10 साल की खिलाफत के बाद हजरत उमर दुनिया से चले गए। लेकिन उनके वफात के सिर्फ तीन दिन बाद हजरत उस्मान मुसलमानों के नए खलीफा बने। जो एक बड़े सहाबी होने के साथ-साथ दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से भी थे। जिसके बाद हजरत उस्मान 12 साल तक मुसलमानों के खलीफा रहे। जिसमें उन्होंने मुसलमानों को एक कुरान पर यूनाइट किया। इस्लाम की पहली करेंसी बनाई। मक्का और मदीना की मस्जिदों को एक्सटेंड किया जो आज तक जारी है। लेकिन खिलाफत की सबसे पहली और बड़ी बगावत भी हजरत उस्मान के दौर में ही हुई। लेकिन अब मसला
यह है कि इस सब के बाद भी लोग बाकी दो खलीफाओं के बारे में तो बहुत जानते हैं। लेकिन हजरत उस्मान के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। हालांकि हजरत उस्मान की स्टोरी बहुत ही इंस्पायरिंग है। क्योंकि हजरत उस्मान खलीफा बनने से बहुत साल पहले मक्का के किसी आम घर में नहीं। बल्कि मक्का के सबसे रिच खानदान बनू उमैया में पैदा हुए। और उनके वालिद अफान का मक्का में कपड़ों का बहुत बड़ा बिजनेस था जो मक्का से बाहर रोम और यमन तक फैला हुआ था। लेकिन अचानक एक दिन जब हजरत उस्मान की एज बहुत
ही कम थी। उनके वालिद अफान किसी सफर से वापस आते हुए फौत हो गए। फौत होने से पहले अफान के दो ही बच्चे थे। बेटा उस्मान और बेटी आमना। इस्लाम से पहले अरब का सिस्टम यह था कि बाप के मरते ही सारा का सारा माल उसके बेटे की तरफ जाता था और बेटियों को कुछ नहीं मिलता था। इसीलिए ऑफकोर्स अफान का पूरा बिजनेस और सारा माल बहुत ही कम एज में हजरत उस्मान को मिला। जिसकी वजह से बहुत ही कम एज में। हजरत उस्मान मक्का के सबसे अमीर लोगों में से एक बने। इसीलिए मक्का के
सारे जवान लड़के हजरत उस्मान को एक रोल मॉडल की तरह देखते थे। इतना ज्यादा पैसा होने के बाद भी हजरत उस्मान ने मक्का के बाकी शहजादों की तरह एक अय्याशी की जिंदगी गुजारने की बजाय अपने खानदान के बिजनेस पर फोकस किया और उसे एक इंटरनेशनल बिजनेस बनाया। अपने इसी बिजनेस की वजह से हजरत उस्मान मक्का में इतने फेमस हुए कि मक्का की माएं अपने बच्चों से कहा करती थी कि मैं तुमसे इतनी मोहब्बत करती हूं जितनी कुरैश उस्मान से करते हैं। अब जब हजरत उस्मान मक्का में अपने कपड़ों का बिज़नेस कर रहे थे। वहां एट
द सेम टाइम एक दूसरे आदमी का बिजनेस में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा था। हजरत अबू बकर रज़ अल्लाह ताला अनो और यहीं से इन दो ग्रेट सहाबा की दोस्ती शुरू हुई। नाउ जब हजरत उस्मान का बिजनेस मक्का में अपनी पीक पर था। एग्जैक्ट उसी टाइम मक्का के एक गार में रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर पहली वही नाज़िल हुई। रीडन आप सल्ला अलह वसल्लम के घर वालों के बाद सबसे पहले इस्लाम अबू बकर रला अनू ने कबूल किया और इस्लाम कबूल करते ही वो सीधा अपने दोस्त उस्मान रज अल्लाह ताला अनहु के पास गए
