छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के इतिहास का एक ऐसा नाम जो किसी भी परिचय का मोहताज नहीं है एक महान योद्धा जिनकी बहादुरी और जिनका रणनीतिक व प्रशासनिक कौशल ही उनकी पहचान थी एक ऐसा वीर सम्राट जिन्हें छत्रपति के ताज से नवाजा गया शिवाजी ने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए छोटे-मोटे राजाओं से जंग नहीं की थी बल्कि उन्हें बीजापुर और मुगलिया जैसी ताकतवर सल्तनत से लोहा ना पड़ा था बीजापुर और मुगल साम्राज्य के कई सेनापतियों को उन्होंने धूल चटा दी थी वे आखिरी दम तक औरंगजेब जैसे शक्तिशाली मुगल सम्राट से लड़ते रहे उनकी रणनीति
के सामने मुगलिया सल्तनत पस्त हो गई थी उन्होंने कई बार औरंगजेब की सेना के दांत खट्टे किए दक्षिण में साम्राज्य विस्तार का ख्वाब देखने वाले औरंगजेब को शिवाजी महाराज ने कभी चैन से बैठने नहीं दिया बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत से उन्होंने ना सिर्फ मराठा को आजादी दिलाई बल्कि बाद में खुद मराठा साम्राज्य के संस्थापक भी बने महज 16 वर्ष की उम्र में शिवाजी ने बीजापुर के कई किलों पर कब्जा कर लिया वह भारतीय नौसेना के पिता थे जिन्होंने कई स्थानों पर नौसेना किलों का निर्माण कराया एक तरफ वह लोगों के लिए हिंदू हृदय सम्राट हैं
दूसरी तरफ उन्हें मराठा गौरव का भी तमगा दिया जाता है उन्होंने हमेशा स्वराज्य और मराठा विरासत पर ध्यान केंद्र किया लेकिन सवाल है कि शिवाजी ने अपनी छोटी सी सेना रखने के बावजूद आखिर कैसे मजबूत आदिलशाही और मुगलिया सल्तनत के सामने चुनौती पेश की थी कैसे उन्होंने औरंगजेब जैसे ताकतवर सम्राट को अपनी रणनीति और कौशल के सामने बेबस कर दिया था और उन्हें छत्रपति के ताज से आखिर क्यों नवाजा गया आज के इतिहास गवाह है कार्यक्रम में इन तमाम बातों को विस्तार से जानेंगे [संगीत] [संगीत] [संगीत] 19 फरवरी 1630 शिवनेरी के किले में शाहजी राजे
और जीजाबाई के घर एक बच्चे का जन्म हुआ और उसका नाम रखा गया शिवाजी कई लोग मानते हैं कि शिवाजी का नाम भगवान शिव के नाम पर रखा गया लेकिन ऐसा नहीं था दरअसल शिवाजी की मां ने पुत्र प्राप्ति के लिए देवी शिवाई की पूजा की थी और इसीलिए देवी शिवाई के नाम पर ही शिवाजी का नाम रखा गया उनका मूल नाम शिवाजी जी भोसले था लेकिन प्रशासन और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें छत्रपति या क्षत्रियों के प्रमुख की उपाधि दी गई थी उनके पिता शाहजी राजे भोसले बीजापुर के दरबार में उच्चा अधिकारी थे शिवाजी
का लालन पालन उनकी माता जीजाबाई की देखरेख में हुआ शिवाजी एक कुशल सैनिक और कुशल मराठा प्रशासक थे उन्हें जंग की ट्रेनिंग और प्रशासन की समझ दादोजी कोंडदेव जी से मिली थी जो बीजापुर सल्तनत में जनरल के पद पर तैनात थे 1630 में जब शिवाजी का जन्म हुआ तो भारत के पश्चिमी भाग में तीन इस्लामी सल्तनत हुआ करती थी अहमदनगर की निजामशाही बीजापुर की आदिल शाही और गोलकुंडा की कुतुब शही यह तीनों आपस में लड़ते रहते थे लेकिन आपस की लड़ाई के अलावा उत्तर की तरफ से मुगल इन सल्तनत को अपने राज्य में मिलाने के
