हम मिडिल क्लास लोगों की सैलरी रेत की मुट्ठी जैसी होती है। जितना कसकर पकड़ो उतनी तेज फिसल जाती है। सैलरी अकाउंट में आते ही ईएमआई याद आती है। किराया याद आता है। मोबाइल बिल, [संगीत] राशन, पेट्रोल, Netflix और फिर अचानक कोई शादी, कोई मेडिकल खर्च, कोई इमरजेंसी और महीने के बीच में सिर्फ एक सवाल घूमता है। अगली सैलरी कब आएगी? हम मेहनत पूरी करते हैं, टाइम पूरा देते हैं। लेकिन पैसा कभी हमारे लिए काम नहीं करता। हम पैसा कमाते हैं और पैसा चुपचाप हमें छोड़कर चला [संगीत] जाता है। लेकिन क्या यही जिंदगी है या इससे
बाहर निकलने का कोई रास्ता भी है? आज हम समझेंगे। पैसे से पैसा कैसे बनता है? 7 तीन दो रूल क्या है? और क्यों? वारेन बफेट अपनी दौलत का राज सिर्फ [संगीत] एक चीज को मानते हैं। कंपाउंडिंग वीडियो अंत तक देखना [संगीत] क्योंकि हो सकता है आज तुम्हारी सोच बदल जाए। पार्ट एक तीन दोस्त तीन सोच। तीन दोस्त थे विजय, शुभम और आकाश। तीनों एक छोटे से शहर में पले, बड़े थे जहां शाम जल्दी हो जाती थी। [संगीत] दुकानें जल्दी बंद हो जाती थी और सपने अक्सर घर की चारदीवारी में ही सीमित [संगीत] रह जाते थे।
वहां लोग नौकरी को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मानते थे। सरकारी हो जाए तो जिंदगी बन गई यही सोच थी। लेकिन इन तीनों के दिमाग में कुछ और चल रहा था। कॉलेज के आखिरी साल में जब [संगीत] सब अपने अपने भविष्य को लेकर कंफ्यूज थे। ये तीनों देर रात तक छत पर बैठकर बातें [संगीत] करते थे। बातों का विषय हमेशा एक ही होता था। अमीर बनना है। सिर्फ नौकरी नहीं करनी। सिर्फ महीने भर का खर्च निकालना नहीं बल्कि कुछ बड़ा करना है। तीनों के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी। [संगीत] 4 साल की पढ़ाई, प्रैक्टिकल्स, एग्जाम्स, प्रोजेक्ट्स
और प्लेसमेंट की टेंशन के बाद अब उनके हाथ में वो कागज था जो समाज की नजर में उन्हें सेटल बना देता है। लेकिन उनके लिए वो डिग्री मंजिल नहीं थी। [संगीत] वो तो सिर्फ टिकट थी मुंबई जाने की टिकट। मुंबई सपनों की नगरी जहां हर दूसरा इंसान कुछ बनने आया है। जहां भीड़ बहुत है। लेकिन मौके उससे भी ज्यादा। जब तीनों पहली बार मुंबई पहुंचे तो स्टेशन की भीड़ देखकर एक पल को डर भी लगा। इतने लोग, इतनी भागदौड़, इतनी [संगीत] तेज जिंदगी। लेकिन उसी भीड़ में उन्हें अपना भविष्य भी दिख रहा था। उन्हें लगा
अगर यहां लाखों लोग कुछ बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं? सपना तीनों का एक ही था अमीर बनना। लेकिन सोच बिल्कुल अलग थी। विजय हमेशा से ग्रुप का सबसे एक्साइटेड और जोशीला लड़का था। कॉलेज में भी अगर कोई नई चीज आती थी तो सबसे पहले वही ट्राई करता था। उसके लिए जिंदगी का मतलब था अनुभव। वो कहता था पैसा कमाने का क्या फायदा [संगीत] अगर जिंदगी एंजॉय ही ना कर पाए। उसे लगता था कि यंग एज दोबारा नहीं आएगी। अभी घूमना है, अभी दिखना है, अभी जीना है। उसकी नजर में अमीर बनने का मतलब
था अच्छी लाइफस्टाइल, [संगीत] ब्रांडेड कपड़े, नया फोन, सोशल सर्कल। लोगों के बीच एक स्टेटस। उसे विश्वास था कि जब कमाना शुरू कर देगा तो धीरे-धीरे सब सेट हो जाएगा। सेविंग बाद में कर लेंगे। [संगीत] इन्वेस्टमेंट बाद में कर लेंगे। अभी तो लाइफ जीनी है। दूसरी तरफ शुभम था। शांत, सोचने वाला, हर चीज को गहराई से समझने वाला। कॉलेज में भी जब बाकी लोग सैलरी पैकेज की बात करते थे। वो पूछता था [संगीत] कंपनी कितने साल टिकेगी? जब लोग बाइक खरीदने का प्लान बनाते थे, वो पूछता था अगर वही पैसा कहीं लगाया जाए तो 10 साल
