ज्ञानी समाधि रहित होने से मुमुक्षु नहीं है और द्वैत भा ब्रह्म के अभाव से वह बद्ध नहीं है परंतु निश्चय करके इस सब जगत को कल्पित समझता हुआ ब्रह्म वत स्थिर रहता है य अष्टावक्र संहिता का श्लोक 18 अध्याय का 28 वा श्लोक है इसका बोला बाबा की छंदों में अनुवाद य है कता समाधि है नहीं जिसमें नहीं विक्षेप है नहीं मोक्ष ही है चाहता रहता सदा निर्लेप है सब विश्व कल्पित जान कर नहीं चित्त को भटका है संलग्न रहता ब्रह्म में सो धीर शोभा पाए शोभते बुद्ध वो बुद्ध पुरुष शोता है जिस महापुरुष को
समाधि की इच्छा नहीं चित्त में विक्षेप नहीं ईश्वर और अपने बीच कोई दूरी नहीं अथवा जिसका सुख स्वरूप भविष्य पर निर्धारित नहीं बिछड़े हैं जो प्यारे से दरबदर भटकते फिरते हैं हमारा है हम में हमन को बेकरारी क्या जिसने अपने उस अलक स्वरूप ईश्वर को जो का त्यों जान लिया मान लिया स्वीकार कर लिया उसको समाधि की इच्छा नहीं होती समाधान तब चाहता है आदमी जब विक्षेप हो दवाई तब चाहिए जब बीमार हो चित्त के साथ जुड़कर अंतःकरण के साथ जुड़कर शरीर के साथ जुड़कर सुखी होने की भ्रांति से ऊपर उठ गए हम संसार में
दुखी क्यों हैं अथवा हम ईश्वर से दूर क्यों हैं कि हम संयोग जन्य सुख चाहते हैं अभी जो है यहां जिस अवस्था में है वह अवस्था वोह परिस्थिति ठीक नहीं भविष्य में कुछ होगा कुछ पाएंगे कहीं जाएंगे कुछ मिलेगा कुछ करेंगे कुछ होंगे तब सुखी होंगे मानो सुख कहीं और बरस रहा है तो ऐसी गलती हम लोग करते हैं और हम संयोग जन्य सुख लेने की कोशिश में लगते हैं ज्ञानवान वह है बुद्ध पुरुष वह है मुक्त आत्मा वह है जो कुछ करके कहीं जाकर कुछ पाकर कुछ खाकर सुखी होने की भ्रांति नहीं है जो
स्वयं सुख रूप है जो अभी यहां इस समय आनंदित नहीं है वह कभी कहीं किसी समय भी पूर्ण आनंदित नहीं हो सकता आप जहां हो वहां अगर प्रसन्न नहीं हो तो वै कुठ में भी प्रसन्नता मिलना संभव नहीं है आप जहां खड़े हैं आपका मूल स्थिति जहां है वहां अगर आप सुखद रूप में नहीं जग रहे हैं तो कोई भी परिस्थिति आपको वह सुखद अव नहीं दे बड़े में बड़ी गलती होती है कि हम संयोग जन्य परिस्थितियां संयोग जन्य सुख में चिपक जाते हैं और देह के संयोग से होने वाली परिस्थिति को चाहते हैं अभी
मैं दुखी हूं कुछ पाऊंगा तब सुखी अभी मैं बध हूं कहीं जाऊंगा तब मुक्त मैंने सुनाई थी कहानी कि सौदागर ने नया नौकर रखा खच्चर घोड़े आदि के टोले लेकर वह एक देश से दूसरे देश एक गांव से दूसरे गांव जाता था नया नौकर रखा नौकर को कहा कि माल बांध दे नौकर ने कहा रसिया नहीं हुजूर बोले घोड़ों को खचर को खड़ा करके उनके पैरों में एहसास करा दिया कि हम बंधे हैं सारी रात बंधे रहे सुबह वो सौदागर आगे गया नौकर को बोला कि माल को छोड़कर आज जल्दी माल को कई लकड़िया मारने
