[संगीत] [हंसी] [संगीत] अनिल जी पुन से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी दो साल से नाम जप कर रहा हूं कुछ समय तक मन किसी भी भोग की इच्छा नहीं करता लेकिन कुछ दिनों बाद फिर मन उसी भोग में रत हो जाता है महाराज जी मैं आगे कैसे बढूं कैसे उसके लिए हठ नना पड़ेगा हम थोड़ा सा हठी स्वभाव अपना बनाए जो धर्म युक्त भोग है वह देना चाहिए मन को जो धर्म विरुद्ध भोग है व नहीं देना चाहिए धर्म युक्त जैसे आप गृहस्थ में हो और आपके मन में काम आया आपकी पत्नी
है तो व अधर्म नहीं होगा लेकिन किसी और माई बहन की तरफ गंदी दृष्टि या भावना भी कर ले वो पाप हो जाएगा आपको अच्छे पदार्थ पाने का भाव आया आपके पास सामर्थ्य है आप व्यवस्था कीजिए भोग लगाइए और पा लीजिए कोई पाप नहीं है लेकिन आपको गलत पाने का मन होता है फिर हमको मन को डांटना होगा यह धर्म विरुद्ध आहार नहीं करना धर्म विरुद्ध आचरण नहीं करना तो धर्म से युक्त जो भोग है वह भजन में सहायक है जैसे आपके मन ने ठान लिया कि अब हमको आज यह भोग पाना है गुल्ला पाना
है या किसी भी इंद्री का भोग और वो राइट है आपके लिए धर्म युक्त है तो आप फिर उसका सहयोग कीजिए देखो मन ही आपको वृंदावन लाया है मन ही आपको एकांतिक में बैठा ले अगर यह खिलाफत कर दे तो आप बैठ नहीं सकते हो ये इतना जिद्दी स्वभाव का है यह अगर अपने हाठ में आ जाए तो इस पर विजय पाना बहुत कर तो इसको दुलार भी करना है मन से एकदम बिगड़े नहीं रहना धर्म युक्त भोग मांगे फिर इसे दे देला है और अधर्म युक्त मांगे तो फिर तू चाहे जितना जला यह मैं
नहीं कर सकता इतना तो लाना पड़ेगा नहीं तो जिंदगी भर ये गुलाम बनाए रखेगा जो धर्म युक्त भोग है उनसे वैराग्य बढ़ता है और जो अधर्म भोग है उनसे राग बढ़ता है आसक्ति बढ़ती है फिर ऐसा लगता है अब मैं इसके बिना जी नहीं सकता कोई व्यसन कोई क्रिया कोई व्यक्ति कोई वस्तु कोई स्थान जब अधर्म युक्त भोग करेंगे तो ये लगेगा इसके बिना हम जी नहीं सकते और जब धर्म युक्त भोग करेंगे तो भगवान की कृपा का सहारा और वैराग्य के द्वारा हम उसको क्रॉस कर सकते हैं तो धर्म युक्त भोगों को भोगी जो
भगवान ने विधान बनाया है क्योंकि आप ग्रस्त और अधर्म युक्त भोगों का त्याग कीजिए और जैसे विरक्त है उसके लिए संपूर्ण भोगों का त्याग है मात्र जीवन यापन के लिए वस्त्र और भोजन के सिवा औषधि के सिवा बस पूरा का पूरा जीवन मरा हुआ जीवन तब वो महात्मा कहलाता है जीवित मर जाए उलट आप में समाय है दिलगिरी पूरा जीवन जलते हुए लड़ते हुए ना कभी कोई सुख ना कभी चैन से चैन से कभी सोए नहीं होंगे जब अभ्यास में निकले थे बाबाज बने थे अभ्यास 15 मिनट लेट जाते तो ऐसा लगता कई घंटे हो
गए क्या और फौरन उठ कर के बैठ के फिर आसन में भगवत चिंतन एक लगन एक अगन फिर पूरे जीवन भर निर्विक यह बैलेंस बनाने वाला मार्ग नहीं है फिर जो बैलेंस बनाने में पड़ जाते तो पाखंड होता है दम होता है सही सही माने में भगवत मार्ग नहीं होता भगवत मार्ग में पूरा जैसे मुर्दा होता है ना मुर्दे के पास कोई वि भोग सामग्री रखो हलचल नहीं होगी ऐसे साधु का मन मुर्दा होता है विरक्त का मन मन मार्या तन बस में कीना हुआ भरम सब दूर बाहर से कछ दित नाही अंदर चमके नूर
आपो त्याग जगत में बैठे नहीं किसी से काम उनमें तो कछु अंतर नाही संत कहो चाहे राम वो भगवान के स्वरूप हो जाते हैं तो गृहस्थ धर्म में धर्म युक्त भोग भोगते हुए भगवान का भजन करना और विरक्त धर्म में आजीवन समस्त भोगों का त्याग करके एकमात्र भगवता अंद में स्थित रहना तो अधर्म युक्त आचरण मत करो तो भजन की कभी हानि नहीं होगी कभी नहीं आप देखना अधर्म युक्त आचरण नहीं होना चाहिए तो गृहस्थ में रहते हुए भी भजन बढ़ने लगे अधर्म युक्त आचरण तो फिर भजन नहीं पाप वंत कर सहज स्वभाव भजन मूर्ति
भाव न काव अगर पाप आचरण होंगे तो भजन में मन नहीं लगेगा जोप दुष्ट हृदय सोई होई मोरे सन्मुख आव की सोई जो दुष्ट हृदय होगा वो भक्त और भगवान की तरफ नहीं चलेगा वो संसार की तरफ चलेगा तो हमारे द्वारा कोई अधर्मा चरण ना बने ये डरते रहो धर्म युक्त भोग देते रहो जिससे आपके गृहस्थ धर्म की पूर्ति होती रहे तो आपका भजन बढ़ता रहेगा ठीक है ना महाराज जी मैं वो तीन चार दिन पहले आपके पास आया था वो सवाल किया था टेंशन होता है कोटा में तैयारी कर रहा था मैं आपको सवाल
किया था दो तीन दिन पहले मेरे को टेंशन होता है कि हमारा बच्चा क्या है कि जोही तुम सब निकले स हम डिलीट का बटन दबा देते हैं इतने रूप है सुबह से 2 बजे से वहां से लेकर कृष्णा शरणम से राधा केल कुं तक तो कैमरा केवल रहता है डिलीट क साथ ही रहता है अब कोई हमसे कहे कि आज आप हमारी तरफ देख के मुस्कुराए थे कोई परिचय मेरे दिमाग में तो आप ही मतलब पूरे टाइम मतलब आप भी रहते हो तो महाराज जी जैसे आपने आपके टाइम उस टाइम बोल के मतलब मन
हल्का किया ना महाराज जी अ मतलब सारा टेंशन गायब हो गया महा जब मेरे को महाराज जब ऐसा मतलब विश्वास हो गया ना मतलब जब भी कुछ होता है मैं आपके इधर आ जाता हूं मतलब मेरा म प स्वागत है आप आओ और जितना निर्विकार हो सको इससे इससे पहले जैसे आपसे एक बार पहले सवाल किया था कि दो वगैरह को देख के नॉनवेज खाने का मन करता है तो आपने समझा तो महाराज जी अंदर से पच्छा ही खत्म हो गया महाराज जी अब क्या अब क्या आप जानना चाहते हो अब तो महाराज जी मतलब
आपको बस देखना है अगर जीवन कोई धर्म संकट में फस जाए उसके लिए क्या सलूशन है भगवान भगवान समस्त भक्तों ने जब कहीं कोई आश्रय नहीं मिला और भगवान को पुकारा तो भगवान ने निश्चित आश्रय दिया है मेरा जीवन एक संकट पसा मैं आपको बताना चाहता हूं नहीं बताने की जरूरत नहीं पुकारने की जरूरत है पुकार में तुम्हारी दम होनी चाहिए अन्य आश्रय नहीं द्रोपदी जी ने जब तक पतियों का सहारा रखा भीष्मा दि का सहारा रखा कोई बचाने नहीं आया जब अपने हाथों से पकड़ा तब भी फिर जब दांतों से पकड़ा तब भी हार
ही माननी पड़ी जब देखा अब की ये 100 हज हाथियों का बल रखने वाला दुशासन एक झटके में अब दांत से वस्त्र हट जाएगा और एक वस्त्र धारण की हुए थी उन्होंने हा द्वारिकाधीश हाथ उठा दिए वस्त्र अवतार भगवान का हो गया यहां से पल्लू नहीं हटा सका ढेर लग गया वस्त्रों का और भगवान का एक वस्त्रा अवतार हो गया द्रोपदी के वस्त्र बन गए भगवान तो आज तक जहां भी इतिहास साक्षी है जो आर्थ भाव से भगवान को पुकारा तो भगवान ने उसकी निश्चित रक्षा की हमें एक ही उपाय पता है श्री भगवान दूसरा
