राजकुमारी चंद्र किरण इतनी सुंदर थी कि सातों द्वीपों में उसके समान दूसरा कोई नहीं था उसकी सुंदरता ऐसी कि चंद्रमा भी उसके सामने शर्मा जाए नयन नक्ष ऐसे कि हिरनी भी उसके सामने पानी भरे राजकुमारी चंद्र किरण जब चलती तो उसकी मदमस्त चाल देखकर नागिन को भी अपनी चाल व्यर्थ लगती उसके चेहरे की लालिमा के सामने पुष्प भी लज्जा जाते नंदनगर पर वीर सेह नामक राजा राज्य करता था राजा का सुंदर नाम का एक बेटा था सुंदर बड़ा रूपवान बलशाली और बुद्धिमान था एक दिन नंदनगर में एक सौदागर आ पुराने जमाने में राजा महाराजाओं को
खुश करने के लिए सौदागर एक से बढ़कर एक अद्भुत अद्वित और निराली वस्तुएं लेकर आते थे सौदागर को आया देख राजकुमार सुंदर ने पूछा बताओ सौदागर अबकी बार क्या नया लाए हो सौदागर ने जी प्रभु कहते हुए राजकुमार सुंदर को एक फोटो दिखाई वो फोटो विश्व सुंदरी राजकुमारी चंद्र किरण की थी जब राजकुमार ने उसे देखा तो देखता ही रह गया इतनी सुंदर स्त्री उसने अपने जीवन में तो क्या अपने सपनों में भी नहीं देखी थी राजकुमारी के नैन नक्ष देखकर राजकुमार अपनी सुद्ध बुध हो बैठा ध्यान टूटा तो उसने सौदागर से पूछा कौन है
यह सुंदरी तब सौदागर ने उसे बताया कि हे राजकुमार सात समुंदर पार एक कंचनपुर नाम का शहर है जहां इंद्रसेन नाम का निर्दय राजा राज करता है जो छोटे से छोटे अपराध के लिए मृत्यु दंड देता है यह सुंदरी उसी की पुत्री राजकुमारी चंद्र किरण है राजकुमार ने खुश हो सौदागर को बहुत से हीरे जवाहरात इनाम के तौर पर देकर विदा किया और अपने मन में विचार किया जब तक यह स्त्री उसे नहीं मिल जाती उसका जीना व्यर्थ है अगर वो है तो सब है वो नहीं तो कुछ भी नहीं चाहे मुझे इसके लिए कुछ
भी कर गुजरना पड़े पर अब तो बस राजकुमारी चंद्र किरण को हासिल करना ही मेरे जीवन का इकलौता मकसद है उसने तुरंत राजसी वस्त्र त्याग दिए और भगवा बाणा धारण कर लिया और एक साधु का भेष बना जंगल की ओर चल दिया जब राजकुमार के जंगल में जाने का समाचार राजा को मिला तो वो राजकुमार के पास आया और बोला बेटा ऐसा क्या दुख हो गया तुझे जो तू राजसी जीवन छोड़ एक फकीर बनने चला हमारे बुढ़ापे का सहारा और होने वाला राजा है तू फिर ये कदम क्यों अपने पिता की बात सुनकर राजकुमार बोला
पिता श्री आपसे हाथ जोड़कर विनती है मेरी बात ध्यान से सुनना मेरे मन में अब चंद्र किरण बस चुकी है मुझे उसके सिवाय और कुछ भी नहीं दिखता राजा बोला बेटा तुम समझदार हो क्यों नादान जैसी बात कर रहे हो आज तक चंद्र किरण के द्वार पर जो भी गया वह वापस लौटकर नहीं आया उसके चक्कर में पता नहीं कितने ही अपनी जान से हाथ धो बैठे पिता की बात को सुनकर राजकुमार बोला पिताजी अब मुझे रोकने की कोशिश मत करिए अब मैं रुकने वाला नहीं अगर मेरे शरीर में प्राण है मैं जीवित हूं तो
मैं जरूर जाऊंगा इतना कह राजकुमार सुंदर वहां से चलने को हुआ तो उसकी माता जी वहां आ गई और बोली मेरे लाड़ले तेरे बिना मैं तड़प तड़प कर मर जाऊंगी ऐसा मत करो क्यों अपना राज पाठ छोड़ तुम मृत्यु को गले लगाने जा रहे हो पर राजकुमार पर उसकी मां की बातों का भी कोई असर नहीं हुआ बोला नहीं माता जी मुझे मत रोकिए अगर मैं नहीं गया तो यही अपने प्राण त्याग दूंगा और चल पड़ा राजकुमारी चंद्र किरण को देखने की व्याकुलता में अभी राजकुमार ने कुछ कदम ही आगे बढ़ाए थे कि तभी उसकी