लगा लेकिन वो उसी कुंडा उसी रेंज में उसी एरिया में चटपटा लगे उस कुंडा से उस इलाके से बाहर नहीं निकल रहे सेठ लौट के आया बोला क्यों क्या बात अभी माल आता नहीं बोले ये चलता ही नहीं तूने बांधा है बांधा तो रस्सी थी नहीं बांधा बोले जैसे बांधा था ऐसे खोल इनके हृदय में ग्रंथि बंधने की हो गई है जैसे बांधा था ऐसा खोल तब चलेंगे नहीं तो नहीं चलेंगे तो ऐसे ही हम लोगों ने भी कुंडा बांध लिए समाज ने भी हमारे इर्दगिर्द कुंडा बांध दिए हमारे मन ने भी बांध दिए यह
मिलेगा तब सुखी होंगे अमुक तो जाति का कुंडला बंद गया अमुक य का बंद गया अमुक परिस्थितियों का बंद गया य ऐसे प्रकार की सूक्ष्म रसिया बंद गई कि महाराज अब हम चलना भी चाहते हैं इस दे अध्यास का कुंडला पार करना भी चाहते लेकिन घूम फिर के वहीं आ जाते सोटिया लगने पर जैसे खच्चर और घोड़े इधर से उधर छटपटाते थे लेकिन दौड़ नहीं लगा पा रहे थे उस रेंज से उस एरिया से बाहर नहीं जा पा रहे ऐसे ही हमारे मन को कई बार दुख की सोटिया लगती है अपमान की सोटिया लगती है
क्रोध की सोटिया लगती है बेचैनी की मौत की खबरें सुनते हैं किसी की य सब सोटिया लगती है लेकिन ऐसे बंदे हैं के देह अध्यास का देह में जो अहम है वो अहम जो देह का बंद गया फिर जाति का अहम फिर संप्रदाय का अहम फिर कुल का अहम फिर पति होने का हम पत्नी होने का हम बेटा होने का हम बाप होने का हम शिक्षक होने का हम साधु होने कहा हम संत अस साधु ने कहा हम ये जो कुंडा हमने चित्त में बांध रखे हैं उन कुंडा के कारण ही हम परमात्मा से दूर
से महसूस होते हैं श्री राम श बचपन में ही सुन लिया समाज ने कुंडला बना दिया तू फलाने का पुत्र है फलानी तेरी जात है उन्होंने तो रेखा खींच दी उन्होंने तो कुंडला बना दिया फिर पढ़ाई पढ़े तुम फलाने हो तुम एमए हो तुम पीएचडी हो तुम फलाने ऑफिसर हो तुम फलाने के पति हो फलाने के भाई हो फलाने के हो ऐसा करते करते हमको देह के साथ इतना जोरदार रस्सियां जकड़ दी गई है है केवल कल्पित तो पतंजलि महाराज कहते हैं कि योग करो चित्त की वृतिया निरोध हो जाए लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि
चित्त की वृत्तियां उठती क्यों है ये जरा सोचो चित्त की वृत्तियां उठती है आसक्ति से इच्छाओं से इच्छा रूपी तूफान चलता है इसलिए सरोवर में वृतिया रूपी चित्र रूपी सरोवर में वृतिया रूपी तरंगे उठती तरंगों को कब तक शांत करोगे कुछ तरंगों को शांत करा तूफान चालू है तो तरंगे तो आती रहेगी बनती रहेगी तुम तूफान को हटा दो तूफान आता है उल्टी मान्यता से वासना आती है उल्टी मान्यता से वासना आती है ना समझ से वासनाओं के तूफान को इच्छाओं के तूफान को हटा दो तो फिर तरंग चित्त में होंगे नहीं और जो हो
रहे हैं उनको तरंग को तरंग समझकर तूफान से उसको बचाओ तो सरोवर दिख जाएगा तो हमारे चित्त में तरंगे उठती हैं क्योंकि हम कुछ बन जाते हैं कुछ बने हुए हैं और फिर कुछ पाना चाहते हैं और बड़े में बड़ी गलती य करते हैं कि कुछ पाकर सुखी होना चाहते हैं जय जय कुछ पाकर सुखी होना चाहते हैं कहीं जाकर सुखी होना चाहते हैं कुछ करके सुखी होना चाहते हैं जो बुद्ध पुरुष है ज्ञानवान वह कुछ करके सुखी नहीं होना चाहते जिज्ञासा जो है एक होती है ऊपर ऊपर से कौल बस प्रश्न कर लिया सब
