ये स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर अष्ट प्रकृति से सब होता है लेकिन शुद्ध परमात्मा अपना आत्मा है उसने कभी कुछ नहीं किया हम उसमें टिके हैं वस सबको पवित्र करने वाला है और गुरु महाराज भी उसी में टके खाया तो प्राणों ने खाया शरीर ने खाया उस खाने ना खाने को जानने वाले गुरु महाराज अपने तत्व में कबीर जी ने भी कहा उठत बैठ तो ही उठाने कत कबीर हम उसी ठिकाने तो अपने साक्षी शुद्ध चैतन्य भाव तो ऐसा करके ग्वाल गोपों को भी तत्व ज्ञान दिया तो य तवार और पर्व हमारा सोया हुआ सत
स्वभाव चेतन स्वभाव आनंद स्वभाव माधुर्य स्वभाव जागृत करने में सहायक होते और साथ-साथ में इन सभी स्वभाव का जो आधार है वह परमात्मा तत्व का ज्ञान देने के लिए यह जन्माष्टमी का उत्सव गुरु पूम का उत्सव शिवरात्रि का उत्सव ब्रह्म वैवर्त पुराण में आया है ब्रह्मा जी सरस्वती को कहते हैं और भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को कहते हैं जो देवकी व्रत रखता है अष्टम जन्माष्टमी का व्रत रखता है करोड़ों एकादशी करने का पुण्य उ से प्राप्त होता है कल जन्माष्टमी है और हे ओधव जो जन्माष्टमी का व्रत करता है उसके रोग शोक दूर हो
जाते हैं जो समाज जन्माष्टमी का उपवास व्रत नियम करते हैं उसका मतलब यह नहीं तो व्रत की महिमा सुनकर डायबिटीज वाले भी त रखे चराते कमजोर भी व्रत रखे नहीं बालक अति कमजोर बुड्ढे थोड़ा फलाद खाए अनुकूलता के अनुसार बाकी पंजरी वंजरी वायु नाशक होता है उसम अजन भी पड़ती है जीरा भी पड़ता है गुड़ भी पड़ता है तो यह सीजन वायु प्रधानता है तो पंजरी का उत्सव आ गया वायु नाशक य सीजन मंदाग्नि का है उपवास रखने से मंदाग्नि दूर होगी और शरीर में जो अनावश्यक द्रव्य पड़े उपवास करने से वह खींच जाएंगे शारीरिक
स्वास्थ्य मिलेगा और मंजरी खाने से वायु का प्रभाव दूर होगा और चित्त में भगवती आनंद भगवती प्रसन्नता उरेगी और भगवान का ज्ञान देने वाले गुरु मिलेंगे तो ज्ञान में स्थिति भी होगी तो एक एक तहवार और एक एक खानपान में ऐसी सुंदर व्यवस्था है कि आपका शरीर स्वस्थ रहे मन प्रसन्न रहे और बुद्धि में बुद्धि दता का ज्ञान जो अंतर्यामी टकर टकर देख रहा है उसके हस्ति का उसके अस्तित्व का प्रभाव पड़ जाए ब्राह्मण ब्राह्मणी रहते थे संध्या करते थे मनुष्य जी आत्मा परमात्मा के लिए है और योनियों में तो खानपान होता है मनुष्य जीवन
सत्कर्म करके सत में स्थिति करने के लिए दोनों जानते थे साधु संतों की बड़े प्रेम से सेवा करते थे तो साधु संत आते जाते रहते हैं तो ब्राह्मण को अपना काम धंधे में भी इतना ज्यादा रुचि नहीं थी तो आमदनी कम और साधु संत आते जाते तो खर्च आमदनी से चार गुना तो आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी कोई उधार नहीं देता था और साधु महाराज की मंडली आ गई पत्नी ने पति के तरफ देखा पति ने पत्नी के तरफ पत्नी ने टास बनई के मैं जाती हूं ले आती हूं गई दुकान वाले के
पास हाथा जोड़ी किया कि तुम्हारे दूध में धो के देंगे लेकिन आज संत लोग आए दसरे शक दे दे है पहले के पैसे बाकी दो दे दे घी दे दे बाप का है उसने खरी खोटी सुना दी भाई देखने में जरा रूप रंग में सुंदर थी जितनी बाहर सुंदर थी उससे ज्यादा भीतर भी सौंदर्य था उसका मीठी वाणी में उसको समझाती रही तो वह दुकान वाला युवा नई शादी किया हुआ था पत्नी जरा देख ने में ऐसी वैसी रही होगी उसको बोला कि तेरे को सीधा सामान दूंगा एक शर्त पर आज रात को तू मेरे
घर आ जा मेरी पत्नी तो माय के है मैं अकेला हूं बुरी नियत से बोला वह समझ गए बोले अच्छा मैं वचन देती हूं सीधा सामान दे दिया रात हुई पति को बोलती है साधुओं को भोजन कराया साधु प्रसन्न होकर गए लेकिन मैं साधुओ की सेवा के लिए वचन देकर सीधा सामान ला दुकान वाले से आज रात को उसने बुलाया है संध्या हो गई है तो उसकी नियत तो कैसी भी हो आप मेरे को आशीर्वाद दो के मैं पवित्र ही रहू बोले हा मुझे भरोसा है मैंने किसी परा स्त्री पर बुरी नजर नहीं की बुरा