सुंदर रूपवती कामिनी पत्नी भी वहां आ पहुंची रानी ने दोहा कहा पास तेरे कामिनी खड़ी कर 16 श्रृंगार छोड़ चले मझधार में कहां मुझे भरतार अर्थात इतनी इतनी सुंदर पत्नी होते हुए भी मुझे ऐसे छोड़कर क्यों जा रहे हो राजकुमार सुंदर ने भी दोहे के रूप में कहा रानी मन धीरज धरो मति दिल करो उदास चंद रोज के बीच में लौट आऊं तेरे पास अर्थात उदास मत हो रानी थोड़े दिन में वापस तेरे पास आ जाऊंगा इतना कह राजकुमार सुंदर वहां से चल पड़ा सुंदर की बात सुनकर रानी गश खाकर जमीन पर गिर पड़ी परंतु
सुंदर बिल्कुल प्रभावित ना हुआ वह सबसे प्रेम नाथे तोड़कर वन की ओर रवाना हुआ उसे तो अब बस राजकुमारी चंद्र किरण की लगन लगी हुई थी काफी दिन यात्रा करने के पश्चात राजकुमार सुंदर कंचनपुर जा पहुंचा और राजकुमारी के महल के सामने आसन जमाकर बैठ गया संयोग वश एक दिन राजकुमारी जब महल की खिड़की में खड़ी थी तो उसकी दृष्टि उस जोगी बने सुंदर पर पड़ी राजकुमार सुंदर तो बावला हुआ पता नहीं कितने दिन से इसी पल के इंतजार में वही टकटकी लगाए देख रहा था राजकुमारी चंद्र किरण ने जैसे ही राजकुमार सुंदर को देखा
वह भी उस हट्टेड शरीर वाले सुंदर नौजवान की आशिक हो गई और कहने लगी हे योगी तुम कौन हो और ऐसा क्या कारण रहा कि तुमने भरी जवानी में अपने देश और गृहस्थ जी जी वन को छोड़कर यह भगवा बाणा पहना और जोगी बन गए राजकुमार सुंदर ने राजकुमारी का प्रति उत्तर देते हुए कहा हे विश्व सुंदरी नजर कर तू मेरी तरफ है प्यारी मोहब्बत तेरी मेरे दिल में है भारी तेरा हुस्न मशहूर है हर जहां तुझे जाने आलम सभी चाह रहा ये है पूरब से आया अब खाकसार मेरा नाम आशिक है ऐ गुल अनार
तेरा हुस्न यहां खींच लाया मुझे जब से तेरा नाम और फोटो दिखा मुझे आगे राजकुमार सुंदर कहता है ऐ हुस्न की मल्लिका जब से तेरा नाम मैंने सुना है तब से मेरा चयन और सुकून सब सब छिन गया है अगर तू मुझे नहीं मिली तो मेरा जीना बेकार है चंद्र किरण राजकुमार की बात सुन बोली योगी तेरा रूप देखकर तो मेरा दिल भी हिलोरे मार तेरे लिए धड़क रहा है पर मुझे अफसोस इस बात का है कि औरों की तरह कहीं तुझे भी अपने प्राणों से हाथ ना धोना पड़े राजकुमारी चंद्र किरण की बात सुन
राजकुमार सुंदर ने दोहा कहा होना होगा सो होवेगा इसमें नहीं अंदेश प्रिय तेरे कारण तजा मैंने राज और देश अर्थात अब जो होगा देखा जाएगा तुम्हारे लिए तो मैं अपना राज्य पाठ और देश तक छोड़ आया हूं राजकुमार सुंदर की बात सुनकर चंद्र के बोली ऐ जोगी मेरे प्रेम में तेरे प्राणों का भी खतरा है क्योंकि जो भी मुझसे प्रेम करता है मेरे पिता उसको मरवा देते हैं या फिर उसे सदा के लिए कैद कर लेते हैं अब भी उनकी कैद में बहुत से व्यक्ति पड़े सड़ रहे हैं इसलिए उचित यही है कि तू अपने
देश वापस चला जा मेरे प्रेम के चक्कर में फंसकर अपने प्राण मत गवा यह सुनकर श्याम सुंदर ने उत्तर दिया तेरा इश्क मुझको लाया यहां भला अब कहो तुम मैं जाऊं कहां यह डर अपने दिल में लाता नहीं बिना लिए तुझको मैं जाता नहीं दोहा कह श्याम सुंदर बोला हे राजकुमारी मेरी परेशानी को थोड़ा ध्यान से देखो तुम तुम्हारे प्यार की खातिर मैं मुश्किलों से लड़ते हुए बर्बाद हालत में तुम्हारे पास पहुंचा हूं यह सुन चंद्र किरण ने खिड़की से एक रस्सी डाली जिस पर चढ़कर खुश होता हुआ राजकुमार सुंदर राजकुमारी के महल में प्रवेश
