जब तक संतोष रूपी धन नहीं आता तब तक वह निर्धन ही रहता है। कामनाओं का जाल बिछा रहता है। बिन संतोष सबूरी संतोष को बिन संतोष न काम न साही अछत काम सुख सपनो नाही प्रेम नगर में रहन हमारी भली बनी आई सबूरी में हाथ में कूड़ी बगल में सोटा चारों दिशा जागीरी में मन मन लागो मेरो यार फकीरी में आखिर ये तन खाक मिलेगा कहां फिरत मगरूरी में कहत कबीर सुनो भाई साधु साहब मिलत सबूरी में मन लागो मेरो यार फकीरी में जो सुख पावा नाम भजन में वो सुख ना ही अमीरी में मन
लागो मेरो यार फकीरी में गुरु गोविंद दो खड़े का के लागू पाए तो बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो मिलाए गुरु और गोविंद भगवान दोनों खड़े पहले किसको प्रणाम करूं? बोले गुरुदेव को। क्योंकि गुरुदेव ने ही गोविंद का दर्शन कराया। गोविंद का परिचय बताया। सब धरती कागज करूं लेखनी सब बनराए। सात समुद्र की मस करूं गुरु गुण लिखा ना जाए। यदि पूरी पृथ्वी को कागज बना दूं। वृक्षों को कलम बना दूं। सब समुद्रों की स्याही बनाकर निरंतर गुरु महिमा लिखूं तो भी गुरु की कृपा गुरु की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। कबीर ते नर
अंध हैं गुरु को कहते और कबीर दास जी कह रहे बड़े अंधे हैं जो अपने गुरु को इष्ट ना मानकर कुछ और कहते हैं। हरि रूठे गुरु ठोर है। गुरु रूठे नहीं ठोर। यदि भगवान नाराज हो जाए तो गुरु के चरण पकड़ लो। कुछ नहीं बिगड़ेगा। अगर गुरु नाराज हो गए भगवान के चरण पकड़ लो तो कुछ नहीं बनेगा। कबीर ते नर अंध है गुरु को कहते और हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नहीं ठोर गुरु बड़े गोविंद ते मन में देखो विचार हरि सुमिरे सो बार है गुरु सुमरे सो पार बड़ी गढ़ बात
कह रहे हैं कि गुरुदेव गोविंद से भी बड़े हैं गोविंद तो थे ही बराबर अनंत जन्मों में क्या बना दिया अंदर बैठे बैठे सब देखते रहे हमारी दुर्गति लेकिन गोविंद ने जब गुरु रूप धारण किया तो अब हमारा परम उद्धार निश्चित हो गया इसलिए चाहे शास्त्रों बार हरी हरी करे अगर गुरु की शरण नहीं गुरु से विरोध गुरु की अवहेलना तो डूबेगा अगर गुरु की कृपा हो गई तो एक ही बार में बेड़ा पार हो जाएगा इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी जाएगी ये तन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान शीश दिए जो
गुरु मिले तो भी सस्ता जान बोले शरीर क्या है विषय भोग की मल मूत्र की पोटरी अगर शीश मांग ले गुरुदेव और गुरुदेव मिल जाए तो शीश काट के दे दे गुरुदेव की प्राप्ति के लिए जाका गुरु है आंधरा चेला निपट निरंध अंध अंधे अंधा ठेलिया दो कूप परंत बहुत संभाल के गुरु कीजिए जान के खूब पहचानो पहले तब गुरुदेव का वरण करो जब वरण कर लो तो फिर किसी की मत सुनो गुरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः बोले अगर गुरु को ज्ञान नहीं है परमार्थ का जैसे पीछे श्री तुकाराम जी कह रहे