का व्यवहार नहीं किया तो तुम्हारे ऊपर कोई बुरी नजर करने वाला कैसे सफल होगा जा भगवान तेरा रक्षक है ना मेरे को भरोसा है जा तो गई दुकान वाला तो ऐसे ऐसे ऐसे दुकान तो बंद कर रहा था और उसको ले गया घर में रूम बंद किया फिर खिड़किया होती है बार पर्दा हो पर्दा बारने पर्दा हो सभी खिड़कियों को पर्दे बर्दे लगाए और माई देख रही है हृदय में शांत होकर के रक्षम प्रभु आप सबके हृदय में है सभी के हैं आप सर्व समर्थ है हे हरि हे गोविंद मन में चिंतन करती रही उसने
सब खिड़किया पर्दे बर्दे लगा दि जो नजी है बोले ठहरो अभी भी कोई देखता है बोले कौन देखता है बो कोई देख रहा है अभी पर्दा लगा उस पर भी कौन देख रहा है बोले आपका हृदय का अंतर्यामी और मेरा अंतर्यामी देख रहा है उधर भी एक पर्दा लगा दो हृदय पर भी पर्दा लगा दो अपन जो कुछ करेंगे ना तो वह नहीं देखे ऐसा करो वहा पर्दा लगा दो फिर आपको जैसा भी चाहिए व देख रहा है ऐसे करके उस काम दुकानदार के आंखों में उसने देखा वो देख रहा है बात तो सच्ची देखता
है अब उस पर पर्दा आप डाल दो उस पर पर्दा डालना संभव नहीं है फिर भी आप डाल दो तो ठीक रहेगा वह दुकान वाला बाई का दर्शन करते करते शुद्ध बुद्धि हो गया धरती पकड़ के बैठ गया बहन आज तूने मेरे को घोर पाप से बचाया तु मेरे को राखड़ी बांध देना न जाने क्या क्या पाप की आदत पड़ जा तो कितनी बार करने से भी काम विकार पूरा तबाही कर देता है बहन माफ करना बोले भाई तुम भी माफ करना तुम्हारे से मैं कर्जा ले गई दे दू नहीं नहीं बहन कोई बात नहीं
व अंतर्यामी का चिंतन करने से बहन का अंतर्यामी ने भाई के अंतर्यामी में छुपा हुआ अपना स्वभाव प्रकट कर दिया अब भाई बहन एक दूसरे को मदद करे दोनों आध्यात्मिक रास्ते चले सब दिन तुम गरीबी के नहीं आ और भगवान के भक्त का तो भगवान रक्षा करते हैं तो जो जैसे यथा माम प्रप जंते तस्त भजामि जो मुझे जैसा भजते हैं जैसा मानते उसी प्रकार उस उनका भजन करता ह उनके काम आता तो जन्माष्टमी उत्सव वासुदेव के शरीर में भगवान रहते मन में देवकी के पेट में आ जाते फिर यशोदा के हृदय से लगते नंद
बाबा का हाथ पकड़ते कैसे भी करके भगवान हमें अपने भगवत स्वभाव में जगाते हैं अभी यहां आप पहुंचे हैं तो आपके अंतर्यामी ने आपको सद्बुद्धि दी बैठने की भावना दी और इधर वही परमेश्वर बुलवाकर आपको उन्नत करते हैं कैसी लीलाए कैसी व्यवस्था है वाह मारा वाला मारा वालड़ा मारा कानुड़ा हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए चाहते हैं फिर भी दुर्गुण फिसलते तो आदत पुरानी है थोड़ा उठते फिर फिसलते फिसलना असावधानी लेकिन फिर ना चलना यह प्रमाद है फिसलते हुए भी पुकारते पुकारते चलो र सवेर पहर हो जाता
हार नहीं मानो क्योंकि रक्षक है हमारा पोषक है प्रभु छ हे प्रभु लीजिए हम को शरण में हम सदाचारी बने ब्रह्मचारी धर्म रक्षक वीर व्रत धारी बने जिसके जीवन में उपवास नहीं है व्रत नहीं है व आदमी वचन का भी पक्का नहीं हो सकता है व्रत वाला दृढ़ होता है तेन दक्षा मापन की त से दृढ़ता आती दक्षा मापन दक्षिणा दृढ़ता दक्षिणाम श्रद्धा माप श्रद्धा बढ़ती और श्रद्धा से सत्य स्वरूप परमात्मा प्राकट्य हो जाता है जैसे बादल हटने से चंद्रमा दिखता है ऐसे ही हल्के वासनाओं के संस्कार और कर्मों का भाग दौड़ के संस्कार हटते
हटते अपना आत्मा देव का अनुभव हो जाता ओम शांति ओम आनंद हरि ओम का लंबा उच्चारण करने से साधकों को बहुत तेजी से लाभ होता है अध्यात्मिक हरि काहा और ओम का म उसके बीच में नि संकल्प अवस्था रहते मन का फरना नहीं रहता कोई संस्कार का प्रभाव नहीं रहता फिर मन इधर उधर जाए हरि ओम ओ [हंसी] [संगीत] ओ अब हृदय में जपते जाओ ओम ओम आनंद ओम शांति ओम माधुर्य ओम प्रभु जी ओम प्यारे जी ओम मेरे जी ओम ओम हरि ओम प्रभु ओम प्यारे ओम मेरे [संगीत] ओम आनंद माधुर्य ओम सुख रूपा
चैतन्य रूपा सर्वर रूपा वासुदेव द्रव्य रूप में शांति रूप में देव रूप में मानव रूप में अनेक रूपों में अरूप प्रभु ओम ओ मधुर शांति ओमकार मंत्र की महिमा 22000 श्लोकों में पेट की तकलीफ है जिगर की तकलीफें सिर की तकलीफें ठीक होती है यह तो बहुत छोटी खोज है जे मार्गन की और भी क्या क्या लाभ होते पूरा वर्णन नहीं कर सकते हम ओमकार अंतर्यामी प्रभु का मंत्र है ओमकार मंत्र ओमकार मंत्र गायत्री छंद य छंद परमात्मा ऋषि ही परमा भगवान नारायण इस ओमकार मंत्र की शक्तियां खोजने वाले ऋषि है ऋषि उसे कहते हैं
