जो अनित्य वस्तुएं हैं उनका ज्ञान वो साइंस बताती है आधुनिक विज्ञान बताता है और जो नित्य तत्व है उसका ज्ञान धर्म बताता है तत्व ज्ञान बताता है तो नित्य ज्ञान की सत्ता से अनित्य ज्ञान का पता चलता है लेकिन अनित्य वस्तुओं से अनित्य ज्ञान से नित्य का पता नहीं चलता भगवान कहते हैं ज्ञान विज्ञान तृप्त आत्मा कुस्तो वि जितेंद्रिय युक्ता चते योगी समलो सम कांचना ज्ञान मतलब नित्य ज्ञान विज्ञान माना उसकी अनुभूति से जो तृप्त हो गए हैं कुस्त जैसे स्वर्ण सोने के गहने बनते जाते हैं लोहे की रण ज्यू की त्यों ऐसे ही मन
में विचार आए बुद्धि में निर्णय आए इंद्रियों में कर्म आए शरीर में अवस्था आई यह सब बदलती जाती फिर भी जो नहीं बदलता वह परमात्मा आत्मा सत्य स्वरूप नित्य ज्ञान स्वरूप है वह आत्मा परमात्मा चेतन स्वरूप है वह आनंद स्वरूप है यह तीन बातें आप पक्की कर लो एकदम भला होगा भला कि मरना आपका नहीं होता यह पक्का कर लो जब भी मरेगा शरीर मरेगा शरीर के बाद भी आप रहते हैं मौत आपकी नहीं होने वाली है इसलिए मौत से डरिए मत और किसी को डराइन आत्मा आप चैतन्य है और अमर है शरीर अवस्थाएं सब
बदलती है लेकिन आप अब बदल नित्य ज्ञान स्वरूप परमेश्वर का सनातन स्वरूप है तो एक डरिए मत और डराए मत दुखी होइए मत क्योंकि सत चित्त आनंद व नित्य ज्ञान क्या है वोह सत है चेतन है और आनंद स्वरूप है जो नित्य ज्ञान स्वरूप है आत्मा परमात्मा वह सत है चेतन है और आनंद स्वरूप है और शरीर असत है जड़ है और दुख रूप है शरीर पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा और हाथ को पता नहीं मैं हाथ हूं आपको पता है य हाथ है आंख को पता नहीं मैं आंख हूं आपको पता है
य आंख है मन की वृत्ति से मन बदलता है उसको आप जानते हैं आंख ठीक देखती कि नहीं देखती उसको आप जानते हैं तो आंख अनित्य ज्ञान दिखाती है लेकिन आप नित्य हाथ अनित्य का ठंडा गर्म बताएगा लेकिन आप नित्य है ठंडा था तभी आप हैं गर्म है तभी आप है और कुछ नहीं है तब भी आप है अच्छा दिखा आप है बुरा दि आप है और नहीं देखता है मन या इंद्रिया तभी आप है तो आपका आत्मा नित्य ज्ञान स्वरूप है इंद्रिय और मन का ज्ञान अनित्य है तो इंद्रिय मन बुद्धि यह अनित्य प्रकृति
की चीजें हैं और अनित्य प्रकृति की चीजों को ही पकड़ के बताएगी न बताएगी तो नित्य सत चित आनंद की सत्ता से बहुत ऊंची बात है इसको सुनने मात्र से हजारों यज्ञ करने का फल कहा गया है सारे तीर्थों में स्नान करने का फल कहा गया सारे पितरों को तर्पण करके तृप्त करने का फल कहा गया है स्नातन तेन सर्व तीर्थम दात्म तेन सर्व दानम कृतम तेन सर्व यज्ञम येन क्षणम मनः ब्रह्म विचारे र कृत्वा वो ब्रह्म परमात्मा जो नित्य चैतन्य है उसके ज्ञान में मन लगाया इतना बड़ा भारी पुण्य होता है तो ये आप
नित्य ज्ञान का आदर करने की गांठ मान लो अपने जीवन में व्रत ले लो मृत्यु जिसकी होती वो हम नहीं है जो मरने वाला है वह शरीर है मरने के बाद भी जो रहने वाला है हम अपने आप हर परिस्थिति के बाप बचपन आया बचपन की जरा जरा गोली बिस्किट लॉलीपॉप चॉकलेट चीज वस्तु खिलौनों में आहा बड़ी राजी नाराजी हो जाती थी लेकिन अब यह राजी नाराजी अनित्य है उसको जान ने वाला नित्य है है कि नहीं कितना सरल है बहुत ऊंची बात सुन रहे हैं और सरल है दवानी आई है पढ़ना है ऐसा है
