[संगीत] [हंसी] [संगीत] राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं स्कूल में छात्र के साथ गलत संग में पढ़ गई थी जिसके चलते मेरे को धोखा मिला अभी पिछले तीन चार वर्ष से डिप्रेशन में वर्तमान में पढ़ाई नहीं कर पा रही महाराज जी मैं लाडली को प्राप्त करना चाहती हूं मैं वर्तमान में क्या करूं कि अभी मैं फिर से सद मार्ग राधा नाम जप करो किसका प्रश्न है राधा राधा राधा नाम जप करो और सब बच्चों से कहते हैं हाथ जोड़कर प्रार्थना य जो गर्ल फ्रेंड बॉय फ्रेंड ये सब चला है ना ये बहुत जहर है
बहुत जहर है इसमें सुख नहीं है अपने जीवन को नष्ट कर देना है ना तो गृहस्थ लायक रह जाता है और ना भगवान लायक रह जाता है बच्चा और जो अंतिम बात आती है वो जो अभी आपने कहा वो धीरे-धीरे डिप्रेशन में पहुंच जाता है और धीरे-धीरे अगर यह तो कहो मतलब आप सुरक्षित हो नहीं तो ब्लैकमेल करके जीवन नष्ट कर दिया जाता है व यहां पहुंच जाता है कि मैं कर लू ऐसे बच्चों के कितने बच्चों को देखा चाहे बच्चे हो चाहे बच्चियां ये आजकल जो चला है ना बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड ये बहुत हानिकारक है
हमें लगता है बच्चों और बच्चियों को घर के जो माता-पिता अभिभावक जन है उनको बचाना चाहिए इस रोग से बचाना चाहिए य बड़ा बुरा रोग चल पड़ा है यह बहुत जीवन नष्ट कर देगा बच्चों का और बच्चों की उन्नति अब देखो पढ़ाई नहीं चिंतन बिगड़ गया अब जीवन किस काम का उत्साह हीन जीवन अभी बच्चा है वो उत्साही जीवन हो गया अब क्या जीवन रह गया अरे इस अवस्था में डिप्रेशन डिप्रेशन तो 50 60 वाले को हो तो समझ में आवे डिप्रेशन ये 15 16 18 20 25 वाले को डिप्रेशन इस समय तो कमल की
कली जैसे खिलती ऐसे हृदय आनंद से युक्त होना चाहिए तो पर आचरण बिगड़ गए संग बिगड़ गया चिंतन बिगड़ गया तो जीवन बिगड़ गया चिंतन ही जीवन है असत चिंतन तो मृत जीवन और सत चिंतन तो अमृत जीवन अब सत क्रिया सत विचार सत चिंतन य ऐसे थोड़ी आ जाते हैं अब असत चिंतन असत क्रिया असत बातें यह बहुत सहज में आ जाएंगे लेकिन सत चिंतन सत क्रिया सत विचार ये थोड़ा चढ़ाई है तो नाम जप करो बच्चा सत्संग सुनो नाम जप करो धीरे-धीरे भगवान सब ठीक हमारे पास एक दवा है नाम जप जो प्रश्न
करो सबका उत्तर नाम जप और सब कुछ नाम जप से प्राप्त हो जाएगा और हम ऐसे नहीं बोल रहे सब साधन करके बोल रहे हैं सब साधन कर या फल सुंदर प्रभु पद पंकज प्रीत निरंतर अपने आराध्य देव में निरंतर चित्त डूबा रहे नाम जप करो राधा राधा और सत्संग सुनते रहो और कुसंग का त्याग कर दो ठीक हो जा धीरे धीरे दिनेश कुमार जी गुरुग्राम से राधे राधे राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं दो साल से आपका सत्संग और वार्तालाप youtube0 चूर्ण के बारे में सुना था जिसके पांच अंगक हैं स्वाध्याय
सत्संग सुमिरन सेवा और समाधि इन पांचों अंगों को जीवन में कैसे उतारे और हर एक अंग के लिए कितना समय निर्धारित करना उपयुक्त रहेगा 24 घंटे सुमिरन तो जब हम खाली हो तब करें पर हम स्वाध्याय कर रहे तो सुमिरन नहीं कर सकते सत्संग सुन रहे हैं तो सुमिरन कर सकते हैं अगर मन भाग रहा है तो नाम में लगा रहे हैं कान से सत्संग सुन रहे हैं और सेवा कर रहे हैं तो सुमिरन कर रहे हैं जो भी सेवा चाहे नौकरी हो चाहे किसानी हो चाहे व्यापार हो सेवा आठ घंटे 10 घंटे प्रत्येक शरीर
धारी को करनी ही चाहिए एक कायर पुरुष के लिए मनुष्य शरीर व्यर्थ है मनुष्य शरीर मिला है अपने कर्तव्य का डट के पालन करने के लिए तो हम आ घंटे 10 घंटे मेहनत का कार्य जरूर करें शरीर इसलिए मिला है तो सेवा करते हुए सुमिरन हो सकता है स्वाध्याय में मनन पूर्वक स्वाध्याय करना इसलिए सुमिरन नहीं हो सकता अगर मनन पूर्वक सत्संग सुने तो भी सुमिरन नहीं हो सकता है अगर एकाग्रता पूर्वक हम सेवा कर रहे तो भी सुमिरन में बाधा पड़ सकती है तो हम जहां जितना समय दे वो एकाग्रता पूर्वक दे और सारे
समय को भगवान को अर्पित कर दे समाधि के लिए पाच मिनट से शुरू करें पाच मिनट से शांत कुछ ना नेगेटिव ना पॉजिटिव एकदम शांत बैठा है कुछ नहीं ध्यान करना बस चुप रहो शांत शांत हो जाओ बैठ गए मन सामने फेंक रहा है अच्छा या बुरा कोई मतलब नहीं शांत पहले ऐसे शुरू करो निरपेक्ष होना फिर मंत्र में या नाम में उस मन को एकदम एकाग्रता पूर्वक लगा दो समय बढ़ाओ 10 मिनट 15 मिनट फिर 20 मिनट धीरे धीरे जब मन शांत हो जाता तो भगवता आकार हो जाता है उसी को समाधि कहते हैं
भगवता आकार गाढ़ स्थिति मंत्र में या नाम में या रूप में गाढ़ स्थिति का नाम समाधि है चेतना होते हुए भी चेतना रहित तो सेवा आठ घंटे संसार की जरूर करनी चाहिए भगवान की सेवा काम नाम इसलिए नहीं ले रहे कि गृहस्थ में हो तुम्हारे लिए माता पिता पत्नी पुत्र परिवार और समाज यही सबसे बड़ी भगवत सेवा है तुम्हें आरती पूजा का समय नहीं मिल रहा तो यह करो यही आरती पूजा भगवान की है देश की सेवा समाज की सेवा परिवार की सेवा यह भगवान की सेवा है सुमिरन हर समय प्रयास करो शवास प्रवास में
सत्संग कुछ समय रखो 30 मिनट एक घंटा हमने 24 घंटे में सत्संग के लिए रख लिया स्वाध्याय 30 मिनट एक घंटा स्वाध्याय के लिए रख लिया समाधि 5 मिनट 10 मिनट क्योंकि उसमें ज्यादा प्रवेश नहीं होगा गृहस्ती में हो मन बहुत उसके लिए तो थमा हुआ संयम नियम ब्रह्मचर्य व्रत ध्यान धारणा समाधि तब पहुंचता है सेवा सुमिरन स्वाध्याय सत्संग समाधि इनको 24 घंटे में हमें पूरे में अभ्यास मिलाना है जहां जहां जैसा हम समय दे पा रहे हैं बका पांचों 24 घंटे में लाना है कि हर समय हमको इन पांच के अंतर्गत ही रहना है
सेवा में है या सुमिरन में है या सत्संग में है या स्वाध्याय में फिर एकांत सुख मसता मथा तो ब्रह्म जिज्ञासा समाधि एकांत में सुखासन पर बैठकर अपने स्वरूप का चिंतन करते संकर सहज स्वरूप संभरा तो लाग समाधि अखंड पारा उस कि तर पाच मिनट से शुरू तो करें समझ रहे ना पर सुमिरन तो हर समय जहां खाली हो वहां सुमिरन प्रारंभ कर दो राधा राधा राधा राधा राधा जी ज्ञानेंद्र यादव जी गोरखपुर से महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव मैं संसार भोग में इतना लिप्त हो चुका हूं कि मैं अध्यात्म की
ओर नहीं जुड़ पा रहा हूं कभी पूजा करता हूं कभी नहीं कर पाता हूं इसमें रेगुलेरिटी नहीं बन पा रही महाराज जी किसका हां प्रियता संसार की जो हो जाती है तो भगवान में एक फॉर्मेलिटी सी होती है प्रियता भोगों में है ना भगवान में कैसे बनावटी भगवान से और सच्चाई से भोगों से जिस दिन सच्चाई से प्रीत करने लगोगे कामी नारी पिरी जिम लोभी जिम प्रिय दम तो उस समय स्थिति बदल जाएगी हम भगवान से प्रीति नहीं करते हैं प्रीति 10 20 नहीं होती एक जगह होती जो य 10 20 जगह प्रीत करते हैं