जो मंत्र को की शक्तियों को खोजे हैं ऋषि तो मंत्र दृष्टा रा न करतार एक होता है निर्माण दूसरा होता है खोज नि माण उसका होता है जो पहले नहीं था खोज उसकी होती है जो पहले था तो भगवान नारायण ने ओमकार मंत्र की शक्तियां खोजी है तो भगवान नारायण के पहले साकार नारायण के पहले ओम स्वरूप चैतन्य था उन्होंने इनकी शक्तियां खोजी तो वो चैतन्य ओमकार मंत्र का देवता कौन है जैसे ओम नमः शिवाय मंत्र का शिव देवता है हरि ओम मंत्र का हरि देवता है ओमकार मंत्र का देव कौन है बोले अंतर्यामी देवता
अमी दे तो क्यों जप रहे हैं अंतर्यामी प्रीति अर्थे अ सद्बुद्धि प्राप्ति अर्थे सद बुद्धि प्राप्ति अ जो आवश्यकता है उसी जप करो पूरी होती है ओम ओम ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ फिर होठ बंद करके हृदय से चलती है तो चलाओ फिर मन इधर उधर जाए तो फिर बाहर मैं होठ बंद करता हूं हृदय में चल रहा है ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओ ओ ओ होठ बंद करके हृदय से फिर होठों से फिर हृदय से ओ आज सप्तमी है शीतला सातम में अंतर्यामी परमात्मा की शीतलता का अभी अभी
रस पान हो जाए ओम मधुर शांति परमात्मा शांति आयु ठंड हरिना हेत थ प्रभु के प्रेम से हृदय पावन शीतल हो रहा है चित्त की शीतलता बड़ी तपस्या का फल है ओम ओम रूपम मधुरम हे प्रेमा अवतार कृष्णा बंसी मधुरम मुकुट मधुरम रागम मधुरम नैनम मधुरम निखिलम मधुरम अखिलम मधुरम मधुरा दे पते मधुरम मधुरम प्रेमा अवतार [प्रशंसा] [संगीत] अधरम मधुरम वदनम मधुरम नयनम मधुरम ह सितम मधुरम र हस्य भी मधुरता है हृदयम मधुरम गमनम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुर निखिलम [संगीत] मधुरम वचनं मधुरम चरित्र [संगीत] मधुरम वनम मधुरम बलित मधुरम चलित मधुरम ममित मधुरम मधुराधिपते [प्रशंसा]
[संगीत] अखिलम [संगीत] रम वेणु मधुरे रेणु मधुरा पाणी मधुरा पाद मधुर नृत्यम मधुरम सख्यम मधुरम मधुरा दे पते अखिलम मधुरम हे मधुमय मारा वाल उड़ा मारा कान उड़ा कृष्ण कन्हैया मंसी बजैया बृंदावन की कुंज गलियों में भक्तों की दिल की गलियों में ठुमक ठुमक ठुमक रास रचैया वाला कन्हैया गीतम मधुरम पीतम मधुरम बंसी मधुरम नादम मधुरम वादम मधुरम भुक्त ुर मक्खन मिश्री तुम्हारा भोग भी मधुर [संगीत] है सुक्तम मधुरम सोते समय ओ आनंद आनंद करके सोते तुम्हारा सोना भी मधुरम और तुम्हारी स्मृति में हम भी मधुरम हो रहे रूपम मधुरम तिलक [संगीत] मधुरम मधुराधिपते अखिलम
मधुर मधु शरती खारे समुद्र को भी अपनी कृपा से लहरा के मधुमय दर्शन करा देते हो खारा समुद्र और जल चरों का डबल सिंगल से भरा समुद्र लेकिन उसको लहराते हुए आलहा देते आनंद देते हजारों हजारों लाखों लाखों लोगों को आजीविका देते कई गंगा यमुना जैसी पवित्र नदिया पैदा करते थे करणम मधुरम तरण मधुरम हरम मधुरम मन हरने वाले मक्खन हरने वाले तुम्हारी चोरी भी मधुर है चोरी जैसा काम भी मधुर करणम मधुरम तरण मधुरम हरम मधुरम स्मरणम मधुरम तुम्हारी स्मृति भी मधुरता देती हो वाला [संगीत] कन्हैया पितम मधुरम सितम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम वालड़ा
आनंद [प्रशंसा] [संगीत] दाता गुवा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा बीची मधुरा सलिलम मधुरम कमलम मधुरम मधुराधिपते प्यारे प्रभु जी मारा वाला गोपी मधुरा तुम्हारी गोपियां भी मधुमय है लीला मधुरा तुम्हारी लीला चेष्टा चोटी खींचना बंसी बजाना दिखाना छिन पर नाचना सब मधुर है गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्त मधुरम भुक्त मधुरम दृष्टि मधुर सृष्टि मधुर मधुरा दे पते अखिलम मधुर गोपा मधुरा गावो मधुरा गोप भी तुम्हारे मधुर गाय भी तुम्हारे मधुर यष्टि मधुरा सृष्टि मधुरा दलित मधुरम फलितम मधुरम मधुरा दे पते मधुरम [संगीत] ओ ओम ओम मधुमय ओम आनंदमय ओम ओ रसमय ओम ओम गुरुम गुरु
मधुरम शिष्य मधुरम नंद [संगीत] [संगीत] [संगीत] दुख से धोखे से चिंता से भरी हुई सृष्टि में आत्म मधुरता क स्वाद च खाने वाले अवतार का नाम है कृष्ण अवतार अवतर तिति अवतार ऊपर से नीचे अवतरित हूं अवतार तुम्हारे हृदय में भगवान का अवतार होने दो चिंता का अवतार से चिंतित हो जाते काम के अवतार से कामी हो जाते लोभ के अवतार से बेईमान हो जाते मोह के अवतार से सूझबूझ मरी जाती लेकिन कृष्ण के अवतार से कृष्णम हो जाते हैं आय ओ गुरु के अवतार से गुरु मय हो जाते हैं [संगीत] संसारी आपाधापी अवा संसारी