पेपर कठिन है फलाना बड़ा टेंशन है पेपर अच्छे गए य मेरे को आ गया इसका ज्ञान हो गया उसका ज्ञान हो गया वह भी भूल गए पेपर आए नहीं आए यह सब आके चला गया लेकिन उसको जानने वाला नित्य ज्ञान स्वरूप वो सत चेतन मेरा आत्मा अभी भी जैसा का तैसा है तो वह है सत स्वरूप जो सत स्वरूप है वह चेतन स्वरूप है जो चेतन स्वरूप है वह आनंद रूप है ज्ञान स्वरूप है तो सच्चिदानंद भगवान का एक नाम है सच्चिदानंद भागवत में आता है सच्चिदानंद रूपाय विश्व उत्पत्ति आदि हे तवे विश्व उत्पति आदि
हे तवे त्रय विनाशाय विनाशाय य वयम नमः जो सत स्वरूप है चेतन स्वरूप है आनंद स्वरूप है उस परमेश्वर को हम प्रणाम करते हैं बोले क्यों प्रणाम करते हो क्या चाहते हो बोले ताप तर विनाशाय आदि देविक आदि भौतिक और मानसिक य ताप दुख मिटाने के लिए तो यह जो दुख है वह आदि देवी जगत में है आदि भौतिक में है मानसिक जगत तक है सच्चिदानंद स्वरूप में यह दुख की दाल निकलती तो अपने जीवन में अगर व्रत नहीं है है तो कच्चा घड़ा है कच्ची समझ तो शास्त्र कहते जिनकी कच्ची समझ है उनका सारा
जीवन का जो भी उपलब्धि है जैसे मिट्टी के बच्चे घड़े में सब कुछ बह जाता है ऐसे जीवन में सब कुछ पापा के उनका बह जाता है ठन ठन पाल हो जाते क्योंकि अनित्य शरीर अनित्य मन अनित्य बुद्धि अनित्य इंद्रिया अनित्य वस्तुएं और उसका अनित्य ज्ञान में रमण कर करके जिंदगी खत्म कर देते हैं लेकिन अनित्य को जानने वाला जो है नित्य वह सत्य है बचपन बदल गया जवानी में क्या-क्या हुआ बदल गया स्वपने में क्या-क्या आया बदल गया लेकिन उसको जानने वाला नहीं बदला तोव सत है वह चेतन है वह ज्ञान स्वरूप है और
वो नित्य है शरीर की अवस्था अनित्य मन के संकल्प विकल्प अनित्य बुद्धि के निर्णय अनित्य और इंद्रियों का ज्ञान अनित्य लेकिन इन सब की गहराई में नित्य चैतन्य [संगीत] परमात्मा उस नित्य ज्ञान स्वरूप की हम उपासना करते हैं कल्याण हो जाए बेड़ा पार हो जाए बार के धूम धड़ के मंदिर देवी देवता सब अपनी अपनी जगह पर लेकिन सारे मंदिरों का सारे तपस्या हों का फल यह है कि हम नित्य स्वरूप अपने सच्चिदानंद में आए तो तीन बातें पक्की कर ले कि मृत्यु से डरे नहीं डरावे नहीं दूसरे को बेवकूफ बनावे नहीं और खुद अनित्य
वस्तुओं में में और अनित्य ज्ञान में बेवकूफ बने नहीं मैं इतना पढा हूं मैं उतना पढा हूं लेकिन ये तो बुद्धि में और जरा सा बुखार आ जाए तो पढ़ाई भूल जाता है मेरे पास इतना धन है उतना धन है जरा सा हवा निकल गई फूक बाहर तो धन पड़ा रह जाए पड़ा रहेगा माल खजाना छोड़ त्रिया सुत जाना है कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना उस सत स्वरूप का संग का जो पहले था अी है बाद में रहेगा यह शरीर 100 वर्ष पहले नहीं था 30 वर्ष के बाद नहीं रहेगा लेकिन
मैं उसके बाद भी रहूंगा इसके पहले भी था तो आंखों का देखने का ताकत पहले जैसी बुढ़ापे में सबकी नहीं होती मन की स्थिति भी पहले जैसी नहीं होती लेकिन उसको जानने वाला तो वही का वही है ना वही सत स्वरूप है ओ उसमें शांत होते जाए फिर मन इधर उधर जाए ओ जितनी देर उच्चारण किया उतनी देर फिर शांत हो ग तो यह असत्य जड़ दुख रूप संसार में भटकने वाला मन इंद्रिया भी सत स्वरूप में विश्रांति पाकर शुद्ध हो जाएंगे माया के तीन गुण है तमस गुण से शरीर की वस्तुएं बनती द्रव्य बनती
रक्त नस नारिया ये वो माया के रजस गुण से शरीर में चेतना आती है माया के सत्व गुण से शरीर में ज्ञान इंद्रियों में आता है लेकिन यह सब बदलने के बाद भी सच्चिदानंद ज्ञान स्वरूप मेरा आत्मा जो क्या त्यों छोटी-छोटी आंखें थी नन्नी नन्नी नाक थी नन्नी नन्नी उंगलियां थी वो सब बदल गई बड़ी बड़ी बड़ी बड़ी बड़े बड़े हाथ तो ये सब माया का खेल बदलता है दिन बदलता रात बदलता सुख बदलता है दुख बदलता है सब जैसे गंगा के प्रवाह में सब बहता है ऐसे सब बहने वाला अनित्य है सुख भी आकर