वे विचारी पुरुष होते हैं प्रीति वान नहीं होते जो प्रीति मान होता है एक जगह प्रीति करता है प्रेम गलि साकरी ता में दो न समाए बहुत जगह प्रीति कैसे हो सकती भोगेश्वर प्रसताव साया आत्मिका बुद्धि समाध विधते जिसका चित अपित कर लिया भोग और ईश्वर ने वो कभी परमात्मा प्राप्ति का चिंतन ही नहीं कर सकता कि मैं भगवत प्राप्ति कर और जब भगवान से प्रियता नहीं है तो फिर फॉर्मेलिटी तो जैसे आपको हमसे प्रियता न हो तो आए प्रणाम करना जो भी भाव आया वो किया लेकिन हमारी प्रियता नहीं और प्रियता है तो कुछ
क्रिया ना हो एक दृष्टि में क्रिया हो जाती है हमारे हमारे बाबा यह प्रियता बहुत काम की चीज तो क्या हमारे भगवान ऐसी प्रियता आती है क्या अच्छा पदार्थ देकर भगवान की याद आती है क्या अच्छी परिस्थिति देखकर भगवान को आप नमन करते हैं क्या बुरी परिस्थिति में भगवान को आप पुकारते हैं क्या भगवान आपके आंतरिक हृदय में अपना प्यार स्थापित कर रहे हैं तो इन सब बातों का उत्तर आएगा नहीं ईमानदारी से देखो ईमानदारी से हम लोग हम लोग जो है पूरा जीवन इसी में व्यतीत किया है तो जैसे आप आरती कर रहे हैं
पूजा कर रहे हैं आपका चिंतन कहां है जहां प्रियता है तो आप देखो आपका आपकी प्रियता कहा है पकड़ना हमारी बात को जब आप आरती कर रहे हो पूजा कर रहे हो या आप माला जप रहे हो या आप कोई भी भागवती कार्य कर रहे हो तो उस समय मन आपका कहां है क्या प्रभु में है क्या आरती में है क्या भोग लगा रहे तो प्रभु को आप पवा रहे हैं नहीं नहीं वो मन वहां होगा जहां प्रियता है तो प्रियता कहां है उसी समय डायरी में नोट कर लो प्रियता जहां होगी वही मन होगा
ठीक पहचान उस समय होगी जब प्रभु के भजन में लगोगे आरती कर रहे होगे भगवत कार्य कर रहे होगे जब तो उस समय तुम्हारा मन जहां है वहां प्रियता है आपने कहा प्रियता है तो बस उस प्रियता से हम और प्रियता बढ़ा दे हम हटाने की नहीं कहते और बढ़ा दे जसे मान लो पत्नी में प्रियता है फिर अन्य जगह किसी स्त्री में प्रियता नहीं होनी चाहिए अभी महाराज जी शादी नहीं हुई नहीं हुई तो फ प्रियता कहां है भाग दौड़ जिंदगी में लगा रहता है काम काज के विष इसमें प्रियता नहीं होती ये तो
धन कमाने के लिए होता है प्रिता हुई धन में तो धन किसके लिए प्रिय है भोगों के लिए और भोग जब अभी संसार में तभी गृहस्थ माना जाता है जब पाणी ग्रहण संस्कार होता है आपकी आयु क्या है 29 वर्ष का वर्षा जब कृष सुखानी समय चक पुनि का पली तो समय तो निकला जा रहा अभी ब्याह का अब भले एक साल दो साल और मान ले आप नहीं वैसे हमें लगता है उत्तम ब्याह का समय 20 से लेकर के 28 के बीच तक हो जाना चाहिए उत्तम बात यह है कि इतने में अब 30
32 35 और 40 य को ब्याह के समय इसमें तो लड़का जवान होने लगते थे ब्याह करने का मन है क्या अभी दो तीन साल बाद अभी दो तीन साल बाद गृहस्ती का उचित समय योग होता है बढ़िया है नाम जप कर रहे हो नाम जप करते हो कोई नशा तो नहीं करते हा तो बस नशा नहीं करते नाम जप करते हो तो धीरे-धीरे सब सदगुण आ जाएंगे नाम में बहुत बड़ी सामर्थ्य क्या नाम जप करते हो राधे राधे राधे चलो जपो राधे राधे जपो कोई ग्रंथ पढ़ते हो नहीं सत्संग सुनते हो कभी अभी पहली
बार आज सुना काफी अजीब हो आप भगवान की सृष्टि में अजीब अजीब जल पहली बार सत्संग सुना अच्छा आज मेरा ज जम दिन नया जन्म मान लेवा सत्संग से जब भगवान अतिशय कृपाल होते हैं तब साधु संग मिलता है जब द्रव दीन दयालु राघो तो साधु संगति पाइए तो एक काम किया करो आज से 30 मिनट हमको सत्संग के लिए दो रोज सत्संग सुनो मोबाइल से 30 मिनट सत्संग के लिए दो और 24 मिनट एकांत के दे शांति से बैठ के 24 घंटा में जब तुम्हें समय मिले तो राधा राधा लिखते हुए देखो लिखो भला
राधा अंदर से लिखा राधा राधा अंदर बोला राधा बाहर लिखा राधा आंख खोल के आंख बंद कर 24 मिनट ये करो और 30 मिनट सत्संग सुनो और कोई पाप कर्म ना बनने पावे इसमें सावधान रहो फिर बढ़िया आगे भगवान आपका मंगल में जीवन कर देंगे वो मंगल भवन है जैसे भी थोड़ा भी भगवान में लग जाए तो जीव परम मंगल को प्राप्त हो जाता है ये पक्का समझ लो और नशा नहीं करते इसलिए बहादुर आदमी हो बहुत अच्छे आदमी हो हा करते पापा आचरण ना होने पावे पाप आचरण से फिर समलिन आ जाती है है
कोई ऐसे ऐसा कुछ अंदर देख लो जहां हो तो उसे काट दो अबलो नसानी अबना न सेयो आज जन्मदिन है आपका तो नया जीवन जियो भगवान के चरणों का आश्रय लेकर मंगलमय जीवन जियो हा जी ट्विंकल जन जी स्विटजरलैंड महाराज जी क्या जीवन में केवल दुख ही हो तो ही भगवत भक्ति में वृद्धि होती है जरूर हम कहेंगे जरूर अगर दुख नहीं है तो भगवत चरणारविंद में जो समर्पण होना चाहिए वह नहीं हो पाता है जरूरी है किसका प्रश्न है हां जरूरी है भगवान कृपा करें और हमें दुख दे जिससे हमारी अंदर की वासना नष्ट
हो और उपासना शुरू हो जाए जब तक दुख नहीं पड़ता तब तक शरणा नहीं होती द्रोपदी जी अपने को भगवान का भक्ता मानती थी लेकिन असली भक्ति का रंग आया तब जब दुख पड़ा और सभा में उनके साथ अभद्र व्यवहार होने की बात हुई तो उनको जो भरोसा था व असली में श्री कृष्ण का भरोसा पूरा नहीं था पहले पतियों का था फिर समाज का था फिर अपना था और बाद में श्री कृष्ण का था नहीं था यह पता कैसे चला जब दुख आया तो पहले पतियों में भरोसा गया फिर भीष्मा आदि में भरोसा गया
फिर अपने हाथ से पकड़ा और जब देखा कि अब नहीं तब त्राहिमाम हे द्वारिकाधीश हे श्री कृष्ण भगवान वस्त्र रूप में यही प्रकट हो गए तो हमें लगता है विपत्ति और दुख ये वो अमृत है जो भगवान से मिला देता है यदि सत्संग हो तो र्थ है यदि सत्संग हो तो नहीं तो विपत्ति और दुख सबको प्राप्त हो रहा है वो उसकी निवृत्ति के लिए और पापा आचरण कर रहा है अगर सत्संग हो तो विपत्ति और दुख भगवान से निश्चित मिला देता है क्योंकि फिर कोई सहयोगी नहीं होता हम देखा कि संसार में कोई भी
प्यार उसको नहीं करता जो ठोकरे खा रहा है विपत्ति है दुख है कोई नहीं प्यार करता और जब ऐश्वर्य और वैभव और सब सुख संपत्ति होती है ना जिसको कभी नहीं जानते व भी आके हाथ मिलाएगा भाई साहब आप हमें जानते हैं हम आपसे वहां मिले थे वो अपना परिचय बताएगा अगर पत्ति में वो आपका परिचय वाला है तो ऐसे करके चला जाएगा कि आप दिखाई ना दे इसलिए मुझे लगता है भगवान बड़े कृपाल है जिनको विपत्ति और दुख देकर सत्संग दे देते हैं वो निकल जाते हैं वो विपत्ति और दुख का सदुपयोग कर लेते
