15 जून 2015 रात के ठीक 12:00 बजे पूरा जगन्नाथपुरी शहर अंधेरे में डूबा हुआ था लेकिन यह कोई साधारण बिजली कटौती नहीं थी यह फैसला सोच समझकर लिया गया था और इसका कारण भगवान जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में एक बेहद गुप्त और रहस्यमय प्रक्रिया चल रही थी उस रात भगवान कृष्ण का असली दिल प्राचीन मूर्ति से निकाला जा रहा था और उसे एक नई मूर्ति में स्थापित किया जा रहा था पूरे पूरी शहर को अंधकार में रखना इस प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा था और इसे देखने वाले एकमात्र व्यक्ति ने जो खुलासा किया वह आपको
झकझोर कर रख देगा लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों किया गया और सबसे बड़ा सवाल क्या वाकई भगवान कृष्ण का दिल 5000 साल से भी ज्यादा समय तक संरक्षित रह सकता है या यह एक प्राचीन उन्नत उपकरण है जो मांस और मांस पेशियों से नहीं बना जगन्नाथ मंदिर के नियम और कानून इतने सख्त हैं कि इस पवित्र स्थान में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रवींद्रनाथ टैगोर आंबेडकर और महात्मा गांधी जैसे बड़े व्यक्तियों को भी प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई लेकिन ऐसा क्यों और 500 साल पुराने भविष्य मालिका ग्रंथ में इस मंदिर के बारे
में ऐसा क्या लिखा गया है जो कहता है कि जब यह मंदिर पानी में डूबेगा तब पूरी दुनिया का विनाश होगा आखिर वह दिन कब आने वाला है यह भी कहा जाता है कि लगातार 800 सालों से जगन्नाथ मंदिर में हर दिन ध्वज बदला जाता है लेकिन अगर किसी दिन यह ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा आखिर इसके पीछे का रहस्य क्या है और एक और बात मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करते समय 22 सीढ़ियां पार करनी होती हैं लेकिन इसमें से तीसरी सीढ़ी पर पैर रखना सख्त
मना है ऐसा क्यों इन सभी प्रश्नों के उत्तर और जगन्नाथ मंदिर का पूरा इतिहास साथ ही इससे जुड़े 15 ऐसे रहस्य जो विज्ञान और आस्था दोनों के नजरिए से आपको चौका देंगे तो आइए शुरू करते हैं इस अद्भुत और रहस्यमई डॉक्यूमेंट्री को जो आपको जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं अद्वित वास्तुकला और अनसुलझे रहस्यों की गहराइयों में ले [संगीत] जाएगी आपने लेकिन आज हम इन सबसे अलग बात करने वाले हैं आज हम बात करेंगे भगवान कृष्ण के हृदय से जुड़े उस रहस्य की जो सदियों से छुपा हुआ है हम बात करेंगे भविष्य मालिका की उस भविष्यवाणी की
जो पूरी दुनिया को हिला सकती है और इसके साथ-साथ हम इतिहास रहस्य और विज्ञान के दृष्टिकोण से मंदिर की अद्भुत कहानियों की पड़ताल करेंगे जगन्नाथ मंदिर भारत के ओड़ीशा राज्य के पूरी शहर में स्थित है और इसे दुनिया के सबसे रहस्यमय मंदिरों में से एक माना जाता है जगन्नाथ का अर्थ है जगत के स्वामी बद्रीनाथ द्वारिका और रामेश्वरम के साथ पुरी का जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक है इस मंदिर का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों जैसे ब्रह्म पुराण नारद पुराण और स्कंद पुराण के उत्कल खंड में मिलता है ऐसा माना जाता