लोग राम राम कर रहे तो हम भी कर ले सब लोग भगवान ही सुखरूप है ऐसा कहते तो हम भी कह ले शास्त्र संत भी कहते हैं कि भगवान ही अंतिम सहारा है तो हम भी कह रहे हैं कोतुल वष हम मान रहे हैं पूछ रहे हैं एक बात [संगीत] है कोतुल की कीमत बच्चों के कोतुल केन है ईश्वर प्राप्ति कोतुहल जैसा नहीं है ईश्वर प्राप्ति बड़ी सूक्ष्म मोक्ष चाहिए सूक्ष्म वृति चाहिए बच्चा पूछ लेता है फिर जवाब मिला तो ठीक है जैसा मिला ऐसा संतोष कर लेता है जिसमें जिज्ञासा होती है वो ठीक से
प्रश्न पूछेगा और उस का उत्तर नहीं मिलेगा तो उसका जीवन में बेचनी रहेगी जिज्ञासु के जीवन में बेचनी रहती है तुलस तुमने प्रश्न पूछा उत्तर मिला तो ठीक है नहीं मिला तो कोई बात नहीं अगर जिज्ञासा से तुम पूछते हो तो उत्तर मिला तब संतोष होगा नहीं तो बेचैनी रहेगी जीवन की बेचैनी मिटाना है तो जिज्ञासा का समाधान हो तब लेकिन मोक्ष की इच्छा य जिज्ञासा से भी ऊंची बात मोक्ष की इच्छा शरीर निछावर करके भी मुक्ति मिले शरीर दाव पर लग जाए जीवन दाव पर लग जाए तो भी कोई हरकत नहीं ऐसी मोक्ष की
इच्छा होती है मुमुक्षु को लेकिन ज्ञानी जब बात को समझ गया तो वह मुमुक्षु भी नहीं संसारी तो नहीं है जिज्ञासु तो नहीं है लेकिन मुमुक्षु भी बचा नहीं क्योंकि मोक्ष की इच्छा भी व समझ गया कि इच्छा मात्र बाधा है सुखी होने की संसार को पाकर सुखी होने की जो इच्छा है वह तो बंधन है अब लोहे के जंजीर हटाकर तांबे के पहरे तांबे के हटाकर फिर सोने के पहरे लेकिन जब तांबे के हट गए सोने के हैं वह भी जंजीर महसूस होने लगे तो उनको भी हटा दिया तो तुच्छ इच्छाओं को मिटाने के
लिए अच्छी इच्छा की अच्छी इच्छाओं को मिटाने के लिए प्राप्ति की इच्छा की लेकिन अंत में देखा कि भगवत प्राप्ति की भी इच्छा जब तक है इच्छा रूपी तरंग इच्छा रूपी जब तूफान चल रहा है तो चित्र रूपी सरोवर में तरंगे चालू रहेगी अंत में ईश्वर प्राप्ति की भी इच्छा उसने छोड़ दी अब वह मुमुक्षु भी नहीं है उतल वाला तो नहीं है जिज्ञासु भी नहीं है मुमुक्षु भी नहीं अब बध भी नहीं मुक्त भी नहीं हकीकत में किसी देश में कोई भगवान किसी देश में कोई सुख है और हम वहां पहुंचे तभी सुखी होंगे
नहीं जो अभी आज इस समय सुखी नहीं हो सकता जिसकी वीणा अभी नहीं बच सकती जिसके दिल की बंसी अभी नहीं गूंज सकती वह कल कैसे गूंजे गी पता नहीं जब आता है तब आज होकर आता है कल कभी आती नहीं ऐसा करेंगे ऐसा होगा फिर सुखी होंगे फलानी जगह रहेंगे 50 भाड़ा का रूम लेंगे और रोज भजन करेंगे तब सुखी होंगे तुम जहां हो वहां अगर सुखी नहीं हो रहे हो तो 5 हज का रूम लेकर भी अगर भजन करते हो तो महाराज वहां भी कोई ना कोई खटका जरूर आ जाएगा पृथ्वी का ऐसा