हैं जी सत्संग पहले आ गया फिर धीरे धीरे जब दुख आए तो ऐसे लगा हा भगवान से और जुड़े तो बिना मांगे सत्संग भी प्राप्त हुआ शंघाई में और अब ऐसे लगता है कि विपत्ति यह है कि हर समय जैसे आपका हट कितना था बचपन में कि आप निकल गए हमारे अंदर वो हट क्यों नहीं आता व भगवान देते हैं व भगवान ही देते ना वो भगवान ही अंदर से देते हम बताए आपको पूरा जीवन हो गया पूरा जीवन हो गया आज तक हमको यह दिखाई नहीं दिया कि यहां कोई प्यार करता है आज तक
नहीं दिखाई दिया मुझे कि यहां कोई प्यार करता है मुझे केवल एक बात दिखाई देती है यहां अपने सुख के लिए हम आपसे प्यार करते हैं ज इस शब्द पर विचार करो आपके सुख के लिए जो हम करें उसे प्यार कहते हैं आपसे जो हम सुख लेने की भावना से प्यार करते उसे स्वार्थ कहते हैं हमें आप स्वार्थ दिखाई दिया प्यार नहीं दिखाई दिया बोलो है प्यार भला अपने सुख को लेकर हम आपसे प्यार करते हैं हम आपके बिना जी नहीं सकते प्यार का शब्द है हम आपके बिना जी नहीं सकते लेकिन आपके बिना नहीं
अपनी स्वार्थ की पूर्ति के बिना नहीं जी सकते नहीं तो उसकी स्वार्थ को ब्रक लगा दो जो स्वार्थ समझ रहा हो फिर करो प्यार फिर देखो उसका स्वरूप देखो आ जाएगा सामने आ जाए जो स्वार्थ वह आप में देख रहा है उसमें आप ब्रक लगा दो आओ हम तुमसे प्यार करते हैं करो हमसे प्यार तो नजदीक नहीं आएगा दिखाई नहीं देगा म प्यार का असली स्वरूप क्या है अपने ण को भी समर्पित करके जिससे प्यार किया जाता है उसे सुख देना सुख लेना नहीं सुख देवे को चाव चित सब सोहित निष्काम इसे प्यार कहते सुख
देवे को सुख देने का ना कहां ऐसा सुख देने का चाव कहां है सुख लेने का चाव प्रभु जी जो माता पिता हमसे कहते हैं वो भी सत है मोह प्रेम नहीं मोह प्रेम बहुत ऊंची चीज बच्चा प्रेम जिस समय आ जाएगा वो अलग हो जाएगा जैसे हम स्त्री से प्यार नहीं करते काम हम पुरुष से प्यार नहीं करते काम माता-पिता का मोह जितने भी संबंध आसक्ति राग इनमें प्रेम नहीं है प्रेम नहीं है प्रेम सच्चिदानंद में है अब तुम्हें उसकी अलग-अलग व्याख्या दिखाए सुना था कुपुत्रो जायते कुछ दब कु माता न भवति शास्त्रों में
लिखा है कितने ऐसे उदाहरण है कि माता-पिता के द्वारा पुत्रों की हत्या हो गई अपने स्वार्थ में जहां बाधा पड़ेगी वहा अलग बात है अगर वह पा कुतिया भी अपने बच्चे को प्यार करती है सुकरी भी अपने बच्चे को प्यार करती है पक्षी भी अपने बच्चे को प्यार लेकिन प्यार नहीं मोह में बंधे हुए प्रेम एक विशुद्ध भगवता अंद है प्रेम हो जाए तो फिर क्या इसीलिए तो चराचर जगत से प्रेम करो कभी कोई बाधा नहीं लेकिन प्रेम कहां कोई करता है स्वार्थ के वशीभूत मोह में बंधे हुए मोह गए बिन राम पद होई न
दृढ अनुराग अनुराग माने प्रेम जब तक मोह है तब तक प्रेम नहीं हो सकता और वो मोह होता है बच्चा प्रेम नहीं होता सबको भगवत प्राप्ति हो जाए कि नहीं हो जाए महाराज जी प्रेम का भाव सबके लिए एक जैसा होना चाहिए कि उसम जैसे अपने पन में ज्यादा प्रेम होता है फ पढ़ाई में नहीं प्रेम की सीधी परिभाषा है हम जिससे प्रेम करते हैं सिर्फ उसको सुख देने की भावना हो किन चिन मात्र स्वार्थ बुद्धि ना हो अब चाहे माता पिता हो चाहे पुत्र हो चाहे पत्नी हो चाहे भाई हो चाहे देश हो चाहे
समाज हो चाहे विश्व हो अपने सुख की लालसा से किया हुआ राग होता है मोह होता है आसक्ति होती स्वार्थ होता है काम होता है प्रेम नहीं होता है आप समझ पा रहे ना इसीलिए करोड़ों में किसी एक में प्रेम अंकुरण पाया जाएगा नहीं नहीं पाया जाएगा हित धाम में आए थे कहा कि हमारा प्रेम विवाह हुआ लव मैरिज आशीर्वाद दीजिए आठ महीने बाद फिर आए तो हम कहा तुम्हारी पत्नी साथ नहीं बोले डिवोर्स हो गया है रे [संगीत] लव अरे एक बार दिल दे दिया तो फिर तुम चाहे जैसा तुम करो हम तुम्हें दिल
दे दिया एक बार जब हमने तुम्हें दिल दे दिया तो दे दिया यार जिंदगी भर के लिए दे दिया अब तुम अगर हमें मार भी डालोगे तो हमारा दिल तुम्हें आशीर्वाद देगा प्रेम का मतलब समझते हो अगर तुम हमें मारोगे या मार भी तुम्हारे दिल में अगर आवाज सुनोगे तो तुम्हारे लिए आशीर्वाद ही निकलेगा तुम्हारे लिए दुख नहीं निकले इसे कहते प्रेम है भला ये म ऐसा प्रेम तो केवल प्रभु के लिए ही हो सकता तो फिर इसीलिए तो प्रेम कहा है और और जब कोई भगवान का आशिक प्रेम करेगा जगत में भी तो अवती
बेजोड़ होगा जैसे तुलसीदास जी ने अपनी पत्नी से प्रेम किया तो माइके जाने का समय ले दिया माइके जाने हम देख जी नहीं सकते तुम्हारे बिना तुम मा कैसे चली जाओगी जैसे धनुर दस जी ने अपनी पत्नी से प्रेम महा भागवत है तो ऐसे चलते हैं बाजार में सब्जी लेने नहीं जाते पत्नी जाएगी क्योंकि वो बिछोना सह सकते तो पत्नी ऐसे चल रही आप छाता ली ऐसे चल रहे चिंतामणि में इतने आसक्त हो गए सब कुछ निछावर कर दिया बिल मंगल जी ने अगर भागवती पुरुष हिरण से आसक्त हो गए तो अगला जन्म हिरण का
लेना पड़ा और महाराज हिरण की दुर्गति नहीं होने दी वही राजा रहु गण बना हिरण और भरत भागवत अगर पुरुष किसी से भी प्रेम कर लेगा तो आर पार का निर्वाह होता वहा स्वार्थ नहीं होता इसलिए भागवत पुरुष का कहीं प्रेम होता नहीं भगवान के सिवा अगर हो जाए तो बेजोड़ होता है हिरन से प्रेम किया जिस भगवान की प्राप्ति के लिए अपना राज्य छोड़ा अपनी पत्नी पुत्र छोड़े और हिरण से प्यार कर लिया तो उसके लिए तीन जन्म लगा दिए तीन जन्म लगा दिए जड़ भरत के रूप में पालकी में उसी को तो उठाए
हुए उपदेश कर रहे तो प्रेम प्रेम शब्द से हदय में होने लगता है नहीं आपके होता है कि नहीं होता हमें पता नहीं हमारे होने लगता है प्रेम शब्द होते एक जैसे कोई दिल को मसला करे शायद इसको ही इश्क कहते प्रेम को उर्दू में इश्क कहते हैं इश्क इसको बोले जैसे कोई दिल को मसला करे अपने प्यारे की याद में प्यारे के लिए तड़पना प्यारे के लिए सिसकना प्यारे के लिए बलिदान होना यह प्रेम कहां आता है अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए देखो हमारे पास इस संसार में प्रेम प्रेम तो बात करते ही
आंसू टपकने लगे बात करते ही हृदय बहा बहा घूमे उसे प्रेम कहते हैं जो दूसरों के लिए बलिदान करने देखो देश प्रेम देखो वंदे मातरम फांसी का फंदा डाल लिया देश प्रेम देखो गुरु गोविंद सिंह के दोनों बच्चे दीवाल में जिंदा चुने जा रहे हैं ना उनके आंसू ना बच्चों के आंसू आप बचा ये देश प्रेम कहीं भी प्रेम की बात आती तो वहा बलिदान होता प्रेम बलिदान मांगता है लेकिन हम प्रेम का नाटक करते हैं प्रेम नहीं प्रेम ना हम भगवान से कर पाते हैं ना इंसान से कर पाते हैं अगर हम डट के
