नमस्कार मैं राणा यशवंत आपका स्वागत करता हूं दिन महीने साल यह समय की गिनती की इकाइयां है हमारी याद भी कमो बेश लेकिन दिन महीने साल में एक नयापन भी है नया दिन नया महीना नया साल और नया का मतलब यह है कि आप पुराना छोड़ रहे हैं जब पुराना छोड़ के नए में आ रहे हैं तो अब नया साल है 2024 जा रहा है 2025 आ रहा है तो जाहिर है देश और दुनिया के भीतर जितनी चीजें हैं आने वाले समय में जो खतरे और चुनौतियां खड़ा हो रही हैं उसके लिहाज से हम अपने
आप को कैसे तैयार कर रहे हैं हम नया क्या करने जा रहे हैं नया संकल्प हमारा क्या होगा नया साल हमारा होना कैसे चाहिए इस पर चर्चा के लिए आज मैं आचार्य प्रशांत जी के सामने हूं आपका बहुत-बहुत स्वागत नया साल कुछ नए सपने नए संकल्प इंसान बहुत कुछ सोचता है इस बार तो यह कर लूंगा इस बार तो वह कर लूंगा कई बार वह सोच लेता है लेकिन कुछ दिनों के बाद व फिर पुराने डर पड़ा जाता है लेकिन जो नया साल 2025 है कितनी चुनौतियों के साथ कितने खतरों के साथ कितनी संभावनाओं के
साथ और किस संकल्प के साथ नए साल में दाखिल हो सबसे पहले तो जब हम संभावनाओं खतरों चुनौतियों की बात करते हैं तो जो कुछ वैश्विक और व्यापक स्तर पर चल रहा है उसको समझना पड़ेगा और फिर हम देखेंगे कि उसका संबंध व्यक्तिगत तल से है कि नहीं है यह बड़ा चुनौती भरा साल है जो अब दस्तक दे रहा है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से कम ही ऐसे साल रहे हैं जब एक नहीं दो-दो बड़ी लड़ाइयां चल रही हो दुनिया में और तीसरी जगह पर तनाव इतना हो कि लड़ाई कभी भी फूट सकती हो
तो मैं 2025 को जब देखता हूं तो पहली चीज ये देखता हूं कि इन दो युद्धों का होने क्या वाला है रूस यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में जो चल रहा है तो ये एक बड़ी चुनौती है यह आ कहां से रही है वह आगे हम देख सकते हैं संबंध उसका भी इंसान के दिल से ही है हम पर 2025 पे हम व्यक्तिगत तल पर कोई संकल्प ले यह ले उससे जरूरी है कि हम पहले देखें दुनिया में क्या हो रहा है हो रहा है पहली चीज यह और दूसरी चीज वह जो कि अगर यह दो
युद्ध रुक भी जाए तो भी इन दोनों युद्धों से वह बड़ा खतरा है और ऐसा बड़ा खतरा है कि जितना बड़ा वह 24 में था उससे ज्यादा बड़ा 25 में है 26 में और बड़ा होगा और 20 साल 50 साल बीतते बीतते व खतरा इतना बड़ा हो जाएगा कि उस खतरे को बड़ा बोलने के लिए भी शायद कम ही लोग बचे ग्लोबल वार्मिंग ग्लोबल वार्मिंग क्लाइमेट चेंज च क्लाइमेट चेंज तो 204 में भारत को आप देखेंगे ना तो हमारे 95 प्र दिन करीब ऐसे थे 365 में से जब कोई ना कोई एक्सट्रीम वेदर इवेंट चाहे
वो क ना कहीं रहा है भारत में कहीं ना कहीं चल रहा था हम इसी तरीके से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जो सबसे ज्यादा गर्म दिन इस साल में हमने अनुभव करे हैं इतने इंसान के इतिहास में हमने कभी नहीं अनुभव करे 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा और 2024 के महीने और दिन और हफ्ते माने आप जिस भी स्तर पर औसत निकाले वह भी सबसे गर्म रहे हैं और यह सबसे खतरनाक बात नहीं है सबसे खतरनाक बात यह है कि 2024 2025 की
तुलना में आपको ठंडा लगने वाला है यानी 2025 ज्यादा गर्म होगा और ज्यादा गर्म होगा और वो भी उतनी खतरनाक बात नहीं है और खतरनाक बात ये है कि 26 और 27 की तुलना में आपको 25 चीज बहुत ठंडा लगेगा तो यह तो एक सतत प्रक्रिया शुरू हो गई ये एक सतत प्रक्रिया शुरू हो रही है जिसका अंत हमारे अंत के साथ होगा और हमारा अंत हो भी जाए वह शायद उतनी भयावह बात नहीं है भयावह बात यह है कि हम सबका अंत कराने के बाद अपने अंत पर आने वाले हैं ऐसी प्रजाति है मनुष्य
जो दुनिया की सारी प्रजातियों को खा गया बर्बाद कर दिया और सबको खत्म करने के बाद अंत में व खुद खत्म होगा हम खत्म होंगे वह हमारी नालायक है हमारा स्वार्थ है लेकिन जो बाकी प्रजातियां खत्म हो रही है उन्होंने कुछ नहीं करा है हम उनको बर्बाद करने वाले हैं और उस बर्बादी में 20 जो 25 है वह एक तरह का वाटर शेड ईयर वो सिद्ध होने वाला है हम यह समझिए कि जितनी देर में बात कर रहे हैं इतनी देर में दर्जनों प्रजातियां सदा के लिए विलुप्त हो गई यह मैं हमेशा क करता हूं
