न होती है जहां त भगवान
की वो मधुरता चेतना का दीदार होता है तुम्हें कोई अपना प्रिय मित्र मित्र मिल जाए तो मजा आएगा कि नहीं आएगा लेकिन जहां तहा जिसको अपना प्रिय दिखता है उसके हृदय में कितना मजा होगा कितना माधुर्य होगा तो भागवत आपको जहां तहां अपना वास्तविक प्रिय है जो मौत में भी हटता नहीं ऐसा वास्तविक प्रिय परमेश्वर की खबर सुनाता है और आपका अज्ञान हर लेता है आपका देह अध्यास हर लेता है आद्य शंकराचार्य ने कहा गलते देहस विजा परमात्मने यत्र यत्र मनो जा तत्र तत्र समाध जिसका देह अध्यास गलित हो गया है और अपने परमात्मा स्वभाव
को जिसने जान लिया है उसका मन जहां जहां जाता है वहां वहां उसकी समाधि है भागवत अपने आप में पूर्ण है उसका एक एक स्कंद पूर्ण है एक एक अध्याय पूर्ण है एक एक श्लोक पूर्ण है एक एक वाक्य पूर्ण है और एक एक शब्द पूर्ण है क्योंकि पूर्ण पुरुषोत्तम से निकला है और पूर्ण पुरुषोत्तम कृपा करके कलयुग के जीवों को शुद्ध करने के लिए प्रेरणा किया है नारद जी के द्वारा व्यास जी के हृदय में ऐसा श्रीमद् भागवत का प्रसाद है प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रस्य उप जायते वो प्रसाद से सारे दुख निवृत
हो जाते हैं और बुद्धि में परमात्मा रस का प्राग होता है कथा आगे चलती है एक बार परीक्षित की मुक्ति सुनकर ब्रह्मा जी ने स्वर्ग में पद्मासन बांधकर तराजू में हानि कहती है भागवत सात दिन में मुक्ति दे देता है यज्ञ याग करोड़ों हजारों लाखों करोड़ों रुपया खर्च करो और हजारों अनुष्ठान करो उसका पुण्य एक तरफ और श्रीमद् भागवत का इतना सारा लाभ ब्रह्मा जी ने तराजू में और शुभ कर्मों को रखा और भागवत के फल को रखा तो भारी हुआ कहते हैं कि सुखदेव जी महाराज ने जब परीक्षित को कथा सुनाने का आरंभ किया
उस समय आकाश में से देवता आए और देवताओं ने कहा कि महाराज भागवत का रस आप हमें पिलाए बदले में स्वर्ग का अमृत परीक्षित को पिला देते हैं सुखदेव जी ने कहा कि भागवत का रस पीने से तो आदमी के पाप नष्ट होते हैं और स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य नष्ट होते हैं भागवत सुनने से और भगवतम वृति होती है देर सर भगवान मिलते और स्वर्ग के सुख से तो अपसरा मिलती है और देर सवेर पतन होता है तुमको नूर लेकर काच का टुकड़ा बदले में देना चाहते हो तुम बनिया गिरी करते हो तुम
भागवत के सुनने के अधिकारी नहीं यह तो प्रसाद रूप से महापुरुषों के द्वारा दिया जाता है इसका क्रय विक्रय नहीं होता है इसका तो क्रय विक्रय कर नहीं सकते वो इतना सारा महान चीज है देवताओं को इंकार कर दिया श्रीमद् भागवत का तो शिष्य सुनने का अधिकार्य है भक्त सुनने का अधिकार यज्ञ में तो जजमान खर्च करता है धुआ सहता है शौनक ने कहा सरज को कि हम यज्ञ करते करते ताप और धुआ से हमारा तो मुंह और मन मेला ही हो गया है लेकिन श्रीमद् भागवत की कथा से हमारी उज्जवल कांति हुई है हम
आपके बड़े आभारी है जो आपने हमको भगवत रस से सीच दिया है कलयुग केवल हरि गुण गा कलयुग केवल हरि गुण गा गावत नरपा वही भव गावत नरपा वही भवता कलयुग केवल हरि गुण गा कलयुग केवल हरि गुण गा गावत नरपा वही भव था गावत नरपा वही भव कलयुग में हरि गुणगान कर परमात्मा को कहो प्रभु तेरी लीला परम प्रभु कैसा त हरा हरा घास खाती है बकरी गाय भैस सफेद दूध वाह हरी तेरी महिमा नन्नी नन्नी आंखें इन जीवों की कैसे बनाता इन पेड़ों के पत्ते और पत्तों की डिजाइन और फूलों की डिजाइन तोत
कैसे कैसी तेरी व्यवस्था है वह प्रभु तेरी लीला अपरंपार है चलते फिरते जो कुछ दिखे संसार का उसका आश्चर्य देखो क्याक दुनिया बनाई और रोज बनता बिगड़ता रहता है फिर भी तेरी पिटारी में कभी कमी नहीं होती सूरज चंद्रमा तारे आकाश कई बुद्धिमान धरती पर आते हैं कुछ खेलते हैं बोलते हैं प्रसिद्ध होते हैं फिर चले जाते और होते तेरी महिमा अपरम पार है जो तिद भावे सो भली तू सदा सलामत निरंकार इस प्रकार भगवान के गुणगान भगवान को दुला धन्यवाद अगर अपमान होता है सासु डांट है तो वहु रानी सासू मर जाए अथवा सासु
से अलग हो जाए ऐसा पति के कान मत चढ़ा सासु जब डांटे तो उवर को क वाह प्रभु तू मुझे परिपक्व करने के लिए सासु के द्वारा कभी तो युक्ति युक्त तो कभी कैसे ही उपदेश दिलाता है वाह प्रभु तू प्रभु को धन्यवाद और कभी बह इधर उधर आंख दिखाए या गड़बड़ करें तो सासु माता तू बुरा मत मानना बह के द्वारा तेरी आसक्ति छुड़ाने की प्रभु की कैसी व्यवस्था है वह प्र कभी देरानी के द्वारा कुछ हो या जेठानी के द्वारा हो तो उस ईश्वर को धन्यवाद दो ये संसार में आसक्ति मिटाने के लिए