कोई कोना नहीं अथवा तो स्वर्ग का ऐसा कोई कोना नहीं कि पाताल का ऐसा कोई कोना नहीं तीनों भवन में ऐसी कोई जगह नहीं कि आप देह को मैं मानकर पूर्ण रूप से संतुष्ट रह सके कुछ ना कुछ फरिया होगी कुछ ना कुछ प्रतिकूलता होगी कुछ न कुछ आकांक्षा बनी रहेगी अष्टावक्र कहते हैं कि धीर पुरुष वह है जिसने आकांक्षा कोही छोड़ दिया इच्छा कोही छोड़ दिया खून पसीना बाता जा तान के चादर सोता जा यह किस्ती तो हिलती जाएगी तू हसता जा या रोता जा यह चि रूपी किस्ती हिलती रहेगी तब तक जब तक
वासना है जब तक कुछ पाने की इच्छा है जब तक कुछ करने की इच्छा है जब तक कुछ जानने की इच्छा है इच्छा मात्र इच्छा मात्र अज्ञान से पैदा होती है और अज्ञान होता है अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं और अपन जो नहीं है उसको मैं मानने की गलती अपना वास्तविक स्वरूप एक है उसकी सत्ता से दूसरा अंत वाहक शरीर बना और अंत वाहक शरीर की सत्ता और सहयोग से आदि भौतिक शरीर बना यह जो हमें दिख रहा है हाथ पैर सिर वाला शरीर यह आदि भौतिक शरीर है इसका आधार है अंत वाहक शरीर इस
स्थूल शरीर का किया कुछ नहीं होता अंदर से जब आप करते हैं तभी उसका किया होता है जैसे इंजन में जो गयर होता है जैसा गर बदलता है जितना पेट्रोल मिलता है गाड़ी उतनी भागती हुई नजर आती गाड़ी बाहर से भागती हुई गाड़ी नजर आती है लेकिन काम अंदर इंजन कर रहा है ऐसे ही कृत्य करता हुआ यह शरीर दिखता है लेकिन इसके किए हुए की कोई कीमत नहीं अंदर तुम्हारा भाव कैसा है यह मंदिर में बैठा है तो जरूरी नहीं कि आप सज्जन हो महात्मा हो और यह दुकान में बैठा है तो यह जरूरी
नहीं कि आप व्यापारी हो आपका अंदर चित्त जहां बैठा है आप वैसे हो लेकिन उस चित्त के साथ और शरीर के साथ जुड़ जाते हो और अपने आप को आप भूल जाते जब अपने आप को भूल जाते तो चित्त में तो इच्छाएं वासना होती है कल्पना होती है आकांक्षाएं होती है और वह आकांक्षा हमेशा भविष्य पर निर्भर होती है मन का एक स्वभाव है कि इसको जो परिस्थिति प्राप्त है वहां नहीं टिकेगा या तो भूतकाल को चिंतन करके दुखी होएगा या तो भविष्य की कल्पना करके मोक्ष भी भविष्य में है अभी मैं बंधा हूं अभी
संसार नहीं चाहे अभी यह नहीं चाहे वोह नहीं चाहे लेकिन बस भगवान के नाम की माला जपता रहा हूं भगवान मुझ पर प्रसन्न हो तो अभी इस समय भगवान नाराज है माला जप और बाद में भगवान प्रसन्न हो तब मैं सुखी रहूंगा यह भी भगत का भाव हो सकता है अच्छा भाव है सात्विक भाव है जो बोतल लाकर दारू पिऊंगा तब सुखी होगा उसकी अपेक्षा इसकी भावना अच्छ है लेकिन ज्ञानवान की यह भावना भी नहीं रहती जय जय वो ऐसा नहीं सोचता कि भविष्य में अभी दुखी हूं अभी ईश्वर नहीं है और भविष्य में मिलेगा
अभी शांति नहीं है बाद में होगी य सब कर कर कर कर कर कराने की जो आदत है वह है चित्त की और वह माया है आद्य शंकराचार्य ने कहा नास्ति अविद्या मनसो अतिरिक्तांक भव बंद हेतु तस्म विलने सकलम विलीनम तस्म जिगने सकलम य अविद्या या माया मन से बाहर नहीं है मन ही अविद्या है यह अंत वाहक शरीर ही माया है सूक्ष्म शरीर ही माया है इसमें जो चीज मौजूद है उसकी कोई कदर नहीं और जो ला मौजूद है उसकी आकांक्षा पैदा होती मजे की बात है कि कल कभी आती नहीं जब आती तब