किसी इंसान में भी भगवत भाव करके प्यार कर ले तो हमारा मंगल हो जाए माता में भगवान देख ले पिता में भगवान देख ले पत्नी में भगवान देख ले तो भगवान तो है ही सब में हमारा काम बन जाए लेकिन हम स्वार्थी पुरुष भगवान ना देख कर के अपनी वासनाओं की पूर्ति चाहते और उसे नाम दे देते प्रेम एक प्रश्न था माता जी अपने पुत्र को प्रेम करती है म प्रेम है या लोभ है उसका नहीं लोभ भी नहीं कह सकते म मनुष्य माता तो थोड़ा बुद्धि रखती है हम पशु पक्षियों की भी कहा व
क्या अपने बच्चे से प्रेम नहीं करते उसका क्या चिंतन होता है क्या कि आगे चलकर मुझे पोषित करेगा ऐसा भी नहीं चिंतन होता पक्षियों का पशुओं का वह मोह होता ही है वह अपने बच्चे के लिए अपने प्राण दे सकती है उसका कोई स्वार्थ नहीं दिखाई दे रहा लेकिन उसे मोह कहते हैं महाराज जी लेकिन अगर उसी मोह की वजह से बच्चा अगर अनुशासन हीन होता है या कुछ गलत दिशाओं में जाता है वो एक अलग चैप्टर हो गया वो एक अलग चैप्टर हो गया पिता अगर बोलता है कि भाई आप अनुशासन में आइए और
इसकी वजह से अगर नहीं आप नहीं समझ अब पटरी दूसरी हो गई अनुशासन शब्द लाने के लिए वो व्यवहार शब्द आ गया हम तो केवल उस राग की बात कर रहे जो लगाव है जो लगाव है अब पटरी दूसरी हो जाएगी उसकी चर्चा दूसरे रूप में होने लगेगी हमारा सिर्फ लगाव से कि जो विविध प्रकार का लगाव है यदि सेे प्रेम में बदल दिया जाए तो भगवान की प्राप्ति हो जाए पत्नी अपने पति को भगवान समझे पति अपनी पत्नी में भगवान को देखे माता-पिता पुत्र में भगवान को देखे पुत्र माता-पिता में भगवान अभी देखो कितना
आनंद में गृहस्ती हो जाए लेकिन स्वार्थ म जी देखना और वर्तन अलग-अलग हो जाता हां वर्त केवल देख देखने की बात कह रहे हैं वर्तन पूरा वैसा ही होगा पत्नी को पत्नी माना जाएगा मां को मां माना जाएगा बहन को बहन माना जाएगा बेटी को बेटी माना जाएगा चारों स्त्री स्वरूप है बर्ताव चारों के अलग होंगे लेकिन चारों में भगवान को देखना हमने कहा है पंडिता सम दर्शना ना कि तिना जो पत्नी के साथ व्यवहार करते हो बहन के साथ थोड़ी करेंगे जो बहन के साथ व्यवहार करते हो पत्नी के साथ थोड़ी करेंगे चारों स्त्री
शरीर है मां बेटी बहन और पत्नी चारों स्त्री शरीर लेकिन चारों से बर्ताव अलग-अलग होगा पर दर्शन एक होगा चारों में श्री भगवान विराजमान है आदित्य शर्मा जी आगरा से महाराज जी राधे राधे आप के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी अगर हमसे कोई गलती हो जाए और कुछ समय बाद अगर हमें अपनी गलती का पछतावा हो और हम पश्चाताप करें तो क्या प्रभु हमें माफ कर सकते हैं पक्का पर पश्चाताप तभी माना जाएगा जब वो पुनरावृत्ति ना हो जो गलती हुई है वो दोबारा ना हो अब लो निशानी अब ना नश हो आज
तक हुआ अब नहीं करूंगा और हृदय से जलन युक्त होकर भगवान से प्रार्थना करें तो वो भस्म हो जाएगी लेकिन साधारण गलती अगर अपराध बना हुआ है असाधारण है तो फिर उसका प्रश्चित करना पड़ेगा जैसे कृ व्रत है चंद्रायण व्रत है या और भी अनुष्ठान भागवत का अनुष्ठान करने पड़ेंगे मात्र प्रश्चित से नहीं हो जाएगा हैना साधारण गलती है तो हो जाएगा जैसे एक साधारण गलती हो गई तो हम कह देते सॉरी इससे भी प्रश्चित हो जाता कि हमसे गलती हो गई इतने में लेकिन असाधारण गलती सॉरी कहने से हो गया क्या नहीं तो ऐसे
ही हम हृदय से जले और बहुत बड़ी गलती हमसे हो गई वो क्षमा हो गया लेकिन अपराध बन जाए तो इससे नहीं होगा फिर उसके लिए प्रायश्चित होता है उसके लिए विधान होता है वो गुरुजनों से पूछा जाता है हमसे पाप बना इसका क्या विधान है जी श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मन की इंद्रियों ने ऐसा इतना प्रबल रूप ले लिया है कि वह किसी भी मानव शरीर को उनके कपड़ों धन राशि और प्रसिद्ध पे जज करता है महाराज जी इससे कैसे संयम पैलाए मतलब सामने वाला कितना अमीर
है कितना अच्छे कपड़े डाले हैं उसका स्टेटस क्या है उस परे इसको आकलन करता है फिर उससे बात करने का या बात नहीं करनी है उसको आकलन करता है र जोगण वृतिया है मन की य कोई खास वृत्ति है क्या रजोगुण वृत्ति है जब तक नाम जप नहीं करोगे तब तक यह सब कूड़ा करक बना ही रहेगा भगवान का स्मरण करने से हमारे हृदय में सात्विकता बढ़ती है आकलन क्या कर सकते हो बाहरी दिखावे को आकलन कहता है क्या क्या जाने ऐसे कैसे साधारण आदमी एक पैजामा और कुर्ता पहने अरबों रुपया उसके पास है क्या
जानोगे तुम बहरी दिखा एक हमने आदमी को देखा खेती लिखाने जाता था वैसे कबाड़ की तरह बोरे में नोट भर के कोई पूछने वाला नहीं था आकलन कैसे लगा सकते हो व तो बाहरी दो चार व्यक्तियों को देखकर से आकलन लगा सकते हो भजन करो सही ज्ञान दृष्टि आएगी और सब में भगवान की भावना करो यह पवित्र दृष्टि य सब गंदी बात है इससे तुम वास्तविक नहीं आकलन लगा सकती क्या आकलन लगाओगी कैसे आकलन लगाओगे आप हमें बताओ लगा सकते हो पक्का आकलन तो फिर ये तो व्यर्थ की बात रहे नाम जप करो जी किस
बात पर आकलन लगाना चाहिए और किस बात का आकलन लगाना चाहिए अगर सामने वाले को देखना ही है तो भागवत सद्गुणों का आकलन लगाना चाहिए निर्भय निश्चिंता निशोक दया ये जो देवी संपदा के सद्गुण है हमको देखने चाहिए और फिर उसका संग करना चाहिए कुसंग का त्याग करके संत संग संत का मतलब होता है जो सत में स्थित है उससे हमें संग करना चाहिए वो बुद्धि है नहीं आकलन करने की तो यह तो पापी लोग भी ऐसा पहने घूमे मिलेंगे तो हमारा पापी से संबंध बनाए क्या बात करें क्या उसे मित्रता का व्यवहार करें क्या
नहीं ऐसा नहीं है हृदय का अच्छा हो वो ज्यादा अच्छा है सबसे बड़ा धनी है जो हृदय का अच्छा है वही तो धनी है ये बाहरी जी उसकी पहचान बाहरी लक्षणों से कैसे करें जब तक भजन नहीं करोगे तो तुम्हारी बुद्धि पहचानने लायक कबाड़ तोड़ने वाले तराजू से सोना नहीं तौला जाता सोने तौलने के तराजू अलग आते हैं ऐसे ही जो भागवत सद्गुण पकड़ना तो पहले भागवत बनो ना नाम जप करो शास्त्र स्वाध्याय करो सत्संग करो गुरुजनों की सेवा करो माता-पिता आदि के अनुशासन में रहो तो तुम्हारी बुद्धि पवित्र होगी तब पवित्र और सबसे बड़ी
बात है सब में श्री भगवान बैठे हैं तात सुनो माया कृत गुण और दोष अनेक गुण या उभय न देखी देखी स्वविवेक गुण दोष दोनों मत देखो सम में भगवान देखो यह उत्तम बात रहेगी गुण दोषों की सत्ता नहीं है भगवान की सत्ता है तात सुनो माया कृत गुण दोष अनेक गुण या उभय न देखी देखी स्व विवेक लेकिन महाराज जी आपके माध्यम से जो है नई पीढ़ी में बहुत सत कर्म की व जा रही है जो नहीं थ लेकिन आपके माध्यम से बहुत ज्यादा हां माध्यम भगवान किसी को बना सकते करते तो वही है
