[संगीत] [हंसी] [संगीत] आशीष जी गोरखपुर से राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी हे गुरुदेव आपके श्रीमुख से कई बार सुना है कि संपूर्ण संबंधों और कामनाओं का समर्पण किए बिना पूर्ण शरणागति नहीं हो सकती तो फिर पारिवारिक संबंध और श्री जी को पाने की कामना को लेकर पूर्ण शरणागति कैसे होगी पारिवारिक संबंध में हमारे भगवान के बिना कोई संबंध है क्या पत्नी में भगवान ना हो तो पत्नी को कितने मिनट रख सकते हो पुत्र में भगवान ना हो तो कितने मिनट रख सकते हो हम सब में भगवान को देखें व्यवहार हमारा पिता पुत्र जैसा ही
होगा स्वांग हमारा पति पत्नी जैसा ही होगा पर हमारा दर्शन जो ज्ञानी है जो भगवत भक्त है व सब में भगवान का विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गव हस्त सुनी च सुपा केचा पंडिता सम दर्शना दर्शन हमें करना है संबंध वैसे ही रखना है विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण में गाय में हाथी में चांडाल में कुत्ते में एक ही भगवान है यह देखना है व्यवहार तो एक जैसा नहीं हो सकता ना जैसे गाय का हम दूध पीते हैं तो कुतिया का दूध थोड़ी पी लेंगे व्यवहार एक जैसा नहीं हो सकता और कुतिया में भी भगवान हमको देख
रहे हैं और गाय में भी भगवान देख रहे हैं जैसे विद्या विनय संपन्न ब्रह्म ऋषि अब उसकी समानता चांडाल से कैसे हो सकती है जो गंदे आचरण करने वाला है पर तत्व दोनों में एक है पर जब विद्या विनय संपन्न कोई ब्रह्म ऋषि पधारे तो उसका आदर होगा उस कोटि से और जो चांडा लाएगा तो उस कोटि से का व्यवहार में अंतर होता है जैसे हम अपना गाल छुए तो हाथ नहीं धोएंगे लेकिन अपने ही अधो अंग छुए नीचे के तो हमें मिट्टी लगा के साबुन लगा के हाथ धोना पड़ता है ना तो व्यवहार में
भेद है शरीर मेरा ही है शरीर मेरा ही है व्यवहार में भेद है ऐसे ही हमारा व्यवहार में भेद है ज्ञानी आत्म स्वरूप देखता है और भक्त भगवान स्वरूप देखता है बिना भगवान के पुत्र की स नहीं है बिना भगवान के पत्नी की सत्ता नहीं है बिना भगवान के इस देह की सत्ता नहीं है बिना भगवान के इस जगत की सत्ता नहीं है इस बात को मानते हो ना तो सब में श्री भगवान हमें देखना है स्वांग हमें पति पत्नी का करना है पिता पुत्र का करना है नाना प्रकार के जो हमें स्वांग मिले हैं
व हमें वैसे ही करना है पर हमें देखना है कि भगवान सब जब हम भगवत भाव सब में देख रहे हैं तो अब संसार संबंध तो हमें नहीं बांध पाएगा क्योंकि हम पहला भगवत भाव देख रहे हैं मेरी पत्नी का जो स्वांग करे हुए हैं उसमें भगवत तत्व विराजमान है यह बाहरी ढांचा पत्नी का अंदर बैठा हुआ भगवान है यहां भी भगवान बैठ सर्वम बस यही बात जीत गए और जब हम भगवान को भूलकर शरीर में राग करते हैं मेरी पत्नी तो आज सत्संग सुना था एक राजा ने अपने पत्नी को दासी समझकर कि अब
तो मेरे साथ ब्याह हो गया और वो मनमानी प्रतिकूलता करने तो उसको नर्क दिखाया गया था बड़ा धर्मात्मा और पुण्यात्मा था तो केवल नर्क का दर्शन कराया गया था पत्नी मान कर के अपमानित कर दिया तो नर्क का दर्शन क्यों तुम्हारी थोड़ी है वो तो भगवान उनमें बैठे हुए हैं स्वांग कर रहे हैं पत्नी का तुम पति का स्वांग करो जितना उचित है तुम कोई मालिक नहीं हो गए हो नाथ सकल संपदा तुम्हारी और मैं सेवक समेत सुत नानी पत्नी का मतलब तुम मालिक नहीं हो गए अर्धांग की तरह उसको जैसे अपने आधे अंग का
हम सेवन कैसे करते हैं जैसे इस हाथ का सेवन करते हैं ऐसे हाथ का सेवन करते हैं हम अपने साथ प्रतिकूलता करते हैं क्या नहीं तो हमारी व आत्मा है हमें प्रतिकूलता नहीं करनी उसके द्वारा की हुई प्रतिकूलता हमें सहनी जैसे हमारे हाथ से ही हमारी चोट लग जाए तो हम किसको रिपोर्ट खाएंगे हमारी दांत से जबान कट गई अब हम किसको रिपोर्ट लिखाए ऐसे ही हमारा ही सब स्वरूप है ऐसे सहा जाता है पर यह नहीं कि उसने हमको ऐसा कहा तो हम फिर वैसा नहीं फिर परमार्थ गलत हो जाएगा हमको अपनी पद्धति से
बात कर जैसे इन संबंधों को वैसे कभी-कभी ध्यान भटक जाता है इधर से परमार्थ के रास्ते से ध्यान भटकता है ये मेरा हां तो संबंध में हम इसीलिए ध्यान ना भटके तो इसीलिए तुम्हें तत्व बता रहे हैं कि सब में श्री भगवान जैसे हमने आप में भगवान पहले देखा कि मेरे भगवान इस रूप में आए अब आप हमसे घंटों बात करते रहो हम आपसे प्यार से बात हमें चिरचिरा नहीं होगी यार मेरा भजन नहीं हो रहा बेकार हमको फसाए हम अपने भगवान से बात कर रहे हैं उनको प्रसन्न करने के लिए उनके प्रश्नों का उत्तर
दे रहे हैं ऐसे पुत्र रूप में ऐसे रिश्ते नातेदार रूप में अगर हम भगवान देख लेंगे तो हमारा भजन नहीं टूटेगा हम भगवान ना देकर फूफा मौसी मसिया देखा बंद जाएंगे नहीं बंद अब गृहस्ती में तो ऐसा नहीं कि हम किसी से बात ना करें किसी से व्यवहार ना करें हमें बिल्कुल वैसे व्यवहार करना है जैसे एक संसारी आदमी पर हमारे और संसारी आदमी की दृष्टि में अंतर होगा व्यवहार वैसे ही होगा मा हमसे बड़े तो हम पैच हुआ छोटे हैं तो आशीर्वाद दिया पर हम छोटे और बड़े में भगवान ही देख रहे हैं व्यवहार
का भेद है दृष्टि का भेद नहीं और साधक साधु दृष्टि से सर्वम लमदम ब्रम यह दृष्टि होती है व्यवहार ऐसा नहीं होता व्यवहार में भेद होगा अ भक्ष पदार्थ त्यागे जाएंगे भक्ष पदार्थ पाए जाएंगे दुष्ट स्वभाव वालों से दूरी बनाई जाएगी सज्जन संग करेंगे लेकिन देखेंगे सब में ये क्रुरा प पापन देखेंगे सब में तो जो हम यह बात अंदर सोच रहे हैं कि हम रिश्ते नाते संबंधियों के बीच में परमार्थ को भूल जाते हैं तो आप उस समय भगवान नहीं देखते इसलिए भूल जाते हैं अगर उनमें भी भगवान देखकर पक्का मानो भगवान तो है