है सब नाटक बाजी है का हिमवंत मुनीश सुन जो कछ लिखा लिलार देव नुज मुनि नाग नर को न मेटन हारे अगर मेट सकता है कोई भावी मेट सके त्रिपुरारी भगवान मिटा सकते हैं दूसरा कोई नहीं हमारी सोच समझ श्रद्धा विश्वास एकमात्र भगवान पर है उनकी पुकार करो वही कोई जंतुर कोई राख कोई ये सब इनकी सामर्थ्य नहीं को न मेटन हार तो इसलिए भगवान को पुकारो जो आपका संकट हो आप समझिए और एकांत में भगवान से विनय कीजिए हम उनके बच्चे हैं अगर हमसे गलती भी हुई है तो हमें क्षमा करें और हमको संकट
से हटावे तो भगवान निश्चित हटाते हैं मंगल भवन अमंगल हारी अमंगल का नाश करते हैं और हरि स्मृति सर्व विपद विमोक्षा भगवान का चिंतन किया गया भगवान विपत्ति का नाश करते हैं इसलिए धैर्य रखकर एकमात्र भगवान का आश्रय रखकर जब आर्थ भाव से पुकारोगे तुरंत समस्या का समाधान निकलने लगेगा लेकिन एक अनन्य होना चा मतलब फोन नंबर जैसे मिलाया जाता है ना ऐसे भगवान से फोन नंबर मिलाने क्या है एक मतलब एक मात्र भगवान का भरोसा अब कोई नहीं रह गया जैसे गजेंद्र सब छोड़ के चले गए एक झटके में ग्राह मार देगा ब एक
मात्र भगवान को हे हरि और आर्थ भाव मतलब ये नहीं कि पता नहीं भगवान करें कि ना करें दूसरा तीसरा ऑप्शन रखे नहीं एक ऑप्शन आखिरी अब बनेगी तो आपसे बनेगी नहीं तो प्रभु मेरा कोई अब साथी नहीं और अंदर से पुकारो हर समस्या का समाधान जीवन भर की पूरी अनुभव की बात कह रहे हैं शास्त्रों की बात कह रहे हैं और है भी वही चाहे डॉक्टर हो चाहे कोई हो वह यही कहता है कि हम पूरा प्रयास करते हैं इसके बाद अंगुली उठा देता है ऊपर वाला सबको ऐसे नहीं कह देता भाई वो तो
भगवान बचा सकते हैं हम तो प्रयास कर रहे हैं बचा भगवान सकते हैं इसलिए हर संकट का समाधान भगवान का आश्रय भगवान को पुकारना भगवान की स्मृति हमारी तरफ से अब आगे किसी को और रास्ता पता हो तो मुझे नहीं पता मुझे तो एकमात्र भगवान ही है अगर सहयोग कर सकते हैं तो भगवान नहीं मुझ जैसे दीन पतित का कौन सहयोग कर सकता है सहयोग स्वार्थ बस भले तुमसे कोई हाथ मिला ले अगर तुम्हारे पास है वैभव सब व्यवस्था नहीं तो दीन हीन अकिंचन का कोई साथी नहीं होता केवल भगवान होते हैं स्वार्थ वस भले
कोई तुमसे मित्रता की बात करे अगर आपके पास है अगर कुछ नहीं है तो कोई तुम्हारा मित्र भी नहीं होगा कोई मित्र नहीं होगा इसलिए भगवान एक ऐसे मित्र हैं जो गरीबों के अकिंचन के असहाय के पति तों को पावन करने वाले हैं ये हम अपने हृदय की बात कहते हैं कि कोई भी संकट मोचन और कोई नहीं भगवान ही है अगर उनसे हम प्रार्थना करें तो बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान इतनी हजारों घटनाएं हमने जीवन में देखी जहां भगवान तो वहीं समस्या का समाधान अब आपका कितना विश्वास है कितना समर्पण है कितनी अनन्य है उसी
से फोन वही लगेगा भगवान उसी की पुकार सुनते हैं द्रोपदी जी ने जब तक दांत का सहारा लिया गोविंद नहीं प्रकाशित हुए जब पूरा भरोसा केवल भगवान का तो फिर भगवान वस्त्र बन गए गजेंद्र का उद्धार लाखों ऐसे अनुभव है संत महात्माओं तो हमें लगता है अन्य किसी का सहारा ना लेकर भगवान का आश्रय लीजिए और जितना पाप का प्रश्चित कराना होगा उतना तुम्हें जलाएंगे और फिर बचा लेंगे बस धैर्य पूर्वक भगवान का ही भरोसा रखना ठीक है मैं गुरु की पूजा करता हूं वो मेरे थोड़ा काम में बिजी होने के कारण में कभी शाम
को कभी सुबह को दिक्कत आ रही है उसम कोई मे पूजा में दोस्त नहीं लग रहा कुछ नहीं यार किसान आदमी गृहस्थ आदमी समझो पूजा का मतलब अगरबत्ती जलाना नहीं है पूजा का अर्थ कर देना नहीं है फावड़ा चलाना भी पूजा है गोली चलाना भी पूजा है अपने कर्तव्य पर निष्ठा से युक्त होकर हम व्यापार कर रहे नौक य सब पूजा है धर्म पूर्वक चलो भगवान का नाम जप करो जो कार्य करते हो तुम्हारी पूजा है यह सृष्टि भगवान के हम बार-बार समझाना चाहते अर्जुन जी कह रहे हम सन्यास लेकर भजन करेंगे भगवान जी कह
रहे नहीं उठा प्रत्यंचा चढ़ा पर और काट इनकी गर्दन यह पूजा होगी तो समझो अगर हमारा फड़ा चल रहा है राम राम इससे बड़ा भजन क्या होगा राधा राधा इससे बड़ा भजन क्या होगा हमें शाम तक ज समय मिला एक लोटा जल चढ़ा दिया हो गई पूजा किसान आदमी हम दिन भर मेहनत कर रहे हैं जो अन्न कमा रहे हैं परिवार का पोषण समाज का पोषण उससे होगा बीच-बीच में भगवान का स्मरण कर रहे हैं भगवान इस पूजा आरती पूजा इससे ज्यादा प्रसन्न नहीं होते अपने कर्तव्य से प्रसन्न होते हैं हां कर्तव्य करते हुए आपके
पास समय आप कर लीजिए नहीं है तो कर्तव्य ही पूजा है अगर कर्तव्य में अधर्मा आचरण करे फिर जाकर खूब घंटी बजाए आरती करे कभी भगवान प्रसन्न होने वाले नहीं अपने धर्म से चलो कर्तव्य का पालन करो नाम जप करो कोई पूजा की बाहरी जरूरत नहीं इसी से भगवान प्रसन्न हो जाए अगर समय है तो गलत समय ना लगाकर गलत जगह भगवान की पूजा में लगा दो नहीं पूरी सृष्टि पूजा ही है हम 12 बजे रात्री से लगे हमारी पूजा तो हो रही है आप लोग हमारी पूजा ही तो है हमारे भगवान के रूप में
आए हमसे प्रश्न करते हैं भगवत चर्चा हो रही आप संतुष्ट होते हैं हमारी हो गई पूजा तो अलग-अलग पूजा है अलग-अलग पूजा एक किसान का हल जोतना फावड़ा चलाना नाम जप करते हुए भगवान के आशित रहना हो गई पूजा उसके लिए फुर्सत थोड़ी कि हम अगरबत्ती लगावे मोमबत्ती लगावे वो तो हल जोते का कि फावड़ा चलाएगा कि वहां बैठ कर के पूजा खोलेगा आप समझ रहे एक आर्मी का जवान सैकड़ों भगत है आर्मी के एक आर्मी का जवान है हर समय तैनात कब स्नान करे कब उसको भोजन मिले कब ये साम नहीं नाम जप करो
राष्ट्र को समर्पित हो दुश्मन की छाती चीरो यही है पूजा अपने अपने कर्तव्य में दृढ़ हो जाओ यही पूजा है ठीक है अशोक कुमार जी लुधियाना पंजाब से राधे राधे महाराज जी तुलसी मेरे राम को रीच जपो या खींच भोम पड़े जाए सभी उल्टा सभी सीधा बीच अर्थात जब इतना सरल ढंग मार्ग स्वामी तुलसीदास जी ने बताया हो तो हमें इतना दुर्लभ मार्ग क्यों बताया जाता है किस प्रकार के साधक के लिए स्वामी कौन सा दुर्लभ प्रपंच से चित्त हटाकर प्रभु में जोड़ना है चाहे दुश्मन मान के भजो चाहे स्वामी मान के भजो चाहे प्रीतम
