हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ह [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] बोल हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओम प्रभु जी ओम ओम प्यारे जी ओम ओम सुखदाता ओम ओम ज्ञान स्वरूपा आत्म रूपा आनंद रूपा ओम ओम [प्रशंसा] ओम नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण भगवान इस जगत की स्थिति को जानते हैं और जगत के लोग कैसा दुख
बनाते हैं वह भी जानते हैं और कैसा दुख मिटाया जाता है वे बेचारे नहीं जानते दुख बनाना तो जानते हैं दुख मिटाना नहीं जानते दुख मिटाने के साधन ऐसे करते कि और दुख बढ़ भगवान जानते हैं भगवान दुख मिटाना जानते हैं हम लोग दुख मिटाना नहीं जानते दुख बनाना हम जानते हैं हम लोग दुख बनाना जानते हैं दुख भगवान ने नहीं बनाया दुख भगवान ने नहीं बनाया और दुख हम चाहते नहीं चाहते नहीं है फिर भी बनाए जाते हैं जिस चीज को आप चाहते नहीं जिस चीज से नफरत है जिस चीज से आप दूर भागना
चाहते वह अनजाने में बनाए जाते हैं दुख भगवान ने बनाया नहीं दुख हम चाहते नहीं दुख हम करता ही नहीं चाहते और दुख भगवान ने बनाया नहीं और हम बनाना नहीं चाहते और बनाए जा रहे हैं इसका पता भी नहीं चलता तो भगवान कृपा करके जैसे बच्चा गंदगी में मैले में हाथ घुमा घुमा के फिर अपने मुंह को शरीर को अथवा नाक बहता टता है अब उसको दुख चाहता नहीं लेकिन दुख बढ़ाने का काम कर रहा है अग्नि में हाथ डालता है नाली की तरफ जाता है सांप की तरफ बिच्छू की तरफ जाता है चाहता
नहीं मैं दुखी हूं जब दुख बनने के दुख की तरफ जाता है जब दुख होता है तब चिल्लाता है ऐसे ही हम लोग दुख बना लेते अनजाने में चिल्लाते चिल्लाते चिल्लाते ज अंतर गहराई में चले जाते तो अंतरात्मा परमात्मा जैसे बच्चा चिल्लाता है तो मां उसे उठा लेती संभाल लेती दुख से दूर कर देती ऐसे हम जब प्रार्थना पुकार करते हैं तो दुख से दूर होने का उपाय भगवान के द्वारा मिल जाता है आम आदमी को एक भर्म घुसाए कोई ऐसा बड़ा आदमी था किसी ने कहा भाई हम सत्संग में जाते हैं बड़ा आनंद है
सत्संग में पाप ताप मिटते हैं बोले जाओ आप लोग जाओ कौन मना करता है हम पापी थोड़े हैं कि सत्संग में जाएंगे हम पापी थोड़े हैं कि सत्संग में जाएंगे सत्संग में तो पाप मिटाने को जाते हमने पाप किए ही नहीं तो हम का को जाए उस बुद्धू को पता ही नहीं कि सत्संग में खाली पाप में ऐसा नहीं सत्संग में ज्ञान बढ़ता है सूझबूझ बढ़ती है आरोग्य बढ़ता है पुण्य बढ़ता है अभी बोलते कि हमने पाप किए नहीं लेकिन जब दुख आता है परेशानी आती तो क्या नहीं करते हो पिया हुआ पानी शरीर से
नहीं निकलता है तो शरण जाते हो डॉक्टर की खाया हुआ अगर नहीं निकलता नीचे से तो फिर शरण जाते हो डॉक्टर से ऐसे ही जगत का राग द्वेष घुसा हुआ है तो सत्संग रूपी डॉक्टर में जाना चाहिए पाप नहीं किया सत्संग में पाप मिटते और मैंने पाप किया नहीं यह कोई तर्क है शिव जी ने क्या पाप किया शिव जी पार्वती को ले जाते अगस्त गुरु के आश्रम में सत्संग सुनने को श्री कृष्ण भगवान शिव कहते हैं वार वार ार मांगू हर्ष दियो सिया रंग पद सरो जन पायनी भक्ति सदा सत्संग शिवजी राम जी से
