हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम श्री परमात्मने नमः ओम श्री परमात्मा ने ओमकार मंत्र ओमकार मंत्र गायत्री छंद गायत्री चंद परमात्मा ऋषि परमात्मा ऋषि अंतर्यामी देवता अंतर्यामी देवता आत्म प्रीति अर्थे आत्म प्रीति अर्थे जपे विनियोग जपे विनियोग ओ ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम होठ बंद कर देना है और ज्यादा देरो नहीं करना है हरि ओम हरि ओम हरि ओम ये
परमात्मा का मंत्र जो है इसके ऋषि भगवान नारायण है इस मंत्र की महिमा जानने वाले भगवान नारायण स्वयं है उसके देवता अंतर्यामी परमात्मा स्वयं है ओमकार मंत्र पाप शमन रोग शमन और परमार्थिक सत्ता सुख स्वरूप ईश्वर में प्रतिष्ठित होने की योग्यता बने वाला महामंत्र है इसके उच्चारण मात्रा से तन के मन के दोष क्षीण होने लगते कमरा हो और अकेले व्यक्ति हो और उसमें य गुंजन करे तो कमरा प्रभावशाली हो जाएगा व्यक्ति गुंजन करे प्रतिदिन 10 मिनट 10 मिनट तीन टाइम तो उसका भी प्रभाव में निखार आने लगेगा दोषों में जो पुरानी आदत है पराक्रम
की ओमकार की गुंजन करता है वह पुराने दोष भी उसके गायब हो य ऐसा महामंत्र है ओ ओ ओम ओ ओ ओ ओ ओ ओम ओम ओम ओम ओम ओ शक्ति वातावरण में छा जाएगी ओम ओ अध्यात्मिक रा का विकास होगा ओ ओम ओम ओम ओम ओम [संगीत] ओ [संगीत] ओ ओ जितनी देर बोलने में लगे उतनी देर शांत होते जाओ प्रभु में [संगीत] ओम ओ परमार्थिक सत्ता में प्रवेश पाने की सुंदर रीति भगवान ने बताई ओ ओ ईश्वर ही बताते ईश्वर से मिलने की तरकीब ईश्वर प्राप्त महापुरुष ही उस तरीके की यात्रा करा सकते
दूसरे के बस की नहीं [संगीत] ओ इस प्रयोग से जो फायदा होता है व आप 12 12 साल मन मानी रीति से करते रहे वोह लाभ नहीं होता जो इन युक्तियों से ईश्वर प्राप्ति में शीघ्र लाभ होता है ओ ओ ओ ओम [संगीत] ऐसा कोई सुख नहीं जो अंतर शांति से उसका सीधा संबंध ना हो ओम शांति ओम शांति हम परमार्थिक परमात्मा में शांत हो रहे हैं हमारी चिंता शोक और पाप समाप्त हो रहे हैं हम ईश्वर की परम सत्ता में शांत हो रहे हैं भगवान की गुरु की कृपा हम पर बरस रही है जो
उल्टा था अष्टदल कमल वो धीरे-धीरे सीधा होता जाए रोज अभ्यास करने हृदय कमल जिसका अभ्यास है उसका खिल रहा है ऐसा एहसास होगा हृदय कमल खिलते ही चेहरे पर एक आत्मिक खुशी की मधुमय झलक दिखाई पड़ेगी हृदय कमल खिलते ही सुख का एहसास होने लगेगा निर्विका नारायण की कृपा का प्रसाद गुरु कृपा का एहसास होना लग होने लगेगा शांति ओम आनंद ओम आनंद ओम आनंद आनंद ओम आनंद ओम आनंद ओ नमो भगवते वास सुदेवा य जो मंत्र है द्वादशी अक्षर बा अक्षरों का मंत्र इसकी एक माला जप करके शादी विवाह अथवा यात्रा में बड़े विघ्न
आने वाले हैं लेकिन एक माला करके जाओ सारे विघ्नों का शमन हो जाता है लेकिन यह संसार व्यवहारिक सत्ता के विघ्नों का शन य ंत्र की महानता इतनी नहीं है मंत्र की महानता तो परमार्थिक सत्ता में बिठाने की है मतलब आत्मा में शांति पर दिलाने की लेकिन लोगों के पीछे भूत लगा होता है ऐसे ही रटते रहते चिल्लाते रहते बोलते जाए फिर शांत होते जाए तो शांत होना व्यवहारिक सत्ता नहीं परमार्थिक सत्ता ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवा ओम नमो भगवते वासुदेवा ओ नमो भगवते वासुदेवाय ओ नमो भगवते यह ओमकार मंत्र जो है ये आद मूल