कोई भी बात करने आता है उससे क्योंकि यह बड़ा एक तात्कालिक फैक्ट हो जाता है इतनी ही देर में कितनी प्रजातियां विलुप्त हो गई और जो विलुप्त हो रही है इसका जो कारण है सबसे बड़ा वह क्लाइमेट चेंज ही है दिल्ली में यह जो सब चल रहा है अभी हमारा यह जो एक क्यूआई वगैरह है इसकी वजह सिर्फ यह थोड़ी है कि कंस्ट्रक्शन हो रहा है या पराली जलाई जा रही है या व्हीकुलर पोल्यूशन है उसकी वजह क्लाइमेट चेंज भी है और हम इस बात को समझने से इंकार कर रहे हैं मैं क्यों कह रहा
हूं 2025 वटर शेड ईयर होगा क्योंकि वैज्ञानिक कह रहे हैं कि बहुत सारे फीडबैक साइकल्स हैं जो अब एक्टिवेट होने जा रहे हैं और फीडबैक साइकिल क्या होता है हम इस पर पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि जो एक बार शुरू हो गया आप उसको रोक नहीं पाओगे तो 2025 में चीजें हमारे हाथ से निकलने वाली है जो हम कहते हैं ना स्टॉप क्लाइमेट चेंज या लिमिटेड टू 1.5 5 डिग्री और यह सब वो चीज हमारे हाथ से निकलने वाली है माने हमें यह अब कहने का हक भी नहीं बचेगा कि हम कुछ करके
क्लाइमेट चेंज को रोक सकते हैं तो नया साल इस भारी चुनौती के साथ हमारे सामने आर बड़ा खतरा है हमने कहा युद्ध है हमने कहा क्लाइमेट चेंज है अगला खतरा हम बात करें तो वह आ जाएगा फिर फिर सोशल मीडिया सोशल मीडिया बड़ा खतरा कैसे है क्योंकि हम अपनी बात कर रहे हैं ना इंसान की और इंसान माने उसकी चेतना माने उसका मन सोशल मीडिया ने आज इंसान के मन के साथ वह कर दिया है जो उसके इतिहास में कभी नहीं हुआ था हम ठीक से सोचने समझने के हम किसी भी मुद्दे पर ध्यान देने
के संदर्भ में नाकाबंदी हालत हो गई है हर आदमी नहीं पर जो लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते हैं वही जो चीज है वह फिर मेंटल डिसऑर्डर में परिवर्तित हो रही है और कुछ हद तक उसी का संबंध इस शताब्दी की भयानक महामारी लोनलीनेस अकेलापन उससे भी है यह बड़ा सवाल है मैंने देखा और व्यक्तिगत तौर पर कई जगहो पढ़ने के बाद मु लगा कि आवाज जिस रफ्तार से बढ़ रही है इंसान उसी रफ्तार से अकेला होता चला जा रहा है सोशल मीडिया ने परिवार के भीतर अलग अलग में लोगों को कैद करके रख
दिया है दोस्तों के बीच की दूरियां जो है वह सोशल मीडिया पर इंटरेक्शन से पट गई है लेकिन इंसान अपने आप में एक अलग एंटिटी हो गया एक साइलो है एक जेल के भीतर कैद हो गया यह कई तरह के अवसाद पैदा कर रहा है बकुल और समाज के भीतर कई तरह की बीमारियां बिल्कुल बकुल इस खतरे से निपटने कोई रास्ता देखिए रास्ता तो यह है कि जो एल्गोरिदम है ना उसको किसी ना किसी रेगुलेटरी बॉडी के परव्यू में लाना पड़ेगा क्योंकि एल्गोरिदम के पीछे लॉजिक होता है व लॉजिक इंसान देता है ऐसा थोड़ी है
कि आपकी फीड में कुछ भी यूं ही आ जाता है किसी ने शातिर आदमी ने बैठ के एल्गोरिदम लिखा है जो आपकी कामनाएं पकड़ता है और आपकी कामना के हिसाब से वही सब कुछ आपको दिखाता रहता है हा जो आपको प्लीज करेगा और आपके भीतर जो प्लेजर गिविंग हार्मोस वगैरह है उनको सीक कराएगा यह आदमी के साथ अत्याचार है मैंने एक बार यह तक कहा था कि यह एक तरह का मानसिक बलात्कार है यह आप नहीं भी कर रहे हैं तो भी एक तरह का सेंशुअल मास्टरबेशन है और आप सोच रहे हो कि आपने ऐसे
स्वाइप करा तो कुछ आ गया नहीं अगला जो आ रहा है आपके पास देखने के लिए कंटेंट रील शॉर्ट्स इसी पर रहता है ज्यादा अटेंशन लोगों का वह पीछे कोई बहुत चालाक आदमी बैठा हुआ है जिसने आपको पकड़ने के लिए इस तरीके से व्यवस्था बनाई है कि आप उसमें हुग ड रहोगे आप हट नहीं सकते हो और वहां आपको सच नहीं दिखाया जाएगा वहां आपको वह दिखाया जाएगा जो आपको अच्छा लगता है जो आपको अच्छा लगता है अच्छाई और सच्चाई यह दोनों अलग-अलग बातें होती हैं हमारे बड़े लोग पीछे के पुरखे हमें बता गए थे
ऋषियों ने कठ उपनिषद में लिखा था कि श्रे और प्रेय अलग-अलग होते हैं हम नचिकेता इतना समझो और जो लोग श्रेय का मार्ग छोड़कर प्रेय के मार्ग पर जाते हैं उनका समूल विनाश हो जाता है तो जो सोशल मीडिया है ये हमें प्रिय के मार्ग पर भेजती है प्रिय माने जो प्रिय लग रहा है जो पसंद आ रहा है भाई मुझे पसंद आ रहा है तो मुझे दिखाया जाएगा ये दिखाया जाएगा वही वही देख रहे हो जो तुम्हें पसंद आ रहा है और जो पसंद आ रहा है उसमें सच्चाई कहीं नहीं है व तुम्हें और
ज्यादा झूठ में कैद कर रहा है अब एल्गोरिदम को असिस्ट करने के लिए एआई भी आ गया है हम तो अब क्या हो रहा है कि जो कुछ मौजूद नहीं भी था वहां पर आपको खुश करने के लिए आपके मन को एल्गोरिदम पढ़ करके उसको क्रिएट कर देता है और आपको दिखा देता है और जितना अभी दिखा रहा है उसे कहीं ज्यादा 2025 में दिखा देगा तो यह होगी गजब तरीके की लोनलीनेस जिसमें आपको किसी इंसान की लगेगा कि जरूरत ही नहीं है क्योंकि मेरी सारी कामनाओं को तो यह स्क्रीन ही पूरा करने दे रही
