कि आज का जो धर्षण है हमारा है उसको इंडिया की ऑफिशियल क्रॉस कहा जाता है कि ज्ञानी अधिकृत फिलॉस्फी अगर कोई है दुनिया के अंदर आप इंडियन फिलॉसफी यह बात करेंगे तो इंडियन फिलॉसफी का नाम सुनते एकदम उनके ध्यान में आ जाएगा वेदांत हैं और किसी दर्शन को भारत के जो स्कॉलर्स है यूनिवर्सिटी में बैठे हुए हैं उनको तो उनमें तो मान्यता मिली है क्योंकि वह तो साथ भी चढ़ाते हैं न्याय भी चढ़ाते हैं और भी चढ़ाते हैं तो वह सिर्फ हुई यूनिवर्सिटी हुए दें और जो इंडियन फिलासफी पढ़ाने वाले वहीं तक लिमिटेड है लेकिन
जितने भी दार्शनिक चिंतक हैं विचारक हैं उनमें जब आप रोशनी की बात करोगे इंडियन फिलॉसफी की तो एक ही चीज आएगी वो करेंगे वेदांत वेदांत दी हाईएस्ट फिलासफी आफ वर्ल्ड दुनिया में इससे ऊंची फिलॉस्फी कोई नहीं बने वेदांत ट्रॉफी का आधार ही ऐसा है जिसके बारे में डाक्टर राधा कृष्णन ने कहा है दूसरी फाइनल फिर ऑफ ह्यूमन थॉट ओं कि मानव के मस्तिष्क के चिंतन जहां तक जा सकती है कि मानव जहां तक सोच सकता है यह नहीं कुमार अभिनव जहां तक सोचा है बल्कि आगे भी संभव नहीं इससे आगे सोच तक है तो यह
आज इसको उनके लिए भी फाइनल फेज रॉ इवन थॉट है और वह फ्ल्फ्फी जो है वह वास्तव में ऐसी है कि दुनिया में आज तक उससे ऊंची अभी तक कोई रोशनी निकल करके नहीं आई थी कि अगर कोई निकली हुई है कहीं नहीं फ़लसफ़ी तब भी लोगों ने दिखाया है कि इसने वेदांत का यह लख्या गया है इसमें वेदांश यह चीज ली गई है यह वेदांत कोई इंंफ्लुएंट दिखाई दे रहा है क्योंकि जहां भी वेदांत होगा वहां किसी ना किसी रूप में अपनी छाप छोड़ेगा वेदांत जो है और आदमी के जीवन में तो अध्यात्म का
घर्षण आत्मा का दर्शन इससे ऊंचा निकल ही नहीं सकता वाकई अब यह हमें देखना है कि वेदांत है क्या है कि वेद जो है हमारे सारे ज्ञान के भंडार हैं आधार हैं दुनिया में उससे पुरानी कोई पिता बेच से पुरानी किताब मिलती भी नहीं अब जो यूनेस्को ने जो किताब प्रदर्शित की है द ओल्डेस्ट बुक ऑफ़ द वर्ल्ड वर्ल्ड नॉलेज की ओल्डेस्ट किताब और ऋग्वेद को रखा है उन्होंने अ है तो यूनेस्को ने भी इस बात को मान लिया है कि दुनिया के अगर ओल्डेस्ट कोई ऐसी किताब है तो वह रिक्वेस्ट है है तो यह
भी है कि हमारे सारे अवैध जो है उनके अंदर क्या है जब उसको देखने लगते हैं तो हम वेद को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देखते हैं है वेद का जो पहला हिस्सा है उसमें भिन्न-भिन्न जो प्राकृतिक शक्तियां हैं उन शक्तियों को देवता मानकर के देवता का मतलब यह जो देता है और लेता कुछ नहीं आपसे उसमें वेद ने उनको देवता मानकर के उनकी उपासना चाहिए इंद्र हमें वर्षा देता है समय पर तो इंद्र कोई आदमी नहीं है बल्कि एक शक्ति है प्रकृति के एक शक्ति है जो हमें वर्षा की शक्ति है यह हम उसको देव