और उन्हें भी इस्लाम की तरफ लेकर आए। हजरत उस्मान जिन्हें मक्का के जवान अपना रोल मॉडल समझते थे उनका इस्लाम कबूल करना पूरे मक्का और स्पेशली उनके खानदान बनो उमैया के लिए एक बहुत बड़ा झजका था क्योंकि हजरत उस्मान के बाद सबको इस बात का पता था कि अब मुसलमानों को पैसों की ज्यादा कमी नहीं होगी। क्योंकि हजरत उस्मान बन उमैया के पहले और अकेले शख्स थे जिन्होंने अपने खानदान के खिलाफ जाकर इस्लाम कबूल किया था। जब आप सल्ल वसल्लम मक्का में लोगों को इस्लाम की तरफ बुलाने लगे तो पहले लोगों का ख्याल था कि
मोहम्मद सल्ला वसल्लम यह सब कुछ सिर्फ अपने खानदान बनू हाशिम को प्रमोट करने के लिए कर रहे हैं। इसीलिए लोग इस्लाम को सिर्फ एक कबीले का रिलजन समझते थे। लेकिन अचानक एक दिन कुरान की एक सूरत नाजिल हुई सूर मसद जिसमें अल्लाह ने मक्का के सारे लोगों को छोड़कर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा अबू लहब और उसकी बीवी के लिए बहुत ही सख्त अल्फाज़ यूज़ किए। ताकि इन आयतों की वजह से सबको पता चल जाए कि इस्लाम किसी खानदान के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। लेकिन अब मसला यह था जिस चाचा
के बारे में कुरान की ये आयात नाजिल हुई थी उसी के दो बेटों के साथ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दो बेटियों का निकाह हो चुका था। तो अब जब इन आयात का आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के चाचा अबू लहब और उसकी बीवी को पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बदला लेने के लिए अपने बेटों को हुक्म दिया कि वो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेटियों को तलाक दे दे। अब जब हजरत उस्मान रज अल्लाह ताला अनहु ने यह देखा कि सिर्फ आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम को कमजोर
करने के लिए उनकी बेटियों को तलाक दिया गया तो वो सीधा आप सल्ला वसल्लम के पास पहुंचे और उनसे उनकी बेटी रुकैया का हाथ मांगा। इस तरह हजरत उस्मान रज़ अल्लाह ताला अनू आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बहुत ही करीब हो गए। ये देखकर उनका खानदान बनू उमैया आखिर और बर्दाश्त नहीं कर सका। क्योंकि यह बनो उमैया के लिए एक बहुत बड़ी बेइज्जती थी। तो अब बिल्कुल बाकी मुसलमानों की तरह बनू उमैया भी हजरत उस्मान जैसे पावरफुल इंसान पर जुल्म करने लगे। कहा जाता है कि उनके एक चाचा हाकम उन्हें रस्सियों से बांधकर मारा करते
थे। और उनका पूरा खानदान उन्हें इस्लाम छोड़ने का कहता रहता था। लेकिन हजरत उस्मान इस सब के बाद भी अपने खानदान के खिलाफ जाकर आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के साथ खड़े रहे। इसके कुछ ही अरसे बाद मक्का में आखिर एक ऐसा टाइम आया कि अब कुछ मुसलमान अब और यहां नहीं रह सकते थे। क्योंकि अब मक्का वालों ने मक्का के दो मुसलमानों को शहीद कर दिया था। तो रसूल्लाह सल्लल्ला वसल्लम ने इन मुसलमानों को हुक्म दिया कि वो अरब को छोड़कर हबशा की तरफ हिजरत करें। जहां एक नेक बादशाह उनकी जरूर मदद करेगा। आप सल्ला