करता है जब आपस में प्रेम होकर चलता है तो तू हमारा विषद मिटाने के लिए सासु के द्वारा स्नेह देता है बह के द्वारा देरानी जेठानी के द्वारा हमारा विषाद मिटाने के लिए तू स्नेह देता है और कभी गड़बड़ दे दे तो तू समझ लेना कि वो परमात्मा तुम्हारा अहंकार और गलती मिटाने के लिए गड़बड़ देता है वह प्रभु तेरी महिमा अपरम पार है आपको भागवती धर्म की मुलाकात हो जाएगी आपको समाज में कोई कोसता हो और झूठ मूठ आपकी निंदा करता हो तो आप उसको धन्यवाद देना कि आप मेरी सहन शक्ति बढ़ा रहे हो
अगर सचमुच में निंदा करता है और आप में गलती है तो अपनी गलती निकालने के लिए किसी को प्रेरित कर रहा है ऐसा समझकर आप अपनी गलती निकालकर बादशाह हो जाइए अगर आपको मान सम्मान मिलता है तो उसे प्यार करना कि तूने मुझे मान सम्मान के योग्य बनाया और उसके अंतःकरण में मुझे सम्मान देने की प्रेरणा की प्रभु सम्मान देकर तू मेरा विषद दूर कराता है और अपमान देकर तू मेरा अहंकार दूर कराता है और विघ्न देकर तू मेरी बेवकूफी दूर कराता है और मेरे में पौरुष भरता है प्रभु तेरी व्यवस्था बड़ी सुंदर है धन्यवाद
है आनंद है मौज है ऐसा नहीं कि भगवान ने ऐसा क्यों कर दिया भगवान ने ऐसी दुनिया क्यों बनाई अरे दुनिया तो अच्छे के लिए बनाई एक आदमी ने कुआ खुदवा के गांव के लोग ठंडा ठंडा पानी मीठा पानी पी लोग पानी भरते थे कोई बेवकूफ दारू पी कुए में अब उसकी मां गालिया देने लगी कि सेठ का सत्याना कुआ खुदया मेरा बेटा मर गया ना कुआ खुदवा तो मेरा बेटा थोड़ी मरता मेरे बेटे को मारने के लिएने कुआ खुदवा दिया बेटे को मारने के लिए कुआ नहीं खुदवा लेकिन कोई कुए में डूब मरे तो
वो सेठ भी क्या करे ऐसे संसार तुम्हारे को डूब मनने के लिए नहीं बनाया संसार तो संसार सागर से पार होने के लिए बनाया फिर कोई अज्ञान से डूब मरे तो वो सच्चा सेठ क्या करे भला बहुत गई थोड़ी रही बहुत गई थोड़ी थोड़ी रही व्याकुल मन मत हो व्याकुल मन मत हो धीरज सबका मित्र है धीरज सबका मित्र है करी कमाई मत खो करी कमाई मत खो गम की अंधेरी रात में दिल को न बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतजार कर जरा जरा बात में अपने को डिप्रेसो प्रभु देत है कपड़ा लकड़ा
आग जिनदा नर चिंता करे उसके बड़े अभग चिंता करता है तो इस बात की कर के दिल में छुपा हुआ दिलभर उसको कैसे पाऊ और कब मिलेगा इस चिंतन कर रोटी की चिंता कपड़े की चिंता उसकी चिंता मुर्दे को प्रभु दे रहा है कपड़ा लकड़ा जो दो दो मर्डर करते खून केस करते उनको भी जेल में रोटी मिलती है तो तेरे को रोटी नहीं मिलेगी नहीं मिलेगी तो इज्जत उसकी जाएगी तेरे बाप को क्या जाता है खा खा के भी तो लोग मर रहे तो नहीं खाके भी मरना ही तो है और क्या है खा
खा के जितने लोग मरे उतना बे खाए कोई नहीं मरा है जय राम जी बोलना पड़ेगा खा खा के जितने लोग मर उतना कोई भूखा नहीं मर रहे खा खा के भी तो मरना है जो भोग भोग के भी मर रहे हैं भोग के तो बीमार हो रहे भोग के तो मर रहे हैं अशांत हो रहे हैं तो भोग कम आ गया तो क्या बड़ी बात है हाय रे हाय उनको इतना बड़ा बंगला और मेरे को तो खाली दो कमरे वाला प्लेट है लेकिन जिसको सात कमरे वाला मकान है या दो कमरे चार कमरे वाला
है वोह भी मेहमान है संसार में और तुम भी मेहमान है यह तो एक धर्मशाला होटल में जा बढ़िया चम्मच बढ़िया ये वो सब धर्मशाला की चीजों का उपयोग करो बाकी बांध के तो साथ में नहीं आ कुछ लोग तो होटल का माल भी हवाई जास का माल भी चमचे मचे य रका जर लेकिन घर में लाकर भी यही रख के जाएंगे वहा तो कोई नहीं ले गया एक चतुर आदमी था अपने दोस्त के साथ दोनों दोस्त गए टी पार्टी में आइसक्रीम की टी पार्टी थी और सफ ने चांदी के चम्मच से आइसक्रीम खाए मेहमान
व्यवस्था खाते खाते सोचा कि चम्मच अपने ले चले जरा भोला बला था दूसरा चतु चम डाल उसने डाल दिया अपने कोट की जेब में चम्मच एक चांदी का चम्मच दूसरा चतुर था उसने दूल्हा के पास जाकर कहा आज मेरा दहा मेरा मित्र दूल्हा बना है मैं तुमको एक मैजिक दिखाता हूं एक जादू दिखाता हूं बरा इधर आ एक चांदी का चमत लाओ चांदी का देखो यह चांदी का चम्मच उस मित्र को तो उसने क्या करा चम्मच छुपाने के लिए अटकल कर द बोले त अपने बूट में डाल चमच ब बूट साइड में डाल दिया और