मानते हैं सूर्य जो है सारी ईएस वितर्का का इतना विशद् वर्णन है हर जगह चरित्र के मंत्र मिलेंगे सूर्य के मंत्र भी लेंगे तो सूर्य हमारे सारा जीवन देता हुए दें तो हम उसको देवता मानने इस तरह से और जो हमारी प्राकृतिक शक्तियां भिन्न-भिन्न हमने उनको देवता के रूप में मानकर के उनकी उपासना की है इसलिए वेद का जो पहला भाग है वह मंत्र वह कहलाता है और उसको उपासना कांड कहते हैं है उसको संगीता भी कहते हैं ऋग्वेद संगीता इसका मतलब है ऋग्वेद का वह हिस्सा जिसमें देवताओं की उपासना लिखी हुई है तो उसको
संगीता भी कहते हैं उपासना कांड भी कहते हैं और मंत्र भी कहते हैं यह वेट का पहला हिस्सा है अब जब हम देवताओं की उपासना करते हैं तो अलग-अलग तरीके से कि उनकी उपासना होनी चाहिए कि कस्मै देवाय हविषा विधेम मां हम कौन से देव को अवधि अर्पण कर रहे हैं अपना जो कुछ वह हमें दे रहा है उसके बदले अहम किस तरह इसको कर रहे हैं तो उसके लिए अलग विधि हैं कि जब हम सूर्य को का मंत्र पढेंगे उपासना का तो सूर्य को जल देंगे इस सूर्य क्या करता है है कि वरिष्ठता हरिश्चंद्र
लोग सब आकर्षित लखै न कोय सूर्य के पास जल नहीं है कि एक बूंद भी पानी नहीं है है तो सूर्य क्या करता है कि हम जो कपड़े सुखाते हैं हमारी नदियां हैं इनमें से धीरे-धीरे हमें पता नहीं लगता हैं तो धीरे-धीरे वह पानी ले लेता है है और जब वह पानी ले लेता है धीरे-धीरे कि वह इकट्ठा हो जाता है बादल के रूप में तो वर्षद हर्षित लोसल हमारी जो सूखी धरती है प्यासी धरती है इसकी प्यास को बुझाने के लिए वह वर्षा बनकर को ही पानी हमें लौटा देता है जो हमसे लिया हुआ
पानी है वहीं सूर्य हमें लौटा देता है तो हम सूर्य को जल अर्पित करते हैं तो यह जले आप रिजर्व कर लोगे और प्रेसर्व करके जब हमें जरूरत पड़ेगी तो लौटा देंगे तो सूर्य की उपासना करने में हमने तरीका निकाल दिया किसी और देवता के लिए हमने को और तरीके निकाल दी तो तरह-तरह के हमने तरीके निकालिए यह कर्म कांड का भाग है वेदिका ब्राह्मण ग्रंथ सारे जो हैं वह कर्मकांड के ग्रहण थे यह वैद्य का वह भाग है जिसको हम कहते के सारे देवताओं का कर्म-कांड है है तो कर्मकांड का भाग है लेकिन वैद्य
के बाद में सबसे अंत में एक हिस्सा रहता है क्यों पूछता है कि यह ऐसा क्यों क्वेश्चन उठाता है है और इसका क्या लाभ यह जो क्वेश्चन है यह क्रॉस ही बना देती है तो वेद का जो प्लास्टिक लास्ट है वह अंतिम भाग वेदिका इसलिए हमने उसको कहा वेदांत और उस वेदांत को हम लगा उपनिषद यह वह गहरा ज्ञान है उपमा ने नीचे निषद नीचे बैठना निकट बैठना निकट गुरु के चरणों के निकट बैठ करके जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह गहरा अध्यात्म ज्ञान है आत्मा का ज्ञान है इस ब्रह्मांड का ज्ञान है वह
ब्रह्म ज्ञान है तो 1992 में ब्रह्म ज्ञान है ब्रह्म क्या है और ब्रह्म का स्वरूप क्या है और हमारी आत्मा का स्वरूप है हमारा आत्मा का भ्रम से क्या संबंध है यह जो गहरे सारे प्रश्न है यह बहुत गहराई से का वर्णन किए गए हैं सारे उपनिषदों में बहुत उपनिषद हैं 218 के करीब उपनिषद हैं लेकिन उपनिषद 11 माने जाते हैं बाद के जो उत्तर दौड़ते उपनिषद है वह उन्हें मुस्लिमों को जोड़-तोड़ के चार मंत्री इधर से लिए दो इधर से लिए 80 के लिए ऐसे बहुत ऑपरेशन बन गए हैं तो 11 उपनिषद को हम