मान के दुश्मन मानो तो कंस और शिशुपाल की तरह रात दिन रावण की तरह रात दिन भगव आकार वृत्ति केवल वैर से अंतिम समय तक कहां राम रतो पचारी खिलवाड़ समझते हो भगवान में चित्त जोड़ना इतना सह जोड़ के तो दिखाओ बहादुर हो तो फिर ऐसे कैसे के बात पकड़ के प्रश्न थोड़ी बनता है चित्त को जोड़ के दिखाओ दो चार घंटे सच्चिदानंद प्रभु में बैरे से जोड़ो काम से जोड़ो प्रेम से जोड़ो जोड़ के तो दिखाओ केवल बात पकड़ लेने से थोड़ी होती जोड़ा चित खीज भजो चाहे रीज तो भजन का भजन का मतलब
समझते हो एक भी वृत्ति संसार की स्पित ना होने पावे हर समय भगवता का कंस को सोते जागते उठते बैठते कृष्णा का वृत्ति गोपियों की कृष्णा का वृत्ति वो भज नहीं प्रेम से मुरारी पादा अर्पित चित्त वृत्ति ठीक वैसे ही वृत्ति कंस कीी है लेकिन वह द्वेष से भज रहा है इसलिए उसे परमानंद की अनुभूति नहीं हो रही वो प्रेम से भज र तो हर समय परमानंद में विकल है भगवान का चिंतन निरंतर करना चाहे श्री सुखदेव जी कहते हैं काम से क्रोध से द्वेष से रिश्तेदारी से नातेदारी से वृत्तियां सच्चिदानंद भगवान में जुड़ती है
इसलिए व सच्चिदानंद स्वरूप हो जाता है जोड़ के देखो वृतिया जोड़ के देखो जैसे कहा जाता है कि बड़ा दुर्लभ जो आप शब्द बोले तो जोड़ के देखो ना बहादुर हो तो मनुष्य जीवन मिला इसीलिए साधन धाम मोक्ष कर द्वारा तो जोड़ो अपनी वृत्तियां एक एक वृत्तियों को समेटकर सच्चिदानंद भगवान में स्थित कर दो फिर प्रश्न का उत्तर अपने आप समझ में आ जाएगा वृत्तियों को जोड़ना भाई इतना कठिन है कि हिमालय को उठा लेना सहज हो जा सकता है लेकिन वृत्तियों को जोड़ना बहुत कठिन है एक सेकंड में काम मय वृत्ति एक सेकंड में
लोभ मय वृत्ति ऐसे-ऐसे तरंग आमान हो रहे साधक जो लगे हैं वास्तविक हार रहे हैं बार-बार बार-बार प्रभु को पुकार जो ईमानदारी से लगे हैं जो बैलेंस बना है ना भोगों का उनको कोई परेशानी नहीं है जब जो रसेंद्र जने द्र के भोग की मांग हुई वो भोग लिया उनको क्या परेशानी परेशानी उनको है जिन्होंने अंतर्मुखी की गुलामी और मन की गुलामी से मुक्त होने की ठानी है उनकी बात है अभी अंतर्म मुख में बैठकर कभी युद्ध हुआ है क्या तुम्हारा अभी नहीं हुआ तो इसीलिए जिनका युद्ध हुआ वो कह रहे बहुत कठिन त्राहिमाम हार
गया नाथ में हार गया ऐसे खिलवाड़ समझते हो परमार्थ को हां गुरु कृपा पात्र है और कदम पर कदम मिलाकर चलर उसके लिए खिलवाड़ हो जाएगा गुरु प्रसन्न सहावन कुला सत मार्ग में जब ठान लिया तो मृत्यु का भी भय नहीं रहता तो इससे बढ़कर और कौन सी व्यथा हो सकती नहीं तो जिस समय व्यथा प्रकट करते ना प्रवचन कर लेना सुन लेना बोल लेना यह सब सहज है लेकिन जिस समय व्यथा मंथन करके इंद्रिया और काम हृदय में तो अच्छे अच्छे ढेर हो जाते हैं इसलिए भगवान ने लिखा यम हीन तेते पुरुषम पुरुष सब
सम दुखा सुखा धरम स्म तत्वा कल्प जो व्यथित नहीं होता कहने की बात अलग है भाई उस व्यथा में जिस समय स्थिति होती है वेग काम का वेग क्रोध का वेग वाणी का वेग उदर का वेग ये सब वेग हैं उस समय सब प्रवचन भूल जाते हैं अच्छे-अच्छे मुंह भरा गिरते हैं बचते वही है जे राखे रघुवीर ते उ बरे ते कालम जो भगवान की शरण में त्राहिमाम और भजन परायण है भगवान उनको बचाते हैं समझ पा रहे हो भाई हां संतों ने जो बात कही है बहुत सोच समझ के कही है कटाक्ष रूप में
जैसे बोले ले तो फिर हमारे शब्दा कि बहादुर हो भगवान के अंश हो जन्म हुआ है जोड़ के देखो चित्त पूरा जीवन उसी में अपने लोग जब लगा दिए ना तो आज भी ऐसे ही है हमारी बस नहीं आप पकड़े हो तो मैं नहीं आप छोड़ दे तो मैं नहीं हमारी सत्ता ही नहीं है हमारा अस्तित्व ही नहीं है जैसे हमसे पूछा जाए कि आपकी साधना बिल्कुल ऐसे है हमारा कुछ नहीं आप पकड़े हैं आप पकड़े हैं तो हमारी सत्ता है आप छोड़ दे तो अभी कुछ नहीं है कुछ नहीं आपसे है सब कुछ आप
ही आप है मैं कुछ नहीं है आपकी कृपा चाहे गुरुदेव की कृपा को चाहे हरि की कृपा को बच्चा चित्त जो हाहाकार मचता है जिस समय जैसी चढ़ाई में खींचकर मन को परमात्मा में लगाने की कोशिश करो फिसल करके जब विषयों की तरफ जाता है तो जो साधक को पीड़ा होती है वो दूसरा नहीं जान सकता है देखो भंडारा खाना इधर-उधर मौज मस्ती बहुत बढ़िया जीवन है लेकिन प्रभु के लिए तड़पते हुए आंसू बहाना और चित्त को सदैव के लिए प्रभु के चरणों में समर्पित करना उस साधक के देखो हां नारायण हरि भजन में पांचों
न सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति बहु बात ये सब अच्छा नहीं लगता हृदय जलता रहता है इसी जलन पे प्रभु रीज करके फिर कृपा की वर्षा करते हैं तो आनंद सिन्न में डूबता है यह ताप है पहला अनर्थ का नाश इसी ताप से होता है ये समस्त वासनाओं को निर्मूल करके भस्म करके ये भगवत प्रेम उदय करता है हृदय में जो इस ताप को सह इसलिए भगवान कह रहे मात्रा स् परतु कोनते शीतोषण सुख दुखदा आग मा पायन अनि त्यास तास भारत वेग आने पर सह जाए स महात्मा चाहे पेंट शर्ट में हो
चाहे भेस में हो वेग आने वेग के बाद तो सब ज्ञान करता है जब वेग आया और परास्त हो गया तो पूरा उपदेश दूसरे को दे सकता है कैसे बचा जाता है लेकिन जब वेग आया तो ज्ञान कहां गया उस समय ज्ञान पक्का समझ लो बच्चा प्रवचन करता प्रवचन बहुत ऐसा कि क्या कहना है वो ज्ञान उस समय नहीं आएगा जो दूसरे को उपदेश देने के समय आ रहा था ना अपना जब वेग आया तब जन वो सही प्रवचन वही कि जब अपने में वेग आए और अपना उपदेश लागू करके इंद्रियों मन को काबू में
कर लिया तो फिर प्रवचन ठीक रहा लेकिन नहीं बच्चा सभा में तो बोलना अलग बात है एकांत में जब वेग आता है ना तो बड़े बड़ों को फैला देता है तभी शिव रंच का मोही कोहे बपुराबी माया पति भगवान भगवान रक्षा करें तो एक साधारण भी असाधारण स्थिति को प्राप्त हो जाए और भगवान से शरणागति ना ले तो फिर वो चाहे जितनी ऊंची गति में जाए माया एक बार ऐसा प्रश्न करती कि उसे गिरा देती ब्रह्मा जी भागवत में स्तुति में कहते हैं कि प्रभु हम तो आपके चरणों की शरण में हैं जो आपके चरणों