है कि यह मंदिर सतयुग की शुरुआत से ही अस्तित्व में है और इसकी दिव्यता आज भी भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है जगन्नाथ मंदिर का सबसे बड़ा और सबसे अनसुलझा रहस्य है ब्रह्म पदार्थ जिसे भगवान श्री कृष्ण का हृदय भी माना जाता है यह ऐसा रहस्य है जो सदियों से भक्तों और वैज्ञानिकों दोनों को हैरान करता आ रहा है आइए जानते हैं इस दिव्य रहस्य की पूरी कहानी जहां आस्था और विज्ञान एक दूसरे से टकराते हैं हर 12 साल में जगन्नाथ मंदिर में एक विशेष और रहस्यमय परंपरा निभाई जाती है इस प्राचीन परंपरा के
तहत भगवान जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी से बनी पुरानी प्रतिमाओं की जगह नई प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है लेकिन इन पुरानी प्रतिमाओं में मौजूद एक दिव्य त्व को संभालकर नई प्रतिमा में स्थानांतरित किया जाता है इसे ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है यह रिचुअल इतना पवित्र और गुप्त होता है कि इसे निभाने के लिए कई कड़े प्रबंध किए जाते हैं इस रात पूरे पूरी शहर की बिजली पूरी तरह काट दी जाती है हर जगह अंधेरा कर दिया जाता है मंदिर की सुरक्षा सीआरपीएफ के कमांड में रहती है और किसी भी व्यक्ति का मंदिर के
अंदर जाना सख्त मना होता है इस प्रक्रिया को केवल मंदिर के मुख्य पुजारी ही संपन्न करते हैं लेकिन उन्हें भी ब्रह्म पदार्थ का रहस्य जानने की अनुमति नहीं होती इसलिए उनकी आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों में मोटे दस्ताने पहनाए जाते हैं यह सब इसलिए ताकि वे ना देख सके और ना ही महसूस कर सके कि ब्रह्म पदार्थ वास्तव में क्या है कुछ पुजारियों ने अपने अनुभव सांझा करते हुए बताया है कि जब मैंने इस ब्रह्म पदार्थ को छुआ तो मुझे एक अनोखी और शक्तिशाली ऊर्जा का अनुभव हुआ ऐसा लगा जैसे मेरे हाथ
में कोई जिंदा चीज थी जो किसी खरगोश की तरह उछल रही थी लोगों का मानना है कि यह ब्रह्म पदार्थ और कुछ नहीं बल्कि भगवान श्री कृष्ण का धड़कता हुआ दिल है जो आज भी 5000 सालों के बाद जीवित है अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए हैं तो इसे सब्सक्राइब करना ना भूले और वीडियो को लाइक जरूर करें हम सबके मन में यह सवाल जरूर उठता होगा आखिर भगवान श्री कृष्ण का हृदय यहां कैसे आया और क्या यह सचमुच संभव हो सकता है इस अद्भुत रहस्य को समझने के लिए हमें समय के पहियों
को घुमाना होगा और जाना होगा 3102 ईसा पूर्व में यानी करीब 5000 साल पहले एक ऐसा समय जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने लीला समाप्त कर इस पृथ्वी से विदा ली महाभारत युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र की धरती पर फैले लाखों शव और कौरवों के विनाश ने हर व्यक्ति को झकझोर दिया इसी विनाश के लिए गांधारी ने भगवान श्री कृष्ण को दोषी ठहराया अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में डूबी गांधारी ने कहा हे कृष्ण जैसे मेरे पुत्रों का वंश समाप्त हो गया वैसे ही तुम्हारा यादव वंश भी आपसी लड़ाई में नष्ट हो जाए और
36 वर्षों के भीतर तुम्हारी द्वारका समुद्र में समा जाएगी 36 वर्षों बाद गांधारी का यह श्राप सत्य साबित हुआ यादव वंश में आपसी झगड़े और क्रोध में लिपटे एक दिन नशे में चूर यादवों ने एक दूसरे को मारना शुरू कर दिया इस घटना के बाद द्वारका समुद्र में डूब गई यह विनाश स्पष्ट संकेत था कि भगवान श्री कृष्ण का पृथ्वी पर समय समाप्त हो चुका है अगर आपको भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी कैसे डूबी और इसके पीछे छिपे रहस्यों के बारे में जानना है तो वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दी गई लिंक पर क्लिक करें वहां