अलह वसल्लम के इस हुकुम के बाद हजरत उस्मान अपनी बीवी रुकैया और कुछ और मुसलमानों के साथ अरब को छोड़कर इथियोपिया मतलब हबशा की तरफ चले गए और वहां जाकर अगेन हजरत उस्मान ने अपनी बिजनेस की नॉलेज को यूज़ करके एक नया बिजनेस इस्टैब्लिश किया। अब जब हजरत उस्मान यहां हबशा में थे। वहां मक्का वालों ने आप सल्ला अलह वसल्लम और उनके खानदान का बॉयकॉट करके उन पर बहुत जुल्म किया। लेकिन हजरत उस्मान मक्का से बहुत दूर होने की वजह से आप सल्लल्लाहु अलह वसल्लम की मदद नहीं कर सके। चार साल हबशा में गुजारने के
बाद अचानक हबशा में एक अफवाह फैली कि मक्का के सारे लोग इस्लाम कबूल कर चुके हैं। यह सुनकर हजरत उस्मान और बाकी मुसलमान हबशा छोड़कर वापस मक्का की तरफ आए। लेकिन यहां आकर उन्होंने देखा कि यह सब कुछ बिल्कुल झूठ था। लेकिन अब मक्का से वापस हबशा जाने की बजाय रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने मुसलमानों को मदीना की तरफ हिजरत करने का हुक्म दिया। अब मदीना मक्का से बिल्कुल ऑोजिट एक बहुत ही गरीब इलाका था और वहां पर मुसलमानों के हालात इतने खराब थे कि उन्हें पीने के लिए पानी भी अवेलेबल नहीं था। यह देखकर रसूल्लाह
सल्ला अलह वसल्लम ने मदीना के सारे मुसलमानों को जमा किया और उनसे कहा कि जो भी मुसलमान उस यहूदी से यह कुआं बेयर रोमा खरीद कर मुसलमानों के लिए खोल देगा उसकी जगह जन्नत में होगी। अब मदीना में ऑफ कोर्स कोई भी ऐसा नहीं था जो इतने सख्त हालात में इस कुएं को अफोर्ड कर सकता हो। लेकिन सिर्फ एक शख्स ऐसा था जिसका बिजनेस शाम, यमन और अब हबशा तक फैला हुआ था। हजरत उस्मान हजरत उस्मान सीधा उस यहूदी के पास गए। लेकिन उस यहूदी ने कहा कि मैं यह कुआं नहीं बेचना चाहता क्योंकि इस
कुएं के पानी पर उसने टैक्स लगाया था और इस पानी को बहुत महंगा बेचता था। तो हजरत उस्मान ने इस यहूदी के साथ एक डील की और उससे आधा कुआं खरीदा। मतलब एक दिन यह कुआं हजरत उस्मान का होगा और एक दिन यहूदी का। उस यहूदी ने यह ऑफर खुशी से एक्सेप्ट कर ली। लेकिन कुछ दिनों बाद उसे पता चल गया कि यह उसने बहुत बड़ी गलती की है। क्योंकि जिस दिन यह कुआं हजरत उस्मान के पास होता था, उस दिन मदीना के सारे लोग आकर इस कुएं से पानी भर कर ले जाते थे। और
अगले दिन यहूदी के पास कोई भी पानी लेने के लिए नहीं आता था। मतलब इस कुएं से यहूदी की कमाई बिल्कुल खत्म हो चुकी थी। तो इस यहूदी ने हजरत उस्मान के पास आकर मजबूरन उन्हें सारा कुआं बेच दिया। और इस तरह हजरत उस्मान ने 20,000 दरहम में यह कुआं खरीद कर मुसलमानों के लिए डोनेट कर दिया। यह हजरत उस्मान की इतनी बड़ी डोनेशन थी कि इसे आज तक पूरी दुनिया याद करती है क्योंकि यह कुआं और इसके पास जमीन आज तक हजरत उस्मान के नाम पर सऊदी अरब में रजिस्टर्ड है। और इस कुएं और
इसके आसपास जमीन से जितनी इनकम आती है उससे हजरत उस्मान के नाम पर ही मदीना में एक बहुत बड़ा होटल बनाया गया है। यह होटल हर साल हजरत उस्मान के नाम पर 50 मिलियन रियाल कमाता है। 5 करोड़ रियाल जो ऑलमोस्ट ₹400 करोड़ बनते हैं। जिसे पूरा का पूरा गरीबों में तकसीम कर दिया जाता है। मतलब हजरत उस्मान वाहिद सहाबी है। जिनके नाम से आज तक अल्लाह की राह में करोड़ों दिए जाते हैं। यह कुआं खरीदने के कुछ ही अरसे बाद इस्लाम की पहली जंग का टाइम आया। जंग बदर जिसमें रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना
