दोस्तों जिनकी वाणी से कभी हस्तिनापुर को [संगीत] धर्म का सही मार्ग मिलता था। जिनकी बुद्धि के आगे बड़े-बड़े योद्धा भी सिर झुका देते थे। वहीं महात्मा विदुर अब वन में कठोर तपस्या कर रहे थे। वे संसार से विदा लेने की तैयारी में थे। जब धर्मराज [संगीत] युधिष्ठिर ने उन्हें वन में देखा तो उनकी आंखें नम हो गई। लेकिन विदुर [संगीत] के चेहरे पर अद्भुत शांति थी। ना कोई मोह ना कोई भय। और तभी विदुर ने युधिष्ठिर से ऐसी बात कही जिसे सुनकर उनका हृदय कांप उठा। तो दोस्तों इस रहस्य को जानने के लिए वीडियो को
अंत तक जरूर देखिए। तो चलिए दोस्तों वीडियो शुरू [संगीत] करते हैं। महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था। सभी कौरव मारे जा चुके थे और युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बन गए थे। पुत्रों के दुख और शोक से टूटे हुए धृतराष्ट्र ने राजमल छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपनी पत्नी गांधारी, कुंती, विदुर और संजय के साथ तपस्या करने के [संगीत] लिए वन का मार्ग अपनाया। वन में वे महर्षि वेदव्यास के आश्रम में रहने लगे। वहीं उन्होंने सादा जीवन अपना लिया और तपस्या में समय बिताने लगे। एक दिन श्री कृष्ण और पांडव धृतराष्ट्र से मिलने वेदव्यास के
आश्रम पहुंचे। वहां पांडवों ने जो दृश्य देखा वो उनके हृदय को छू लेने वाला था। धृतराष्ट्र सिर पर घड़ा रखकर पानी लाने जा रहे थे। माता कुंती आश्रम में झाड़ू लगा रही थी और माता गांधारी आश्रम के कामों में लगी हुई थी। यह दृश्य देखकर युधिष्ठिर की आंखों में आंसू भर आए। [संगीत] वे भावुक होकर बोले ताज श्री यह सब क्या है? आप तो हस्तिनापुर के महाराज थे। आपको यह सब करने की क्या आवश्यकता है? जिनकी सेवा में दिन रात दासियां [संगीत] लगी रहती थी। आज वे खुद सेवक की तरह काम कर रहे हैं। इतना
कहकर युधिष्ठिर कुछ पल के लिए मौन हो गए। फिर धीरे से आगे बोले, ताज श्री यदि हमसे कोई भूल हुई [संगीत] है, यदि हमारे कारण आपको यह दिन देखना पड़ रहा है, तो हमें क्षमा कर दीजिए। हम आपके अपराधी हैं। आपने जीवन भर हस्तिनापुर को संभाला और आज आप ही कष्ट उठा रहे हैं। यह देखकर मेरा हृदय व्याकुल हो उठा है। कृपा करके हमारे साथ हस्तिनापुर लौट चलिए। वहां आपकी सेवा करना ही हमारा सौभाग्य होगा। आपके चरणों की सेवा ही हमारे लिए सबसे बड़ा धर्म है। धृतराष्ट्र हल्की मुस्कान के साथ बोले पुत्र जो खुद को
भगवान की सेवा में समर्पित कर देते हैं। वे दूसरों से सेवा नहीं करवाते अपना काम खुद करना ही सच्ची साधना है। राज सिंहासन पर बैठकर मैंने संसार को देखा था। लेकिन अब त्याग [संगीत] के रास्ते पर चलकर मैं अपने आप को देख रहा हूं। यही मेरे जीवन [संगीत] की बची हुई यात्रा है और इसी में मुझे सच्ची शांति मिल रही है। इसलिए तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ। प्रजा की सेवा करो। वही तुम्हारा सच्चा धर्म है। इतना कहकर धृतराष्ट्र कुछ पल के लिए मौन हो गए। फिर धीरे से आगे बोले याद रखो पुत्र राजा का जीवन