ऊपर स्थित मानते हैं कि यह व हैं जो वेदों के अंदर मूल रूप से मौजूद हैं है उसमें ही है इशावस्यम उपनिषद उसको इस उपनिषद कहते हैं तो शिष्य कट है कि इन प्रश्न मुंडक मांडूक्य ऐतरेय छांदोग्य कि बाजार अन्य और श्वेताश्वतर उपनिषद 111 उपनिषद को हम मूल मानते हैं इसलिए मूल मानते हैं कि शंकराचार्य ने इन 11 पर ही अपना सारा केंद्रित किया दर्शन तो इससे सिद्ध होता है कि शंकर के जमाने तक केवल यह 11 उपनिषद थे बाद में जोड़तोड़ करके लोगों ने और बना लिए सारे तो मूत्र रोग विशेषज्ञ ही माने जाते
हैं वह मूलरूप हैं तो यह वह वेद का वह भाग है अवैध के दो मानिए एक तो वेट किताब है यह हमारी संगीत आएं इस संगीता की व्याख्या करने के लिए जो इसका अंतिम भाग है जहां यकीन दूसरा और सर्वे जो है विद धातु से बना है संस्कृत के विद् का मतलब होता है जानना है का ज्ञान का ज्ञान की पराकाष्ठा जहां ज्ञान अंत हो जाता है कि इससे आगे कोई सोच भी नहीं सकता आ है तो वे किसी किताब का नहीं बल्कि हम करेंगे ज्ञान का डांस है वह वेदांत है कि यह अंतिम अच्छे
से ऊंचा कोई सोचेंगे तो वेदांत का मतलब यह है दोनों विशेष के वेद का निचोड़ जो उपनिषदों में दिया हुआ है सारे वेदों का निचोड़ निकाल करके अपनी तत्व रख दिया है उपनिषदीय ऐसा ज्ञान है जो गुरु अपने शिष्य को उसको देता था जो श्रद्धा के साथ गुरु के बिल्कुल निकट उनके चरणों में जाकर बैठता था तो वेद का भी निचोड़ निकालकर के उपनिषद में दे दिया और दूसरे अर्थ में भी ज्ञान है वित्त व धातु से ज्ञान का अंतिम श्राद्ध जो सकता है इससे ऊंचा कोई ज्ञान नहीं हो सकता वह वेदांत के नाम से
मशहूर है कि यह वेदांत जो है यह भारतीय संस्कृत चीनी दुनिया की संस्कृति की सबसे ऊंची देन है इससे ऊंची देने व उपनिषदों से ऊंचा दर्शन नहीं हो सकता कि शोपेनहावर राम के बहुत बड़े दर्शन दार्शनिक हुए हैं फ्रांस के और उनका के बीच सीधी 16 सफाई लाइव एंड 16 अपॉइंटमेंट उपनिषद का ब्रह्म ज्ञान जो है वह जीवन में भी शांति देने वाला है और शांति के साथ आदमी को पर लोग पहुंचाने वाला है आज तो इन मुद्दों को लेकर की जो दर्शन देखा गया वह वेदांत है को अवैध मानते हुए दो मैंने कौन-कौन से
ऐसे आचार्य हुए है जो वेदांतिक हैं हमारे पास दो बड़े आदमी है शंकर और रामायण शंकर को कितने लोगों ने प्रभाव डाल करके सारा उपनिषद का ज्ञान प्रभाव डाला शंकर एक ऐसे आदमी जो 932 साल की आई हूं मैं सारे उपनिषदों का ज्ञान प्राप्त किया और उसके बाद उन्होंने चतुर सूत्री नाम की किताब लिखी ब्रह्म सूत्र व भाष्य लिखा गीता पर भाष्यों अधिक खर्च तो 32 साल की आयु में तो उसके बाद उन्हें दूसरे ग्रंथ भी लिखे जो छोटे मोटे मामलों के लिए थे जैसे सौंदर्य लहरी लिखा उन्होंने और बहुत अच्छा ग्रहण थे तंत्र का
