तुमने कभी नोटिस किया है? जब भी हम कोई नया गोल शुरू करते हैं तो शुरुआत में हम ऑलमोस्ट अनस्टॉपेबल लगते हैं। जिम जॉइ करते हैं तो पहले हफ्ते एक भी वर्कआउट मिस नहीं करते। स्टडी स्टार्ट करते हैं तो पहले कुछ दिन घंटों तक पढ़ लेते हैं। YouTube चैनल स्टार्ट करते हैं तो आइडियाज की कमी नहीं होती। लेकिन फिर कुछ अजीब सा होता है। गोल वहीं रहता है। सपना वहीं रहता है। काम भी वहीं रहता है। लेकिन जो इंसान उस गोल के लिए इतना एक्साइटेड था, वह धीरे-धीरे रुकने लगता है। और हैरानी की बात यह है
कि उसे खुद पता नहीं होता कि वह रुक क्यों रहा है। लोग कहते हैं डिसिप्लिन ना होने की वजह से ऐसा होता है। मोटिवेशन की कमी की वजह से ऐसा होता है। लेजीनेस की वजह से ऐसा होता है। लेकिन अगर प्रॉब्लम सिर्फ लेजीनेस होती तो कोई भी इंसान एक हफ्ते तक इतनी कंसिस्टेंसी दिखा ही नहीं पाता। जरा सोच के देखो। जो आदमी रोज सुबह 5:00 बजे उठ सकता है वो अचानक 20 दिन बाद उठना क्यों छोड़ देता है? जो स्टूडेंट 10 दिन तक लगातार पढ़ सकता है वो 11वें दिन किताब खोलने का मन क्यों खो
देता है? और सबसे इंपॉर्टेंट सवाल आखिर ऐसा क्या होता है ब्रेन के अंदर कि जिस काम को हम कभी करना चाहते थे उसी काम को करने के लिए बाद में खुद को फोर्स लगाना पड़ता है। तो देखो यहां प्रॉब्लम डिसिप्लिन की नहीं है और ना ही मोटिवेशन की है। प्रॉब्लम हमारे ब्रेन के अंदर एक साइकोलॉजिकल मैकेनिज्म की है जिसे अगर तुमने समझ लिया तो तुम सिर्फ कंसिस्टेंसी ही नहीं बल्कि ह्यूमन बिहेवियर का एक ऐसा सीक्रेट समझ जाओगे जो एक्सप्लेन करता है कि लोग गोल क्यों छोड़ देते हैं। और यह मैकेनिज्म इतना पावरफुल है कि अगर
तुम इसे नहीं समझे तो हर साल नए गोल बनाओगे और हर साल वही सर्कल रिपीट होगा। बट अगर तुमने इस वीडियो को एंड तक देख लिया तो आई प्रॉमिस इस टॉपिक पे दोबारा तुम्हें कोई वीडियो देखना नहीं पड़ेगा। बिकॉज़ दिस वीडियो इज नॉट अबाउट मोटिवेशन। दिस वीडियो इज अबाउट अ साइकोलॉजिकल मैकेनिज्म। देखो ह्यूमन ब्रेन को सक्सेस की उतनी परवाह नहीं होती जितनी परवाह प्रोग्रेस की होती है। और यही वजह है कि बहुत सारे लोगों की कंसिस्टेंसी टूट जाती है। इस चीज को ध्यान से समझना। मान लो दो लोग हैं। पहला बंदा गेम खेल रहा है।
दूसरा बंदा एग्जाम की तैयारी कर रहा है। अब अगर लॉजिकली देखा जाए तो एग्जाम की तैयारी ज्यादा इंपॉर्टेंट है। लेकिन फिर भी गेमर 5 से 6 घंटे बिना थके बैठे रहते हैं। और जो स्टूडेंट एग्जाम की तैयारी कर रहा है वो 30 मिनट बाद ही फोन चेक करने लगता है। क्यों? क्या गेमर ज्यादा डिसिप्लिंड है? नहीं। तो क्या स्टूडेंट लेजी है? नहीं। फर्क कहीं और है। देखो गेम हर सेकंड ब्रेन को एक मैसेज भेज रहा होता है कि तुम आगे बढ़ रहे हो। लेवल बढ़ रहा है। कॉइन बढ़ रहे हैं, रैंक बढ़ रही है। और