ही ना अरे भैया बिजली ना हो तो पंखा नहीं चलेगा एसी नहीं चलेगी ये हैलोजन नहीं जलेगा ये बलम नहीं जलेगा जो कारण को जानने वाले सब समझ रहे हैं कि एक मात्र बिजली का ही सारा खेल है तो पावर तो भगवान ही सब में है ना और उनको देखना े हमने देखा कि मेरे भगवान इस रूप में मेरा भजन बन गया क्योंकि अब मैं भगवान से वार्ता कर रहा हूं तो जितनी देर बात करूंगा सब भजन माना जाएगा जब हम भगवान ना मानकर रिश्ते नाते और मित्र दोस्त यह सब सांसारिक संबंध मानते हैं फिर
हमारी भक्ति बाधा को प्राप्त हो जाती है और जब हम भगवत भाव कर लेते हैं तो भक्ति बाधा को प्राप्त नहीं होती है वह आबाद हो जाती है अखंड हो जाती है बिना सब में भगवत भाव के पक्की भक्ति नहीं हो सकते सो अनन्य गति जाके अस मति न टरे हनुमंत मैं सेवक स चराचर रूप स्वामी भगवंत अगर हम संबंधों में भगवत दर्शन करेंगे तो हमारा भजन दृढ़ हो हो जाएगा बोलना स्तोत्र हो जाएगा चलना परिक्रमा हो जाएगा खाना यज्ञ हो जाएगा हमारा हर कार्य भजन हो जाए क्योंकि हम अपने में भगवान सब में भगवान
हम भगवत भाव से भरे वही दिव्य महापुरुष हो जाता है पर है कठिन बात नहीं जब हम अपने व्यवहार में उतरते तो भगवान का भाव भूल जाते हैं व्यक्तित्व भाव आ जाता है हमारे ये रिश्तेदार हम इनके ये व्यवहार में भगवान का हम विस्मरण कर दिए तो फिर व्यवहार अलग हो गया परमार्थ अलग हो गया अगर हम परमार्थ को व्यवहार में ले आवे तो हमारा व्यवहार भी भजन बन जाएगा आप समझ इसके इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बिना भगवत भाव की क्योंकि व्यवहार में जाना है सबसे भगवान की चर्चा थोड़ी होगी व्यापारी हो तो
व्यापार की चर्चा होगी मित्र है तो मित्र से चर्चा पत्नी परिवार उससे उस तरह की चर्चा होगी तो हमारा भजन तो बाधित हो गया ना अखंड भजन कहां हुआ अखंड भजन ऐसे होगा उनमें हमने भगवत भाव कर लिया और है भाई सत्य बात है अगर ये हो कि है तो नहीं भगवान अब एक मतलब में आप होप रहे हो हमारे दिमाग में भगवान है बेटे का ढांचा केवल तुम्हारे बेटे कहलाने वाला है अंदर जो उसमें पावर है वो भगवान ही है वो जब चले जाते हैं तो ढांचे का आप भी प्यार नहीं करते चाहे जितना
लाड़ला पुत्र भी जलवा दोगे या गड़वा दोगे क्योंकि भगवान से ही आप प्यार कर रहे अनजाने में भी भगवान बिल्कुल पक्का समझो सच्ची वालो पावर भगवान सब में बैठा हुआ है वही पावर है अब जैसे एक ही बिजली सब में है अब अज्ञानी इस बात को जो नहीं जानेगा व कहेगा बिजली तो ठंडी होती है हमने देखा फ्रिज में एसी में यह गर्मी कैसे पैदा कर सकती है बिजली तो जीवन का पोषण करती है यह जान कैसे ले सकती है लेकिन अगर आप देखो तो जान लेने वाली भी है और जान का पोषण करने वाली
भी है वह गर्म भी है वो ठंडी भी है ऐसे ही प्रतिकूल और अनुकूल उष्ण और शीत अच्छा और बुरा दुष्टा आत्मा और महात्मा यह बाहरी करण है इनमें जो कारण है वह परमात्मा यह जो जान गया वही सिद्ध महापुरुष हो जाता तोब हम चले मार्ग में बिना पैसा के महान पुण्य है महान कार्य है हम आपसे भगवान का बर्ताव कर रहे हैं ना व्यवहार अंदर मानकर तो जितनी देर हम बात करेंगे ये सब हमारा भजन बन गया पे मतलब पेमेंट के आप धनी बन रहे हो कार्य वही करना है जैसे कल एक भगत जी
आए थे व प्रश्न कर रहे थे मेरे कपड़े की दुकान है कहां का आता है आधा आधा घंटा कपड़ा सब देखता एक भी नहीं लेता फिर मुझे बहुत जलन होती है तो इस क्यों अगर उसको पहले ही मान लो कि मेरे भगवान आए हैं इस रूप में आधा घंटा सेवा बनी और हे भगवान आप ले या ना लो हे भगवान सेवा आपको समर्पित उसका पेमेंट मिलेगा आपको बहुत और वो मालिक जब पेमेंट देगा तो बहुत बड़ा धनी बना देगा ये संसार क्या देगा तो हम लोग अगर सब भागवत भाव से कार्य करें तो आनंद बना
रहेगा नहीं तो हर क्रिया कष्ट देने वाली बन जाएगी अब कितना कष्ट अंदर के आधा घंटा बहुत ही दुष्ट है आधा घंटा आया पूरा कपड़ा खुलवा दिया अब उनको समेट समेट के रख पैसा एक भी नहीं मिला बार-बार जलन हो गई अगर यह बात आ गई कि गाहक के रूप में मेरे भगवान आए थे चलो इतनी सेवा देने वाले तो भगवान है तो निमित्त मात्र बनता है कोई व्यक्ति अब ज्ञान है तो आनंदित है नहीं है तो परेशान हो ऐसे कितने व्यवहार है कितने व्यवहार मतलब अज्ञान के कारण दुख ही दुख है एक भाई थोड़ी
सी वस्तु या थोड़ी सी जमीन के लिए एक भाई को मार देता है वह भी जेल चला जाता है दोनों सब खत्म अज्ञान की बात है ना अगर भाव अपने परिवार में अपने सब में भगवत भाव है देन हार कोई और भया तुम ले जाओ तो वो जो आपने संतोष किया जो आपने भगवत भाव किया अब उसका भी तो पुण्य है उस उस कर्म का भी तो फल है तो वह केवल थोड़ी सी जमीन लेकर खुशी हो गया और आपने भगवान की कृपा पर विश्वास किया वो कैसे बढ़ाता है अनंत सृष्टि किसी के सहयोग से
थोड़ी की है वो अपने एक संकल्प से की है यह बात समझना थोड़ा कठिन होता है अगर समझ गया जीवन मुक्त हो गया आनंदित हो गया आवागमन से मुक्त हो जाएगा समझ पा रहे आप आपकी सारी बात चलते हैं बस थोड़ी सी दिक्कत आ रही कभी कभी अपने आप को बहुत असमर्थ महसूस करते हैं जैसे नाम लेते तो ऐसे लगता है कि मैं एकदम समर्थ नहीं हूं इसमें य ये आप देखो अब जरा देखना अब इस बात को भी पकड़ो इस चोरी को ये आपका मन आपको समझा रहा है ना आप तो सच्चिदानंद भगवान के
अंश है मन ही समझाता है तो तुमको मन बारबार उसको हता हूं बारबार हराता हूं बारबार उठता हूं मतलब आज दो साल से मैं उससे लड़ रहा हूं और मैं आपके आशीर्वाद से बहुत मतलब आगे निकला भी हूं लेकिन आज भी मैं महसूस करता हूं अगर मैंने कल दिन भर भजन किया तो मुझे आज लगता मैंने कल कुछ भी नहीं किया और फिर मुझे उसी स्थि वसे एक कृपा है अहंकार ना होते कृपा है अहंकार ना होते बहुत बड़ी कृपा है कि रोज भजन हो रहा है और मन पर आप लड़ रहे हैं देखो अगर