चले गए दुख दुख भी आके चले गए चिंताए भी निगड़ी आक चली गई खुशिया भी आ आक चली गई लेकिन उन सबको जानने वाला सच्चिदानंद जो [संगीत] का दुख तब होता है जब असत शरीर में असत व्यवहार में असत कल्पनाओं में सत बुद्धि करते और सच्चिदानंद के ज्ञान का पता नहीं अथवा अन करते तभी आपको दुख दबोच होता है तभी कर्म का बंधन दबोच होता है तभी ईश्वर से आप दूर फैके जाते हैं एक बात और याद रखो कि ईश्वर दूर है ऐसी बेवकूफी कभी स्वीकार ना करो पराए हैं दूर है देर से मिलेंगे श्रम
साध्य है नहीं नहीं स सा साहिब सद सदा हजूर अंधा जान तता को दूरे व आनंद स्वरूप सदा हजरा हजूर है लेकिन उधर को बुद्धि जाती नहीं ना विचार जाता नहीं अ सत में रमण कर करके थक जाते सो गए फिर उसी में रमण किया फिर सो गए ऐसे जीवन पूरा हो जाता तो सत में रमण करने का सत्य के तरफ ने का पक्का इरादा कर दो सच्चिदानंद का सुमर तो नित्य ज्ञान तो है लेकिन नित्य ज्ञान की स्मृति नित्य ज्ञान की अनुभूति दुखों से पार कर देगी कर्म बंधनों से पार कर देगी चिंताओं से
पार कर देगी शोक से पार कर देगी ति शकम आत्म वित उस आत्मा को जानने से आप शोक से पार हो जाए आकर्षणों से पार हो जाएंगे आप संसारी वस्तुओं से आकर्षित नहीं होंगे लेकिन संसार आपसे आकर्षित होगा क्योंकि व आप नित्य सच्चिदानंद में रमण करने लग गए कृष्ण वस्तु पर आकर्षित नहीं होते लेकिन कृष्ण को देखकर लोक और प्रकृति आकर्षित रहती आत्मा सबका आनंद स्वरूप मूल स् चेतन मृत्यु से डरे नहीं डरावे नहीं बेवकूफ बने नहीं बनावे नहीं दुखी होवे नहीं और दूसरे को दुखी करे कौन चाहता है मैं दुखी हू कोई नहीं चाहता
कोई एक आदमी भी बोल दे कि मैं फलाना काम दुखी होने के लिए किया था अथवा करूंगा नहीं फिर भी असत शरीर में इंद्रियों में सुखी होने की भूल से बेचारे दुखी होते रहते और सत में आ जाए तो फिर दुख यूं मिटता है चिंता बंधन य मिलता है नहीं तो कितनी डिग्रियां ले लो कितनी नौकरियां कर लो कितने प्रमोशन कर लो दुख नहीं मिलता कभी ना छूटे पिंड दुखों से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं तो सच्चिदानंद ब्रह्म स्वरूप परमात्मा में आना ही पड़ेगा हजार जन्म के बाद भी जय विजय वैकुंठ में थे भगवान नारायण
का बाहर से दर्शन करते थे लेकिन नारायण तत्व जो नित्य ज्ञान है उसमें नहीं आए तो वैकुंट से पतन हुआ गोपियों को शरद पूनम की रात को श्री कृष्ण ने कृपा करके सानिध्य दिया आनंदित तो किया लेकिन बाद में फिर गोपियों को उस नित्य ज्ञान में ना आई तो दुख गया नहीं गोपिया बिलक बिलक के रोती थी लेकिन गोपियों में खानदानी थी कि हमारे कारण श्री कृष्ण को तकलीफ ना प ये उनमें बड़ा भारी सद्गुण था नहीं तो ब्रज और मथुरा क्या दूरी थी लेकिन गोपियों ने मर्यादा तोड़ी नहीं गई नहीं तंग करने कृष्ण को
गई हम जैसा चाहे ऐसा कृष्ण करें ऐसी गोपियों में नीच बुद्धि नहीं थी उनका बड़ा भारी सदगुण फिर धव को भेजा कि नित्य का ज्ञान दे आओ तो गोपिया ने प्रेमा भक्ति की बात से उधव को प्रभावित कर दिया ऐसी पवित्र गोपिया प्रचेता राजकुमारों ने भगवान शिव जी का दर्शन किया शिव जी प्रसन्न हुए विष्णु स्तवन का विद्या बताया भगवान विष्णु प्रकट हुए और विष्णु जी ने बोला क्या चाहिए बोले प्रभु हम अपने मन से जो मांगेंगे वह तो अनित्य होगा चला जाएगा आप जो हमरा कल्याण समझे वही दीजिए तो भगवान विष्णु ने कहा जाओ