हर मिनट में ब्रेन को प्रूफ मिल रहा है कि मेरी मेहनत का रिजल्ट आ रहा है। अब स्टूडेंट को देखो। एक घंटा पढ़ लिया, कुछ बदला नहीं, दो घंटा पढ़ लिया, कुछ बदला नहीं, 3 घंटा पढ़ लिया। लेकिन अभी भी रिजल्ट नहीं दिख रही। एग्जाम अभी भी महीनों दूर है और यहीं से ब्रेन का इंटरेस्ट टूटना शुरू होता है क्योंकि ह्यूमन ब्रेन फ्यूचर में नहीं जीता। ब्रेन प्रेजेंट में जीता है। उसे आज प्रूफ चाहिए लेकिन स्टडी, जिम, YouTube या बिजनेस जैसे गोल्स में प्रोग्रेस तो होती है लेकिन दिखाई नहीं देती। और इनविज़िबल प्रोग्रेस ब्रेन के
लिए ऑलमोस्ट इनविज़िबल रिवॉर्ड बन जाता है। इसीलिए बहुत बार लोग काम नहीं छोड़ते हैं। वह प्रोग्रेस महसूस करना छोड़ देते हैं। और जब प्रोग्रेस महसूस नहीं होती तो उनका ब्रेन मान लेता है कि शायद कुछ हो ही नहीं रहा। फिर चाहे रियलिटी में बहुत कुछ हो रहा हो। जैसे जब एक बीज जमीन में बोया जाता है तो कई दिनों तक ऊपर से कुछ भी नजर नहीं आता। लेकिन अंदर ही अंदर उसकी जड़े मजबूत हो रही होती हैं। ग्रोथ चल रही होती है। और प्रॉब्लम यह है कि ह्यूमन ब्रेन को अंडरग्राउंड ग्रोथ पसंद नहीं है। उसे
विजिबल ग्रोथ चाहिए। तो सवाल यह है अगर ब्रेन को प्रोग्रेस फील करनी जरूरी है तो हम प्रोग्रेस को विज़िबल कैसे बनाएं? ज्यादातर लोग यही सबसे बड़ी गलती करते हैं। वह प्रोग्रेस को रिजल्ट से मेजर करते हैं और यही कंसिस्टेंसी का सबसे डेंजरस ट्रैप है। मान लो तुम YouTube चैनल ग्रो करना चाहते हो। अब तुम प्रोग्रेस को किससे मेजर करते हो? व्यूज, सब्सक्राइबर्स या रेवेन्यू से? और प्रॉब्लम यह है कि यह सारी चीजें तुम्हारे कंट्रोल में होती ही नहीं। इसीलिए हर दिन तुम्हारा ब्रेन एक सिग्नल रिसीव करता है। अभी तक कुछ हुआ ही नहीं। अब एक
स्टूडेंट को देखो। वो प्रोग्रेस को मार्क्स से मेजर करता है। जिम वाला प्रोग्रेस को बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन से मेजर करता है। बिजनेस वाला प्रॉफिट से मेजर करता है। और ये तीनों ही फ्यूचर रिवॉर्ड है। प्रेजेंट रिवॉर्ड नहीं। इसीलिए तुम्हें यहां पर एक साइकोलॉजिकल शिफ्ट करना पड़ेगा। मतलब तुम्हें रिजल्ट ट्रैकिंग से एक्शन ट्रैकिंग पर मूव करना होगा। और शायद कंसिस्टेंसी इंप्रूव करने का यह सबसे प्रैक्टिकल तरीका है। इसीलिए इसे ध्यान से समझना। देखो ब्रेन को यह मत दिखाओ कि तुम कहां पहुंचना चाहते हो बल्कि ब्रेन को यह दिखाओ कि तुम कितना आगे बढ़ चुके हो। जैसे एक