की शरण में नहीं हुए उनको ची ऊंची स्थितियों में जाकर गिरते हुए देखा है ज्ञाना अभिमान हों को तो औरों की तो बात जाने दो शिव बिरंचि का मोह को है ब पुराण बहुत विचित्र भगवान की माया है तभी बड़े-बड़े लोग कहते हैं बहुत दुर्लभ है भगवत प्राप्ति बहुत कठिन है भगवत प्राप्ति क्यों अब पूरे जीवन चित्त को संभालकर परमात्मा में स्थापित करना निर्विक करना निर्विकार होना अब निर्विकार य वचन सं सारिक आदमी क्या जाने सुन लिया बहुत है उस साधक से पूछो जो जल रहा है उसकी जलन को दूसरा क्या जाने प्यास लगी पानी
पी लिए भूख लगा भोजन पा लिया वेग आया जैसा जन इद्री रसेंद्र का वैसा निपट लिया उससे पूछो जो हर इंद्रियों के वेग को सह रहा है वो अंदर जो ताप है वही तपस्या है उसी तपस्या से भगवान जी जते और ये बाहरी तपस्या नहीं अंदर के ताप को जो सह जाता है हा ता स्त स्वभ संतों की जब आती कि संतों के लक्षणों की किन संतों के चरणों की शरण में जाने से या उनकी आ सक्ति से मोक्ष पदवी प्राप्त होती तो भगवान कपिल देव जी के तिति क्वा पहला कह रहे तिति क्वा काण
काहा सुदा सर्व देहि नाम पहला तिथ क्वा माने सहनशील हर विषय को सह गया मान अपमान निंदा स्थिति लाभ हान सुख दुख सबसे बहुत कठिन है बात करना अलग बात है कठिन है बिल्कुल अंदर कुछ भी फर्क नहीं पड़ना चाहिए ना हर्ष होना चाहिए ना शोक होना चाहिए समान भाव से निकलो खेल समझते हो इसे चाहे जितना दूसरे को उपदेश करे जब अपनी बात आती है ना तो स्थिति होगी तो आप डामाडोल नहीं होगे और स्थिति नहीं होगी तो थोड़ी देर में अपनी असलियत में आ जाओगे और लड़ने लगेगा या आपको प्रताड़ित करने लगेगा फेल
हो गया स्थिति नहीं है अंदर केवल बा हैं और स्थिति है तो बड़े से बड़े दुख में भी वो विचलित नहीं होगा बड़े से बड़ी परिस्थिति में विचलित नहीं य यही कठिन है बच्चा मां पिता भाई बंधु पत्नी पुत्र परिवार धन संपत्ति सबका प्यार बटोर के भगवान के चरणों में समर्पित करना कितना कठिन करके तो देखो जननी जनक बंद सुत दरा तन धन धाम शहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनही बांध बरटोरी बहुत कठिन है बहुत कठिन है मतलब हम तो तुम तो संसार में रह रहे हो तो तुम क्या जानो कि कठिन
किसे कहते हैं साधना साधक वही जान सकता है ऐसा संत वास्तविक जो मार्ग है या भक्ति का जो मार्ग है बहुत कठिन मार्ग है क्या कठिन सबसे प्यार हटाना है ब यही कठिन है भगवान तो अपने थे हैं रहेंगे वो तो आत्म स्वरूप है और है वो फिर भी हमारी दुर्गति रुक रही क्या यही छाती में है हृदय में सबके हृदय अत विकारी भजन निरंतर भगवत स्मृति अब ये करके देखो तोत बात बल जाए निरंतर भगवत हम कह रहे एक घंटा केवल हमको ऐसा दे कि कुछ और चिंतन नहीं हो पाएगा बस करके दिखाओ एक
घंटा केवल राधा राधा राधा राधा देख लो फिर कैसा मन तुमको जलाता है इतने में एक घंटे में ऐसा व्यतीत कर देगा कि यार बहुत ही कष्ट और पूरा जीवन साधु अर्पित करता है भगवान में बहुत कठिन है नहीं आप देखो ना हम आपको बताया ना सबका प्यार समेट बड़ा कठिन है देखो बाबा जी बन जाने पर देह का प्यार बना रहता है देह से प्यार थोड़ा कम होता है तो अहम स्थिति बड़ी जोर की हो जाती है साप वरदान क्रोध मान सम बहुत अंदर बच्चा पूरा साम्राज्य है जीतना है पूरा साधक जीवन भर लगा
रहता है इस पर विजय प्राप्त करने के लिए त्रिगुणात्मक माया पर विजय प्राप्त करके गुणात स्थिति प्राप्त करना बहुत कठिन हैय गुरु कृपा से भगवान की कृपा से और स्वयं की कृपा से स्वयं भी अपने ऊपर कृपा करे कि हमारा उद्धार हो जाए तब इस पर चला जा सकता है बहुत कठिन बच्चा चार कदम चलने के बाद सब मनोरंजन में लग जाते हैं बहुत चढ़ाई है लगने दे कहा कुछ मनोरंजन में जाते आ गया हा तो जो सुनेगा तो नारद सिख ज सुने नर नारी अवश भवन तज होए भिखारी आप सरि है सब की हमारी
बात सुनोगे तो ये तो काटे गी ही संसार के राग को जो सत्संग सर्व संगो प हिमाम सत्संग समस्त संगो से रहित करके भगवान की भक्ति में लगाता है तान यज्ञ ंदा से तीर्था नियमा यमा यथा वरुण संग सर्व संग प सत्संग समस्त संगो का त्याग कराकर भगवान से प्रीति करता है हा संसार से आंखें हटाकर नंद नंदन प्रिया जू से आखि बहुत बड़ी बात है बस बात बन गई मन आज्ञा पर चल गया फिर निकल जाएगा फिर कठिन नहीं रहती फिर तो रोज नया नया एक उत्साह नवम नवम उसी उत्साह में हर कष्ट सहता
हुआ आगे निकल जाता है चलो नाम जप करो ठीक है हां सुरवी मित्तल जी राजस्थान से श्री हरिवंश महाराज जी श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी आत्म चिंतन और आत्म सुधार क्यों आवश्यक है कैसे हम अपने जीवन को में आत्म चिंतन और आत्म सुधार कर सकते हैं आत्म सुधार आत्मा का कोई सुधार ये तो लौकिक शब्द है परमार्थिक शब्द नहीं आत्म सुधार परमार्थिक शब्द नहीं है क्योंकि आत्मा निर्विकार चैतन्य घन है उसमें सुधारने की कोई जरूरत ही नहीं सरल भाषा में स्वामी जी लिख रहे हैं ईश्वर अंश जीव अविनाशी
चेतन अमल अमल माने निर्विकार मल रहित चेतन अमल सहज सुख रासी उसका तो सुधार करना नहीं अब जो शब्द लौक शब्द कहा जाता आत्मा म लिया जाता है अंतःकरण से यहां जो लिया गया है वह अंतःकरण से लिया गया है कि आप अपने अंतःकरण का सुधार करो और आत्म चिंतन का तात्पर्य कि अंतःकरण में निरीक्षण करो कि आपका कितना सत चिंतन होता है कितना असत चिंतन होता है आत्मा का चिंतन नहीं होता अपने आप से अपने आप का व है चिंतन रहित हो जाना ही आत्मा का चिंतन है अंतःकरण की सामर्थ्य नहीं उसका चिंतन कर
सके वह अचिंत है तो अंतःकरण साक्षी जो है वह अपने आप से अपने आप का चिंतन है जो चिंतन रहित स्थिति उसे आत्म चिंतन कहते हैं किसका प्रश्न था अच्छा अब पता नहीं आप हमारी भाषा समझ पाओ अध्यात्मिक की गुण बात है तो जो यहां अंतःकरण के सुधार की बात कही गई आत्मा शब्द से बिल्कुल अलग क्षेत्र हो जाता है तो जो अंतःकरण के सुधार की बात कही गई है उसमें देखना चाहिए कि हमारा अंतःकरण कितना शास्त्र सम्मत चल रहा है क्योंकि अंतःकरण से ही स्फर होता संकल्प बनता है और उसी से सारी क्रियाएं होती
है तो तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित हो क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए यह शास्त्र आज्ञा करता है शास्त्र की बात नहीं समझ में आती तो संतों के मुख से सुन लो वो विधि निषेध का वर्णन करते हैं तो जो विधि है वो करना और जो निषेध है उसे ना करना यही आत्म निरीक्षण है और इसी आत्म निरीक्षण से भगवत चिंतन बनेगा और भगवान के मार्ग में अग्रसर हो पाएगा पथिक अगर वो गलत आचरण करता रहा तो अनुभव नहीं होगा फिर लोग कहते हैं हम 20 साल से भजन कर रहे हैं हमें