थे कि सब पेट भरने का धंधा है यदि हरि की प्रीति नहीं हरि का निरंतर जप नहीं भजन नहीं केवल स्वांग बनाया इस बात के लिए रुपया पैसा इसके लिए तो कह रहे हैं जाका गुरु है आंधरा आंधरा उसने भगवत तत्व का बोध नहीं किया भगवत दर्शन नहीं किए तो क्या मतलब बोले चेला निपट निर ऐसे को जो गुरु बनाया तो अंधों में अंधा वो है और अंधे का हाथ पकड़ के अंधा चलता है तो कहां गिरते हैं दोनों बोले दोनों नरक जाएंगे हरे शिष्य धन सोक न हरई सो गुरु घोर नरक मह पर बहुत
विचित्र है। अरे नाथ का नाम जब तक नहीं जपेगा निरंतर भजन नहीं करेगा फिर तो तुम तो रुपए का बढ़ावा देकर कोई पाप आचरण कर रुपया दे परमप चला जाएगा। क्या बकवास? अंधे अंधा ठेिया दो कूप परंत समदृष्टि सद्गुरु किया तो मेटा भरम विकार जहां देखो ता एक ही अब साहब का दीदार ये है गुरु का कृपा स्वरूप जहां देखो ता एक ही साहब का दीदार कबीर जोगी जगत गुरु तज जगत की आस और जो जग की आशा करे तो जग गुरु जोगी दास जब तक जगत की आशा नहीं तो हर संत जगतगुरु है और
जब आशा जग की भई तो जग गुरु जोगी दास ऐसा देखा है इसलिए बहुत सावधान राम नाम निज औषधि सद्गुरु द बताए औषधि खाए अरु पथ रहे ताका वेदन जाए जितने भी रोग हैं काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर सब नष्ट हो जाएंगे जो गुरु ने नाम दिया है और जो परहेज बताया है यह नहीं करना यह नहीं करना वैसे चलो पक्का निरोग हो जाओगे सपने में बराई के जब धोखे निक नाम स्वप्न में ऐसे निकल गया नाम वाके पग की पैतरी मेरे तन की चाम ओ की पग तली और मेरे तन की चाम कबीर
साहब कह रहे नाम जपत कुष्टि भला चुई परे जो चाम कंचन देके काम की जा मुख नाही नाम अच्छा है शरीर कुरूप है रोग युक्त है लेकिन नाम जप कर रहा है तो धन्य है उसका जीवन बड़ा रूपवान है। बड़ा धनवान नाम जप नहीं कर रहा तो नरक जाएगा। किस काम का उसका रूप और संसार का ये वैभव सुख के माथे सिल पड़े जो नाम हृदय ते जाए बलिहारी वा दुख की पल पल नाम रटाए। सिल पड़े उस सुख में जो सुख आकर भगवान का विस्मरण करा दे। धन्य है वह दुख जो हर कदम प्रभु
की याद कराता है। बलिहारी वा दुख की पल पल नाम रटाए लेने को हरि नाम है देने को अन्नदान तरने को आधीनता बढ़न को अभिमान बोले लेने के लिए सबसे सुंदर बात है हरि नाम देने को कोई भूखा हो पेट भर दियो अर्थ जहां देना हो तो बहुत होश में दे समझ के नहीं दुरुपयोग होगा तो दुर्गति तुम्हारी भी होगी होगी और तरने को बहुत जोर की बात कर रहे हैं। पकड़ना महापुरुष है। आधीनता यह बहुत जोर की बात अगर अपने इष्ट के अधीनता आ गई तो आप तर जाओगे। तरने को आधीनता सत्य वचन आधीनता
परती मात समान इतने पे हरि नाम मिले तुलसीदास जबान कभी किसी माता बहन की तरफ पाप दृष्टि ना करे सत्य वचन बोले और भगवान के अधीन रहे निश्चित भगवान की प्राप्ति हो जाएगी तीन बातों में ठेका ले लिया तुलसीदास जी ने सत्य वचन आधीनता परती मा समान इतने पे हरि ना मिले तो तुलसीदास जमान लेने को सतनाम है देने को अन्नदान तरने को आधीनता और बढ़न को अभिमान जिसके अभिमान आ गया वो नष्ट हो गया डूब जाएगा मोर तोर की जेवरी बट बांधा संसार दास कबीरा क्यों बंधे जाके नाम आधार जो नाम जप कर रहा
