एक मिनट में 13 से 14 स्वास खर्च होते हैं आम आदमी के लेकिन प्राण की ताल बद्ध होने से एक मिनट में 11 12 स्वास से ही काम चल जाता है 10 से 20 टका स्वास हमारा बच जाता है जिससे आयुष वृद्धि में मदद मिलती है और मन की चंचलता कम होने से मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक विकास में भी बड़ा लाभ होता है भगवन नाम से आयु आरोग्य और पुष्टि की प्राप्ति होती चित्त की प्रसन्नता और बुद्धि की विलक्षण शक्तियां भी भगवन नाम और ध्यान से विकसित होती है जप शुरू करने के पूर्व थोड़ी सी
प्रार्थना और स्तुति करना भी अनिवार्य माना गया सात्विकता के लिए कभी कभार लिखित जप करना एकाद घंटा एकाग्रता के साथ-साथ मानसिक लाभ भी होते हैं कलयुग केवल हरि गुण गा गावत नर पाव भवता कलयुग कर्मन धर्म विवेक राम नाम अवलंबन एक भगवन नाम का ही अवलंबन है कलयुग में साधु माला घुमाते घुमाते मन इधर उधर भागे तो फिर कॉपी में भगवान का नाम लिखना चालू कर दे इसमें बलात इंद्रियों को लगना पड़े आंख वहां लगेगी हाथ भी लगेगा और नाम भगवान का लगेगा लिखेगा तब मन को भी लगना पड़ेगा मानसिक जप हो तो अच्छा है
माला पर जप हो तो भी बढ़िया है और कभी-कभी मानसिक जब और माला के जब से मन उबान महसूस करता है तो एक आध घंटा प्रतिदिन कॉपी में भगवन नाम लिखा जाए कापी ऐसी आती है लकीरों वाली अपने आश्रम से बांटते हैं जो जप करना चाहे लिखना चाहे बांटते हैं कापिया लाखों छपती है हो सके तो यहां मंगा लेना निशुल्क कॉपिया भेज दी जाएगी साधु संत उस पर बैठे बैठे भगवन नाम लिख सकते हैं उससे एकाग्रता में मदद मिलती है कलयुग कर्मन धर्म विवेक राम नाम अवलंबन एक भगवान के नाम का ही अवलंबन कलयुग में
बढ़िया साधन माना गया है भगवान कहते हैं महर्षि नाम भगुर अहम मह ऋषियों में भगु में हूं यज्ञ नाम जप यज्ञ अस्म और यज्ञ में तो काणा कोढ़ी नहीं चलता है विधुर नहीं चलता लेकिन जब यज्ञ में तो सब चलता है और जप यज्ञ और सब यज्ञों से श्रेष्ठ माना गया अपना स्वरूप माना गया है भगवान का स्वरूप है जप यज्ञ यज्ञ नाम जप यज्ञ अस्म स्थावर नाम हिमालय स्थावर तीर्थों में हिमालय ने भगवान भगवान ने हिमालय को अपना स्वरूप बताया क्योंकि वहां ब्रह्म वेता संत आत्म रामी ब्राह्मी मस्ती में निवास करने वाले लोग हैं
और भगवान शिव का ससुराल भी यज्ञ नाम जप यज्ञ अस्म जप चार प्रकार का होता है पहले तो आरंभ में वखरी से जब किया जाए जैसे मैंने राम राम या हरि ओम काहा हजारों लोगों ने सुना य बैकरी जप कुछ समय के बाद उसको मध्यमा में लाते हैं होठ हिले ना हिले और जब कंठ में मुख में जप का प्रभाव अपना काम करता रहे वखरी से मध्यमा का जप 10 गुना ज्यादा प्रभावशाली माना है वक्र से मध्यमा मध्य मध्यमा से पसंती और द गुना अर्थात स गुना ज्यादा प्रभावशाली माना गया और पसंती से पराज जप