आपको पूरी कहानी विस्तार से जानने को मिलेगी भगवान श्री कृष्ण जंगल की ओर चले गए वह एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान मग्न हो गए तभी जरा नामक एक शिकारी ने उन्हें हिरण समझकर तीर चला दिया तीर उनके पैर में लगते ही जरा को अपनी गलती का एहसास हुआ वह माफी मांगने भगवान के पास पहुंचा श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा डरो मत यह सब मेरी लीला का हिस्सा है त्रेता युग में तुम राजा बाली थे मैंने राम अवतार में तुम्हें छल से मारा था और अब उसी कर्म का परिणाम है कि आज तुम
मेरे लिए मृत्यु का माध्यम बने हो इसके बाद श्री कृष्ण ने योग निद्रा में लीन होकर इस भौतिक संसार को त्याग दिया जब अर्जुन को इस दुखद समाचार का पता चला तो वह तुरंत पहुंचे और भगवान का अंतिम संस्कार किया लेकिन चमत्कार हुआ भगवान का पूरा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया सिवाय उनके हृदय के यह हृदय धड़कता हुआ और ऊर्जा से भरपूर जलने से बच गया यह दिव्य हृदय जिसे बाद में ब्रह्म पदार्थ कहा गया अर्जुन ने भगवान कृष्ण के दिव्य हृदय को एक लकड़ी के मंच पर रखा और उसे पवित्र नदी में प्रवाहित
कर दिया यह दिव्य हृदय नदी में बहता हुआ लंबे समय बाद ओड़ीशा के महानदी तट पर पहुंचा उस स्थान पर एक सब्र जनजातीय समुदाय रहता था इस जनजाति के मुखिया थे विश्ववासु जब उन्होंने इस दिव्य हृदय को लकड़ी के मंच पर तैरते हुए देखा तो वह चकित रह गए इस हृदय से एक दिव्य चमक निकल रही थी विश्ववासु ने तुरंत इसकी दिव्यता को पहचाना और इसे नील माधव के रूप में पूजना शुरू कर दिया उसी समय मालवा राज्य के राजा इंद्रद्युम्न जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे ने भगवान नील माधव के दर्शन करने की
प्रबल इच्छा व्यक्त की उनकी यह खोज आगे चलकर भगवान जगन्नाथ मंदिर के निर्माण की आधार शिला बनी लेकिन आगे बढ़ने से पहले इस वीडियो को एक लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिए क्योंकि यह आपके लिए एक सेकंड का काम है लेकिन इससे हमारी काफी बड़ी मदद होती है मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे एक रात भगवान विष्णु ने सपने में दर्शन देकर आदेश दिया कि वह उनकी दिव्य मूर्ति नील माधव को ढूंढे और उनके लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण करें भगवान ने संकेत दिया कि यह मूर्ति नीलांचल की
एक में छिपी हुई है राजा ने अपने ब्राह्मण पुजारी विद्यापति को नील माधव की खोज के लिए भेजा कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद विद्यापति ने आदिवासी मुखिया विश्ववासु के बारे में सुना जो एक गुफा में छिपी इस दिव्य मूर्ति की पूजा करता था विद्यापति ने नील माधव की पूजा की अनुमति मांगी लेकिन विश्ववासु ने इसे अपनी जनजाति का रहस्य बताते हुए मना कर दिया विद्यापति ने तब चालाकी से उनकी बेटी ललिता से विवाह कर लिया और इस प्रकार विश्ववासु का विश्वास अर्जित किया ललिता के माध्यम से विद्यापति ने विश्ववासु को मनाया और उसे