बाद कितना होगा? उसे हमेशा से जमीन, प्रॉपर्टी और डेवलपमेंट में दिलचस्पी थी। जब भी शहर में कोई नया मॉल या बिल्डिंग बनती थी, वह उसके बारे में पढ़ता था। उसे समझना था कि शहर कैसे बढ़ते हैं और पैसे कहां से बनते हैं। [संगीत] उसके लिए अमीर बनने का मतलब था एसेट्स बनाना। ऐसी चीजें जो उसके सोने पर भी उसके लिए काम करें और फिर था आकाश। तीनों में सबसे ज्यादा ऑब्जर्व करने वाला। कम बोलता था [संगीत] लेकिन जो बोलता था सोच समझ कर कॉलेज के दिनों में ही उसने स्टॉक मार्केट के बारे में पढ़ना शुरू
कर दिया था। उसे चार्ट्स समझ में आते थे। उसे नंबर पसंद थे। [संगीत] उसे लॉजिक पसंद था। जब बाकी दोस्त आईपीएल की बात करते थे, वह कभी-कभी पूछ बैठता था। अगर किसी कंपनी का प्रॉफिट हर साल 15% बढ़ रहा है, तो 10 साल बाद उसका स्केल कितना बड़ा होगा? उसे जल्दी अमीर नहीं बनना था। उसे सिस्टम समझना था। तीनों एक [संगीत] ही कमरे में बैठते थे। एक ही चाय की दुकान पर जाते थे। एक ही लोकल ट्रेन पकड़ते थे। लेकिन उनके दिमाग में चल रही फिल्म अलग-अलग थी। [संगीत] विजय खुद को एक ऐसी जिंदगी में
देखता था जहां लोग उसे नोटिस करें। शुभम खुद को ऐसी जिंदगी में देखता था जहां बैंक बैलेंस उसे सुकून दे। आकाश खुद को ऐसी जिंदगी में देखता था जहां पैसों का ग्राफ [संगीत] धीरे-धीरे ऊपर जाता रहे। तीनों की शुरुआत एक जैसी थी। मिडिल क्लास बैकग्राउंड, सीमित पैसे, बड़े सपने। लेकिन असली फर्क कमाई में नहीं था। असली फर्क था सोच में। एक सोच कहती थी पहले खर्च, [संगीत] फिर बचत। दूसरी सोच कहती थी पहले एसेट फिर आराम। [संगीत] तीसरी सोच कहती थी पहले नियम समझो फिर पैसा लगाओ। उन्हें उस वक्त अंदाजा भी नहीं था कि यही
सोच आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय करेगी क्योंकि अमीर बनने का सपना देखना [संगीत] आसान है। लेकिन अमीर बनने की सोच रखना मुश्किल है। तीनों दोस्त एक ही शहर से आए थे। एक ही उम्र के थे। [संगीत] एक जैसी डिग्री थी। एक जैसी शुरुआत थी। लेकिन जिंदगी अब तीन अलग-अलग रास्तों पर चलने वाली थी। पार्ट दो [संगीत] विजय की कहानी। विजय को सबसे पहले नौकरी मिली 30 हजार महीना। जिस दिन ऑफर लेटर आया उस दिन उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी। घर फोन लगाया। मां की आवाज कांप रही थी खुशी से।
पापा ने सिर्फ एक लाइन कही। अब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए। 23 साल की उम्र में 30ज़ [संगीत] की सैलरी उसे करोड़ों जैसी लग रही थी। उसे लगा बस [संगीत] अब लाइफ सेट है। अब मैं जीत गया। मुंबई जैसे शहर में पहली सैलरी का मैसेज फोन पर आया तो उसने स्क्रीनशॉट लिया, दोस्तों [संगीत] को भेजा, Instagram स्टोरी लगाई। फर्स्ट सैलरी फीलिंग उसे लगा यह शुरुआत है उस जिंदगी की जिसकी उसने कल्पना की थी। और यहीं से धीरे-धीरे एक ऐसा रास्ता शुरू हुआ जो बाहर से चमकदार था। लेकिन अंदर से खोखला। मुंबई का पार्टी
कल्चर। वीकेंड का मतलब घर बैठना नहीं बाहर जाना। नए नए कैफे रूफ टॉप रेस्टोरेंट क्लब नाइट्स ऑफिस के लोग भी वही कर रहे थे। किसी ने नया फोन लिया। किसी ने एप्पल वॉच किसी ने ब्रांडेड जूते। विजय को लगा अगर मैं पीछे रह गया तो लोग क्या सोचेंगे? पहली सैलरी के 3 महीने बाद उसने अपना पुराना फोन बदल दिया। ईएमआई पर, फिर कपड़े, फिर जूते। [संगीत] हर खरीद के बाद उसे कुछ मिनटों के लिए बहुत अच्छा लगता था। जैसे वह सच में आगे बढ़ रहा हो। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह असल में
