अपनी मनमानी साधना से तो कभी शिव को झांग तो कभी विष्णु को तो कभी गंगा किनारे तो कभी यमुना किनारे कभी कन्याकुमारी तो कभी बद्रीनाथ चक्कर काटते रहेंगे तो जीवन पूरा हो जाएगा लगेगा कि अध्यात्मिक हो रहे हैं न अध्यात्मिकता की ऊंचाई का अनुभव नहीं होगा तो समय बड़ा कीमती है और समय कीमती शरीर क्षण भंगुर है ऐसे जीवन में अल्प जीवन में अगर कोई ठोस चीज ठोस तत्व ठोस रास्ता नहीं मिला तो आदमी भटक जाता है कबीर ने कहा भटक मुआ भेदु बिना पावे कोन उपाय खोजत खोजत युग गए पाव कोस घर आए दीक्षा
देना कोई साधारण पुरोहित या साधारण गुरु का काम नहीं है जो महापुरुष भिन्न भिन्न रास्तों से यात्रा किए हैं भिन्न भिन्न माइलस्टोन देखे हुए वह ऊंचाई पर पहुंचे हैं यात्रा के शिखर पर पहुंचे अथवा यात्रा की मंजिल तय किए ऐसे महापुरुषों के द्वारा जब वह कृपा दी जाती है अज्ञान पाप और ताप को नाश करने की कृपा देने का सामर्थ्य रखें और फिर सामने वाला दृढ़ता से आकाश जैसी विशालता समुद्र जैसी गंभीरता और वज्र जैसी दृढ़ता से उस महापुरुष की दीक्षा को अपने में संभालने की क्षमता रखे तो गुरु गुरु का आत्म अनुभव और पुण्य
कृपा देने का सामर्थ्य और शीष कक्षा मन पचाने की योग्यता इन दो शब्दों के जोड़ को दीक्षा बोलते हैं अर्थात गुरु की करुणा कृपा अनुभव संपन्न आध्यात्मिक प्रसाद देने की चेष्टा और शिष्य की श्रद्धा पचाने की तत्परता इन दो बातों को के मेल को बोलते दीक्षा यह दीक्षा लेना कोई साधारण बात नहीं है इसको द्विजा बोलते हैं मां और बाप के संयोग से जो शरीर पैदा होता है रज वीर्य से वह जन्म जात से तो शुद्र चीजों से नीचे के केंद्रों से जो चीजें निकली है उन चीजों से मिश्रित होकर बना है उसको शुद्र बोलते
हैं जब भगवन नाम और गुरु कृपा से दीक्षा मिलती है तो दोबारा जन्म होता है मां के रजवीर से हमारे शरीर का जन्म होता है और भगवत मंत्र और गुरु कृपा से हमारा जन्म शुरू होता है जैसे विधवा स्त्री का श्रृंगार व्यर्थ है ऐसे गुरे आदमी का जीवन व्यर्थ है ऐसा शास्त्र कहते हैं गुरु तो करना चाहिए लेकिन गुरु करना करने के पहले खूब सावधान होना चाहिए यह जीवन का बड़ा अवसर है जैसा तैसा पुरोहित को गुरु बना लिया और फिर श्रद्धा नट कीया मन माना कुछ करते रहे वर्षों के वर्ष बीत गए बाद में
लगेगा कि कुछ नहीं भगवान भगवान कुछ नहीं तो अतो भ्रष्ट ततो भ्रष्ट हो जाएगा इसीलिए यह काम बहुत समझदारी का है दृढ़ता का है और आज के युग में तो गुरुओं का मिलना बहुत कठिन भी है बहुत सुगम भी है जहां तहां गुरु मिल जाएंगे गुरु बनने की सबको इच्छा लगी शौक हो गया प्रवचन करने का गुरु बनने का दूसरे को सीख देने का बड़बड़ चालू कर देने का तो आजकल तो एक फैशन हो गया है लेकिन यह बड़ी जिम्मेदारी है विवेकानंद बोलते थे कि गुरु बनना अर्थात सहस्त्र मुद्राएं दान करना तो वह दरिद्र आदमी