देव ऋषि नारद मिलेंगे और तुमको नित्य तत्व का ब्रह्म ज्ञान द तो ये सत्संग इतनी ऊंची बात है कि भगवान शिव जी के दर्शन हो जाए विष्णु जी के दर्शन हो जाए फिर भी सच्चिदानंद का ज्ञान देने वाले गुरु की प्रसादी के बिना यात्रा अधूरी रह [संगीत] जाती तो आप इधर ध्यान दो अब मेरे पास ज्यादा सत्संग कहानियां अथवा कथाएं करने का समय नहीं है मैं निवृत्ति की तरफ बढ़ रहा हूं एकांत रिटायरमेंट की तरफ तो सार बात यह है कि दुखी होवे नहीं दूसरों को करें नहीं तो निर्द दुख नारायण में विश्रांति पाए निर्द
दुख नारायण का ज्ञान पाएं निर्गुण नारायण में अपनी स्थिति जमाए किसी को बुरा माने नहीं किसी का बुरा सोचे नहीं किसी का बुरा करें नहीं किसी को बुरा कहे नहीं ऊपर से व्यवहार काल में तो थोड़ा व्यवहार संभालने के लिए हो जाए लेकिन गहराई में समझना कि यह सब अनित्य संसार में हो रहा है नित्य सो हम स्वरूप स्वास अंदर जाती है ठंडी बाहर आती है गर्म ये किसकी सत्ता से होती शवास का उर्द गमन अधो गमन किसकी सत्ता से और यह स्वास जो है प्राण वायु संचरण करता है इसीलिए रक्त भी संचित होता है
और सारे शरीर की प्रक्रिया नित्य चैतन्य की सत्ता से स्वास चलता शरीर चलता है इंद्रिया देखती मन देखता है सोचता है तो इतना निकट है इतना अपना आप है इतना सहज है अपने अंतःकरण में इसलिए इसका नाम आत्मा है और ब्रह्मांड में व्याप रहा है इसलिए उसको परमात्मा बोलते हैं उसकी उपासना उसमें विश्रांति उसके ज्ञान का सुमर साधना ऐसा नहीं कि कोई साधना कोई बाथरूम है के ना धो केर जरा फ्रेश होकर आ गए एक घंटा अपना आधा घंटा माला वाला क्या नियम किया बस आ गया और फिर जैसा आए ऐसा अस साधन करने लगो
इसका नाम साधना नहीं सारा जीवन नित्य साधन मय हो जाए देखे सुने व्यवहार करें स्मृति व्यवहार चिंतन ज्ञान उसी सच्चिदानंद का जीवन में बड़ी भारी उपलब्धि बीती हुई बातें स्वपना हो गई बीता हुआ दुख भी स्वपना बीता हुआ सुख भी स्वपना होया शादी के दिन भी स्वपना हो गया कोई मर गया रुदन के दिन भी स्वपना हो गया लेकिन उसको जानने वाला अपना है कि नहीं व नित्य ज्ञान स्वरूप वही चैतन्य स्वरूप है कोही आनंद स्वरूप है ऐसा स्मृति करते करते उसी के आनंद में उसी के ज्ञान में उसकी चेतना में अपने चित्त को कल्याण
का एकदम राज मार्ग है कठिन नहीं है लेकिन जिनको कठिन नहीं लगता ऐसा महापुरुषों का संग मिलना कठिन और उनके अनुसार फिर जीवन में दृढ़ता से व्रत लेकर चलने का इरादा करने वाला साधक मिलना क अपना लक्ष्य बना ले कि मुझे तो सच्च दान नंद परमेश्वर का आनंद पाना है सच्चिदानंद प्रभु का उसके लिए कभी भगवान से बातें करें कभी रोए कभी हसे कभी जप करे कभी ध्यान करे लेकिन बस लक्ष्य बना दे ईश्वर को पाने का लक्ष न ओ जल होने पाए कदम मिलाकर चल सफलता तेरे चरण चूमेगी आज नहीं तो कल अपना लक्ष्य
ऊंचा बना ले कि अनित्य चीजें कब तक अनित्य संबंध कब तक अनित्य संसार का ज्ञान कब तक मुझे तो नित्य जो ज्ञान स्वरूप है चेतन स्वरूप है आनंद स्वरूप मेरा आत्मा होकर बैठे [संगीत] प्रभु नारायण हरि हरि ओम ओ ओम ओ ओ ओ वासुदेवा हे प्रभु हे प्रभु राम राम राम राम और कर्म करने में कर्ता की मेहनत का फल मिलता है नश्वर कर्मों के नश्वर फल और वैदिक कर्मों में स्वर्ग आदि का फल लेकिन भगवान के भजन में कर्ता के बल का ही फल नहीं मिलता कर्ता की तो थोड़ी बहुत होती है मेहनत बाकी