से 313 मुसलमानों की फौज लेकर बदर की तरफ रवाना हुए। लेकिन मसला यह था कि हजरत उस्मान मुसलमानों की इस फौज में नहीं थे। क्योंकि उनकी बीवी और आप सल्ला अलह वसल्लम की बेटी रुकैया की तबीयत बहुत खराब थी। इसीलिए आप सल्ला अलह वसल्लम ने हजरत उस्मान को मदीना में रहने का हुक्म दिया। लेकिन अब जब आप सल्ला अलह वसल्लम और मुसलमान जंग बदर लड़ने में बिजी थे। वहां उनकी बेटी रुकैया की तबीयत बहुत खराब हुई और वो इस दुनिया से चली गई। जब रसूल्लाह ससल्लम जंग बदर जीत कर वापस मदीना पहुंचे तो मुसलमान बहुत
खुश थे और जंग जीतने का जश्न मना रहे थे। लेकिन उसी वक्त आप सल्ला अलह वसल्लम को उनकी बेटी रुकैया की मौत की खबर दी गई। जिस पर आप सल्ला अलह वसल्लम को इस जीत के दिन भी बहुत दुख हुआ। रुकैया रज़ अल्लाह ताला अन्हा की मौत के बाद मदीना के लोगों ने देखा कि हजरत उस्मान बहुत ही दुखी और परेशान रहने लगे। और जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि रुकैया की मौत का दुख तो मुझे है ही। लेकिन मुझे इस बात का भी गम है कि उनके जाने के बाद मेरा रिश्ता रसूल्लाह
सल्लल्लाहु अलह वसल्लम के साथ टूट चुका है। यह सुनकर आप सल्ला अलह वसल्लम ने अपनी दूसरी बेटी उम्मे कलसूम की शादी भी हजरत उस्मान से कराई। जिसके बाद हजरत उस्मान का नाम जुनूरैन पड़ा। मतलब दो नूरों वाला। बदर की जंग ऐसा एक ही इवेंट था जिसमें हजरत उस्मान मुसलमानों के साथ शामिल नहीं थे। क्योंकि बदर के बाद हजरत उस्मान इस्लाम की हर बड़ी जंग ओहद और खंदक जैसी बड़ी जंगों में शामिल थे। और इसके बाद आया हजरत उस्मान की जिंदगी का सबसे इंपॉर्टेंट इवेंट। कि जब खंदक की जंग के बाद मुसलमान मदीना से उमरा करने
के लिए मक्का की तरफ रवाना हुए। जैसे ही मुसलमान मक्का के करीब पहुंचे रसूल्लाह सल्ल वसल्लम ने हजरत उमर को हुकुम दिया कि जाओ और मक्का के लीडर अबू सुफियान से बात करो कि हम किसी जंग के लिए नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ उमरा करने के लिए आए हैं। ये सुनकर हजरत उमर ने आप सल्लल्ला वसल्लम से कहा कि मेरा खानदान मक्का में इतना स्ट्रांग नहीं है कि वो मेरी हिफाजत कर सके। आप मेरी जगह उस्मान रज अल्लाह ताला अनू को भेजें क्योंकि उनका खानदान बनू उमैया है जिनसे इस वक्त मक्का में कोई भी ताकतवर
नहीं है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी यह बात पसंद आई और उन्होंने हजरत उमर को छोड़कर इस इतनी इंपॉर्टेंट डील के लिए हजरत उस्मान को भेजा। अब जब हजरत उस्मान मक्का की तरफ चले गए तो लोगों ने यहां आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है? हजरत उस्मान सबसे पहले जाकर काबा का तवाफ करके वापस आ जाए। तो रसूल्लाह ससल्लम ने कहा कि जितना मैं उस्मान को जानता हूं वो मुझसे पहले कभी भी तवाफ नहीं करेगा। जैसे ही हजरत उस्मान मक्का पहुंचे वहां एक्सजेक्टली ऐसा ही हुआ। मक्का वालों ने हजरत
