फूड क्रिटिक पुष्पेश पंत कहते हैं कि 10 किमी के दायरे में तमाम प्रकार के समोसे मिलते हैं किसी में महीन धनिया है तो किसी में साबुत किसी में लहसुन किसी में काजू तो किसी में पनीर ठोस दिया जाता है कोई समोसा मीठा है जिसमें खोया या कहे मावा भर दिया गया है तो कोई चॉकलेट वाला समोसा बेच रहा है समोस का संसार निराला है पर असल में समोसे बनाए कैसे जाते थे 11वीं सदी में फारसी इतिहासकार अबुल फजल बेहा की पहली बार समोसे का जिक्र करते हैं इसे गोश्त नट्स और ड्राई फ्रूट से भरकर बनाया
जाता था पूरे सिल्क रूट में समोसे का जिक्र मिलता है लेकिन भारत की तरफ यात्रा में समोसा थोड़ा बदल गया आज हमारे समोसे में आलू भरा मिलता है समोसे के सिग्नेचर स्वाद की पहचान भी इसी आलू से है समोसे क्या भारत की तमाम डिशेस में आलू का खासा दबदबा है और भारत ही क्या आलू का दबदबा पूरी दुनिया में है चाहे काउच पोटैटो जैसे मुहावरे हो या रशियन वोट का फ्रेंच फ्राइज हो या पराठे यत्र तत्र सर्वत्र आलू हर जगह विराजमान है पर जितने आमय आलू आज लगते हैं इतने आमय हमेशा से थे नहीं कभी
इन्हें शैतान का सेब कहा गया कभी जानवरों को खिलाया गया एक और ताज्जुब की बात यह कि आलू नाइट शद पौधों के परिवार से आता है जिसमें कई पौधे टॉक्सिक होते हैं जंगली आलू में भी यह खतरनाक टॉक्सिन पाए जाते थे तो फिर ये आलू जंगल से हमारी प्लेट तक आए कैसे और ऐसा आए कि हर जगह अपनी जगह बना ली आइए आज जानते हैं आलू सबसे पहले कहां उगाए गए कैसे यह पूरी दुनिया में फैले और इन्हें भारत लेकर कौन आया नमस्कार मेरा नाम है अंकुर और आप देख रहे हैं ऐतिहासिक किस्से कहानियों से
जुड़ा हमारा रोजाना का कार्यक्रम तारीख जिसमें आज कहानी आलू की ब्रॉट टू यू बाय पंजाब नेशनल बैंक भरोसे का प्रतीक [प्रशंसा] दक्षिण अमेरिका के माचू पिचू में प्राचीन इंका सभ्यता के सुराग मिलते हैं समंदर से करीब ढाई किलोमीटर ऊपर उरु बांबा में बसी सभ्यता इसे खोया हुआ शहर कहा जाता है दुनिया के प्राचीन सात अजूबों में एक यह भी है सभ्यता तो यहां खूब फली फुली लेकिन यहां का जीवन आसान नहीं रहा होगा भूकंप मौसम की मार और जानलेवा ऊंचाई ट्रांस से लेकर फसल उगाने तक यहां लोगों की जिंदगी मुश्किल बनाने वाली चीजें कम नहीं
थी फिर भी प्राचीन लोगों ने यहां रहने का रास्ता खोज ही लिया शहर बसाए शायद इस काम में आलू ने अहम भूमिका निभाई होगी दरअसल आज से करीब सात 8000 साल पहले बोलीविया और पेरू की सीमा के बीच इंडीज की पहाड़ियों में खानाबदोश लोगों ने पहली बार आलू की खेती शुरू की और अगले करीब 6000 साल तक ये यहीं लोगों के बीच राज बनकर रहा जब जब तक साल 1533 में यूरोपीय फ्रांसिस्को पिजारो ने पेरू पर हमला ना कर दिया खोजने तो यह सोना चांदी आया था पर हाथ लगा आलू शायद यह पहला यूरोपीय बना
जिसने आलू को देखा इसी वक्त करीब साल 1537 में कोलंबिया में आलू के बारे में पहला रिकॉर्ड मिलता है कुछ जगहों पर आलू का नाम बटाटा भी लिखा मिलता है पर आलू के साथ समस्या यह थी कि ये नाइट शिद पौधों से जुड़ा है जो कि जहरीले हो सकते हैं धतूरा भी इसी परिवार का हिस्सा है आलू की शुरुआती किस्मों में भी ऐसे केमिकल पाए जाते थे जो कि इंसानों के लिए हानिकारक थे हालांकि किसी तरह प्राचीन इनका लोगों ने आलू की ऐसी किस्में बनाई जो खाने लायक थी कुछ जगह जिक्र मिलता है कि आलू