तो भगवान की कृपा का फल उसमें मिलता बहुत फायदा राजा जंगल में भूखे प्यासे हो गए किसी जंगल में रहने वाले ने उनको खिला पिला दिया राजा ने कहा अच्छा फलाने इस देश का राजा हूं तो आ जाना फला अब वो राजा क्या उसको वही ऐसी झोपड़ी में रखेगा या ऐसे ही खिलाएगा क्या मक्काई की रोटी और चटनी राजा तो अपने तरफ से देता ऐसे ही जब आप असत शरीर असत मन असत बुद्धि असत वस्तु असत संसार उसमें रहकर सत चित आनंद का प्रीति करते हो चिंतन करते हो तो तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार कर लेता है
फि वह अपनी ओर से तुम्हें देता है तो निहाल कर देता एकदम ऊंचा सौदा है प्रभु ज्ञान प्रभु स्मृति प्रभु चिंतन ओम ओम ओम ओम ओ नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण हरि हरि हरि ह हे सच्चिदानंद प्रभु ओ ओम ओ होठों में उसके नाम का स्मरण करो हृदय से स्मरण करो प्रीति करो उसमें शांत होते जाओ अपने बल भूते से नहीं लेकिन अपनी पुकार और प्रेम से खोते जाओ अस सत से हटते सत के होते जाओ बस ओम शांति ंडी शांति मधुर शांति प्रभु ओम ओ ओम ओम ओ जब तक जी में जान रहे तन
में प्राण रहे मेरी प्रीत की डोरी तेरे तरफ बढ़ती रहे मेरे इष्टदेव गुरुदेव प्रभु देव सच्चिदानंद देव वालड़ा स्मात कार्य भावे ओम ओ ओ [संगीत] [संगीत] मैं सत स्वरूप परमात्मा [संगीत] में स्थित ना हुआ असत संसार में भटका मैं चेतन स्वरूप होकर जड़ वस्तुओं को मेरी मानता हूं मैं ज्ञान स्वरूप आनंद स्वरूप होकर दुख रूप संसार के आकर्षण में फस रता प्रभु अब मैं तेरी शरण मारा वालड़ा हरि हरि हरि नारायण ओम ओम [संगीत] हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे पाप ताप को हरने वाले कषित आकर्षित करने वाले प्रभु सच्चिदानंद में एकाकार करने
वाले रोम रोम में रमने वाले राम कृष्ण हरि ओम ओम ओम [संगीत] ओम ओम ओम बल स्वरूपा ओम बलम देही ज्ञान स्वरूपा ज्ञानम देही आनंद स्वरूपा आनंदम देही ओम ओम [संगीत] [प्रशंसा] ओ ह ओम ओम ओम ओ ओम ओम ओम प्रभु [प्रशंसा] सच्चिदानंद स्वरूप [संगीत] तू सत है यह सुना था लेकिन अभी अनुभव हो रहा है तेरे सत्य ज्ञान का [संगीत] महाराज मेरा वालड़ा [संगीत] कौन कछ के रंग नथी चढ कौन कहता है कि रंग नहीं चढ़ता [संगीत] सच्चिदानंद का रंग क्यों नहीं चढ़ेगा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]
[प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मारा [प्रशंसा] वालड़ा मेरे प्रभु जी प्यारे जी मेरे [प्रशंसा] जी भगवान ही हमारे थे हैं और रहेंगे शरीर हमारा था नहीं और रहेगा भी नहीं तो शरीर के संबंध और वस्तु [संगीत] कब वहा सच्चिदानंद तुम इतने सरल इतने निकट हो मुझे पता नहीं मैं नाहक हक से जुदा था मुझे मालूम ना [संगीत] था ना हक तुझसे जुदा था प्रभु मुझे मालूम ना [संगीत] था तू मेरा दिलभर देवता था प्रभु मुझे मालूम ना [संगीत] [प्रशंसा] था हे गुरुदेवा [संगीत] हे इष्ट देवा हे प्रभु देवा ओ प्यारे देवा [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] छोड़ पवाड़े
झगड़े सारे गोता वेदत य दुनिया की तू तू मैं मैं अच्छे बुराई आकर्षण दूर हटो अ तो सच्चिदानंद का प्रसाद पावन कर देता है हे बोतल की शराब अलकोल जा तू शराबियों के पास हमें तो गुरु प्रसादी की शराब खुश हाल निहाल कर रही है [प्रशंसा] जाम पर जाम पीने से क्या फायदा रात बीती सुबह को अभागी अलकोल उतर जाती तू फकीरी प्यारिया पिया कर तेरी सारी जिंदगी सुधर जाती है [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] नारायण नारायण [संगीत] सच्चिदानंद की स्मृति इतनी सुखदाई है अगर उसमें टिक गए तो क्या पड़ पार