सर्वोपरि सर्वश्रेष्ठ माना गया मद भक्ति लभते पराम उपरा जप करने वाले को भगवान की परा भक्ति की प्राप्ति भी हो जाती है जहां-जहां विशेषता दिखे वहां वहां भगवान की ही महिमा भगवान का ही प्रभाव देखना चाहिए सर्वप्रथम तीन मात्रा वाला प्रणव प्रकट हुआ महर्षि नाम भभु अहम भभु में विशेषता देखी भगवान वो विशेषता भगवान की याद करनी चाहिए जप में यज्ञों में जप यज्ञ में हूं जब जप करे तो समझे साक्षात हरि का स्वरूप ही हमारे साथ प्रकट हो रहा है हमारे चित्त में उसी की कृपा हो रही जब जब जप करने का विचार आए
तो समझना चाहिए कि ठाकुर जी ने मुझे याद किया है जय राम जी की मैं ठाकुर जी का ठाकुर जी मेरे ठाकुर जी का स्मरण आया तो जरूर मेरे को ठाकुर जी ने याद किया व प्रभु मैं आपका स्मरण करता हूं जप के बदले में संसार की तुच्छ चीज ना मांगे एक बात और दूसरी बात जप करते समय इस जगत को महत्व ना दे तीसरी बात जप का उच्चारण मंत्र का उच्चारण साफ सुधरा शुद्ध हो और चौथी बात अर्थ में मन तल्लीन होता जाए पांचवी बात कभी कभार जप में विविधता करके भी मन को लगाया
जाए और छठी बात जप जहां बैठकर करते हैं वह आसन ऐसा होना चाहिए विद्युत का कुचालक अर्थिंग ना मिले ऐसा आसन होना चाहिए तखत पर भी कुछ बिछा दिया बैठे आर्थिक नहीं मिलती या तो धरती पर कुछ प्लास्टिक या तो कंबल आदि बिछाकर फिर सूती कपड़ा बिछाकर जप करें जप करने से जैसे डायनामो घूमता है और विद्युत बनती है ऐसे बार-बार एक ही मंत्र उच्चारण से आध्यात्मिक ऊर्जा बनती है जो हमारे वात पीत कफ के दोषों को निवृत करती है और मनो विकारों पर विजय पाने का सामर्थ्य देती है अगर अर्थिंग मिलती रही तो एक
तरफ कमाई करते रहे दूरे दूसरे तरफ बिखेरते गए अर्थिंग ना मिले और जप करते जाए उसका बड़ा भारी लाभ मिलता है मन बुद्धि में विलक्षण लक्षण प्रकट होने लगते जापक के तुलसीदास महाराज ने तो साफ कहा है कि मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा पंचम भक्ति अवेद प्रकाशा ये भक्ति का पांचवा सौपान माना गया है है मंत्र जाप छठी और सातवी बात यह है कि जप जहां करें उस जगह पर जप के बाद भी थोड़ी देर ऐसे ही विश्राम करे कुछ ना करे जप भी फिर ना करे विश्राम करे तुरंत उस जगह को ना छोड़े जप
से जो आभामंडल बना है जो अंतःकरण में वातावरण बना है जो शांति और माधुर्य बना है उसकी गहरी स्थिति ल कभी कभार जब ध्यान में मन ना लगे तो उसको जैसे घोड़ा नहीं चलता है दाए बाहे भागता है तो उसको बलात उसके लगाम को मोड़ मरोड़ के उसको लाया जाता है ऐसे कभी-कभी तो बैठते तो अपने आप आनंद आनंद आने लगता है और जप चालू हो जाता है और कभी करें तो भी मान एक बेगर कर रहे ऐसा भी होता है कभी कभार तो ना चाहते भी बड़ा आनंद आता और जप अपने आप चल जाता
