ओमकार मंत्र गायत्री छंद गायत्री छंद परमात्मा ऋषि परमात्मा ऋषि अंतर्यामी देवता अंतर्यामी देवता ईश्वर प्रीति अर्थे ईश्वर प्रीति अर्थ जपे विनियोगा जप विनियो सुख शांति प्राप्ति अर्थे सुख शांति प्राप्ति अर्थे जपे विनियोग जपे विनियोग ओम ओ ओ ओ ओ [संगीत] ओओ हरि ओम म ओम ओम ओम ओम ओम ओ [संगीत] हरि ओम ओम ओम ओम ओम [संगीत] ओम हरि ओम ओम ओम ओ [संगीत] ओओ हरि ओम ओम ओओ [संगीत] ओ प्रभु ओम ओम [संगीत] ओओओ दाता ओम म [संगीत] ओओओओ हरि ओम म [संगीत] ओओओ हरि ओम [संगीत] ओओओओ हरि ओम ओ [संगीत] ओ हरि ओम
[संगीत] ओ मैं आनंद स्वरूप शांत आत्मा परमात्मा का हरि [संगीत] ओमम हृदय कमल खिल रहा है अष्टदल कमल हृदय में जो है वो मुरझाया हुआ था खिल रहा है और भगवान नारायण समाधि स्त है योग निद्रा में आनंदित हो रहे हैं भगवान नारायण हृदय कमल में प्रसन्नता से सूक्ष्म तम आनंदम घन परमात्मा सच्चिदानंद घन आनंद स्वरूप हमारा हदय कमल में जागृत हो रहा है इसी पावन मंत्र का अद्भुत प्रभाव है हरि ओम [संगीत] ओओओओ आनंद है शांति है अंतरात्मा के रस का आवाहन है हरि ओम माओ माओ माओ माओ माओ [संगीत] ओ हरि ओम ओम
ओम ओम ओम माओ [संगीत] माओ हरि [संगीत] ओम हरि ओम म म [संगीत] ओओ दाता [संगीत] ओओ हरि ओम आनंद दाता है त तू ज्ञान दाता है तू रस दाता है प्रभु हरि ओम सुख दाता है मेरे हृदय कमल को तू ही तो शुद्ध कर रहा है प्रभु तेरा नाम हरि ओम कर गई फ करर फेंक कुए में तो तो हरि रस में डूबता जा मनवा तो प्रभु का है तो फिक्र तेरी कैसे तो चिंता तेरी कैसे है तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत होई जी निश्चिंत होई प अनहोनी होनी नहीं होनी होए सो होए हरि
ओ अभी तो हरि रस में मगन हो [संगीत] ग हरि ओम माओम माओ माओ माओ माओ हरि ओम ओम माओम माओम माओम माओम माओ [संगीत] माओम हरि ओम माओम माओम माओम माओम माओम माओम माओम हरि ओम म म म म म म म [संगीत] हरि ओम ओओ माओ माओ माओ [संगीत] माओ हरि ओम माओ माओ माओ मा मा मा हरि ओम माओम माओ माओ माओ हरि शरणम हरि प्रीति हरि ओम ओम हरिरस हरति पात कानी शोका दुखानी इति श्री हरि हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम [संगीत] ओमम हरि ओम [संगीत] हरि ओम हरि ओम
हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओओ ओ ओ ओ ओ ओ ह ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओम ओ ओ ओ ओ ओ हरि हरि हरि हरि हरि हरि ह हरि हरि हरि ह ह ह रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा रामा हरि ओम ओम ओम ओम ओ [संगीत]
हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम हरि ओम [हंसी] ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओमम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओम ओम [संगीत] [संगीत] ओ ओम शांति ओ आनंद ओ प्रसन्नता प्रसन्नता आरोग्य की महा कुंजी
प्रसन्नता सफलता स्वास्थ्य की बड़ी ऊंची औसत है और प्रसन्नता भगवन नाम से जो आती वो सात्विक प्रसन्नता है सतवास जायते ज्ञानम उदर सवेर स्व के ज्ञान में बड़ी मदद करती ओम आनंद शांति ओम ओम ओ मति कुमती सबके उरर वेद पुराण निगम असक वेद भी कहते हैं पुराण भी कहते हैं निगम शास्त्र भी कहते हैं कि सबके अंदर शुभ अशुभ छुपा रहता है संत समागम हरि कथा से शुभ हिस्सा विकसित होता है तो अशुभ को पनपने का अवसर नहीं मिलता अगर संत समागम और हरि कथा हरि का नाम नहीं है तो अशुभ पनपता है शुभ