है वो मैं मेरी त तेरी माया उसे फास नहीं पाती है सुमिरन सो सुख होत सुमिरन सो दुख जाए कहे कबीर सुमिरन किए साईं माई समाए जो निरंतर नाम जप सुमिरन करता रहता है उसको सुख ही सुख मिलेगा दुख का नाश हो जाएगा और अपने सुख सिंधु प्रभु में समा जाएगा दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोई जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए कबीर दास जी कहते जब विपत्ति पड़ती दुख पड़ती हां राम कृष्णा हरे अच्छा है पर अगर सुख में निरंतर सुमिरन करते तो ऐसी स्थिति आती कि
दुख तुम्हें व्यापता ही नहीं सुमिरन की सुधियों करे जैसे दाम कंगाल कहे कबीर बिसरे नहीं पल पल ले संभाल जैसे गरीब आदमी को कुछ रुपया मिल जाए तो बार-बार जेब संभालता रहता है ऐसे भक्त को चाहिए हर समय संभालता रहे मेरा सुमिरन ना छूट टूट जाए जब तप संजम साधना ये सब सुमिरन के माही कबीर जानत भक्त है सुमिरन सम कछु ना बड़ी बड़ी साधनाएं भगवन नाम जप के समान नहीं इसलिए भक्त जानता है वो नाम को पकड़े रहता है और कोई ध्यान नहीं नाम को पकड़े रहता है सोवो तो सुप मिले जागो तो मन
माही जब सुमिरन आपका का निरंतर चलेगा तो स्वप्न भी बड़े मंगलमय आते हैं। ऐसा लगता है स्वप्न ही चलता रहे कभी जागू नहीं। सुंदर सुंदर ऐसी लीलाएं ऐसी प्रभु की मंगलमय भक्तों की मंडलियां ये निहाल हृदय हो जाता है। सोवो तो सपने मिले और जागो तो मन माही भावना में लोचन राता सुध हरी बिछुरत कबहु बहुत जोर की बात शीश उतारे भूई धरे ता पर राखे पाव दास कबीरा यो कहे ऐसा होए तो आओ शीश उतारे भूई धरे ता पर राखे पांव कबीर दास जी कह रहे दास कबीर आयो ऐसा हो तो अर्थात अहंकार का
मिटिया मेट प्रेम न बाड़ी उपजे प्रेम ना हाट बिकाए राजा प्रजा जे रुचे शीश दे ले जाए प्रेम बाड़ी में नहीं उपजे ये बाजार में नहीं बिकता अगर तुम्हारी हिम्मत हो तो आप प्राणों की बाजी लगाकर हरि को खरीद लो हरि ही प्रेम बपू है प्रेम प्रेम सब कोई कहे प्रेम न चीने कोई आठ पहर भी ना रहे प्रेम कहावे सोए आठों पैर जो डूबा है प्रभु में वही प्रेमी है जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं ना प्रेम गली अति सा तामे दो न समाए जा घट प्रेम न संचरे सो घट
जान मसान जैसे खाल लोहा हार की सांस लेत बिन प्राण जिसके हृदय में भगवत प्रेम नहीं बेकार जीवन है जैसे गांव में देखा है कि वो एक चमड़े की धोकनी बनाते थे उसी से ऐसेसे करते थे वो हवा देती थी तो उसे अस्त्रों को लाल करके फिर पीटा जाता था उसे धोकनी कहते थे जैसे खाल लोहार की सांस लेत बिन प्राण ऐसे उसका जीवन व्यर्थ है जिसके हृदय में भगवान का प्रेम और जब भगवान का साक्षात्कार होता तो मैं खो जाता है। जब तक मैं रहता है तब तक भगवत साक्षात्कार नहीं होता। जब मैं था