बुद्धु मित्रा ने बूट पहन लिया चतुर मित्र गया बोले चम्मच लाओ बैरा बैरक से चमत लेके कोर्ट में रख दिया बोले देखो ये चम्मच मैं अपने कोट में डालता हूं इसके जूते में से निकलो चतुर आदमी ने अपनी जेब में चम्मच रख दिया और बुद्धु मित्र के से तो चोरी करवाया के तो छुपा दे जूते में लोगों के सामने उसके जूते से चमच निकलवाया बड़ा वा वाई करके और अपना चम्मच चुरा चला लेकिन चम्मच चुराया चतुरा की लेकिन वो चम्मच कितना दिन साथ में रहेगा किसके साथ आएगा जो शरीर है उसको भी छोड़ना पड़ेगा तो
चम्मच कब तक चलेगा जय राम जी की ये सब मरने वाले यहां अते स्थाई रहने वाला कोई नहीं आता मरो मरो सबको कहे मरना ना जाने कोई एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना ना होई ये न को मारकर इस अविद्या को अहंकार को मारकर परमात्मा को जान लो फिर दोबारा तुम्हारे को गर्भ में ऊंधा नहीं लटकना प भीष्म पितामह ने युधिस्टर को तो ज्ञान दिया दान धर्म का स्त्री धर्म का राज्य धर्म का उपदेश दिया भिन्न भिन्न राजा को ऐसा करना चाहिए कि शत्रु अगर बलवान है तो उसे कंप्रोमाइज कर लेना चाहिए और उसकी
कक पॉइंट ढूंढते रहना चाहिए जब मोक है तो शत्रु का दुर्गुण और ढूंढ के उसको ठिकाने लगा देना चाहिए राजा को ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि सामने वाला जैसा व्यवहार करे उससे उस सवाया व्यवहार करे अगर कूटनीति का करता है तो राजा सवाई कुट नीति खेल के सामने वाले को ठीक करे वहा जय जय सियाराम नहीं चलेगा जय राम जी जो करेगा वो भरेगा चलो अपने तो सीताराम सीताराम करो यह नहीं चलता व्यवहार में सब जगह जय राम जी की सज्जन के आगे सज्जन मध्यम के आगे मध्यम प्रयत्न करें राजा को चाहिए कि पापी और
दुष्टों के हाथ में धन और सत्ता ना जाने दे दुष्टों और पापियों के हाथ में धन और सत्ता जाएगी तो आम आदमी बहुत दुखी होंगे परेशान हो उचित है कि जो हीन कर्मी हीन स्वभाव वाले हैं उनको दबा कर रखे और जो सज्जन है उनको प्रोत्साहित करे इसमें प्रजा की और राजा की शोभा है राजा का कर्तव्य है प्रजा का रंजन करे प्रजा को संतुष्ट करे तृप्त रखे प्रजा को पुत्र की नहीं पाले और प्रजा के भोग प्रजा से जो टैक्स लिया है प्रजा के हित में लगाए ना कि परदेश में थपिया करे जय राम
जी की अपनी आवश्यकताएं कम रखे और जो आवश्यकता जिनको ज्यादा है वस्तुओं की उनकी सेवा में लगाए व्यक्तिगत खर्च व्यक्तिगत टपटप व्यक्ति व्यक्तिगत आडंबर कम करें और समाज के सेवा में अपने धन को अपने बुद्धि को लगाने वाला यशस्वी और स्वर्ग का अधिकारी होता है जिसके राज्य में प्रजा दुख कार्य है वह राजा अवश्य नरक का अधिकार ऐसा रामायण में लिखा है तुम अपने कुटुंब के राजा हो अपने पड़ोस के राजा हो या अपने मोहल्ले के राजा हो तो आपका भी यह कर्तव्य हो जाता है ऐसे आप अपने शरीर और इंद्रियों के तो राजा हो
तो आप अपनी आंख को बीमार होने से बचाइए दिन में दो चार बार आंखों को ठंडा पानी छाट ये आंख हाथ पैर ये इंद्रिया भी तो तुम्हारी प्रजा है भले तुम्हारा महाराष्ट्र शासन में कोई कुर्सी नहीं है लेकिन शरीर शासन में तो तुम्हारी कुर्सी है इसका तो अच्छा शासन करो शरीर स्वस्थ रहे ऐसा भोजन करो बीमारी आए तो दब मत जाओ घबराओ मत बीमारी किस लिए हुई क्या खाने से हुई कैसे व्यवहार से हुई वो ध्यान रखो और फिर यथा योग्य उसका उपचार करो बीमारी दो प्रकार की होती है एक होती है व्याधि दूसरी होती
है आधि आधि होती है मन के रोग से और व्याधि होती है शरीर के खानपान की बेवकूफी से मुझे यह मिले मुझे वो मिले किसी का धन किसी का कुछ देकर तमाम इच्छाएं करने से मन में आधी आती है मन में आधी आने से शरीर में व्याधि घुस जाती है आराम से मन अगर प्रसन्न और ज्ञान संयुक्त है तो मन में आधि नहीं आती तो शरीर में जल्दी से व्याधि नहीं आती और वातावरण किसी कारण व्याधि आ भी जाती है तो मन में आधि ना होने के कारण व्याधि ज्यादा समय टिकती भी नहीं रोग भले
शरीर में आए लेकिन मन में रोग को मत आने दो मैं रोगी हूं मैं रोगी हूं मैं रोगी हूं सोचकर मन में रोग मत उतरने दो मन में रोग उतर गया तो उतर गया लेकिन स्व में रोग को मत उतरने दो मैं तो निरोग नारायण का अंश हूं ऐसा स्मरण करो आधि मन के रोग को कहते हैं व्याधि तन के रो को कहते हैं वे औषध से उपवास से दान पुण से और जप से भी मिटती है ऐसे मंत्र है जो रोग मिटाने में बड़ी सहाय करते हैं जैसे कैंसर की बीमारी है तो तुलसी का