कुछ अनुभव नहीं हुआ तो चलनी में गैया द है और दोष दैव को दे गाय दहे चलनी में और कहे कि हमारे भाग्य में दूध नहीं लिखा तो भैया तू इतने छेद वाले पात्र में दूर आए कैसे बात बनेगी पहले छेद बंद कर या पात्र ऐसा ला तो ऐसे ही हम लोग जो गंदे आचरण कर देते हैं वो गंदे आचरण वाले छेद से हमारा भजन भगवत चिंतन सब वहीं से ब जाता है हमको अभ अनुभव नहीं हो पाता हमारी स्थिति ऊपर नहीं उठ पाती है तो हमें आत्म चिंतन का मतलब अंतःकरण का निरीक्षण करना चाहिए
कि हमारी बुद्धि में कहीं सांसारिक सुख की वजह से मन में कहीं सांसारिक सुख का संकल्प तो नहीं बन रहा और मन और बुद्धि की प्रेरणा से कहीं इंद्रिया गलत क्रियाओं में तो नहीं उतर रही इनका निरीक्षण करता रहे और शास्त्र सम्मत चलता रहे समझ पा रहे हैं आप सर शर्मा जी हिमाचल से राधे राधे महाराज जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा स्वभाव स्पष्ट वादी है अगर किसी की बात या कोई व्यवहार आचरण मुझे ठीक नहीं लगता तो उन्हें मैं प्रेम पूर्वक बोल देता हूं ऐसा करने पर कुछ लोग तो उसे
सहर्ष स्वीकार करते हैं परंतु कुछ लोग नहीं प्रणाम स्वरूप जो लोग उसे स्वीकार नहीं करते वो यहां तो बुरा मान जाते हैं या बातचीत करना बंद कर देते हैं कई बार इसके परिणाम स्वरूप माता-पिता भी रुष्ट हो जाते हैं और कहते हैं कि आपको सामाजिकता का ज्ञान नहीं है हां इस पर तर्क वितर्क होने लगता है फिर आहत होता है दिल ये उत्तम स्वभाव नहीं है पहली बात तो हमें सबके दोष देखने का अधिकार ही नहीं है गुरु को शिष्य के दोष देखने का अधिकार है माता-पिता को पुत्र के दोष और मित्र को मित्र के
जैसे आपका कोई मित्र है अब आप उससे बात करो व नाराज भी हो जाए तो दूसरे दिन फिर बैठेंगे एक जगह पास फिर समझाएंगे क्योंकि व मित्र हमारा और शास्त्र आज्ञा करता है कि कुपथ का सुपंथ चलावा मित्र का लक्षण है गंदे मार्ग से हटाकर अच्छे मार्ग में मित्र को चलाना शेष जब तक आपसे कोई ना पूछे तब तक नहीं बोलना चाहिए तेरे भावे जो करे भलो भुलो संसार नारायण तू बैठ के अपनान बार यदि वह गलत कर रहा हो आप गलत देख रहे हो तो खड़े तो दोनों है समय तो दोनों का बर्बाद हो
रहा है एक गलत कर रहा है और एक गलत देख रहा है यह आदमी दोषी है यह पापी है नीच है तो जो उसकी होगी वही गति उसकी होगी क्योंकि समय तो दोनों का एक ही काम में जा रहा है ना एक गलत कर रहा है और एक गलत देख रहा है और एक गलत कह रहा है उसी का वर्णन कर रहा है तो आप भगवान से विमुख है हा अधिकार जहां है वहां छूट है जैसे शिष्य है तो शिष्य के आ चरणों का चिंतन करना होगा देखना होगा क्योंकि व गुरु बनाया है गलत है
तो उसको बोलना होगा कि आपको कोई गलत कर रहे हो अगर आप ऐसा करोगे तो यह दंड विधान है क्योंकि उसको समझाना ऐसे माता-पिता है उसका अधिकार अपने पुत्र के दोषों को देखना और उनको दूर करना ऐसे मित्र है वो हमेशा क्रोधित रहते हैं और मतलब पिताजी माताजी बहुत कुछ बोल देते हैं मैं कई बार तो नहीं सोचता लेकिन कई बार तर्क वितक होता है तो बहुत आहत हो जाते हैं मैं क्षमा मांग लेता हूं नहीं आप तर्क वितर्क क्यों करते हैं क्या यही विद्या है विद्या विनयम ददाति अपने बड़ों से तर्क वितर्क नहीं करते
अपने बड़े अगर हमें उपदेश कर देते हैं और हमें लगता है इनका उपदेश गलत है तो मनम क्योंकि हमें चलना अपने दिमाग से है आप उपदेश कर रहे हैं मैं गलत हूं आगे सुधार करेंगे या वोह गलत है नहीं समझ पा रहे तो हम मौन तर्क वितर्क करना तो बिल्कुल खराब है माता-पिता गुरु से तर्क वितर्क थोड़ी किया जाता है तो उनकी आज्ञा मान लेनी चाहिए जैसे भी वो कहे आज्ञा पर विचार करना होगा हम बोलने पर मना कर रहे हैं आज्ञा पर कुछ ऐसे माता-पिता हैं ऐसे गंदे आचरण की तरफ गंदे भाव ऐसे माता-पिता
के वचन नहीं मानते चाए लेकिन वो तो अच्छे भाव करते हैं लेकिन आजकल और उनकी सोच और हमारी सोच में थोड़ा अंतर तुम्हारी दोनों की सोच में शास्त्र अगर प्रमाणित है तो माना जाएगा किसकी सोच सही है अपनी सोच नहीं तस्मा शास्त्रम प्रमाणम थे शास्त्र और संतों से प्रमाणित सोच को ही सही सोच कहते हैं नहीं तो मन में तो बहुत सी स्फना उठती रहती है तो फिर उनका निर्णय करना होगा उसमें मन में कभी क्रोध भी आ जाता है और वाणी से कुछ गलती से गलत निकल जाता है तो उसको कैसे नियंत्रित करें कि
वो क्षणिक होता है मैं क्षमा मांग लेता हूं बिल्कुल ठीक बात है लेकिन हमको पहली बात ये ध्यान रखनी कि पूज्य जनों से वार्तालाप हमको तर्क वितर्क वाला नहीं करना पहली बात स्वीकार करो यदि आप इससे बचना चाहते हो अगर हम भूल से ऐसा तर्क कर देते हैं तो उनकी दी हुई उत्तर पर हमें क्रोध नहीं करना ये हमें सोचना होगा कि मुझे क्रोध नहीं करना जब क्रोध आवे तो दांती पीस लो मौन हो जाओ नहीं बोलना और वाणी भी थोड़ी गलत निकल जाती कई बार अभी तो बुद्धि काम कर रही तो आप अपनी गलतियों
को देख पा रहे हैं तो वाणी को भी समा वाणी एक अमूल है जो कोई बोले जान हे तराजू तोल के तब मुख बाहरान अपने बात कहने के पहले सोचना है कि यह बात हितकर है शास्त्र सम्मत है दूसरों को सुख प्रदान करेगी तो बोला नहीं तो अंदर ही दबा के चुप हो गए शांत एकम सुशील कुमार गुप्ता जी राधा वल्लभ श्री महाराज जी आपकी कांतिक वार्तालाप में सुना था कि जब तक खुद को भगवत साक्षात्कार ना हो जाए तब तक किसी दूसरे को अपनी स्थिति नहीं बतला चाहिए या उप वर्तमान की स्थिति अगर बता
दी जाए तो बंद हो जाती है ये निज अनुभव की बात है और बहुत से संतों के अनुभव की बात है हा अभी वर्तमान में जो चल रहा है हमारे जीवन में वो हम किसी से नहीं कहेंगे जो आज है कल जो हमें अनुभव हुआ है वो हम किसी को प्रोत्साहन देने के लिए सत मार्ग के लिए बता सकते हैं लेकिन आज जो चल रहा है अभी नहीं बताएंगे आज अभी क्या स्थिति नहीं बताए और कभी अगर धोखे से निकल गई तो उसमें विघ्न पड़ जाता है ये हम खुद अनुभव किया है और जो अच्छे
साधक हैं वो इस बात का अनुभव करेंगे कि अपने अनुभव की बात बताते ही व अनुभव भी गायब और वह साधना भी गायब हो जाती है इसलिए वर्तमान की साधना को छुपा के रखें किसी को बताए नहीं अगर कभी बताना हो तो उदाहरण में बताए कि हमने संतोष से ऐसा सुना था कि ऐसे ऐसे अपनी ना आ जाए बात तो यह चीज ध्यान रखना चाहिए साधक को वर्तमान की स्थिति का वर्णन नहीं करना चाहिए अपनी जो भूत है बीता हुआ उसको उदाहरण में पेश कर देने से कोई हानि नहीं होती लेकिन वर्तमान की स्थिति नहीं