आज होके आती और जो आज प्रसन्न नहीं है आज परितृप्ति नहीं वह कल कभी परितृप्ति हो ही नहीं सकता और कल भी आज होकर आएगी और मन फिर कल पर भागेगा आप प्रयोग करके देखना 32 दांत में एक दांत अगर टूट जाता है तो देखना जरा जीभ बार-बार कहां जाती है 31 की कोई खबर नहीं लेगी जो नहीं है उधर ही जाएगी ये मनीराम का स्वभाव य चित्त का स्वभाव है जो नहीं है उधर जाती लेकिन ज्ञानवान जो है वहां ठहरता है और जो नहीं है उसकी फिक्र नहीं करता इसीलिए वह हर हाल में मस्त
रहता है हर हाल में तृप्त रहता है पूरे हैं वो मर्द जो हर हाल में खुश है मिला अगर माल तो उस माल में खुश है हो गए बेहाल तो उसी हाल में खुश है कभी सोए हाट में तो कभी बाट में खुश है कभी उड़े टाट तो कभी उसी वाट में खुश है पूरे हैं वह मर्द जो हर हाल में खुश है उसकी खुशी भविष्य पर नहीं है उसकी खुशी कोई संयोग पर नहीं है उसकी खुशी कोई प्राप्ति पर नहीं है अथवा किसी त्याग पर नहीं है उसकी खुशी अपने तीसरे निज स्वरूप पर ठहरने
की है तो हमारे तीन शरीर हैं एक चदा काश स्वरूप शुद्ध स्वरूप जिसको मैं बोलते हैं शुद्ध में अगर हूं माया मिल गई मैं हूं फलाना य माया मिला दी मैं जहां से उठती है वह हमारा आत्म स्वरूप है उसकी सत्ता लेकर य अंत वाहक शरीर दूसरा और दूसरे शरीर का संयोग लेकर य जो दिख रहा है तीसरा शरीर तो हम लोग गलती क्या करते कि इस तीसरे शरीर को अनुकूल परिस्थिति सर्जित करके सुखी होना चाहते हैं श्री राम पाश्चात्य जगत का ज्ञान विन बुद्धिमत्ता अकल और होशियारी और जितना इसी के लिए सुविधाए और सुख
उपलब्ध किया जाता है उतना ही आदमी सत्य से दूर चला जाता है अगर सत्य के तरफ लक्ष्य हो और इसका उपयोग करने के लिए शरीर को खिलाए पिलाए तंदुरुस्त रखें इसकी मना नहीं लेकिन यही सर्वेश्वर मान लिया तो महाराज कोई भी ऊंची अवस्था आ जाए बाह्य जगत से लेन अंदर में तृप्ति नहीं रहेगी अंदर में आनंद नहीं रहे अंदर की वासना जो है ना तूफान चलते ही रहेंगे तरंग चालू रहेंगे पतंजलि और अष्टावक्र मुनि में काफी फासला हो जाता है पतंजलि कहते हैं कि तरंगों को दबा दो तरंगों को शांत कर दो यहां पतंजलि मुनि
के सा समाप्त होती है योगस चित्त वृति निरोध योग से चित्त की वृतिया निरोध करो लेकिन अष्टावक्र मुनि की यहां से साधना शुरू होती कि चित्त की वृतिया चित्त दूसरा शरीर है आपका मूल जो है वह चित्त नहीं है तभी तो कहते हो मेरा मन मेरी बुद्धि मेरा चित्त मेरा विचार ऐसे ही क तो मेरा सिर मेरा पैर मेरे हाथ मेरे फेप से मेरे घुटने मेरी किड निया मेरी पीठ तो यह सब तुम्हारा है और तुम्हारा वास्तव में तो तुम्हारा नहीं है लेकिन तादाद में हो गया इसलिए तुम इसको अपना मानते तुम तुम तो नहीं