लिए लगातार दबाव डाल रहे थे ताकि दक्षिण भारत में मुगलों का वर्चस्व कायम हो जाए इस दौरान दिल्ली में शाहजहां का शासन था 1636 में शाहजा औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया गया सूबेदार बनते ही औरंगजेब ने सबसे पहले बीजापुर पर हमला कर दिया मुगलों के वार ने बीजापुर में मोहम्मद आदिल शाह का शासन कमजोर करना शुरू कर दिया इधर शिवाजी छोटी उम्र में ही कमाल कर रहे थे वह युद्ध की रणनीति बनाने में माहिर हो रहे थे उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद छापेमारी युद्ध कौशल में महारत हासिल कर ली थी महज 16 साल की
उम्र में तोरणा पर कब्जा करके शिवाजी ने अपने युद्ध कौशल का लोहा मनवा दिया था 1646 में सुल्तान मोहम्मद आदिल शाह बीमार पड़ गया उसकी बीमारी के चलते बीजापुर की सल्तनत और कमजोर हो गई इस वक्त का फायदा उठाते हुए शिवाजी ने तोरणा किले पर धावा बोला और कब्जा कर लिया वहां मिले बड़े खजाने को शिवाजी ने जप्त कर लिया या बीजापुर के सुल्तान को उनकी तरफ से मिला पहला तगड़ा झटका था शासन की कमजोरी के चलते बीजापुर अराजकता का शिकार हो चुका था इस कमजोरी का फायदा उठाकर सामंतों ने बीजापुर के अधिकतर किलों पर
अपना अधिकार जमा लिया शासक को कमजोर पड़ता देख शिवाजी ने मराठों को संगठित किया और बीजापुर के दुर्गों को जीतने की योजना बनाई अगले दो साल के भीतर शिवाजी ने पुणे के पास कई महत्त्वपूर्ण किलों पर अपना कब्जा जमा लिया इनमें कोडना और पुरंदर जैसे वे किले शामिल थे जो बीजापुर के ताकतवर हिस्से माने जाते थे बाद में शिवाजी ने राजगढ़ किले पर भी कब्जा कर लिया उन्होंने पुणे के पूर्व में सुपा बारामती और इंदापुर के आसपास के क्षेत्रों को भी अपने सीधे नियंत्रण में ले लिया इसके बाद शिवाजी ने पश्चिम की ओर कोंकण की
तरफ रुख किया और कल्याण के अहम शहर पर कब्जा कर लिया बीजापुर सल्तनत के भीतर इन घटनाओं ने खलबली मचा दी आदिल शाह के सामने शिवाजी को बंदी बनाने की और उन पर कड़ी कारवाई करने की मांगे उठने लगी लेकिन यह वह दौर था था जब आदिल शाह शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित हो चुका था आदिल शाह शिवाजी को बंदी नहीं बना सका लेकिन उसने उन पर कार्रवाई करने के लिए वार करने के लिए एक दूसरी चाल चली 1648 में आदिल शाह ने शिवाजी के पिता शाह जी को गिरफ्तार करवा लिया सूचना मिलते ही
शिवाजी आग बबूला हो उठे उन्होंने नीति और साहस का सहारा लिया और छापेमारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद करा लिया 1649 से 16 बचपन के दौरान शिवाजी ने अपनी विजय यात्रा पर खुद से ही लगाम लगा दी और अब तक मिली अपनी बढ़त को व चुपचाप रहते हुए और मजबूत करने में जुट गए यह भी उनकी रणनीति का ही हिस्सा था जिसका नतीजा यह हुआ कि शिवाजी बेहद मजबूत बनकर दोबारा उसी तेवर में उभरे 1656 में महा बालेश्वर के वर्तमान हिल स्टेशन के पास जावली की घाटी पर उन्होंने कब्जा कर