ग्रंथ माना जाता है बहुत सारे लोग तो उसे उबलने का ग्रंथ मानते हैं लेकिन और सारी जनता के लिखा था तो शंकर ने बहुत ग्रंथ लिखे और 32 साल की आयु में उनकी मृत्यु हो गई तो इसलिए दुनिया का भी सबसे बड़ा इंजीनियर शंकर को माना जाता है संघर्ष जितना जीनियस कोई दुनिया में नहीं हो सकता जो 32 साल की आयु में इतने बच्चे किताब अंकित है कि अब शंकर को जो प्रेरणा मिली है कहां से मिली है वैसे तो उनकी जीवन का बड़ा लंबा चौड़ा व है लेकिन शंकर को जो प्रेरणा मिली थे उनकी
मां ने जब उन्होंने संन्यास लिया तो उनकी मां ने कहा था कि मैं क्या करूं तू आकर सैनिकों का सारा को लंबा चौड़ा किस्सा है लेकिन उनकी मां ने का घर जा रहा है तो किससे लेगा है ज्ञान तो उन्होंने कहा कि आज के युग में ज्ञान देने वाले आदमी जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वह ऐड पाद गौड़पादाचार्य के जाना और गौड़पादाचार्य जो है वह ज्ञान देकर के आगे बढ़ा देंगे तो वहीं से प्रेरणा लेकर के शंकर चले है और डिब्रूगढ़ पास जी के आश्रम में पहुंचे तो उन्होंने उस किताब रख दी उनके सामने के
सारा निचोड़ जितना भी दर्शन है उसका यह है उसका नाम तो ब्रह्म सूत्र शंकर का सारा घर्षण ब्रह्मसूत्र के ऊपर भ्रष्ट है थे कमेंट्री ऑन ब्रह्म सूत्र है तो ब्रह्मसूत्र की रचना वाले जो थे वह बादरायण विकसित है अ है जिनको आम आदमी वेदव्यास के नाम से जानता है कि आम आदमी बादरायण के नाम से नहीं जानता उनको वेदव्यास के नाम से जानता है क्योंकि उन्होंने सारे वेदों का निचोड़ निकाल करके और ब्रह्मसूत्र की रचना कर दी ब्रह्मसूत्र का मतलब ब्रह्म ज्ञान है है तो ब्रह्मसूत्र की रचना करके उन नर बाघ शेर गौड़पाद को दे
दिया हैं सबसे पहला वेदांत का जो छात्र है वह गौड़पाद ऋषि ने लिखा लेकिन गौड़पाद ऋषि के पास सेंटर दैट नहीं रह सके गोट पास चले गए तपस्या करने के लिए और गोविंदाचार्य जो गौड़पाद के शिष्य थे उनके पास शंकराचार्य को छोड़ गए कहते हैं इसको ब्रह्म ज्ञान दो यह इस पर वह शैली का या और इसका भाषा दुनिया में मेरा आशीर्वाद है दुनिया में प्रचलित होगा वेदांत जाएगा दुनिया के ऊपर तो गोविंदाचार्य के आश्रम में शंकर ने वेदांत की शिक्षा ली शादी की तारीख कि अब उस समय के हालात क्या थे उस समय इस
साइकिल वेद जैन वेद नाम का और भारतीय संस्कृति मैसेज वैदिक धर्म का बिल्कुल लेश मात्र भी नहीं रहता था है सारे हिंदुस्तान के अंदर बोद्ध धर्म फैल गया था है और बोद्ध धर्म का इतना प्रचार हो गया था कि कोई बहुत भिक्षु अगर कहीं से निकल जाता था और किसी बहुत व्यक्तियों की किसी के ऊपर परछाई पड़ जाती थी तो उसके मुंह से अपने आप निकल पड़ता था बुद्धम शरणम गच्छामि बुद्धं शरणं इसलिए कोई घर से निकलता ही था ब्राह्मण लोगों ने घर में से निकलना बंद कर दिया था कि अगर कोई बोध भिक्षु जा