गायत्री अंतक शुद्ध हृदय वालों के लिए आरंभ में यही मूल गायत्री था फिर बुद्धि थोड़ी अशुद्ध हुई तो गायत्री माता का मंत्र 24 अक्षरों का हुआ फिर वेद और पुराण शास्त्र सब बाकी तो सात्मा परमात्मा का स्वाभाविक ध्वनि ओमकार ओमकार सात बार जप करने के बाद नाभि केंद्र के नीचे एक प्रकार का मूलाधार केंद्र रहता है उसमें तरंग उत्पन्न होते हताशा निराशा को छू कर देते हैं बल ओज भर ते यहां तक कि रोग के कीटाणु भी भाग खड़ जैसे गायत्री मंत्र के महानता का अनुभव करने वाले ऋषि विश्वमित्र थे देवता सूर्यनारायण ऐसे ओमकार के
महानता का अनुभव करने वाले भगवान आदि नारायण विष्ण ओमकार मंत्र परमात्मा ऋषि अंतर्यामी देवता जैसे गायत्री मंत्र का देवता सूर्य है इस ओमकार मंत्र का देवता अंतर्यामी परमेश्वर ख इस ओमकार की [संगीत] महिमा कोई व्यक्ति जीव से पूर्ण गा नहीं सकता इसके अर्थ भी बहुत क्योंकि सारी सृष्टि का मूल है जैसे पृथ्वी से कितनी चीज वस्तु पेड़ पैदा होते कितने किस्म के जीव जंतु सबका आधार पृथ्वी है ऐसे पृथ्वी जल तेज वायु आकाश सबका आधार जो परब्रह्म परमात्मा है उसका वाचक ओमकार एक पंडित जी थे बड़े अच्छे सात्विक थे अभी उनका शरीर नहीं है उन्होंने
एक करोड़ ओम नमः शिवाय ओम लगा के नमः शिवाय के मंत्र और पार्थिव शिव लिंगों का पूजन किया तो कहते थे कि मेरे मन में आया कि शब्द के पीछे रूप होता है जो भी शब्द होता है उसके पीछे उसका रूप होता है तो नमः शिवाय मुझे तो कोई दर्शन नहीं हुआ रूप का ऐसा मैंने सोचा तो मेरे सामने शिव जी खड़े हो गए व सज्जन आदमी थे गप लगाने वालों में से नहीं थे तो ओमकार मंत्र अगर किसी रूप का ध्यान करने के लिए भी जपते हो तो वैसा बन जाएगा नहीं तो ओमकार निराकार
भी है साकार भी ओमकार मूल गायत्री है और ओमकार का यह गुंजन आम आदमी नहीं कर सकता ज्यादा मायों को भी मना किया हुआ है ओम अकेला है तो ओम जपेंगे तो एकदम फक्कड़ साय के निर्भग विचार हो जाए स्वामी राम तीर्थ प्रोफेसर थे ओम जपते थे विरक्त हो गए अकेले फक्कड़ बन गए ओम ना जप हो गया कि रग रग में उसका प्रभाव छ गया एक रात को सरदार पूर्ण सिंह चौका देखा टिमटिमाते तारे अंधेरी रात और कोई ओमकार बोल रहा है इधर उधर देखा तो देखा कि व झोपड़ी से आवाज आ रहा है
देखा तो राम तीर्थ के शरीर से वो ध्वनि निकल रही तो उनका सेवक पूर्ण सरदार घबराया ओ तीर्थ राम ओ तीर्थ राम तेनू कुछ होए गया भराव तीर्थ राम बोले क्या हुया बोले ओम ओमता अर्जुन के शरीर से भी ध्वनि निकलती थी तो तीर्थ राम खुश होकर खूब नाचे के पूर्ण सिंह अब मेरी साधना पूर्ण हो गई आज तक तो मैं जपता था अब ये ध्वनि स्वाभाविक निकलने ल अब मैं तीर्थ नाम नहीं हूं अब राम तीर्थ हूं अब यह राम जहां भी जाएगा वह भूमि तीर्थ तोव को प्राप्त होगी क्योंकि ओमकार की सिद्धि हो
गई प्रोफेसर राम मूर्ति पहलवान राम मूर्ति गोरखपुर में किसी संत के दर्शन करने तो संत ने भी अपने राम नाम मंत्र की ध्वनि की ऐसी मानसिक सिद्धि कर दी थी बाहर से बोले फिर धीरे-धीरे अंदर में चलने लग चलाते फिर चलने लगता तो मंत्र की सिद्धि संकल्प सिद्धि होती है तो वो संत गोरखपुर के गांधी कहे जाते थे इतने सत्यवादी और अच्छे स्वभाव के थे फिर वो संत हो गए पहले तो कार्यकर्ता थे गोरखपुर के गांधी कहे जाते तो साधु तोव राम मूर्ति उनके दर्शन करने गए बोले तुम पहलवान हो हेनरी सेंडो जो विश्व विख्यात