का काम नहीं है करोड़पति हो तभी वह शस्त्र मुद्राएं प्रति व्यक्ति को दे सकता है आज कंगला शस्त्र मुद्राए दान करने की गादी पर बैठ जाता है ऐसे व्यक्तियों के लिए विवेकानंद ने तो कटाक्ष किया है संत कबीर ने भी कहा गुरु लोभी शिष्य लालची दोनों खेले दाव दोनों डूबे बांवरे चड़ी पथर की नाव गुरु को भी आध्यात्मिक अनुभव होना चाहिए शिष्य के शंकाएं निवारण करने का सामर्थ्य होना चाहिए और शिष्य में भी तत्परता होनी चाहिए लाल बू झक्कड़ गुरु थे गांव के बाहर कहीं छोटी मोटी कुटिया बनाकर रहते थे कहानी है गांव जंगल के
पास ही था अनजाने में कोई रात को कोई गर्मियों के दिन हो होंगे बारिश के छींटे पड़ गए होंगे हाथी आया हाथी तो राउंड लेकर चला गया गांव वालों ने देखा कि यह पैर किसका है चर्चा हुई चर्चा हुई आखिर कोई नतीजा नहीं निकला कभी हाथी देखा नहीं था सोचा कि चलो गुरु महाराज को पूछे गुरु महाराज ये आप आइए देखिए कि यह पैर किस जनावर के हैं गुरु महाराज ने देखे पैर तो बड़े हैं गुरु महाराज जोरों से हंसे और फिर रोए बोले गुरु जी आप हसे और रोए क्यों बोले हसा इसलिए कि आखिर
गुरु की जरूरत तो पड़ती है और रोया इसलिए कि मैं नहीं होता तो तुम्हारा क्या हाल होता एक छोटी सी बात नहीं समझ सकते हो जो बझे लाल बू जकड़ और न बझे कोई पैर में चक्की बांध के कोई हिरना आया होई यह गोल गोल जो इतना पैर लग रहा है तो पैर में वो चक्की बांध के कोई हिरना आया होई जो बुझे लाल बू झक्कड़ और न बुझे कोई पैर में चक्की बांध के कोई हिरना आया ई रणा तो देखा था उसने गुरु ने भी चेलों ने भी देखा था लेकिन पैर हिरण के नहीं
थे तो पैरों में चक्की बांध दिया होगा वो आटा पीसने की चक्की के होते है ना वो बांध के आया होगा और क्या वो अपनी ओर से तो बड़ा ज्ञान छाट रहा था लेकिन उसका ज्ञान का दर्शन आप करो कैसा है कभी कभार ऐसे बहुत लोग मिल जाते हैं एक इंजीनियर आया बोले बापू जी मैंने 12 साल से मंत्र दीक्षा लिया है गुरु बनाया लेकिन कोई मैं कता अरे मैंने कहा किसको म गुरु बनाया बोले वो दिल्ली दरवाजे में पाठी है पाठ करते थे ज्ञानी जी ज्ञानी जी मैं क्या आजकल तो रसवे को महाराज बोलते
हैं जय राम जी की भीख मंगे को भी महाराज बोलते हैं और पोथी पढ़ने वाले को ज्ञानी जी बोल देते हैं ब्रह्म ज्ञानी की बात अलग है ज्ञानी जी अलग बात तो कौन सा मंत्र है वैसे तो गुरु मंत्र किसी को बताना नहीं चाहिए लेकिन जब कोई सतगुरु मिलता है तो गुरु किया है तो गुरु क्या दिया है तो बताना पड़ता है तो उसने गुरु मंत्र बताया तो यहां से तो रतलाम तक गाड़ी पहुंच जाए उसको बोलते गुरु मंत्र मैं क्या गुरु मंत्र नहीं तो पौड़ी पूरी दे दिया तुम्हारे को कोई पाठ करा दिया तो
