भारत के हर घर में हर फर्स्ट ऐड बॉक्स में हर स्कूल, हॉस्पिटल और क्लीनिक में एक बोतल जरूर होती है डेटोल। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कैसे डेटोल सिर्फ एक एंटीसेप्टिक नहीं बल्कि एक आदत बन चुका है? असल में इस छोटी सी बोतल के पीछे छुपी है एक कमाल की कहानी। एक ऐसी कहानी जिसने लाखों लोगों की जान बचाई। जो दुनिया की सबसे बड़ी जंग वर्ल्ड वॉर में सैनिकों का सबसे भरोसेमंद साथी बना। और सबसे इंटरेस्टिंग बात जिस कंपनी ने इसे बनाया उसकी शुरुआत एक गरीब आदमी ने की थी जो पहले आटे की चक्की
चलाता था। तो चलिए शुरू करते हैं 100 साल से भी ज्यादा पुरानी भरोसे की कहानी यानी डेटोल की [संगीत] कहानी। तो दोस्तों स्टोरी स्टार्ट होती है साल 1840 से जब इंग्लैंड के एक छोटे से शहर में आइजैक रैकेट ने बड़ी उम्मीदों के साथ एक फ्लोर मिल यानी आटा चक्की की शुरुआत की। लेकिन काफी कोशिशों के बावजूद मुनाफा ना के बराबर था और हालात दिन-ब दिन मुश्किल होते जा रहे थे। पर फिर भी आइजैक ने हार नहीं मानी और वह लगातार मेहनत करते रहे। उसी दौरान उन्हें रियलाइज हुआ कि ज्यादातर लोगों के बीच हजीन और साफ
सफाई को लेकर कोई अवेयरनेस नहीं है। ऐसे में उन्होंने सोचा कि क्यों ना कुछ ऐसा बनाया जाए जिससे साफ सफाई भी आसान हो जाए और लोगों को इसकीेंस भी पता चले। इसी विज़न के साथ उन्होंने रैकेट एंड सनंस नाम की एक कंपनी बनाई। जहां वह स्टार्च, नील और घर में यूज होने वाले कई तरह के क्लीनर्स बनाने लगे। इन प्रोडक्ट्स की क्वालिटी इतनी कमाल की थी कि जल्द ही इसने लोगों के घरों में जगह बनाना शुरू कर दिया। 1880 तक इंग्लैंड में रैकेट का नाम हर घर तक पहुंच चुका था। लोग इन प्रोडक्ट्स को सिर्फ
साफ सफाई का सामान नहीं बल्कि अपने घर की सेहत का हिस्सा मानने लगे थे। सब कुछ सही चल रहा था। कंपनी भी ग्रो कर रही थी। लेकिन असली गेम चेंजर आया 1929 में जब एक साइंटिस्ट डॉक्टर विलियम रेनाल्ड्स ने रैकेट कंपनी को ज्वाइन किया। असल में उस समय मेडिकल दुनिया की सोच कुछ और ही थी। लोग मानते थे कि बीमारियां सिर्फ शरीर के अंदर की गड़बड़ियों से होती है। जैसे कि डाइजेशन या फिर इंटरनल वीकनेस। इसीलिए ज्यादातर डॉक्टर्स बीमारियों को ट्रीट करने में लगे रहते थे ना कि प्रिवेंट करने में। लेकिन डॉक्टर रेना्स का मानना
बिल्कुल अलग था। वह कहते थे कि बीमारियां बाहरी इंफेक्शन से भी आती हैं। और उस टाइम एक बहुत ही खतरनाक इनफेक्शन था प्यूरेपेरल सेप्सिस जो कि बच्चों को जन्म देने के बाद महिलाओं को होता था। यह इंफेक्शन इतना खतरनाक था कि 1930ज में इससे हर साल लाखों महिलाओं की मौत हो रही थी। अब मार्केट में फिनाइल, मर्यूरिक क्लोराइड और फार्मलिन जैसे कीटाणु नाशक अवेलेबल थे। लेकिन उनके साथ कई तरह की प्रॉब्लम्स भी थी। जैसे कि उनकी स्मेल बहुत तेज होती थी जिससे मरीजों को चक्कर आने लगते थे। स्किन पर जलन और इनफैक्ट कुछ केसेस में