हो जाए काय को संसार के झूठे सुखों में फसे मरे हे राम जी अंतःकरण का शीतल होना बड़े तपों का अनंत फल है अंतःकरण का शीतल होना सच्चिदानंद का सुख पाना बड़ी तपस्या का बड़ी कृपा का फल है स्वाभाविक ही जिसका चित्त शीतल है उसको समाधि कहते हैं जो मैत्री करुणा अन्यता आदिक गुणों में स्थित हुआ है और जिसका मन आत्म विषय से शांति को प्राप्त होता है उसको समाधि कहते हैं हे राम जी भाव समाधि स विकल्प समाधि निर्विकल्प समाधि नादा अनु संधान योग कई प्रकार के हमने पापड़ बले आपको जो सार सार सुख
स्वरूप है वही जरा सा चखा वश जी बोले हे जी मैं तो चदा काश रूप हूं पर मेरा वशिष्ठ नाम ऐसे है जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम होता है मैं तो चदा काश ब्रह्मा हूं वशिष्ठ नाम तो ऐसा है जैसे कोई रस्सी को नहीं जाने तो बोले सांप है कोई बोले दरार है कोई बोले डांग है कोई बोले पानी का रेला है कोई बोले बरसाद है इसलिए धरती का चेरा है रसी को रसी नहीं जानते ऐसे मुझको सच्चिदानंद नहीं जानते तो वशिष्ठ जी मानते ऐसे आप मेरे स्वरूप को नहीं जानते तो बापू जी मानते
बाकी घर में बैठ के भी पूनम करोगे कभी कभार तो देखो बापू जी के साथ कैसा उधर भी है [संगीत] [प्रशंसा] है वही सच्चिदानंद की तरंग ऐसा नहीं कि अब घर में रहे तो फिर सत्संग छूट जाए ऐसा नहीं इधर लाभ मिलता है तो इधर लो नहीं तो फिर घर पर उससे सवाया लाभ लो आध्यात्मिक लाभ ही वास्तविक में लाभ है लौकिक लाभ तो धोखा है मिल गया मिल गया छूट गया छूट गया नारायण हरि नारायण हरि नारायण हरि हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] ओम हे राम जी तुम शरी
खों को मेरा आकार दिखता है पर मुझको तो आदि भौतिक और अंत वाहक दोनों शरीर चदा काश का किंचन भास हैं मैं तो सदा अद्वैत रूप निराकार हूं तुम्हारी और मेरी चेष्टा समान है परंतु मुझको सदा आत्म पद का निश्चय है इस कारण मैं जीवन मुक्त होकर विचर हूं अज्ञानी को अक्रिया में भी द्वैत भाता है और मुझको तो क्रिया में भी अद्वैत ही भास है हे राम जी निमेष का जो सत भाग है उसका अर्ध भाग भी प्रमाद होने से नाना प्रकार का जगत प्रकट भाषित होता है इससे ज्ञान रूपी पर्वत पर हमेशा चढ़े
रहना और अंता रूपी गड्ढे में कभी भी ना गिरना हे राम जी आत्म ज्ञान रूपी सुमेरू पर्वत पर चढ़कर फिर अहं के गड्ढे में गिरना बड़ी भारी मूर्खता है जब दृश्य भाव को त्यागो ग तभी अपनी स्वभाव सत्ता को प्राप्त हो ग हे राम जी आत्मा का अज्ञान ही बंधन और आत्मा का बोध ही मुक्ति है इससे बलपूर्वक मोह निद्रा को छोड़कर आप ही जागो तभी इस बंधन से मुक्त हो ग अभ्यास करके वासना और प्राणों को स्थित करो जब मूर्खता उदय होती है तब कर्म उदय होते हैं अभ्यास करके वासना छोड़ो जगत का मजा
लेने के और भगवत सुख भगवत ज्ञान आकर मुक्त हो जाओ हे राम जी जैसे कोई पुरुष किसी देश को जाता है और पहुंचने का समय थोड़ा हो तो वह मार्ग के स्थान देखता भी जाता है परंतु किसी में भी लिप्त नहीं होता वैसे ही चित्त को आत्म पद में लगाओ ऐसा शरीर पाकर यदि आत्म पद ना पाया तो फिर कब पाओगे आत्मा पद माना अपने को जानना है मरने के बाद भी शरीर यहां रह जाता है और अपन तो रहते नहीं उसको खाली पाना है बस कठिन थोड़ी है और पराया है क्या दूर है ना