गुरु मंत्र में एक तो वैदिक मंत्र हो यह जरूरी है ऐसे तो कई अनाप सनाब मंत्र है लेकिन वैदिक मंत्र हो दूसरी बात मंत्र शॉर्ट हो तीसरी बात हमारे अधिकार का हो अच्छे से अच्छी दवाई दीजिए अच्छे से अच्छी चीज केमिस्ट की दुकान पर उस खाने से आपका रोग नहीं मिटेगा आपके लिए जो रोग निवार करेगी वह आपके लिए अच्छी से अच्छी चीज है दवाई के दुकान पर बहुत बढ़िया से महंगी से महंगी जो दवाई हो भैया दे दो मेरे को तो उससे तो सत्यानाश हो जाएगी उसमें बीच में केमिस्ट और मरीज के बीच में
डॉक्टर चाहिए जय राम जी ऐसे अच्छे में अच्छा मंत्र कभी सुना किसी मंत्र की महिमा कभी किसी साधना की महिमा सुना कभी किसी की सुना कभी कुछ करने लग गए कभी कुछ करने लग गए इससे व आध्यात्मिक ऊंचाई का अनुभव नहीं होगा एक गुरु तो गजब का काम करते थे किसी को दीक्षा देते तो बोले चलो मेरे साथ पास में किसान ने सात कुए खोद रखे थे कोई 10 हाथ कोई आठ हाथ कोई नौ हाथ कोई 13 हाथ सात खोद रखे थे आठ खोदने की तैयारी थी साथ में पानी नहीं व आठवा खोद रहा था
पूरा खेत खड्डे खड्डे कर डाला और पानी नहीं गुरु ले जाता कि अगर ऐसा मूर्ख किसान बनना है ऐसा मूर्ख साधक बनना है तो मेरे से दीक्षा मत लो इसने देखो दृढ़ता नहीं पानी निकलेगा कि नहीं निकलेगा आठ हाथ खोदा नहीं निकला दूसरी जगह नौ हाथ खोदा कहीं 13 हाथ खोदा तो कहीं 11 हाथ खोदा खोद खोद के पूरा खेत खड्डे बना दिया और पानी का चुल्लू भर भी नहीं और बोलता मैं पुरुषार्थ करता हूं तो पुरुषार्थ में भी यथा योग्य मेहनत और बुद्धि चाहिए एक धूप घुमाने में भी अकल चाहिए भाई जय राम जी
की नहीं तो मेहनत अपनी भी जाती है और लोगों को डिस्टर्ब हो जाता है आटा गुने में भी अ कल चाए तो गुरु दीक्षा देना कोई ऐसे मूर्खों का काम नहीं न्या मन्या कुर तुम हमारे चेले हम तुम्हारे गुर दक्षिणा धर तू चाहे तर चाहे मर हमारे गुरु जीी बोलते थे आजकल गोपो विजी टोप गिस की बैठो गा देते गोपा टोपा डाल के गुरु पढ़ने का गादी पर बैठ गया हम भी गुरु और कुछ लोग तो केवल पगार दार है जो धर्म का प्रचार करने को देश परदेश से आ जाते तो पगार दार गुरु नहीं
हो सकता है जय राम जी की पगार दार सतगुरु नहीं हो सकता पगार दार मास्टर हो सकता है शिक्षक हो सकता है लेकिन सतगुरु तो पगार दार सतगुरु नहीं हो सकता है सदगुरु उसे कहा जाता है जिसे रिद्धि सिद्धियां और भगवान की सृष्टि के प्रलोभन है उसको भी ठुकराने का सामर्थ्य हो यहां तक कि शास्त्र विरुद्ध बात अगर कभी भगवान भी कह दे तो भगवान का त्याग करने का भी सामर्थ्य उसे सतगुरु कहा जाता [प्रशंसा] है स्वर्ग के सुख का ब्रह्म लोक के सुख का वैकुंठ के सुख का और वैकु आदि पति के प्रलोभन को