तो बर्न तक हो जाते थे। और सबसे बड़ा खतरा पता है यह कंपाउंड ह्यूमन टिश्यूस के लिए भी सेफ नहीं थे। और कुछ में तो कैंसर कॉजिंग एलिमेंट्स भी पाए गए थे। अब ऐसे में डॉक्टर रेना्स ने एक मिशन शुरू किया कि एक ऐसा कीटाणु नाशक बनाना है जो पावरफुल भी हो और सेफ भी। मतलब बैक्टीरिया को भी मारे, इंसानी स्किन पर इरिटेशन ना करें। हॉस्पिटल्स में रोज यूज किया जा सके और सबसे इंपॉर्टेंट चाइल्ड बर्थ के बाद होने वाले इनफेक्शंस को भी रोकने में मदद करें। रेना्स ने अपनी रिसर्च एकदम बेसिक से स्टार्ट की।
हर केमिकल कंपाउंड को अलग-अलग तरीके से टेस्ट किया। फार्मूलाज़ को बार-बार बदला और दिनरा एक्सपेरिमेंट करते रहे। और फिर कई महीनों की मेहनत और सैकड़ों एक्सपेरिमेंट्स के बाद आखिरकार उन्होंने वो एंटीसेप्टिक लिक्विड बना ही लिया जो कि ऊपर डिस्कस किए गए सभी प्रॉब्लम्स का स्यूशन लेकर आया। और फिर रैकेट ने इसी पावरफुल फार्मूला को ही नाम दिया डेटोल। अब प्रोडक्ट तो तैयार था लेकिन रियल वर्ल्ड टेस्टिंग बाकी थी। डॉक्टर रेना्स और रैकेट की टीम ने सोचा कि टेस्ट वहीं करेंगे जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। यानी कि मैटरनिटी व जहां प्यूरीपेरल सेप्सिस सबसे कॉमन था।
और फिर 1933 में लंदन के क्वीन चार्लोट मैटरनिटी हॉस्पिटल में शुरू हुआ डेटोल का पहला ट्रायल। और दोस्तों, आपको बताते चलें कि यह हॉस्पिटल उस टाइम पर चाइल्ड बर्थ केयर के लिए काफी फेमस था। यहां के डॉक्टर्स और नर्सेज को क्लियर इंस्ट्रक्शंस दिए गए कि डेटोल का यूज डिलीवरी के पहले और बाद में हाथ धोने के लिए, इंस्ट्रूमेंट्स को सैनिटाइज करने के लिए और वार्ड की साफ सफाई में किया जाएगा। और दोस्तों, इन स्टेप्स को लेने के बाद से जो हुआ, वो किसी मेडिकल मिरेकल से कम नहीं था। सिर्फ 2 सालों के अंदर ही प्यूरेपेरल
सेप््सिस के केसेस में 50% से भी ज्यादा की गिरावट आ गई। डॉक्टर्स ने तो खुले शब्दों में कहा कि डेटोल इज अ गेम चेंजर। अब शुरुआत में डेटोल सिर्फ फार्मेसीज में ही मिलता था। मतलब बिना डॉक्टर के प्रिस्रिप्शन के इसे कोई नहीं खरीद सकता था। लेकिन जब यह साइंटिफिकली प्रूव हो गया कि डेटोल ना सिर्फ इफेक्टिव है बल्कि सेफ भी है तो फिर रैकेट ने एक बड़ा डिसीजन लिया और डेटोल को आम लोगों के लिए भी ओपन कर दिया गया। जिससे कि यह मेडिकल, सुपर मार्केट्स और जनरल स्टोर्स पर भी मिलने लगा और फिर 1930