इतना आपको अनुभव हो गया कि मन को हम कुछ परसेंट सही ला पाए हैं तो बहुत बड़ा काम हो गया है त आपके आशीवाद 100% हम उसके अधीन थे अगर 90 पर हम उसके अधीन और 10 पर अपने को छुटा पाए तो बहुत बड़ा काम कर लिया और पूरा मुक्त तो श्री भगवान कर देंगे तुम चिंता ना करो प्रयास तुम करते रहो मिल जाएगी अरे देखो अभी राधा बोला व अभी प्राण छूट जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी उसकी चिंता मत करो हमें जीवन सही आचरण करते हुए गुजारना है परिणाम तो भगवान की की कृपा
से प्राप्त होना है इसलिए चिंता मत करो चिंतन करो और बहुत कृपा है जो अध्यात्म में चल पड़े नहीं तो कितना अब जैसे जैसे आप चलोगे अध्यात्म में तो पीछे का मार्ग आपको कितना गंदा और कडुआ दिखाई देगा कि आपर कैसे नरक में फंसे थे और जो उसी में फंसे उनको अच्छा लग रहा है की तरह जिंदगी जी रहे थे जी तो अब क्या है जैसे-जैसे आप ऊंचे उठोगे वैसे-वैसे पूर्व आपको दिखाई देगा कि कहां मैं फंसा था अच्छा जो उसमें फंसे हैं उनको ये लगेगा कि पागल है क्या लगता है लोग ने बी बच्चों
को ही लगता है जब उनसे बैठक मैं भगवत चर्चा करता हूं लेकिन आज छ सात महीने से थोड़ा थोड़ा 5 पर उनके अंदर भी जो है हा संग से रंग आ जाएगा संग से रंग आ जाएगा चल सुमन गुप्ता जी कोलकाता से राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी मराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम गुरुदेव नाम जप में मेरा खूब मन लगता है ऐसा लगता है कि नाम जप के बिना नहीं जी पाऊंगी पर मंत्र जाप जैसे शुरू करते हूं तंद्रा वस्था में चले जाते हूं आपकी आज्ञा 11 माला पूरी करती हूं हा जैसे जैसे
जैसे अंत किसका है जैसे जैसे अंतःकरण पवित्र होगा वैसे वैसे मंत्र में रति हो जाएगी मंत्र में रति होना कठिन है नाम में रति है सौभाग्य का विषय जैसे बने वैसे तुम कुछ माला जो 11 माला दिया है उसको आप करते रहो नाम जपते रहो फिर एक दिन देखना कि मंत्रम वृति हो जाएगी मंत्र में मतलब मंत्र जितना अंतःकरण पवित्र होगा उतने व नाचने लगता है हृदय में मंत्र सुरत होने लगता है मंत्रा का वृति के शास्त्र में बहुत महिमा की गई है जो गुरु मंत्र है व हमारे दिमाग में ऐसे छा जाए राउंड राउंड
एकदम चल रहा है बारबार जैसे होटलों में नहीं लिखा आता ऐसे ऐसे दिमाग में लिखा चल रहा है एक एक अक्षर अब धीरे-धीरे चलो नाम में रुचि हो गई है ना एक सोपान बहुत जोर का चढ़ गई आप नाम जपते रहो जितना खाली समय मिले नाम जप करो खाली समय का मतलब नियम की अपनी दिनचर्या करने के बाद नियम में प्रमाद मत करना अभी मन मंत्र में अरुचि पैदा करेगा फिर कल नाम में अरुचि पैदा कर देगा जिस नाम के बल से मंत्र में अरुचि कर रहा है व कल नाम में रुचि पैदा कर देगा
हम लोग जीवन भर इसी लड़ाई को ड़ते हुए पूरा देखते हुए आए हमें गुरु आज्ञा पर इसको बांधना है और शेष समय में जो नाम हमें प्रिय लग रहा है हम उसको जप पाएंगे संसार का चिंतन ना हो इसलिए हमें जो प्रिय वो हम शुरू करेंगे पर गुरु आज्ञा पर चलना है अगर आज्ञा का उल्लंघन करोगे तो आज उसके लिए यह इधर रुच कराएगा फिर कल किसी विषय के लिए नाम में रुच करा देगा इसको वश में करना तभी हो सकता है जब धीरे धीरे धीरे इसके जो कदम हम डालते चले जाए वो पीछे ना
हटे जो आज्ञा हो गई उसका अक्षर सा पालन करें मंत्र में रुचि बहुत पवित्र हृदय में होती है इसलिए थोड़ा भी कहीं अपराध बनेगा तो मंत्र में अरुचि हो जाएगी नाम भगवान बड़े कृपालु है जो आपको सुख मिल रहा है पर मंत्र में नियमानुसार जो माला जो पाठ उसको जरूर करते रहिएगा उसकी उपेक्षा मत कीजिए क्योंकि वही आगे स्वरूप प्रदान करेगा मंत्र से ही हमें भाव देह की प्राप्ति होती है तो खूब नाम जप करो अन्य समय और अपनी नियमावली जो गुरु की दी हुई नियमावली उसका जरूर पालन करें उसकी बड़ी महिमा है मन का
यही कार्य है कि वो शास्त्र और गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करवाना चाहता है कभी-कभी धर्म के नाम पर पवित्रता के नाम पर भजन के नाम पर भी अवहेलना कर देता है हां तो इसलिए हमको चाहिए इस कुछ नियम जो गुरुजन देते हैं उनमें इसको बांधना पड़ेगा कि मन लगे ना लगे मुझे करना है ये मुझे आज्ञा है उसको मुझे करना है जैसे 11 माला गुरुमंत्र 12 पद चतुराश्रम अक्ष भोजन नहीं कुसंग नहीं यह चार बातें हम जरूर कहते हैं कि कुसंग नहीं करना अक्ष भोजन नहीं पाना 11 माला गुरु मंत्र जपना और 12 पद
चतुरा जी के पढ़ लेना और शेष समय राधा राधा राधा वल्लभ श्री हरिवंश खूब आनंद से नाम जप अपने कर्तव्य को करते हुए अगर नाम जब छूटता है तो आप कर्तव्य को श्री जी के चरणों में अर्पित कर वो भी प्रभु जी बस एक ही दुविधा थी या एक ही सवाल था कि जब मैं अर्पित करता हूं तो वो आनंद नहीं प्राप्त होता है जो नाम जप के दौरान होता है मुझे अपराध बोध लगता है कि मैं हां ये ये भक्ति का लक्षण है ये भक्ति का स्वभाव प्रभाव है कि वो डायरेक्ट सीधा स्वाद लेना
चाहती प्रभु का अब वो तो मान कर के समर्पित कर रहे हैं थातु प्रपंच का कार्य संसार का कार्य हम मानकर प्रभु को समर्पित करते हैं पर इसमें हमें तब आनंद आने लगेगा जब भगवान की आज्ञा मानेंगे मैं यह कर्म भगवान के लिए कर रहा हूं और मरीज के रूप में भगवान है और जब हम यह देखेंगे कि मेरे भगवान इस रूप में तो वर्तमान में आनंद मिलने लगेगा अभी हम केवल भावना करते हैं सच्चाई से नहीं मानते इस मरीज में भगवान है अगर हम सच्चाई से मानेंगे तो अपने भगवान की सेवा हमने दो घंटे
की तो हमें आनंद आएगा कि नहीं हम श्री विग्रह की जब सेवा करते हैं भगवान मान के तो आनंद होता है ना भगवान पाषाण विग्रह या काष्ट विग्रह या अष्टधातु विग्रह तो हमें आनंद आता है ना तो हम चैतन्य मरीज रूप में भगवान को भगवान सही माने में नहीं मान पा रहे तो हम उनमें सही माने में देखें तो हमको पूरा वैसे ही आनंद मिलेगा जैसे हम ठाकुर जी की सेवा में आनंदित होते हैं ऐसे उस मरीज की सेवा में आनंद यद्यपि भगवान ही सर्वत्र है इसमें बिल्कुल भेद नहीं है भगवान ही पूरे के पूरे