ठुकराने का सामर्थ्य जिसमें हो उसे सतगुरु कहा जाता है तुर्क दुनिया तुर्क उकवा तुर्क मौला तुर्क तुर्क लोग क्या कहेंगे लोक लज्जा में मरा रहेगा तो साधन में आगे पहुंचेगा ही नहीं जो लोक लज्जा छोड़कर भगवान के रास्ते चल पड़ा है बुद्ध की नाए महावीर की नाए कबीर कीना नानक की नाए तुर्क दुनिया दुनिया की परवाह नहीं किया तुर्क उक बा स्वर्ग आदि के प्रलोभन आए उस उक बा को भी स्वर्ग को भी ठुकरा दिया प्रलोभन को भी तुर्क मौला लोग क्या कहेंगे भगवान क्या कहेगा मौला यह ले लो वो ले लो नहीं तुर्क कर
दिया और फिर तुर्क का मान त्याग का भी त्याग कर दिया मैं त्यागी हूं ऐसा मन में भी नहीं रहा उसे उसे सत्य की प्राप्ति होती है उसे सदगुरु बोलते हैं तो सदगुरु मेरा सूरमा करे शब्द की चोट मारे गोला प्रेम का हरे भर्म की कोट ये जो भ्रम है मैं देह हूं जगत सच्चा भगवान कहीं पर बैठा यह भ्रम है जैसे आकाश सर्वत्र है ऐसे चदा काश परमात्मा सर्वत्र है लेकिन वृत्ति स्थूल होने के कारण उस परमेश्वर का अनुभव नहीं होता जैसे बारात जाने से घड़ियाल की खटखट नहीं सुनाई पड़ती ऐसे ही बहिर्मुखी होने
से उस सत चित आनंद सुख स्वरूप परमेश्वर का अनुभव नहीं होता दूसरा अपने को कुछ मान बैठे हैं उस गलती से भी अनुभव नहीं होता तीसरा हम अनुभव के योग्य नहीं है इस बेवकूफी से भी अनुभव नहीं होता और चौथा तुच्छ चीजों को महत्व देते हैं और उतना उस परम तत्व को महत्व नहीं देते इसलिए भी अनुभव नहीं होता और पांचवा बड़ा है कि अनुभव कराने वाले गुरु नहीं मिलते साधारण पुरोहित को पकड़ लिया तब भी अनुभव नहीं होता में सामर्थ्य चाहिए वह मुझ में है मुझे अपने आत्मा का प्रत्यक्ष हस्ता मलक बत जैसे हाथ
में आमला है तो किसी से पूछने थोड़ी जाना है कि आमला मेरे हाथ में कि नहीं है मुझे हस्त मलक वत परमात्मा तत्व का अनुभव है ऐसा मेरा शिष्य कोई नहीं जिसको मैंने आनंदित ना किया हो मैं समर्थ गुरु हूं और तुम भी सत पात्र शिष्य हो संयम सदाचार तत्परता गुरु भक्ति यह सद्गुण शिष्य में चाहिए संयम सदाचार तत्परता गुरु भक्ति य शिष्य में सद्गुण चाहिए और शोत्र ब्रह्म निष्ठ करुणा और अ हेतु की कृपा बरसाने का भाव गुरु में होना चाहिए शिष्य को कहीं बुरा ना लग जाए कहीं नाराज ना हो जाए कहीं भाग
ना जाए कहीं चला ना जाए उस भय से अगर गुरु जी शिष्य की रक्षा करते हैं तो या तो शिष्य महामूर्ख है या तो गुरु लोभी है जय राम जी की शिष्य महामूर्ख होगा तो उसको नहीं डांट जरा डांट तो भाग जाएगा लेकिन अर्ध मूर्ख होगा तो उसको डांटने में गुरु घबराए का नहीं महामूर्ख होगा तो बोले देखो गुरु जी ने अपमान कर दिया इंसल्ट कर दिया ऐसे कोई गुरु होता तो भाग जाएगा तभी भी गुरु नहीं डांटते उसको और एक एकदम बुद्धिमान है तभी भी नहीं रहा अर्ध मूर्ख तो होगा ही तभी तो शिष्य