है ना और जितना आप खुद को नहीं जानते होंगे उससे ज्यादा एल्गोरिदम आपको जानता है तो आपकी कामना की आपके भोग की आपकी हवस की एक-एक सामग्री स्क्रीन पर आपके सामने आती जाएगी और आप बिल्कुल रोमांचित होते जाओगे पुलकित होते जाओगे आप स्क्रीन से चिपक जाओगे जितना आप स्क्रीन से चिपक जाओगे उतना आप यथार्थ से परिवार से समाज से दोस्तों से दूर होते जाओगे क्योंकि स्क्रीन ही अब आपकी जिंदगी बन गई है ना आपको किसी और के साथ जाने की जरूरत क्या है हम और स्क्रीन को इस तरीके से तैयार किया जा रहा है कि
आप उसमें बिल्कुल घुसे रहो घुसे रहो घुसे रहो मने यह बहुत बड़ा खतरा है अब मैं वॉर के खतरे की बात करता हूं आप तुरंत मान लोगे क्योंकि उसमें बम फटता दिखाई देता है मैं क्लाइमेट चेंज के खतरे की बात करता हूं उसमें भी आप मान लो क् उसमें तूफान आता दिखाई देता है ज्यादा बारिश होती दिखाई देती है सूखा पड़ता दिखाई देता है समुद्र तल का उठना दिखाई देता है प्रजातियों का विलुप्त होना दिखाई देता है यह सब खतरे की बातें लगती है भयानक लगती है पर जब यह सोशल मीडिया की बात होती है
और उसमें एआई से संबंधित खतरे उसमें रिड्यूस ंग अटेंशन पस उससे रिलेटेड मेंटल डिसऑर्डर और रोली नेस इनकी बात होती है तो हमें उतना खतरा नहीं लगता क्योंकि वहां जो मामला है वो प्लेजरेबल है और जहर और ज्यादा खतरनाक हो जाता है ना जब मीठा होता है यह मीठा जहर है और यह बड़ा जबरदस्त जहर है यह हमको उन तरीकों से गुलाम बना रहा है कि हमें खबर नहीं लग रही है कोई आपको आकर के कॉलोनाइज करे बाहर से जैसे कैपिटल ज्म में हुआ कि जाओ पूरे देश को कॉलोनाइज कर लो तो आपको पता लगता
है आप विरोध करते हो आपके यहां क्रांतिकारी पैदा होते हैं गोली चलाते हैं बमों के धमाके करते हैं आप आजादी पाने की कोशिश करते हो पर कोई आपके मोबाइल के अंदर घुस कर के फिर आपके मन के अंदर घुस कर के आपको कॉलोनाइज कर ले तो आपको पता भी नहीं लगता आपको लगता है कि यह तो मुझे बहुत प्यार दिया जा रहा है यह तो मेरी कामनाएं पूरी की जा रही है यह जो सोशल मीडिया है आज आपको बंधक बनाने का कॉलोनाइज करने का और आपको लूटने का बिल्कुल नायाब तरीका है और उद्देश्य इसका बिल्कुल
वही है जो ईस्ट इंडिया कंपनी का था जो जितने भी यूरोपियन पावर्स थे वो कॉलोनाइज करने क्यों निकले थे कोई उनको खुजली नहीं थी कि हमें जाकर के यह जो काले और भूरे लोग हैं इनको डंडा मारना है वो कॉलोनाइज करने निकले थे पैसे के लिए चाहे वह चाइना के ओपीएम वर्स हो चाहे भारत का कॉलोनाइजेशन हो चाहे अफ्रीका का स्लेव ट्रेड हो वो सब किस लिए था वो सब पैसे के लिए था तो यहां से भी जो आपको कॉलोनाइज किया जा रहा है ना वो पैसे के लिए किया जा रहा है उसके खिलाफ आप
विद्रोह भी कर सकते थे इसके खिलाफ आप विद्रोह भी नहीं करोगे यह 2025 का बहुत भयानक खतरा निकलने वाला है वॉर्स क्लाइमेट चेंज के बाद यह अगला खतरा है यह बहुत इंटरेस्टिंग मामला है आचार्य जी कह रहे हैं कि पूंजी के जरिए निवेश करके या किसी की खेती किसी का उत्पाद इसका दोहन करके आप पैसा कमा रहे दिखता है लेकिन आपकी जो मानसिक कुंठा है या यौन कुंठा एं हैं उन कुंठा हों को पूरा करने के लिए यह जो सोशल मीडिया के जरिए कंटेंट आप तक पहुंचाया जा रहा है वह भी एक तरह का उपनिवेशीकरण
है कॉलोनाइज किया जा रहा है वहां से पैसा वो खींच रहा है और आपको अपना गुलाम बना रहा है ये बहुत दिलचस्प बात है मुझे लगता है कि इस तरीके से तो नहीं देखा गया होगा इसको लेकिन एक खतरा और है ओटीटी पर जो कंटेंट आता है और वो खुला हुआ मंच है आपके बच्चे आसानी से वहां तक जा सकते हैं और ओटीटी दरअसल एक तरह से सेमी पोर्न कंटेंट ही लेकर के आता पोर्न कंटेंट उस तरह का है और इसमें एक बड़ी आबादी जो हमारे बच्चों की किशोर अवस्था के में जो लड़के हैं वह
बीमार हो रहे हैं और पथभ्रष्ट हो रहे हैं डिरेल्ड हो रहे हैं और यह खतरा आपकी नई पीढ़ी के सामने बहुत बड़ा है य भी 205 में एक बड़ा संकट है वो वही चीज है ना कुछ भी ऐसा दिखाओ जो देखने वाले को प्लेजर दे देगा तो वह जो चीज दिखाई जा रही है उसमें हुग रहेगा और साथ ही साथ उसको भ्रम बना रहेगा कि यह जो हो रहा है यह तो मेरी चॉइस से हो रहा है क्योंकि मैंने यह चैनल चुना था या मैंने स्वाइप किया तो यह आया था या फलाने को मैं फॉलो