एक ऐसे चक्र में फंस रहा है जिसका नाम है लाइफस्टाइल इनफ्लेशन। [संगीत] सैलरी आई, खर्च बढ़ा, सैलरी थोड़ी बढ़ी। खर्च उससे ज्यादा बढ़ गया। धीरे-धीरे उसे ऑफिस के पास रहने का मन हुआ। [संगीत] लोकल ट्रेन की भीड़ से थक चुका था। उसे लगा मैं कमाता हूं। मुझे आराम मिलना चाहिए। उसने ऑफिस के पास एक अपार्टमेंट [संगीत] लिया। 12,000 महीना रेंट। किराया देते समय उसे लगा कि यह खर्च नहीं अपग्रेड है। अब उसका स्टेटस अलग था। अब वह कह सकता था मैं ऑफिस के पास रहता हूं। लेकिन सच्चाई यह थी कि [संगीत] उसकी सैलरी का लगभग
आधा हिस्सा सिर्फ छत के लिए जा रहा था। कुछ महीनों बाद ऑफिस के दो दोस्तों ने कार खरीद ली। लंच टाइम में पार्किंग में खड़े होकर वो अपनी अपनी कार की बातें करते विजय के मन में हलचल शुरू हो गई। मेरे पास क्यों नहीं है? वो शोरूम गया। एक चमचमाती कार देखी। सपनों जैसी कीमत ज्यादा थी। लेकिन सेल्समैन ने कहा सर ईएमआई सिर्फ 12,000 सिर्फ बस यही शब्द सबसे खतरनाक था। 12,000 ईएमआई 12,000 रेंट [संगीत] 3,000 की सैलरी में 24,000 तो पहले दिन से फिक्स बिजली, [संगीत] इंटरनेट, खाना, पेट्रोल अलग। कुल मिलाकर 25,000 से ज्यादा
हर [संगीत] महीने पक्का खर्च। बचत लगभग खत्म। लेकिन बाहर से देखने पर सब शानदार [संगीत] था। कार थी, अच्छा फ्लैट था। ब्रांडेड कपड़े थे। लोग कहते विजय तो सेटल हो गया। उसे भी यही लगता था। लेकिन धीरेधीरे [संगीत] महीने के आखिर में बैलेंस घटने लगा। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल शुरू हुआ। अगली सैलरी में भर दूंगा और फिर [संगीत] वही चक्र दोहराया जाने लगा। यहीं पर एक लाइन याद आती है जो वारेन बफेट ने कही थी। खर्च के बाद जो बचे उसे मत बचाओ। पहले बचाओ फिर जो बचे उसे खर्च करो। लेकिन विजय ने इसका उल्टा
किया। पहले खर्च [संगीत] फिर जो बचेगा वो बचत और जब कुछ बचा ही नहीं तो बचत कहां से होती? उसे लगता था कि वो आगे बढ़ रहा है क्योंकि उसकी लाइफस्टाइल बेहतर हो रही थी। लेकिन असल में वह फंस रहा था। फंस रहा था ईएमआई में। फंस रहा था स्टेटस की दौड़ में। फंस रहा था तुलना में। वो हर महीने काम करता था। सैलरी के लिए सैलरी जाती थी खर्चों के लिए। पैसा उसके पास रुकता नहीं था। [संगीत] बढ़ना तो दूर की बात थी। वारेन बफेट की एक और लाइन है। अगर आप वो चीजें खरीदते
हैं जिनकी जरूरत नहीं है तो जल्द ही आपको वो चीजें बेचनी पड़ेंगी जिनकी जरूरत [संगीत] है। विजय को यह लाइन तब समझ में नहीं आई। उसे लगा कार जरूरी है। उसे लगा बड़ा फ्लैट जरूरी है। उसे लगा दिखना जरूरी है। लेकिन जो जरूरी था फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, [संगीत] इमरजेंसी फंड, इन्वेस्टमेंट वो पीछे छूट गया। 23 की उम्र में उसे लगा मैं जीत गया। 25 की उम्र [संगीत] तक वो ईएमआई के हिसाब से महीने प्लान कर रहा था। 27 तक उसे सैलरी बढ़ने का इंतजार रहने लगा ताकि खर्च मैनेज हो [संगीत] सके। उसने कभी यह नहीं सोचा