लिया इस जीत ने शिवाजी को दक्षिण और दक्षिण पश्चिम महाराष्ट्र में आगे बढ़ने ने की राह खोल दी लेकिन 6 साल तक युद्ध से दूर रहे शिवाजी की आदिलशाही सल्तनत से अदावत अभी भी खत्म नहीं हुई थी ऐसे में बीजापुर में शिवाजी की गतिविधियां फिर से बढ़ने लगी बीजापुर की मुख्य रानी बड़ी बेगम साहिबा ने अपने दरबारियों को ललकार हुए पूछा कि बीजापुर में ऐसा कौन सा शख्स है जो शिवाजी को कुचलने की ताकत रखता है जवाब में आदिल शाही हुकूमत के सबसे बड़े लड़ाके अफजल खान ने सबसे पहले मशहूर इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी किताब
शिवाजी एंड हिज टाइम्स में लिखते हैं अफजल खान ने बीजापुर के दरबार में डींग हां की कि शिवाजी कौन है मैं उसे यहां जंजीरों में बांध कर लाऊंगा और ऐसा करने के लिए मुझे अपने घोड़े से नीचे तक उतरने की जरूरत नहीं पड़ेगी असल में अफजल खान की शिवाजी के परिवार से बहुत पुरानी दुश्मनी थी शिवाजी के पिता शाहजी राजे भोसले और अफजल खान दोनों ही बीजापुर सल्तनत के लिए काम किया करते थे शिवाजी के पिता शाहजी को एक समय अफजल खान ने ही गिरफ्तार किया था और उन्हें जंजीरों में जकड़ करर बीजापुर ले गया
था शिवाजी और उनकी मां जीजाबाई का मानना था कि शिवाजी के बड़े भाई संभाजी की हत्या में भी अफजल खान का ही हाथ था शिवाजी के मन में अफजल खान की छवि एक ऐसे व्यक्ति की थी जिसने उनके पिता के साथ बुरा सुलूक किया था और उनके भाई की हत्या की साजिश रची थी ऐसे में जब अफजल खान ने शिवाजी को पकड़ने का बीड़ा उठाया तब दोनों के बीच कई संदेशों का आदान प्रदान हुआ और अंततः 10 नवंबर 1659 को दोनों की मुलाकात तय हुई इस मुलाकात के दौरान अफजल ने शिवाजी को अपनी बाहों के
घेरे में लेकर मारने की कोशिश की पर शिवाजी इस चाल को पहले ही भांप चुके थे और उन्होंने अपने हाथ में बग नख यानी बाघ के नाखून छिपा रखे थे इसी बनक से वार कर शिवाजी ने अफजल खान को मौत के घाट उतार दिया अपने सेनापति को मरा पाकर अफजल खान की सेना वहां से भाग खड़ी हुई उधर 1656 में बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह की मौत के बाद औरंगजेब ने वहां आक्रमण कर दिया शिवाजी ने औरंगजेब को बीजापुर पर हमले में मदद करने की पेशकश की इस पेशकश के बदले शिवाजी को बीजापुर के किलों
और उनके कब्जे वाले गांवों पर उनके अधिकार को औपचारिक मान्यता मिल गई इस दौरान मुगलों और शिवाजी के बीच रिश्ते बहुत अच्छे बने रहे लेकिन अगले ही साल यानी 1657 में शाहजहां ने अपने सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया इस बात से औरंगजेब आग बबूला हो गया और शाहजहां के इस फैसले को मानने से उसने इंकार कर दिया इतना ही नहीं औरंगजेब ने फरवरी 1658 में खुद को सम्राट घोषित कर दिया और मई 1658 में सामू गढ़ की लड़ाई में दारा शिकोह को शिकस्त देकर औरंगजेब ने निर्णायक जीत हासिल कर