कर गया उसे अपनी किस्मत पर नाज हो रहा था राजकुमार के ऊपर आते ही चंद्र किरण उसके गले में बाहें डालकर कहने लगी ए हसीन नौजवान तुझसे पहले भी पता नहीं कितने ही मेरे आशिक आए और मेरे पिता के दंड की भेंट चढ़ गए कितने ही मौत के घाट उतार दिए गए कितने ही जेलों में बंद पड़े हैं पर पता नहीं क्यों ना कभी किसी के लिए मेरे अंदर के जज्बात जागे और ना ही उनकी सजा पर मेरा हृदय पसीजा पर तुम्हारी बात कुछ और है तुम उन सबसे अलग हो तुम पहली नजर में ही
मुझे भा गए राजकुमारी चंद्र किरण के मुख से अपने लिए इतनी प्रशंसा सुनकर राजकुमार सुंदर भी गदगद हो गया उसे अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था कि राजकुमारी चंद्र किरण उसे इतनी आसानी से मिल जाएगी दोनों का इश्क परवान चढ़ने लगा अब तो राजकुमार सुंदर ऐसे ही हर रात को राजकुमारी चंद्र किरण के पास आता और सुबह होने के करीब होती तो रस्सी के सहारे उतर कर चुपचाप दबे पांव महल से चला जाता कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक चलता रहा दोनों रात में मिलते और प्रेम लाभ करते इस तरह दोनों को ऐशो आराम
करते-करते बहुत दिन बीत गए पर फिर एक दिन रात के अंतिम पहर में जब राजकुमार सुंदर वापस जाने लगा तो कोतवाल ने उसे देख लिया और कहा कौन है तू जो आधी रात को राजकुमारी के महल से आ रहा है क्या चुराया है तूने राजकुमार सुंदर ने माफी मांगते हुए कहा नहीं कोतवाल साहब मैं कोई चोर नहीं हूं पर कोतवाल पर उसकी बातों का कोई असर नहीं हुआ और तुरंत सिपाहियों को बुला उसे पकड़वा दिया और कहा ले जाओ इस बदमाश को इसने सारी प्रजा को परेशान कर रखा है सुबह हुई तो राजकुमार सुंदर को
राजा के सामने राज दरबार में पेश किया गया कोतवाल ने राजा से कहा महाराज यह बहुत बड़ा चोर है रात यह महल में चोरी करने गया था जब यह उतर कर जा रहा था तो मैंने इसे पकड़ लिया राजा ने कोतवाल को शाबाशी देते हुए उसकी तारीफ की फिर सिपाहियों को आदेश दिया ले जाओ इस बदमाश को और बंद कर दो सबसे अंधेरे वाले कमरे में और सुबह श्याम इसको खाने की बजाय 50-50 कोड़े मारे जाए राजा का आदेश सुन तुरंत सिपाही राजकुमार सुंदर को पकड़ ले गए जब यह बात चंद्रकिरण को पता लगी कि
उसके प्रेमी को राजा ने कैद कर लिया है और राजा ने सख्त सजा की आज्ञा दी है तो वह बेहोश होकर गिर पड़ी राजकुमारी चंद्र किरण को जब होश आया तब विलाप करते हुए कहने लगी हाय मेरे दुराचारी निर्दय पिता ने मेरे प्राणों से भी प्यारे साजन को कैद कर लिया है बिना मेरे साजन के यह नीरस जिंदगी मुझे भी नहीं जीनी मैं आग में कूदकर अपने प्राण त्याग दूंगी जब दासी ने राजकुमारी चंद्र किरण के मुख से यह बात सुनी तो वह घबरा गई और उसको धीरज धरने के लिए कहने लगी तब चंद्र किरण
बोली हे सखी मैं किस प्रकार धीरज थरूं मुझे पिया के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता इस प्रकार चंद्र किरण हर समय राजकुमार श्याम सुंदर के विरह में व्याकुल होकर रोती रहती अब मैं यहां का किस्सा समाप्त करके राजकुमार श्याम सुंदर की पहली पत्नी का हाल बताता हूं रानी भी अपने पति के विरह में बुरी तरह व्याकुल रहती थी और अपना एक एक दिन राजकुमार सुंदर के इंतजार में काट रही थी एक दिन की बात है कि रानी अपनी चित्र सारी में सो रही थी कि अचानक उसने एक सपना देखा कि एक बच्चा रानी से