कि पैसा उसके लिए कैसे काम करेगा। वो बस यही सोचता रहा कि वह पैसे के लिए कितना काम कर सकता है और यही लाइफस्टाइल ट्रैप है जहां हर अपग्रेड तुम्हें ऊपर उठता हुआ दिखता है [संगीत] लेकिन धीरे-धीरे तुम्हें नीचे बांधता जाता है। विजय को सच में लगता था कि वो आगे बढ़ रहा है। लेकिन असल में वो [संगीत] एक सुनहरी जंजीर पहन चुका था जिसका नाम था ईएमआई। पार्ट तीन शुभम की कहानी जब विजय मुंबई की चमक में खो रहा था। उसी समय शुभम ने एक बिल्कुल अलग फैसला लिया। उसने एक्सपेंसिव मुंबई छोड़कर पनवेल में
रहना शुरू किया। उस समय 2009 था। आज का डेवलप्ड नवी मुंबई नहीं तब का पनवेल चारों तरफ धूल अधूरे रोड खाली प्लॉट कुछ आधी बनी बिल्डिंग्स। लोग मजाक उड़ाते थे। कहते थे यहां कौन रहेगा? मुंबई छोड़कर यहां आ गया। नो कैरियर बनाना है या गांव [संगीत] बसाना है। लेकिन शुभम भीड़ को नहीं देख रहा था। वो भविष्य देख रहा था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे। पहले कुछ महीनों तक तो नौकरी भी नहीं थी। खर्च चलाने के लिए पिताजी से पैसे मंगवाने पड़े। लेकिन एक चीज थी जो उसके पास थी। जानकारी [संगीत] वो रोज निकलता
था। साइट्स देखता था। डेवलपर्स से बात करता था। लोकल लोगों से पूछता था। [संगीत] मैप्स देखता था। सरकारी नोटिस पढ़ता था। उसे समझ आ रहा था कि [संगीत] पनवेल सिर्फ आज नहीं है। पनवेल 10-15 साल बाद क्या बनेगा। असली कहानी वहां है। मेट्रो की घोषणा हो चुकी थी। नए रोड प्रोजेक्ट्स की [संगीत] प्लानिंग थी। इंफ्रास्ट्रक्चर धीरे-धीरे तैयार हो रहा था। कमर्शियल डेवलपमेंट आने वाला था। लोग वर्तमान देख रहे थे। शुभम भविष्य पढ़ रहा था। उसे पता था कि रियलस्टेट में पैसा एक दिन में नहीं बनता। लेकिन अगर सही जगह और सही समय पर एंट्री हो
जाए, तो [संगीत] समय ही सबसे बड़ा पार्टनर बन जाता है। उसने एक छोटा सा निवेश किया। [संगीत] 10 लाख के आसपास उसके लिए यह छोटा नहीं था। यह उसकी और उसके परिवार की सालों की बचत थी। रिस्क था, डर भी था। लेकिन उसने जुआ नहीं खेला। उसने रिसर्च के बाद फैसला लिया। पहले कुछ साल कुछ खास नहीं हुआ। ना कीमत में बड़ा उछाल [संगीत] ना कोई चमत्कार। लोग फिर बोले, देखा कुछ नहीं हुआ। लेकिन रियल एस्टेट शोर नहीं करता। वो चुपचाप बढ़ता है। धीरे-धीरे रोड बेहतर हुए। फिर एक स्कूल खुला। फिर एक छोटा मॉल फिर
आसपास और बिल्डिंग्स बननी शुरू हुई। जो इलाका कभी सुनसान था वो धीरे-धीरे रहने लायक बन गया। और फिर वही हुआ जिसका शुभम इंतजार कर रहा था। 11 साल बाद वही प्रॉपर्टी जो 10 लाख में ली थी 90 लाख की हो चुकी थी। किसी एक दिन में नहीं किसी एक साल में नहीं बल्कि समय डेवलपमेंट और धैर्य के साथ। यही है पावर ऑफ कंपाउंडिंग का रियल एस्टेट वर्जन। सिर्फ प्रॉपर्टी की वैल्यू नहीं बढ़ी। [संगीत] रेंट भी बढ़ा। पहले छोटा रेंट मिला। फिर एरिया डेवलप हुआ तो रेंट बढ़ा। फिर डिमांड बढ़ी तो और बढ़ा। एक समय ऐसा
आया जब उस एक प्रॉपर्टी का रेंट उसकी सैलरी के बराबर पहुंच गया। यहीं से उसने दूसरा कदम उठाया। पहली प्रॉपर्टी से आने वाला रेंट दूसरी प्रॉपर्टी की ईएमआई में लगाया। दूसरी से [संगीत] तीसरी, तीसरी से चौथी, धीरे-धीरे चार प्रॉपर्टीज। उसने कभी अचानक अमीर बनने की कोशिश [संगीत] नहीं की। उसने बस समय को अपने साथ जोड़ लिया। लोग पूछते थे कब तक इंतजार करेगा? वो [संगीत] मुस्कुरा कर कहता जब तक समय मेरे लिए काम करना शुरू ना कर दे और एक दिन वही हुआ। उसकी सैलरी अब उसकी सबसे बड़ी इनकम नहीं थी। [संगीत] रेंट था। अब