उसका अपना नहीं होता। वह अपनी प्रजा का होता है। यदि तुम धर्म और न्याय से राज्य चलाओगे तो वही मेरे लिए सबसे बड़ी संतोष और शांति होगी। यह सुनकर युधिष्ठिर [संगीत] और भी व्याकुल हो उठे। उनकी आंखें नम थी। वाणी कांप रही थी। वे बोले ताज श्री यदि आप हस्तिनापुर वापस नहीं चलेंगे तो मैं भी यहीं रहकर आप सबकी सेवा करूंगा। इस पर धृतराष्ट्र [संगीत] गंभीर स्वर में बोले पुत्र जब मैं हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर बैठा था तब मैं राजा कम और पिता अधिक था। मैं सदा पुत्र मोह में बंधा रहा। उसी मोह और
माया ने मेरे विवेक को ढक लिया। मैं देख नहीं सका कि कौन सही है और कौन गलत। मोह के कारण मैं सत्य को पहचान नहीं पाया। धर्म और अधर्म में अंतर समझ नहीं सका। मैंने कई बार अन्याय होते देखा। पर मेरा हृदय दुर्योधन के पक्ष में झुकता रहा। आज सोचता हूं यदि उस समय मैंने मोह त्याग कर न्याय का साथ दिया होता तो शायद इतना बड़ा विनाश ना होता। यह जो महाभारत का युद्ध हुआ यह केवल राजसत्ता की लड़ाई नहीं थी। यह मेरे अंधे प्रेम और कमजोर निर्णयों का परिणाम भी था। अंधा मैं केवल आंखों
से नहीं था। पुत्र मैं अपने मोह से भी अंधा हो गया था। और उसी अंधे मोह का परिणाम आज हमारे सामने इतना बड़ा शोक बनकर खड़ा है। इतना कहकर धृतराष्ट्र ने गहरी सांस ली और शांत स्वर में कहा अब मैं इस मोह माया से दूर होकर अपने जीवन [संगीत] की शेष सासे प्रभु स्मरण और तपस्या में बिताना चाहता हूं। ताकि मेरे मन को शांति मिले और आत्मा को सच्चा मार्ग। इसलिए तुम सब हस्तिनापुर लौट जाओ। राज्य का भार संभालो। प्रजा की सेवा ही अब तुम्हारा सबसे बड़ा धर्म है। इतना कहकर वे कुछ पल के लिए
मौन हो गए। फिर धीरे [संगीत] से आगे बोले युधिष्ठिर तुम्हारे काका श्री विदुर तो महान तपस्वी बन गए हैं। यह सुनकर युधिष्ठिर चौंक उठे। वे व्याकुल स्वर में बोले तात्री आप क्या कह रहे हैं? काका श्री विदुर महान तपस्वी बन गए हैं। तभी वहां मौजूद महर्षि वेदव्यास ने शांत स्वर में कहा, हां युधिष्ठिर विदुर घोर तपस्या कर रहे हैं। उन्होंने अन्न और जल दोनों का त्याग कर दिया है। वे केवल हवा के सहारे ही अपना जीवन चला रहे हैं। वे वन में एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकते। सदा भ्रमण करते रहते हैं। उनका
मन अब संसार से पूरी तरह हट चुका है। यह सुनकर युधिष्ठिर बोले, मैं काका श्री को कहीं से भी ढूंढ कर लाऊंगा। इतना कहकर वे बिना देर किए उन्हें [संगीत] खोजने के लिए वन की ओर निकल पड़े। उनके मन में चिंता भी थी और कर्तव्य का भाव भी। जब विदुर ने दूर से युधिष्ठिर को अपनी ओर आते देखा तो वे तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे। मानो वे उनसे मिलना नहीं चाहते हो। युधिष्ठिर उन्हें पुकारते हुए पीछेछे चलते रहे। काका श्री ठहरिए। लेकिन विदुर जी ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वन अब और