बना है अगर पूरा होता तो शिष्य क्यों बनता जय राम जी की और अर्ध मूर्ख को अर्ध मूर्ख रहने दे तो गुरु का कर्तव्य क्या फिर तो पत्थर को भगवान बनाना आसान है क्योंकि व पत्थर शिल्पी का विरोध नहीं करेगा लेकिन इस जीव को इस दो हाथ पैर वाले शरीर को मैं मानने वाले पुतले को ब्रह्म बनाना बड़ा कठिन पहले तो उसकी श्रद्धा नहीं होगी और श्रद्धा होगी तो ऊपर ऊपर से थोड़ा फायदा उठाकर चलो गुरु जी को मन से ही मान ले क्योंकि प्रैक्टिकली मानेंगे तो जिम्मेदारी आ जाती मन से ही मान के गाड़ी
चलाऊ और फिर कभी भाग्य जोर करेगा तो गुरु को ऑफिशियल मानना शुरू करेगा दीक्षित होगा बाद में भी अपने मन के विरुद्ध या अपने मन में समझ में नहीं आएगी तो बोलेगा गुरु जी को ऐसा नहीं करना चाहिए गुरु ये नहीं करना चाहिए वो नहीं कर अब एक गुरु है लाखों लाखों शिष्य और उनके लाखों लाखों मन है लाखों लाखों कल्पना है तो सोचेगा गुरु उनको यह करना चाहिए वो बोलेगा वो करना चाहिए वो चाहिए ये उल्लू के पट्ठे गुरुओं को अपने ढांचे में डालने के लिए भी कई लोग आते हैं उन सबको सहते हुए
और दबाते हुए और घुमाते हुए जो अपने पथ पर जाता है और लाखों को ले जाता है यह कोई साधारण व्यक्ति का काम नहीं [प्रशंसा] है हां हां सबकी करना और गली अपनी ना भूलना और अपने आप में डटे रहना यह कोई मजाक की बात नहीं है करोड़ों करोड़ों व्यापारी मिल जाएंगे करोड़ों करोड़ों ऑफिसर मिल जाएंगे लाखों लाखों पंडित मिल जाएंगे विद्वान मिल जाएंगे सैकड़ों और हजारों गुरु मिल जाएंगे लेकिन सतगुरु तो कभी-कभी कहीं कहीं कबार कबार [प्रशंसा] सतगुरु मेरा सुरमा करे शब्द की चोट मारे गोला प्रेम का हरे भर्म की कोट शिष्य देह में
खड़ा है जगत की सत्यता में खड़ा है मेरे तेरे में खड़ा है और कोई शिष्य नरक से आया है तो कोई स्वर्ग से आया है शिष्यों में भी डिफरेंट माइंड के होते हैं ऐसा नहीं कि चलो हमारा एक गुरु है तो सब शिष्य एक हो जाएंगे नहीं होंगे उनका आपसी मतभेद रहेगा मती में मता रहेगा घर के पांच छह मेंबर है उनमें भी दो दो पार्टी हो जाती तीन तीन मत हो जाते हैं छ मेंबर में तीन चार पांच मत हो सकते हैं तो लाखों लाखों शिष्य में भी तो मत मंतर उन सबको साथ लिए
हुए चलना एक ही डर में बांधना उनके हृदय का कितना आत्म बल आत्म सामर्थ्य और करुणा का कितना चिगम होगा तब व बंधे रहे होंगे स्नेह की कितनी मजबूत रज्जू होगी जो लाखों लाखों शिष्यों के हृदय को बांधकर गुरुजी यात्रा करवा रहे हैं दो तीन बच्चे के मां-बाप बच्चों से परेशान हो जाते पिटाई कर देते अरे मैं तो तंग आ गया इससे तो मर जा मा खाना ख और वो बच्चे ऐसे कि जरा आंख दिखाओ तो चुप हो जाए अथवा तो सीटी बजा ऐसे बच्चे होते और ये बच्चे सीटी भी नहीं बजे तो आंखें दिखाए