रस 10 ग्राम शहद के साथ पा 10 ग्राम शहद और 10 ग्राम तुलसी का रस सुबह दोपहर शाम मरीज को दो कैंसर कारो किसी भी प्रकार का होगा उसमें फायदा होता है तुलसी के पौधे उसके कमरे में रखो तुलसी के पत्तो की माला उसको पहनाओ कैंसर के रोग में आ रहा बच्चे की याद शक्ति बढ़ानी है पाच 10 सात तुलसी के पत्ते खाए एक गिलास पानी पे याद शक्ति बढ़ेगी दांतों की बीमारी जल्दी नहीं आएगी भगंदर जलंदर कभी नहीं होगा और कैंसर का रोग कभी नहीं होगा बच्चे को अगर धनाढ्य बच्चा है याद शक्ति नहीं
रहती तो साथ काजू जरा सा शहद लगाकर सुबह चबा चबा के खाए नाश्ते में याद शक्ति बढ़ेगी आधि कैसे मिटती है उसको भी जान ले और व्याधि कैसे मिटती है उसको भी जान ले आधि व्याधि तन और मन को आती है और उसको मिटाने वाला अपना चैतन्य स्वरूप का ज्ञान का अवलंबन लेना चाहिए बाणों की सया पर पड़े हैं भीष्म पितामह बाण और बाणी में फर्क है बाण इतना दुख नहीं देता जितना वाणी दुख दे सकती है नाग से नागन ज्यादा जहरीली होती है इसलिए वाणी ऐसी बोल किसी को दुख ना दे बाण का दुख
तो मिट जाता है लेकिन वाणी का दुख बहुत समय तक रहता है इसलिए आपकी वाणी के द्वारा किसी को दुख ना मिले ऐसा प्रयत्न करना चाहिए वाणी ऐसी बोलिए जो मनवा शीतल होए औरन को शीतल करे आपहु शीतल होई बोलने के पहले ही आप अपने हृदय को आनंदित करिए आधि और व्याधि के चिंतन से रहित करके भगवती भाव से आप भरकर वाणी बोलिए चाहे सामने वाला विद्वान है चाहे मूर्ख है धनवान है चाहे निर्धन है माई है चाहे भाई है लेकिन उसकी गहराई में मेरा नारायण है ऐसा सोचकर आप मीठी निगाह ना आखिए निगाह डालिए
आप आंखों से हंस दीजिए सामने वाले का मंगल होगा और आपका एक पैसा नहीं लगेगा सारा संसार आपका मित्र होने लगेगा जय राम जी की यह धनार है इसके पैसे कैसे खींच ये तो गरीब है धत तेरे की ऐसा सोचकर मिलोगे तो कुछ नहीं आप भी बंद होगे उसको भी बांध होगे लेकिन जो भी हो धनाढ्य हो गरीब हो विद्वान हो अविधवा हो अपना हो पराया हो उसकी गहराई में मेरा चैतन्य है नारायण नारायण करके उन पर अपनत्व की निगाह डालो तो आपका मंगल होगा आप व्यवहार में सफल होंगे जिससे आप बात करते हो वो
कोई मशीन नहीं है कोई रोबट नहीं है उसे सांत्वना की जरूरत है प्रेम की जरूरत है उत्साह की जरूरत है आनंद की जरूरत है माधुर्य की जरूरत है और तुम दे सकते हो तो दाता बनकर अपना माधुर्य बांटो उत्साह बांटो प्रेम बांटो तो आपके अंदर वही बच जाएगा अगर घणा बांटते तो वही रह जाएगा जो देता है वही पाता है आदमी एवरी एक्शन क्रिएट एक्शन आप जो देते भीतर से वही आपके पास रहता है गुलाब गुलाबी क्यों है कि वो गुलाबी कलर वापस देता है इसलिए उसके पास गुलाबी रहता है हरा रंग हरा क्यों है
पत्ते हरे क्यों है ये हरा रंग वापस देते हैं जो देते हो वही आपके पास रह जाता है एक महात्मा बैठे थे किसी अनजान व्यक्ति ने कहा बाबा इस नगर में मैं रहना चाहता हूं यह नगर कैसा है हम बस सकते इसमें कैसे नगर के लोग है महात्मा ने कहा जिस नगर से तू आकर यहां रहना चाहता है वह नगर कैसा है बोले वो तो बहुत खराब है बड़े दुष्ट लोग है बड़े स्वार्थी लोग है बदमाश लोग है महाराज उधर तो बड़ी मुसीबत है बेवकूफ लोग बोले यहां भी ऐसे ही रहते थोड़ी देर के बाद
शया बोले महाराज मेरे को इस नगर को देखकर बड़ा चाह हो रहा है कि मैं अपना गांव छोड़कर अपना नगर छोड़कर यहां रहो आपकी क्या राय है बोले तेरा नगर कैसा है बोले लोग तो बहुत अच्छे हैं हमारा गाव भी अच्छा है लेकिन यहां आप मिलते नहीं सत्संग मिलता है इस माने महाराज थोड़ी लालच होती है और यहां भी काम धंधा वही चलेगा महाराज तो यहां रहू कि नहीं बोले उस नगर के लोग कैसे बोले बहुत अच्छे बाबा जी उधर के तो हमारे गांव के लोग बहुत अच्छे लेकिन इस गांव के लोग कैसे बाबा ने
कहा इस गांव के लोग भी बहुत अच्छे चेला ने सोचा अभी अभी तो बोला बुरे हैं फिर बोलते हो अच्छे बोले जैसी जिसकी दृष्टि होती है उसको ऐसे ही लोग मिल जाते हैं जो बुरा है उसको बुरे ही मिल जाते हैं जो अच्छा है उनको अच्छे ही मिल जाते हैं और जो बहुत अच्छा है उनके आगे बुरे भी आते तो की भी अच्छाई का हिस्सा उनके आगे प्रकट हो जाता है जो महात्मा लोग है उनके आगे बुरे लोग भी आते ना तो बुरे लोगों अच्छाई का हिस्सा उनके आगे क्रिएट हो जाता है प्रकट हो जाता