करता हूं इसलिए आ रहा है हमें पता भी नहीं लगा कि तुम उसे फॉलो कर नहीं रहे हो तुम्हें करवाया जा रहा है कोई धक्का देके काम कराए डंडा मार के बंदूक दिखा के तो पता चल जाता है कि हमारे साथ जबरदस्ती हो रही है हम पर चुपचाप आपको ललचा ललचा के आपसे काम करा लिया जाए तो आपको पता भी नहीं लगता कि आपके सा जबरदस्ती हो रही है और जबरदस्ती कराने का तो यह बहुत पुराना तरीका रहा है ना आपने यौन कुंठा की बात करी इंसान को उसके सेक्सुअल सेंटर पर पकड़ लो वो कहीं
नहीं जाने वाला अब ससी को गुलाम बनाना बहुत तरीके होते हैं जिसमें से एक बड़ा काम का तरीका होता है सेक्स तो यह वही तरीका है जो आज चलाया जा रहा है बहुत पुराने हैं यह जंगल के तरीके हैं जो नए अवतारों में बिल्कुल आधुनिक और एआई वाले अवतारों में हमारे सामने आ रहे हैं और हमारे पास कोई कोई समाधान नहीं है हम जानते हैं इनसे कैसे निपटना है एक मसला और है रेडिकलाइजेशन का हां ये दुनिया जो है अभी सीरिया या गाजा या बांग्लादेश म्यांमार में भी कमो शब जाते हैं तो देखते हैं कि
जो बौद्ध हैं जिनको लेकर के महात्मा बुद्ध ने एक अलग तरह की परिपाटी शुरू की वह भी मार्शल कौम हो गई और उसने भी फौज बना ली हां जी यह खतरा मुझे लगता है कि 2025 में बढ़ेगा बहुत बड़ा इसमें आपको ना पूरी दुनिया को ही जोड़ देना चाहिए य जो रेडिकलिस्ट म है और एक्सट्रीमिस्म है कट्टरवाद यह पूरी दुनिया पर ही छारा है अभी अमेरिका में जो चुनाव हुए हैं आपको क्या लग रहा है कि इस पर वह जो कट्टर धर्म होता उसकी छाया नहीं थी पाकिस्तान अफगानिस्तान मिडिल ईस्ट में जो लड़ाई चल रही
है आपको क्या लग रहा सिर्फ जियोपोलिटिकल है एसेंशियली वो एक रिलीजियस स्ट्राइफ है व एक वो एक धार्मिक युद्ध है भले ही ऊपर ऊपर से उसने जिओ पॉलिटिक्स का चूहा पहन रखा हो हम बांग्लादेश की पाकिस्तान की बात कर रहे हैं दोनों के बीच में जो हिंदुस्तान है उसको हम भूल सकते हैं क्या हिंदुस्तान में हर तरीके से क्या रेडिकलिस्ट म नहीं बढ़ रहा है जब बौद्धों की आपने बात करी उसम हम लंका को भूल सकते हैं क्या जो इतनी लंबी वहां लड़ाई चली वह वास्तव में क्या बौद्धों और हिंदुओं के बीच में नहीं थी
तो धर्म का विकृति करण जो हो रहा है वह इंसान को कहीं का नहीं छोड़ेगा क्योंकि मैन इज अ स्पिरिचुअल एनिमल बिफोर ही इज अ सोशल एनिमल मैंने कहा किसी और ने नहीं कुदरत नहीं कर रहा तो हम वो लोग है ना हम चेतना के लोग हैं हम जंगली जानवर नहीं है और ये जो चेतना है ना हमारी यह मांगती है पूछती बताओ सच क्या है मुझे झूठ में नहीं जीना सच की उसी तलाश को धर्म कहते हैं भ्रमों में ना जीने को आंतरिक बंधनों को चुनौती देने को धर्म कहते हैं तो धर्म जो होता
है वो मनुष्य की भीतरी सारी बीमारियों की रामबाण दवा होता है और दवा ही अगर जहर बन जाए तो इंसान को कौन बचाएगा धर्म जिसको दवा का काम करना चाहिए था उसने पता नहीं क्या-क्या मिला दिया कि वो बिल्कुल जहरीला हो गया है और दुनिया में हर जगह बहुत बड़ा बयान आया आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का उन्होंने कहा कि एक अयोध्या का मामला था और वह एक अलग तरीके से इस देश में रखा गया उसका निपटारा हो गया बात यहीं तक खत्म हो जाती है आगे जो है इस सिलसिले को बढ़ाना ठीक नहीं है देखिए
धर्म का प्राथमिक सरोकार इंसान को मुक्ति देने से होता है मैं अपनी जीवन ऊर्जा को अंड बंड दिशाओं में ना लगाऊं मुझे पता रहे मैं हूं कौन ताकि मैं कामनाओं के पीछे गुलाम बनकर ना भागू मैं दूसरे को भोग की दृष्टि से देख कर के रिश्ता ना बनाऊं धर्म इन बातों से संबंध रखता है धर्म का मतलब वो सब नहीं होता जो आजकल चल रहा है और यह सब जो चल रहा है अगर ये चलता रहेगा तो फिर धर्म ही इतना बदनाम और बुरा शब्द बन जाएगा कि यह जो पीढ़ियां हैं हमारे सामने की और
आने वाली यह धर्म से एकदम किनारा कर लेंगी उदाहरण देता हूं ब्रिटेन में पहली बार ऐसा हुआ है अब कि जो अपने आप को ईसाई कहते हैं वह बहुमत में नहीं है वह 50 प्र से नीचे हो गए हैं य ज्यादातर लोगों के लिए ताज्जुब की बात होती हम तो सोचते हैं भाई कि ब्रिटिश तो सब क्रिश्चियन होते हैं ऐसा नहीं है वो 50 प्र से नीचे हो गए जिन्होंने अपने आपको कहा है कि हां साहब मैं तो ईश्वर में विश्वास रखता हूं मैं थीट हूं व 50 से नीचे हो गए और बाकी कौन हो