बतानी चाहिए तो क्या महाराज जी इसमें भी निषेध है कि हम अपने प्रियजनों को या भगवत प्रेमी को आपके या आपसे जितना भी जाना श्री राधा नाम की महिमा के बारे में बता सकते नहीं उसकी चर्चा तो करना चाहिए भगवान ने आदेश किया है मत चित्ता मद गत प्राणा बोध अंता परस्पर कथं मा नित्यम तुष्यंति चरमंत च कि हमने महाराज जी से सुना है कि व ऐसा कह रहे थे राधा नाम की ऐसी ऐसी महिमा जपने से ऐसा मैंने सुना था मैं राधा नाम कितना जपता हूं मुझे क्या अनुभव हो रहा है यह नहीं बताना
महाराज जी से सुना था कि ऐसा ऐसा ऐसा रात दिन चर्चा करो कोई परेशानी नहीं अपनी बात नहीं आनी चाहिए कि मैंने राधा नाम जप किया मुझे अनुभव हुआ ये फिर वो रुक जाएगा फिर उस परे गुप्त रखना है फिर आपसे कोई पूछे कि आप राधा नाम जब आपको कुछ जप रहे हैं कैसा क्या जप रहे हैं मा संतों की कृपा जो भी हो जाए ऐसे क्या हम क्या बताए हम तो अभी शुरुआत भी नहीं हुई ऐसे चलना चाहिए भजन को छुपाना चाहिए छपा नहीं चाहिए छुपाना चाहिए हम लोग छपा में ज्यादा आनंदित होते हैं
नहीं कुछ बातें तो ऐसी होनी चाहिए जो पर्सनल होनी चाहिए ठाकुर जी का प्यार ठाकुर जी को भोग लगा रहे ठाकुर जी का दुलार ये पर्सनल होना चाहिए उसको तो छुपा इसीलिए भजन करना कठिन करके बचाना कठिन और बचा के पचा कठिन और जिसका भजन पच गया वही सिद्ध हो गया तो भजन को छुपाओ और परस्पर बोध अंता भगवान की चर्चा संतों के मुख से जो सुनी है वह चर्चाएं करो मंगलमय रहेगा अपने अनुभवों को छुपा ले मैं पढ़ाई के साथ क्या और कर सकती हूं जो कि ये धार्मिक मार्ग में आगे जाना है खाली
नाम जाप नाम जाप को आप खाली मत समझिए जो राम नहीं कह पाते थे ना मरा मरा जपे तो ब्रह्म ऋषि हो गए बच्चा कक्षा नौ पढ़े गांव वाले कक्षा छह से ए बी सीडी शुरू होती है गांव की पढ़ाई में और नौ तक पढ़े हैं नौ तक क्या पढ़ाई होती है व आप प्रश्न उत्तर यहां कर ही रहे नाम खाली नहीं है नाम में इतना कुछ भरा है कि सुमिर पवन सुत पावन नामु अपने बस करि राख राम भगवान को अधीन कर लिया तो सारी विद्या सारी कलाएं सब भगवान में विराजमान है अगर नाम
जप करोगे और पढ़ाई करोगी और पवित्र आचरण से रहोगी तो जिस उन्नति में जाना चाहोगी पहुंच जाओगी आज हमारे देश देश की राष्ट्रपति कौन है नहीं जानती हो हां तो ऐसा नहीं कि माताएं बहने उन्नति नहीं कर सकती अब वो हम ऐसी तैयारी करें कि हम अपने राष्ट्र की सेवा में आए समाज की सेवा में आए एक सांसारिक जीवन जी कर के कीड़े मकू की तरह मर जाना यार मनुष्य जीवन की मानता क्या रही चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष कौन नहीं जानता मीरा जी को अगर भक्ति में उतरी तो पूरा विश्व जानता है और नमस्कार
करता है उनके पावन चरणों में यह नहीं है किसी भी मार्ग में हम जाएंगे और पवित्र है नाम जप करते हैं और उद्देश्य को बिल्कुल पहचानने वाले हैं तो कहीं भी चले जाओ कहीं भी आज हमारे देश की रक्षा में भी बहने खड़ी हैं नहीं खड़ी संगीन लिए हुए खड़ी हैं जहां एक सेकंड में खोपड़ी उड़ा दी जाएगी और एक सेकंड में खोपड़ी उड़ानी पड़ेगी ऐसी स्थिति में तो क्या क्या कमी है हमारा दिमाग इतना प्रवीण हो सब बात बन जाएग उसको दिमाग को प्रवीण करने के लिए भगवत च जिनका प्रवीण है और भजन नहीं
कर रहे तो पूर्व में उन्होंने तप किया है दान किया है पुण्य किया है उसके बल से अभी है लेकिन आगे फिर जीरो है ये पुरानी खेती है और जो आज नाम जप कर रहे हैं धर्म से चल रहे हैं कष्ट पा रहे हैं इनकी यह खेती बहुत जोर की पीछे वाली गड़बड़ थी जो अभी उनको परेशान कर रही लेकिन आगे चलकर उनका बहुत सुंदर जीवन होगा इसलिए नाम जप को ना समझे कि क्या हो जाएगा और कोई धार्मिक प्रवृत्ति नाम जप मात्र से सब कुछ हो जाएगा खूब पढ़ाई को भी भगवान की पूजा समझो
पवित्र जिंदगी जीना सीखो ये जो आजकल चला है गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड इसमें ना फसे अगर यहां कोई भी बच्चा हमारी बात माने तो इसमें ना फसे जब तक हमारा लक्ष्य ना बन जाए लक्ष्य की प्राप्ति ना हो तब तक विषय सेवन ना करें और फिर किसी माता-पिता परिवार की सलाह से उचित वर का वर्ण करके गृहस्थ धर्म में चला जाए जैसे हमारी भारत की पद्धति है यह दलित दुरा पवित्रता ना जीवन में आवे नहीं बहुत खतरा है बच्चा इसमें मतलब एक बार गलती करके आप किसी बॉयफ्रेंड से संग कर लिए अब वो आपको अगर दुष्ट स्वभाव
वाला है तो ब्लैकमेल करेगा अपवित्र आचरण करके सुखी कैसे कोई हो सकता है और नए-नए बच्चों में बहुत आज के जो वातावरण में यह बहुत गंदगी फैल रही इसलिए जो भाई बहन हमारे पास आए हमारी प्रार्थना है कि आप जब तक माता-पिता की सहमति ना हो तब तक किसी पुरुष का संग ना करें क्योंकि माता-पिता जैसा दोस्त कोई नहीं होता वह सही निर्णय बताएंगे हमारा यदि कोई दोस्त बन रहा है तो अपने माता-पिता से मिलाए और उनकी अनुमति लेकर जब पानी ग्रहण हो जाए तभी संग करें नहीं संग ना करें दोस्ती कर लो कोई परेशानी
नहीं दोस्त तो स्कूल में बच्चे बच्चियां खेलो को तो लेकिन संग ना करें संग का मतलब गंदी वृत्ति को ना धारण करें वो तभी स्वीकार करें जब पानी ग्रहण हो जाए गृहस्थी में जाए माता-पिता का अगर आशीर्वाद पहले तो देवी देवता ग्राम देवता सबकी पूजा होती थी अब अब कहां बुद्धि रह गई देवी देवता ग्राम देवता पूजा और सर नहीं है पहले ही जब गंदी बातें हो रही बहुत गलत य हमारे भारत देश की परिपाटी नहीं है इसलिए हमारी प्रार्थना चरित्र पवित्र रखना नाम जप करना पढ़ाई को अपनी पूजा मानना फिर आप आगे बढ़कर देख
लेना कि उन्नति कैसे होती है चरित्रहीन हमारे यहां पूजन नहीं होता पुस्त कुल में जन्मा था रावण उत्तम कुल कुलस्ते चरित्रहीन होने के कारण राक्षस कहा गया ब्रह्म ऋषि की संतान है ब्राह्मण है कोई साधारण नहीं है और बस आचरण बिगर गए तो राक्षस कहा गया इसलिए आचरण हम चरित्र अगर बिगड़ गया तो हमें बनारस में एक बार एक संत से मिलाने गए तो जजज थे बहुत ऊंची स्थिति उनकी थी ऐसे जोर से हाथ पकड़ा उस समय नवीन अवस्था थी तो हमें अंग्रेजी नहीं आती क्योंकि गांव के पड़े तो उन्होंने कहा था मतलब हिंदी में