स्टूडेंट एग्जाम मार्क्स कंट्रोल नहीं कर सकता। लेकिन वो यह देख सकता है कि आज कितने पेज कंप्लीट हुए हैं और आज कितने घंटे उसने पढ़ाई किए हैं। एक यूबर व्यूज, सब्सक्राइबर यह सब कंट्रोल नहीं कर सकता। लेकिन वो यह देख सकता है कि इस महीने कितने वीडियोस अपलोड हुए, कितने स्क्रिप्ट कंप्लीट हुए और ब्रेन को एग्जैक्टली इसी प्रूफ की जरूरत होती है। यहां एक और इंटरेस्टिंग बात है। इसे ध्यान से समझना। ह्यूमन ब्रेन सक्सेस से ज्यादा मोमेंटम से मोटिवेट होता है। मान लो तुम साइकिल चला रहे हो। सबसे मुश्किल पार्ट कौन सा होता है? शुरू
करना। लेकिन एक बार साइकिल चल गई तो उसे चलाते रहना इजी हो जाता है। कंसिस्टेंसी भी वैसे ही काम करता है। मतलब ब्रेन को बड़े रिजल्ट नहीं चाहिए। ब्रेन को यह महसूस होना चाहिए कि तुम आगे बढ़ रहे हो। फिर चाहे स्पीड कितनी भी स्लो हो और शायद इसीलिए कंसिस्टेंट लोग परफेक्ट होने की कोशिश नहीं करते हैं। वो विज़िबल प्रोसेस क्रिएट करते हैं क्योंकि उन्हें पता है जिस दिन ब्रेन को प्रूफ मिलना बंद हो गया उस दिन मोटिवेशन भी धीरे-धीरे कम होने लगेगी। लेकिन जिस दिन ब्रेन को रोज छोटा सा प्रूफ मिलने लगा उस दिन
से कंसिस्टेंसी नेचुरली इंप्रूव होने लगेगी। कंसिस्टेंसी टूटने की दूसरी सबसे बड़ी प्रॉब्लम आज मेरा मन नहीं कर रहा। अगर तुम इस फीलिंग की गहराई में जाओगे तो तुम्हें समझ आएगा कि आज मेरा मन नहीं कर रहा। यह कोई रीजन नहीं है। यह ब्रेन का आउटपुट है। तो सवाल यह है ब्रेन यह आउटपुट जनरेट ही क्यों करता है? इस चीज को जरा ध्यान से समझना। क्या तुमने कभी सुबह उठकर यह बोला है? आज रील्स देखने का मन नहीं कर रहा या आज फोन चलाने का मन नहीं कर रहा शायद बहुत कम लेकिन आज पढ़ने का मन
नहीं कर रहा। आज जिम जाने का मन नहीं कर रहा। आज वीडियो एडिटिंग करने का मन नहीं कर रहा। यह हम बार-बार बोलते हैं। क्यों? क्योंकि ब्रेन हर काम को दो चीजों से जज करता है। पहला इसमें एफर्ट कितना लगेगा। दूसरा रिवॉर्ड कितनी जल्दी मिलेगा और ब्रांड लगातार यह कैलकुलेशन करता रहता है। अब मान लो तुम्हारे सामने दो ऑप्शन है। पहला रील्स देखो इंस्टेंट डोपामिन मिलेगा मजा आएगा और तुम्हारा एफर्ट ऑलमोस्ट जीरो होगा। दूसरा 2 घंटे पढ़ाई करो। 2 घंटे जिम करो या वीडियो एडिटिंग करो। यहां एफर्ट ज्यादा लगेगा और रिजल्ट शायद महीनों बाद मिलेगा।
अब जरा ब्रेन के पर्सपेक्टिव से देखो। उसके लिए कौन सा ऑप्शन अट्रैक्टिव लगेगा। ऑब्वियसली पहला। क्यों? क्योंकि ब्रेन फ्यूचर को डायरेक्टली एक्सपीरियंस नहीं [संगीत] कर सकता। वो सिर्फ प्रेजेंट को एक्सपीरियंस कर सकता है। और तुम्हारा फ्यूचर सक्सेसफुल वर्जन ब्रेन के लिए रियल नहीं है। लेकिन आज का कंफर्ट उसके लिए रियल है। इसीलिए ब्रेन बार-बार प्रेजेंट कंफर्ट को चूज़ करता है। फ्यूचर रिवॉर्ड को नहीं। और जब तुम्हें यह फीलिंग आती है कि आज मेरा मन नहीं कर रहा तो एक्चुअल में ब्रेन तुम्हें एफर्ट से बचाने की कोशिश कर रहा होता है और तुम उस फीलिंग को