है इसलिए बुरे लोगों को भी बहुत लाभ होता है अच्छे महात्माओं के दर्शन से अच्छे लोगों की अच्छाई तो डेवलप होती है क्रिएट होती है लेकिन बुरे लोगों में भी जो अच्छाई छुपी है वो सत्संग से और संत दर्शन से डेवलप होती है क्रिएट होती है संसार सागरमल तुमति योजन गीता नावं समारो पारम यात स जो मनुष्य घोर संसार सागर को पार करना चाहता है उसे गीता रूपी नौका पर चढ़कर सुख पूर्वक पार हो जाना चाहिए यज्ञ में तो काना कोढ़ी विदुर अलव नहीं है लेकिन गीता ने तो गजब कर दिया अपी चेत दुराचारी पापे
भ पाप कृतम दुराचार में भी आखरी कोटि प्रिय प्रिय तर प्रियतम ऐसे कृत कृत तर कृतम ऐसा व्यक्ति चुने हुए पापी और उनमें से भी चुने हुए उसमें से जो सर्वोपरि ऐसा व्यक्ति हो और गीता की शरण आ जाए गीता का ज्ञान धारण कर ले श्रवण कर ले घोर से घोर पात की शि प्रम भवति धर्मात्मा जल्दी धर्मात्मा हो जाएगा साधु रेव सम मंतव्य उसको साधु ही जानो क्योंकि गीता का ज्ञान सुनकर उसने शरीर का अहम हटाकर आत्मा में प्रीति करना चालू कर दिया तो उसका संसारी आकर्षण मिट जाएगा सरकने वाला आकर्षण मिटते ही उसके
बुद्धि में राग और द्वेष की व्यथा दूर हो जाए सरकने वाले आकर्षण के कारण ही प्राणी का चित्त अशुद्ध रहता है और अशुद्ध ही चंचल होता है शुद्ध चित्त में चंचलता नहीं और जो शांत है त शुद्ध है और जो शुद्ध है तो शांत है जैसे नाविक नाव को ले जाता है नाव नाविक को ले भागती है ऐसे शांत चित्त शुद्ध होता है और शुद्ध चि शांत होता है से से सामर्थ्य प्रकट सुखी रहने का सामर्थ्य जिसमें भीतर सुखी रहने का सामर्थ्य नहीं है विषय विकारों की थपेड़ों में अपने को स आता रहता है यह
मिले तो सुखी हो जाऊं यह पाऊ तो सुखी हो जाऊं सुबह से शाम तक बचपन से युवावस्था तक और युवावस्था से बुढ़ापे तक हाथ पैर हिलाते मन बुद्धि रगड़ रगड़ आदमी थक जाता है अंत में संसार अनित्य है दुख स्वरूप ऐसा करके दुखी होकर ही सब जाते हैं कोई निश्चिंत होकर पूर्ण सुखी होकर गया हो तो वोह ब्रह्म ज्ञानी होगा दूसरे के वश की बात नहीं नहीं है सौराष्ट्र में एक संत हो गए अखा भगत उनका नाम अखा भगत न अनुभव बहु अखा भगत ने एक पुस्तक लिखी उस पुस्तक का नाम था अख अखा भगत
के चाबुक अखा भगत ना चाब का उसका एक वाक्य है सजीवा है निर्जीव ने घड़ो सजीव चैतन्य जीव ने निर्जीव पत्थर में से कोई देवी देवता भगवान घड़ा सजीवा है निर्जीव ने घड़ो पछी ने के मने काई दे मेरे को कुछ दे अखो तमने ई पूछे के तुम्हारी एक फूटी के बे ईश्वर की पूजा उपासना करो लेकिन उससे मांग मांग कर वासना की धारा में बहुमत ईश्वर कौन है तुम कौन हो इस प्रकार का गीता का ज्ञान लोगे तो फिर ईश्वर की मूर्ति में भी तुम्हें परमात्मा देखेगा और मूर्ति बिना भी तुम्हें परमात्मा की महक
आएगी परमात्मा का रस आएगा तुम तो तृप्त हो जाओगे तुम्हारे संग में आने वाले भी तृप्ति का अनुभव करने लगेंगे ऐसा तुम्हारा हृदय मंदिर बना दो ना भाई महा पापा द पापानी गीता ध्यानम करोति चेत वच स्पर्शम न कुर्वंति नलिनी दलम मुमत जिस प्रकार कमल के पत्ते जल को स्पर्श नहीं करते कमल के पत्तों पर जल नहीं ठहरता ऐसे आपके चित्त में दुख नहीं ठ दुख के निमित्त बहुत होते हैं लेकिन दुख क्यों होता है इस बात पर विचार करना चाहिए और दुख के निमित को पकड़कर अगर उससे जूझते रहोगे तो दुख की जड़े कभी
नहीं मिटती सारा जीवन चला बड़े-बड़े विद्वान तपस्वी जती जोगी रगड़ रगड़ के अपने को दुख के निमित होते हैं कभी आता है प्रारब्ध वेग से दुख कभी आता है अपनी बेवकूफी के कारण गलत निर्णय से दुख कभी आता है प्रकृति के प्रभाव से दुख कभी आता है किसी दुष्टों के स्वभाव से दुख कभी आता है मित्रों में आसक्ति के कारण दुख लेकिन इतने ही कारण नहीं है इन कारणों को खोजते खोजते जब तक अनिर्वचनीय कारण तक नहीं पहुंचो तब तक दुखों की जड़े नहीं हटेगी मुर्गी पहले कि अंडा पहले मनुष्य कर्म करता है तो फल
पाता है तो कर्म किए तब फल पाया तो कर्म पहले की फल कर्मों से शरीर मिलता है तो पहले कर्म हुए फिर शरीर हुआ तो बिना शरीर के कर्म कैसे हुए बिना शरीर के कर्म नहीं हुए तो कर्मों के बिना शरीर कैसे मिल गया बिना कर्म के शरीर नहीं होता है और शरीर के बिना कर्म नहीं होते हैं तो कर्म पहले या शरीर पहले बिना मुर्गी अंडा नहीं आता अंडे के बिना मुर्गी का बच्चा पैदा नहीं होता तो मुर्गी पहले की अंडा पहले इसको खोजते खोजते जब तक अनिर्वचनीय तक अनिर्वचनीय ता तक नहीं पहुंचते तब