वो काम कर रहा था क्योंकि वो करना चाहता था। जरूरत से नहीं। वो सुबह उठकर ऑफिस जाता था। लेकिन अगर कल छोड़ना पड़े तो जिंदगी नहीं रुकेगी क्योंकि उसके पास एसेट्स थे। एसेट्स जो हर महीने पैसे ला रहे थे। एसेट्स जो हर साल कीमत में बढ़ रहे थे, उसने कोई लॉटरी नहीं जीती। उसने कोई शॉर्टकट नहीं लिया। उसने सिर्फ एक काम किया। जल्दी शुरुआत की। सही जगह चुनी और धैर्य रखा। जहां बाकी लोग 5 साल में रिजल्ट चाहते थे। वो 10-15 साल की सोच रहा था। और यही फर्क था। वो काम नहीं कर रहा था।
उसके एसेट्स काम कर रहे थे। जब लोग सैलरी का इंतजार करते थे। वो रेंट की नोटिफिकेशन देखता था। जब लोग ईएमआई से बंधे थे, वह एसेट से आजाद हो चुका था। रियल एस्टेट ने उसे सिर्फ पैसा नहीं दिया, [संगीत] उसे समय दिया, सुकून दिया, चॉइस दी और यही असली अमीरी है। [संगीत] पार्ट चार आकाश की कहानी। जहां विजय लाइफस्टाइल में उलझ गया था और शुभम जमीन में भविष्य ढूंढ रहा था, वहीं आकाश ने एक तीसरा रास्ता चुना। ना ज्यादा शोर, ना ज्यादा [संगीत] दिखावा। उसे पता था कि स्टॉक मार्केट जल्दी अमीर बनने की जगह नहीं
है। लेकिन सही तरीके से खेलो तो यह धीरे-धीरे जिंदगी बदल सकता है। आकाश ने सबसे पहले अपने पैसों को सिस्टम दिया। उसने 50 30 20 रूल अपनाया। 50% जरूरतों के लिए 30% लाइफस्टाइल के लिए। 20% सीधा निवेश। उसने फैसला [संगीत] किया कि जो भी हो जाए या 20% कभी मिस नहीं होगा। सैलरी कम हो या ज्यादा महीने में कितना भी खर्च हो [संगीत] निवेश पहले कटेगा। वह कहता था अगर खुद को पहले पर नहीं करोगे तो जिंदगी भर दूसरों के लिए काम करते रहोगे। उसे याद थी वारेन बफेट की एक लाइन। खर्च के बाद जो
बचे उसे मत बचाओ। पहले बचाओ फिर जो बचे उसे खर्च करो। आकाश ने इसे नियम बना लिया। उसने शुरुआत की इंडेक्स फंड एसआईपी [संगीत] से। कोई हाई रिस्क स्टॉक नहीं। कोई टिप्स नहीं। कोई कोई शॉर्टकट नहीं। हर महीने ऑटो डेबिट चाहे मार्केट ऊपर हो या नीचे। शुरुआत में उसे बहुत एक्साइटमेंट नहीं मिला। ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ रहा था। कोई बड़ा जंप नहीं। कई बार मार्केट गिरता था और उसका पोर्टफोलियो लाल हो जाता था। दोस्त कहते थे देखा मार्केट जुआ [संगीत] है। लेकिन आकाश जुआ नहीं खेल रहा था। वह समय खरीद रहा था। उसने एक और नियम
जोड़ा। हर साल अपनी इन्वेस्टमेंट 10% बढ़ानी है। सैलरी बढ़े या ना बढ़े एसआईपी जरूर बढ़ेगी। पहले साल 5000 अगले साल 5500 फिर 6000 से ज्यादा धीरे-धीरे उसका निवेश बढ़ता गया। उसे वारेन बफेट की एक और बात याद रहती थी। स्टॉक मार्केट अधीर लोगों से पैसा लेकर धैर्यवान लोगों को देता है। आकाश अधीर नहीं था। उसने समझ लिया था कि मार्केट में अमीर वही बनता है जो टिकता है। [संगीत] लेकिन वह यहीं नहीं रुका। उसे समझ आ गया कि सिर्फ सैलरी से बड़ा कॉरपस बनाना मुश्किल है। इसलिए उसने साइड इनकम बनानी शुरू की। शाम को फ्रीलांसिंग
[संगीत] वीकेंड पर छोटे आईटी प्रोजेक्ट्स ऑनलाइन स्किल्स सीखना। उसने कोडिंग सुधारी। डाटा टूल्स सीखे। छोटे-छोटे क्लाइंट्स लिए। शुरुआत में एक्स्ट्रा 5000 मिलते थे। फिर 10,000 फिर कभी-कभी 20,000 भी उसने उस एक्स्ट्रा इनकम को खर्च नहीं किया। सीधा निवेश में डाल दिया। अब उसकी एसआईपी सिर्फ सैलरी से नहीं चल रही थी। [संगीत] उसके स्किल्स भी उसके लिए पैसा बना रहे थे। धीरे-धीरे उसके मल्टीपल इनकम सोर्स [संगीत] बन गए। जॉब इनकम, फ्रीलांसिंग इनकम, बोनस इनकम। हर बार वही नियम पहले निवेश। कई बार मार्केट क्रैश हुआ। उसका पोर्टफोलियो गिरा। लोग पैनिकिक में बेच रहे थे। लेकिन उसे बफेट