को अवसर नहीं मिलता अशुभ को पनपना आसान है शुभ के पन पाने में पुरुषार्थ है जैसे बरसात पड़ती है तो फालतू घास कंठी के लिए वृक्ष अपने आप फल जाते हैं लेकिन गुलाब के पौधे अपने आप नहीं फलते उसकी कलम लगानी पड़ती है गुड़ाई करनी पड़ती है तब गुलाब के फूल खिलते हैं तो जो कीमती चीज है वह अपने आप नहीं पनब जाती है उसके लिए धरती को संस्कारी करना पड़ता है भूमि को संस्कारी किया जाता है फिर उसमें बीज बोया जाता है ऐसे ही हमारे अंतःकरण को सत्संग से संस्कार किया जाता है गुरु दीक्षा
से साधना का बीज बोया जाता है और साधना और नियम के जल और खाद से उसे सींचा जाता है तो हमारे हृदय रूपी भूमि में भगवत प्राप्ति रूपी वृक्ष पनपता है फलता है फूलता है और मोक्ष के फल लगते हैं मोक्ष का मतलब क्या है कि सब बंधनों से सदा के लिए मुक्ति बंधन कोई चाहता नहीं है सब बंधनों से सदा के लिए मुक्ति जन्म का बंधन बुढ़ापे का बंधन व्याधि का बंधन मौत का बंधन इस बंधन से सभी बंधे घट यंत्र किनाई हम भटक रहे बुद्ध कहा करते थे कि यह जो पहाड़ है वोह
तुम्हारी एक एक भिक्षु तुम्हारे जन्मों के सारी हड्डियां खड्डी कट्ठी कर दे तो इस पहाड़ को मात कर देगी तुमने इतने जन्म पाए और हर जन्म में बीवी बच्चे पुत्र पर बार सजाया संजोया अंत में शरीर को संभाला वह शरीर भी मर गया उसकी हड्डियां अगर कट्ठी कर दी जाए हर जन्म की तो यह जो हिमालय पहाड़ दिखता है उसको भी लांग जाएगा तुम इतने युगों से जन्मते मरते आए हर जन्म में तुमने आंसू बहाए हुए आंसू अगर कट्ठे कर दिए जाए तो यह सरोवर को मात कर देंगे इतने तुमने आंसू बहाए इसलिए अभी थोड़े
सावधान हो जाओ सत् आशय लो और हदय रूप भूमि में परमात्मा प्रति रूप बी बोध दुनिया की कोई भी चीज प्राप्त किया तो वह टिकने वाली नहीं है लेकिन ईवर को एक बार पाया तो मिटने वाला नहीं क्योंकि ईश्वर अमिट सता है और संसार मिटने वाली चीज है जो मिटता है उसे माया कहते हैं जिसे जो अमिट है उसे परमात्मा कहते हैं जो परमात्मा है उसी का अंश अपना आत्मा है बचपन आपका मिट गया लेकिन आप नहीं मिटे शैशव आपका मिट गया आप नहीं मिटे जवानी कईयों की मिट गई आप नहीं मिटे बुढ़ापा मिट गया
मौत आई फिर भी वह व्यक्ति मिटा नहीं स्वर्ग में है या तो नरक में है या तो किसी जन्म में है तो जो जन्म के बाद भी रहता है वह जीवात्मा अमिट है तो इस अमिट जीवात्मा का अमिट परमात्मा सेही जब तक सहयोग नहीं होगा ज्ञान नहीं होगा तब तक बेचारा हर जन्म में सुखी और आनंदित सुखी और शांत होने के लिए सब प्रयत्न करता है लेकिन यह प्रयत्न सब कुसंग के हैं बाहर के हैं इसलिए बाजी हार जाता है चाहे हिटलर बन जाए चाहे सिकंदर बन जाए चाहे क्रूर कंस बन जाए चाहे रावण बन
जाए चाहे कुछ बन जाए अंत में पश्चाताप आद लगता है शिष्य ने पूछा गुरुदेव कि करण इतना दानी था और दोस्ती निभाने में अव्वल नंबर था और पांडवों का छठा भाई था फिर भी करण मारा गया परास्त हुआ और अर्जुन जीता इसका क्या कारण गुरु जी ने कहा ऋषि वन ने कि बेटा चिंतन की धारा विपरीत वह कौरवों को साथ दुर्योधन को साथ दे रहा था इसलिए उसकी चिंतन की धारा उसी प्रकार की थी और अर्जुन श्री कृष्ण का साथ ले रहा था सत्संग ले रहा था दुर्योधन के पास सैन्य बल था राज्य बल था