गुफा तक ले जाने के लिए राजी कर लिया यात्रा के दौरान विद्यापति ने चुपचाप रास्ते में सरसों के बीज गिरा दिए ताकि वह वापसी पर रास्ता पहचान सके जब विद्यापति ने पहली बार नील माधव की मूर्ति देखी तो वह उसकी दिव्यता से मंत्र मुग्ध हो गए तुरंत उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न को इस अद्वितीय मूर्ति के बारे में सूचित किया लेकिन जब राजा गुफा पहुंचे तो मूर्ति वहां से गायब थी विश्ववासु ने मूर्ति को छिपा दिया था यह सोचकर कि राजा इसे अपने साथ ले जाएंगे इस घटना से राजा इंद्रद्युम्न बेहद दुखी हुए तभी भगवान विष्णु ने
फिर से उन्हें सपने में दर्शन दिए और निर्देश दिया कि पुरी के समुद्र तट पर जाएं भगवान ने कहा एक विशाल नियम का पेड़ बहकर आएगा उसी पेड़ से मेरी नई मूर्ति बनाओ राजा ने आदेश का पालन किया और समुद्र तट पर अपने सेवकों को भेजा वहां उन्हें वह विशाल नीम का पेड़ मिला जिस पर भगवान विष्णु के प्रतीक शंख चक्र गदा और कमल उके हुए थे लेकिन पेड़ को उठाना आसान नहीं था कई प्रयासों के बावजूद पेड़ अपनी जगह से नहीं हिला अंततः आदिवासी मुखिया विश्ववासु की सहायता से यह पेड़ पुरी तक लाया गया
लेकिन कोई भी कुशल कारीगर उस लकड़ी से नील माधव की मूर्ति नहीं बना सका कारीगरों ने राजा से कहा हे महाराज यह लकड़ी इतनी मजबूत है कि हमारे हथौड़े और छेनी का इस पर कोई असर नहीं होता कृपया हमें माफ करें हम यह कार्य करने में असमर्थ हैं इस स्थिति से निराश राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु की प्रार्थना की भगवान विष्णु राजा के सपने में प्रकट हुए और कहा हे राजा देवताओं के दिव्य वास्तुकार विश्वकर्मा की पूजा करो वह यह कार्य पूर्ण करेंगे राजा ने भगवान की सलाह मानी और विश्वकर्मा की प्रार्थना की कुछ दिनों
बाद विश्वकर्मा एक बूढ़े आदमी के रूप में प्रकट हुए और राजा से बोले हे महाराज मैंने सुना है कि आप एक मूर्ति बनाना चाहते हैं राजा ने पूछा क्या आप यह कर सकते हैं विश्वकर्मा ने उत्तर दिया हां लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं विश्वकर्मा ने कहा मैं भगवान विष्णु की मूर्तियां एक बंद कमरे में 21 दिनों में बनाऊंगा इस दौरान मुझे कोई परेशान नहीं करेगा अगर किसी ने दरवाजा खोला तो मैं मूर्तियों को अधूरा छोड़ दूंगा राजा ने इन शर्तों को मान लिया और विश्वकर्मा ने काम शुरू कर दिया शोर मचाते हुए दरवाजा बंद हुआ
आरा छेनी और हथौड़े की आवाजें सुनाई दी लेकिन जब 15 दिन बाद भी कोई आवाज नहीं आई तो रानी गुंचा चिंतित हो गई उन्होंने राजा से कहा महाराज शायद वह बढ़ई भूख से मर गया है हमें दरवाजा खोलना चाहिए राजा ने मना किया लेकिन रानी ने जोर दिया और दरवाजा खोलने का आदेश दिया जैसे ही दरवाजा खुला सभी हैरान रह गए विश्वकर्मा गायब हो चुके थे और पीछे केवल तीन अधूरी मूर्तियां थी राजा को बहुत दुख हुआ कि शर्त तोड़ने की वजह से मूर्तियां अधूरी रह गई भगवान जगन्नाथ के हाथ और पैर अधूरे हैं बलराम
और देवी सुभद्रा की मूर्तियां भी अधूरी हैं जब राजा इंद्रद्युम्न उन मूर्तियों के पास गए तो उन्हें एक दिल की धड़कन महसूस हुई एक दिव्य आवाज आई जिसने राजा को बताया कि श्री कृष्ण का दिल इन मूर्तियों में है राजा ने इन मूर्तियों को स्थापित किया आज यही अधूरी मूर्तियां भगवान जगन्नाथ बलराम और देवी सुभद्रा के रूप में जगन्नाथ पुरी में पूजी जाती हैं भगवान जगन्नाथ को दुनिया का एकमात्र जीवित देवता माना जाता है जो अपने भक्तों की इच्छाओं को सुनते और पूरा करते हैं अब हम बात करते हैं उस ब्रह्म पदार्थ की जो 5000