कह रहा है रानी तेरा पति श्याम सुंदर कंचनपुर में कैद हो गया है यह स्वप्न देखकर रानी एकदम चौक कर उठकर बैठ गई और व्याकुल होकर चिल्ला चिल्लाकर रोने लगी हाय ये क्या हो गया रोने की आवाज सुनकर दासिया दौड़ी हुई आई और कहने लगी क्या हुआ महारानी ऐसे दहाड़े मार-मार कर क्यों रो रही है आपको क्या पीड़ा है रानी घबराकर बोली मैं सो रही थी कि एक बच्चे ने आवाज दी और कहा कि तू यहां सो रही है वहां तेरा पति कंचनपुर में कैद हो गया है ऐ दासी वह जल्दी आने का वचन देकर
गए थे मगर अभी तक नहीं लौटे ऐसा प्रतीत होता है कि वह अवश्य ही किसी विपत्ति में पड़ गए हैं और गिरफ्तार हो गए हैं वो कंचनपुर के राजा की कैद में बड़ा मुश्किल समय काट रहे हैं अब मुझे ही कुछ करना होगा अपने पति की सहायता के लिए मैं जोगिन बनकर खुद कंचनपुर जाऊंगी रानी की यह बात सुनकर उसकी दासी बोली महारानी आप दिन रात रो-रो कर क्यों स्वयं को नष्ट कर रही हैं आपने बस एक बुरा सपना देखा है आपके पति कुशल पूर्वक हैं और जल्दी ही वे सही सलामत आपके पास लौट आएंगे
रानी बोली नहीं दासी वो सपना बिल्कुल सत्य है मेरा दिल कह रहा है मैं अपने पति परमेश्वर को तलाश करने अवश्य जाऊंगी मेरे पीछे से मां पिताजी का अच्छे से ख्याल रखना इतना कह रानी कंचनपुर जाने की तैयारी में लग गई रानी ने अपने वस्त्र उतार दिए शाही वस्त्रों के साथ सारा श्रृंगार जेवर भी उतार भगवा वस्त्र पहन जोगन के भेष में आ गई फिर हाथ में वीणा लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ी अपने पति की तलाश में निकली रानी बहुत दिनों तक शहरों जंगलों की खाक छानती छाते कंचनपुर जा पहुंची वहां जाकर उसने
लोगों से अपने पति का हाल पता किया तो लोगों ने बताया कि उसे तो राजा ने चोरी करने के अपराध में कैद कर लिया है यह सुनकर रानी बहुत घबराई और सोचने लगी कि अब क्या उपाय करना चाहिए जिससे प्राणनाथ को स्वतंत्र कराया जा सके कुछ सोच विचार कर जब रानी ने वहां के लोगों से राजा के बारे में पूछा कि राजा को किस चीज का शौक है तब लोगों ने बताया कि राजा को संगीत सुनने का बहुत शौक है यह सुनकर रानी के मन को धीरज बंधा क्योंकि गायन विद्या में में वह निपुण थी
अब रानी ने शहर के प्रमुख स्थानों पर जाकर गाना प्रारंभ कर दिया थोड़े दिनों में ही वह प्रसिद्ध हो गई एक दिन शाम के समय वह किसी उद्यान में खड़ी वीणा हाथ में लिए रागिनी अलापने लगी वहां मौजूद भीड़ ने जोगन बनी रानी की खूब तारीफ की जोगन जहां भी जाती उसकी मधुर वाणी और सुंदर शायरी से लोगों की भीड़ जमा हो जाती लोग उसकी गायन विद्या की तारीफ करते नहीं थकते उड़ते उड़ते जोगन की प्रशंसा राजा के कानों तक भी जा पहुंची राजा ने उसी समय चौपारण दी कि नगर के उद्यान में जो जोगन
ठहरी हुई है उसे सम्मान पूर्वक हमारी सभा में ले आओ चोपार तुरंत जोगन बनी रानी के पास जा पहुंचा और हाथ जोड़कर कहा ए जोगिन राजा जी ने आपको याद किया है कृपया मेरे साथ राज दरबार चलिए रानी बोली ऐ चोपार हमें राजा के दरबार से क्या काम हम तो मन के मौजी हैं जहां इच्छा होती है वहीं जमावड़ा डाल लेते हैं जिस स्थान पर हम आसन जमाकर बैठ जाते हैं हमें तो वही स्थान राज दरबार प्रतीत होता है जोगिन की बात सुनकर चोपार बोला जोगिन जी आपको तो ऐसा ज्ञान प्राप्त है कि लाखों राजा