गए एथी हा वो कह रहे हमें नहीं मानना बाकी एथी हो गए या कि जो दूसरे धर्मावलंबी है मतलब कुल मिला के य कि ईसाइयत अब वहां पर बहुमत में नहीं [संगीत] है आने वाली पीढ़ियां लगातार धर्म की गंदगी को देख कर के धर्म को ही लात मारे दे रही हैं तो सब जो है ना उन्मादी लोग जो कहते हैं हम धर्म की रक्षा के लिए सामने आ रहे हैं हम तो धर्म को बचा जाएंगे धर्म को बचाना बहुत जरूरी है धर्म खतरे में है मैं उनसे कहना चाहता हूं कि तुम जो कर रहे हो
उसके कारण धर्म एकदम बर्बाद हो जाएगा मर जाएगा क्योंकि तुम किसी को जबरदस्ती तो धार्मिक नहीं बना सकते ना तुम्हारी हरकतें देख कर के न जाने कितने लोग धर्म को ठुकराए दे रहे हैं तुम्हारी हरकतें देख के कहते हैं कि अगर धर्म के के प्रतिनिधि धर्म के नेता ऐसे होते हैं तो मुझे धर्म चाहिए ही नहीं यह होने जा रहा है तो ऐसे में यह जो बात है कि भाई बस करो बहुत हो गया यह रोज-रोज कहीं पर आप एक और नई आफत खड़ी कर देते हो तो यह जो बयान आया है अच्छा है इसकी
प्रशंसा होनी चाहिए विकास को लेकर के जब देश के पास कोई अपनी सोच ना हो मैं सेंट्रल एशिया पाकिस्तान तक की बा पाकिस्तान अफगानिस्तान सीरिया ली बिया यमन वो पूरा इलाका जो है क्योंकि आपने ऐसी जकड़ बंदी कर ली धर्म को लाकर के इस तरह की ठेकेदारी उसके हाथ में दे दी कि यह जो है यही तुम्हारा धर्म है इसके आगे तो कुछ है ही नहीं तो हुआ ये कि कठ मुल्ला पैदा कर दिया आपने आपने आतंकवादी पैदा कर दि हां मानसिक जकड़ बंदियों के गुलाम पैदा कर दिए तो इस तरह से क्या हम वैसा
बनना चाहते हैं यह प्रश्न बहुत एक मैं आपसे पूछना चाहता हूं एक यूरोप है वो भी धर्म अनुवाई है अमेरिका का भी राष्ट्रपति है वो बाइबल पर हाथ रख कर के शपथ लेता हैन हो चका है हां वेस्टर्न कंट्रीज में जो धर्मों का अनुगमन है हा और यहां जो अनुयाई हमारे सेंट्रल एशिया मुस्लिम कंट्रीज में है दोनों में क्या फर्क है दोनों धर्म को ले बहुत फर्क है बहुत फर्क है फर्क यह है के जर्मनी में मार्टिन लूथर हुए जिन्होंने कहा मैं विरोध करता हूं और उनको विरोध करने दिया गया और उनकी प्रोटेस्ट से प्रोटेस्टेंट
निकल पड़े और उसी फिर धार्मिक रिफॉर्मेशन से रेनसा निकल पड़ा वहा यह नहीं कहा गया कि तुम अगर कोई आगे की बात करोगे नई बात करोगे तो हम तुम्हारा गला काट देंगे तो इसलिए जो ईसाइयत है वो अपने आप को मॉडर्नाइज कर पाई वो अपने आप को नई समझ नई सोच के साथ चला पाई देखिए मूल तो तीनों का एक ही है ना सबसे पुराने कौन है यहूदी अब्राहम एक धारा की बात कर रहा हूं उसके बाद कौन आ जाते हैं ईसाई और फिर उनमें सबसे नए कौन हैं व है मुस्लिम तो उसमें यह बिल्कुल
प्रासंगिक बात है कि यहूदी भी समय के साथ आगे बढ़ पाए और कुल जो दुनिया में 70 80 लाख करोड़ से कम है यहूदी ये हर तरीके से प्रभुत्व की स्थिति में है जबकि 60 लाख यहूदियों को तो हिटलर ने ही होलोकास्ट में मार दिया था इतनी भारी यंत्रणा झेलने के बाद भी आज क्या वो निखर के सामने आए और क्या उनकी ताकत है और उनकी तादाद कुछ नहीं है फिर भी छाए हुए हैं अमीर भी बहुत है और सामरिक दृष्टि से भी तेज तरार हैं इनोवेशंस भी कर रहे हैं आर्ट्स में भी आ गए
हैं साइंस में भी आ गए हैं स्टार्टअप्स में भी आ गए हैं यहूदी और आप क्रिश्चियन वर्ल्ड को देखते हैं तो आपको पता ही है जब आप डेवलप वर्ल्ड की या फर्स्ट वर्ल्ड की बात करते हैं या ग्लोबल नॉर्थ की बात करते हैं तो इनडायरेक्टली आप बात कर रहे होते हैं क्रिश्चियंस की है ना जब भी आप बात करते हो कोई विकसित मुल्क तो आपके दिमाग में किसकी छवि आती है एक एक गोरे की जो ईसाई है यही तो आती है ना तो वो इतना आगे बढ़ गए हैं क्यों बढ़ गए हैं क्योंकि धर्म को
पूरे तरीके से लचीला होना पड़ता है उन मुद्दों में जो टाइम डिपेंडेंट माने समय सापेक्ष है धर्म को कट्टर होना चाहिए सिर्फ उन बातों पर जो समय के साथ बदलती नहीं है उदाहरण के लिए करुणा एक ऐसा मूल्य है जो कि समय के साथ नहीं बदल सकता तो हम ये नहीं कह सकते कि कंपैशन किसी समय पर वैलिड था और कंपैशन किसी और समय पर वैलिड नहीं है समय निरपेक्ष है समय निरपेक्ष बात है वो तो धर्म का ताल्लुक इन समय निरपेक्ष मूल्यों से होता है फिर एक सवाल आता है जैसे आपने कहा किक वेस्ट