भगवान ही कर रहे हैं अच्छा सत्य वस्तु छुपती नहीं है सत्य वस्तु छुपती नहीं है भगवान भगवान की चर्चा भगवान का नाम यह मंगल करके ही रहता है तो बड़े श्रद्धा से सुन रहे लोग और मान रहे हैं तो उसका प्रभाव भी पड़ रहा है इसमें लोगों की श्रद्धा भगवान की कृपा हमारा जैसे क्या प्रवचन कितने अच्छे-अच्छे प्रवचन करने वाले हैं कितने अच्छे-अच्छे उपदेश देने वाले हैं सब महापुरुष है पर भगवान किसी को यश दिलाना चाहते हैं तो निमित्त बना देते हैं वो करें करावे आप सब जने बढ़ाई दे अपने जन को बढ़ाई देना चाहते
हैं तो ऐसा होने लगता है जी राधे राधे महाराज जी एक बात कहना चाहती हूं आपसे जी महाराज जी जब आप बहुत भीड़ में जैसे एक तारीख को आप निकले दे ना तो आपके स्वास्थ्य की चिंता हो जाती क्योंकि भीड़ बहुत थी ऐसा लग रहा था आपको कोई नुकसान ना हो हां ऐसाय लोग भी चिंतित हो जाते हैं पर मुझे लगता है आप गाड़ी से आया करें पर हमें लगता है ना कि हमारे साथ भगवान रहते हैं और हमें लगता है सब रूपों में भगवान आते हैं तो मुझे इंफेक्शन इसीलिए नहीं होता क्योंकि हम अपने
भगवान को देख रहे हैं और हमारे भगवान हमारी सुरक्षा में भी कर रहे हैं सीम की चाप सके को तासु बड़ रखवार रमा पति जासु इसलिए कोई अमंगल तो हो नहीं सकता अच्छा मृत्यु एक नियत समय है आनी है उसके अलावा अब जैसे प्रारब्ध हो किडनी फेले डायलिसिस होता है जो और आगंतुक कष्ट है वो भगवान की कृपा से सहन शक्ति दी भगवान ने उसे हम सहते रहते हैं और समाज की सेवा होती रहती है नहीं तो बड़ा कष्ट है शरीर में बड़ी पीड़ा है परंतु महाराज जी भीड़ में हर तरह के लोग होते ऐसा
लगता है कि कोई आपको चोट ना पहुंचा हां ऐसा सबके अंदर भावना रहती है इसलिए गाड़ी से आया करे चोट पहुंचाना हो तो गाड़ी से भी पचा द राधा रानी का बल है आप और बृज जन का पूरा आपके लिए पूरा आशीवाद आप बजवास हों को बहुत आशीर्वाद देवेश जी राधा महाराज जी आपके हेतु की कृपा से हमें शरणागति मंत्र अस उपासना पद्धति और आपके श्री मुख से सत्संग रूपी अनमोल वचन सहज प्राप्त है प्रभु जैसे हमें हमारे शरीर के संबंधी जनों से तदा भाव अत्यंत प्रियता है उनको कुछ सुख दुख होता है तो मुझे
महसूस होता है वैसे भाव निष्ठा तदात्मानं उपासना पद्धति हरि गुरु भगवान के चरणों में कैसे और कब जाकर दृढ़ होगी महाराज जी जैसे घर परिवार वालों में सहज में ऐसी नहीं होती सहज में मात संगत दुर्लभ हो अगम्य अगर हो गई तो अमो गस अगम्य के लिखा माता से प्रीति होना परिवार से प्रीति होना वो तो स्वाभाविक है जन्म सिद्ध है जननी जनक बंधु सतधारा तन धाम सुद परिवारा इनमें तो स्वाभाविक ममता है लेकिन किसी संत में सद्गुरु देव में या आराध्य देव में तो लिखा देवर्ष नारा जी महा संगत दुर्लभ हो पहले तो महापुरुषों
का मिलना दुर्लभ और दूसरा अगम्य उनसे प्रीति नहीं हो सकती अगर प्रीति हो गई तो अमोघसिद्धि जीवन रहते हुए जीवन मुक्त हो जाएगा केवल चिंतन मात्र से पौंड्रक वासुदेव की कथा आती है भागवत में व नकली दो भुजाएं लगाकर और केवल यह चिंतन करता था मैं वासुदेव हूं असली तो असली वासुदेव पदवी प्राप्त हुई सूप मोक्ष सूप मोक्ष की उसको प्राप्ति हुई तो भगवत मार्ग में ि गुरु से ऐसी प्रीता हो जाए जैसे मां से मत जैसे सखी बोली तो कहीं ना कहीं प्रियता है इसके हृदय में या कहीं महाराज जी को अधिक प्रीति मन
भा संदेह जिससे अधिक प्रीति होने लगती है तो संदेह होने लगता है कहीं कोई चोट ना पहुंचा दे कहीं कोई अमंगल ना कर दे कहीं कोई ऐसा ना हो जाए तो माता की तरह उसके हृदय में जो भाव आया ना वो कहीं न कहीं प्रीति का अंकुर उदय हो रहा है सुन सुन कर के ऐसा लगने लगा कि मेरे महाराज जी तब ये बात आती कहीं कोई चोट ना लग जाए कहीं कोई अमंगल ना हो अधिक प्रीति मन भासन दे और अगर प्रीति हो जाए संतों से तो पक्का भगवान इस बात का निर्वाह करते हैं
कि जो दास से प्रीति करता है तो भगवान अपने भक्त से बढ़कर उसको हा जो उनके दास से प्रीति करता है अपने भक्त से बढ़कर उसको प्रीति भगवान प्रदान करते हैं उसको सुख प्रदान करते हैं जब हम भगवान से कहते हैं कि हमसे बहुत प्यार करते हैं उनसे रोज ही एक बात कहते हैं हम उनसे बहुत प्यार करते हैं तो वो हम सामने से आके ों नहीं कहते कि वो भी हमसे प्यार करते हैं बात अभी आप कहती हैं और जिस दिन हो जाएगा ना कि भगवान से हम प्यार करते हैं यही धक्क से होगा
और आखों से आंसू निकलने लगेंगे यह उत्तर होता है भगवान आनंद स्वरूप है आनंद स्वरूप है य ऐसा लगता है जैसे हम उनसे कह रहे हम आपसे रोज कह रहे हम आपसे बहुत नहीं यह बात तब मानी जाएगी जब किसी से प्यार नहीं होगा हम उनसे भर तो किसी से भी प्यार नहीं ऐसा ऐसा ऐसा देखो कह देना साहिज है उनसे बढ़कर शरीर से प्यार है शरीर से शरीर संबंधियों से नाना प्रकार की भोग विलासिता से हमारे अंदर कहीं ना कहीं प्रियता है और जिस दिन केवल भगवान से प्रियता होगी तो ये प्रश्न नहीं रहेगा
सखी आपके अंदर क्योंकि ये प्रश्न बता रहा है कि अभी प्रियता नहीं है नहीं आपने कहा सामने आकर उत्तर के वो नेत्रों में बसे रहते हैं वो छाती में बसे रहते हैं कैसे तुम्हें बताए अरे वो कैसे हम नहीं मान सकते इसलिए नहीं मान सकते कि बचपन से अभी तक उन्हीं से प्यार किया है दावे के साथ कहते हैं उन्हीं से प्यार किया है और दावे से कहते हैं हर प्यार का उत्तर 100 का सभाव शेर मिला है 100 का सभाव शेर मिला है ऐसा नहीं मिला कि हमारा 100 महाराज का 90 ऐसा नहीं हुआ
अगर हमारा 100 तो उनका स्वाव सेर हुआ है उनकी तरफ से कमी नहीं रहे अपने सुधार करो अपने सुधार करो जब आपकी सुधार वृति आ जाएगी ना तो भाषा बदल जाएगी सबरी जी भगवान से क्या कहते हैं प्रभु आप इतनी कृपा कर रहे हो अधम ते अधम अधम अति नारी तिन मा में मति मंद आघी आपका जोर है कि मैं उनसे प्यार करती हूं हमारा कथन है कि वो आपसे प्यार कर रहे हैं आप समझ नहीं पा रहे हो जीव की सामर्थ्य कितनी इसकी सामर्थ्य कितनी दोनों पर विचार करो अगर आपके एक बूंद आंसू प्रभु
के लिए आते हैं तो दसव बूंद आंसू उनके गिर चुके हैं आपके लिए तब एक बूंद आया है आप सच्चे मान लीजिएगा अगर एक बार कृष्ण कहते हैं तो 100 बार आपका सुमिरन किए तब आप एक बार कृष्ण बोल रहे हैं उनका प्यार स्वभाव से रहे हमारा प्यार कमजोर है जब हम यह मानेंगे ना तभी असलियत में प्यार आएगा तुमसे कोई पूछे भगवान से प्यार कर भगवान से प्यार क्या बात करते हम भगवान से प्यार करने लायक है आंखों में आंसू आ जाए और रोमांच हो गया गला रु गया और फिर भी यह निकल रहा
है कि हम भगवान से प्यार कर पाएंगे यह है प्यार भगवान का वो अभी मतलब और चलो और आगे ब प्रीति प्रतिक्षण वर्धमान सूक्ष्म तरम अनुभव स्वरूपम कामना रहित ये प्रेम के लक्षण है प्रेम सदा बढ़ करे जब प्रेम बढ़ता है ना तो यह कहना मुश्किल हो जाता है कि मैं आपसे प्रेम करता हूं ये जो कहता है ना मैं आपसे प्रेम करता हूं वास्तविक व प्रेम नहीं करता है तब कह रहा है नहीं मैं आपसे प्रेम करता हूं यह कहना मुश्किल यह बनावटी होगा यह केवल स्वार्थ पूर्ति होगी तो हम भगवान से प्यार करते