बने हुए हैं वो थोड़ा जब हमारी दृष्टि पवित्र होगी तब हमें पता चलेगा तो अभी समर्पण का चलाते रहिए हां वह आनंद का अनुभव उससे भी ज्यादा आने लगेगा क्योंकि नाम जप करने से मेरे को आनंद आता है और सेवा करने से सामने वाले भगवान को आनंद आता है उनको आन तत् सुख भाव समझ रहे हैं ना तत् सुख भाव में जब सुख आ जाएगा तब ये दोष खत्म हो जाएगा अभी स्सुख भाव भजन का ही सही पर मेरे को आनंद आता है और जब हम सेवा करते हैं तो सामने वाले प्रभु को आनंद आता
है मेरा आनंद छिन गया लेकिन वो आनंदित हो गए इसमें तत् सुख भाव बना तत् सुख भाव से जो आनंद आएगा वो परमात्मा प्राप्ति सीधे कराएगा ठीक है जय मार तो बाबा नेत्र धन्य है जाए आपके द नहीं हमारे नेत्र धन्य हो जाए आप बृजवासन के दर्शन करके आप भगवत पार्षद है हम तो आपके सेवक हैं आपकी जूठन और आपके चरण रज के प्रताप से हम है आप तो प्रभु के निज जन है प्रभु के निज जन है ब्रजवासी हमारे पूज्य है ब्रजवासी हमारे गुरु स्वरूप है हम हर एक ब्रजवासी को अपने गुरु स्वरूप मा
हमारे शरीर में जो खून है ब्रजवासी हों के नमक से अन्न से है हमारे में जो कुछ दिखाई दे रहा है व ब्रजवासी हं की चरण रज का प्रताप दिखाई दे रहा है इसलिए ब्रजवासी तो हमारे बाबा बहुत कृपा क्योंकि बृजवासी सस्त्र जन्म हरि रंग राचे बज जन्म आए जिनको कई कई हजार वर्ष ठाकुर जी की लीला से संबंध रहे उनको बज में र तो आपसे तो विशेष प्रेम करें आपके स्वास्थ की से थोड़ी चिंता लगी इसीलिए हम स्वस्थ है कि आप चिंतित हो तो हम चिंता रहित है श्री जी का लाल जू का जो
प्रताप है ना वो किडनी क्या चीज है करतु अ करतु अन्यथा करतम सर्व समर्था साई स्वरा मु कम करोति वाचाल पंगम लंगते गिरिम यत कृपा तम वंदे परमानंद माधवा अभी हमारे लाल जू कृष्ण चंद्र जू का प्रताप जाना नहीं जान लेना तो फिर निश्चिंत हो जाए निर्भय हो जाए लाओ इन बजवास हों को दुपट्टा पहनाओ सखियों को उ श्री जी बाबा एक भाव है आपके समक्ष रखेंगे श्री प्रार्थना करयो यही भाव हमारो बनो र ब्र काम कछु हमको बैकुंठ की राह ना जावनी है बज की रज में रज है के मिलू यही प्रीत की रीत
निभानी है वन वल्लभ गाय चराया करू संग गलन की गरावनी है क्यों हमारा सा भा है ठाकुर जी सखा हमारे नंद नंदन की धरी रेनी है गार बने अबलो बहुत मती ऐसी है बाबा को विचारण में चले जाए मति मंद गवार बने अबलो अब काहे को जिय को निरास करे सब जान गए पहचान गए अबता है विश्वास करे प्रिय पूर्ण ब्रह्म हमारो सखा अब काहे को और की आस करे बजवास मिलो ब्रजवासी बने बन श्याम सखा बजवास करे तो श्री जी से यही कृपा करि बाबा ठाकुर जी के संग में गाय चराए करें ठाकुर जी
की लीला को आनंद लेते र म कोई पग चाहे मुक्ति और भक्ति दुनिया को दो हमें ऐसा कोई उपाय बताओ कि हर बार जन्म मानव को मिले या ब्रज सेवा ठाकुर सेवा और संत सेवा हम यही करते हैं बिल्कुल श्री कृष्ण चंद्र जू से अपनापन जब कर लिए आप तो इसके बाद और कोई आराधना नहीं सारी आराधना हों का फल है प्रभु से अपनापन हो जाना आपके तो रोम रोम में अपनापन कि मेरो कन्हैया मेरो लाला बस यही खास बात है मेरो बाबा सब आपसे बा यही हमारो सौभाग्य उदय हुआ कि आप सब ब्रजवासी अपना
मान लिए यही हमारा सौभाग्य उदय हु नद चरणों में धनवा बड़ी कृपा करी आए की कपा हो रही है हमारी ता बार बार हम तो चे ब कोई दिक्कत नहीं एक दुपट्टा ला एक माला ला सच्ची बात यह है कि इस वृंदावन में मीरा भाई मिलने को मना कर दिया तो उका क्या कियों से नहीं मिलते कहा तो यहां तो सब गोपिया ही गोपिया रहती है जी तो आप सब महापुरुषों की कृपा है उंगल पकड़ के ले जाते हैं सरकार तो ये आपकी कृपा है श्री जी की कृपा है कि आप हमको बुला लेते हैं
हम आ जाते हैं तो हमने कहा कि ये तो बड़े बड़े को जाने अनजाने में अपराध जाने में अपराध हो जाता है तो उनकी फकड़ करके आप क्षमा प्रार्थना करवा के श्री जी के दरबार में अपराध से बचा लेते और सबके बचाने का ठेका आपका हम सब को इस दरबार में कैसे रहना चाहिए य आप सबको अब वृंदावना आधी शवरी श्री स्वामिनी जी के विषय की जानकारी बिना रसियो के जो वनिता पुरुष भाव जाए सेव ललिता आद के भाय ऐसे रसियो के बिना कैसे कोई स्वामिनी जी को जा यत पादाम रु रेणु कणिका मुर्धन निधा
नहीं प्राप्य भावा शया यहां वेद रसिकन की वाणी श्री वृंदावन धाम इष्ट श्यामा महारानी प्रेम देवता मिले बिना सिधि होए न कारज भगवत सब सुख दान प्रगट व रसिका चार जब तक और वैसे भी ये अलक्ष राधाम निखिल निगम रप राम रसा बोधे सारम किम सुकुमार विजयते जिसे वेद भी नहीं जान सकते वो तो हरि है नहीं जान सकते भगवत रसिक जी ने कहा है कि चश्मा नित्य बिहार को दियो बिहारी न मोय जब तक बिहारी ज कृपा करके चश्मा न दे दृष्टि न दे तब तक उनको कैसे कोई पहचान सकता है रसगन मोहन मूर्ति
विचित्र केली महोत्सव लसित राधा चरण विलो रुचि सिकंडम हरिम वंदे जब स्वामिनी जो मुस्कुरा के देख ले वे पतित सख भ्रम चसन ब्रजराज सुनो यस कटाक्ष सरपा विम तस ताम राधिका परि चरा कदा रसेर स्वरूपा ज हो ठाकुर जी के अवतार का प्रयोजन राधा जी की आराधना के सिवाय दूसरा नहीं जी जी इलिए हमारे कुं जी ने बहुत प्रयोजन कहे हैं आपकी मीठी कथाओ के लिए हमें लगता है श्री जी की के लिए उस निकज में हम संसारी नीच जीवों का दुष्ट जीवों का अयोग्य जीवों का किंचित अधिकार नहीं है पर आप साधुदा दे कर