में रेनेसा आ गया हां अपने खिलाफ खड़ा होने वाली शक्तियों या जो सुधारवादी शक्तियों है उसको उने स्वीकार किया प्रोटेस्टेंट ग्रुप आ गया वहां भारत के भीतर भी एक दौर भक्त मूवमेंट का रहा चैतन्य महाप्रभु मीरा दादू रहीम नाना कबीर बाद में हमारे यहां सुधारवादी आंदोलन जिसको आप पुनर्जागरण कहते हैं राजा राम मोहन राय स्वचंद विद्यासागर दयानंद सरस्वती तो हमने अपने भीतर बदलाव के लिए उन शक्तियों को खड़ा होने दिया स्वीकार भी किया क्या आप मानते हैं कि अब उस बदलाव के लिए हमने दरवाजे बंद कर दिए कु कोई दिखता मैं बिल्कुल मानता हूं देखिए
जो भी आएगा ना सुधार करने बदलाव करने व थोड़ी चोट देता है और समाज वही सुधरता है और आगे बढ़ता है जो उस चोट को दर्द महसूस होते हुए भी थोड़ा सा सर झुका करके स्वीकार कर लेता है चोट आपको भी लगती है और जिस सुधारण में आपको चोड़ती होती आप भी प उसको चोट देते हो बराबर का काम रहता है राजा राम मोहन राय हो कि करवे हो ऐसा तो नहीं कि हमने उनको चोट नहीं दी है ठीक है चोट तो हमने सबको दी है तो यह यह एक परस्पर आदान प्रदान का काम चलता
रहता है व सुधारक आएगा वह ऐसे कहेगा तुम में कुछ गलत है मैं उसको ठीक करूंगा तो चोट तो लगती है तो फिर हम भी पलट के उस पर वार करते हैं गाड़ी गलौज करते हैं कई बार हम उसको मार भी देते हैं लेकिन फिर भी इतनी सही शुता इतनी सहनशीलता रहती है कि वह कहता है तुम अगर मुझे मार भी रहे हो तो भी मैं तुम्हें सुधार का प्रयास करूंगा और हम कहते हैं कि हां हमें तुम्हारी बात बुरी तो लग रही है लेकिन ठीक है लाओ सुने लेते हैं और फिर सुनते सुनते हमें
समझ में आता है कि यार इसकी बात में दम है जब यह प्रक्रिया होती है वह प्रक्रिया हिंदू धर्म में अभी चल रही है वो पूरी नहीं हुई है व जो हमारा कार्यक्रम है वह करीब 200 साल पहले शुरू हुआ था और वह अभी भी चल रहा है पूरा हो नहीं पाया है जिस दिन पूरा हो जाएगा उस दिन आप पाएंगे कि जाते बाद यहां से हट गया उस दिन आप पाएंगे कि बहुत सारी हमारी जो गड़बड़ किस्म की प्रथाएं परंपराएं और अंधविश्वास है वह हमारे हट गए महिलाओं के प्रति जो हमारा रुख है वह
बदल गया लोक धर्म में कई तरीके की जो संकीर्णता एं और क्षुद्र काएं हैं वह सब हट गई और सबसे बड़ी बात विज्ञान के प्रति हमें बड़ा सम्मान और प्रेम आ गया जिस दिन हिंदुइज्म में जो सुधार कार्यक्रम है वह निष्पत्ति की ओर कंक्लूजन की ओर बढ़ेगा उस दिन एक यह बड़ा लक्षण आप पाएंगे कि जो हिंदू मन है वो विज्ञान को बड़ी इज्जत देना शुरू कर देगा वो हो रहा है धीरे-धीरे वो चल रहा है तो जब आप देखते हैं ईसाइयत को तो वहां वोह कार्यक्रम 80 90 प्रत पूरा हो गया था और पहले
ही पूरा हो गया था शत प्रतिशत तो कहीं नहीं पूरा होता वहां भी कट्टरवादी बैठे हैं वहां भी अंधविश्वासी कुछ हद तक बैठे हैं पर 80 90 प्र उन्होंने रसा के थ्रू और फिर उसके बाद उनके पॉलिटिकल रिवोल्यूशन हुए उसके थ्रू अपने आप को चर्च के मकड़ जाल से आजाद कर लिया था हिंदू धर्म में प्रक्रिया चल ही रही है इस्लाम में शुरू ही नहीं होने पाती अब जब शुरू ही नहीं होगी तो फिर क्या होगा शुरू नहीं होगी तो यही होगा कि बस लड़ाई झगड़ा मारपीट चल रहा है एक प्रिमिटिव सा माहौल देखने को
मिलता है कहीं पर भी कोई उदारवादी सोच नहीं होती आधी आबादी महिलाओं की है व कैद रहती है उसको बाहर नहीं निकलने देते उसको पढ़ने नहीं देते उसको पॉलिटिकल और इकोनॉमिक पार्टिसिपेशन नहीं देते और जब सब बड़ी अजीब सी हालत है य ये धर्म के लक्षण थोड़ी है धर्म का काम यह सब करना थोड़ी है धर्म का काम क्या करना है हमने बात करी ना धर्म का काम है इंसान को भीतर से आजादी देना हमारे भीतर कुछ बैठा है जो हमेशा परेशान रहता है बड़ी बेचैनी में बड़ी तड़प में रहता है धर्म का काम होता
है उसको जरा सा बोध देना ज्ञान देना और उसको शांत कर देना इसी को मुक्ति कहते हैं इसकी जगह जब धर्म ये सब कराने लग जाए कि इसको मारो उसको मारो उसके घर में आग लगा दो उसका गला काट दो उसको बोलो अभी अफगानिस्तान में क्या हुआ पता अभी उन्होंने और ज्यादा कर दिया है कि महिलाए पढ़ने भी नहीं जा सकती और कर दिया है और य सब किसके नाम पर कर रहे हैं वो इलाम ये धर्म के नाम के इस्लाम के नाम पर कर रहे हैं तो फिर तो और क्या हो रहा है कि
एक तरह का डोमिनो इफेक्ट चल रहा है एक रिएक्शनरी इफेक्ट चल रहा है जो इस्लामिक फंडामेंटलिज्म है उसकी प्रतिक्रिया में और कई बार उसको बहाने की तरह इस्तेमाल करके इस्लामिक रेडिकलिस्ट म भी शुरू हो गया है और हिंदू रेडिकलिस्ट म भी शुरू हो गया है मैं नहीं कह रहा कि वो नेसेसरीली एसेंशियली एक प्रतिक्रिया के तौर पर ही आ रहा है लेकिन अगर आप उनसे बात करेंगे तो व यही कहते हैं कि अगर यह इतनी गड़बड़ कर रहे हैं अगर ये इतने कट्टर हैं मुसलमानों की ओर उंगली दिखा कर के व कहते हैं कि अगर