शैर सपाटे से 100 गुना ज्यादा तीर्थ यात्रा सुखदाई पुण्य दय उज्जवल भविष्य और तीर्थ यात्रा से भी स गुना प्रभावशाली कीर्तन और कीर्तन से भी 100 गुना प्रभावशाली भगवन नाम जप और भगवन नाम जप से भी हज गुना प्रभावशाली गुरु मंत्र का जप और गुरु मंत्र जिसने लिया उसको परम प्रभाव के स्वभाव में जकना हजार गुना सुखदाई भगवत ध्यान भगवत ज्ञान भगवत माधुर्य है फिर उसके लिए तो भगवान अपने घर की चीज [संगीत] [प्रशंसा] अपना हृदय को मधुमय करना हो तो नित का वजन याद रखो ऋतुम ना निंद अररर कीचड़ हो गया अररर बरसात हो
गई अर गर्मी है गर्मी भी कुछ रंग लाती है बारिश को और बारिश भी रंग लाता है बारिश के बिना तो देखो हाहाकार मत जाएगा सर्दी भी रंग लाती है जो कुछ है वाह वाह मधुर है वाह वाह वाह अपमान भी आपका अहंकार मिटाने का रंग लाता है रोग भी आपको सावधान करने का रंग विघ्न बाधा और दुख भी पाप मिटाता है और भविष्य उज्जवल करता है वाह वाह रतु न निंद तद व्रतम ऋतु की निंदा नहीं करूंगा वह व्रत लेता [संगीत] हूं लोकान निंद लोगों की निंदा नहीं करूंगा यह व्रत लेता हूं पशु निंद
तो गधे अरे तो कामन उसने बनाया है एकनाथ जी महाराज गधे में भगवान का उ से उसको पानी पिलाते तो था तो गधा निकल आया शिव जी पशु न निंद पक्षम न [संगीत] निंद लोकान नित सब मधुमय मधुमय मराम न पीवे शराब न पियो यह व्रत मासम न भक्ष मास नहीं खाने का व्रत मधुमय स्वभाव जागृत करलो हो जाएगा आनंद मैं दुखी हूं मैं बीमार हूं बेटा ऐसा है ऐसा बढ़िया है मनुष्य के मन की बड़ी भारी कमजोरी है जो बढ़िया है उधर ध्यान नहीं है जहां खटपट है वही खोज के उसी फरियाद के चिंतन
में भागता फिरता 32 दात है तो एक टूट गया अब छ दिन हो गए बारबार जीब उधर जाती अरे निगड़ी पता है नहीं है तो नहीं है बात नथ नथ तो फफा मारे 31 लाभ ले नथी तो 29 न लाभ ले 3 से बन तो चौकट लाभ ले आनंद मधु मधुमय आनंद है वाह हरि ओम ओम ओम ओम अपने चित्त को मलिन मत करो दुखा आकार वति को उखाड़ फको बंधे जाते तो भी हंस रहे हैं भागना पड़ता तो र छोड़ो राय की जय भागना पड़ता तो भाग भी लेते लेकिन अंदर से काता नहीं क्रूरता
नहीं युद्ध करना पड़ता तो कर लेते मधु मधु मां मां मक्खन लाओ अभी दोपहर को मक्खन नहीं खाते कब खाते सुबह तो अब क्या बोले शाम होगी दूध पिएंगे तो मां दूध दे दो अरे अभी दोपहर है मां देखो आंख बंद के देखो संध्या हो गई ना मां देखो रात हो गई मां को मधुरता देते उनको दूध की क्या जरूरत तो भगवान सत रूप है चेतन रूप है आनंद रूप तो उनके आनंद स्वभाव को जगाओ दुखी संसार में अतृप्त संसार में अशांत संसार में धोखेबाज संसार में एक भगवत रस ही दुर्गुणों को दूर करेगा धोखा
क्यों करते सुख के लिए अशांत क्यों है कि सुख की कमी दुख क्यों है कि आनंद की कमी है सुरा सुंदरी या लवर लवरी क्या करते आनंद सुख के लिए अंदर भगवान को स्नेह करो आनंद है माधुर्य तो बहु खराब प्रभु नहीं प्रभु मेरे ओ आनंद अपने को खराब अपने को अच्छा नहीं अपने को चैतन्य मानो भगवान का भगवान अपने दुखी दुखी दुख वत से ू खराब छ खराब छ तो नकारात्मक वत से ं मांडो छ मांडो छ तो मनवाड़ वत से पने मनवार ने दुखने खराब ने जो ना रह चैतन्य आत्मा च आत्मन रस
जा तुकाराम महाराज ने एक बार भगवान को कहा के पांडुरंग में तुमला गाली देनारा खाली दा नहीं गाली दूंगा ऐसा दम नहीं मारा गाली दे डाली और भगवान को आनंद आता है हे पांडुरंगा में तुमला गाली देना र का गाली दू माता तुमला तुम भरवाई बैलो बैल सबका भोजा वान करते हो भगवान कते बरा तुम तुमने अच्छा पहचाना मां बच्चे का बोजा वहन करती है ठीक है लेकिन मां को पूछो तुम्हें बोजा लगता है क्या नहीं बच्चे के लिए स्वयं तो यह मां के अंदर बच्चे के लिए स्वयं कृपा बरसाना सेवा करना यह गुण कहां
से आया अंतर्यामी प्रभु से आया मां आवेश में अज्ञान में तो कुछ गड़बड़ कर लेगी लेकिन भगवान आवेश में और अज्ञान में गड़बड़ करे ऐसे भगवान नहीं है भगवान तो भगवान है तो आज एक नई बात है कि तीन प्रकार के अमृत भगवान वल्लभाचार्य ने कहे एक मानुषी सुलभ अमृत जो आप चंद्रमा के किरणों के अमृत किरण अथवा चीज वस्तु में हम अमृत त्व की भावना करते दूसरा देवताओं के लिए अमृत तीसरा भगवान के लिए अमृत तो भगवान से बढ़कर भगवान का के लिए अमृत नहीं होता भगवान का अमृत भगवान स्वयं है तो भगवान स्वयं