के पहली सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी से तीसरी स अंतिम सीढ़ी आपकी उंगली पकड़ के वहां प्रयोग करने की है चाहे नरसी का चरित्र देख लो और चाहे गोपेश्वर जी का चरित्र देख लो किसी का भी चरित्र देख लो किसी की सामर्थ्य स्वतंत्र नहीं आपने अपना जो कुछ कहा है सार सर्व सब कुछ कह दिया है सरकार इतना अमृत का धरना आपने छोड़ दिया खूब कृतार्थ कर दिया अधिक समय हम नहीं लेना चाहते बस इत कृपा हो बहुत है इतना अधिक समय लेना हमारी धता है ले ले आप हम पर कृपा करके जैसे पिता अपने पुत्र
पर कृपा करता है आप वात्सल्य करके आए और जैसे बालक तोतली बोली बोले तो माता-पिता को सुख होता है ऐसे आपको सुख हो रहा है हम तो आए दिन सुख लेते हैं एक वहां रास्ते में एक लड़का मिल गया लड़का मिल गया बाबा हम आपको भेज द ये कैसा विचित्र है उसकी बेश भूषा देख कर के हम घबरा गए पता नहीं कहा ले जाए क्या ले जाएगा और बड़े प्रेम से उठल कर के ले आ जहां पहुंचना तो पहुंच दिया हम कहा कि तुम कौन हो तो उसने कहा कि हम उनके सत्संग में जाते उनके
सत्संग में जाने का ऐसा प्रभाव है हमारा तो कोई परिचय नहीं कुछ नहीं अपरिचित तो कितने संतों की वो सेवा करता यह जो हदय के भावों का परिवर्तन हो रहा है इसके मुकाबले कोई दूसरी सेवा नहीं सरकार शने आपको इसीलिए भेजा है और हम सब जीव य सब आप जन यही जाते हैं कि कभी श्री जी का और श्री जीी के अनुत महापुरुषों का स्वप्न में भी अपराध ना हो किसी तरह से बस यही प्रार्थना है यही आपसे प्रार्थना चाते हैं और धाम में जो आप भाव प्रकट कर रहे हैं अगर यह भाव धाम का
ऐसे सेवन किया जाए वृंदावन ई वि दिवसे तज के सब अभिमान तते नीच आपको तो जाने सोई जान हमारे प्रियालाल के प्रेम रहस्य का वही ज्ञाता हो सकता है जो सर्व अभिमान त्याग कर वृंदावन में अपने को नीच वत रखे तो प्रियालाल के प्रेम रस को प्राप्त हो जाता है खूब सुखी है खूब आनंद में आप सब संतों का खा कर के अत्यंत अलाद है सुखी है सत्य कह रहा हूं धाम गलत नहीं कह रहा हूं आपकी इतनी कृपा वर्त रही है और क्या चाहिए जी श्री जी की कपा श्री जी की य तक आको
क कर रही है पियूष सोलंकी जी ग्वालियर से जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मन में ईट और गुरुजनों के लिए व अन्य लोगों के लिए कभी-कभी बुरे विचार आते हैं महाराज जी इसमें उसमें डरना नहीं चाहिए क्या है मन जिस समय रजोगुण और तमोगुण से युक्त होता है तो उसका संकल्प विकल्प गलत होने लगता है भोग संबंधी प्रमाद संबंधी निंदा करने के भाव दोष दर्शन के भाव तो हमको उस समय मन का साक्षी भाव रहना होगा मन में जो गलत भाव आ रहे हैं उन भावों का हम किचिन मात्र स्वीकृति ना दे तो
स्पित होते और नष्ट हो जाते अगर हम स्वीकृति दे देंगे तो अपराध बन जाएगा अब जैसे इष्ट के प्रति तुम क्या दोष दर्शन कर सकते हो जैसे कि ऐसे आ जाता क मानसिक अगर सेवा लेते हैं तो मन में भाव आ जाता है कि कहीं अगर श्री जी को गर्म दूध लगा रहे तो ऐसा जाता कि श्री जी की चुंडी जल गई या श्री जी का अंग इस पर ज्यादा गर्म हो गया तो उल्टे सीधे भाव से बनने लगते हैं अगर सही सेवा मान से करना चाहेंगे तो वो मन में वैसा नहीं आएगा अभी नाम
जब करो अभी सेवा की तरफ आंतरिक दृष्टि मत रखो क्योंकि जब तक सेव्य में तन्मयता ना हो तब तक तो अभी तो बच्चा हो ना तो अभी नाम जप पर ज्यादा ध्यान दो और श्रीमद् भागवत का अध्ययन करो श्रीमद् भागवत को सुनो भगवत गीता जी पढ़ो भगवत गीता जी को सुनो तभी भूमिका बनेगी प्रथम सुने भागवत भक्त मुख भगवत बाणी भगवत गीता जी और श्रीमद् भागवत य खूब सुने और नाम जप करें आठों पहर श्री जी के लिए ही चिंतन में बनने के लिए पहले हमारा पुरुष भाव तो छूटे हमारा देह भाव तो छूटे नहीं
तो हो सकता है दोष भाव आ जाए और अगर दोष भाव आ गया तो फिर मिटिया मेट हो जाएंगे नहीं हो जाएंगे हमारा भाव ही खराब हो गया तो सब बिगड़ जाएगा अब महारानी जू के प्रति उपासना में पहले महाराज जू से मिलो लाल जू से श्री श्री कृष्ण अनुराग उत्पन्न हो लाल रंगीलो गाइए ताते प्रीति रंगीली पाइए जब तक श्री कृष्ण कृपा ना करें तब तक लाडली जू तक पहुंच नहीं हो सकती तो हम श्री कृष्ण जस गाए वो श्रीमद् भागवत में श्री कृष्ण आज्ञा पालन करें वो श्रीमद् भगवत गीता जी में श्री कृष्ण
कृपा करें तब अपने हृदय के धन लाडली जू के चरणों में प्रेम दे श्री श्यामा जू के चरणन की बलिहारी जे है बसत किशोर लाल के प्राण मध्य सदा श्री श्यामा जू के चरणन की बलिहारी बिहर कुसुम पराग लगत जब पीत वसन ले झारत लुटत मयूर चंद्रिका तिन तर अद्भुत छवि निहारत जावक चित्र बनाई सवारत करम सफल तब मानत हित ध्रु ते सबन ते दुर्लभ रसिक मरम प जानत श्री श्यामा जू के चरणन की बलिहारी तो इसलिए डरो मत साक्षी भाव मन के अपराध लगता है अपराध तो बच्चा लगने की बात छोड़ो डरो मत गंदगी
तो आ रही है ना के लिए तो बना लेता हम जानते कि आप हम फिर उनको डांटते भी कि मेरे गुरु जी कितने प्यारे कितने अच्छे फिर भी उल्टा सीधा सुचवा आता है तो व साक्षी रहो गंदा मन है इसलिए गंदगी अपना फेंकता है नाम जप करो और इसके साक्षी रहो ये श्री जी के प्रति इष्ट के प्रति गुरु के प्रति ये गंदगी मन की स्फर आएं हैं इनको फेंकते रहो देखो अ जी सोचते थे कि गुरु जी से एक बार क्षमा मांगे त अपराध हो गया हो तो तुम डरो मत हम तुम्हारे साथ हैं
इसके इस मन के साथ तुम मत रहो हम तुम्हारे साथ है मन बड़ा बदमाश है इसको अगर अपना मा लोगे तो ये तुम्हें ही परेशान कर देगा कबहु का मन रंग तुरंग चढ़े कबहु मन सोच करे धन का कबहु मन नारी प्यारी लगे कबहु मन त्यागी चले बन का इसकी तरंगे है इनकी तरंगों को हमें साक्षी भाव से काटना है कभी यह बहुत भजन करेगा कभी य कभी निंद स्तुति में आएगा कभी भोगों में लगेगा कभी त्याग में लगेगा तो हमको साक्षी भाव से रहना हमें ज्यादा इस पर ध्यान नहीं देना है सर्वतो भावे आश्रय