पहलवान था आकड़ के आया भारत में और तुमने उसको कुश्ती के लिए ला रा तो व तुम्हारा बल देखकर कुश्ती लड़ने से मना कर दिया तुम अपने छाती पर पाटिया रख के हाथी को तो पसार कर देते हो बैल गाड़िया पसार कर देते हो दो 25 हस पावर वाली जीपों को जंजीरों से पकड़ते हो जीप घूम घूम के जंजीरें टूट जाती लेकिन तुम इतने बलवान हो मेरा अंगूठा जो है ना हिल रहा है पैर का उसको तुम रोक के दिखाओ ये तो एक प्रकार की पहलवान की मस्करी की बात हुई लेकिन वो महापुरुष था मंत्र
सिद्धि पहलवान राम मूर्ति उनका अंगूठा हिलने से रोकने का प्रयास किया लेकिन विफल ग तो मंत्र जाप से संकल्प में बड़ा बल आ जाता है उस संकल्प को संसार की तुच्छ चीजों में खर्च करे तो फिर तुच्छ फल मिलता है लेकिन उस संकल्प को नि संकल्प नारायण में शांत होने के लिए करे तो ऐसी कोई शक्ति नहीं जो विश्रांति से पैदा ना हो आम धनो करो ते करू ते करू थक जाएगा संसार में उब जाएगा बुड्ढा हो जाएगा थोड़े पैसे इकट्ठे होंगे बीमार हो जाएगा बहुत पसारा ना करो थोड़ा शांत भी हो जाओ ध्यान भी
करो नहीं तो अभी टाल है और टाल बढ़ जाएगी थक जाओगे जो लोग लंबी कार की मुसाफ करते हैं उनको समझना चाहिए कि मौत को जल्दी नहीं बुलाए खुला सिर रखने से भी आंख नाक और कान जल्दी बुड्ढे हो जाते हैं और दिमाग और फिर खुली हवा में कार में मुसाफिर इंद्रिया काम करती है गाड़ी ड्राइविंग करो तो तो आपकी आंख भी काम करती है कान भी काम करता है मन भी काम करता है पैर भी काम करते चित भी काम ये कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है लंबी ड्राइविंग करना जिसको जल्दी मरना हो वह
हाईवे की मुसाफिर खूब करें जिनको जल्दी बूढ़ा होना हो वो खुला सिर रख के खूब घूमे जिसको संसार में जल्दी थकना हो व संसार का ज्यादा चिंतन करें जिसको इन सभी तकलीफों से बचना है ओमकार का जप करे फिर सोए ओमकार का जप करके शांत हो जाए तो थोड़े परिश्रम से ज्यादा सफलता आती नहीं तो परिश्रम कर कर के मजूर की ना थक के मर जाएंगे संसार ऐसा कोई सामर्थ्य नहीं कि चित्त की विश्रांति से उसका उद्गम ना हो चाहे अणिमा महिमा गरिमा लगमा सिद्धि हो चाहे रिद्धि होहे सत्य संकल्प सामर्थ्य हो चाहे लोक लोका
के रहस्यों को जानने वाली कला सबका उद्गम स्थान चित्त की विश्रांति से होता है शरीर की विश्रांति से शरीर की थकान मिटती लेकिन चित्त की विश्रांति से जीवात्मा में परमात्मने धीरे मानसिक होने लगता है फिर भी सदा मानसिक नहीं चलता मन इधर उधर फिर ओम ओम ओम एक बार राम तीर्थ जंगलों पहाड़ों में हिमालय में घूमने के भी शौकीन थे ओम ओम ओ तो साथ में एक दो भगत थे हिमालय की बरसात बोले स्वामी जी ये तो बरसात आई भी बोले राम बा शकम करता कि नहीं बरसना बादल बिखर गए बरसाद एक बार चार पांच
री छड़े उन पर टूट पड़े नेत्र युद्ध से ओम ओम करके रीछ को भगा दिया एक बार कोई शेर उनके रास्ते में आ गया नेत्र युद्ध से शेर को वो बहुत गरीब डीबी कुटुंब से प्रोफेसर हुए एमए हुए पढ़ते थे तो एक किसी मोहल्ले में लाहौर के किसी मोहल्ले में उन्होंने छोटा सा कमरा ले रखा था तो जब स्कूल में प्रश्न होते कॉलेज में तो 10 में से आठ के उत्तर लिखो आठ में से पांच के उत्तर लिखो पा में से तीन के उत्तर लिखो तो ये 10 के 10 आठ के आठ पांच के पांच