रहा होगा और उसकी परछाई भी पड़ गई हमारे ऊपर तो 9th बहुत बन जाएंगे हमारे मुझे अपने आपकी निकलने लगा है अब तो ऐसी हालत में उन्होंने कहा क्यों क्या तुझे पर यह प्रतिज्ञा करके आए हो कि मैंने वैदिक धर्म की दोबारा स्थापना करनी है है और वैदिक धर्म को ही मैंने सबसे सबसे बड़ा धर्म है उसको हिंदुस्तान में दोबारा लाना है तो तुम एक काम करो एक आदमी है जिसने बहुत देश की नाक में नकेल डाली है तो उसके पास चले जाओ है उसका नाम है कुमारिल भट्ट कि मीमांसक है वह है और वह
कि बौद्धों का बड़ा मन कर रहा है कि शुक्राचार्य ने उसका अ का पता पूछा उनसे अपने गुरु से उन्होंने बता दिया कि कुमार कुमारिल भट्ट वह मिलेगा तो है लेकिन दौड़ भाग गए कि जब शंकर मां कुमारिल भट्ट के पास पहुंचे तो कुमारिल भट्ट ने अपने शरीर के ऊपर में तेल का मर्दन करके खूब सारा तेल लगा करके और जो चावल की भूसी होती है चावल के ऊपर से छिलका निकलता है वह छिलका सारे शरीर में चिपकाया हुआ था और वह चिता बनाई हुई थी Store में कूदने वाले थे मैं पहले शंकराचार्य जी वहां
पहुंचे और उनको नमस्कार किया तो उनका के महत्व व संसार को त्याग करके जा रहा हूं तो उनका क्या आप संसार को त्याग कर जा रहे हैं आज तो बहुत जरूर है बुद्ध धर्म को निराकरण करके फिर से वैदिक धर्म को लाना है हमें बुधन आंखें वेद को नहीं मानते और बहुत दार्थ बहुत जो लॉजिक है वह भी हमारी न्याय की लॉजिक को उन्होंने बिल्कुल खंडन कर दिया है तो अब बहुत दिनों से कौन जीतेगा कैसे जीतेंगे हम तो इसलिए आपको तो जीना चाहिए उन्होंने कहा मैंने एक क्या काम किया था कि मैं थोड़े दिनों
के लिए बहुत बन गया और मैंने बहुत दो कि इनकी जो पार्ट शहर है थी इनके जो आश्रम थे इनके जो बड़े-बड़े केंद्र से वहां जाकर के इनकी बौद्ध धर्म की शिक्षा ली और खासतौर से बुद्धि प्रोजेक्ट इनका जो तर्कशास्त्र है उस तर्कशास्त्र से जिन्होंने न्याय का न्याय के रोज इसको खंडन किया है वह सारा इनका तर्क शक्ति का है और उस पर सांस को सीखने के बाद जब मैं इस बात के लिए खड़ा हुआ कि इसी तरह शहर की धज्जिया उड़ाने है बौद्धों की तो कहते हैं इनके जो बोध भिक्षु तेल बहुत बड़े वह
कहने लगे कि तुमने तो बड़ा पाप किया है कि जिस गुरु से तुमने ज्ञान लिया है और उसी गुरु का तुम खंडन करने जा रहे हो तो अति अब गुरु अपमान था गुरु का अपमान करना जिसे विद्या प्राप्त किया उस उससे बड़ा महापाप दुनिया में नहीं हो सकता मैं तो इतना महक इतना बड़ा महापाप किया है अपने के जिस गुरु से ज्ञान लिया है आज उसी गुरु का खंडन करने के लिए जा रहे हो आप तो कहते मुझे यह हो गया कि यह तो हमारी बेल्ट वह भी है कि गुरु का अपमान करना सबसे बड़ा
पाप है तो इसलिए मैंने इस शरीर से गुरु का अपमान किया है बहुत देश का अपमान किया है शरीर को मैं धारण करने योग्य नहीं हो इसलिए मैं तो अब में शरीर त्याग रहा हूं लेकिन मैं तुम्हारे एक आदमी बताता हूं है जिसने मुझसे सारा शास्त्र के अवतार लेकर के अवरोधों का खंडन किया है तो उसके पास चले जाओ गहरे बताओ तो यह कुमारी व थे उन्होंने बताया कि मैंने तो इसलिए बहुत धर्म स्वीकार किया था खाओ मैं बहुत लोगों के पास क्यों गया कहते हैं मैं एक दिन निकला हुआ जा रहा था तो मैंने