पराया है ना दूर है लेकिन उधर रुचि नहीं इसलिए पराया लगता है दूर लगता बिल विल फाइंड ए वे जहां चाह वहां रा बन एबी सीडी कठिन लगता था अभी सरल हो गया ऐसे ही है ये भी परमात्मा प्राप्ति बाहर के सहारे ढूंढो आत्मा सहारा हे राम जी किसी के सिर पर आग लगे और वह उसे बुझाने के निमित्त त्रण डाले तो वह बुझती नहीं बल्कि बढ़ती ही जाती है व जमाने में पेट्रोल पंप नहीं था नहीं तो वशिष्ठ जी बोलते आग लगे और पेट्रोल का फरा हे राम जी किसी के सिर पर आग लगे
और वह उसको बुझाने के निमित्त ण डाले तो वह बुझती नहीं बल्कि बढ़ती ही जाती है वैसे ही विषयों की इच्छा भोगने से तृप्त नहीं होगी इच्छा ही बंधन है और इच्छा की निवृत्ति का नाम मोक्ष है ऐसा सुख ब्रह्मा के लोक में भी नहीं जैसा इच्छा की निवृत्ति में है ये मिल जाए यह भोग य डिजायर न र ब्र कर देती है भिखारी बना देती डिज हे राम जी रात को कोई डिजायर नहीं होती नींद में त बच्चे को डिजाइन नहीं होती तो आनंद इच्छा और जो बड़ा हुआ इच्छा हुई तो गया य हे
राम जी शास्त्र का श्रवण और तप दान यज्ञ सभी इसी निमित्त है कि किसी प्रकार से इच्छा निवृत हो दुनिया से मजा लेने की इच्छा छोड़ दूसरों की सेवा कर दो अपने आत्मा का मजा जगा दो बस गलती हो रही ना आत्मा के मजा को ढकने वाला बाहर का मजा अंदर परेशान हे राम जी जो अनिश्चित पद में स्थित है उसको यदि एक क्षण भी इच्छा उपजती है तो वह रुदन करता है जैसे चोर से लुटा गया मनुष्य रुदन करता है वैसे ही वह रुदन और पश्चाताप करता है और उसके नाश का उपाय करता है
यह जैसे स्वप्न में भ्रम से रूप दिखते हैं वैसे ही यह ग्राह्य ग्राहक भ्रम से प्रा भाषित होते हैं हे राम दृष्टा दर्शन और दृश्य तीनों ब्रह्म में कल्पित है चीर काल से हम खोज रहे हैं परंतु द्वैत हमको नजर नहीं आता एक ब्रह्म सत्ता ही ज्यों की त्यों भाषित होती है जो निरा भास ज्ञान रूप है वह आकाश से भी सूक्ष्म है और सब जगत भी वही है हे राम जी ऐसा दुख घोर नरक में भी नहीं होता जैसे तृष्णा से होता है जो धनवान है उनको को धन के कमाने और रखने की चिंता
है उठते बैठते खाते पीते चलते सोते सदा धन की और खपे खपे खपे में खप जाते हैं मोर एंड मोर मोर एंड मोर नारायण नारायण नारायण ओ हम हे राम जी यद्यपि धनी हो और उससे संतोष नहीं तो वह परम दरिद्री है और जो धन से हीन है परंतु संतोष वान है वह ईश्वर है जिसको संतोष है उसको विषय बंधन नहीं कर सकते विपरीत भावना में दुख होता है और जो दुखदायक पदार्थ हैं वे भी फिर सुखदायक जान पड़ते हैं हे राम फिर ड्रिंक करता है है तो दुख देने वाला ड्रिंक करता क्लब में जाता
है खड़े खड़ नाचता है मांसपेशियों को बुढ़ापा जल्दी ले आता है एंग्री नेस जल्दी आ जाएगा खड़े खड़े खाएगा खड़े खड़े पिएगा दुख की चीज को उसको सुख लगता है अशांति और बीमारी देने वाला व्यवहार उसको सुखदाई हो है बुद्धि कमजोर हो जाती है हरि ओम हरि ओम हे राम जी मैं ऊंची भूजा करके पुकारता हूं मेरा कहा मूर्ख नहीं मानते कि संकल्प से रहित होना ही परम कल्याण है यही भावना हृदय में क्यों नहीं करते जब तक जड़ धर्मी है अर्थात विषय भोगों में आस्था करता है और आत्म तत्व से शून्य रहता है तब
तक मूड रहता है जब तक स्वरूप का प्रमाद है तब तक हृदय से संसार का तम और किसी भी प्रकार से दूर नहीं होता है चाहे चंद्रमा उदय हो और अग्नि का समूह हो या द्वादश सूर्य इकट्ठे उदय हो तो भी हृदय का तम किंचित मात्र भी दूर नहीं होता हदय का अंधकार लख चंदा चढ़े सूरज चढे हजार गुरु मन ज्ञान न होदा गुरु बिन घोर अंधार बाहर के रोशियो से अंदर का अंधकार नहीं मिटता ना समझी का नाम है दुख जन्म मरण उच्चारण करें लंबा चुप संकल्प कम नि संकल्प में नारायण प्रगट [संगीत] ओ