कपट बल था लेकिन जहां भगवत बल और अपना पौरुष होता है वहां विजय होती है यत्र योगेश्वरा कृष्ण यत्र पार्थ धनुर्धर तत्र श्री विजय भूति ध्रुवा निति मेमती तो कबीर जी के य वचन सभी के जीवन में सार्थक हो जाए कबीरा मांगे मांगना प्रभु दीज मोहे दो मुझे दो चीज देना संत समागम हरि कथा मो और मेरे हृदय में निश दिन हो हरि का ज्ञान नहीं होगा तो जगत के ज्ञान से बढ़ा हुआ दिल दिमाग उलझ जाएगा तो जगत का ज्ञान जैसे कानों के द्वारा दिल दिमाग में घुसता है ऐसे भगवत तत्व का ज्ञान घुसे
तो वह जगत के ज्ञान के प्रभाव को हटाकर अपना सत्य का प्रभाव जगाए कुमति को हटाकर सुमति को जगाए कुसंग को हटाकर सुसंग को धन्ना जाट सत्संग मिल गया भगवान के दर्शन करने तक की योग्यता ली शबरी भील शदी के फेरे फिर रहे थे और पंडित ने कहा सावधान शबरी ने देखा कि संसार में फस जाएंगे छेड़े खोल के चल दिया मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी को सत्संग मिला शबरी के खानदान में कोई कल्पना नहीं कर सकता है कि एक भीलन इतनी प्रसिद्ध होगी कि बड़े-बड़े संत भी उसकी था गाएंगे और राम उसके झूठे
बेर खाए तो शबरी में जो सत्संग का अंश छुपा था मतंग ऋषि के संग र्क से साधना से शबरी के हृदय की भूमि खेड़ी गई और भगवत प्राप्ति का बीज डाला गया और शबरी ने उसे सींचा सीधा गणित उसी पुस्त ऋषि के कुल में पैदा हुए रावण और कुंभकरण और विभीषण कुंभकरण का अपना चिंतन की धारा है रावण के चिंतन की धारा अपनी है लेकिन विभीषण की धारा ऊंची थी तो ईश्वर में सफल हो गया विषण तो आपके माता-पिता ऊंचे होते हुए भी आपके चिंतन की धारा हल्की है तो परिणाम हलका इसीलिए माता-पिता अच्छे हैं
अच्छा है कुटुंब अच्छा है तो अच्छा है कुटुंब छोटा है तो भी कोई फिक्र नहीं आपके चिंतन की धारा अच्छी हो जाए संग अच्छा हो जाए आजकल के जो बच्चे हैं नया जनरेशन चिंतन की धारा बहुत छोटी हो गई आपके बाप दादा में जो सहन शक्ति और कार्य कुशलता और मजबूती थी वह अपने में नहीं और जो अपने में है वह अपने बेटे बेटियों में नहीं पाई जाती चिंतन की धारा बहुत छोटी हो गई बच्चे बच्चियों की अभी जो पुराने लोग हैं 80 साल के 90 साल के देखे जाते हैं लेकिन आने वाला जनरेशन 80
साल का जीवन जिएगा कि नहीं इस प्रश्न बड़ा चिंतन की धारा ऊंची हो तो एक होता है सामाजिक चिंतन भाई सद व्यवहार करे सब ईश्वर का रूप है अपने आत्मा रूप है सबसे प्रेम से कर ठीक है दूसरा है दैविक चिंतन और तीसरा है तात्विक चिंतन तो तात्विक चिंतन करते करते त स्वरूप में टिक गए तो पार हो गए और तात्विक चिंतन निश्चिंता ले आता है एक है प्रकृति और दूसरा है पुरुष एक है माया और दूसरा है अधिष्ठान राम ब्रह्म परमार्थ रूपा श्री रामचंद्र जी कैसे हैं कि ब्रह्म स्वरूप है राम नाम जिम जपही