हैं ऐसा तो कह नहीं सकते भगवान हमको बहुत प्यार करते हैं ये तो हम तुम्हें बोला कि स तो उधर से स्वभाव से नहीं अगर हमसे कोई पूछे आप श्री जी से प्यार करते हो तो रोना आ जाएगा जाएगा कि क्या हम प्यार करते हैं हम क्या वो प्यार करते हैं वो हमें प्यार करते हैं इसलिए हमारे अंदर कुछ है अगर वह हमें प्यार ना करते तो हम उनको क्या प्यार करते हम तो देहा अभिमानी जीव नाना प्रकार के भोगों में फसे हुए जैसे हनुमान जी से पूछा तो हनुमान जी कह रहे अस्म अधम सखा
सुन मुह पर रघुवीर मेरे जैसे अधम प भगवान का प्यार है वो कह रहे हैं और आप कह रहे वो प्यार नहीं करते हैं सामने भाव सव सात्मा बध प्रेमा समझ प र सखी जी अब उसको सही पटरी प ले आओ तो प्यार है ही बढ़ता जाएगा प्रभु के प्रति मनीषा जी गुरुग्राम से राधे राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी भगवान और गुरु के स्थान में क्या फर्क है क्या गुरु भगवान का स्थान ले सकते पहली बात तो भगवान के सर्वत्र विराजमान होने पर भी हर जीव दिन दुखी
और परिस्थिति में हारने वाला और जब गुरु का सानिध्य गुरु रूप में वही भगवान मिले तो फिर माया का पर्दा फाड़ कर के सच्चिदानंद में स्थित कर दिया इसलिए गुरु गोविंद दो खड़े का अकेला गोपाल तो बलिहारी गुरु आपने वही भगवान गुरु है दूसरा कोई गुरु नहीं है बंदो गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महाम तम पुंज जा सुवचन जिनको ऐसा लगता है कि गुरु भगवान नहीं है तो उन्होंने गुरु नहीं बनाया उन्होंने नाटक किया है गुरुर ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरु का स्वरूप क्या
है ब्रह्मानंदम परम सुखदम केवलम ज्ञान मूर्ति द्वंद वातीत गगन सदस तत्वम सद लक्ष्यम एकम नित्यम विमल अचलम सर्वद साक्षी भूतम भावातीत त्रिगुण रतम सद्गुरु तम नमामि सद्गुरु कोई व्यक्ति होता है भगवान ही तो होते हैं पर भगवान भगवान के रूप में सबके हृदय में बैठे हैं लेकिन समस्त जीव चराचर दुखी है लेकिन जब भगवान गुरु रूप में आ जाते हैं तो जीव का परम कल्याण कर देते हैं आपके शब्दों में जो था कि क्या गुरु भगवान की जगह लेले ले सकते हैं अरे गुरु भगवान से बड़े हैं भगवान कह रहे हैं मोते अधिक गुरु जी
जानी भगवान ने गुरु बनाया नहीं बनाया संदीपनी जी वशिष्ठ जी बैठ कर के उपदेश कर रहे संदीपनी जी उपदेश भगवान शिष्य बने बैठे जो गुरु शब्द है वो भगवान से भी बढ़ कर के मोते हैं अधिक गुरु ही जिए जानी भगवान कह रहे किसका प्रश्न था समझ पा रहे हैं आप जी हितेश शर्मा जी राधा राधा महाराज जी आपके श्री मुख से काफी बार सुना है कि भगवान का नाम जब व आश्रय से सभी पापों का नाश हो जाता है लेकिन कई बार यह भी सुना है कि कर्मों का फल अवश्य में भक्त भैया कर्म
का जो फल हमारे पास आया प्रारब्ध बनकर उसको हम भोग लेते हैं और जो संचित कर्म वो भस्म हो जाते हैं जो क्र माण और संभाल के करने कि पाप नाना बन पावे हम मुक्त हो जाते हैं प्रारब्ध भोग जो आया है वो छूटा हुआ बाण है लेकिन जो तोड़ीर में रखे वो भस्म कर सकते हैं जो छूट गया बाण लक्ष वेद कर दिया वोह तो दर्द है ही है तो प्रारब्ध है आ चुका है भजन आज हम कर रहे हैं और प्रारब्ध जन्म से पहले रच चुका है अब उसको भोगना पड़ेगा ज नाम जब
करते हैं तो उससे हम सहने की सामर्थ्य मिलती सहने की सामर्थ्य मिलती है प्रारब्ध नहीं नष्ट होता प्रारब्ध भोगना पड़ता है बड़े-बड़े सिद्धों को और संचित कर्म भस्म हो जाता है और क्रमा निष्फल हो जाता है और प्रारब्ध को भोगने के सा भगवान देते हैं भजन की सामर्थ्य सहती है और अपनी दिनचर्या पूरी कराती है हम कोई निराश नहीं कोई हताश नहीं कोई उदास नहीं यह भगवान के भजन का प्रभाव समझ पा रहे आप आपको ठंड नहीं लगती जितने से काम चल जाए उतने से चला लेते चकि पहले गंगा किनारे रहे ना तो गंगा किनारे
बहुत भीषण ठंडी होती और उस समय हमने कभी स्वेटर साल कंबल इनका प्रयोग नहीं किया जी बहुत कष्ट होता है पर आप नहीं अब मतलब अब जैसे बनियान है एक बनयान अपने इतने से काम चल जाता है तो हम चला रहे हैं काम अब जैसे बाहर निकलेंगे तो एक बार महसूस होगा कि य ठंडी है बस फिर खत्म चिंतन में अगर हम प्रभु का चिंतन कर रहे हैं तो फिर इन सब ठंडी गर्मी मात्रा स्पर्श सातु कोनते शीतोषण सुख दुखदा आग मा पनु अनि त्यास तास भारत बचपन से इसका सहाय भूख प्यास गर्मी सर्दी मार
दुलार दोनों सहे हैं तो अब भगवान की कृपा से वो परिपक्व भाव बन गया है इसलिए उसम कोई तुम्हें देख के लगता होगा सर्दी लग रही हवेली लग रही है रुआ खड़ा है क्या हा देखते ना तो फिर ऐसा लगता है कि हम भी नहीं पहने तो वहां पर रहते तो नहीं पहनते वृंदावन में दो दिन से तो मतलब पहनना ही पड़ा हमको नहीं पहनना पड़ेगा प्रार बदला जा सकता है नाम जब से यार बदला जा सकता है पर हमें लगता है कि जैसे मच्छर मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया जाए तो बेकार है
नहीं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग मच्छर मारने के लिए भजन का प्रयोग प्रारब्ध प्रारब्ध तो भोग के कट सकता है हम भजन करते हैं भगवत केवल भजन पर ध्यान दे भजन प ध्यान दो भगवान तुम पर ध्यान देंगे तुम भगवान पर ध्यान दो भगवान कहते हैं ना अनन्य चिंत तो माम ये जना परिपास तेशाम नित्या युक्ता नाम योगक्षेम वामम मैं तुम्हारा ध्यान दूंगा योग और क्षेम का तुम मेरा चिंतन करो तो कहीं महाराज जी कहीं महाराज जी भगवान जी का ही रूप तो नहीं है अब ये तो हमें पता ले हमें तो यह पता है हमें तो
यह पता है कि भगवान के एक तुच्छ दासो का दास भगवान केस सवाल य था भक्ति कैसे करें और संसार में रह के भक्ति कैसे करे देखो भक्ति तो एक ही तरह से होती है जीवन शैली दो तरह की होती है एक गृहस्थ में रहकर जीना एक विरक्ति में रहकर जीना लेकिन भक्ति तो ऐसी ही होगी जब भक्ति का रंग चढ़ेगा तो नहीं खान पान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे त खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है नारायण हरि भजन में पांचों सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति
बहु बात चाहे वो गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो जब तक अपनी ममता बटोर कर सब जगह की भगवान के चरणों में नहीं समर्पित कर देगा अखंड भजन नहीं करेगा तब तक भगवत प्राप्ति कठिन है चाहे कोई भी हो भजन से भगवान की प्राप्ति होती चाहे विरक्त हो चाहे गृहस्थ हो रहनी अलग अलग है हम मांग के खाते हैं आप आप मांगने वाले को खवाते हैं अंतर इतना है हम मांग के खाते हैं और आप मांगने वाले को खवाते हैं आप मेहनत करते हैं हम भजन में मेहनत करके आपको भजन देते हैं आप अन्य में मेहनत