साल से रहस्यमय तरीके से सुरक्षित है यह पदार्थ क्या है यह कैसे अब तक जीवित है और सबसे महत्त्वपूर्ण विज्ञान इस ब्रह्म पदार्थ के बारे में क्या थ्योरी देता है आइए इन सब पर विस्तार से बात करते हैं यह रहस्य आपके सारे सवालों का जवाब देगा यह निश्चित है कि यह हृदय रक्त और मांसपेशियों से नहीं बना था क्योंकि इसमें से एक दिव्य ऊर्जा निकल रही थी और हल्का कंपन महसूस हो रहा था फेमस आर्कियोलॉजिस्ट प्रवीण मोहन इस रहस्यमई कहानी को साइंस के नजरिए से समझते हैं उनका कहना है कि श्री कृष्णा सिर्फ एक इंसान
नहीं बल्कि एक सुप्रीम बीइंग थे उनके पास ऐसी प्राचीन शक्तियां थी जो आज की मॉडर्न साइंस के लिए भी अज्ञेय है थ्योरी के मुताबिक ब्रह्म पद पथ जिसे नील माधव या श्री कृष्ण का दिल कहा जाता है असल में एक आर्क रिएक्टर है यह एक ऐसा डिवाइस है जो भयंकर स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता रखता है इस थ्योरी के जरिए वह जगन्नाथ मंदिर के रहस्यों को समझाने की कोशिश करते हैं उन्होंने बताया कि जगन्नाथ की मूर्तियां लकड़ी से बनाई जाती हैं क्योंकि लकड़ी इलेक्ट्रिसिटी कंडक्ट नहीं करती ब्रह्म पदार्थ से उत्पन्न ऊर्जा को नियंत्रित
करने का एक तरीका है करीब 50 साल पहले एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसने इस दिल को देखा था उसने कहा कि यह दिल चांदी जैसा तरल बहा रहा था और यही तरल लकड़ी को कमजोर कर देता है यही कारण है कि हर 12 साल में मूर्तियों को बदलना पड़ता है उस व्यक्ति ने यह भी दावा किया कि दिल को जब प्रकाश में लाया गया तो यह चक्र की तरह घूमने लगा और जोर से वाइब्रेट करने लगा उसने कहा कि यह दिल अष्ट धातु से बना है इसके अलावा जब इस ब्रह्म पदार्थ को
मूर्ति से बाहर निकाला जाता है तो यह सक्रिय ना हो जाए इसे रोकने के लिए पूरे पूरी शहर की बिजली बंद कर दी जाती है यह प्रक्रिया आज भी वैज्ञानिकों और श्रद्धालुओं के लिए रहस्यमय बनी हुई है यह था ब्रह्म पदार्थ यानी भगवान कृष्ण के हृदय का रहस्य जिसे आज तक विज्ञान भी पूरी तरह से सुलझा नहीं पाया है लेकिन जगन्नाथ मंदिर के सारे रहस्यों को हम एक ही वीडियो में नहीं समेट सकते इसका दूसरा भाग जल्द ही लाएंगे अगले भाग में हम जानेंगे भविष्य मालिका ग्रंथ की उन भविष्यवाणियों के बारे में जो जगन्नाथ मंदिर
से जुड़ी हैं जानेंगे कि हर रोज ध्वज क्यों बदला जाता है अगर 22 सीढ़ियों में से तीसरी सीढ़ी पर कदम रख दिया तो क्या होता है सुदर्शन चक्र की वह अद्भुत शक्ति क्या है और सात बर्तनों में बनने वाली रसोई का क्या रहस्य है साथ ही ध्वज का हवा की विपरीत दिशा में लहराना यह सच है या सिर्फ एक मिथक अगर आपके मन में जगन्नाथ मंदिर को लेकर कोई सवाल है तो हमें कमेंट में जरूर बताएं हम उसे दूसरे भाग में कवर करेंगे तो दोस्तों आपको यह वीडियो कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताएं और चैनल
को सब्सक्राइब कर करना ना भूलें मिलते हैं जगन्नाथ मंदिर के रहस्यों के दूसरे अध्याय में तब तक के लिए धन्यवाद जय हिंद जय भारत [संगीत]