ऐसे बच्चे दुनिया को नचा करर सारे जगह पर टेस्ट कर करा के फिर आए हुए और उन पों को साधना और स्नेह की रसी में रज्जू में बांधकर चलते रहना चलते रहना यह कोई साधारण आदमी का काम नहीं गुरु धोबी शिष्य कपरा साबुन सर्जन हार सरत शिला पर बैठ के निकले मैल अपार जन्म जन्मांतर के अपने अपने मैल हम लोगों के हैं किसी का सेक्सुअल मैल है तो किसी का धन के आकर्षण का मैल है तो किसी को प्रसिद्धि का मैल है तो किसी को कुछ मैल है तो किसी को बह बेटियां ठीक कराने का
वासना है तो किसी को कुछ ठीक करने का न जाने एक एक व्यक्ति के अंदर क्या क्या डिमांड है और क्याक मान्यता है और ऐसे एक दो व्यक्ति नहीं एक दो 100 नहीं एक दो हजार नहीं लाखों लाखों लोग और फिर भी वह लोग उस गुरु में श्रद्धा बनाए रखे तो उस गुरु की कितनी जिम्मेदारी और गुरु की कितनी विशालता हृदय की होगी और कितनी पहुंच होगी कितना स्नेह से हृदय भरा होगा गुरु के हृदय का स्नेह और करुणा ना हो तो एक भी शिष्य टिक नहीं सकता क्योंकि शिष्य अपने जीवन में जीता है शिष्य
को जो दिखता है गुरु को उससे बिल्कुल निराला दिखता है फिर भी गुरु शिष्य का नाता जो बना रहता है उसमें केवल शिष्य का समर्पण और गुरु की करुणा यह दो तारों का रज्जू है रस्सी है शिष्य की श्रद्धा और गुरु की करुणा इस डोरी से गुरु शिष्य का नाता चलता रहता है नहीं तो शिष्य को जगत सत्य दिखता है देह मैं दिखता हूं भवान कहीं दिखता है और गुरु के देह मिथ्या लगता है जगत मिथ्या लगता और भगवान अपने से कतई दूर नहीं दिखता तो दोनों तो एंटी है जय राम जी गुरु का अनुभव
और शिष्य का अनुभव दोनों पूर्व पश्चिम है अर्जुन अपनी अपनी अकल होशियारी मार रहा है कृष्ण के आगे कृष्ण बोलते बातें तो पंडितो जैसी करता लेकिन रोर मूर्ख हो के तो कभी-कभी शिष्य इतनी पंडिताई मारेगा अपने मन में अब कह नहीं सकेगा चलो कोई बात नहीं तो गुरु है लेकिन होना ऐसा चाहिए गुरु को क्या पता मैं टेक्निशियन को लेकर आऊंगा तब गुरु जी को बताऊंगा कि गुरु जी यह इसका यह काम होता है और गुरुजी बोलेगा अच्छा अच्छा भाई हम तो नहीं जानते इसमें ठीक है ये करो वो करो अंदर से समझेगा कि अच्छा
शिष्य जी तू अपना टेक्नियन ला वो ला वो ला लेकिन गुरु की जो सहज संकेत की वाणी उसकी तूने कीमत नहीं की अभी तू बच्चा है अभी तेरे को छोटा साधन देंगे जो जो व शिष्य भीतर से समर्पित होता जाएगा त्य त्य गुरु कृपा विशेष रूप से उसके हृदय का पशन लेती जाएगी गुरु कृपा ऐसी खतरनाक है कि शिष्य को मार भती है महाराज जय राम जी की शिष्य को मार भती जैसे बारिश के दिन हो आप घर में सोए और कोई आ गया आदमी अरे भाई दरवाजा खोलिए बारिश है हम भीग रहे हैं आपका