हो ज्ञानी वह है जिसको पता चल गया कि मैं एक रस हूं और यह चीज बदलने वाली है और य बदलने वाली चीजों से शाश्वत सुख उपलब्ध नहीं होता सुख की एक आभा सुख की एक भ्रांति पैदा होती धन किसलिए चाहता तू आप माला माल है सिक्के सभी जिसी से बने तोत वह महा टंक साल है चाह न कर चिंता न कर चिंता ही बड़ी दुष्ट है है त श्रेष्ट से भी श्रेष्ठ मगर चाह करके भ्रष्ट है तो हमारी जो चाय है हमारी जो वासना है वो हमारे चित्त में बेचैनी पैदा कर देती और वासना
क्यों होती है कि हम कुछ पाकर सुखी होने की गलती करते हैं फिर कोई माला घुमाकर सुखी होने की इच्छा करें कोई रुपया कमाकर कोई कुछ पाकर लेकिन कोई संयोग पैदा करके जो सुखी होने की इच्छा करते हैं जब तक वो संयोग नहीं हुआ तब तक वो करें और फिर संयोग हो जाएगा तो पाएंगे कि ये भी कुछ नहीं और कुछ करो और कुछ करो और कुछ करो और कुछ करो करते करते करते जीवन समाप्त हो जाता है मौत आ जाती फिर दूसरा जीवन शुरू हो जाता है फिर मौत होती है फिर जन्मता है फिर
मरता है लेकिन मजूरी से पिंड छूटता नहीं अष्टावक्र मुनि बड़ी अद्भुत बात बता रहे हैं कि ज्ञानी समाधि रहित होने से मुमुक्षु नहीं है ज्ञानी को समाधि करने की भी इच्छा नहीं होती यह तो बहुत ऊंची चीज है बड़ी सुहावनी खबर है समाधि तो लेकिन ज्ञानवान समझ गया कि समाधि भी चित्त करता है भोग भी चित्त भोगता है तो उस भोग से उपरा हो गया जो बीमार है उसको तंदुरुस्ती चाहिए जो बीमार है उसको दवा चाहिए जिसको विक्षेप है उसको समाधान चाहिए समाधि चाहिए जो अशांत है उसको शांति चाहिए तो दृष्टा कभी अशांत तो हो
नहीं सकता और दृश सदा एक जैसा रह नहीं सकता ऐसा उसको ज्ञान हो गया श्री राम तो जो अपने मूल स्वरूप में अपना मूल स्वरूप और परमात्मा का मूल स्वरूप एक ही है जैसे बचपन बदला लेकिन मैं नहीं बदला जवानी बदली मैं नहीं बदला उसको देखने वाला काम आया हम कामी हो गए नहीं यह कामी हो गया काम गया मन शांत क्रोध आया मन क्रोधी हो गया क्रोध गया मन शांत लोभ आया मन लोभी हो गया लोभ गया मन शांत तो लोभ नहीं था तब भी मन को देखने वाला मैं था और लोभ आया तब
भी देखने वाला मैं हूं और लोभ चला गया तभी भी देखने वाला मेरा हूं मैं तो बदला नहीं तो लोभ बदला काम बदला क्रोध बदला बचपन बदला जवानी बदली बुढ़ापा बदला जीवन बदला मृत्यु बदला तो जैसे य शरीर और अंदर का शरीर बदला ऐसे ही हमारा घर और पड़ोस और समाज यह भी बदलता है तो शरीर और समाज की एकता हुई शरीर और संसार की एकता हुई यह है बदलने वाले मैं नहीं बदलता हूं जैसे मैं नहीं बदलता ऐसे परमात्मा भी नहीं बदलता तो मेरा जो आत्मा मैं रूप में है वह और परमात्मा दोनों एक
जात के हैं जय जाए तो जो अपने मूल स्वरूप में अपना मूल स्वरूप और परमात्मा का मूल स्वरूप एक ही है जैसे बचपन बदला लेकिन मैं नहीं बदला जवानी बदली मैं नहीं बदला उसको देखने वाला काम आया हम कामी हो गए नहीं यह कामी हो गया काम गया मन शांत क्रोध आया मन क्रोधी हो गया क्रोध गया मन शांत लोभ आया मन लोभी हो गया लोभ गया मन शांत तो लोभ नहीं था तब भी मन को देखने वाला मैं था और लोभ आया तब भी देखने वाला मैं हूं और लोभ चला गया तभी भी देखने