जाग ही जोगी प्रपंच रंच रंच भी हो ब्रह्म सुख अनुभव अनुपा अ कथन अनामय नाम नरूपा जो ब्रह्म सुख है उस ब्रह्म सुख की प्राप्ति जब तक नहीं हुई तब तक कितना भी धन कमा ले मजूरी हाथ लगेगी संभालने की कितनी भी सत्ता कमा ले पाले लेकिन मिथ्या शरीर का नाम नाम का नाम होगा हमें क्या मिल जाएगा मेरा बड़ा नाम है मेरे बड़े आश्रम है मेरी बड़ी गदिया है मेरे बड़ी फैक्ट्रियां है मेरी बड़ी पोस्ट है मैं बड़ा प्रधानमंत्री हूं लेकिन भैया यह शरीर का नाम थोपा हुआ है माया के ऊपर नाम का नाम
हुआ आपको कुछ नहीं मिला धोखे के सिवाय आजकल तो उसी में लोग लगे मैं कुछ दुनिया में नाम कर जाऊ नाम कर जाऊं लेकिन मैं क्या हूं उसको तो खोज लाला आप को क्या क्या अनुभव होते इसका कोई महत्व नहीं तात्विक जगत में मेरे को कृष्ण के दर्शन होए मेरे को स्वपने में ऐसा दिखा गुरु जी ऐसे दिखे ऐसे शेषनाग दिखे इसका कोई तात्विक जगत में ज्यादा मूल्य नहीं अनुभव क्या क्या हुए उसका मूल्य नहीं लेकिन अनुभव किसको हुआ उसको खोजा आपने तो वाह वाह धन्य हो आप अनुभव जिसको होते वो मैं कौन हूं ऐसे
ही उपासना का फल क्या है कि किसी देवी देवता को प्रकट करना इतना महत्वपूर्ण नहीं है दु चरित्र से चि उपरा हो जाए यह उपासना का फल है विक्षेप से विक्षेप के समय भी चित्त में समता शांति बनी रहे यह उपासना का फल है तो कुछ भी करके हमारे चित रूपी भूमि में सत्संग के बीज जाए स कादी ऋषि चार थे जन्म जात सिद्ध पुरुष थे उसमें से तीन श्रोता बनते थे और एक वक्ता ब्रह्म चरता करते तात्विक चर्चा करते शोता बनते तो नीचे बैठते तो नीचे बैठने में अपने में हीन बुद्धि नहीं होती है
सत्संग और ऊंचा बैठकर जो सत्संग करते उनमें अहम बुद्धि नहीं होती यह सत्संग की विशेषता है जो ऊंचे बैठे हैं मैं वि और जो नीचे बैठे हम हीन है ऐसी भ्रांति नहीं होती भगवत चर्चा का ये एक महत्त्वपूर्ण प्रसाद है तो यह सत्संग से मिलता और सत्य एक परमात्मा है सत्य अपरिवर्तनीय [संगीत] मिथ्या है दुख सुख मिथ्या है मान अपमान मिथ्या जन्म मरण मिथ्या है लेकिन मेरा आत्मा सत्य स्वरूप है जहां से मैं उठती है वह चैतन्य सत्य स्वरूप है फिर मैं फलाना हूं यह माया है सुनकर मैं मनुष्य हूं मैं गुजराती हूं मैं फौजी
हूं मैं खोजी हूं मैं प्रधानमंत्री हूं यह सब माया का रूप है तो मैं कौन हूं उसको खोज लिया वाह वाह उसने सारे काम कर लिए और उत्तम तरीका है उत्तम साधक के लिए तात्विक साधक के लिए कि आकाश पर दृष्टि को स्थिर करे एकांत इससे मानसिक शांति और आंतरिक बल आकाश जैसे सबको ठोर दे रहा है ऐसे परब्रह्म परमात्मा चदा आकाश सबको ठोर दे रहा है तो जिनकी उत्तम स्थिति होती है वे आकाश की तरफ एक टक देखे देखे देख अथवा स्वासो स्वास को गिनते शांति का अनुभव करते तो जितनी शांति अंतरात्मा में लेंगे
उतना ही चित्त में संकल्प सामर्थ्य फलता है जितना वव पीडो भवती सिद्ध जितना कष्ट सते धर्म पर अडिग रहते उतना संकल्प बल बढ़ता है जितना सत्संग में चित रहता है उतना सहज समाधि का सुख प्राप्त होता है सत्संग विवेक न हो गई हजार वर्ष की समाधि कर ले उससे भी दो क्ण सत्संग तात्विक ऊंचा है तुलसीदास जी ने कहा तन सुकाय पिंजर कियो धरे रन दिन ध्यान तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान तो सत्संग हमें प्रेरणा करता है क्या आप विचारो के दुख किसको होता है दुख है तो दुख में बहिए मत मान आए