तब हरी नहीं। अब हरि है मैं ना प्रेम गलियत साकरी तामे दोनों समाए प्रेम बिकंता मैं सुना माथा साटे हाट बुझत विलंबन कीजिए तक्षिण दीज काट। अगर ऐसा लग रहा है कि यहां प्रेम बिक रहा है। बोले कैसे? बोले गर्दन काटने बोले फौरन काट दो। बहुत सस्ता है। प्राण दिए यह प्रेम ना पसो महंगो आए सखीरी बड़ा महंगा है। बड़ा सस्ता सौदा है। जल्दी जाओ कोई दूसरा ना ले ले। अर्थात अपना अपन को हार कर प्रभु से तब प्रेम होता है। प्रेम बिना धीरज नहीं और विरह बिना बैराग और सद्गुरु बिना जाने नहीं मन मन
का ये दाग। बिना सद्गुरु के रहस्य नहीं जागृत हो सकता। निर्मल मन नहीं हो सकता। इसलिए सद्गुरु की कृपा से ही प्रेम, वैराग, विरह सब प्राप्त होता है। प्रेम तो ऐसा कीजिए जैसे चंद चकोर चोंच टूट भई मा गिरे चितवे वाही ओर चकोर जो है वो आग खाता है। उसकी चोंच जल जाती है, गिर भी जाती है। पर वो चंद्रमा की तरफ ही देखता रहता है। क्यों आग खाता है? चकोर इसलिए आग खाता है कि उसे चंद्रमा से प्रेम है। सुना है कि भगवान शंकर चिता की भस्म लगाते तो सोचता ऐसे चंद्रमा से तो मिल
नहीं पाऊंगा। अगर मैं जलकर राख हो गया कभी भगवान शंकर मेरे शरीर की राख लगा लेंगे तो मस्तक पर ही द्वितीया का चंद्रमा है। मरकर जलकर मैं अपने प्रीतम से मिल जाऊंगा। मीठो कहा अंगार में जाह चकोर चबाए। कह रहे कि प्रेम ऐसा होना चाहिए जो अपने को मिटाकर भी प्यारे को सुख देने की भावना हो। अधिक स्नेही माछरी दूजा अल्प सने जब ही जल ते बिछुरे तब ही त्याग देह प्रथम स्नेही तो मछली है जैसे जल से अलग करो तड़पड़ा कर प्राण त्याग देती है और तो सब दूजे प्रेमी पहला स्नेही जो अपने प्रभु
के जरा भी विस्मरण तो प्राण जैसी त्यागने की व्याकुल तद स्मरण परम व्याकुल तेति प्रीत जो लागी घुल गई बैठ गई मन माई रोम रोम पी पी करे मुख की श्रद्धा नाही जब प्रेम प्रकट होता है तो मुख से जपने की बात खत्म हो जाती है हृदय रोम रोम प्रीतम को पुकारने लगता है नैना अंतर आवत नैन झाप तो ले ना मैं देखो और को ना तो ही देखन देऊ नेत्रों में मेरे प्रभु आप आ जाओ मैं अंतर्मुख हो जाऊं ना तो तुम्हें किसी को देखने दूंगा ना कोई तुम्हें देख पाएगा। मैं नेत्र बंद करके
सदैव अपने हृदय मंदिर में आपको रखूंगा। ना मैं देखो और को ना तो देखन दे कबीरिया जग आई के किया बहुत तक मित्र जिन दिल बांधा एक सो ते सोवे निश्चिंत आकर यहां बहुत मित्र बना लेते हैं लोग जिसने हरि को मित्र बनाया एक को वही निश्चिंत हो गया पी का परिचय तब जानिए पीसे हिलमिलील होए लीला मेरे लाल की ये प्रभु की दिव्य लीलाओं का प्रवेश तब होता है जब संसार से विलग होकर प्रभु में हिलमिल जाए अगर संसार का कोई भी एक मित्र है संसार का कोई एक प्रियजन है तो रंग नहीं आएगा