महाराजा आप की सेवा में खड़े रह लेकिन फिर भी यह आपका धर्म है कि जो व्यक्ति आपसे हरि गुण सुनना चाहे उसे सुना दो रानी तो चाहती ही ये थी यही तो शुरू से उसकी योजना थी सो जोगिन चलने को तैयार हो गई जब रानी चोपार के साथ राजा के महल में गई तो उसे देखकर सब लोग सम्माना खड़े हो गए उसके दरबार में आते ही सन्नाटा छा गया नौकरों ने उसे मृग छाला सान दिया तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा ऐ जोगिनी तुम कौन हो और कहां से आई हो तब जोगिनी बोली हम पर्वतों
और रत्नों की भूमि में रहकर दिन रात ओम का नाम जपक सादगी से भरा जीवन जीते हैं उसी में हमें खुशी मिलती है राजा बोला ठीक है जोगिनी तो अपने मुख से हरि का कुछ गुणगान कीजिए यही हम सबकी अभिलाषा है तब जोगिन ने यह राग गाया यह जोगति हमें भाया है छोड़ दिया माल खजाना हीरा मोती लुटाया है फेंक फांक के शाल दुशाला जग से चित्त उठाया है इश्क फंद में छोड़ कानन कुल माशूक बनाया है धीरज धर्म सब छोड़ दिया जब मजा फकीरी पाया है जंगल में अब रहता है दिल बस्ती से घबराया
है चाक गिरे बा करके अपना आह भरना चाहा है रतन लाल अब इश्क रैन दिन सब यह खेल खिलाया है जोगिन बनी रानी की यह रागिनी सुन पूरी सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी राजा भी अपना आसन छोड़ खड़ा हो रानी की इस अद्भुत रागिनी को अपनी तालियों के साथ सम्मान देता है राजा की खुशी देख रानी को अपना मकसद पूरा होता हुआ दिखता है जोगिन का राग सुन राजा खुश हो जोगिन से कहता है जोगिन तुम्हारा राग सुनकर बेहद खुशी हुई बहुत दिनों के बाद मेरा दिल इतना खुश हुआ है मांगो जो भी
तुम मांगना चाहो आज मेरा हृदय बहुत खुश है तुम जो भी मांगोग मैं अवश्य दूंगा यह सुनकर जोगिन ने कहा हे राजा मेरा पति तुम्हारी बेटी चंद्र किरण के प्रेम में फंसकर यहां आया और तुमने उसे कैद कर लिया है मैं उसको मांगती हूं कि तुम उसे छोड़ दो और अपनी बेटी चंद्र किरण की शादी उसके साथ कर दो राजा वचनबद्ध हो चुका था पुराने समय में वचन से बढ़कर कुछ नहीं होता था अतः राजा ने जोगिन की बात मान ली उसने सुंदर को स्वतंत्र कर दिया और अपनी बेटी चंद्र किरण की शादी उसके साथ
कर दी राजकुमारी चंद्र किरण की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था राजकुमार श्याम सुंदर अपनी पहली पत्नी के पैरों में गिरकर उससे माफी मांगता है और कहता है हे रानी मुझे नहीं पता था तुम मुझसे इस कदर प्रेम करती हो कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर सात समुंदर पार इतनी मुसीबतें झेलते हुए मुझे आजाद कराने आओगी जब तक मेरे शरीर में सांसे हैं मैं तेरा रणी रहूंगा बड़े हृदय वाली रानी राजकुमार सुंदर को माफ कर देती है और राजकुमारी चंद्र किरण को अपनी छोटी बहन के रूप में स्वीकार कर लेती है तीनों राजा से विदा ले
अपने राज्य लौट आते हैं और एक खुशहाल जीवन जीते हैं निष्कर्ष प्रेम विश्वास त्याग और क्षमा यह चार स्तंभ इस कहानी की आ है यह कथा हमें यह समझने में मदद करती है कि सच्चा प्रेम वह है जो ना केवल प्राप्त करता है बल्कि त्याग भी है जो केवल मांगता नहीं बल्कि देता भी है सच्चा प्रेम और विश्वास हर कठिनाई को पार कर अंत में विजय का ताज पहनता है कहानी में अंत तक बने रहने के लिए आपका तह दिल से धन्यवाद