करके हमको भोजन देते हैं दोनों का एक दूसरे से आप हमें भिक्षा देते हैं हम आपको शिक्षा देते हैं दोनों एक दूसरे के पूरक है पर भगवान की प्राप्ति दोनों को तभी होगी जब अखंड भगवान का चिंतन होगा निरंतर भगवान का चिंतन तो गृहस्थ में ऐसा करे अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर दे रोज के रोज और अधिक से अधिक नाम जपने की चेष्टा करें तो इससे भगवत भक्ति बढ़ेगी और भगवत समर्पण होगा तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी जी दुख में भक्ति ज्यादा होती है सुख में कम हो जाती है हा ऐ हा ऐसा
है अगर सुख में भगवान की दुलार वृत्ति देखो कि हम पर कितना दुलार है भगवान का तो बारबार उनकी याद आएगी नहीं देखो कितना दुलार है लोग ठंडी में कपड़े नहीं है काप रहे हैं मुझे बढ़िया कपड़े भगवान ने दिए मुझे बढ़िया मकान दिया मुझे बढ़िया परिवार दिया बड़ी कृपा है भगवान की बड़ा दुलार तो बारबार भगवान का स्मरण आवे जब हम सुख भोगने में तो फ भगवान का वि स्मरण हो जाएगा और सुख जितने उनको सबको प्रसाद बना ले भगवान को अर्पित करके चाहे वस्त्र हो चाहे रुपया हो चाहे जो भगवान को स्वामी बना
ले स्वयं सेवक बन जाए तो सुख पूर्वक भगवान की प्राप्ति हो जाएगी दुख में तो भगवान का सुमिरन होता ही है और सुख में हो सुख दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए संत ने कहा तो सुख में तो और बढ़िया सुमिरन होना चाहिए क्योंकि चकाचक कोई परेशानी ले तो और राधा राधा राधा राधा दुख में तो परेशानी युक्त राधा राधा सुख में आनंद युक्त राधा राधा दोनों में हो जाएगा अभ्यास करो अभ्यास भोगों के मिलने पर भगवान छूट जाते हैं यह गलत
बात है भोगों के मिलने पर और भगवान का दुलार लगना चाहिए नहीं कि देखो भगवान हम पर कितने प्रसन्न है हमारी कोई असुविधा ही नहीं सब सुविधा किए तो हम और जपे राधा राधा राधा राधा राधा महाराज जी आपके दुनिया भर में इतने शिष्य है लाखों हजारों मैं भी उन में से एक महाराज जी बहुत प्यार करता हूं आपसे जी लगता कि क्या मेरे गुरु य जान पाएंगे कि मैं इतना प्यार करता हूं उनसे क्या मैं उनको जना पाऊंगा कभी क्या तुमय जान पाओगे गुरु तुमको प्यार करते तभी तुम गुरु से प्यार करते हो तुम
जान पाओगे कि गुरु तुमको प्यार करते तभी तुम्हारे हदय में गुरु के प्रति प्यार आया है आपकी तरफ से नहीं है गुरु की तरफ से गुरुदेव गुरुदेव भाव में आचार और गुरुदेव को प्रसाद खिला सकते हैं कि अनिया खिलाना पर्याप्त प्रसाद कैसे खिला सकते हो भगवान ते हैं बगल में तो भगवान को खवा के जैसे हा ऐसे हां ऐसे ऐसे ऐसे य ये उत्तम बात है कभी कभी भाव में आता है कि गुरुदेव को भी आचार्य को अनिया ही खिलाए नहीं नहीं नहीं गुरुदेव को पसंद आएगा पहले इष्ट को फिर आचार्य को फिर गुरुदेव को
ये गुरुदेव को पसंद आएगा नहीं हां बहुत सुंदर बहुत सुंदर मन में जैसे इच्छा आती है तो मैं फिर कहती हूं कि नहीं मेरे को ये कुछ नहीं चाहिए और थोड़े दिन बाद वही चीज पूरी हो जाती है तो श्री जी और ठाकुर जी क मुझसे नाराज तो नहीं कि वो इच्छा जल्दी जल्दी पूरी कर देते हैं नहीं वैसे चाहिए कि इसमें हमको हर्षित नहीं होना चाहिए जो हमारी इच्छाओं की पूर्ति हो तो हमें अपने ऊपर प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा कर देना चाहिए कि हम क्या भक्त है प्रभु को सुख देने की बात नहीं सोचते अपने
सुख मांगने की बात सोचते हैं और श्री जी मैं कभी मांगू भी तो आप पूरा मत करना ऐसा प्रार्थना करना चाहिए हमें राजी नहीं होना चाहिए नहीं हमारा मन मांगता रहेगा उधर वो पूर्ति करते रहेंगे और छुपते रहेंगे वो छुपते रहेंगे और हम अपनी कामनाओं की पूर्ति में पूरा जीवन बर्बाद कर देंगे और कामनाओं का क्या अस्तित्व ये कभी टिकती थोड़ी है अभी एक कामना पूर्ति दूसरी खड़ी हो गई तीसरी तो हम एक भक्त थी उन्होंने भगवान से कहा था कि यदि मैं स्वर्ग मांगूं तो मुझे नरक भेज देना यदि मैं सुख मांगू तो मुझे
दुख दे देना हे नाथ आप मेरे मन की कभी पूरी मत करना उसे उत्तम बात यही है कि हम प्रभु से प्रार्थना करें कि मेरे मन की पूर्ति ना करना आपके मन में जो वही करना जी श्याम जीवनी शरण जी नम महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरी उम्र 14 साल है मैं अखंड ब्रह्मचर्य का नियम लेना चाहता हूं उसके लिए मेरे को क्या पालन करना पड़ेगा बहुत कठिन है बच्चा बहुत कठिन है पहली बात तो हर समय गुरुजनों की नजर में होने चाहिए आप दूसरी बात सांसारिक पढ़ाई वाले बच्चों के
बीच में नहीं होने चाहिए आप गुरुकुल में होना चाहिए बिना गुरुकुल में वो भी गुरु की नजर में गुरुकुल में कु ना हो जाए एकांत सेवन ब्रह्मचर्य के पालन के लिए सात्विक आहार असुविधा युक्त जीवन गुरुजनों की कठोर आज्ञा में रहना तब जाकर के क नहीं तो अभी तो बच्चा हो अभी से थोड़े दिनों में ऐसे जैसे घुन लग जाता है ना लकड़ी में अंदर खोखला कर देता है ऐसे वासना दुर्वासना मम सदा परिक शति व पूर्व जन्म की संस्कार पूर्व जन्म की कामनाए आपको गिराना शुरू कर देंगी यह कहते हैं महाराज जी कि हम
को यही छोड़ दियो और ये बहुत मतलब राधा नाम भी जितना कर बातें करते हो दूसरा पूरी चतुरा रोज पढ़ते हैं जी लेकिन अब इनको अकेले कैसे क्या नहीं इसमें य सब समझने की बात है कि घर में या परिवार में या स्कूल में अखंड ब्रह्मचर्य का माहौल नहीं मिलेगा और बिना माहौल के हम अखंड ब्रह्मचर्य अभी मोबाइल रखें नए लड़कों से बात करें तो अखंड ब्रह्मचारी अखंड शब्द बहुत भयावह है उनकी सोच है व बस हमें लगता है कि ब्रह्मचर्य शब्द रखो अखंड शब्द छोड़ दो अखंड भगवान के ऊपर छोड़ दो कि आप जैसे
रखो हम तो चाहते हैं अखंड लेकिन अखंड भगवान को समर्पित कर दो और ब्रह्मचर्य में रहो जब तक ब्याह ना हो ब्रह्मचारी रहो भगवान की इच्छा होगी तो गृहस्थ में ले जाएंगे भगवान की इच्छा होगी विरक्त में ले जाएंगे ऐसे चलो क्यों अपने जीवन को भगवान के ऊपर सौप दो सब संभाल लेंगे जी ब्रह्मचर्य में जल्दी नहीं उठा पाता सुबह सारा ब्रह्मचर्य मान लेते हैं पर सुबह जल्दी नहीं उठा जाता और ठंड में तो बिल्कुल [हंसी] नहीं एक लोटा ठंडा पानी रख लिया कर असल बात अच्छा लगन लगई तो फिर यह सब बातें हट जाती
लगन नहीं लगी ना इसलिए क साल के हो आप 16 हां तो इतने तीन वर्ष हो गए थे हमें बाबा बने हुए हैं 16 वर्ष में तीन त्रिकाल स्नान गंगा जी त्रिकाल प्रात क्या हमारा अभ्यास रात्रि में 2 बजे उठने का रहा है अब तो और जल्दी हो गया है उस समय जैसे गंगा किनारे टर्च नहीं है बिजली नहीं है तो 2 बजे रात्रि के उठना और थोड़ी देर भजन में बैठ के फिर गंगा के किनारे जाना स्नान आदि करना और गंगा स्नान इस समय एक डुबकी लगाओ तो पता लगेगा सर है कि नहीं इतना