वाला मेरा ह मैं तो बदला नहीं तो लोभ बदला काम बदला क्रोध बदला बचपन बदला जवानी बदली बुढ़ापा बदला जीवन बदला मृत्यु बदला तो जैसे य शरीर और अंदर का शरीर बदला ऐसे ही हमारा घर और पड़ोस और समाज यह भी बदलता है तो शरीर और समाज की एकता हुई शरीर और संसार की एकता हुई यह है बदलने वाले मैं नहीं बदलता हूं जैसे मैं नहीं ब ऐसे परमात्मा भी नहीं बदलता तो मेरा जो आत्मा मैं रूप में है वह और परमात्मा दोनों एक जात के हैं जय जय अपना जो शुद्ध म है तीसरा आध्यात्मिक
शरीर जो है आध्यात्मिक म शरीर तो भाषा आ जाती है ी गलती की उसको शरीर कहो या असलत कहो या तत्व कहो अपना जो मैं अपना जो शुद्ध मैं है वो परमात्मा का मैं और अपना मैं एक है जैसे अपने बदलते नहीं शरीर और मन बदलता है ऐसे ही परमात्मा सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मा नहीं बदलते सृष्टि होती है सृष्टि में परिवर्तन होते हैं सृष्टि प्रलय होती है तभी भी भगवान रहते हैं पुराणों में सुना होगा कि महा प्रलय हो जाता है अत्यंतिक प्रलय हो जाता है प्रलय हो जाता तो उसको भी तो कोई देखता है प्रलय
में कुछ नहीं रहता कुछ नहीं रहने को भी कोई जानता है ऐसे ही रात्रि को तुम नित्य प्रलय कर करते हो सो गए मेरा मकान यह बात चले गई मेरा दुकान एक बात चली गई मेरी जाती पाती सब भूल गए कहां हो क्या कर रहे हो सब भूल गए सुबह उठे कुछ नहीं देखा कुछ नहीं देखा बड़ी आराम से नींद आ गई कुछ नहीं देखा और बड़ी मजे की नींद आई तो नींद आई कुछ नहीं देखा कुछ ना देखने को भी तुम जान रहे हो तो तुम्हारे यह कण जो है वो देखते तब भी तुम
देखते हो और वे नहीं देखते तभी भी वह जो देखता है वह तुम्हारा असली स्वरूप है ज्ञानवान उस असली स्वरूप में टिका है इसलिए उसकी सदा समाधि है उसको समाधि करनी नहीं पड़ती उसका समाधान हो गया उसका रोग निवृत हो गया इसलिए दवा उनको लेनी पड़ती नहीं योग समाधि में विक्षेप निवृत करने के लिए योग समाधि है भाव को शुद्ध करने के लिए भक्ति है व्यवहार को शुद्ध करने के लिए निष्काम है लेकिन अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए किसी की जरूरत नहीं अपना आत्मा तो शुद्ध है यह नहीं जाना तब तक यह सब
करना पड़ता है ज्ञानवान ने यह जान लिया है रिनझाई के गुरु से रिनझाई ने पूछा कि गुरु जी शुद्ध क्या है अशुद्ध क्या है पवित्र क्या है अपवित्र क्या है गुरु ने कहा मैं जो करता व शुद्ध है जो नहीं करता हूं अशुद्ध मेरे से जो होता है वह पवित्र है और जो नहीं होता है वह अपवित्र है बोले बाबा जी आपसे कोई गलती नहीं होती होगी बोले जब मैं था इस शरीर को मैं मानकर मैं था तब तो कितना भी संभल संभल के करता था तभी भी सोचता था कि अब ऐसा करूंगा तब सुखी
होंगा ऐसा करूंगा तब कुछ होगा अब मैं जब खो गया मुझे अपने असली स्वरूप का पता चला तब इसके साथ का जो मेरा जोड़न था व जोड़न कट आउट हो गया संयोग जन्य सुख लेने की लालसा मिट गई और जब से लालसा मिट गई तब से जो कुछ होता है बढ़िया होता है कुछ चाहिए तो गदाई है कम चाहिए तो खुदाई है और कुछ नहीं चाहिए तो शशाई है