कहते हैं आपके चरणों में प्रीति मिल जाए आप मा अंतरात्मा रूप राम अब शिव जी ने क्या पाप किया है कि भक्ति सदा सत्संग मांगते सं काद ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र है अगर कोई सत्संग और ऋषि मुनि का नहीं मिलता तो एक भाई सत्संग करता और तीन भाई सुनते हैं सदा पाच साल के बालक रहते हैं ऐसी योग शक्तियां है लोक लो कांतर में जा सकते हैं नारद जी के बड़े भाई भगवान राम जी वशिष्ठ जी के सत्संग में जाते हैं सीता जी को ले जाते लक्ष्मण भैया को भरत शत्रुगन और दशरथ जी
भी जाते सत्संग में बाबू जी को तो ना जाने क्या-क्या कमिया है व दशरथ को इतनी कमिया नहीं थी जितनी आजकल के अहंकार हों को कमी कमिया सताती फिर भी सत्संग में जाते थे वनवास होने के समय भी श्री रामचंद्र जी भरद्वाज आश्रम में सत्संग को गए अत्री आश्रम में सत्संग को गए और ऋषि मुनियों के पास गए सीता जी को भी ले गए और अनुस जी मिली तो अनुसया जी के चरणों में सीता जी को भेजा सत्संग करने को सत्संग से जो ज्ञान मिलता है सत्संग से जो दुख नाशिनी शक्ति मिलती है उसका बयान
दुनिया की कोई औषध या कोई सुविधा नहीं कर सकती वृंदावन के तरफ एक लड़की रहती थी उसकी शादी हो गई बच्चे को लेकर पति के साथ कहीं कार में जा रही थी ड्राइवर की लापरवाही से धड़ा थंबे से टकराई गाड़ी ड्राइवर पति मर गया और खुद को तीन चोट लगी शरीर आगरे की अस्पताल में एक साल तक पड़ी रही लोगों ने बोला कि तुम तो उड़िया बाबा का सत्संग सुना तुम तो भक्त है फिर भी तुम्हारे को एक्सीडेंट हुआ अी शादी हुई एक बच्चा ड्राइवर मर गया गाड़ी बिस्कुट हो गई पति मर गया साल भर
से तुम अस्पताल में पड़ी हो तो तुम्हारे सत्संग का फल क्या डििया बाबा का सत्संग भी सुना तुमने बृंदवन में तो बोले सत्संग का फल यह नहीं है कि प्रारब्ध को मिटा दे हां सामान्य प्रारब्ध तो मिटा देगा मंद है उसे मिटा देगा तीव्र है तो घटना घटेगी लेकिन फिर भी सत्संग का फल तो देखो अभी देखो यह भैया आए हैं मैं हसते खेलते उनसे बात कर रही हूं बैठ नहीं सकती चल नहीं सकती शरीर में तीन जगह ऐसे बड़े-बड़े फैक्चर हुए लोगों को तरस आता है लेकिन मुझे तो दुख जैसा लगता ही नहीं मैं
तो जानती हूं कि प्रारब्ध की बला मिट मिट रही है पति का और हमारा सहयोग जितना था उतना रहा य सत्संग के प्रभाव से तो मैं अभी निश्चिंत हूं आनंदित हूं प्रसन्न हूं आपको मैं कैसी लगती हूं मैं विधवा लगती हूं क्या अनाथ लगती हूं क्या मैं दुखी लगती हूं क्या बोले नहीं बहन जी दुखी तो आप नहीं हो यह तो हम मानते हैं जगत पति में मेरा आत्मा साथ में है बाहर का पति मरा हो तो कई जन्मों में पति चले जाते आते मिलते यह सत्संग से पता चला दुख के समय निर्द दुख नारायण
में विश्रांति पाना यह सत्संग से पता चला आस्था जिसमें आस्था है वह दृढ़ रहे कर्तव्य परायण रहे जो कर्तव्य परायण रहता है दो कर्तव्य होते हैं एक संसारी खाना कमाना पति पत्नी के काम आना दूसरा मुख्य कर्तव्य अपनी आत्मा को परम सरसम बना देना अपने आप को ईश्वर तोव से जो बिछड़ है वह मिलाने के लिए मनुष्य जन्म है बिछड़े हैं जो प्यारे से दर बदर भटकते फिरते हैं हमारा यार है हम में हमन को बेकरारी क्या देखो सुनो भगवत गीता का दसवा अध्याय नौवा श्लोक में भगवान ने बताया निर्द दुख होने की एड्रेस सुन