अभी चार मास अपने आप का अमृत पान करते तो हमको भी इन चार मासों में भगवान जल में शेष सया में सोते हैं तो जल में भगवत अंश की विशेषता है तो स्नान आदि का महत्व है ऐसे ही भगवान अपनी योग निद्रा में रहते हैं तो आप भी भगवत रस पान करने में ये चतुर्मास आपके लिए भी हितकारी है तोब क्या करोगे चलो भगवान तुम तो योग निद्रा में आते हो अब हम हम तुम्हारी थोड़ी स्मृति में आते हैं ओमकार मंत्र गायत्री छंद गायत्री छंद परमात्मा ऋषि [संगीत] अंतर्यामी देवता अंतर्यामी देवता इस ओमकार मंत्र के
खोजने वाले भगवान आप हो इसलिए आपको हम ऋषि बोलते हैं शास्त्र के अनुसार और इस मंत्र के देवता अंतर्यामी वो भी आप ही हो कहीं अंतर्यामी रूप में और कहीं ऋषि के रूप में और कहीं ब्रह्मा के रूप में तो कहीं लीला साधी के रूप में तो कहीं श्रोता के रूप में सब तुम्हारी लीला है सब तुम ही हो हम य ओमकार का जप करेंगे किसलिए करेंगे कि तुम्हारी प्रीति पाने को जो तुम बांटने के लिए घूम रहे हो और सारी लीला रच रहे हो बैल बने [संगीत] हो विष्णु सहस्त्र नाम में एक नाम भगवान
का बल भी है रिष्य बल एक नाम गुरु भी है लघुता से ऊपर उठाते इसलिए गुरु है लघु में नहीं रहने देते पति पत्नी का लघु सुख है उसमें गड़बड़ कर देंगे झगड़ा करा देंगे सासु बहु का लघु सुख है ऐसा कराएंगे नहीं कराते व तुमको गुरु के पास ले जाए स्वयं गुरु है तो गुरु के पास लेकर तुम्हारे कोई गुरु सुख बड़ा सुख दिला गुरु सुख क्या है ओम ओम ओम ओम प्रभु जी ओम प्यारे जी ओम मेरे जी ओम अंतरात्मा देव ओम ओम होठों से दो मिनट जपो खाली प्यार से गुरु सुख दाता
लघु सुख हरता गुरु सुख [संगीत] भरता आनंद ओ नंद कौन है जीव तो नंद है और आनंद कौन है अंतर्यामी घर कहां है तुम्हारा अंतः नंद घेर आनंद हाथी दिने घोड़ा दिने फिर बाहर की चीजों में ममता क्या रही दो [संगीत] करो ओ ओ ओ [संगीत] अब कंठ से करो यह साधना श्री कृष्ण ने यशोदा को [संगीत] सिखाई जीव में गुण दोष रहते हैं अविद्या के कारण और भगवान में जो गुण दोष दिखते हैं वह लीला के [संगीत] कारण जीव में अविद्या के कारण और भगवान में जो गड़बड़ी कभी दिखे तो वो [संगीत] लीला भक्ति
में तीन बातें जरूरी है भगवान में मन लगाना और भगवान का ध्यान करना और भगवान के प्रेम स्वभाव में एकाकार होना भगवान की पूजा भगवान के लिए समर्पण भगवान की शरणागति और भगवान में प्रेम जन्माष्टमी भादरवा प्रद जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र और [संगीत] बुधवार का दिन था श्री कृष्ण कहते ये दुर्लभ योग जन्माष्टमी का जो जन्माष्टमी का उपवास करते हैं कोटि जन्म कृत पाप के नष्ट हो जाते हैं जो जन्माष्टमी जयंती का उत्सव करते हैं संस्कृति की समृद्धि और संरक्षण में योगदान देते [संगीत] हैं वे भवसागर से तरकर मेरे प्रेम प्रसाद को पाते हैं जो भगवान
के कीर्तन भजन में आनंदित आदित होते नाचते हसते हैं रो गाते हैं कभी भाव विभोर होते हैं ऐसे व्यक्तियों को देखकर जो अपने को विशेष मानते हैं और ऐसे भक्तों की मजाक करते हैं उनको 100 वर्ष तक अशु नर्क में अशु पान करके रहना पड़ता है वाग गद गदा द्रवित यस्य चित्तम वाणी गदगद हो जाए चित्त द्रवित हो जाए कभी हंसी आने लगे कभी रुदन हो कभी भाव विभोर हो कभी कुछ की कुछ क्रियाएं हो तो ऐसी चेष्टा में जो भक्त सराबोर होते हैं उन भक्तों को देखकर जो लोग व्यंग करते हैं हसी मजाक करते
हैं उनको 100 स वर्ष तक नरक में अश्रु नरक में अशु पान करके रुदन करके गुजारना पड़ता है अब [संगीत] आप ध्यान मग्न होते जाओ ओ गहरी शांति परमात्मा शांति रूपम मधुरम निपुर मधुरम बंसी मधुरम अखिलम मधुरम निखिलम मधुरम गहरी शांति और प्रीति में खोते जाओ जो कुछ होता है भीतर से होने दो हंसी आए तो होने दो रुदन आए तो होने दो आंसू पढ़ते तो आंसू गिरने दो और प्रेमा भक्ति बरसती तो प्रेमा बर [संगीत] से भगवत ध्यान से भगवत रस मिलता है तो तुम्हारी बुद्धि पुण्य और पाप से पार हो जाती है राग