को मिट्टी के साथ मिलाकर खाया जाता था ताकि इसमें मौजूद हानिकारक केमिकल सोलानिन मिट्टी के तत्वों से बाइंडर जाए और कम नुकसान पहुंचाए आज भी कुछ जगह पर यही परंपरा है पर प्राचीन लोगों ने कैसे जंगली आलू को खाने लायक बनाया इस बारे में ज्यादा जिक्र नहीं मिलता है खैर पिजारो के हमले के बाद आलू का रास्ता यूरोप के लिए खुला स्पेनिश लोगों को आलू मिले इतिहासकार इसे द ग्रेट कोलंबियन एक्सचेंज कहते हैं शुरुआती दिनों में इसे जानवरों के खाने के तौर पर बेचा जाता था या फिर जहाजी बेड़ों में खाने के लिए इस्तेमाल किया
जाता था समझा जा सकता है जहां एक तरफ मीठे और रंग बिरंगे फल और सब्जियां हो वहां बेस्वाद मटमैला से आलू को कौन ही इज्जत देता दूसरे तरफ आलू की वैरायटी को विदेशों में उगाना भी आसान नहीं था इंडीज की पहाड़ियों और यूरोप के मौसम में काफी फर्क था फिर भी आलू फैला 1600 तक आलू ज्यादातर पश्चिमी यूरोप में दस्तक दे चुका था साल 1596 में इसका पहला साइंटिफिक रिकॉर्ड भी मिलता है लेकिन यूरोपीय इसे शैतान का फल मानते थे क्यों क्योंकि यह जमीन के नीचे उकता था नरक के ज्यादा करीब माना जाता था इसे
नाम दिया गया शैतानी फल वहीं इंग्लैंड में आलू की कहानी थोड़ी अलग थी कहानी कहती है कि कैनरी आइलैंड से एक शख्स रानी एलिजाबेथ के लिए आलू लेकर आता है आलू उगाए जाते हैं पर पकाने वाले को यह नहीं पता था कि आलू के पौधे में पकाएं क्या तो मासूम आदमी ने जहरीली पत्तियां पका दी और जमीन के नीचे का आलू फेंक दिया जिसके बाद लोगों की तबीयत खराब हो गई और सालों तक आलू से कन्नी काट ली गई पर अपने देशों में ना सही यूरोपी हुकूम तों ने अपने ने कॉलोनियों में आलू को बाकायदा
पहुंचाने की कोशिश की किसी फिक्र कि जहरीला पौधा औपनिवेशिक देशों में लोग खाएं या ना खाएं मसलन ऑस्ट्रेलिया बसाने के लिए इंग्लैंड से कैदी भेजे गए आलू भी भेजा गया हम पहले तारीख के एपिसोड में ऑस्ट्रेलिया के बसाने की कहानी बता चुके हैं लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा खैर जहां-जहां यूरोपीय गए वहां वहां आलू भी पहुंचा भारत से लेकर अफ्रीका आयरलैंड से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक आलू अपनी पहचान बनाता गया चीन की मिंग डायनेस्टी में आलू डच लेकर जाते गए अकाल से जूझ रहे चीनियों के लिए आलू वरदान से कम ना था भारत में आलू
पुर्तगाली लेकर आए लेकिन शुरुआती दिनों में यह तटों तक ही सीमित रहा डच और ब्रिटिश भी शुरुआती दौर में आलू के फैलने के लिए जिम्मेदार रहे हम जानते हैं कि ब्रिटिश एंबेसडर थॉमस रो को जहांगीर के दरबार में भेजा गया था रो के पादरी एडवर्ड टेरी अपनी यात्रा के लेखों में भारत में पहली बार आलू का जिक्र करते हैं धीरे-धीरे यूरोपीय व्यापारी अपने साथ आलू को भारतीय शहरों में फैलाते हैं 19वीं सदी तक उत्तर भारत और बंगाल में आलू उगाए जाने लगे बंगाल की बिरयानी में आलू के लिए इन्हें धन्यवाद दे सकते हैं खैर भारत
में जैसा मौसम और जलवायु है वहां कोई फसल उगाना ताज्जुब नहीं पर वैराइटल शुरुआती दिनों में भारतीय उपमहाद्वीप में आलू की खेती दुनिया की 1 फीसद थी हालांकि 300 साल बाद नई खोजों और वैराइटीज के आने के बाद आलू ने हर थाली में अपनी जगह बनाई बहरहाल यूरोप में आलू के फैलने की कहानी थोड़ी ड्रैमेटिक है 18वीं सदी के बीच यूरोप युद्ध और लड़ाइयां की जद में था इन युद्धों के बीच दो दिक्कतें आई एक तो सेना का पेट भरने के लिए अनाज और दूसरा जनता की फसलों को सुरक्षित रखना क्योंकि सैनिक जब कहीं हमला
करते तो फसलों को लूट कर ले जाते बर्बाद कर देते ऐसे में खाने के लाले पड़ने लगे तब पिक्चर में आलू आते हैं चूंकि आलू जमीन के नीचे रहते इसलिए ऐसा विरले ही होता कि सैनिक कहीं रेड करें और रेड के के बीच रुककर आलू खोदे और ले जाएं ऐसे में किसानों ने आपदा में अवसर देखा आलू युद्ध से बचने का जरिया बना यह अवसर प्रशिया के सम्राट फ्रेडरिक द ग्रेट ने भी देखा आलू की फसल को बढ़ावा दिया भुखमरी का इलाज आलू से निकला इसी के चलते फ्रेडरिक को पोटैटो किंग कहा गया आज भी