ली मतलब मुगलिया सल्तनत पर औरंगजेब का कब्जा हो गया औरंगजेब ने शाहजहां को बेदखल कर दिया और सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी उसका पूरा ध्यान उत्तर भारत की रियासतों पर था जिसकी वजह से मुगलों के हाथ से दक्षिण भारत निकलता जा रहा था इन परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए शिवाजी ने दक्षिण में मुगल इलाकों पर हमला कर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया अहमदनगर और रेसिन के दुर्ग पर भी शिवाजी ने धावा बोला इस वजह से औरंगजेब और शिवाजी के बीच रिश्तों में कड़वाहट आ गई औरंगजेब ने जब उत्तर भारत की
रियासत पर अपनी पकड़ बना ली तब उसने दक्षिण के बारे में सोचना शुरू किया लेकिन उस वक्त तक शिवाजी दक्षिण के 40 दुर्गों पर कब्जा कर चुके थे ऐसा नहीं था कि दक्षिण भारत से मुगलिया सल्तनत बिल्कुल बेखबर थी मुगल सैनिक पूरे दक्षिण भारत में फैले हुए थे लेकिन शिवाजी की शानदार युद्ध नीति के सामने दक्षिण में वे बेबस हो गए थे शिवाजी पहाड़ी किलों को अपनी युद्ध रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानते थे वे हर किले के अंदर एक ही रैंक वाले तीन अधिकारियों को तैनात करते थे ताकि उनमें से अगर कोई एक दुश्मन
से मिल भी जाए तो भी किले को आसानी से फतह नहीं किया जा सके गोरिल्ला तकनीक उनकी युद्ध रणनीति की मजबूती थी शिवाजी छोटे-छोटे गुटों में बटक दुश्मनों पर हमला किया करते थे हमला करते ही शिवाजी और उनकी सेना तुरंत गाय हो जाती थी और पहाड़ के दुर्गों में छिप जाती थी शिवाजी ने एक ताकतवर नौसेना भी बनाई थी शिवाजी जानते थे कि कोंकण तट पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उन्हें मजबूत नौसैनिक शक्ति हासिल करने की जरूरत होगी लिहाजा उन्होंने 1657 में ही अपनी नौसेना का निर्माण शुरू कर दिया था इसीलिए उन्हें भारतीय नौसेना
के पिता के रूप में भी जाना जाता है उन्होंने जयगढ़ विजयदुर्ग सिंधुदुर्ग तथा अन्य कई स्थानों पर अपने नौ सेना किलों का निर्माण कराया उस जमाने में उनके पास चार अलग-अलग प्रकार के युद्धपोत भी हुआ करते थे मराठी इतिहास का दावा है कि उनके बेड़े में लगभग 400 युद्धपोत थे हालांकि समकालीन अंग्रेजी इतिहास के मुताबिक यह संख्या कभी भी 160 से अधिक नहीं हुई थी बहरहाल दक्षिण भारत में धीरे-धीरे मराठा साम्राज्य शिवाजी के नेतृत्व में मजबूत होता चला गया औरंगजेब भी शिवाजी की ताकत से अच्छी तरह वाकिफ हो चुका था उसने शिवाजी पर अंकुश लगाने
के लिए अपने मामा शाहिस्ता खान को दक्षिण का सूबेदार बनाया और डेढ़ लाख की फौज के साथ शाहिस्ता खान को पुने भेजा शाहिस्ता खान 3 साल तक मावल में लूटपाट करता रहा शाहिस्ता खान की इन हरकतों का जवाब देने के लिए अप्रैल 1663 में शिवाजी ने शाहिस्ता खान पर हमला कर दिया इस हमले में शाहिस्ता खान की चार अंगुलियां कट गई और उसके बेटे अबुल फतेह को मराठों ने मौत के घाट उतार दिया इस समय तक शिवाजी का खजाना लगभग खत्म हो चुका था अपने खत्म हो चुके खजाने को फिर से भरने के लिए 1664