से 1940 के बीच यह बोतल ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, साउथ अफ्रीका, कनाडा और साउथ अमेरिका जैसे देशों में भी यूज किया जाने लगा। इसी बीच 1936 में डेटोल इंडिया भी पहुंचा था। लेकिन यहां का सफर आसान बिल्कुल भी नहीं था। क्योंकि उस दौर में यहां हजीन को लेकर अवेयरनेस ऑलमोस्ट जीरो थी। और लोग जख्मों पर नीम की पत्तियां, हल्दी या फिर घर के पुराने नुस्खे लगाना ही ज्यादा भरोसेमंद मानते थे। डेटोल को लोग अंग्रेजों की दवा कहते थे और सोचते थे कि पानी के जैसा दिखने वाला यह लिक्विड आखिर क्या ही काम करेगा। उस समय तो हालत
यह थी कि ज्यादातर गांव में ना तो डॉक्टर्स थे ना प्रॉपर हॉस्पिटल्स और जो डॉक्टर्स थे भी वह किसी नए प्रोडक्ट को अपनाने में काफी हिचकिचाते थे। ऊपर से डेटोल इंपोर्टेड प्रोडक्ट था। यानी कॉस्ट भी लोकल एंटीसेप्टिक्स से कहीं ज्यादा। और तो और चाइल्ड बर्थ केयर भी अक्सर लोकल दाइयों के हाथ से होती थी जो डेटोल जैसे एंटीसेप्टिक को बिल्कुल भी जरूरी नहीं मानती थी। लेकिन फिर भी रैकेट पीछे नहीं हटा। कंपनी ने धीरे-धीरे एजुकेशनल कैंपेन, हॉस्पिटल्स और डॉक्टर्स के जरिए लोगों को समझाना शुरू किया। लेकिन तभी इसी बीच आया 1939 और शुरू हो गया
वर्ल्ड वॉर 2। युद्ध के मैदान पर सैनिक घायल तो गोलियों से ही होते थे लेकिन उनकी डेथ होती थी ज्यादातर इंफेक्शंस से और दोस्तों यहीं पर फ्रंटलाइन वॉरियर बनकर सामने आया डेटोल वो लिक्विड जो कभी अंग्रेजों की महंगी दवा कहलाता था अब बन चुका था जिंदगी बचाने का हथियार। वर्ल्ड वॉर के दौरान डेटोल की परफॉर्मेंस इतनी असरदार रही थी कि ब्रिटिश गवर्नमेंट ने इसे ऑफिशियली एसेंशियल सप्लाई घोषित कर दिया था। मतलब कि अब डेटोल हर सोल्जर की मेडिकल किट और हर वॉर हॉस्पिटल का एक जरूरी हिस्सा बन गया था। जैसे-जैसे वॉर तेज हो रहा था,
डेटोल की डिमांड भी लगातार बढ़ रही थी। लेकिन यहां पर एक बहुत बड़ा खतरा भी आ गया था कि बॉम्बिंग अटैक्स की वजह से रैकेट की फैक्ट्री कभी भी डैमेज हो सकती थी। और दोस्तों, अनफॉर्चूनेटली अगर ऐसा हो जाता, तो फिर पूरी सप्लाई चेन ही रुक जाती। ऐसे में कंपनी ने लिया एक बोल्ड डिसीजन। पूरी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को ही रीोकेट कर दिया है एक सेफ जोन में ताकि चाहे कुछ भी हो जाए डेटोल का प्रोडक्शन बिना किसी रुकावट के चलता रहे। वॉर खत्म होते-होते डेटोल पूरे यूरोप में हाउसहोल्ड नेम बन चुका था। और अगर बात