है और कभी चाहने पर भी आनंद नहीं आता और जब चलता नहीं मानो मशीन कीना कर रहे ऐसा भी होता है प्राण की जब ताल बद्ध नहीं होती तब ऐसा होता है तो ऐसा जब हो तो क्या करें पंजों के बल से थोड़ा जंप कर ले दोनों पंजों के बल थोड़ा कूद ले तो प्राण की ताल बद्ध होता हो होग फिर मन को लगाया जा फिर भी अगर नहीं लगता है तो दोनों हाथों की उंगलियां बगल में डाल दे रामा रामा राम राम राम राम राम राम मन का बाप भी लगेगा ज तो ज कहां
जय राम जी बोलना पड़ेगा अगर ऐसे भी नहीं लगता तो फिर तीसरा ही टंक विद्या नाथ संप्रदाय के जोगी बड़े जोग में निपुण हो जाते थे दोनों हाथों से दोनों कोनी पकड़ी [संगीत] ले दो तीन मिनट ऐसा किया तो जब से जो स्थिति बनी है वो अचेतन मन में गहरी उतरेगी ध्यान और पूजा से जो मन बढ़िया बना है उसका गहरा स्वभाव होगा इस प्रकार का कभी कोई प्रयोग तो कभी कोई प्रयोग करके जैसे कभी दाल चावल रोटी खाते तो कभी हलवा खाते कभी काली रोटी और सफेद दाल भी खाना पड़ता है जय राम जी
की तो खाना पड़ता हैना क्या करे भाई साधु साधु जो बने भाई काली रोटी दे दे तो सफेद दाल दे दे सेठ जी दे तेरी मर्जी कैसे भी करके अपना पेट भरना है ऐसे ही ऐसे भी करके मन में परमात्मा का रस भरना है अलग अलग प्रयोग करके लोग बोलते मन भगवान में नहीं लगता है लेकिन लगाने की युक्ति वाले बोलते कि भगवान के सिवाय मन लगेगा तो कहां लगेगा और कोई चीज ही नहीं जहा मन टिका रहे लगा रहे नहीं लगेगा लगने योग्य मन को तो भगवान ही है क्योंकि भगवान स्थिर तत्व है शाश्वत
है सुख स्वरूप है आनंद स्वरूप है और मन सुख चाहता है शाश्वत चाहता है नहीं लगे तो एक प्रयोग और कर लो जैसे भगवान द्वारका में रहते नारद जी को वहां श्राप नहीं लगता था नारद जी बार-बार द्वारका जाते भगवान बोलते जाओ जरा मथुरा का समाचार ले आओ गए मथुरा फिर आए द्वार का नारद जाओ जरा वैकुंड की खबर ले आओ गए वैकुंट फिर आए द्वार का नारद जाओ जरा वृंदावन की खबर ले आओ गए वृंदावन फिर आए द्वारिका तो जाने की मन की पचास जगह हो लेकिन घूम फिर के आने की अपने राम में
रमने की एक ही जगह हो तो पचास जगह का एक एक मार्क होगा और एक ही राम में आने की 50 मार्क से तो विद्यार्थी भी पास हो जाता है तो साधु पास हो जाए तो क्या बड़ी बात है जय सियाराम कुछ लोग यह बोलते कि भगवान में मन नहीं लगता भगवान में मन लगेगा तब भजन करेगा ये तो तुम बुद्धू हलवाई जैसी बात करते हो बुद्धू हलवाई तैरना सीखने को गया स्विमिंग पूल वाले मास्टर ने कहा कि मार गुता मैं तेरे को साथ में तेरा ना सिखा करने लगा बोले लगा जंप लगाया जंप थोड़ा
मुंह में पानी नाक में पानी आंख कान में पानी पानी हाथी हाथी करके बाहर निकला हाथ में जल लेकर उसने कसम खाई कि जब तक बराबर तैरना नहीं सीखा तब तक पानी में पैर नहीं रखूंगा अब क्या बिस्तर पर तैरना सीखेगा भांजे सड़क पर तैरना सीखेगा तैरना नहीं जब तक तैरना बराबर नहीं सीखा तब तक पानी में पैर नहीं रखूंगा अरे भैया तैरना नहीं आता है तभी भी पानी में ही तो तैरना सीखा जाएगा ऐसे ही भगवत भजन में आनंद नहीं आता मन नहीं लगता फिर भी तू रटे जा रटे जा पाप ताप निवृत होंगे