उस्मान से कहा कि आप बाकी मुसलमानों को छोड़ें। आप बड़े खानदान से हैं और खुद काबा का तवाफ करके वापस चले जाएं। लेकिन हजरत उस्मान ने उन्हें कहा कि मैं कभी भी आप सल्लल्लाह अलह वसल्लम से पहले तवाफ नहीं करूंगा। अब मक्का वाले मुसलमानों को बस तकलीफ देने के लिए हजरत उस्मान के साथ इस डील को डिले करने लगे। जिसकी वजह से हजरत उस्मान कई दिन तक मक्का में ही रहे। अचानक वहां मुसलमानों के कैंप में यह अफवाह फैली कि मक्का वालों ने रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मैसेंजर उस्मान को शहीद कर दिया है। और
ये आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ऐसी तौहीन थी जिसे एक्सेप्ट करना इंपॉसिबल था। अब तक मुसलमान किसी जंग के लिए तो नहीं आए थे। लेकिन मक्का वालों की इस हरकत के बाद आप सल्लल्लाह वसल्लम ने अपनी स्ट्रेटजी बदल दी और मुसलमानों से एक दरख्त के नीचे बैत लेना शुरू की कि हम अपने खून के आखिरी कतरे तक हजरत उस्मान के बदले के लिए मक्का वालों से लड़ेंगे। जिसके बाद सारे मुसलमानों ने आकर रसूल्लाह सल्ल वसल्लम के हाथ पर बैत की और हजरत उस्मान रज अल्लाह ताला अनू की तरफ से आप सल्ल वसल्लम ने एक हाथ
दूसरे हाथ पर रखकर उनकी तरफ से भी बैत की मतलब मुसलमानों की पूरी फौज हजरत उस्मान के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे। लेकिन यह जंग कभी हुई ही नहीं। क्योंकि यह एक झूठी अफवाह थी और हजरत उस्मान बिल्कुल सही सलामत वापस आकर मुसलमानों के साथ शामिल हुए। इस बैत को बैतुल रिजवान कहा जाता है। और यह इतनी इंपॉर्टेंट बैत थी कि जिस दरख्त के नीचे मुसलमानों ने बैत की थी, उस दरख्त का जिक्र कुरान में भी हुआ है। अब यहां पर एक बहुत ही इंटरेस्टिंग बात है कि इस सबसे बाद हजरत उमर
की खिलाफत में जब भी मुसलमान हज करने आते थे वो इस दरख्त के पास जाकर भी हाजिरी लगाते थे। जो एक ऐसा काम था जिसका इस्लाम में कोई जिक्र नहीं है। और हजरत उमर नहीं चाहते थे कि मुसलमान इस्लाम में नए-नए रिवाज बनाए। तो हजरत उमर ने अपनी खिलाफत में हुकुम दिया कि इस दरख्त को काट दिया जाए। इसीलिए आज तक किसी को नहीं पता कि वो दरख्त आखिर कहां पर था। इसके बाद हजरत उस्मान की मदीना में इतनी अहमियत थी कि एक दिन रसूल्लाह सल्ला वसल्लम किसी छोटी जंग पर मदीना से कहीं दूर चले
गए और जाने से पहले उन्होंने अपनी जगह मदीना का लीडर हजरत उस्मान को बनाया। इसके बाद इस्लाम के हर इवेंट में हजरत उस्मान आप सल्ला अलह वसल्लम के करीबी साथी रहे। खैबर, फतेह मक्का, हुनैन। इन सारी जंगों के बाद आखिर एक ऐसी जंग आई जिसकी वजह से आज तक हजरत उस्मान को याद किया जाता है। इसी तरह इस्लाम पूरे अरब में फैल गया और अब मुसलमानों की जंग सीधा उस वक्त की सुपर पावर रोमन एंपायर से होने लगी। लेकिन रोमन एंपायर से लड़ना कोई आसान काम नहीं था। उसके लिए मुसलमानों को बहुत ज्यादा माल और
ताकत की जरूरत थी। तो आप सल्ला अलह वसल्लम ने जंगे तबूक के लिए मुसलमानों की 3000 की फौज जमा की। तो अब 3000 की फौज को मैनेज करना एक बहुत ही मुश्किल काम था। इसीलिए रसूल्लाह सल्ला वसल्लम ने पूरी मुसलमान उम्मत से अपील की कि जिससे जितना हो सके इस फौज की मदद के लिए खर्च करे और जो भी इस फौज की अपने माल से मदद करेगा इसके बदले में उसे जन्नत मिलेगी। यह सुनकर हजरत अबू बकर ने अपने घर का सारा सामान लाकर डोनेट कर दिया। हजरत उमर ने अपने घर का आधा सामान मुसलमान