उसका अर्थ हमको दूसरे ने बताया था व गुड करैक्टर मतलब अच्छा चरित्र और अंग्रेजी में कुछ बोला था उन्होंने कि जिसका करैक्टर सही है वही हमारे यहां बंदनी और पूजनीय होता है कभी टूटना नहीं तुम्हारा चरित्र नहीं बिगड़ना चाहिए उन्होंने शिक्षा दी थी तुम्हारा चरित्र नहीं बिगड़ना चाहिए तो गुरुजनों की कृपा से जीवन में बात ध्यान रखी कि चरित्र नहीं बिगड़ना चाहिए चरित हमारे यहां राम चरित गाया जाता है क्यों क्योंकि भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम इतना भी कभी धर्म विरुद्ध नहीं नहीं तो भगवान शिव का अनन्य उपासक रावण है आज भी कहीं अभिषेक होगा तो उसका
लिखित तांडव गाया जाएगा जटा टवी गल ज्वल प्रवाह पावितस्थले गले लंब लंब ताम भुजंग तुंग माल ऐसा थोड़ी जैसे झूला झुलाया जाता है ऐसे महा देव और पार्वती जी को बसों बार अपनी भुजाओं पर उठाकर ऐसे झुलाया है कोई साधारण थोड़ी था लेकिन चरित्र बिगड़ गया चरित्र बगड़ दूसरे की तरफ गंदी दृष्टि रखने वाला रावण वो मार के भगवान ने उसको फेंक दिया खोपड़ी पर बंदर लात मारते थे जैसे फुटबॉल में मला तो मंदोदरी देख के कहा राम विमुख हस हाल तुहारा रहा ल को कुल रोवल हारा इसलिए सबको चरित्र पर ध्यान देना चाहिए चरित्र
पवित्र हो और नाम जब चल रहा हो अपने कर्तव्य को पूजा समझो चाहे वो किसानी हो चाहे व्यापार हो चाहे नौकरी हो चाहे राष्ट्र सेवा हो जो अपना कर्तव्य भगवान ने दिया व हमारी पूजा है हम अगरबत्ती लगावे धूपबत्ती लगावे या ना लगावे हम अपनी पूजा में अगर सत्य में है तो भगवान उसी से प्रसन्न हो जाएंगे अब इधर अगरबत्ती लगाकर उधर जाकर बेईमानी करो तो अगरबत्ती के धुआ से भगवान थोड़ी प्रसन्न हो जाएंगे तो ये बात है राधे राधे महाराज जी गुरु जी मुझे झूठ बोलने की बुरी आदत है मैंने बचपन से झूठ का
सहारा लिया चाहे बात छोटी हो या बड़ी काफी सफाई से झूठ बोल लेता हूं और फिर अपने आप पर गर्व करता हूं मुझे लगता है कि जब झूठ बोलने से आसानी से काम हो जाता तो सच क्यों बोलना खुद को बचाने के लिए लोगों को नहीं नहीं गलत बात है गलत बात से कभी अच्छी बात नहीं होती है दो चार जगह हैं जहां झूठ बोल देना चाहिए आपके झूठ बोलने से किसी की जान बच रही आप बचा लीजिए आपके झूठ बोलने से किसी का जीवन यापन बहुत जोर का हो जाएगा झूठ बोल देते हैं आपके
झूठ बोलने से किसी कन्या का व्याह हो जाता है हम झूठ बोल देते हैं दो तीन चार जगह ऐसी जगह हैं जहां झूठ बोलने से पाप नहीं लगता है लेकिन हर समय झूठ बोलना तो नहीं असत्य संपादक पंजा य पाप भी है झूठ बोलना पाप है बहुत जगह से दोहा चौपाइयों में पाया जाता है साच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप जा के हृदय साच है ता के हृदय आप कबीर दास जी का कई महापुरुषों ने कहा तो जहां तक हमें बने तो सत्य वचन के द्वारा हम बात करें झूठ क्यों बोले बेमतलब झूठ बोल
देते हैं और उसको सोचते हैं कि हम बहुत सफाई से जैसे निकल गए तो तुम्हारा मन तो गंदा हो रहा है अच्छा यह गंदा मन दूसरों को सफाई की बात करके तो निकल गए अब तुमको ऐसी जगह फसाए जहां से तुम फिर निकल नहीं पाओगे क्योंकि झूठ बोलने से मन मलिन होता है कलयुग युग का उसके ऊपर विशेष आक्रमण होता है जो झूठ बोलता है झूठ ही लेना झूठ ही देना झूठ ही भोजन झूठ च बेना श्री तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा कलि का प्रभाव बढ़ेगा तो कोशिश करो हम ये नहीं कह रहे
आज से सत्यवादी हरिश्चंद्र बन जाओ कोशिश करो कि आपके द्वारा व्यर्थ वाला झूठ ना बोला जाए कहां हो तो अगर हम वृंदावन बता देते हैं तो हमारी कोई हानि नहीं हो जाएगी जो सत्य बात है वह कोशिश करें हम जैसे कई लोगों ने कहा कि हम तो व्यापार में झूठ बोलना ही पड़ेगा मुझे लगता है नहीं जैसे आप कपड़े का व्यापार करते हो या कोई भी व्यापार करते हो तो सब कोई जानता है मुनाफा लेने के लिए व्यापार करता कोई किसी का नौकर नहीं है उसके भी परिवार है खर्चा है अब आप यह झूठ क्यों
बोलते हो कि से कहते हैं ये 00 का पड़ता है आपको 00 का दे देंगे क्यों झूठ बोल रहे हो 120 मीटर देंगे बस आपको लेना है लीजिए आपको नहीं लेना चले जाइए सही ठोस बात रखोगे ना कपड़ा सही और उसका मुनाफा लेकर दाम सही तो लोग धीरे-धीरे समझ जाएंगे कि अब कसम खाके आपने कह दिया कि 00 का पड़ता है आपको दे देंगे ऐसा कैसे झूठ बोल दिया अब वही उसके लिए अपराध बन गया और व जानता नहीं आप फिक्स रखिए सब कोई जानता मुनाफे के लिए व्यापार होता है तो झूठ बोलना जरूरी थोड़ी
है नहीं बिल्कुल करेक्ट दाम रखिए उसमें अपना मुनाफा जोड़कर और देन हार भगवान है जब आप सत्य पर चलोगे तो भगवान अपने आप व्यवस्था कर देते हैं प्रयास अपना होता है व्यवस्था भगवान की होती है तो हमें लगता है बच्चा झूठ तो नहीं बोलना चाहिए प्रयास करें धीरे-धीरे अभ्यास करें कि हम झूठ ना बोले अब कई लोगों को मोबाइल झूठ बोलवा है हेलो कहां हो बोले इस समय तो हम आगरे में है बगल वाले घर में आज तो नहीं मिल पाएंगे आगरे में है हम थोड़ा दूर है ऐ झूठ क्यों बोल दिया भैया हमें नहीं
मिलना अभी अभी हमें नहीं मिलना खत्म खेल हम झूठ क्यों बोलेंगे हम आगरे में ऐसे तो बहुत से ऐसे झूठ है जो व्यर्थ के हैं जिनको अगर हम सत्य बोले तो हमारी कोई हानि नहीं है उसमें वैसे सत्य बोलने से हा है भी नहीं अगर हम गलत किए हैं हम सत्य बोल देंगे तो हमारा सुधार हो जाएगा हमें दंड मिलेगा हम पवित्र हो जाएंगे हमारी गंदी आदत छूट जाएंगी हम गंदी आदतों को बहुत सजाकर सत्य बोल कर के और निकल जाते हैं तो वो निकल नहीं गए वो कर्म फसाए का कहीं ना कहीं क्योंकि वो
बचा हुआ है और जैसे गलती हुई हमने स्वीकार कर ली हमसे गलती हो गई अ वो गाली दे या हमें अपमानित करें तो हमारे कर्म का फल हो गया और आगे से हम गलती करेंगे नहीं तो सत्य भगवान का स्वरूप है सच्चिदानंद रूपए तो हमें लगता है बच्चा झूठ नहीं बोलना चाहिए अभी कहीं न कहीं आपकी बुद्धि शुद्ध है जिससे आप अपने दोष को पकड़ पा रहे हैं और तो उसको छोड़ भी दीजिए जिस दोष को हमने अपने अंदर पकड़ा उसे धीरे-धीरे छोड़ देते हैं अभ्यास करते हैं सत्य बोलने का सही बोलने का तो भगवान