ठंडा पा लि आपको लगता नहीं कि अभी थोड़ा सा और सो जाऊं जैसे ही नहीं नहीं हमें कभी नहीं लगा कभी नहीं लगा हमें यही लगा है कि अगर हमें एक झपकी लगी और घड़ी में देखा तो कई बार भ्रम हुआ है कि घड़ी गलत है क्या ये अभी कह रहे 20 मिनट हुआ है और मुझे लगता मैं घंटों सो चुका और बैठकर भजन करने का मन होता अधिक से अधिक भजन करूं सोने का यह कभी जिंदगी में नहीं आया कि आप आराम ऐसा कभी जिंदगी आज भी नहीं बच्चा बीमार शरीर है 8 बजे लोग
सुलाते हैं 11 बजे उठकर बैठ जाते हैं 11 बजे से दिन सध चल रही हो 11 बजे तक चलेगी कभी आराम विश्राम राम काज की बन मोई कहा विश्राम अंकित मित्तल जी पानीपत श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी नकारात्मक शक्तियों के बीच सकारात्मक कैसे रह सकते हैं बाहर बहुत वय विचार मास मदिरा कारोबार यह सब होता है मन कुछ नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं हो रहा हमारे दिमाग में जो हो रहा उसे हटाना है बस किसी का भी हो हमारे दिमाग में जो हो रहा है उसको हटाना बस आप अपना चश्मा बदल दीजिए तो पूरी
सृष्टि बदली नजर आएगी सृष्टि को आज तक किसी ने नहीं बदल पाया देखो हमारी दृष्टि बदली तो पूरी सृष्टि बदल जाएगी तुलसीदास जी की दृष्टि बदली तो सिराम में सब जग जानी करो प्रणाम जोरी जुग पानी अगर हमारी दृष्टि ठीक है तो सृष्टि ठीक है हमारी दृष्टि खराब तो सृष्टि खराब अपने दिमाग की यह जो गंदी बातें इनको हटा दो आपका दिमाग जहा स्वस्थ हुआ हमको सब भगवान हमारे आते इतने रूपों में जैसे एक बार कोई ऐसा था जो मदिरा पीता है और मांस खाता है उसको लोगों ने कहा कि बाबा के सामने कैसे पहुंच
गया इसको नहीं जाना चाहिए तो हम कहा वो क्या जाने इसको जरूर आना चाहिए बीमार आदमी अस्पताल नहीं आएगा तो और क्या आएगा स्वस्थ आदमी आया अस्पताल तो कोई बड़ी बात है क्या बीमार आदमी आवे ये बीमार है बिचारे ये तो संतों के विशेष कृपा पात्र है हमें अपने दिमाग का बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोई जो दिल खोजो आप लो तो हमसे बुरा ना महाराज जी कभी कभी नकारात्मक लोगों को सकारात्मक ज्ञान दे तो खुद ही दुश्मन नजर आने लग जाते हैं हमें लगता है हमें लगता है ज्ञान देने की एक
पद्धति है सबको ज्ञान नहीं थोपना चाहिए यह भी बात समझो हमें आरत अधिकारी जब पावई आरत अधिकारी जब पावे गु तत् साधु दुरावे जैसे आपसे कोई जुड़ा आपको देखता है सत्संगी है बहुत अच्छे आचरण तो यार मेरा सुधार कैसे हो अब आप बोल सकते हो ऐसे उपदेश ले दिया जाता अवसर पर दिया जाता है उपदेश या वोह अधिकारी होकर पिपासु होकर जिज्ञासु होकर आपके वचन पीना चाहता है आपके वचन समझना चाहता है तब दिया जाता है ऐसे नहीं नहीं तो मौन रहा जाता है ऐसे थोपा नहीं जाता अपनी भक्ति अपने ज्ञान को किसी के ऊपर
थोपा नहीं जा सकता वो पिपासु है जिज्ञासु है तो फिर दिया जाता है तो मौन रहो नाम जप करो आपसे कोई आपकी ही टेबल में कोई शराब पी रहा है कोई मांस खा रहा है कोई अलग अलग मान लो आप फिस में हो तो आपको क्या करना है आप पानी पियो उनका विरोध नहीं उनमें भगवान को देखो और यह माया की लीला चल रही है कहीं कोई विस्पोट नहीं कहीं कोई परेशानी लंका में रहकर उत्तम भक्ति वि भीषण जी ने कर ली रावण के प्रधानमंत्री भी थे भाई तो थे ही प्रधानमंत्री भी थे तनिक भी
राक्षसी भाव नहीं था और रावण के भाई है उत्तम भक्ति को प्राप्त हो गए तो जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग चंदन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग अगर उत्तम प्रवृत्ति है तो हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा आपको अपने को मजबूत करो आप अपने को ठीक करो अपने पैरों में जूते पहन लो पूरे संसार में कारपेट बिछाने की जरूरत नहीं है ले कहां तक बिछाओ ग कारपेट अपने जूते पैरों में डाल लो तो आपका पैर सुरक्षित हो अपनी दृष्टि सुधार लो संसार सुधर गया सृष्टि कैसी बोले जैसी तुम्हारी दृष्टि जाक रही भावना जैसी
प्रभु मूरत देखी न तैसी दुर्योधन को कभी भगवान भजन से होता है वो भजन करता नहीं था देखो परिवर्तन विदु रानी जी का किस कोटि का अभी देखा नहीं श्री कृष्ण को केवल आवाज आई श्री कृष्ण आए हैं देहाती स्थिति क्योंकि भजन कर रही थी इसलिए नाम जप और बढ़ाओ नाम जप बढ़ाओ आप में सामर्थ्य आएगी दूसरों के दोष आपके प्रभाव से नष्ट हो जाएंगे बोलना कम संकल्प ज्यादा कि हमारे मित्र शराब पीना बंद कर दें आपका भजन है वो जाकर उनकी बुद्धि को शुद्ध कर देगा जैसे लोग हजारों लोग कहते हैं कि हमारा मांस
छूट गया शराब छूट गई हमें लाभ मिला तो हम किसी के घर जाकर थोड़ी कहते यहीं से अब वो भगवान काम कर रहे हैं वाणी के द्वारा भगवान काम कर रहे हैं भगवान की कृपा वह सब जीवों को सुधार जो पूरी सृष्टि के स्वामी भगवान है ना वो सब कर रहे तो हमें चाहिए कि हम य सृष्टि का कार्य भगवान के ऊपर छोड़ दे और अपना संभालने का भार जो हमारे अंदर दुर्गुण हम प्रभु से प्रार्थना करके उनको दूर करें और नाम प्रयास हमारा सफलता भगवान के हाथ में ये सृष्टि भगवान के हो जाने हमारे
समीप जो हैं वो सुधर सकते हैं तब जब हमारे अंदर भजन बल होगा भजन बल नहीं होगा तो नहीं सुधर सकते पक्का समझ लो भजन बल से सुधारा जा सकता है तो पहले तुम खुद बलवान बनो कि काम तुम्हें परास्त ना कर पावे क्रोध तुम्हें परास्त ना कर पा तब तो दूसरे को सुधारने की बात सोचे अभी तो हम चले हैं और अगर प्रहार हो गया तो देखो आप कह नहीं रहे लोग हमारे दुश्मन बन जाते हैं तो यह भी बात नहीं आनी चाहिए तुम करो दुश्मनी हम करेंगे तुमसे प्यार तुम्हें बदल के दिखाएंगे तुम्हें
तब तो माना जाए कि बदलने की क्षमता आ गई है नहीं तो अभी बदलने की क्षमता नहीं अभी आप बदलो ठीक है प्रभु जबसे शरणागत हुए ऐसे आप बोलते की इच्छा जानी चाहिए तभी प्रभु इच्छा बढ़ती जा रही है कि लगता है कि आपके दर्शन दोबारा कर लू दोबारा कर लू कोई जा रहान लगता उनके साथ वो इच्छाएं निषेध है जो भगवान और गुरु से विमुख करती है गंदी इच्छा है लेकिन जो अच्छी इच्छा है उनको और बढ़ाना चाहिए गंदी इच्छाओं का त्याग करना चाहिए लेकिन हम श्री जी के दर्शन गुरु जी के दर्शन भगवन
नाम जप भगवत लीला कथा ये इच्छाएं तो बढ़नी चाहिए अगर य इच्छा बढ़नी नहीं तो लाभ क्या मिला हमें भक्ति का ठीक है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
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