ये इतने कट्टर है मबू तो फिर हमारी मजबूरी है हम भी कट्टर हो जाएंगे अब चक 2025 के पड़ाव पे हैं आपने दो बातें कही कि हिंदू धर्म के भीतर बदलाव की प्रक्रिया चल रही है उसको पूरा होने में अभी वक्त लगेगा पहली बात यह है कि 2025 में क्योंकि सरकार ने महिलाओं की हिस्सेदारी एक तिहाई चुनाव में कर दी है तो 2026 ऑनवर्ड आपको दिखाई पड़ता है दूसरा कि मुस्लिम समाज के भीतर शाहबानो का फैसला जो था उसने एक देश में अलग तरह की खद बदा हट पैदा कर दी थी सरकार ने ट्रिपल तलाक
को खत्म किया सरकार वक्त बोर्ड को भी अंकुश डालना चाहती है तो कैसा दिखता है भारत आपको मुझे यह दिखाई देता है कि भारत के मुसलमानों के साथ सब राजनैतिक दलों ने कुछ उल्टा ही पुल्टा करा है हम यह नहीं माना गया है कि यह भी वैसे ही इंसान है जैसे और कोई होता है तो इनकी भी वही जरूरतें हैं क्या है जरूरतें सबसे जो मूलभूत जरूरत होती होती है शिक्षा देखिए फिर बोलूंगा इंसान चेतना का प्राणी होता है और शिक्षा के बिना हम जानवर जैसे होते हैं तो कभी हमने उनको वोट बैंक की तरह
करा कभी हमने यह करा कि कोर्ट भी अगर कोई प्रोग्रेसिव फैसला दे रहा है तो हम संसद के माध्यम से शाहबानो केस हम हम कोर्ट को भी सुपर सड करे दे रहे हैं कभी हमने यह कर दिया कि इनको मार्जिनलाइज कर दो इनको पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन मत दो उनको बिल्कुल अलग बना दो कभी यह कर दिया लेकिन अगर इंसानों की तरह देखें तो जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है भारत के मुस्लिमों को विश्व ई व शिक्षा जब तक आपको इस दुनिया के फैक्ट्स ही नहीं पता होंगे तब तक आपके भ्रम और अंधविश्वास कैसे कटेंगे और
अगर नहीं कटेंगे तो उन्हीं भ्रमों को उन्हीं अंधविश्वासों को आप धर्म मानते चलोगे धर्म की शुद्धि के लिए वैज्ञानिक शिक्षा आधुनिक शिक्षा बहुत जरूरी होती है और यह गड़बड़ हमें सब भी इस्लामिक मुल्कों में देखने को मिलती है हम भारत को कई बार दोष दिया करते हैं मुझे बड़ा बुरा लगता है कि दुनिया की जब टॉप यूनिवर्सिटीज की लिस्ट जारी होती है उसमें हमारी इतनी कम क्यों होती हैं और जो होती भी है वो वही हमें पता है क्या होते हैं आईटी होती हैं कभी जेएनयू का नाम आ जाता है कभी एक दो और यूनिवर्सिटी
कभी-कभी डीयू का भी आ जाता है लेकिन उनका भी सबका नाम पीछे आता है अब आप उसमें ये देखो कि जो यह इस्लामिक वर्ल्ड है उसकी कौन सी यूनिवर्सिटी होती है कुछ भी नहीं होता और यह सिर्फ कोइंसिडेंस नहीं है यह एक तरीके की अंदरूनी या सबकॉन्शियस साजिश है उदाहरण देता हूं पाकिस्तान में वह डार्विन की थ्योरी पढ़ाना ही नहीं चाहते उन्होंने सिलेबस से निकाल दिया उनके लिए शिक्षा खतरनाक बात है वह कहते हैं कि अगर हमने यह बता दिया कि मनुष्य का तो क्रमशः विकास हुआ है धीरे-धीरे और अभी भी हो ही रहा है
तो फिर यह बात हम कैसे अपने बच्चों को बता पाएंगे कि एक दिन एक कोई ऊपर बैठा है जिसने मनुष्य की रचना करी यह जो क्रिएटर एंड क्रिएशन वाली थ्योरी है यह तो फिर धराशाई हो जाएगी और पूरा मामला ही जब इस पर चल रहा हो कि एक क्रिएटर है एक क्रिएशन है तो फिर शिक्षा और विज्ञान यह दुश्मन जैसे लगते हैं जो इस्लाम है वह एक ऐसा परिवेश और संस्कार घरता है कि आदमी का जो स्वतंत्र विकास है वैज्ञानिक नजरिया है विकसित ही नहीं होने देता है इसीलिए दुनिया के जितने भी इस्लामिक देश हैं
वो आज भी कोसों पीछे हैं देखिए कोई भी धर्म हो ना वो चलता किस पर है धर्म ग्रंथ पर ठीक है कोई आपको रिलीजन नहीं मिलेगा जिसके पास एक बुक ना हो या बुक्स वहां पर एक बुक है रिलीजन ऑफ द बुक हम रिलीजन ऑफ द बुक्स है हमारी बहुत सारी है पर बहुत सारी होने पर भी हम कहते हैं वेद वैदिक धर्म है हमारा ठीक है तो किताब तो होती है तो किताब होती है वो जो किताब होती है वह रची गई होती है लिखी गई होती है यह धार्मिक लोगों की भाषा में कहते
तो उतरी होती है किसी एक समय पर तो उसम बहुत सारी ऐसी बातें होती है जो सिर्फ उस समय के लिए उपयोगी थी और वह बातें ठीक है क्योंकि जिस समय किताब आई उस समय कुछ चल रहा था तो वहां पर लिख दिया गया था तो जो उस धर्म के अन्याय होते हैं यह उनका अपना फर्ज होता है यह उनकी अपनी बुद्धि की बात हो होती है कि जो बातें सिर्फ अतीत की हैं उनको बहुत सम्मान के साथ अब म्यूजियम में रख दो और जो बातें बिल्कुल काल निरपेक्ष है इटरनल है सनातन है कालातीत है