तक इसका समाधान नहीं मिलेगा ऐसे ही दुख को खोजते खोजते दुख के निमित्त को अनिर्वचनीय तक नहीं पहुंचो ग तब तक दुखों की जड़े कभी नहीं कटेगी दुख की अंधेरी रातें कभी नहीं कटे थोड़ी देर के लिए दुख रूपांतरित हो जाएगा लेकिन भय तो बना रहेगा धनवान को निर्धनता का भय बना रहे यशस्वी को अपयश का भय बना रहेगा तंदुरुस्त को बीमार का भय बना रहेगा और जिंदे को मरने का भय बना रहेगा है कि नहीं आ है कि नहीं जीवित को मृत्यु का भय बना रहेगा सुखी को दुख का भय बना रहेगा पहलवानों को
दुर्बल होने का भय बना रहेगा और जो मिलते हैं ना जब लग रहेंगे चांद सितारे तुम हो हमारे हम है तुम्हारे परदेसी तुम भूल ना जाना वायदा किया है साथ निना तो साथ टूट ना जाए उसका भय बना रहेगा और साथ टूटे बिना रहता भी नहीं है कितना भी एग्रीमेंट करो कितना भी गले लगो चिपके रहो फिर भी जहां सहयोग है वहां वियोग होता ही है जहां मेल है वहां से बिछड़ना भी होता है जब तक य गीता का सुप ज्ञान हमारे जीवन में नहीं आता तब तक हमारे दुख करवट लेते रहते जैसे कटियारा है
सिर पर काठी का बोजा उठा के जा रहा है हाय थके दुखी हुए रख दिया कंधे पर हास आराम मिला दुख मिटा नहीं दुख मिटा नहीं दुख ने करवट ली बदला कंधा थका दूसरे कंधे पर रखा के हास आराम मिला दूसरा कंधा थका बाजार तक पहुंच गए बेच दिया पैसे मिल गए ह बोझा उतरा बोझा उतरा नहीं बोझे ने करवट ली बेटा पैसे मिले सीधा सामान खरीदा घर आए कमा के सीधा सामान ले ले अब भूख लगी रोटी खाई रोटी खाते पेट प आराम से हाथ घुमा के हा निश्चिंत हो गए लेकिन चार घंटे के
बाद जो खाया उसको खाली करने की चिंता होना जरूरी है और जो खाली किया भरने के लिए फिर वही करना चालू हो जाएगा बहु रानी सासु के पैर दबाती है आर्य नारी सासु पूछती कि बहु रानी घर का काम हो गया बोले मां सासु जी सारा काम हो गया बर्तन भी माज छे हैं और तो क्या बब्बू के बाप को खांसी थी ना तो थोड़ा सा अदरक जरा सा शहद और थोड़ा सा काली मिर्च की दो बूंदे मिलाकर उनको चाटने को दे दी चम्मच में और वो भी सो गए और चम्मच भी मैंने माच के
रख कोई काम बाकी नहीं है बेटी दूध बूत जमा दिया बोले सब कंप्लीट है बर्तन भी कोई झूठा नहीं बहारिया बहारिया तो दिन को हो गई सारा काम टा लिया अच्छा अब तू सो जा सारा काम पूरा हो गया बोले हां सुबह हो और बहु रानी से सासू पूछे कि सारा काम फिनिश हो गया तो अभी तो कोई काम बाकी नहीं है वो हंसेगी बोले कोई काम बाकी नहीं क्या सारे काम बाकी है बच्चों को नहलाना पढ़ाना लिखा ये करना वो करना दाल बनाना सब्जी बनाना गाय दोना फ्रश दोना सारा काम बाकी रात होते पूरा
काम फिनिश करके सो जाते और प्रभात हुए सारा काम अधूरा दिखता है ऐसे जीवन के आरंभ से लेकर जीवन की मृत्यु तक कुछ न कुछ अधूरे काम रही जाते अखा भगत ने कहा अखो कहे अंधार कु झगड़ो मटा कोई ना लो फलेट म जा तो नहीं रा अटलो मकान थ जा तो नहीं रा अटलो छोक पनी जाए तो नहीं रात करता करता के संसार में कोई सा मरी जा तो रात भला मानस मर मा रात नथ आत्मा ने पाम ले तो रात गीता ना ज्ञान ने पा मले तो नि रात गुरु ना अनुभव ने पता
अनुभव बनावे ले तो रात ब्रह्म विता के अनुभव को अपना अनुभव बना दे गीता के ज्ञान को अपना बना ले कृष्ण के अनुभव को अपना बना ले तब निरा होग तो कैसे बनाए चलो अब उसी यात्रा प चल दुख विज्ञानियों ने खोजा दुख लोग दुखी है और दुख से छुटकारा चाहते हैं और बड़े बड़े लोग दुख से छुटकारा चाहते चाहते आखिर हार गए थक गए तोय दुख कौन सी बला है दुख को खोजो तो दुख का कोई वेट वेट भी उनको कुछ मिला नहीं कोई वजन नहीं दुख की आकृति भी खोजा तो उनको कोई मिला
नहीं दुख का रूप रंग भी नहीं मिला दुख का वजन भी नहीं मिला फिर भी लोग तो दुखी होते हैं जो निर्द दुख आदमी है उसको सता करर दुखी करके उसका वेट किया तभी भी उतने का उतना कोई दुख आने से उसका वेट बड़ा घटा नहीं फिर भी लोग दुखी होते हैं विज्ञानियों को मानना पड़ा मैं दुखी हूं इस प्रकार की दुखा आकार वृति पैदा होती है तब आदमी दुखी होता है दुख के निमित से दुखी नहीं होता जब दुख की वृत्ति उत्पन्न होती है तभी दुखी होता है बच्चा चलते चलते गिर पड़ता है चोट