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई यह निष्ठा जरूर बहुत जल्दी जल्दी लानी पड़ेगी तभी प्रेम रंग में पी परिचय तब जानिए पव से हिलमिल होए पव की लाली मुख पड़े प्रगट देख सोए चेहरे से पता चलने लगता है भगवत प्राप्त हो गया है क्योंकि जब जैसे घर में दीपक जला दो तो झरोखों से पता चलने लगता है अंधेरा नष्ट हो गया ऐसे भगवत साक्षात्कार किए हुए पुरुष के दर्शन मात्र से हृदय में एक अद्भुत आनंद आल्हाद लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल लाली देखन मैं गई तो मैं भी हुए गई लाल मैं
अपने प्रीतम लाल जी की लाली देखने निकली ऐसा उनका साक्षात्कार हुआ जिधर देख रहे हैं उधर वो ही वो तो इधर भी वही मैं भी हो गई लाल ब्रह्मवित ब्रह्म भवती तस्मित जने भेदा भाव वो भगवत स्वरूप हो गया ज तिरियापी हर बसे सुरति रहे पिय माही ऐसे जन जग में रहे हरि को भूलत नाही जैसे पतिव्रता पत्नी मायके गई हो तो मायके में सब काम कर रहे लेकिन अपने पति का विस्मरण एक क्षण के लिए भी नहीं हो रहा ऐसे संसार के सब कार्य करते हुए भक्त भगवान का चिंतन करता है कामी क्रोधी लालची
इन भक्ति न होए भक्ति करे कोई सुरमा जाति बरन कुल खोए ये जो कामी है क्रोधी है लालची है भक्ति का नाटक कर सकते हैं स्वांग भक्ति इनसे नहीं भक्ति तो कोई शूरवीर कर सकता है जो जाति कुल सब मर्यादाओं को एक तरफ रख के भगवान के भक्तों की उिष्टामृत चरणामृत उनके वचनामृत के प्रभाव से हर रंग में रंग गया कामी कबहु न गुरु भजे मिटे न संशय शूल और गुना सब बकस हो कामी डार न मूल ये जो कामी पुरुष होते हैं कभी गुरु की आज्ञा में नहीं रहते इनके कभी संशय प्रश्न खत्म नहीं
होते सब गुनाह बकस दिए जाते हैं लेकिन जो कामना करके गुरु का विरोध करते हैं इनके ना डाल रह जाता है ना मूल रह जाता है अर्थात बहुत बुरी पूरी तरह नाश होता है गुरु द्रोही का काम क्रोध मद लोभ की जब लग घट में खान कहा मूर्खा कहा पंडिता दोनों एक समान जब तक काम है क्रोध है लोभ है तो चाहे जितने विद्वान हो मूर्ख ही हो कोई उससे लाभ नहीं मिला कोटि कर्म लागे रहे एक क्रोध की लार किया कराया सब गया जब आया अहंकार अगर अगर क्रोध है अहंकार सब मिटिया मेट हो
गया चाहे जितना साधना किया हो किया कराया सब गया जब आया अहंकार इसलिए कंचन तजना सहज है सहज तिया का नेह मान बढ़ाई ईर्ष्या दुर्लभ तजना ए दोष पराए देखकर चले हसंत हसंत अपनी याद ना आव जिनको आदि आदिना काम का कामिनी के प्रति राग त्यागना लोभ का धन के प्रति कंचन के प्रति लोभ त्यागना ये सब हो सकता है। कबीर दास जी कहते पर मान बढ़ाई ईर्ष्या इनका त्याग करना बहुत कठिन है। कुछ लोग दूसरे के दोष देखकर हंसकर चल रहे हैं। उनको पता नहीं कि उनका विनाश करने के लिए इतना ही काफी है।
परदोष दर्शन वही तुम्हारे अंदर ऐसे दोष पैदा करेगा जिनका आदि अंत ही नहीं है। विद्या मदद अरगुण मद राज मद उन्माद इतने मद को रद करे तब पावे अनहद अनहद नाद का तभी जब विद्या का घमंड गुणों का अभिमान राज मदद उन्माद और भी जितने अहंकार इनको रद्द कर दे तब अनहद ना निरंतर भगवत चिंतन का चलता है भगवत सुमिरन का सावधान माया छाया एक सी बिरला जाने कोई भता के पाे फिरे सनुख भाग सो बोले माया छाया की बात है भक्त के पीछे डोलती जो भगवान का भजन करते हैं और जो माया के पीछे