इनकी कब्र में लोग आलू छोड़कर जाते हैं आलू को लेकर नजरिया बदल रहा था जिसे जानवरों का खाना और शैतानी समझा जाता था व आलू गरीबों के लिए वरदान निकला जैसा कि जेम्स लंग अपनी किताब नोट्स ऑफ पोटैटो वॉचर में जिक्र करते हैं ग्रामीण इलाकों में आलू को खास तवज्जो दी गई क्योंकि यह प्रति एकड़ ज्यादा न्यूट्रिशनल उपज देता था खासकर आयरलैंड में यह फायदे का सौदा था क्योंकि किसान किराए की जमीन पर खेती करते थे और जैसे-जैसे लैंडलॉर्ड जमीनों का किराया बढ़ाते गए किसान कम से कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा फसल उगाने के
लिए मजबूर होते गए ऐसे में आलू काम में आया क्योंकि यह उगाने में आसान था और आसानी से स्टोर किया जा सकता था अब आलू के साथ सब कुछ अच्छा था जिसके चलते दुनिया के तमाम महाद्वीपों में यह फैला पर एक वक्त में आलू आयरलैंड के लोगों के लिए काल भी बना हमने समझा कि आलू आयरलैंड में खासे अहम हो गए ये इतने फायदेमंद थे कि 17वीं सदी में एक एकड़ में उगाए गए आलू और एक दुधारू गाय छह से आठ लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए पर्याप्त थे किसी और अनाज से ऐसा
करना मुश्किल था देश में आलू एक स्टेपल फसल के तौर पर बढ़ने लगती है कार्बोहाइड्रेट और मिनरल्स से भरपूर आलू गरीबों का पेट भरने के लिए बेहतर साधन था क्योंकि ब्रिटिश आयरलैंड की कीमती फसलों को निर्यात कर देते थे उन्हें बाहर बेच देते थे ऐसे में देश के लोगों के लिए आलू एक सहारा बने आयरलैंड की लगभग आधी आबादी कुछ 85 लाख लोगों के खाने का मेन जरिया आलू ही था देश इसी एक फसल पर निर्भर सा था लेकिन 1840 के दशक में आलू की फसल में एक आपदा दस्तक देती है किसानों के आलू काले
से पड़ जाते हैं जो भी इन्हें खाता है उसे भयंकर पेट दर्द की शिकायत होती है और कुछ मामलों में मौत की बात भी सामने आई आज आप जानते हैं कि इसके पीछे एक फंगस थी पर उस वक्त पर यह पहेली ही था आखिर यह अनजान बीमारी है क्या इस बीमारी को नाम दिया गया द ब्लाइट क्योंकि आयरलैंड ज्यादातर सिर्फ एक ही फसल पर डिपेंडेंट था हालात खराब होते गए बाकी यूरोपीय देशों में भी ब्लाइट फैला पर आयरलैंड इसके केंद्र में था वहीं आयरलैंड इंग्लिश कंट्रोल में था इसलिए प्रशासन ने भी कोई खास मदद नहीं
की खाना पूर्ति के लिए कुछ मक्का अमेरिका से मंगाया गया निर्माण कामों में बढ़ावा देने की कोशिश की गई ताकि लोगों को काम मिले पर यह नाकाफी था काम के लिए लोगों को दूर तक जाना पड़ता था और जो खाना मिलता उसमें न्यूट्रिशन कम ही रहता था एक कहानी थॉमस मलोन की मिलती है जो कि 18 किमी चलकर काम पर जाता था एक रोज काम से वापस आते वक्त व अचानक गिर पड़ा और मर गया पीछे छोड़ गया छह बच्चे और पत्नी 1846 तक नमी वाला मौसम वापस आया फसल को करीब 75 फीस यील्ड कम
हो गई 7 साल बाद मौसम ठीक हुआ और फसल को उपज वापस लाइन पर आना शुरू हुई लेकिन अब तक 10 लाख लोग अपनी जान से हाथ धो चुके थे 20 लाख लोग पलायन कर चुके थे इतिहास में यह घटना आयरिश फेमाइनस के सबसे कुख्यात अकालोली के बावजूद आज आलू दुनिया के लगभग हर महाद्वीप में मौजूद है अंटार्कटिका के रिसर्च सेंटर से लेकर स्पेस में इसकी खेती तक आलू ने अपनी छाप बखूबी छोड़ी हमें कमेंट्स में बताइए आपकी फेवरेट आलू की डिश कौन सी है आज के तारीख में इतना ही इसे लिखा था राज विक्रम
ने अपना ख्याल रखिए और देखते रहिए द ललन टॉप [संगीत]