की लाइन याद थी। जब [संगीत] लोग लालची हो तो डरिए और जब लोग डर रहे हो तो लालची बनिए। जब सब डर रहे थे आकाश ने एसआईपी बढ़ा दी क्योंकि उसे पता था कि डिस्काउंट पर खरीदना ही लॉन्ग [संगीत] टर्म वेल्थ का आधार है। साल दर साल उसका कॉर्पस बढ़ता गया। पहले दो-ती साल में ग्रोथ छोटी थी। फिर कंपाउंडिंग ने असर दिखाना शुरू किया। पहले जो इंटरेस्ट मिलता था वह छोटा था। फिर इंटरेस्ट पर इंटरेस्ट जुड़ने लगा। फिर वही इंटरेस्ट उसकी एनुअल कंट्रीब्यूशन से भी ज्यादा होने लगा। यहीं पर उसने असली मैजिक महसूस किया। उसे
समझ आया कि पैसा कमाने से ज्यादा जरूरी है पैसा टिकाना और उसे समय देना। 10 साल के अंदर उसका पोर्टफोलियो इतना बड़ा हो चुका था कि [संगीत] अगर वह चाहे तो बेसिक खर्च इन्वेस्टमेंट रिटर्न से कवर हो सकते थे। वह अब काम इसलिए कर रहा था क्योंकि उसे करना अच्छा लगता था। ना कि इसलिए क्योंकि ईएमआई भरनी है। वह अक्सर कहता था रिस्क वहां से आता है जहां समझ नहीं होती। उसने बिना समझे कभी निवेश नहीं किया। उसने धैर्य को स्किल बना लिया। धीरे-धीरे उसकी इन्वेस्टमेंट इनकम उसकी लाइफस्टाइल कॉस्ट को पकड़ने लगी। और एक दिन
उसने कैलकुलेट किया। अगर यही ग्रोथ रेट 5 साल और चला तो वह फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हो जाएगा। ना कोई लॉटरी, ना कोई क्रिप्टो गैंबल, ना कोई ओवरनाइट सक्सेस। [संगीत] सिर्फ डिसिप्लिन, कंसिस्टेंसी और कंपाउंडिंग। जब लोग सैलरी इंक्रीमेंट का इंतजार कर रहे थे, आकाश कंपाउंडिंग [संगीत] इंक्रीमेंट देख रहा था। वह समझ चुका था कि असली आजादी हाई इनकम से नहीं आती। फाइनेंशियल कंट्रोल से आती है। और इसीलिए वह मुस्कुरा कर कह सकता था मैं काम करना चाहता हूं मजबूरी में नहीं। यही था उसका गेम। स्टॉक मार्केट प्लस सर डिसिप्लिन प्लस टाइम। और यही वजह थी कि उसकी
कहानी चुपचाप चल रही थी। लेकिन सबसे स्थिर थी। 7 3 [संगीत] 2 रूल ऑफ कंपाउंडिंग। अब ध्यान से समझो क्योंकि यही वो जगह है जहां ज्यादातर लोग [संगीत] गलती कर देते हैं। लोग सोचते हैं कि पैसा तभी बड़ा बनता है जब बहुत बड़ा अमाउंट लगाया जाए। लेकिन सच्चाई यह है कि पैसा अमाउंट से नहीं रेट और टाइम से [संगीत] बढ़ता है। 7 3 दो रूल इसी खेल को आसान भाषा में समझाता है। अगर आपको औसतन 10% का रिटर्न मिलता है तो आपका पैसा लगभग 7 साल में दो गुना हो जाता है। मान लो आपने 1
लाख निवेश किए अगर 10% सालाना रिटर्न मिलता है तो लगभग 7 साल में वह 2 लाख के आसपास हो जाएगा। यह सुनने में बहुत रोमांचक नहीं लगता। 7 साल इंतजार और सिर्फ दोगुना। यही वजह है कि ज्यादातर लोग बीच में ही रुक जाते हैं। क्योंकि पहले 7 साल कंपाउंडिंग का सबसे धीमा हिस्सा होता है। यही वो फेज है जहां लोग पेशेंस खो देते हैं। पहले साल में 10% का मतलब सिर्फ 10,000 की बढ़त। दूसरे साल 10% अब 12,000 पर लगेगा। तीसरे साल 12,21,000 पर। शुरुआती बढ़त छोटी दिखती है। धीमी लगती है, उबाव लगती है। लेकिन
असली खेल यहां से शुरू होता है। पहले 7 साल बेस बनता है। इन सात सालों में आप अमीर नहीं बनते। आप नीम बनाते हैं। जमीन तैयार करते हैं। गति इकट्ठी करते हैं। जब 1 लाख2 लाख बनता है तब लोग कहते हैं बस इतना। लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि अब आगे जो [संगीत] होगा वह अलग होगा। अब शुरू होते हैं अगले 3 साल। जब 2 लाख पर 10% लगता है तो बढ़त अब 20,000 की होती है। [संगीत] 10,000 की नहीं। यही फर्क है। अब पैसा खुद भी कमाने लगा है। अब आपका पैसा आपके लिए