देखा के लिए आवाज लगाई भिक्षाम देहि तो एक महिला जो ठीक रतन वह ऊपर खड़ी हुई थी उसने कहा कि बाबा पर्ल फैला दें मैं यहां से जो कुछ भी होगा और नाराज वगैरह फेंक दूंगा तो उसमें काम ऐसी भिक्षा नहीं लेते तो नीचे आकर देखा कि दरवाजे पर खड़े होकर उस अगर मैं नीचे आ गई और को इधर से बहुत भिक्षु निकला तो मेरा तो वैदिक धर्म समाप्त हो जाएगा मैं अभी कहने लगी तो कह नहीं रुकेंगे मेरे धर्म की रक्षा कौन करेगा ऐ हां बाबा मैं भिक्षा देने तो आ जाऊंगी लेकिन मेरे धर्म
की रक्षा कौन करेगा अगर बोधिधर्म ने बन गई तो तो कहते मैंने उससे वादा किया कि तू मुझे बिछा देर में बुद्धों का नाश करूंगा आ और बौद्धों के बुद्ध नाश करने के बाद तेरे धर्म की बहुत वेदिक धर्म की तो कहते मैंने बौद्धों का नाश करने के लिए वहां से मुझे प्रेरणा मिली और मैं फिर बहुत दूंगी पाठशाला में गया वहां से मैंने बहुत दिनों का ज्ञान अंदर का सारा डिविलियर्स और फिर बहुत देखो मैंने तो कहते मुझसे गलती हो गई कि मैं बहुत दम से ज्ञान से खा और बहुत दुख ही उन्हें गुरु
का अपमान करना शुरू कर दिया है तो कहने के शंकराचार्य फिर मुझे बताओ मैं तो आपके पास कैसे आपने तो उन्होंने कहा कि मंडन मिश्र है मेरा शिष्य उसके पास तुम चले जाओ वह भी मीमांसक है है और विमान तथा वार्ड ज्ञान की ऊंची ज्ञान और कर्म कांड दोनों को मीमांसक मानते हैं तो वैदिक कर्मकांड को जो आप संरक्षण कर रहे हैं वह भी मीमांसक हैं और वेद ज्ञान को ले करके जो वैदिक तर्कशास्त्र लेकर के बौद्धों का खनन कर रहे हैं वह भी मीमांसक हैं तो मंडन मिश्र के पास चले जाओ तो यह जब
गए वहां पर तो वहां कुएं पर और से पानी भर रही थी उन्हें विकास के जिस घर की ओर से हिंदुस्तान में सब लोग पानी बोलने लगे हैं क्योंकि लोकभाषा पाली है तो वहां कोई संस्कृत बोलते ही नहीं है तो कैसे जब स्त्रियां पानी भरने के लिए आए तो जो स्त्रियां संस्कृत में बोर्ड लगे होने के पीछे पीछे चली जाना वह मंडन मिश्र के घर ले जाएंगे तो यह गए वह कुएं पर इन्होंने पानी का यह औरत की वह जो पानी पिलाने लगी तो उन्होंने कहा कि मंडल में सिरका कि संस्कृत में पूछा कि मंडल
में सुखा कर क्या है कहां है तो और साथ ही उसने कहा कि कहां से आया बाबा तू इन्हें लगा के मैं गोविंदाचार्य के आश्रम लाया हूं कुमारिल भट्ट ने मुझे यहां भेजा है तो भट्ट हिमांशु को सबसे ऊंची मीमांसा है गुरु नोट कहलाती है वह गुरु का महत्व है कुमारिल भट्ट का तो करेंगे अच्छा गुरूजी ने भेजा है कुमारिल भट्ट ने आपको भेजा है वह तो गुरु मत हमारा तो करेंगे करूंगा उन्होंने तो अपने आप को दान कर लिया है और मुझे यह भेजा है तो वह करने लगी कि का पैसा करो तुम यहां