की जाए इंडिया की तो यहां भी अब लोगों का परसेप्शन बदलने लगा था और इसका सबसे बड़ा क्रेडिट जाता है रैकेट कंपनी की स्मार्ट और लोकलाइज्ड अप्रोच को क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि इंडिया में सिर्फ प्रोडक्ट बेचना ही काफी नहीं है। यहां पर लोगों का ट्रस्ट भी जीतना पड़ेगा। कंपनी ने सबसे पहले डॉक्टर्स और हॉस्पिटल्स को टारगेट किया। फ्री सैंपल्स दिए गए ताकि मेडिकल प्रोफेशनल्स खुद इसका असर देख सकें और फिर अपने पेशेंट को भी रिकमेंड कर पाएं। और दोस्तों इस स्ट्रेटजी ने डेटोल को ग्रेजुअली हर घर तक पहुंचा दिया। क्योंकि जहां कभी
लोग नीम और हल्दी की ट्रीटमेंट लेते थे अब वहीं पर लोग कहने लगे डेटोल लगाओ इंफेक्शन भगाओ। वर्ल्ड वॉर के बाद जिस तरह से इंडिया में डेटोल की डिमांड बढ़ रही थी, उसे देखते हुए रैकेट ने एक बड़ा स्टेप लिया और 1945 में भारत में डेटोल की पहली फैक्ट्री खोल दी गई। बस फिर क्या था? कुछ ही सालों में डेटोल ऑलमोस्ट हर इंडियन घर का हिस्सा बन गया। 1980 तक एक एस्टीमेट के मुताबिक 65 मिलियन इंडियंस यानी कि 6.5 करोड़ लोगों ने कम से कम एक बार डेटोल का इस्तेमाल जरूर किया था। लेकिन फिर आया
1999 का दिसंबर महीना जब डेटोल की कहानी में आया एक और मेजर टर्निंग पॉइंट। इस साल रैकेट कंपनी का बेंकाइजर एनवी के साथ में मर्जर हो गया और फिर कंपनी का नाम बन गया रैकेट बनकाइजर। बेसिकली बेंकाइजर एक जर्मन कंपनी थी जिसे 1823 में जोहान बेंकाइजर ने शुरू किया था। शुरुआत में यह कंपनी वाटर सॉफ्टनर और क्लीनिंग एजेंट्स बनाती थी और उनके बनाए गए प्रोडक्ट्स इतने इफेक्टिव थे कि जल्द ही पूरे यूरोप में पॉपुलर हो गए। लेकिन अब सवाल उठता है कि जब दोनों कंपनियों का बिजनेस ठीक चल रहा था तो फिर मर्जर की जरूरत
ही क्यों पड़ी? असल में 1990 के एंड तक रैकेट की ग्रोथ काफी धीमे पड़ने लगी थी। इनोवेशंस का टेमो अभी थोड़ा स्लो हो गया था और ग्लोबल मार्केट में यूनilver और प्रॉक्टर एंड गैंबल जैसे नए-नए प्लेयर्स की वजह से कंपटीशन भी काफी बढ़ने लगा। मतलब कंपनी को अब कुछ बड़ा करने की जरूरत थी। दूसरी तरफ बनकाइजर थी एक साइंस ड्रिवन और एग्रेसिव कंपनी जिसके पास थे वनिस वेट और ड्यूरेक्स जैसे फास्ट ग्रोइंग और मॉडर्न प्रोडक्ट्स। लेकिन प्रॉब्लम यह थी कि बेंकाइजर के पास वो डीप डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क नहीं था जो कि रैकेट के पास में था।
यानी कि एक के पास जबरदस्त प्रोडक्ट्स तो दूसरे के पास बढ़िया नेटवर्क और पुराना भरोसा। इसी सोच के साथ दोनों कंपनीज ने एक साथ मिलकर काम करने का फैसला लिया। मर्जर के बाद दोनों कंपनीज ने मिलकर इनोवेशंस को तेज कर दिया। सप्लाई चेन को एफिशिएंट बनाया और मार्केटिंग को बनाया और भी ज्यादा रिलेटेबल। और दोस्तों इन सभी इंप्रूवमेंट्स का सीधा फायदा मिला डेटॉल को। क्योंकि अब डेटोल बन चुका था एक लिक्विड से कहीं आके एक लाइफस्टाइल एसेंशियल। 90ज के दौरान जब भारत में हजीन को लेकर जागरूकता बढ़ने लगी तब रैकेट बेंकाइजर ने इसे सिर्फ एक
