क्या तुमने सोचा गाड़ी में ट्रेवल करते वक्त उल्टी जैसा मन क्यों होता है मतलब पहले तो नहीं हो रहा था गाड़ी में बैठने के बाद ही हुआ है हां तुम्हारी गाड़ी में ही दिक्कत है हट तो देखो ऐसा नहीं है होता क्या है कि जब भी हम गाड़ी में बैठते हैं और गाड़ी चल रही होती है तो आंखें जब कार के अंदर देखती हैं तो उसको तो लगता है कि भैया गाड़ी तो एक जगह रुकी हुई है पर कान को ऐसा नहीं लगता क्यों क्योंकि कान की गुफा के अंदर कान कान बहुत अंदर एक लिक्विड
होता है जो मोशन के हिसाब से इधर-उधर होता है तो अब गाड़ी चल रही है तो वो लिक्विड भी मोशन के हिसाब से इधर-उधर होगा अब ये आंखों का और कानों का सिग्नल दिमाग के पास जाता है आंखें बोलती है गाड़ी नहीं चल रही है कान बोलते हैं गाड़ी चल रही है अरे हम कह रहे हैं नहीं चल रही है अरे हम कह रहे हैं चल रही है तुम बात नहीं मानोगे हमारी कह दिया जब नहीं चल रही है तो नहीं चल रही है अरे चल रही है भाई तो अलग-अलग सिग्नल आने की वजह से
दिमाग को ऐसा लगता है कि शायद शरीर में कुछ ऐसी टॉक्सिक या पॉइजन चीज चली गई जिसकी वजह से ये सब हो रहा है तो उसको बाहर निकालने के लिए दिमाग उल्टी करवा देता है