में शिवाजी ने बंदरगाह शहर सूरत को लूट लिया सूरत मुगलों के लिए समृद्ध और मुनाफे वाला व्यापारिक केंद्र हुआ करता था 13 फरवरी 1665 को शिवाजी ने वर्तमान कर्नाटक में पुर्तगालियों के कब्जे वाले बसरूर पर भी नौसैनिक हमला किया और एक बड़ी लूट हासिल की उधर शाहिस्ता खान पर शिवाजी के हमले और सूरत में हुई लूट से औरंगजेब तिलमिला उठा था जवाब में उसने शिवाजी को हराने के लिए राजपूत जनरल जयसिंह को लगभग 15000 की सेना के साथ भेजा जयसिंह की सेनाओं ने शिवाजी पर दबाव डाला इस घुड़सवार सेना ने ग्रामीण इलाकों को तहस-नहस कर
डाला और शिवाजी के किलों की घेराबंदी कर दी 1665 के मध्य में जब मुगल सेना ने पुरंदर के किले को घेर लिया और कब्जे के करीब पहुंच गई तब शिवाजी और जयसिंह के बीच एक महत्त्वपूर्ण समझौता हुआ 11 जून 1665 को शिवाजी और जयसिंह ने पुरंदर की संधि पर दस्तखत किए शिवाजी अपने 23 किलों को छोड़ने को राजी हो गए उनके पास अब 12 किले बचे लेकिन औरंगजेब इस संधि के लिए तैयार नहीं था औरंगजेब को लग रहा था कि दक्कन में उसके विस्तार के सामने मराठा ही उसे चुनौती दे सकते हैं हालांकि बाद में
व्यक्तिगत रूप से नापसंद होने के बाद भी राजा जयसिंह के कहने पर औरंगजेब ने शिवाजी के साथ संधि करने पर अपनी हामी भर दी इस संधि के बाद शिवाजी महाराज को औरंगजेब के दरबार में बुलाने की कोशिश शुरू हुई जयसिंह ने बीड़ा उठाया था कि वह किसी तरह शिवाजी को औरंगजेब के दरबार में लाने के लिए मनाएंगे लेकिन पुरंदर के समझौते में शिवाजी ने साफ कर दिया कि वह मुगल मनसब के लिए काम करने और शाही दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं है शिवाजी को औरंगजेब के शब्दों पर भरोसा नहीं था जदुनाथ सरकार
अपनी किताब शिवाजी एंड हिज टाइम्स में लिखते हैं जयसिंह ने शिवाजी को यह उम्मीद दिलाई कि हो सकता है औरंगजेब शिवाजी से मुलाकात के बाद उन्हें दक्कन में अपना सूबेदार बना दे और बीजापुर और गोलकुंडा पर कब्जा करने के लिए शिवाजी के नेतृत्व में एक फौज भेजे यह सिर्फ कयास थे औरंगजेब ने इस तरह का कोई वायदा नहीं किया था इस मान मनोबल के बाद मुगलों के निमंत्रण पर शिवाजी औरंगजेब के आगरा दरबार में पहुंच गए उस वक्त मुगलों के दरबार में सिर्फ बादशाह ही बैठा करते थे और बाकी दरबारी खड़े रहा करते थे दरबार
के नियम के मुताबिक जिसको जितनी ऊंची मनसबदारी दी जाती थी उसकी हैसियत उतनी ज्यादा बड़ी होती थी और बादशाह के दरबार में उसकी पूछ उतनी अधिक ज्यादा हैसियत वाले मनसबदार आगे की पंक्ति में खड़े होते थे और बाकी लोगों को पीछे खड़ा होना पड़ता था मनसबदारी को आम भाषा में अगर हम समझे तो रैंक कह सकते हैं शिवाजी जब औरंगजेब के दरबार में पहुंचे तो उन्हें 5000 की मनसबदारी दी गई लेकिन शिवाजी नाराज हो गए क्योंकि वह कम से कम 7000 की मनसबदारी चाहते थे उन्होंने भरी सभा में औरंगजेब के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की
औरंगजेब ने इसे अपना अपमान समझा और शिवाजी को नजरबंद करा दिया अब शिवाजी समझ चुके थे कि पुरंदर की संधि दरअसल केवल छलावा मात्र है औरंगजेब का असल इरादा तो शिवाजी की हत्या करने का था लेकिन इसके पहले कि औरंगजेब अपने मंसूबों में कामयाब हो पाता शिवाजी औरंगजेब के सैनिकों को चकमा देकर फरार हो गए 17 अगस्त 1666 को शिवाजी किले से भागने में कामयाब हुए ऑड्री ट्रस्ट के औरंगजेब की जीवनी औरंगजेब द मैन एंड द मिथ में लिखती हैं इस बात की बहुत संभावना है कि शिवाजी उन सैनिकों को रिश्वत देकर निकलने में सफल