ओ [संगीत] जितनी देर उच्चार उतनी देर चुप थोड़े दिन में आनंद शांति शक्ति फिर नारायण स्तुति पढ़े तो भगवान कैसे हैं थ कल्याण हो जाए ईश्वर के और किताब नारायण स्तुति ओ [संगीत] ओ [संगीत] उन स्वयं प्रकाश स्वयं सिद्ध सत्तात्मक भगवान की मैं शरण ग्रहण करता हूं शरण ग्रहण मतलब उसम हम शांत होते उसको हम स्वीकार करते ऐसा नहीं कहीं पैर पकड़ना है यह विश्व प्रपंच उन्हीं की माया से उनमें अध्य स्त है यह कभी प्रतीत होता है तो कभी नहीं अदस्त का मतलब क्या है जैसे रस्सी है रस्सी को नहीं जानते तो सांप अदस्त
है देखता है ऐसे परमात्मा को नहीं जानता परंतु उनकी दृष्टि जू की त्यों एक सी रहती है वे इस के साक्षी हैं और उन दोनों को ही देखते रहते हैं वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही है कोई दूसरा उनका कारण नहीं है वेही समस्त कार्य और कारणों से अतीत प्रभु मेरी रक्षा करें प्रलय व परमात्मा हमारे रक्षक वही पोषक प्रलय के समय लोक लोकपाल और इन सबके कारण संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं उस समय केवल अत्यंत घना और गहरा अंधकार ही अंधकार रहता है परंतु अनंत परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान
रहते हैं उनकी लीलाओं का रहस्य जानना बहुत ही कठिन है वे नट की भाति अनेकों वेष धारण करते हैं उनके वास्तविक स्वरूप को ना तो देवता जानते हैं और ना ऋषि ही जिनके परम मंगलमय स्वरूप का दर्शन करने के लिए महात्मा गण संसार की समस्त आसक्ति हों का परित्याग कर देते हैं और वन में जाकर अखंड भाव से ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं तथा अपने आत्मा को सबके हृदय में विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं वे ही मुनियों के सर्वस्व भगवान मेरे सहायक हैं वे ही मेरी गति है ना उनके
जन्म कर्म है और ना नाम रूप फिर उनके संबंध में गुण और दोष की तो कल्पना ही कैसे की जा सकती है फिर भी विश्व की सृष्टि और संहार करने के लिए समय समय पर वे उन्हें माया अपनी माया से स्वीकार करते हैं वे अरूप होने पर भी बहु रूप हैं उनके कर्म अत्यंत आश्चर्य मय है स्वयं प्रकाश सबके साक्षी परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं जो मन वाणी और चित्त से अत्यंत दूर है विवेकी पुरुष कर्म सन्यास अथवा कर्म समर्पण के द्वारा अपना अंतःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं हैं तथा जो स्वयं तो
नित्य मुक्त परमानंद एवं ज्ञान स्वरूप है ही दूसरों को कैवल्य मुक्ति देने का सामर्थ्य भी केवल उन्हीं में है जो सत्व रज और तम तीनों गुणों का धर्म स्वीकार करके क्रमशः शांत घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं उन भेद रहित सम भाव से स्थित एवं ज्ञान घन प्रभु को मैं बार-बार नमस्कार करता हूं आप सबके स्वामी समस्त क्षेत्रों के एक मात्र ज्ञाता एवं सर्व साक्षी हैं आप स्वयं ही अपने कारण है पुरुष और मूल प्रकृति के रूप में भी आप ही हैं आप समस्त इंद्रिय और उनके विषयों के दृष्टा हैं समस्त प्रतीति हों
के आधार हैं अहंकार आदि छाया रूप असत वस्तुओं के द्वारा आपका ही अस्तित्व प्रकट होता है समस्त वस्तुओं की सत्ता के रूप में भी केवल आप ही भास रहे हैं आप सबके मूल कारण है आपका कोई कारण नहीं है तथा कारण होने पर भी आप में विकार या परिणाम नहीं होता इसलिए आप अनोखे कारण हैं जैसे समस्त नदी झरने आदि का परम आश्रय समुद्र है वैसे ही आप समस्त वेद और शास्त्रों के परम तात्पर्य है [संगीत]