एंटीसेप्टिक लिक्विड के रूप में नहीं बल्कि एक हेल्थ एसेंशियल्स की तरह प्रमोट करना शुरू कर दिया। अब डेटोल सिर्फ घाव या चोटों के लिए नहीं था। अब यह था हर दिन के पर्सनल हजीन का हिस्सा। इसके बाद से रैकेट ने ल्च की एक पूरी प्रोडक्ट रेंज जिसमें शामिल थे डेटोल सोप, डेटोल हैंड वाश, सरफेस क्लीनर और हैंड सैनिटाइजर। यानी कि अब लोग सिर्फ दवा की तरह नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी डेटोल को अपनाने लगे थे। लेकिन फिर आया कोविड-19 पेंडेमिक एक ऐसा समय जब हाइजीन सबसे बड़ी प्रायोरिटी बन गई थी। इस पेंडेमिक के
दौरान हजीन के लिए डेटोल हैंडवाश और सैनिटाइजर जैसे प्रोडक्ट्स की डिमांड आसमान छूने लगी। इस टाइम कंपनी ने कई सारे अवेयरनेस कैंपेन भी लांच किए जिसमें लोगों को बताया गया कि कैसे वायरस से बचने के लिए प्रॉपर हजीन रखना बहुत जरूरी है। डेटोल ने WHO की गाइडलाइंस को फॉलो करते हुए प्रोडक्ट्स बनाए और बड़े लेवल पर प्रमोट भी किया ताकि लोग समझ पाएं कि इन प्रोडक्ट्स का साइंटिफिक बेस कितने स्ट्रांग है। इतना ही नहीं डेटोल ने एक बहुत ही इमोशनल और इंस्पायरिंग कैंपेन भी ल्च किया जिसका नाम था डेटोल सैल्यूट्स। इन कैंपेन में उन कॉमन
हीरोज़ को सैल्यूट किया गया जो पेंडेमिक के दौरान साइलेंटली दूसरों की मदद कर रहे थे। जैसे कि डिलीवरी बॉयज, क्लीनर्स, नर्सेज और लोकल हेल्पर्स। कंपनी ने ना सिर्फ उन्हें सम्मान दिया बल्कि फ्री हैंड सैनिटाइजर और क्लीनिंग किट्स भी डिस्ट्रीब्यूट किए ताकि हजीन हर जरूरतमंद तक पहुंच सके। इसका असर यह हुआ कि 2020 के फर्स्ट हाफ में ही डेटॉल की सेल्स में 62% की जबरदस्त ग्रोथ देखी गई और इसी के साथ लाइफ बॉय को पीछे छोड़ते हुए डेटोल भारत का नंबर वन सोप ब्रांड बन गया। लेकिन दोस्तों जहां सक्सेस होती है वहीं शुरू होती है असली
टेस्टिंग और डेटोल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब डेटोल की डिमांड रिकॉर्ड तोड़ रही थी तब शुरू हुआ एक लीगल वॉर और सामने कोई और नहीं बल्कि उसका सबसे बड़ा कॉम्पिटिट लाइफ बॉय था। असल में हुआ कुछ यूं कि रैकेट बेंकाइजर ने डेटोल हैंडवाश के एक टीवी ऐड में ऐसा साबुन दिखाया जो कि लुक्स वाइज काफी हद तक लाइफ बॉय जैसा ही लग रहा था। इस ऐड में मैसेज था कि डेटॉल हैंड वॉश साबुन की तुलना में बैक्टीरिया को मारने में ज्यादा इफेक्टिव है। अब लाइव बॉय यह देखकर भड़क गया। उन्होंने इस पर