रहे जिन्हें उनकी निगरानी के लिए लगाया गया था लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वह उन बड़ी टोकर में बैठकर निकल भागे जिनमें ब्राह्मणों के लिए दान का सामान भिजवाया गया था किले से निकलकर शिवाजी ने साधु का भेष बनाया और पैदल चलते हुए वापस अपने राज्य पहुंच गए इतिहासकार जेल मेहता की किताब एडवांस स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मिडिवल इंडिया के मुताबिक आगरा से निकलने के बाद शिवाजी का महाराष्ट्र में भव्य स्वागत हुआ आगरा के प्रकरण ने मुगलों के खिलाफ शिवाजी को एक ऐसी शक्ति के तौर पर उभारा जो औरंगजेब को टक्कर देने
का माददा रखता था शिवाजी के बच निकलने के बाद मुगलों के साथ उनकी अदावत कम हो गई मुगल सरदार जसवंत सिंह ने नए शांति प्रस्तावों के लिए कोशिशें शुरू की और शिवाजी तथा औरंगजेब के बीच मध्यस्थता की 1666 से 1668 के बीच औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की उपाधि प्रदान कर दी शिवाजी ने उस समय अपने सबसे बड़े पुत्र संभाजी को जनरल प्रताप राव गुर्जर के साथ औरंगाबाद में मुगल वायसराय प्रिंस मुअज्जम के साथ सेवा करने के लिए भेज दिया औरंगजेब ने शिवाजी को बीजापुर पर हमला करने की भी अनुमति दे दी जिस पर आदिलशाही
वंश का शासन था कमजोर सुल्तान अली आदिल शाह द्वितीय ने शांति के लिए मुकदमा दायर किया और शिवाजी को सरदेशमुखी और चौथाई के अधिकार दे दिए शिवाजी और मुगलों के बीच शांति 1670 तक ही चली इसके बाद औरंगजेब को शिवाजी और मुअज्जम के बीच घनिष्ठ संबंधों पर संदेह होने लगा उसे लगा कि शायद मुअज्जम शिवाजी से रिश्वत ले रहा है उसने सोचा कि अगर यह संदेह सच हुआ तो शिवाजी औरंगजेब के सिंहासन पर भी कब्जा कर सकते हैं इस वक्त औरंगजेब अफगान से लड़ने में व्यस्त था जिससे दक्कन में उसने अपनी सेना बहुत कम कर
दी थी औरंगजेब के संदेह ने शिवाजी और मुगलों के बीच शांति काल को खत्म कर दिया मुगलों ने कुछ साल पहले उधार दी गई रकम वापस पाने के लिए शिवाजी से बरार की जागीर छीन ली जवाब में शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ फिर से आक्रमण शुरू कर दिया शिवाजी ने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से शिकस्त दी पुरंदर की संधि में जिन राज्यों को शिवाजी ने मुगलों को दिया था कुछ ही महीनों में उन इलाकों पर दोबारा उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया नए हमलों से तिल मिलाए औरंगजेब ने सूरत से लौटते वक्त शिवाजी
को रोकने के लिए दाऊद खान के नेतृत्व में एक सेना भेजी लेकिन यह सेना भी वर्तमान नासिक के पास वाणी डिंडोरी की लड़ाई में हार गई अपने नए अभियान के दौरान शिवाजी ने बीजापुर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया देखते ही देखते शिवाजी ने अपने अभियानों के जरिए बहुत ज्यादा इलाकों पर कब्जा कर लिया था और खूब धन दौलत भी अर्जित किया था लेकिन इस समय तक आधिकारिक तौर पर वह राजा नहीं बन सके थे राजा की औपचारिक उपाधि के अभाव में वह अभी भी तकनीकी रूप से एक मुगल