ले लोगे तो यह दोष समाप्त हो जा हां ये भी बात है अहम का समर्पण हो गया तो सर्वतो भाव समर्पण और अहम रूपी दोष महल में सारे दोष रहते अभी बच्चे नाम जप पर समर्पण कैसे होता है पहले नाम जप करो और गीता और भागवत का स्वाध्याय करो और खूब श्रवण करो सत्संग जो हो रहा है अपने आप पहले मार्जन होने दो पात्रों का फिर इसमें रस आएगा पहले मार्जन होले बार कह दो आप मेरे हो मैं आपकी हूं हम यह नहीं कह सकते कि आप मेरे हो हम यह कह सकते कि हम सब
श्री जी के हैं अच्छी बात करते हो कितनी बड़ी बात कह दी कि हम तुम्हारे साथ हैं क्या चाहते हो आ इससे आगे कुछ नहीं होता हा महापुरुष आज तक जिन महापुरुषों ने जिनको संभाला है श्राप भी दिया उनका कल्याण कल्याण हो गया बिल्कुल खुली भाषा में इतनी उ इतनी उदारता पूतना दरबार से हम तुम्हारे साथ है ऐसा कहने वाले सरकार ऐसा कह रहे हैं सब संभालेंगे आप समर्पण हो जाओ समर्पण में कसर है हम आप सची बात क कसर अपनी होती है द की नहीं होती समर्पण की कसर अपनी है आपकी नहीं है आपका
तो दरबार ना उदार है कया हम तुम्हारे साथ है इससे आगे कोई शब्द नहीं होता हर समय ऐसा लगता है कि कहीं कोई सेवा अपराध हो मतलब घबराया घबराया सा रहता उसे थोड़ा तो घबराहट बनी रहनी चाहिए अगर थोड़ा डर बना रहेगा तो हमसे गलती नहीं होगी कि जैसे हम किसी संत के पास गए तो वैष्णव अराधना बन जाए संभल के बोले संभल के चेष्टा करें मंदिर गए तो कहीं भगवत अपराध ना बन जाए धाम आए तो कोई धाम अपराध ना बन जाए तो ये अगर हम थोड़ा डरते रहेंगे तो हमसे अपराध नहीं बनेंगे और
जब हम भूल कर देते हैं तो अपराध अगर किसी के जीवन में अपराध की कमी हो होती है उसका कारण होता समाज का भय या लोग क्या कहेंगे कानून का भय यार कहीं ऐसा ना हो जाए भगवान का भय गुरु का भय शास्त्र का भय यह भय जिसके जीवन में है तो वह निष्पाप हो सकता है अगर यह भय नहीं है तो फिर वह दुष्ट स्वभाव में परिवर्तित हो सकता है अब जैसे कानून का भय नहीं समाज का भय नहीं भगवान का भय नहीं तो पापा आचरण तो कर ही आएगा वो फिर और जिसको य
है कि यार भगवान कोई देखे ना देखे भगवान तो देख रहे एक गुरु के पास मंत्र लेने के लिए दो लोग गए उन्होंने कहा कि भाई तुम्हारी निष्ठा क्या इस बात की हम परीक्षा लेंगे तो दो तरबूज दिए और दोनों को कहा ऐसे स्थान में काट के लाओ जहां कोई देखता ना हो तो एक थोड़ी देर में आ गए उनका दूसरा भी आ जाए दूसरा शाम तक आया पर तरबूज लेकर आया तो एक से पूछा कि तरबूज तुम काटकर बहुत जल्दी आ गए थे तो कहा महाराज जी हम ऐसी एकांत जगह में गए जहां कोई
नहीं था किसी ने नहीं देखा हम काट कर ले आए तुम पूरा तरबूज लेकर आ गए हो शाम तक बोले महाराज जी मैं जहां भी गया तो वहां जब सोचता कि एकांत है तो लगता भगवान तो देख ही रहे ना तो मुझे ऐसा कोई स्थान नहीं मिला जहां भगवान ना देख रहे हो आपने कहा तो कोई ना देखता हो इसलिए मैं नहीं काट पाया तो जो काट के लाए थे उनसे कहा तरबूज खाओ निकल जाओ और जो नहीं काटे थे उनसे कहा तुमको दीक्षा देता हूं जो सर्वत्र भगवान को भगवान देख रहे हैं तो जिसे
भगवान का भय है या शास्त्र का भय है या कानून का भय है तभी वह अपराध से बचता है तो हमारे अंदर अगर थोड़ी घबराहट बनी रहे कहीं कोई पाप ना बन जाए कहीं कोई गलती तो हमें लगता है अच्छा है ये बुरा नहीं है पर इतनी घबराहट ना हो जाए कि हमें भजन से विमुख कर दे संत से विमुख कर दे धाम से विमुख कर दे इतनी नहीं होनी पर थोड़ा होना आवश्यक है यह घबराहट आपको उत्तम अवस्था में प्रदान करेगी यह घबराहट आपको पाप नहीं होने देगी अपराध नहीं होने देगी और जो भय
नहीं धारण करते उनसे फिर पाप बन जाता है डॉक्टर अभिषेक रंजन जी पटना बिहार से राधे राधे श्री हरिवंश आपके चरणों में कोटि कोटि नमन प्रभु जी मैं श्री जी की कृपा से एक चिकित्सक हूं महाराजी आए दिन गंभीर लाचार मरीज जिन्हें कैंसर पॉलिसिस किडनी डिसीज जैसे कभी ठीक ना होने वाले रोग हैं जिनमें मरीजों की हालत दिन प्रतिदिन खराब होती रहती है इलाज के दौरान उनको मानसिक शारीरिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है ऐसे में सिर्फ उनमें डर बल्कि पल-पल मौत का आगाज उन्हें कई बार ऐसे हालात दे देता है कि वह बहुत सारे डिप्रेशन
में चले जाते हैं जिससे वह या तो वक्त से पहले दवाई छोड़ देते हैं या नकारात्मक होकर अवसाद ग्रस्त को खाना पना बंद कर देते हैं महाराज जी ऐसे ही मरीजों में उम्मीद और आस तब जगाने की चेष्टा होती है जब आपकी पॉलिसिस किडनी बीमारी और इलाज डायलिसिस के अतरे दिन कष्ट और पीड़ा के बाद भी आप रोज ऐसी दिनचर्या में रहते हैं जो एक स्वस्थ मनुष्य भी नहीं कर पाते आपके उदाहरण देते हुए हम मरीजों को आध्यात्मिक शक्ति हेतु चेष्टा करते हैं गुरुदेव इस बाबत हम चिकित्सकों और मरीजों के कल्याण हेतु आप अपना मार्गदर्शन
और देखो हम स्पष्ट आपको बता दे अभी हम अपने को बीमार मान ले कितने कष्ट आप जो कह रहे परम सत्य है अगर भगवान में चित्त ना जुड़ा हो तो आदमी मृत्यु मांगे मृत्यु ऐसा कष्ट है वो हमसे पूछते आपको कष्ट हो रहा है तो कहते कष्ट को क्या कष्ट होगा कष्ट को क्या कष्ट होगा आप चित्त को प्रभु में लगाए तब बचते हैं ऐसे थोड़ी बचते हैं पर हम हर समय आनंदित रहते हैं आप देखो सुबह सत्संग हुआ श्री जी का वन बिहार मंगला स अभ एकांतिक चल रहा है अब ज बजे तक चले
फिर आरती में गए फिर जाकर थोड़ा प्रसाद पाया डायलिसिस करवाया उस समय भी हम आनंदित रहते हैं क्यों क्योंकि हम चित्त में प्रियालाल से जुड़े रहते हैं खास बात है तो आप डॉक्टर हैं आप मरीज हैं या आप स्वस्थ हैं या आप किसी भी कार्य में रत है जब तक अध्यात्म से नहीं जुड़ होगे तब तक आप द्वंद पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि व्यापार है बराबर मुनाफा ही थोड़ी मिलेगा कभी घाटा हो सकता है संबंध है बराबर अनुकूलता थोड़ी मिलेगी कभी प्रतिकूलता मिल सकती है कभी मनमुटाव हो सकता है तो उस स्थिति में