और द्वेष बुद्धि का स्वभाव बाधित होकर समता के कामराज में आती तो बुद्धि रितम भरा प्रज्ञा बन जाती जैसे कोलसा काला है अग्नि में मिल जाते लाल चमचमा आता अग्नि रूप ऐसे ही भगवान बोलते माम कम शरणम रज तमेव शरणम ग गीता में शरणागति की बहुत ढंग से प्रेरणा मिलती है गतिर भरता प्रभु भ साक्षी भरता भोक्ता भगवान साक्षी है [संगीत] निवास शरणम सुरत शरणागति हों का निवास स्थान में हूं अंतर यान थके हुए जीव मेरे में आके आराम करते तमेव शरणम ग अर्जुन तू उसी मुझ अंतर्यामी में आ जा मा में कम शरण शरण
आ जा आप भगवान की शरण में डूबते जाओ ओम शांति गहरी शांति मधुर शांति धर्म राजा सावित्री सावित्री देवी को कहते हैं कि जन्माष्टमी का व्रत 100 जन्मों के पापों से मुक्ति दिलाने वाला है श्री कृष्ण में 64 दिव्य गुण है एक तो सुंदर अंग वाले हैं दूसरा शुभ लक्षण युक्त है तीसरा [संगीत] अतिशय रुच वाले हैं चौथा दिव्य गुण है तेजोमय पांचवा गुण है बलवान है पर्वत उठा लिया छठा दिव्य गुण है भगवान नित्य है शरीर नित्य नहीं है नहीं भगवान नृत्य है जो भगवान में गुण है वही तुम्हारे में भी गुण है तुम
भगवान के अविभाज्य सातवा गुण है प्रिय भाषी भगवान मधुर बोलते हैं आठवा भगवान का गुण है सत्यवादी भले समझ में ना आए लेकिन भगवान जो बोलते हैं सत्य बोलते [संगीत] हैं नौवा गुण है शौर्यम भगवान शूरवीर दसवा गुण है भाषाओं के ज्ञाता है कोई भी भाषा बोलो उसको पहले वही जानते ताप के भाव गवा गुण है परम पंडित है भगवान पंडितों के भी प्रेरक है पंडितों को भी राह दिखाने वाले बारवा भगवान का यह दिव्य गुण है कि बुद्धि मानो में शिरोमण तेरवा है प्रतिभाशाली चवा गुण है कला पारंगत चाहे नृत्य कला हो चाहे वाद्य
कला हो चाहे संधि कला हो चाहे युद्ध कला हो चाहे साधन कला हो चाहे साध्य कला हो कलाओं में पारा गत और पमा गुण है कि भगवान चतुर है जो आजकल के चतुर है वैसी चतुराई नहीं लोक निर्द दुख कैसे हो इसमें चतुर है लोग सवान कैसे हो आत्म वान कैसे हो और मेरे स्वभाव को पाकर मुझ में कैसे हू ऐसी चतुराई भगवान में है ऐसी किसी में नहीं दूसरे तो चतुराई से खुद भी ठगे जाएंगे लोगों को ठग चीज वस्तुओ से ऐसी तुच्छ चतुराई तो संसारी लोग मानते हैं भगवान की चतुराई भगवत मय है
फिर भगवान दक्ष है फिसलते नहीं पुत्रों को पोतों को देखकर उनका पक्ष नहीं लेते दक्ष है उनकी गलती तो उनको भी दंडित करने में सहमत रहते हैं ऋषियों ने श्राप दिया के गर्भवती गोपी लेकर आए हो लेकिन वास्तव में गोप है इसके पेट पर जो तुमने तपेली में तस्म को रखा है उसी से तुम्हारा विनाश होगा कृष्ण ने सुना ऋषियों ने जो कहा है ठीक है तटस्थ है दक्ष है चाहते तो श्राप अन्यता कर सकते नहीं दक्ष जो जैसा कर्म करता है उसको ऐसा फल भुगतने 17वी बात है भगवान कृतज्ञ है थोड़ा भी भगवान का
स्मरण करो जप करो भगवान के लिए कुछ भी करो तो भगवान उसको भूलते नहीं कृतज्ञ 18वां भगवान का गुण है व्रत धारी आप में भी वह भगवान के गुण आए कोई भी जीवन में माला करने का गु व्रत ब्रह्मचर्य पालने का व्रत उपवास करने का व्रत पूनम भरने का व्रत आपके जीवन में भी होगा तो आप भगवान की कृपा को और भगवान के स्वभाव को आत्मसात करने में सफल हो जाएंगे 19वां भगवान में गुण है देश काल और परिस्थिति को तुरंत जानने वाले आप भी देश काल और परिस्थिति को जानकर व्यवहार करो बसवा गुण है
शास्त्र ज्ञान में पारा आप भी सत्संग के द्वारा शास्त्र का ज्ञान में पारंगत हो जाओ 21वां गुण है भगवान का पवित्र साफ सुथरे रहो मन से बुद्धि से और शरीर से बावा गुण है आत्म संयमी अपने को जब चाहे चुप में डाल दे जब चाहे संयम में रख दे जब चाहे तो बोले जब चाहे मोन रहे ऐसा नहीं कि अपनी आदत के गुलाम बन जाए जब चाहे अपनी आदत को घुमा दे ऐसे आत्म संयम भगवान और 23 मा गुण है भगवान स्थिर है और 24 मा है सहनशीलता है शिशुपाल गालियां देता गया देता गया देता
गया एक दो तीन चार नहीं 100 स गालियां देता गया भगवान सहते गए और तुकाराम बोलते तुम बैल हो भगवान हस रहे वृगु ने लात मार दी उनका पैर सहलाने लगे आपके पैर को तो चोट नहीं लगी मेरा हृदय तो देव दनो के युद्ध में कठोर हो गया होगा आपको तो चोट नहीं लग कैसी शन शक्ति आप भी सन शक्ति बढ़ाओ सासू मां कुछ कह दे तो शन शक्ति रखो पति की मां है हमारे पति की जन्म दत्र सासु माना पग दबाओ नहीं ड़ा दे भगवान सम दृष्टि है और भगवान उदार है तीवा गुण है