जमींदार या बीजापुरी जागीरदार के पुत्र थे उनके द्वारा जीते गए इलाकों पर शासन करने के लिए उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं था यह इसलिए भी जरूरी था ताकि दूसरे मराठा द्वारा पेश किए गए किसी भी चुनौती को उनके द्वारा रोका जा सके बहरहाल 6 जून 1674 को रायगढ़ किले में उनका राज्य अभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति की उपाधि दी गई इसके बाद उन्होंने हिंदवी स्वराज्य का ऐलान किया विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिंदू साम्राज्य था हालांकि शिवाजी का साम्राज्य अभी भी मुगलों के मुकाबले बहुत छोटा था उन्हें इस बात का
एहसास था कि इस तरह मुगलों का मुकाबला करना उनके लिए मुश्किल होगा इसलिए उन्होंने अपने साम्राज्य को और बढ़ाने का निर्णय लिया शिवाजी ने सोचा कि अगर वह दक्षिण की तरफ बढ़ते हैं और वहां अपना साम्राज्य विस्तार करते हैं तो दक्षिण और उत्तर के बीच की सीमा को वह रक्षा कवच की तरह उपयोग कर सकते हैं इसलिए शिवाजी ने योजना बनाई कि मराठे पहले मुगलों पर छोटे-छोटे आक्रमण करेंगे और जब मुगल सेना हमला शुरू करेगी तो वे दक्षिण की तरफ पीछे हटेंगे इससे होता यह कि मुगलों के विशाल सेना अपने संसाधनों के साथ बहुत आगे
तक नहीं जा पाती इससे जंग लंबी खिसती और मुगल सैनिक थक जाते इसके बाद शिवाजी की सेना उन पर हमला कर जीत हासिल करती इसी योजना के तहत अपने राज्याभिषेक के बाद छत्रपति दक्षिण की ओर बढ़ गए इस अभियान को उन्होंने दक्षिण दिग्विजय नाम दिया दक्षिण में आगे पढ़ना आसान हो सके इसलिए शिवाजी ने औरंगाबाद के सूबेदार और गोलकुंडा के कुतुब शाह के साथ संधि कर ली उनका यह अभियान 1676 से 1678 तक चला शिवाजी का साम्राज्य मुंबई के दक्षिण में कोंकण से लेकर पश्चिम में बेलगांव धारवाड़ और मैसूर तक फैल चुका था औरंगजेब को
चुनौती देने के साथ शिवाजी अपने राज्य का विस्तार करते रहे इतिहास के मुताबिक शिवाजी की वजह से ही और औरंगजेब की दक्षिण नीति फेल हो गई मुगलों और शिवाजी के बीच चल रही दुश्मनी के बीच 3 अप्रैल 1680 को अचानक सब कुछ थम गया यह वह मनहूस दिन था जब मराठों में शोक की लहर दौड़ गई शिवाजी का निधन हो गया पर मराठों के साथ औरंगजेब की अदावत फिर भी खत्म नहीं हुई 1680 में शिवाजी महाराज की मौत के बाद उनके पुत्र संभाजी महाराज ने राज काद संभाला 1681 में औरंगजेब के बगावती बेटे अकबर द्वितीय
को संभाजी ने शरण दी औरंगजेब अब संभाजी के पीछे पड़ा और उसकी नजर फिर से दक्षिण पर गड़ गई हालांकि संभाजी महाराज की शूर वरता की वजह से औरंगजेब के लिए मुश्किलें फिर भी जस की तस रही 1689 की शुरुआत में छत्रपति संभाजी राजे के बहनोई गानो जीी शिरके ने उन्हें धोखा दिया गानो जीी शिरके और औरंगजेब के सरदार मुकर्रर खान ने संगमेश्वर पर हमला कर दिया मराठों और मुगल सेना के बीच यहां भीषण संघर्ष हुआ इस समय तक मराठों की ताकत कम हो चुकी थी मराठा योद्धा अचानक हुए दुश्मन के हमलों का जवाब नहीं