हम अपने को कैसे पावे वो अध्यात्म जब हम नाम जप करेंगे और जब हम सत्संग सुनेंगे और हम इस जीवन के रहस्य को समझे कि हम शरीर नहीं है आज हम बाबा जी है बचपन से भजन में लगे लेकिन जन्म के समय से यह रोग मिल गया यह जो पॉल शिष्ट है यह वंशानुगत है हमारी मां को था उसी से हमारे आया और हम उसी गर्भ में गए जहां पोल सिस्ट है क्योंकि होना है क्योंकि भोगला है 35 वर्ष की अवस्था तक तो हमें पता ही नहीं चला 35 वर्ष में ऐसा प्रकाशित हुआ था कि
लग रहा था गए गए मतलब ये तो ऐसा है डॉक्टर ने कहा दो ढाई साल बहुत बहुत तीन साल ऐसे 18 साल 19 साल हो गए लेकिन हमें भगवान की शरणागति मिलने के कारण हम किडनी के फेल वाले डिपार्टमेंट में है ही नहीं हम पास वाले डिपार्टमेंट में क्यों हम श्री जी से जुड़े हुए हैं भगवान से जुड़े हुए इतना भी भय नहीं है दो किडनी दोनों फेल है अगर चार पांच छह होती सब फेल हो होती तो भी भय नहीं होता मरने का भय नहीं है तो हम क्या प्रसन्न रहने के कारण हमें आज
तक अभी वो खून वाला सिस्टम वाला परेशानी नहीं है वो नहीं खून वो क्या होमोग्राफ किडनी मरीज का कम हो जाता है सात आठ ऐसे चलता है क्यों क्योंकि हम हर समय प्रसन्न रहते हैं अब दूध रबड़ी तो खा नहीं सकते आप तो खुद जानते हैं इसका तो खून बढ़ने का कारण क्या है हम प्रसन्न रहते हैं रात दिन प्रसन्न रहते हैं और हम इसको सोचने का टाइम नहीं देते कि हम बीमार हैं सोचने का टाइम नहीं देते नहीं जहां ग्रंथ पढ़ रहे हैं चिंतन कर रहे हैं नाम जप कर रहे हैं और दिनचर्या ऐसी
है कि हम रात्रि के 1 बजे जगते हैं और सच स्नान सब करके 2 बजे टहलने जाते हैं जो डेढ़ किलोमीटर 2 किलोमीटर टहलने के बाद फिर हम अपनी कुटिया में अ जो कुछ थोड़ा फिर अपना दिनचर्या ग्रंथा अवलोकन करके फिर सत्संग और ये दिनचर्या चलती रहेगी दिन में कभी सोते नहीं रात्रि में 7:00 और आठ के बीच में लेटते हैं 11 और 12 तक जो विश्राम हुआ हुआ नहीं जग कोई बीमार वाली चर्चा नहीं है बीमार आदमी ऐसे होता है हम रोग में नहीं है तो हम सब मरीजों से और डॉक्टरों से और सब
भाइयों से यही प्रार्थना करते कि अध्यात्म को समझे बिना तुम्हें सुख शांति नहीं मिल सकती रोग आ गया है शरीर में है अगर मन निरोग है तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा रोग नहीं है और मन रोगी है तो जितनी जेलें भरी मन रोगियों से ही भरी है जेले जो भरी है ना मन रोगियों के दिमाग के रोगी जो है ना हिंसा द्वेष व्य विचार पापा आचरण कर रहे हैं और मन स्वस्थ है शरीर अस्वस्थ है बहुत आनंद रहता कोई फर्क नहीं पड़ता यह छोटा-मोटा रोग नहीं आप खुद समझ रहे ये छोटा मोटा रोग नहीं है
और भगवान की शरण में संयम से पूरा जीवन रहा ब्रह्मचर्य का एक बहुत बड़ा प्रताप होता है तो एकदम हर नस नाड़ी में एक अव्यक्त तेज रहता है अव्यक्त उत्साह रहता है ओज रहता है कोई भी कार्य जैसे परिक्रमा चला जाए हां हां यह थोड़ी आगा हम किडनी फेलियर है पर हमारा उत्साह इतना जोर का रहता है कि किसी कार्य में नेगेटिव सोच है ही नहीं पॉजिटिव पॉजिटिव है तो हम आनंदित रहते हैं अब जैसे ये का ये तो फेल हो गया तो हम पॉजिटिव है भगवान कोई ना कोई रास्ता तो रखे होंगे ना अब
हम चिंतित नहीं हो गए अब क्या होगा हाय क्या वही होगा जो मंगल विधा आज तक हम देख रहे हर कार्य मंगल विधान का हो रहा है ये क्या है भगवान का प्रताप इसीलिए अगर भगवान से जुड़ जाए कोई भी तो परम मंगल हो जाए पर चित्त क्या है भगवान से जुड़ता नहीं अपना भरोसा रखता है अपनी कमाई का अपने मित्र का अपने लेकिन भगवान का भरोसा नहीं तो हम यह कहते कि अगर हमारा चित्त भगवान से जुड़ा है और हम भगवान का नाम जब कर रहे हैं और भरोसा भगवान का रखें तो बहुत आनंद
की प्राप्ति हो जाती पर अब क्या है कि जैसे आग लगने पर कुआं खोदना मूर्खता ही कही जाएगी अब जैसे आदमी परेशान स्थिति में आ गया अब उसको यह ज्ञान नहीं सु आएगा अब नहीं सु क्योंकि आग लग चुकी अब कुआ खोदने से मतलब तो यावत स्वस्थ मदम कलेवर यावत दूरे जरा भरथरी जी कह रहे हैं जब तक रोग दूर है और बुढ़ापा दूर है समस्या दूर है तब तक तुम अपने चित्त को भगवान में जोड़ लो तो तुम निकल जाओगे नहीं उस घटना परिस्थिति में ऐसा दम होता है कि तुम उसमें भगवान में चित्त
जोड़ ही नहीं सकते क्योंकि माया इतनी प्रबल है अब जैसे एक आदमी का परिवार लुट गया व्यापार हानि को प्राप्त हो गया अब उसे कहो भगवान में चित्त जोड़ो वो तो गाली देगा भगवान में अब जैसे बचपन से चित्त जुड़ा भगवान की कृपा पहले से और उसको पता हो चुका मेरा शरीर अब जाएगा अब उसको यह पता नहीं कि जितना बचा उससे मैं कमा लू भगवन नाम और अपना कल्याण कर लूं तो कल्याण से तो मतलब नहीं रह गया और शरीर स्वस्थ होगा नहीं और अब इतनी दम नहीं रह गई कि चित्त भगवान में जोड़
ले ये दुर्दशा जीव की है अगर वो जीव अब भी जोड़ ले तो जोड़ सकता है पर वो बीमारी में हमने देखा है मरीज मोबाइल में फिल्म देख रहे हैं और डायलिसिस हो रहा है उनको पता है कि कौन सा डायलिसिस अंतिम हो सकता है लेकिन अपने जीवन का मंगल नहीं सोच रहे सीरियल है गंदी बातें इधर-उधर देख कर के मोबाइल में यह दुर्दशा जीव की है कैसे अब वो समय काट रहा है चार घंटे फिल्म देख के और यहां समय आंख मुंदी अंदर चार घंटे नाम जप में तन्मय है महाराज डायलिसिस होगा हां चलो
ठीक हटाओ फिर अपने चिंतन कब डायलिसिस हुआ हमसे मतलब क्या अब वो फिल्म देख रहा है वो मोबाइल देख रहा है वो कैसे चैन से रहेगा चित्त भगवान में जुड़ा नहीं तो शरीर से जुड़ा शरीर मरने की बात है तो अब घबराहट है बड़ी अव्यवस्था हम मान बड़ी अव्यवस्था है पर उस अव्यवस्था में अगर अब भी भजन कर ले तो भगवत प्राप्ति हो जाए क्योंकि भय का अवसर तो है ही है कि कभी भी मृत्यु हो सकती पर है बहुत कठिन भाई है बहुत कठिन उस अवस्था जब स्वस्थ था तो भोगों में चित्त था अब