काम कर रहा है। अगले 3 साल ग्रोथ तेज होती है। क्योंकि अब हर साल की बढ़त पिछले साल से बड़ी होती जाती है। ग्राफ अब थोड़ा ऊपर उठता दिखने लगता है और फिर आते हैं आखिरी 2 साल। [संगीत] यही वो फेज है जिसे एक्सप्पोनेंशियल जंप कहते हैं। जब बेस बड़ा हो जाता है तो 10% भी बड़ा बन जाता है। अगर आपके पास 4 लाख हैं तो 10% मतलब 40000 अगर 8 लाख हैं तो 10% मतलब 80 अब बढ़त सैलरी जैसी लगने लगती है। और यही है कंपाउंडिंग का जादू। पहले 7 साल में आप मेहनत करते
हैं। अगले 3 साल में मेहनत का असर दिखने लगता है। आखिरी 2 साल में पैसा रॉकेट की तरह भागता है। इसीलिए इसे 7 3 2 रूल [संगीत] कहा जाता है। यह कोई जादुई फार्मूला नहीं है। यह समय का गणित है। शुरुआत में लाइन सीधी लगती है। धीरे-धीरे कर्व बनता है। फिर वही कर्व तेजी से ऊपर उठता है। कंपाउंडिंग शुरू में बोरिंग लगती है। धीमी लगती है। लगता है कुछ हो ही नहीं रहा। लेकिन असल में [संगीत] अंदर ही अंदर गति बन रही होती है। जैसे हवाई जहाज रनवे पर दौड़ता है। शुरू में लगता है बस
चल रहा है। फिर अचानक जमीन छोड़ देता है। कंपाउंडिंग भी वैसी ही है। [संगीत] जितना जल्दी शुरू करोगे उतना ज्यादा रनवे मिलेगा। अगर आप बीच में रुक गए तो प्लेन कभी उड़ान नहीं भरेगा। 7 साल धैर्य चाहिए। [संगीत] 3 साल भरोसा चाहिए। 2 साल में चमत्कार दिखता है। लेकिन वह 2 साल उन्हीं को मिलते हैं जो पहले 7 साल टिके रहते हैं। यही है 7 तीन दो रूल ऑफ कंपाउंडिंग। धीरे शुरू होता है फिर तेज होता है और एक समय बाद अनस्टपेबल हो जाता है। अब इसे बहुत सरल तरीके से समझते हैं। दो मान लो
कोई 25 साल की उम्र में हर महीने 5000 की एसआईपी शुरू करता है। रिटर्न मान लेते हैं औसतन 12% सालाना। 5000 सुनने में बड़ा अमाउंट नहीं लगता। कई लोग कहते हैं इससे क्या होगा? लेकिन खेल अमाउंट का नहीं समय का है। अगर यही 5000 हर महीने लगातार 30 साल तक निवेश किए जाएं तो 55 साल की उम्र तक पहुंचते। पहुंचते यह रकम करोड़ के आसपास पहुंच सकती है। [संगीत] ध्यान देना यह जादू नहीं है। यह लॉटरी नहीं है। यह कोई अचानक बड़ा मुनाफा नहीं है। यह हर महीने की छोटी सी आदत है जो समय के
साथ मिलकर विशाल बन जाती है। अब यही उदाहरण बदलते हैं। अगर वही 5000 की एसआईपी कोई 35 साल की उम्र में शुरू करें और 55 तक यानी सिर्फ 20 साल [संगीत] निवेश करें तो उसका फाइनल कॉर्पस लगभग आधा रह जाएगा। [संगीत] अमाउंट वही, रिटर्न वही, डिसिप्लिन वही, फिर भी परिणाम अलग। क्यों? क्योंकि कंपाउंडिंग को सिर्फ एक चीज चाहिए। टाइम 25 साल की उम्र में शुरू करने वाले को 10 साल एक्स्ट्रा मिलते हैं और वही 10 साल सबसे ज्यादा ताकतवर होते हैं। शुरुआती सालों में पैसा छोटा लगता है। लेकिन जैसे [संगीत] जैसे बेस बड़ा होता है,
इंटरेस्ट पर इंटरेस्ट जुड़ता जाता है। पहले आपका निवेश बढ़ता है, फिर उस निवेश पर रिटर्न बढ़ता है। फिर उस रिटर्न पर भी रिटर्न बढ़ता है। यही कंपाउंडिंग का असली खेल है। वारेन बफेट का फार्मूला। वारेन बफेट कहते हैं, डू नॉट से व्हाट इज लेफ्ट आफ्टर स्पेंडिंग? स्पेंड व्हाट इज लेफ्ट आफ्टर सेविंग। [संगीत] यह लाइन सुनने में बहुत साधारण लगती है। लेकिन यही अमीरी का आधार है। ज्यादातर लोग क्या करते हैं? पहले खर्च [संगीत] फिर बचत। और जब कुछ बचता ही नहीं तो निवेश कहां से होगा? बफेट की ताकत सिर्फ उनका दिमाग नहीं था। उनकी असली