डोलते तो आगे भागती कभी पकड़ में नहीं आती इसलिए मांस आहारी मानवा प्रत्यक्ष राक्षस अंग ताकी संगति करे परत भजन में भंग वैष्णव जन सावधान सुन ले कबीर साहब जी की वाणी कह रहे हैं जो मांसाहारी करने वाले हैं प्रत्यक्ष में मनुष्य रूपेण राक्षसा मांसाहारी मानवा प्रत्यक्ष राक्षसंग ता की संगति करते परत भजन में भंग जब शरणागत दीक्षा देते हैं तो उनमें एक सूत्र बताते कि जिसकी रसोई में जिन पात्रों में मांस बन चुका है तुम्हें दाल रोटी खीर पुआ भी दे तो नहीं खाना क्योंकि वो सब अपवित्र राक्षसी रसोई है बिल्कुल दूर रहो ऐसे
तो किसी ने प्रश्न किया था हमारे यहां अतिथि देवो भव कहा गया अतिथि आता कहता मुझे मुर्गे का मांस चाहिए तो राक्षसो भव थोड़ी है असुर भव थोड़ी है देवो भव देवता थोड़ी है खाते अतिथि देवो भव अतिथि देवता देवता का भोग हलवा पूरी रस रसगुल्ला नाना नाना प्रकार के छप्पन भोग लगा यही जरूरी दलित दुराए ये जो अब अतिथि बनकर के आते हैं तो अतिथि असुर भव वो राक्षस है जो कहे कि मांस मछली तो राक्षसों के स्वागत करने की बात नहीं अतिथि देवो भव मातृ देवो भव पितृ देवो भव तो देवता का क्या
आहार है सतोगुणी ये जो मांस आहारी मानवा प्रत्यक्ष राक्षस जान ये राक्षस है राक्षस का संग करने से नरक जाओगे हानि होगी पक्की बात और सुनो ये जो मांस मछरिया खात हैं ये काल तुम्हें कैसे जलाएगा जैसे भुट्टा भूज के खाया जाता है ना ऐसे एसी गाड़ी में भून देगा काल चाबी भी नहीं लगेगी दरवाजा भी नहीं खुलेगा चीख भी बाहर नहीं जाएगी आराम से भून जाओगे जल तर है मछली देखते हो नहीं पानी से कैसे मुंह भगाया ऐसे प्यास से व्याकुल होकर कैसे प्राण ये सारे कच्चे खा जाए ऐसे ऐसे गंगा किनारे देखा केक
ऐसे धरे ऐसे ऐसे चबा रहे थे जैसे कोई गाजर मूली तो भ्रमण कर रहे थे हम देखा जिंदा है बोले हां भगवान क्या देवता है कैसे कैसे मांस मछरिया खात है सुरा पान जे मछली खाते हैं मांस खाते हैं शराब पीते हैं ते नर जड़ सो जाएंगे जमुरी का खेत जड़ से मरोगे बंद कर दो शराब पीना मछली खाना अंडा खाना मांस खाना ऐसे ऐसे ज्ञान देने वाले हैं फैक्ट्री में बनता है फैक्ट्री में जरूरी है तुम्हें वही खा के मरो कैसा उसमें घणी तुम्हें उल्टी नहीं आती सारे बलवान बनते हैं वो कह रहे हम
बलवान है अंडा खा के मछली खा के बलवान है। मुर्गा खा के बलवान सुनो आगे। मांस मांस सब एक है। मुर्गी हिरनी गाय आंख देख नर खात हैं। ये सब नरक जाए। तैयारी कर लो भाई। अटैची संभाल लो। नरक जाओगे। चाहे मुर्गी खाओ, चाहे हिरनी खाओ, चाहे बकरी खाओ, चाहे गाय खाओ। कैसे कैसे राक्षस हैं। हजार बार समझाने पर भी समझ में नहीं आ रहा है तो इसका मतलब है अभी दुर्गति भोगनी है इनको नरक की अरे अभी प्रायश्चित कर ले किसी भी जीव आप चींटी के पीछे अंगुली लगा के ऐसे देखो ऐसे पीछे चला