दे सके इस युद्ध में मुगल सेना ने संभाजी महाराज को गिरफ्तार कर लिया और 1689 में औरंगजेब ने संभाजी महाराज की बर्बर हत्या करा दी इसमें कोई दोराय नहीं कि शिवाजी महाराज ने अपने जीवन काल में अपनी बहादुरी से औरंगजेब की नींद उड़ाए रखी उनकी साहसिक रणनीति का ही परिचय था कि औरंगजेब अंत तक से नहीं बैठ सका औरंगजेब ने खुद जयसिंह से कबूला था कि हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि उसे खुद दक्षिण के अभियान पर जाना पड़ेगा आगरा से शिवाजी के बच निकलने सूरत पर उनके दूसरे हमले और 23 किलों पर दोबारा
कब्जा किए जाने के बाद औरंगजेब के पास दक्षिण कूच करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था अपने निधन से पहले शिवाजी ने औरंगजेब को मजबूर कर दिया था कि वह दक्षिण में अपने घटते हुए असर को दोबारा पाने के लिए वहां मार्च करें यही हुआ भी और अपनी मौत तक औरंगजेब उत्तर भारत लौट नहीं सका 1911 में रविंद्रनाथ टैगोर ने मॉडर्न रिव्यू में एक लेख में लिखा कि शिवाजी एक हिंदू साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे जवाहरलाल नेहरू ने भी डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा शिवाजी हिंदू राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान के प्रतीक थे हालांकि उनका हिंदू
राज्य हिंदुओं और गैर हिंदुओं दोनों के लिए था उनकी सोच समावेशी थी वह हिंदू और मुस्लिम दोनों को एक जैसा समझते थे वह धर्म के आधार पर भेदभाव को घिनौना और अनैतिक मानते थे उनकी सेना में मराठों और दूसरे हिंदुओं की तरह मुसलमानों को भी शामिल किया जाता था उनकी नौसेना के दो आला अधिकारी दारिया सारंग वत जी और दौलत खान मुसलमान थे उनके एक और आला सैनिक अफसर नूर बेग थे जो मुसलमान थे शिवाजी ने अपने सलाहकारों के विरोध के बावजूद 700 पठानों को अपनी सेना में शामिल किया था शिवाजी महिलाओं के खिलाफ हिंसा
के सख्त खिलाफ थे उन्होंने सैनिकों को निर्देश दिया था कि छापा मारते वक्त किसी भी महिला को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए अगर कोई भी सैनिक महिलाओं के साथ बुरा सलूक करता पाया जाएगा तो उसे कड़ी सजा दी [संगीत] जाएगी तो यह कहानी थी छत्रपति शिवाजी महाराज की जिन्होंने अपना पूरा जीवन वीर और साहसी योद्धा के रूप में जिया जिन्होंने अपनी रणनीतिक और युद्ध कुशलता से मुगल और बीजापुर सल्तनत को बेचैन कर दिया और जिनका नाम इतिहास में हमेशा स्वर्णा अक्षरों में दर्ज रहेगा आज इतिहास गवाह है मैं बस इतना ही अगली बार फिर किसी और
दिलचस्प कहानी के साथ हाजिर होंगे हमारा यह कार्यक्रम आपको कैसा लगा कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए साथ ही अपने सुझाव भी हमें बताइएगा हमें आपके फीडबैक का इंतजार रहेगा अपना ख्याल रखिए [संगीत] [संगीत] नमस्कार [संगीत] [संगीत] [संगीत] i