औरतों ने अपने जेवर और इवन एक गरीब सहाबी ऐसे भी थे जिन्होंने कुछ खजूर लाकर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने पेश किए। जिससे ऑफ कोर्स मुसलमानों की फौज को फायदा तो हुआ लेकिन असल में इस पूरी फौज के पीछे सबसे ज्यादा फंडिंग सिर्फ एक ही सहाबी की थी। हजरत उस्मान जब मुसलमान हर तरफ से तबूक की जंग के लिए जमा होने लगे तो हजरत उस्मान ने उनके लिए सबसे पहले 1000 ऊंट 70 घोड़े 10 हजार गोल्ड कॉइंस 70 हजार सिल्वर कॉइंस ये सब मुसलमानों की फौज को डोनेट कर दिए जिसका अगर आज हिसाब लगाया
जाए तो यह बिलियंस ऑफ रुपीस बनते हैं। रसूल्लाह सल्ल वसल्लम ने इन सिक्कों को अपने हाथ में पकड़ कर कहा आज के बाद उस्मान जो भी करे उसे कोई नुकसान नहीं होगा। हजरत उस्मान और बाकी मुसलमानों की मदद से मुसलमानों की फौज मदीना से रोमन एंपायर की तरफ रवाना हुई। लेकिन यह फौज इतनी बड़ी थी कि सिर्फ इसके खाने पीने का खर्चा भी बहुत बड़ा था। और कुछ ही दिनों बाद इस फौज के खानेपीने का सामान खत्म होने लगा और लोग रसूल्लाह सल्ला वसल्लम की तरफ मदद के लिए देखने लगे। यह देखकर हजरत उस्मान फुल
स्पीड गए और एक बार फिर कई ऊंटों को खानेपीने की चीजों से भरकर मुसलमानों की फौज की तरफ लेकर आए। जब आप सल्ला वसल्लम ने हजरत उस्मान के इस काफिले को दूर से आता हुआ देखा तो वो बहुत खुश हुए और उन्होंने लोगों से कहा कि वो देखो तुम्हारी मदद के लिए सुर्ख ऊंट सामान ला रहे हैं और जैसे ही ये काफिला पहुंचा आप सल्ला वसल्लम ने अल्लाह से दुआ की या अल्लाह मैं उस्मान से खुश हूं और आप भी उस्मान से राजी हूं। अब मसला यह था कि जैसे ही मुसलमान तबूक की जंग के
लिए पहुंचे रोमन एंपायर की फौज पहले ही वहां से भाग चुकी थी। मतलब कोई जंग हुई ही नहीं। तो अब चाहिए तो यह था कि हजरत उस्मान अपना सारा डोनेट किया हुआ माल मुसलमानों की फौज से वापस ले लेते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और जंग ना होने के बावजूद भी अपना यह सारा माल मदीना की रियासत को डोनेट कर दिया। इस तरह आप सल्ला वसल्लम अपने आखिरी दिन तक हजरत उस्मान से खुश रहे। इसीलिए उनकी वफात के बाद इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर रज अल्लाह ताला अनू ने हजरत उस्मान को अपना बड़ा मिनिस्टर
बनाया और हजरत उस्मान उसी तरह अपने बिजनेसेस की ताकत से मुसलमानों की इस खिलाफत को सपोर्ट करते रहे। जिसके बाद हजरत उमर की खिलाफत में भी हजरत उस्मान उनके सबसे बड़े मिनिस्टर्स में से रहे। लेकिन जैसे ही हजरत उमर की शहादत के बाद हजरत उस्मान मुसलमानों के खलीफा बने, रोमन और पर्शियन एंपायर के बादशाहों को समझ आ गई कि यही टाइम है मुसलमानों की इस खिलाफत को खत्म करने का और उन्होंने मुसलमानों की इस खिलाफत पर हर तरफ से हमला कर दिया। तो अब हजरत उस्मान ने यह प्रूफ करना था कि वो हजरत उमर की
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