लगी उसके घुटने को लेकिन दुख का निमित तो उत्पन्न हुआ लेकिन मन में दुखा आकार वृति भाव नहीं उत्पन्न हुआ तो कई बार गिरता हुआ बच्चा जब उठता है तो हसता है तीली मल गई मथला माल दिया है दुख का निमित हुआ लेकिन मृति उत्पन्न नहीं हुई तो वोह दुखी नहीं तो मानना पड़ेगा कि अनुकूल वृत्ति और प्रतिकूल वृत्ति में जब दुखा आकार भाव बनता है सुखा आकार भाव बनता है तो आदमी अपने को सुखी दुखी मानता है हकीकत में सुखा का भाव दुखा आकार भाव ये मन की वृत्तियों में होता है और बेवकूफी से
य उसमें जुड़ जाता है तो सुखी दुखी होता रहता और सुखी दुखी होने से अंतःकरण मलीन हो जाता है सुखी दुखी होने से अंतःकरण मलिन हो जाता है अशुद्ध हो जाता है अशुद्ध और मलिन अंतःकरण में ख्वाहिश खूब उठती है दुख मिटाने की भी ख्वाहिश होती है सुख पाने की भी ख्वाहिश होती है और सुख पाने की लालच भी आदमी को गुलाम बना देती है और दुख मिटाने की इच्छा भी आदमी को भीतर से सुकड़ देती है आदमी अपनी महिमा से गिरा रहता है बरा कहां तो ईश्वर का सनातन अंश कहां तो परमात्मा का अविभाज्य
अंग और कहां दुख मिटाते मिटाते मर गए दुख मिटा नहीं सुख को पकड़ते पकड़ते मर गए सुख टिका नहीं यंग पसन से लाइफ इ फुल ऑफ जॉय बट वाइस पर्सन से लाइफ इ फुल ऑफ सार जवान समझते जिंदगी मजा लेने की है लेकिन जब बूढ़े बुजर्ग होते उनसे पूछो क्या हाल है बोले कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं ऐसी बात भी नहीं है और सब कुछ है ऐसी बात भी नहीं जहां सब कुछ है वहां का गीता का ज्ञान नहीं है और जहां कुछ कुछ होते कुछ भी नहीं होता है उसकी सत्यता
मिटती नहीं मिथ्या की सत्यता नहीं मिटती और सत्य में जागृति नहीं आती है यही मूल कारण है दुखों [संगीत] का जैसे यह गुलाब के फूल माला आज से महीना पहले नहीं थी महीना बाद में ऐसी नहीं रहेगी तो अभी भी नहीं के तरफ जा रही ऐसे जो भी परिस्थितियां पहले नहीं थी बाद में नहीं रहेगी अभी भी नहीं के तरफ जा रही तो उनमें जो सत्य बुद्धि है और जो पहले था अी है बाद में रहेगा उसके प्रति जो लापरवाही है उसका जो अज्ञान है वही कारण है सारे दुखों का मूल वही कारण है सारी
मुसीबतों का मूल वही कारण है जन्म मरण का मूल वही कारण है न चाहते हुए भी पीसे जा रहे कोई दुख नहीं चाहता फिर भी पीसे जा रहे कोई अशांति नहीं चाहता फिर भी तपे जा रहे हैं कोई मौत नहीं चाहता है फिर भी बारबार जन्मे और मरे जा रहे हैं केवल ज्ञान रूपी सूर्य को पीठ देकर छाया पकड़ने छाया को पकड़ते सूर्य को पीट देते तो छाया दूर भागती है छाया से बेपरवाह होकर सूर्य के तरफ जाते तो छाया पीछे पीछे आती बस यही हाल है तुम ज्ञान के स्वरूप ज्ञान स्वरूप आत्मा के तरफ
मुंह कर दो तो यह संसार का सुख और आनंद रूपी छाया तुम्हारे पीछे पीछे आएगी और जो संसार से सुख और आनंद लेने जाते हो तो वो दूर भागता आप सताए जाते दुखी होते इसके लिए अपने जीवन में वेद भगवान कहता है छोटा मोटा कोई व्रत लाओ छोटा ही व्रत पालन से आपका मन शुद्ध होगा मनोबल बढ़ेगा भले छोटा सा ही नियम हो लेकिन उस नियम को कष्ट स दृढ़ता से पा इससे आपके जीवन में दक्षता आएगी और दक्षता से आपके जीवन में श्रद्धा आए और श्रद्धा से आप सत्य स्वरूप अपनी असलत को पाले यह
यजुर्वेद का मंत्र है व्रते न दीक्षा मापन व्रते दीक्षा मापन दीक्ष मापन [संगीत] दक्षिणापन दक्ष श्रधा मापन श्रधा मापन शयाम सत्य मापते शयाम सत्य मापते छोटे मोटे व्रत से आपके जीवन में व्रत पालन से दक्षता आती है दक्षता से आपको अपने आप में श्रद्धा होती कि मैं कर लूंगा पा लूंगा बिल बिल फाइंड वे जहां चाह वहां राह यह कौन सा उ कदा जो हो नहीं सकता तेरा जीन चाहे तो हो नहीं सकता छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे इंसान क्या के दिले दिलबर में घर ना करे नथिंग इज इंपॉसिबल एवरीथिंग द पॉसिबल लेकिन
अपने को बस मारते कु चलते हुए हम ख पाते जा रहे कोई आदमी चप्पू लेकर अपनी उंगलियों के पीस बनाए चिप्स बनाए तो उसको आप क्या बोलोगे चुरी या कची या चक्कू लेकर अपने अंगों को काटे और बोले देखो ये पीस बना रहा हूं तो आप क्या बोलोगे उस आदमी को पागल बोलोगे ना पागल भी ऐसा नहीं करता अपने अंगों को काटकर चिप्स बनाकर दिखाने की पागलपन तो पागल को भी नहीं होती तो जैसे शरीर के अंगों को काट काट के दिखाना के देखो चिप्स बनाए तो ये पागलपन से भी गई बीती बात है उससे