स्ट्रांग ऑब्जेक्शन उठाई और डायरेक्टली रैकेट पर मिसलीडिंग एडवर्टाइजमेंट का केस ठोक दिया। उनका कहना था कि यह सिर्फ एक ऐड नहीं यह हमारे सालों से बनाए गए ट्रस्ट और रेपुटेशन पर सीधा हमला है। यह लीगल केस कुछ ही हफ्तों में मीडिया की सुर्खियों में आ गया। न्यूज़ चैनल्स, न्यूज़ पेपर और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स हर जगह पर बस यही चर्चा थी। डेटोल वर्सेस लाइव बॉय में कौन जीतेगा यह ब्रांड वॉर? अब जहां ज्यादातर ब्रांड्स ऐसे केसेस में लड़खड़ा जाते हैं। लेकिन डेटोल ने यहां भी अपना ट्रस्ट साबित कर दिया। क्योंकि कुछ ही हफ्तों में मामला आपसी समझौते
से सुलझ गया और सबसे बड़ी बात इतनी बड़ी लड़ाई और मीडिया कवरेज के बावजूद डेटॉल की रेपुटेशन पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा क्योंकि इस लीगल लड़ाई के एक साल बाद यानी 2021 में डेटॉल का नेट रेवेन्यू पिछले 2 साल के मुकाबले 40% ज्यादा रहा और वह भी ऐसे टाइम पर जब दुनिया भर की कंपनीज़ सप्लाई चेन और ऑपरेशंस की दिक्कतों से लगातार जूझ रही थी। अब अगर आज की बात करें तो एंटीसेप्टिक लिक्विड सेगमेंट में डेटोल का दबदबा इतना जबरदस्त है कि इसने लगभग 85% मार्केट शेयर पर कब्जा कर रखा है। वहीं लिक्विड
हैंडवाश कैटेगरी में भी डेटॉल भारत का सबसे बड़ा ब्रांड बना हुआ है। जहां इसका मार्केट शेयर करीब 60% है। इसके अलावा डेटोल बार सोप कैटेगरी में ना सिर्फ इंडिया का नंबर वन सोप ब्रांड है बल्कि यूएई, सऊदी अरबिया और मलेशिया जैसे कई सारे देशों में भी यह नंबर वन की पोजीशन होल्ड करता है। और दोस्तों डेटोल की इस मजबूत ग्लोबल प्रेजेंस और दमदार ग्रोथ के पीछे रैकेट बैंकाइजर की जबरदस्त स्ट्रेटजीस हैं। जैसे डेटोल ने खुद को हमेशा सेफ्टी हाइजीन और ट्रस्ट से जोड़कर रखा। उनकी आइकॉनिक टैगलाइन डेटोल का धुला सिर्फ एक लाइन नहीं बल्कि एक
हैबिट बन गई। एड्स में मां बच्चों का इमोशनल बॉन्ड दिखाकर डेटोल ने साफ सफाई को डेली लाइफ का हिस्सा बना दिया और सबसे बड़ा कदम पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से पार्टनरशिप कर रूरल इंडिया में हाइजीन अवेयरनेस को भी प्रमोट किया गया। पोस्टर्स, वर्कशॉप, मोबाइल वैन्स और हेल्थ केयर कैंपेन के जरिए डेटोल गांव-गांव तक साफ सफाई का मैसेंजर बन गया। इससे ना सिर्फ लोगों का भरोसा बढ़ा बल्कि डेटॉल को मिली एक अलग पहचान। एक जिम्मेदार और सोशली अवेयर ब्रांड की। डेटॉल ने हमें सिखाया अगर ब्रांड सिर्फ प्रोडक्ट ना बनकर एक इमोशन, एक आदत और
एक इंपैक्ट बन जाए तो वह मार्केट नहीं बल्कि दिलों पर राज करता है।