एक कमरा है आपने खोल दिया वह आदमी खड़ा है धीरे से बैठ गया चलो फिर तो उसने पैर पसारे हम बोले यह क्या करते हो बोले क्या क्या करते तकिया लाओ आराम करना है फिर थोड़ी देर हुई बोले तुम चले जाओ यह घर मेरा है तो जैसे तैसे घर थोड़े दोगे उस आदमी में भी कुछ कला होगी कुछ दम होगा तभी तो आप अपना घर छोड़कर बाहर निकलोगे उसको दे दोगे ऐसे ही गुरु दीक्षा अथवा हरि ओम हरि ओम करते गुरुदेव की कृपा तुम्हारे द्वार पर आती कैसे भी करके तुम थोड़ा सा हृदय का द्वार
खोल देते हो और गुरु कृपा वहां आकर कोने में बैठती है धीरे-धीरे अपने पैर पसार जाएगी पैर पसार जाएगी और तुम्हारे अहम को कान से पकड़ के बाहर निकाल देगी बोले अभी घर ये कोई साधारण काम थोड़ी है भाई तुम्हारा जन्मो जन्मों का घर है पुराना घर एक किराएदार नहीं निकलता तो हाउस मालिक को निकालना कोई मजाक की बात है जब मैं था तो तू नहीं अब तू है तो मैं नहीं अब मैं भी रहूं तू भी रहे ये झंझट बाजी नहीं चलती व इश्क इश्क करना जहां बचाना यह भी कोई हो सकता है बोले
बापू रात को गहरी नींद आ गई थी लेकिन चार बार हार्ट अटैक भी था और गहरी नींद भी थी और हार्ट अटैक भी था असंभव है हार्ट अटैक और गहरी नहीं देख साथ नहीं रह सकती इश्क करना जा बचाना एक तो गुरु तत्व का मोहब्बत लेना और आनंद लेना मुक्ति का अनुभव करना और दूसरा अपनी जान बचाना अपने अ को बचाना इश्क करना जा बचाना यह भी कोई हो सकता है आशिक दिले दर्द वो भी कोई सुख से सो सकता है क्योंकि शिष्य की थोड़ी बहुत पुण्याई है भगवन नाम गुरु मंत्र का प्रभाव है शिष्य
की श्रद्धा का धागा टूटते टूटते भी फिर संध जाता है बच जाता है गुरु की करुणा राम कृष्ण जैसे सदगुरु है और नरेंद्र जैसा शिष्य है शिष्य और गुरु के बीच सात बार विद्रोह हो गया नरेंद्र जैसा बुद्धिमान भटक भटक के बाद में गुरु किया खूब भटके और बाद में राम कृष्ण को गुरुदेव किया और राम कृष्ण को प्रत्यक्ष होता था माता जी को और तोतापुरी गुरु ने ब्रह्म ज्ञान कराया कई लोग तो बोले फलाने महाराज को साक्षात्कार हो गया तो महाराज के गुरु कौन है बोले उनके गुरु गुरु तो नहीं उनके पिता ही उनके
गुरु थे तो उनके पिता को साक्षात्कार था बोले तो पता नहीं तो तुम्हारे गुरु को साक्षात्कार नहीं हो सकता उसका वो फलाने महाराज के भागवत की कथा करते हैं उनको भगवान का साक्षात्कार अरे बच्चे साक्षात्कार कोई मजाक की बात थोड़ी है उसने किसी समर्थ सदगुरु का शरण लिया है कि नहीं लिया है और समर्थ सदगुरु वास्तव में समर्थ है कि खाली गुरु हैं तब भी साक्षात्कार की संभावना और वो भी वर्तमान साक्षात्कारा नहीं तो पोथी पड़ पड़ जग मुआ पंडित भयानक कोई ढाई अक्षर प्रेम का पड़े स पंडित होई इस बात को भी तो याद