के ऐसे वो प्राण बचाने के लिए भागती ऐसे हर जीव है बोले अंबा प्रसन्न होंगी एक लकड़ी का बना होता है उसमें गर्दन फंसा दी सीधे साधे बकरे की जय है अंबा अंबा प्रसन्न होंगी बचाएंगी तुम्हें नरक से अंबा नहीं तुम्हें नरक ही जाना पड़ेगा और फिर अगले जन्म वो आएगा और तुम बनोगे बकरा और फिर कहेगा जय जगदंबा फिर काटेगा फिर काटे पक्का पक्का इसमें सुन लो मुर्गी मुर्गा जी करत है मोह साहब लेखा मांगसी तो संकट पर है तो कहता हो कह जात हो कहा जो मान हमार जा गर्दन तू काटियो सो फिर
काटी तुम्हार कबीर दास जी कह रहे कह रहा हूं सुन लो सुन लो हमारी बात मान लो तो मान लो जिनकी गर्दन काट रहे हो तुम्हें वही बनना पड़ेगा वो तुम्हारी गर्दन काटेंगे पक्का बढ़िया यहां टेक फिर और दूसरी तरह से काटा जाता तुमने तो एक ही बार में काट दिया। वह ऐसे नहीं काटते। हाथ पैर बांध करके आग की ज्वाला में फेंक देते हैं। घंटा आध घंटा बुनो तड़पो। अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म सुभाशुभम। समझ लो इतनी बुद्धि भ्रष्ट हो रही है लोगों की। इतने वीआईपी बन रहे हैं। पहले तलवार की नोक में गाय
आदि का मांस जरा सा चखाकर धर्म भ्रष्ट कर दिया जाता था। अब यह देश विदेश की यात्रा करके पैसा देकर खाते हैं। सोचो आप पैसा देकर गाय का मांस खा रहे हो। हिंदू बनते हो, सनातन धर्मावलंबी बनते हो, भगत बनते हो, तिलक लगाए हो। अरे सारे नरक जाओगे। तुम्हारी समझ में नहीं आता। तुम्हें अगर पेट भरना है भैया तो डबल रोटी ले ली। ऐसे ही पा थोड़ा नमक घी लगा लो। फल सेब संतरा ले लो। जरूरी सेन बीज जो है विदेश से बनवा के उसमें गाय का मांस लगवा के खाओ। सारे राक्षस समझते नहीं फिर
बताते कोई उपाय बताओ शुद्धि का प्यार ना से तो समझ में आता नहीं समझाते हैं तो समझ में आता नहीं समझ लो कहता हूं कहीं जात हो कहा जो मान हमार जाका गर्दन तुम काट हो सो फिर काटी तुम्हार मछली बेचारी जिंदा ला के कढ़ाई में खौलते हुए में डाल दिया क्रिस्पी सारी क्रिस्पी दांत ले रह जाएंगे ऐसी ऐसी नरक में जानते हो क्या होता है दूसरे का जो मांस खाते गन्ना की तरह पेरे जाते हैं कूलों में ऐसे बड़ी-बड़ी चोंच के गिद्ध ऐसे नोचनोच करके अरे बड़ी दुर्गति पढ़ के देखो शास्त्रों में तो डरप
जाओ कभी सुनाएंगे नरक का क्या आनंद है वो भी तो सुनो ना यहां का आनंद जो ले रहे हो वहां आनंद मिलेगा जो पराई स्त्री से संभोग करता है वहां स्त्री लोहे की लाल लाल आग वैसे आलिंगन कराते हैं यमदूत दोनों हाथ पकड़ के वैसे ऐसे और मिनट दो मिनट पांच मिनट 10 मिनट ल मरना है नहीं आनंद ले भले छुप छुप के यहां जो पुरुष की पर पुरुष से आलिंगन रोरो नरक कल्प सत पर सिद्धांत धर्म सिद्धांत ये भारत है विदेश नहीं है होश में इसकी बड़ी महिमा है धर्म का क्षेत्र है यहां धर्म
से कमाई करके आप भगवान को प्राप्त कर सकते हो आप नरक जा सकते हो आप भूत बन सकते हो आप देवता बन सकते हो इसलिए मांस मछरी आज खात है बंद कर दे रे वो देवी देवता को बलि देना बंद करे मुर्गा से बलि नहीं उपवास कर लौंग खोट के 20 दिन तो पता चले तेरे को दूसरे की गर्दन उड़ाने में कौन सा त्याग है कौन सी बहादुरी और निर्मम पशुओं की हत्या कर सारी बुद्धि भ्रष्ट है छोटे छोटे जीवों को ले आए हुए जय अंबा अंबा प्रसन्न होंगी वो उनकी अम्मा नहीं है तुम्हें जगत