आनंद आएगा रस आएगा मन लगेगा पित्त प्रकोप से कभी कभार मुंह में सुखा रोग की तकलीफ होती किसी उस समय किसी वस्तु का स्वाद नहीं आता चतुर वैद्य क्या करते मिश्री के टुकड़े पकड़ा देते बोले यही तुम्हारी औषधि बोले कुछ स्वाद ही नहीं आता मिश्री मीठी नहीं लगती बोले मीठी ना लगे तो कोई बात नहीं अभी इसको औषधि समझ के चूसता जा जो पित्त प्रकोप शांत होगा तो मिश्री मीठी भी लगेगी और स्वाद भी आएगा ऐसे ही तू जपता जा पाप प्रकोप शांत होगा तो राम नाम मीठा भी लगेगा और ध्यान का स्वाद भी आएगा
भैया राम भगत जग चार प्रकारा सुकृत चार अन उदारा च चतुर कर नाम आधारा ज्ञानी प्रभ ही विशेष प्यारा एक बार संत कबीर के सुपुत्र कमाल गंगा किनारे खड़े-खड़े आश्चर्य से देख रहे कि कलकत्ता का सेठ काशी में आया है 200 पंडों को लेकर भंडारे की तैयारी हो रही है सेठ से पूछा कि सेठ तुम भंडारा करते हो तो किस निमित करते हो जैसे निमि से भंडारा करने वाला भंडारा करता है खाने वाले पर भी उसकी थोड़ी बहुत असर या पड़ती है पक्की बात है जय सियाराम साधु भंडारा कराता है प्रेम से खुशी जैसे हम
चाहते हैं कि सब संतों को अयोध्या के संतों को जी माए भंडारा करे तो हमें यह नहीं है कि हमें यह मिल जाए वोह मिल जाए नहीं भगवान के नाते भगवान के भगवान की चीज भगवान के भक्त ार आनंद है तो उसका भाव अलग होता है अगर कोई चाहे कि हमें बेटा हो इसलिए भंडारा करता है तो खाने वाले पर उसकी असर पड़ती उड़िया बाबा और 10 संत और उड़िया बाबा का नाम तो आप लोगों ने सुना होगा कहीं पधारे थे और किसी भक्त ने उनको आमंत्रण दिया जय राम जी तो बोलना पड़ेगा साधुओ को
द द साधु और 11 में उड़िया बाबा किसी अर्था थी भक्त ने किसी अर्था थी साहूकार ने उन 11 साधुओ को जि माया जिमा तो महाराज सबने प्रेम से लेकिन सुबह सबके चेहरे उतरे हुए एक दूसरे से पूछा बोले रात को सपन दोष हो गया यार मेरे को भी हो गया बोले मेरे को भी हो गया मेरे को भी हो गया द द साधुओ को सपन दोष हो गया उड़िया बाबा के पास आए कि महाराज ऐसा क्यों महाराज ने कहा कि जिसने जि माया है उसने कोई ऐसी हल्की वासना से जि माया होगा उस भगत
को बुलाकर पूछा वैसा तो कोई भगवान का भगत तो था नहीं संसार का भगत था बोले भैया सच बता तो किस भावना से जि माया साधु को बोले महाराज हमने सोचा कि बेटा नहीं होता है साधुओ को जि माए तो शायद हमको बेटा हो जाए भा द तेरे की साधुओ को सपन दोष हो गया तूने कामना से जीया जराम बोलना पड़े अ अन्न का प्रभाव तो पड़ता है लेकिन अन्न पर जिसकी दृष्टि पती है भाव आता है उसका भी हमारे चित्त पर प्रभाव पड़ता है उन प्रभावों को तो ने के लिए भगवत नाम जैसा और
कोई बढ़िया औषध नहीं है इसलिए अन्न ग्रहण करते समय भी भगवन नाम जप करके करें ताकि और दोष निवृत हो जाए और भगवत भाव का ही प्रभाव हमारे प्रसाद प पड़े [संगीत]