करना पड़ेगा तुलसीदास जी ने कहा गुरु बिन भव निधि तरही न कोई चाहे बिरंचि शंकर सम होई सृष्टि करने का सृष्टि बनाने का सामर्थ्य आ जाए प्रलय करने का सामर्थ्य आ जाए फिर भी सदगुरु की कृपा के बिना देह की परिछन नहीं मिटती है अंतक अव छिन्न चैतन्य और व्यापक चैतन्य की अभिन्न का अनुभव जब तक नहीं होता है तब तक काम अधूरा है विवेकानंद बोलते थे भगवान के रास्ते भगत होना यह तो आसान है और भगत में से भी जिज्ञास होना यह भी आसान है जिज्ञास होकर साक्षात्कार कर लेना यह भी ठीक है साक्षात्कार
करके एकांत में जीवन मुक्त होकर महापुरुष होकर ब्रह्म मय होकर रहना ये भी आसान लेकिन ऐसा अनुभव करने के बाद भी नीचे आना और एक एक आदमी के साथ मत्था पची करके उसको वहां तक ले जाना यह बहुत बड़े में बड़ा काम [प्रशंसा] है इसमें कई खतरे हैं अपना ब्रह्मानंद छूट जाए अपनी लोक वासना जग जाए अपना वा वाई का चस्का लग जाए कच्ची पक्की साधना है तो फिर अपने को उसी हरट्यूब हुए भी कई लोग तो ऐसे बुद्ध को जब साक्षात्कार हुआ तो बुद्ध चुप हो गए अब क्या बोलना जो सत्य है वह सत्य
है सत्य तो वाणी का विषय नहीं है जो बोलेंगे माया का सहारा लेकर बोलना पड़ेगा माया छोड़ दिया माया का सहारा लेकर क्या बोलना बुद्ध चुप रहे कहानी कहती है कि देवता लो आए मथा टेका तुम्हें जो मिला है वह संसार को बाटो बुद्ध बोलते हैं मुझे जो मिला है वह वाणी में नहीं आ सकता जो अधिकारी वह तो मेरे में श्रद्धा रखकर मेरे सामने चुपचाप बैठेंगे तभी समझ जाएंगे और जो अधिकारी नहीं है उनके लिए मैं बोलूंगा तो जो अनुभव है वह तो बोलने में नहीं आएगा उसको छूकर ही तो आएगा माया ही माया
ही बोलूंगा तो जो अधिकारी है उनको तो उपदेश की जरूरत नहीं है जो अधिकारी है उनको उपदेश क्या फायदा करेगा देवता लाजवाब हो गए फिर शांति से देवताओं ने युक्ति खोजी बोले जो अधिकारी वह तो आपके निकट बैठते ही आपके वाइब्रेशन से आपकी कृपा से उन्नत और जो अन अधिकारी है उनको असर नहीं होगी लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है जो अनाधि कारी भी नहीं है अधिकारी भी नहीं है एक गिरे हुए भी नहीं और एकदम चुप होकर पचा ले ऐसे भी नहीं उन लोगों के लिए बोलने की कृपा करो जो आपके मौन को झेल
नहीं सकते और आप बोले तो वैसे के वैसे नहीं रह सकते ऐसे लोगों के लिए बोलने की कृपा करो वह बदले बुद्धे इस बात पर राजी हो ग फिर जीवन भर बोलते रहे अंतिम स्वास तक बोलते रहे मेरे गुरुदेव अंतिम स्वास तक बोलते रहे यह उनकी करुणा कृपा है नहीं तो क्या लेना कई ऐसे महापुरुष होते समझ में आ गया सत्य अब क्या बोलना उसी में रहो