ताकत थी अर्ली [संगीत] स्टार्ट प्लस पेशेंस। उन्होंने बहुत जल्दी निवेश शुरू किया और उससे भी बड़ी बात उन्होंने बीच में रुकना नहीं सीखा। उनकी ज्यादातर संपत्ति 50 साल की उम्र के बाद बनी। क्यों? क्योंकि तब तक कंपाउंडिंग ने दशकों का समय जमा कर लिया था। सबसे बड़ी गलती क्या है? लेट शुरू करना। [संगीत] 25 में शुरू करो इक्वल फ्रीडम। 35 में शुरू करो इक्वल प्रेशर। [संगीत] 25 में शुरू करोगे तो समय तुम्हारे साथ होगा। 35 में शुरू करोगे तो समय तुम्हारे खिलाफ दौड़ रहा होगा। जो 25 में शुरू करता है, वह धीरे-धीरे बेस बनाता है।
उसे कंपाउंडिंग के पूरे 30 [संगीत] साल मिलते हैं। जो 35 में शुरू करता है, उसे वही मंजिल पाने के लिए ज्यादा अमाउंट लगाना पड़ता है। ज्यादा रिस्क लेना पड़ता है और ज्यादा तनाव झेलना पड़ता है। टाइम खरीदा नहीं जा सकता। लोन से नहीं, हाई सैलरी से नहीं। आप सैलरी बढ़ा सकते हैं। इन्वेस्टमेंट बढ़ा सकते हैं। रिस्क बढ़ा सकते हैं लेकिन समय नहीं बढ़ा सकते। यही वजह है कि अर्ली स्टार्ट एक अनफेयर एडवांटेज है। फाइनल कंपैरिजन 36 की उम्र में तस्वीर साफ हो चुकी थी। शुभम फाइनेंशियली फ्री। उसके एसेट्स उसके [संगीत] लिए काम कर रहे थे।
आकाश 5 साल में रिटायरमेंट की तैयारी। उसका कॉरपस इतना बड़ा हो चुका था कि पैसिव इनकम बनने लगी थी। विजय 20 साल ईएमआई बाकी। सैलरी बढ़ी थी लेकिन खर्च उससे तेज बड़े थे। फर्क कमाई में नहीं था। [संगीत] फर्क सोच और डिसिप्लिन में था। सैलरी कम होना प्रॉब्लम नहीं है। बहुत लोग कम सैलरी [संगीत] से शुरुआत करते हैं। हैबिट्स असली प्रॉब्लम है। अगर आदत है पहले खर्च करने की तो लाख कमाओ या 10 लाख कमी महसूस होगी। अर्ली स्टार्ट इक्वल अनफेयर एडवांटेज। जितना जल्दी शुरुआत उतना लंबा रनवे। कंपाउंडिंग स्लो शुरू होती है। पहले बोरिंग लगती
है, [संगीत] धीमी लगती है। लेकिन जो टिके रहते हैं उनके लिए वही कंपाउंडिंग अनस्टपेबल [संगीत] बन जाती है। आखिर में अमीर वो नहीं बनता जो सबसे ज्यादा कमाता है। अमीर वो [संगीत] बनता है जो सबसे ज्यादा समय तक डिसिप्लिन रहता है। अगर आज की कहानी में कहीं ना कहीं [संगीत] तुम्हें अपना चेहरा दिखा। अगर तुम्हें लगा कि तुम भी विजय की तरह दौड़ रहे हो या तुम शुभम और आकाश की तरह सिस्टम बनाना चाहते हो [संगीत] तो अब फैसला तुम्हारे हाथ में है। अगर आप चाहते हो कि मैं 5000 से 500 तक की पूरी एसआईपी
स्ट्रेटजी [संगीत] स्टेप बाय स्टेप ब्रेकडाउन करूं। एक ऐसा अर्ली रिटायरमेंट रोड मैप बनाऊं जिसे मिडिल क्लास रियलिस्टिकली फॉलो कर सके और एक प्रैक्टिकल इन्वेस्टिंग गाइड दूं जो थ्योरी नहीं [संगीत] ग्राउंड रियलिटी पर बेस्ड हो। तो कमेंट करो फाइनेंसियल फ्रीडम। मैं समझ जाऊंगा कि आप रेडी हो अगला लेवल अनलॉक करने के लिए। वीडियो पसंद आई हो तो लाइक जरूर करो। आपका एक लाइक सिर्फ एक क्लिक नहीं है। [संगीत] वो सिग्नल है कि ऐसा कंटेंट और बनना चाहिए। और अगर तुम सच में चाहते हो कि तुम सैलरी के पीछे भागना बंद करो और पैसा तुम्हारे लिए काम
करना शुरू करे [संगीत] तो चैनल सब्सक्राइब करो। लेजेंड ऑफ़ फाइनेंस क्योंकि यहां हम शॉर्टकट्स नहीं बेचते। यहां हम ओवरनाइट सक्सेस की कहानी नहीं सुनाते। यहां हम हाइप नहीं सिस्टम सिखाते [संगीत] हैं। मिलते हैं अगली वीडियो में। तब तक कमाओ नहीं समझदारी से बढ़ाओ।