भगवान धार्मिक है और 21 31 मा गुण है भगवान शूर 32 मा गुण है भगवान में करुणा खूब 33 मा गुण है भगवान अमानी है औरों को मान देते हैं स्वयं कितना भी मान हो उनका महत्व नहीं रखते अपने में बड़पन नहीं गुरु के पास दर्शन करने जाते गुरु का रथ खींचते हैं गुरु को चरण चपी करते 34 मा गुण है भगवान विनीत है और 35 वा गुण है भगवान उदार है और 6वा गुण है भगवान लज्जा वान भी शर्मा भी है लो ऐसा नहीं कि इतना सामर्थ्य तो नक कटे होक रहे नहीं शर्मा भी
छ भगवान लज्जा वान भी है शरणागत रक्षता का उनका बड़ा भारी गुण हे भगवान मैं तुम्हारी शरण हूं बस सच्चे हृदय से कर लो फिर चाहे साड़ी अवतार हो चाहे आवेश अवतार हो चाहे प्रेरणा अवतार हो कुछ भी करके हमारी भलाई कर देते 38 मा गुण है भगवान सुख रूप है और उवा भगवान सबके हित से तो आप भी सबके हित भ क्योंकि भगवान का आत्मा अंतर्यामी और तुम्हारा आत्मा भी वही अंतर्यामी भगवान ब्रह्म रूप है तो तुम भी उस ब्रह्म के वंशज हो 20 4 मा गुण है भगवान प्रेम वशीभूत हो जाते हैं और
आप भी तो हो जाते खूब प्रेम से आपसे कोई व्यवहार करे तो आपका दिल भी तो ऐसे ही हो जाता है भगवान के गुण तुम्हारे में छुपे हैं विकसित होने दो 41 मा गुण सबका मंगल सासु का भी मंगल बह का भी मंगल हो रहा है 44 वा गुण है भगवान लोक प्रिय है कृष्ण आए कृष्ण आए कृष्ण आए दौड़ते हैं श्री कृष्ण जहां से भी जाते लोग दौड़ के जाते कं सा आ कं सा आ जिधर कंस देखते उधर से कन्नी काटते दूसरी जगह भागते राम आए राम आए लोग दौड़ते उनके तरफ रावण आया
रावण उनसे दूर भागते तो राम जी का गुण प्रकट करो कृष्णा का गुण प्रकट करो मारा सासु मारा पति माता मारा पति दूध पीछ मैं करने मारे ना आशीर्वाद लेवाना हो भगवान लोकप्रिय है भक्त वत्सल है और 46 वा गुण है भगवान का चित्त चुरा लेते उबाई को बोलते तेरा लाला मैं तेरा लाला हूं उ बाई का चित्त चुरा लिया आपका हमारा चित्त चुरा लिया दो बजे ह उन की बातें सुनने में आपको भूख प्यास नहीं चित्त चुरा लिया उनकी बातों ने चित्त चोर है ये 46 वा गुण है भगवान का 47 मा है भगवान
आराध्य ऐसी उनकी लीला और ऐसा उनका स्वभाव है कि उनकी आराधना के बिना बुद्धिमान और भक्त हृदय रुकेगा नहीं 48 वा गुण है भगवान ऐश्वर्य से युक्त है ऐश्वर्य जरा सा खाया फिर उस कटोरे से व्यंजन निकलते गए ऋषि मुनि खाए एक साक पड़ा था वह खाया अक्षय पात्र का बना दिया ऐसा भगवान का और यह तुम्हारे में भी है आदी बालटी दी जाओ स्कूल में प्रसाद बाटो स्कूल में प्रसाद बांटते बांटते थक गए फिर प्रार्थना किया तब रात को प्रसाद खत्म भगवान का ऐश्वर्य भगवान का 39 वा गुण है भगवान में वैराग्य द्वारका डूब
रही है तो आए आए मेरी द्वारका डूब अरे तुम्हारी चार ईट गिर जाती है तो रोते हो मेरा मकान गिर गया अरे सोने की द्वार का डूब रही हो कृष्ण की बंसी बज रही है और पसवा गुण है कि भवान ईश्वर है 5वा गुण है एक स्वरूप है एक रस बावा गुण है भगवान सर्वज्ञ है मेरे को तो आया कि जिसको गरज होगी आएगा सृष्टिकर्ता खुद लाएगा वह सूरज उगने के बाद नाहे तब भूख लगी लेकिन किसानों ने कहा कि रात को हमको स्वपना आया तो मेरे मन में जो आएगा वह भगवान को पहले पता
था तभी किसानों को रात को सपना दे दिया तो कैसे है और भगवान में 53 मा गुण है नित्य नूतन जरे जोत रे नवीन रस और भगवान केय सूरज भी नित्य नूतन चंद्रमा भी नित्य नूतन और संत की वाणी भी नित्य नूतन नित्य नवी नित्य नवी नित्य आनंद और 5वा गुण है भगवान का सच्चिदानंद है सत है चित है आनंद स्वरूप है पचमा 5वा गुण है के सिद्धियों द्वारा सेवित है रिद्धि सिद्धियां उनकी सेवा चाकरी में 5वा गुण है शक्ति से युक्त है और 57 मा है विग्रह ब्रह्मांड प्रकट कर लेते हैं संकल्प मात्र से
वो तुम्हारे में भी है तुम भी रात को स्वपने में क्याक प्रकट कर लेते हो रेलगाड़ी बना लेते हो खेत खली बना देते हो आबू की रबड़ी बड़ी अजमेर का दूध मिठा नयाना कोटा ईले भरने सिंह लेले मुंबई हलो है कि नहीं तुम्हारे में भी भगवत स्वभाव है पैदा कर देते हो सपना और भगवान में 5वा गुण है अवतारों के स्रोत है भगवान से अवतार प्रकट होते उनवा दिन है गुण है भगवान मुक्ति दाता है और साठवा गुण है भगवान आकर्षित करने वाले 6वा गुण है भगवान चमत्कारिक लीलाएं करते यशोदा के आगे मुंह खोल दिया