सब उत्तर लिख देते और लिखते कि सभी प्रश्नों के उत्तर लिख दिए मन चाहे उनको चेक कर लो सभी ठीक है सभी सच्चे और सभी सच्चे साबित होते थे नके प्रभाव को देखकर एक विद्यार्थी ने अमीर विद्यार्थी था इनसे दोस्ती की और दोस्ती करते करते बोला है तुम कहां रहते हो मुझे दिखाओ तो तीर्थ राम टालते रहे एक दिन उसने हट ली कि तुम अपना निवास मुझे नहीं दिखाते हो मैं आज नहीं छोडूंगा तुम्हारे साथ ही चलूंगा बहुत आग्रह था मित्र का तो सस्ता कमरा दो चार रुपए किराए में मिले ऐसा किसी जगह पर ले
रखा तो कमरे का ताला खोलकर उन्होंने दरवाजा खटखटाया [संगीत] तो साथी ने पूछा क्या अंदर कोई रहता है क्या बोले मेरे दो दोस्त और रहते हैं तो उनको ताला लगा के तुम चल दि तो बोले हां ऐसे ही दोस्त है अभी अभी चले जाएंगे खटखटा आता हूं तो दोस्त चले जाए तो बोली ऐसे कैसे दोस्त हैं कि खटखटा और चले जाए तो उसने धक्का मार के खोला तो सांप अपने बिल के तरफ जा रहे थे तो अमीर लड़का दंग रह गया किसे जहरी काले सांप बोले मेरा क्या बिगाड़ ओम ओम उनमें भी मैं ही तो
हूं मेरे दोस्त है तो ओमकार का अर्थ है सब में वो ओम एक ही परमात्मा है सब में एक सत्ता है ओ मनाव ईश्वर अनेक रूपों में दिख रहा है ओ माना वही परम सबका सुहृद सबके यज्ञ तप का फलका भोगता है ओ ओम इति आलम ओम कामना पूर्णस सब कुछ ओ में आ जो भी अर्थ लगा [संगीत] करो उनको साक्षात्कार हुआ फिर अमेरिका उपदेश देते देते अमेरिका पहुंचे तो प्रेसिडेंट रोजवेल राष्ट्रपति उनके चरणों में आकर बैठता बड़ी शांति मिली मनुष्य मात्र की मांग है आनंद और शांति तो महापुरुष के संपर्क में आनंद और शांति
मिलती तभी अपन लोग खींच के आते हैं भले अभी अपनी योग्यता कम है तो आंशिक मिलती है तो उनको है तभी तो अपने को मिलती मनोरंजन अलग बात है और चीज वस्तु खाकर सुखी होना यह विषय विकारी सुख इसमें तो जीव का पतन होता है लेकिन न सूंघने का ना सेक्स का ना भोगने का ऐसे शांति और आनंद आ जाए जीव उन्नत होता है तो जितना जितना शांत और आनंदित रहे ध्यान में भजन में उतना उतना व जीता आत्मा होगा जीता आत्मा परमात्मा समाहित शीतोषण सुख दुखे शु तथा मान अपमान उसने परिस्थिति को जीत लिया
उसका मन तात्मा हो गया फ उसे ठंडी हाय मुझे ठंडी लग रही नहीं शरीर को संभालेगा लेकिन मुझे ठंडी लग रही है मुझे गर्मी लग रही है मुझे सुख मिला मुझे दुख मिला वह अज्ञान उसके चित् में नहीं रहता सुख दुख ठंडी गर्मी शरीर और मन तक है ओ तो ओ मान मैं क्या हूं वो मैं ही जानू किसी महापुरुष से पूछा कि बाबा आपके जीवन में कोई दुख नहीं आता सदा खुश रहते हो आप दुखी नहीं होते बोले नहीं दुखी नहीं होते बोले दुख नहीं आता बोले है दुखी नहीं होता बोले सुखी नहीं होते
बोले सुख आता है तो आप सुखी नहीं होते दुखी नहीं होते क्यों बोलिए आने जाने वाली चीज मैं तो सदा रहता हूं उनसे क्यों जोड़ सहज में उन प्रसंगोचित सुख के समय सुखी हो गए नाराज के समय रोष दिखा ले अंदर में कबीर जी ने कहा उठ बैठ तो वही उठाने का तो कबीर हम उसी ठिकाने उसी अपने आत्मा परमात्मा के [संगीत] ठिकाने ऐसा पुरुष अपने आप में तृप्त हो जाता है उसका तो मंगल हो जाता है लेकिन उसके नाम की कोई मनौती मानते तो उनके भी काम होने लगते वैसा महान आत्मा हो जाता