भी ज्यादा गई बीती बात है कि हम अपने को ही काटे जा रहे हैं अपने को ही कोसे जा रहे हैं अपने को ही सताए जा रहे कृपा करो अपने पर मेहरबानी करो अपने को बहुत कोसा तुमने अपने को बहुत सताया और आपको पता तक नहीं चला कि मैंने अपने को कोसा अपने को सताया आप अपने से ज्यादा तुच्छ वस्तु को महत्व देकर अपने को कोस सिगरेट मिल जाए मजा आ जाए तो निकोटिन पोइजन को आप अपने मजे से ज्यादा महत्व दे दिया पान मसाला खालू मजा आ जाए है तो सुपारी और तंबाकू का मिश्रण
उससे धातु कमजोर होता है अन्न नली में चांदेन नली के पास ही अन्न नली होने के कारण ऑपरेशन भी बड़ा खतरे से भरा होता है लेकिन मजा लेने के लिए पान मसाला जिसमें चिप कलियों का पाउडर डालते जो पतंगी म के ऊपर पतंग को खाने के लिए जो मरती रहती चिपकली ऐसे चिपक का पाउडर मान मसालो ऐसी चीज को इतना महत्व दिया कि आप अपने को खो बैठे हाय पान मसाला तू सुख दे हाय बीड़ी तू सुख दे हाय शराब तू सुख दे नहीं नहीं तू जिसको अपना मोहर मारता है व ही सुख देने की
भ्रांति तुझे दिखा तू अपना सुख वहां फेंक कर गुलाम मत बन जैसे कुत्ता हड्डी चबाते चबाते मेहरों में घा हो जाता है अपनी मेहरों का अपने मुंह का रक्त आता है लेकिन बेवकूफ से समझता कि इसमें से मजा आ रहा है ऐसे ही आप अपने को सता सता कर विषयों के परिस्थितियों के गुलाम होकर मानते कि हास य हुआ तब सुखी हुआ यह हुआ तब मैं निश्चिंत हुआ यह हुआ तब मैं सुखी ये आप अपने को अनजाने में सताए जा रहे गीता य बेवकूफी अनजान पना तुम्हारा हटाने के लिए आई गीता अज्ञान हटाने के लिए
आई गीता अविद्या हटाने के लिए आई गीता अस्मिता हटाने के लिए आई है गीता राग द्वेष हटाने के लिए आई गीता अभिनिवेश हटाने के लिए आई है और गीता सुख सामर्थ्य देने को आई है गीता समता के सिंहासन पर बिठाने को आ गीता कर्म के फल की आसक्ति छुड़ाकर कर्म फल दाता स्वरूप के साथ एक करने के लिए आई है इस गीता की महिमा परम पार है गीता का एकाद लोक का पाठ और भगवन नाम कीर्तन साधु पुरुष का दर्शन करोड़ तीर्थ करने का फल देता है य जो शास्त्र वचन है रे गैरे किसी आदमी
की कल्पना मात्र नहीं अभी विज्ञानी लोग आश्चर्य व्यक्त करते हैं भारतवासियों के ओम के जप से ऐसा ऐसा फायदा होता है बोस्टन में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के डॉक्टर हरबर्ट बेनसन ने 2500 वर्ष 25 वर्ष से यह अध्ययन किया है सासुना में य मंत्र मंत्र जो साधु बाबाओ से लोग प्रभावित होते हैं अस्पतालों से मरीज ठीक नहीं होते और संतों के पास से ठीक होते तो क्या केवल श्रद्धा से ठीक होते नहीं नहीं डॉक्टर हरबर्ट बसन ने केवल श्रद्धा से ही ठीक होते ऐसी बात नहीं मंत्र का अपना प्रभाव ओमकार का जप करने से और भी कई
डॉक्टर लीरिया ने डायमंड ने दूसरे डॉक्टर में अभ्यास करके जाहिर किया कि अनन में अपना रक्त के कणों पर इसका प्रभाव पड़ता है नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है ऐसा प्रभाव पड़ता है डॉक्टर हरबर्ट ने तो उसकी थोड़ी और व्यापकता बताई हमारे मन पर भी इसका अच्छा असर पड़ता है हमारे ऋषियों को मैं प्रणाम करता हूं हजारों वर्ष पहले उन्होंने पूरे फायदों की बात कर रखी मंत्र जाप से केवल हमारे रक्त पर या नस नाड़ियों पर ही असर होता है यह स्थूल शरीर की बात है लेकिन हमारे अंदर चार शरीर और यह जो शरीर दिखता है
इसको हम अनमय कोष बोलते हैं इसके अंदर प्राणम कोष है उसके अंदर मनोमय कोष है उसके वि ज्ञानम कोष है उसके अंदर आनंदमय कोष है और वैदिक मंत्र जब किसी सदगुरु के द्वारा मिलता है मन माना जपो उसका अपना होगा भाव लेकिन आपकी योग्यता कौन सा मंत्र जपने की है यह आपको पता नहीं कोई सीधा स्वर्ग से आया है तो कोई सीधा नरक से आया कोई केजी का विद्यार्थी है तो कोई पीएचडी का विद्यार्थी है कोई सातवी का है तो कोई बारवी का विद्यार्थी है सबके ये एक पाठ्य पुस्तक नहीं काम आए सब कंट्री हों
के लिए जीरो व व नहीं चलेगा अलग-अलग कंट्री के लिए कंट्री कोड अलग-अलग होता है सब ऑफिसों के लिए एक का एक नंबर नहीं होता ऐसे ही सब लोगों के लिए एक का एक प्रकार का साधन नहीं होता है इस बात पर हम बहुत प्रसन्न है कि हमारे देश में साधना हों की वैरायटी है मंत्रों की वैरायटी है भगवानों की वैरायटी है उपासना की वैरायटी है और यही फल है कि यहां अभी भी जितने भक्त और संत प्रैक्टिकल अनुभव करने वाले हैं उतने किसी देश में अभी नहीं मिल रहे हैं यह हमारे ऋषियों की सच्चाई
का प्रत्यक्ष फल