और त्रिलोकी दिखा द अर्जुन को विश्वरूप दिखा दिया और भी कई कई लीलाए चमत्कारिक लीला करते और भगवान में 6वा गुण है भक्तों से भक्तों से विभूषित होते हैं जहां भी भगवान है वहां भक्त भगवान को देखकर लोग भक्त बन जाए यह गुण संतो में भी होता है संत जहां जाते उनके भक्त बन जाते देश वही तो भगवान है संतो का अंतक 6वा गुण है मुरली चित हरने वाले जरा सी बं बंसी में प्राण दे और साधन तो मार के पीट के बजाए जाते लेकिन बंसी तो अपना प्राण उडेल के बजाते और नजर डालते तो
सब का चित चुरा लेते और 64 वा गुण है भगवान जिनके तुल्य किसी का रूप नहीं किसी के लक्षण नहीं किसी का नहीं अपने आप में पूर्ण है और भन प्रपन्नतिहरे अंदर उसकी छुपी हुई दता है जरा होने दो जो सुना है उसमें रम तो श्री [संगीत] कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि अर्जुन तू आध्यात्मिक क्या है जानता है अर्जुन को तो पता ही नहीं है और कृष्ण जगा रहे हैं आध्यात्म की मु चते आदि देवी कम चकम आदि भौतिक की मु चते अर्जुन अपने को मानता था और वास्तव में अर्जुन योग्य था उस समय
में मनुष्य की जो योग्यता विकसित हो सकती उससे भी ज्यादा योग्यताएं अर्जुन की थी स शरीर स्वर्ग में गया और अपसरा में श्रेष्ठ उर् वंशी ने ऑफर किया कि तुम मेरे पति बन जाओ बोले नहीं नहीं पति नहीं बनते हो तो एक दिन के लिए मुझे अपने गले लगा लो बोले एक बार लगा लो नहीं ऐसा नहीं कर अरु वंशी तो अप्सराओं में जैसे तारों में चंद्रमा ऐसे अप्सराओं में श्रेष्ठ ऐसी सौंदर्य की धनी उरवंखन अगर वाले भी आ जाएंगे और बंबई वाले भी आ जाएंगे यूरोप वाले भी भागेंगे ऐसे प्रभावशाली होती है व मेरे
साधकों को ध्यान में दिखती कभी-कभी अरे साई ऐसी थी ऐसी थी लेकिन आपने कहा था फसना नहीं तु मैं तो हाथ जोड़ के बैठे रहे फिर उसने अपना य नश्व चमड़ा हटाकर शरीर में जो होता है वह सब दिखाया बच गए अपसरा बड़ी खूबसूरत होती है बड़ी आकर्षण होती है बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को भी फिसला देती है ऐसी अप्सराओं की शिरोमणि कृष्ण यह अपने अर्जुन मोहित नहीं हुए तोर वंशी ने कहा मैं श्राप दे दूंगी बोले मां तुम्हारा श्राप सच्चा होता है मुझे पता है मां कैसे बोलते हो युती तुम भी युवक खूब डांटा मैं
श्राप स्वीकार करूंगा लेकिन अपनी कमर नहीं ऊंगा कितनी ऊंची बात है ऐसा अर्जुन श्री कृष्ण कहते आदि भौतिक के मचत य पंच भूतों का शरीर आदि भौतिक पांच भूतों में से ही बना है आदि देवी का मन बुद्धि है इन दोनों को चलाने वाला अध उसको तो जानता नहीं है और मानता कि यह मर जाएंगे वोह मर जाएंगे पितरों को श तर्पण कौन करेगा अरे जो पैदा हुए वो तो मरेंगे ही तू नहीं मारेगा तो भी उ मरे मराए अब देख तो श्री कृष्ण ने कृपा करके उनको दिखाया कि सब मौत के तरफ खींचे जा
रहे हैं स्वासो शवास में सभी लोग मौत के तरफ जा रहे जैसे गंगा सागर की तरफ ऐसे सभी शरीर मौत की तरफ जा रहे हैं कृ ने महसूस कराया तब श्री कृष्ण का उपदेश सुनने की अर्जुन को इच्छा नहीं थी लेकिन अर्जुन के चित्त में उपदेश सुनने की भूख जगा द कुंजा को इच्छा नहीं थी कृष्ण से मिलने की और सीधा होने की जगा दी आप में हमारे में ऐसी कोई योग्यता नहीं थी कि हम इस श्री कृष्ण उत्सव में इस तरीके से कृष्ण तत्व का ज्ञान पाए सुने लेकिन योग्यता जगा दी हम तो तीन
पढ़े और योग्यता जगा दी बात कर रहे उनके विषय में तो औरों को पाने के लिए तो हमें यत्न करना पड़ता है लेकिन हमको जगाने के लिए हमें यत्न नहीं करना पता और सुख लेने के लिए तो हमें यत्न करना पड़ता है लेकिन भगवती सुख लेने के लिए हमें यत्न नहीं कर पड़ता भगवती सुख अपने आप फट निकलता है उसका अनुभव अभी मैं कराता हूं चता हूं तुम जो नए लोग है उनको तो खाऊंगा जरूर केवल भूमिका बनाओ बाकी भगवान से सुख मांगने की जरूरत नहीं भगवान जो सुख लेते हैं वह अपने आप का सुख
तुम्हारे को खाएंगे अब भी आज इस समय हम भगवान के हैं भगवान हमारे अंतर्यामी भगवान का मंत्र है ओ