तो मान में भूलिए मत अपमान आए तो अपमान में दब मत ये किसको होता है तोय तात्विक चिंतन है यह तात्विक चिंतन आपको बहुत ऊंचा बना देगा दूसरा है कि सुबह नींद में से उठे तो जहां भूमध्य के बीच में तिलक करते हैं वहां थोड़ा स्पर्श कर दे मथा टेक के पड़े रहे थोड़ी देर तो जो जीवनी शक्ति रा ऊर्जा वह सारी शिव नेत्र में आएगी जहां से विचार की सुंदरता जिसे अभी विज्ञान ने कहा पीनियल ग्रंथि का विकास होता है विज्ञानी भी लगे भारतीय योगियों के खोज अनुभवों की महता को जानने को तो यह
पीनियल ग्रंथि में पावर है ऐसा विज्ञानी बोलते विज्ञानी ने दूसरा भी एक बढ़िया काम किया कि व बोलते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी में दो मस्तिष्क है एक सूर्य नाड़ी से संचालित होता तो दूसरा चंद्र नाड़ी से और दोनों मस्तिष्क में दोनों मगज के बीच शरीर में लगभग 10 अरब जितने मतलब हजार करोड़ जितने न्यूरॉन्स है अभी विज्ञानी बोलते हैं कि हमारी खोपड़ी में 10 अरब मतलब हजार करोड़ जितने न्यूरॉन्स हैं विज्ञानियों की भाषा लेकिन अपना योग दर्शन कहता है कि 10 से भी ज्यादा 11 12 अरब तक भी यह सूक्ष्म कोष है वो एक-एक
कोष मतलब एक एक न्यूरॉन्स आपके ग्रह नक्षत्र का मॉडल है प्रतिनिधित्व कर सकता है आप अगर साधना करके उन न्यूरॉन्स को विकसित करते हैं तो आपके संकल्प के अनुसार ग्रह नक्षत्र चांद सितारे में उथल पाथल हो सकती है और वृक्षों में फलों में फूलों में वस्तुओं में उथल पाथल हो सकती है ऐसे एक मेरे मित्र संत है जो य मेरे को दिखाते हैं लोगों को भी दिखाते हैं देखो यह अंगूठियां एक सरदार था तो लोहे का कड़ा पहनते बोले मेरे को बताया देखो इसको सोने का बना देते अपन तो यूं करके हाथ घुमाकर सोने का
बना दिया चांदी की अंगूठी ली किसी की उसकी सोने की बना दी तो यह यह न्यूरोस विकसित होते हैं तो पदार्थों में परिवर्तन हो जाता है राम कृष्ण को किसी ने पूछा कि प्रभु आप कहते हैं य सब में एक परमात्मा है एक सत्ता है यह एक सत्ता ही हम कैसे जाने कैसे माने हमको तो विश्वास नहीं होता कि सब में एक सत्ता है रामकृष्ण ने कहा भाई है बोले महाराज आप कोई कृपा करिए हमें कोई प्रमाण मिलेगा कोई व्यक्ति वहां से गाय ले जा रहा था और उसने गाय को पीटा तो राम कृष्ण ने
उस गाय के पीटने के निशान अपनी कमर पर अपने पीठ पर दिखाया कि बोले देखो त्व है किसी ने कहा कि जब संत के संकल्प में इतना बल है जैसे ईश्वर सृष्टि करता है तो संत भी ईश्वर के साथ जोड़कर सृष्टि में कुछ भी कर सकते होंगे बोले होता है व तो योग का सामर्थ्य होता तो क्या महाराज य सफेद फूल गुलाबी हो सकते हैं बोले भाई ईश्वर की सृष्टि में असंभव क्या है तो जो फूल सफेद जो पौधा सफेद फूलों का था सुबह वह आया तो उसने देखा कि इस देखो कुछ सफेद फूल लगे
और कुछ गुलाबी हुए बोले ये क्या है ठाकुर जी बोले तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है तो मेरा कहने का तात्पर्य नहीं कि आप सफेद फूलों के पौधे को गुलाबी कर दीजिए अथवा आप लोहे के कड़े को सोने का कर दीजिए य कोई बड़ी ऊंची बात नहीं है आखिरी बात नहीं ऊंची बात तो यह है कि आप अपने से अभिन्न जो परब्रह्म परमात्मा है आप जो चाहते हैं वह पा लीजिए ऊंची बात ये है