चले जाओ दरवाजे पर एक तरफ तो होता होगा और एक तरह नैना होगी और वह शास्त्रार्थ कर रहे होंगे तो तक कह रहा होगा सुथार परमाणुवाद मे ना कह होगी पड़ता परमाणुवाद तो तय है और मैंने जो है वह मानसिक है उनमें शरण चल है तो जहां यह सात देखो वही वर्णन मिश्र का मकान है इस देश के अंदर आज संस्कृत बोलने वाला कोई नहीं रहा है और मंडन मिश्र के घर में तो स्त्रियां तो क्या वहां तोता और मैना भी संस्कृत बोलते हैं तो कहते हैं अगर तुम नजर संस्कृत भाषा को बचाना है और
संस्कृत भाषा मर गई तो वेद को कौन पढ़ेगा तो वेद ज्ञान को अगर बचाना है और वैदिक धर्म की द्वारा स्थापना करनी है तो मंडन मिश्र के घर चले जाओ तो करिए मंडन मिश्र के चले घर चले गए और वह मंडल में अश्लील डांस करने लगे उसकी जो पत्नी ठीक बहुत ही बड़ी विभूति उसको इन्हें जज बना लिया कि तुम जज हो और वह जो थी अब जब बातचीत करने लगी तो बाद में मंडन मिश्र ने अपने आप को सरेंडर कर दिया और सरेंडर करने के बाद क्या हुआ कि सुरेश्वराचार्य के नाम से शंकराचार्य ने
कहा कि तुम मेरी गद्दी पर बैठाओगे जो Maggi पहली कर दी स्थापित करूंगा पहला अ है तो सुरेश्वराचार्य को भी एक साथी मिल गया इनको और उसको लेकर के इन्होंने वैदिक धर्म का प्रचार करना शुरू किया था कि शंकराचार्य ने और शंकराचार्य प्रचार शुरू किया तो उन्होंने वही काम लिया उन्होंने कहा कि जो ब्रह्म सूत्र तरह जो बादरायण विशेष लिखा है जो गौड़ पाचक उन्होंने दिया गौड़पाद ढ उस ब्रह्म सूत्र पर भी अगर कोई हमने भाषण दिया और ब्रह्म सूत्र और हमने सारे संचार केंद्र फैला दिया तो वैदिक धर्म अटल हो जाएगा अमर हो जाएगा
इससे ऊंचा ज्ञान दुनिया में कोई नहीं है और बुद्ध धर्म का का नाश हो जाएगा बिल्कुल है है तो वेदांत शंकराचार्य का जो है वह वास्तव में ब्रह्मसूत्र पर भाष्य है शंकराचार्य ने जो सारा वेदांत का दर्शन लिखा हुआ था मैं ऋषि वादरायण जिनको वेद व्यास कहते हैं उन्होंने उस सारे विष्णु 1992 में जितना भी और ऐसी चीजें हैं जहां आपस में कंट्राडिक्शन था या कोई ऐसी शंका आ जाती थी जिसके कारण है होता कि एक उपनिषद में यह बात कही गई है दूसरे में इस लिए बहुत ही करते थे कि तुम्हारे 19th मे तो
अपने ऑफिस अपनी बातों का खंडन किया हुआ है इनमें तो यहां कंट्राडिक्शन रॉ अगर यह आगे तो उस सारी कंट्राडिक्शन को रिमूव करके सारी कंट्राडिक्शन को दूर करके जहां-जहां विरोधा भास आ गए थे उन सब विरुद्ध हाथों को दूर करके उन्होंने ब्रह्म ज्ञान का सबसे बड़ा ग्रंथ लिख दिया यह ब्रह्मसूत्र के नाम से है तो ब्रह्मसूत्र उनका दिया हुआ है वेदव्यास जी का उन्होंने गौड़पाद को दिया और गोल पाचक आगे इस पर जो भाषा लिख देगा है तो वे धर्म की वैदिक धर्म की दोबारा स्थापना कर देगा क्योंकि इसके मुकाबले में फिर दोनों का ज्ञान
बिल्कुल बहुत धोखा नहीं और भी लोग हैं उनका ज्ञान भी बिल्कुल ठीक है पड़ जाएगा तो शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र ले लिया और ब्रह्म पर पर अपना भाषण लिखना शुरू किया कि शंकर का जो भाषा ब्रह्मसूत्र पर वह सबसे ऊंचा भाग माना जाता है अ कि अ कर दो