माता कहा जाता है छोटे छोटे जीव आपके सामने बलि चढ़ाए बोले नहीं ये अपनी जबान की तृप्ति के लिए मूर्ख लोग ऐसा करते हैं मेरे लिए नहीं करते अंबा के लिए करना है तो उपवास कर तप कर व्रत कर अपने को कष्ट दे तो मैं जानू अंबा के लिए तेरा बलिदान है छोटे-छोटे बकरे बकरियां इनको ले आए निर्मम जीव बोल सकते नहीं म्या काट दिया बोले जय अंबा बड़ी प्रसन्न हुई हमने अंबा के लिए कुछ दिया देख लेना अंबा खून काट कर तेरा पी गई नहीं पिया हो तो भागवत में पढ़ के देख लो भद्रकाली
के सामने जड़ भरत जी को काटने को तो देवी जी प्रकट हो गई अपने ही जनों को काट काट करके खूब खून पी रही है जय अंबा अब सही हुआ ऐसे हो गए जो निर्मम पशुओं को काटते हो कहत हो क जात हो कहा जो मान हमार जाका गर्दन तुम काट हो सो फिर काटी तुम्हार अब लोग प्रश्न कर देते हैं चार लोगों ने मिलकर के उसके साथ ऐसा ऐसा किया ये किया ये किया भगवान कहां था? भगवान ने खेती दे दी है, बीज दे दिया। क्या बोना चाहते हो? जो बोगे वही काटोगे। तुम अल्पज्ञ
हो। तुम क्या जानते हो? उसकी तीन प्रकार की लीलाएं हैं। तीन प्रकार के बीज हैं। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण क्या बोझते हो? ये कर्मभूमि है। जो बोओगे वही खाओगे। वही काटोगे। होश में। तुम्हारे दोष देने से भगवान का सिद्धांत नहीं बदल जाता। भगवान को कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों नहीं फर्क पड़ता? तुम्हारे हृदय में ही बैठे हैं। क्या फर्क पड़ेगा? देख रहे हैं तुम क्या कर लोगे भगवान को मारो छाती में घुसा लगेगा भगवान को ऐसे कुछ भी भगवान को तुम भगवान को क्या जानते हो अरे तुम्हारे अंदर ही बैठा है तू ही बना बैठा है
समझ पा तू ही बना बैठा है जो तू अपने आपा समझ रहा है वो वही है मूर्खता छोड़ो शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार चलो भगवत चरणारविंद का आश्रय लो किसी भी तरह का गलत खानपान मत मत करो निरंतर नाम जप करो सबकी सुन लो सह लो महापुरुषों ने इसी पद्धति से भगवान को प्राप्त किया है हमारे ऊपर सबके ऊपर बड़ी कृपा हरि जी की है कि अभी अवसर है हर गलती के सुधारने का जिन जिन भोगों को आप त्यागते जा रहे हैं आप उतने बढ़िया जीवन मुक्त होते जा रहे हैं। हर कमी अपने को पता
है। अपने अपने आराध्य देव गुरुदेव के चरणों के बल से एक एक गलती का मिटिया मेट करते चले जाओ और जब कोई चाह नहीं कोई गलती नहीं तो आप जीवन मुक्त महापुरुष हो गए आप भगवत प्राप्त हो जाएंगे भगवान सहज में मिल जाएंगे भगवान यही है हम में है सब में है बस दृष्टि बदलनी जहां बदली तो जित देखूं तित श्याम मई इसलिए नाम जप सहनशीलता किसी की निंदा ना करना अपनी निंदा सुन लेना और हर समय अधीनता अपने आराध्य देव के अधीन रहो।