रियलिटी समझ लेते हो। जबकि वह सिर्फ एक सिग्नल होता है। तो सवाल यह है अगर मन नहीं कर रहा सिर्फ एक सिग्नल है तो इसे कंट्रोल कैसे करें? इस चीज को जरा ध्यान से सुनना क्योंकि यहां पर ज्यादातर लोग गलत गेम खेलते हैं। उन्हें लगता है कि कंसिस्टेंसी का मतलब है हर दिन अपने आप को पुश करना, अपने मन को हराना या मोटिवेशन ढूंढना। लेकिन रियलिटी कुछ और है। कंसिस्टेंट लोग अपने मन को कंट्रोल नहीं करते। वह अपने डिसीजन मन से पहले ले लेते हैं। मान लो कल सुबह तुम्हें जिम जाना है। ज्यादातर लोग क्या
करते हैं? सुबह उठते हैं और फिर डिसाइड करते हैं आज जाऊं या ना जाऊं? मूड है या नहीं है। और मैंने तुम्हें पहले ही बताया है अगर तुम ब्रेन के सामने ऑप्शंस रखोगे तो ब्रेन वही ऑप्शन चूज़ करेगा जो तुम्हें कंफर्ट दे। क्योंकि ब्रेन का फोकस फ्यूचर पर नहीं प्रेजेंट पर होता है। इसीलिए ब्रेन के सामने ऑप्शंस मत रखो। उसे बस एक्शन दो। जरा ध्यान से समझना। अगर तुम सुबह उठकर डिसाइड करोगे कि जिम जाना है या नहीं तो ब्रेन तुरंत ऑप्शन क्रिएट करना शुरू कर देगा और जहां ऑप्शंस होते हैं वहां कंसिस्टेंसी टूटना शुरू
हो जाती है। इसीलिए कंसिस्टेंट लोग काम करते समय डिसीजन नहीं लेते। वो डिसीजन पहले ही ले चुके होते हैं। जैसे जिम जाना है तो रात को ही डिसाइड हो गया। पढ़ाई करनी है तो उसका टाइम पहले ही फिक्स हो चुका है। वीडियो एडिटिंग करनी है तो उसका स्लॉट पहले ही तय हो चुका है ताकि जब एक्शन का वक्त आए तो ब्रेन को डिसाइड करना ना पड़े। सिर्फ एक्सक्यूट करना पड़े क्योंकि बहुत बार कंसिस्टेंसी एफर्ट की वजह से नहीं टूटती। कंसिस्टेंसी डिसीजन की वजह से टूटती है। हम हर दिन वही डिसीजन दोबारा लेने लगते हैं और
हर बार ब्रेन कंफर्ट के फेवर में आर्गुममेंट देने लगता है। लेकिन जिस दिन तुमने इंपॉर्टेंट डिसीजन को पहले ही लॉक करना शुरू कर दिया। उस दिन से आज मेरा मन नहीं कर रहा। यह वाली फीलिंग की पावर आधी हो जाएगी। क्योंकि फिर तुम डिसाइड नहीं करोगे। तुम उस डिसीजन को फॉलो करोगे जो तुम पहले ही ले चुके हो। और कंसिस्टेंसी का असली सीक्रेट यही है कि तुम इंपॉर्टेंट एक्शन को इतना नॉन नेगोशिएबल बना दो कि उनके बारे में रोज डिसीजन लेना ही बंद हो जाए। याद रखना जिस दिन तुमने प्रोग्रेस को देखना सीख लिया और
अपने इंपॉर्टेंट डिसीजन को पहले ही लॉक करना सीख लिया उस दिन कंसिस्टेंसी मोटिवेशन का गेम नहीं रहेगी। वो सिस्टम का गेम बन जाएगी। वो सिस्टम जो हर कंसिस्टेंट लोग फॉलो करते हैं। और अगर अभी भी किसी चीज को समझने में कोई प्रॉब्लम हो या फिर कोई क्वेश्चन हो तो कमेंट सेक्शन में बेझिझक तुम मुझसे पूछ सकते हो। मैं उसका आंसर जरूर करूंगा। तो चलो मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। तब तक आप लोग अपना ख्याल रखना।