आपको बल देंगे ठीक है और थोड़ा नाम जप कर लीजिएगा नाम जप करते हैं यह भी तो झूठ नहीं बोल रहे हा कितने मिनट करते 5000 बहुत सुंदर धन्यवाद और बढ़ाते रहिएगा आगे ठीक है आजकल काउंटर चला है बहुत अच्छा उसमें मन लग जाएगा अधिक से अधिक संख्या में नाम जपने का उसमें बहुत चाव बढ़ता है वाहेगुरु का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह बहुत कृपा बहुत कृपा लाओ श्री जी की कुछ प्रसादी वस्त्र बहुत दिनों बाद दर्शन दिए आकर के न राधे राम ये वाली पंक्ति गुरु नानक देव जी ने वृंदावन में उरण की थी
गुरुद्वारा से वहा एक महीना रते महाराज वृंदावन में तो यहां पे राम लीला का था जो महाराज ने कहा था कि असली में जो है अंदर म अंदर में मन में राम जी की लीला करो ये बाहर के तमाशे ऐसे भगवान ु करने से खुश नहीं होंगी अंदर से अंदर के भाव से खश बकल अगर अंदर का भाव नहीं है ना तो बाहर से सुख नहीं मिल पाएगा बाहर के लिए तो बात तो देखो जो हम बाह पूजा करते हैं उसका फल होता है अंतर में घुसना अंत मुख होना हा ये जितनी भी बाह सेवा
पूजा तीर्थ टन इसीलिए गुरु नानक साहब की वाणी में बाह का महत्व नहीं है बाह का नहीं कि आप जट्टा रखा लिए आप लंगोटी पहन लिए आप यह कर लिए अंदर से आप शून्य हो भजन नहीं है परमात्मा का निरंतर चिंतन नहीं है खास वास पकड़ कर के गुरुवाणी जी कहते हैं अंदर का चिंतन आपका क्या है जी महाराज आप मान लो बाहर से छवि पूज रहे हो मूर्ति पूज रहे हो और अंदर परमात्मा को नहीं देख रहे हो किसी के तो फिर इसके बाद मनमानी पापा आचरण करो तो पूजा से मतलब क्या रह गया
है ना अगर बाह पूजा को आप केवल भगवान मानते हो और अंदर आप अपने भगवान नहीं दे दूसरों के नहीं देखे तो आपका व्यवहार गलत होगा तो बाह पूजा का क्या फल मिला वाह पूजा का फल है अंतर्मुखी अंतर में परमात्मा चिंतन करते हुए सम में परमात्मा का दर्शन करना यह सबसे बड़ी पूजा है तो ये तो प्रारंभिक पूजा होती जैसे बाहर की पूजा है बाहर की यह सब बातें हैं उसका फल होता है अंतर्मुखी म ब्रह्म ज्ञान क्या होता है कैसे प्राप्त होएगा जी प्र करव हा इ तीनों बातों को तो दो मिनट बैठ
जा फिर हा बैठ जा बैठ जा ब्रह्म ज्ञान आत्म स्वरूप जो अपनी आत्मा है जो मैं हूं यह तो है नहीं यह तो ढांचा पांच भौतिक है यह ब्रह्म ज्ञान में इसका त्याग किया गया है शरीर का राग त्याग किया गया है और मन और इंद्रियों के जो भोग हैं वो मेरे नहीं है मन और इंद्रियों के हैं एक है यह स्थूल शरीर और एक है सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म शरीर का अनुभव होता है जब स्थूल शरीर सोया होता है और स्वप्न में जो शरीर होता है स्वप्न वो केवल सूक्ष्म शरीर होता है उसमें हम देखते
हैं कि अच्छा बुरा मारपीट सुख दुख लेकिन यह स्थूल शरीर तो सैया में आराम से सोया होता है लेकिन स्वप्न में जो सुख दुख का अनुभव होता है वो होता है सूक्ष्म शरीर से और फिर है कारण शरीर कारण शरीर का अनुभव होता है जैसे हम खूब नींद में सो गए गाढ़ फिर हमें आया कि आज पाच घंटे में बहुत सोए पाच घंटे बहुत सोए तो जो आत्मा साक्षी है वो उसको अनुभव करा रहा है तो स्थूल सूक्ष्म कारण स्थूल जागृत अवस्था ये सूक्ष्म स्वप्ना अवस्था कारण सुषुप्ति अवस्था और जो तीनों को जानता है साक्षी
जीहा परमेश्वर वही आत्मा स्वरूप है और उसको अनुभव करना है ये तो बात हो गई उसकी इन तीनों शरीरों से रहित होकर उसका अनुभव करना है ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना और उसके अनुभव की स्थिति में पहुंचने के लिए गुरु कृपा अत्यंत अनिवार्य है क्योंकि इस शरीर से राग छोड़ना बहुत कठिन है नंद होता है वहां आनंद नहीं परमानंद मतलब परमानंद अगाध आनंद अखंड आनंद अन नंद हां तभी तो बड़े-बड़े संत महात्माओं को बड़े गुरुजनों को इतना जब कष्ट दिया गया तब भी मुस्कुरा के बोले तेरा किया लागे वाहेगुरु का हर विधान सर माथे परमानंद में
तो स्थूल शरीर को कष्ट दिया जा रहा है क्योंकि और कर्म के अनुसार है नहीं जी महाराजय कर्म साधारण प्राणियों के शरीर पर होता है समर्थ पुरुषों में नहीं समर्थ पुरुष य दिखाए कि हम धर्म के लिए अपने शरीर को सहित करते हैं धर्म के लिए तेग बहादुर सिंह जी ने जो इतनी सामर्थ्य रखते थे उनके शिष्य जन कि अधर्म हों को दंड देने में पूर्ण समर्थ थे तो नजदीक बुलाया और स्पर्श किया और सारी शक्ति ले ली क आप करके दिखाओ तो ऐसे बोले न सहना है अजार को जरना है हा हमको यह दिखाना
है कि हम अपने धर्म के लिए प्राणों की बाजी लगा सकते हैं और गर्दन कट आदी और इतने सामर्थ्य शली थे तन से भी मन से भी और स्वरूप से भी कि अगर व एक संकल्प कर लेते तो विधर्मी सब मर जाते सब नष्ट हो जाते हा तो हमारे गुरुजनों ने उसी स्वरूप में स्थित होकर स्वरूप में कष्ट नहीं है देह में कष्ट है तभी वह कह रहे तेरा किया मीठा लागे नहीं तो देह जल रही है तो फिर ताप तो लगे ना लेकिन हा जो आत्मा है नैनम छिंदंति स प्राण नयनम दहति पाव का
न चन क्लेंप न शति मारुता अग्नि उसे जला नहीं सकती कोई अस्त्र उसे छेद नहीं सकता वायु उसको जखा नहीं सकती जल उसे डुबो नहीं सकता वो ऐसा आत्मा है परमात्मा आप भेजता है साधु को दुनिया केलेली जी जी वो परमात्मा स्वरूप ही होते हैं जैसे ये गुरुजन है अपने हा तो सब परमात्मा स्वरूप ही है साक्षात परमात्मा ही आए थे और थोड़ी मान लो जैसे गुरु अर्जुन देव जी है कितना कष्ट सहते हुए भी अपने धर्म ये जीव थोड़ी है ये मनुष्य थोड़ी है ये मनुष्य रूप में परमात्मा है स्वयं परमात्मा विराजमान है यह
दश योग जो गुरु है ना ये स्वयं परमात्मा है कितनी छोटी अवस्था में सबके रोग को लेकर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया रोग उस समय जो फैला हुआ था दाने वा गुरु ह कृष्ण हां तो हां तो अपने प्राणों की बलिदान कर दिया गुरु बहुत छोटी अवस्था आ साल की उम्र थी मराज हा साल की ये सब आत्मा स्वरूप है हा ये शरीर से ये ब्रह्म ज्ञान प्राप्त ब्रह्म ज्ञान का संबंध जो होता है उम्र से नहीं होता नहीं नहीं नहीं ये तो बचपन में हो सकता है जवानी में भी बुढ़े में हा श्री
सुखदेव जी 16 वर्ष की अवस्था के है लेकिन ब्रह्म ज्ञान संपन्न तो हजार हजार वर्ष की आयु के महात्मा खड़े होकर हाथ जोड़कर उनको प्रणाम करते हैं तो इसका अवस्था से कोई लेला दिलाए थोड़ा सा डस है महाराज जी का सुब कुछ प्रसाद दे सबसे प तो हमको इतना सुख मिलता है आप दर्शन से जैसे गुरुजन के पार्षद आते हैं ना तो हमें बहुत सुख मिलता है