टाइमलेस है उन बातों को सदा फॉलो करते रहो लेकिन यह डिस्टिंक्शन कि भाई इस समय पर अब यह बातें हैं यह किसी काम की नहीं है बस जो यही सेंट्रल कोर मैसेज है वह काम का है यह देने के लिए हर समय पर कोई चाहिए होता है जो आकर के रिइंटरप्रेट करे समसामयिक कंटेंपरेरी भाषा में अपने ग्रंथ को लोगों को बताए कि देखो आज की दुनिया में इस ग्रंथ का यह अर्थ है उसकी गुंजाइश इस्लाम दे इस्लाम उसकी गुंजाइश देता नहीं है देता नहीं है अब आप अगर इस्लाम के भी कोर पर जाएंगे आप क
बाकी सब हटा दो जो टाइम डिपेंड बात हैं उनको हटा दो अगर ऊपर सब हटा दो तो जो कोर बात है इस्लाम में अगर सिर्फ वो रखी जाए तो इस्लाम भी निखर कर सामने आएगा सेंट्रल मैसेज है वहां तौहीद टोटल नॉन डुएलिटीज निकालने चलता है तो उसका फिर मंसूर जैसा हाल हो जाता है मंसूर का पता है ना आपको कि एक बार में नहीं मारेंगे तरीके तरीके से मारेंगे आंखें निकाल लेंगे नाक काट लेंगे जीभ काट लेंगे तड़पा तड़पा कर मारेंगे आदमी कहता भैया हम हम हमको सुधारक नहीं बनना है तो यह भी हो सकता
है कि जो भारत का भी इस्लामिक समाज है वह चूंकि उसी परिवेश उसी धार्मिक सूत्र वाक्यों और संस्कार के भीतर रहता है इसलिए बहुत कोशिश करने के बाद भी उसमें बदलाव आप नहीं देख पाते हैं वो तो है ही है देखिए कोई भी व्यक्ति जो बिल्कुल फंडामेंटल बात को पकड़ कर नहीं चलेगा वह धर्म के नाम पर धोखा ही खाएगा खुद भी बीमार होगा दूसर को बीमार करेगा चाहे कोई धर्म हो ठीक है अब मेरे सवाल का दूसरा हिस्सा जो महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी मिली लोकसभा विधानसभाओं में तो महिलाओं की स्त्री भारत में नए
साल से आगे आप कैसे देख रहे हैं मैं तो ऐसे जाऊंगा कि महिलाओं की दुर्दशा हुई कैसे थी अगर हम यह समझ जाए कि बीमारी कहां से आ रही है तभी दवाई बना सकते हैं ना दुर्दशा हुई कैसे थी महिलाओं की अब प्रकृति में तो महिला और पुरुष एक बराबर ही पैदा होते हैं घर में लड़की हुई है लड़का हुआ है वहां तो कोई ऐसा भेद होता नहीं है दो बच्चे हैं पैदा हो गए हैं और आप जंगल चले जाए तो वहां भी नर और मादा सब एक अपने अपना काम कर रहे होते प्रकृति वाला
तो बीमारी कहां से आई थी स्त्री शोषण की यह बीमारी भी धर्म का चोला पहन कर आई थी जब तक धर्म के नाम पर जो गंदगी है उसको नहीं हटाया जाएगा तब तक महिलाओं की बेहतरी संभव नहीं है महिलाओं का उत्पीड़न हम कह देंगे व एक सामाजिक समस्या है नहीं साहब समाज भी कहता है कि मैं जो कर रहा हूं महिलाओं के साथ वह रिलीजियस अप्रूव्ड है वह धर्म सम्मत है मैं इसलिए कर पा रहा हूं तो अगर धर्म का वह जो संस्करण है ना जो कहता है कि महिला की जगह तो पति के चरणों
में है और महिला को तो शिक्षा की भी कोई जरूरत नहीं है गुरु की भी कोई जरूरत नहीं है पति परमेश्वर है पति ही गुरु है और महिला अगर पति के पांव नहीं दबा रही है तो घर में लक्ष्मी नहीं आएगी अगर धर्म का यह संस्करण चल रहा है तो आप महिलाओं को कितना भी प्रतिनिधित्व दे दीजिए एक तिहाई नहीं आप तीन चौथाई दे दीजिए कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जहां से बीमारी आई थी पहले वहां पर समाधान करना पड़ेगा धर्म को प्रत्येक मनुष्य को चेतना की तरह देखना पड़ेगा स्त्री पुरुष की तरह नहीं शरीर
देख कर के धर्म काम नहीं कर सकता धर्म को कहना पड़ेगा तुम आदमी हो तुम औरत हो तुम चेतना हो तुम्हारे जीवन का लक्ष्य है मुक्ति जब यह हो पाएगा तो फिर स्त्रियां अपने आप आगे बढ़कर के उनके पास सब कुछ है प्रकृति का दिया हुआ बस हमने ही उनको कृत्रिम सामाजिक जंजीरों में जकड़ रखा है वो फिर खुद आगे बढ़ कर के जो उनकी सही जगह है उसको हासिल कर लेंगी हमें उनको जगह देनी भी नहीं पड़ेगी वो खुद हासिल कर लेंगी अा जी नए साल पे मैंने सोचा कि संकल्पों को लेकर के हम
बढ़ेंगे लेकिन आपने कहा कि चुनौतियां कहीं बड़ा प्रश्न है और नए साल इन चुनौतियों को समझना बहुत जरूरी है मुझे लगता है कि हमारे दर्शकों को आपके जरिए यह समझ में आया होगा कि 2025 नया साल तो है लेकिन यह कहीं ज्यादा खतरों के साथ है 2024 के मुकाबले और इस लिहाज से दुनिया को इंसान को तैयार होना चाहिए बहुत-बहुत शुक्रिया आपका बात करने के लिए थैंक यू सर