भी घना हो चुका था। चारों ओर सन्नाटा था। ऊंचे ऊंचे वृक्ष थी। शांत वातावरण और पत्तों की हल्की [संगीत] सरसराहट आखिर में विदुर एक बड़े पेड़ के नीचे रुक गए। उनका शरीर बहुत दुबला हो गया था। लेकिन उनके चेहरे पर अलग ही चमक थी। ऐसी शांति जो तपस्या और भगवान के भजन से मिलती है। युधिष्ठिर थके हुए और भावुक होकर उनके पास पहुंचे। वे झुककर विदुर के चरणों में गिर पड़े और बोले काका श्री क्या मुझसे कोई गलती हो गई है। आप मुझे देखकर क्यों भाग रहे थे? हे महात्मा हे महाज्ञानी क्या अपने लोगों से
बिछड़ना ही हमारे भाग्य में लिखा है। युद्ध भूमि में न जाने कितने रिश्ते हमारे हाथ से छीन गए। पौत्र से लेकर पितामह तक अब तात्री और माता श्री भी हमसे दूर हो गए हैं। पर आप हमसे दूर मत जाइए काका श्री तब विदुर ने धीरे और गंभीर होकर कहा पुत्र मैं तुमसे दूर नहीं भाग रहा था। मुझे पता था कि तुम अकेले मुझे नहीं खोज पाओगे। इसलिए मैं खुद तुम्हारे सामने आया हूं और जानबूझकर तुम्हें अपने पीछे लगाकर यहां ले आया हूं। सबसे दूर इस एकांत में क्योंकि जो बात मैं तुमसे कहना चाहता हूं वो
सबके सामने [संगीत] नहीं कही जा सकती थी। इसलिए मैंने यह रास्ता चुना और तुम्हें सबसे दूर इस जंगल में लाया। यह सुनकर युधिष्ठिर [संगीत] भावुक होकर बोले काका श्री मुझे समझ नहीं आ रहा कि आप ऐसी कौन सी बात कहना चाहते हैं जो आप किसी और के सामने नहीं कह सकते। विदुर जी शांत स्वर में बोले पुत्र अब मैं अपने शरीर त्यागना चाहता हूं। यह सुनकर [संगीत] युधिष्ठिर की आंखें भर आई। वे कांपते स्वर में बोले काका श्री ऐसा मत कहिए आप हमें छोड़कर नहीं जा सकते। आपकी चतुराई आपका ज्ञान आपकी नीति के बिना मैं
राज्य कैसे संभाल पाऊंगा? मुझे आपकी आवश्यकता है। तब विदुर ने शांत स्वर में कहा पुत्र निराश मत हो। शरीर का जाना बिछड़ना नहीं होता। सच्चा संबंध आत्मा का होता है। देह का नहीं। हम दोनों अलग नहीं है। पुत्र हमारे शरीर भले ही अलग-अलग हो लेकिन हमारी आत्मा एक ही है। तुम नहीं जानते हो पुत्र। हम दोनों उसी दिव्य शक्ति के अंश हैं जिसे लोग यम कहते हैं। मृत्यु अंत [संगीत] नहीं है। यह केवल एक परिवर्तन है। यह शरीर नश्वर है। एक दिन इसे मिटना ही है। इसलिए मैं इस देह का त्याग कर अपनी चेतना को
तुम्हारी चेतना में विलीन करना चाहता हूं। ताकि मेरा ज्ञान, मेरा अनुभव, मेरी नीति और मेरा धर्म सब तुम्हारे भीतर जीवित रहे। अब भय मत करो। बिना पलक झपकाए मेरी आंखों में देखो। युधिष्ठिर ने आंसू पोंछे और दृढ़ होकर विदुर की आंखों में देखने लगे जैसे एक आत्मा दूसरी आत्मा से संवाद करने जा रही हो। और देखते [संगीत] ही देखते विदुर ने शांत भाव से अपने प्राण त्याग दिए। दोस्तों अब आपके लिए एक सीधा सा सवाल है। आपको क्या लगता है? क्या आत्मा का संबंध वास्तव में देह से परे होता है? जैसा विदुर जी ने कहा।
आपका जवाब क्या है? अपना जवाब हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो अभी हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें और वीडियो को लाइक शेयर करना ना भूलें। जय श्री कृष्णा। ओ