अस्वस्थ है तो शरीर नष्ट होने वाला इस बात की चिंता है धन की चिंता है कष्ट की चिंता है भगवान के चिंतन की तो गुंजाइश ही नहीं रह गई तो हम सब प्रार्थना करें कि उनका चित्त अगर प्रभु में जुड़ जाए तो समस्या का समाधान है अन्यथा कोई समस्या का समाधान नहीं यह बड़ा भयावह संसार है बड़ा भयावह संसार है भगवान के आश्रय तो बहुत आनंद है भगवान के आश्रय से ही आनंद है अन्यथा दूसरा कोई आनंद नहीं अच्छा चाहे जितना धन संपत्ति और स्वस्थ आपके पास हो मरोगे तो है ही एक दिन और साथ
कुछ जाना है नहीं तो अगर नाम जप नहीं है तो अंत एक बार एक सज्जन आए थे तो उन्होंने कहा कि प्रभु मेरे अंदर एक भय सता गया है कहा क्या बोले सब कुछ है है लेकिन अब हमें डर लग रहा है कि मरूंगा तो सब छूट जाएगा हमारा अब इस डर से मुझे कन बता है तो यह डर हटाले के लिए ही भजन है सब कुछ है लेकिन अब मरोगे अब जाना पड़ेगा अब छोड़ के जाना पड़ेगा पत्नी पुत्र परिवार क्योंकि वृद्धावस्था आ गई तो सूचना मिल गई कि अब जाना ही जाना है तो
घबरा रहे थे कि क्या उपाय हमका एक मात्र भजन अगर भजन किए होते आप कह रहे सब कुछ है पर भजन नहीं है तो आप घबरा रहे हो और कुछ ना हो और भजन हो तो हमारी तरह ताल ठोको ग कि जिस समय जो आवश्यकता होगी वो सब हो जाएगा भगवान सब करने वाला है पक्का समझो बहुत कृपालु है हम वो देख रहे हैं वो कौन सा रूप लेकर आता है कब कैसे काम बना जाता है बड़ा विचित्र खेल उसका है अब जीव को भरोसा नहीं भगवान का उसे अपना भरोसा है अपनी कमाई का भरोसा
अपने कर्मों का भरोसा है पर प्रभु का भरोसा नहीं तो अपने पास जो कुछ है वो बहुत थोड़ा है और माया नष्ट करने में सेकंड नहीं लगाएगी और जो भगवान से मिलेगा वो अमोघ मिलता है अमोघ मिलता है पक्का समझो लोक परलोक सबका मंगल करने वाले भगवान है इसलिए सबसे प्रार्थना नाम जप करो भगवान के आशित रहो और यह शरीर नष्ट होगा आज नहीं तो कल यह ध्यान में रखो तो जब यह नष्ट ही होगा तो पाप क्यों करो अच्छे कर्म कर लो यहां से जाना ही तो कमाई करके जाओ यार एक अरब आपके बैंक
में जमा है तो 25 पैसे लेकर जाओगे क्या यहां से आपका पूरा नाम रोशन है लेकिन जब मरोगे पाप कर्म किए यमदूत लेकर जाएंगे तो यहां का नाम य यमराज के यहां तुम्हारा बचाव कर लेगा क्या नहीं नाम जप किया भगवान का चिंतन किया भगवान का दूसरों की सेवा की दूसरों को सुख पहुंचाया यह आपको सुख पहुंचाएगा यह आपके साथ जाएगा तो इसलिए हमें लगता है थोड़ा उनको सत्संग सुनाया जाए नाम जप की प्रेरणा दी जाए और उनको ढाढस बंधाया जाए हां देखो उत्साह संपन्न हम आपको वो कैसे बताएं हर समय हमें ऐसे फूलन रहती
है एक आनंद रहता है मतलब कैसे तुम्हें बताया हां एक उत्साह रहता है इनी किडनी सब कोने में फसे हा जहां सुंदरता की सीमा भगवान श्री कृष्ण प्रियाज उनका नाम उनका रूप उनका हमें खुशी है मरने की कि शरीर छूटेगा तो अपने प्रभु से मिल जाएंगे अपने प्रभु के पास जाएंगे जन्म जन्म से जिससे बिछड़े रहे उससे मिलने का अवसर आया तो भला भय का विषय अपने जैसे विदेश से कोई अपने घर जाना हो तो उसको कहीं परेशानी आएगी क्या वो तो उत्साहित होगा कितनी जल्दी पहुंचो अपने घर वाले से मिल तो अनंत जन्मों से
अपने प्रभु से बिछड़े रहे आज हमारा मिलने का समय आ रहा है शरीर छूटेगा अपने श्यामा जू से मिलेंगे अपने प्रभु से मिलेंगे तो मरने का भी भय खत्म तो फिर चिंता क्या रह गई आनंद है आनंद इसलिए भगवान से जब तक चित्त नहीं जुड़ेगा तब लगी कुशल न जीव गोस्वामी तुलसीदास जी तब लग कुशल न जीव कह सपनेहु मन विश्राम जब लग भज न राम को शोक धाम तज काम जब तक भगवान का भजन नहीं करता तब तक शोक चिंता भय मृत्यु दुख इनसे नहीं बच सकता कुछ भी कमा ले कुछ भी कर ले
इसलिए भगवान का आश्रय व बस कुछ बातें ऐसी होती है जो कही नहीं जाती समझी जाती है प्रभु कितना प्यार करते हैं प्रभु कितना दुलार करते हैं जाने मोरी छाती जैसे मीरा जी कहती ना कि जाने मोरी छाती मेरे गिरधर वैद्य मुझे कितना सुख देते मेरे गिरधर कितना सुख ये मीला जी कहती ऐसे हम तुम्हें कैसे बताएं प्रभु कैसे सुख देते हैं यह किडनी फिटनी संसार के रोग य संसार के दुख यह संसार का शरीर य तनिक भी असर नहीं कर रहा जो भगवान की कृपा है ना वह ऐसे कवच में लिए हुए जैसे प्रहलाद
जी के हाथियों से कुछ लाया गया जहर पिलाया तो अपने मित्रों से कहते हैं मुझे इतना भी कष्ट क्योंकि मेरे हरी मुझे गोद में लिए और यह केवल प्रवचन से नहीं प्रवचन कर रहे हैं और शरीर स्वस्थ है सब खानपान बढ़िया वो एक अलग चीज है भारी कष्ट तो हम कह रहे कि इतना जब मिल रहा है तो आप भगवान से चित्त को जोड़िए आपको भी मिलेगा क्योंकि यह खजाना आपके अंदर भी है सबके अंदर भगवान बैठे आनंद लिए पर आपने भगवान से कभी अपनापन नहीं किया शरीर से किया शरीर के रिश्ते नातो दारो से
और यह जानने में दिखाई दे रहे पर ये है नहीं कोई अपने कोई अपना नहीं सच्ची मानिए सारे संबंध झूठे हैं तुम किसी के काम लायक हो इसलिए तुम्हे कोई प्यार कर रहा है और अगर काम लायक ना हो तो यहां आप देख लो कोई प्यार नहीं कर रहा भगवान से चित्त जोड़ ले फिर उसको असली चश्मा मिलता है कोई नहीं तो जब तक जीवन भगवान को समर्पित नहीं होता भगवान से नहीं जुड़ता भगवान का नाम जप नहीं होता तब तक आनंद नहीं कुछ भी कर ले और जब संकट में फंस गया तो चित्त भगवान
में जुड़ना कठिन है जैसे रोग आदि फिर चित्त हा फिर चित्त को घसीट कर प्रभु में लगाना बड़ा मुश्किल है इसलिए बड़े कृपा पात्र है जो स्वस्थ शरीर में भजन का अभ्यास कर लिए तो अस्वस्थता में फिर भजन करके निकल जाते हैं