लो भैया मत चित्ता मद गत प्राण बोधि अंत परस्पर कथं माम नित्यम तुष्यंति च रमती च आप मिलने आए हो मुझे मरीज समझ के दुखी समझ के लेकिन मैं आपको निर्द दुख होने का भगवत प्रसाद बताती हूं भगवान कहते हैं मेरे में चित्त वाले मेरे में प्राणों को अर्पण करने वाले भक्त जन आपस में मेरे गुणगान करते हैं मेरे प्रभाव को जानते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्य निरंतर संतुष्ट रहते हैं और मेरे में प्रेम करके अपने प्रेम स्वभाव को जानते दुखा आकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होने देते हैं सुख की लालच उत्पन्न नहीं
होने देते हैं सुख का सत उपयोग दुख में समता मेरा जो सत्संग करते हैं उनको तीन बातों में सदा संतोष रहता और तीन बातों में सदा असंतोष रहता है स्त्री पुरुष के संसारी व्यवहार में संतोष भोजन और सुविधाओं में संतोष पुत्र संतान में पुत्र मानते तो ठीक है नहीं मानते तो ठीक है होते तो ठीक है नहीं कम हुए तो ठीक है नहीं हुए ठीक है इन तीन चीजों में संतोष होता है और भगवत सत्संग में दान पुण्य में और भगवत ग्रंथों के पढ़ने में उत्तम साधक संतो नहीं करते जिन्होंने सत्संग सुनने से संतोष कर
लिया कि हमने बहुत सुन लिया उन्होंने राम कथा का भगवत कथा का स्वाद ही नहीं लिया भैया जिनके श्रवण समुद्र समाना कथा तुम्हारी सुभग सरी नाना बार बार बर मांगो हर्ष दियो देहु श्री रंग पद सर्जन अपन पायनी भक्ति सदा सत्संग जिनके कान है समुद्र जैसे जैसे समुद्र में कहीं कहीं से नदिया आती है और समुद्र आघा नहीं जाता ऐसे अगर सत्संग सुनक अगा गए तो सत्संग रस का तुमने पान ही नहीं किया जयो ज सत्संग सुनते हैं भगवत ध्यान करते शास्त्र पढ़ते त्यों त्यों उसमें और और और और लगता है आवश्यकता लगती है भाई
एक्सीडेंट हुआ है साल भर से आग्रह की अस्पताल में पड़ी हो पति मर गए हैं तुम दुखी नहीं होती बोले दुखद घटना घटती है और बेवकूफी होती तो आदमी मैं क्यों मानते नहीं तो दुख आता है जाता है यह तो संसार की रीत है तानाबाना अनुकूलता प्रतिकूलता स्वास्थ्य बीमारी जीवन मरण यश अपयश जिसके जीवन में ज्ञान का आदर है वे दुखों से असंता का अनुभव करते हैं परिस्थितियों से असंगत का अनुभव करते हैं जिनके जी जीवन में श्रद्धा विश्वास है वे फिर श्रद्धा विश्वास में विकल्प नहीं करते तो आत्मीयता होती व भगवान दूर नहीं है
परे नहीं है पराए नहीं है भविष्य में मिले ऐसे नहीं है वह हमारे आत्मा है जो नित्य है वह भगवान है और जो नित्य है वही भगवान हमारा आत्मा हो बैठे दुख अनित्य है बचपन अनित्य है जवानी अनित्य है सुख अनित्य है लेकिन उसको जानने वाला मेरा आत्मा नित्य है मैं नित्य हूं साल भर अभी हुआ है डॉक्टर बोलते दो पाच दिन में छुट्टी दे देंगे लेकिन आपको मैं लगती हूं क्या बीमार लगती हूं क्या मैं सताई हू दुखी हूं मैंने ज्ञान का आदर किया है मैंने श्रद्धा विश्वास में विकल्प नहीं लाया दृढ़ता आई तो
मुझे आत्मा अपना लगता है परमात्मा अपना लगता है सारा जगत वासुदेव में है है वासुदेव की लीला है बल का दुरुपयोग ना करने से कर्तव्य परायणता आ जाती है बुद्धि बल हो मनोबल हो धन बल हो उसका सदुपयोग करे तो आदमी कर्तव्य परायण होता है कर्तव्य परायण होने से कर्म करने का राग मिट जाता है फल की लोलुपता मिट जाती भविष्य में भगवान मिले ऐसी भ्रमण चली जाती भगवान से अलगाव दूर हो जाता है कुड कपट दूर हो जाता है अभी भगवत सुख में भगवत आनंद में भगवत माधुर्य में मैं आपको दिखती हूं कि नहीं
दिखती हूं बोले देवी हम तो आए थे कि तुमको कुछ सुनावे जसे जैसे तुम्हारी पीड़ा हट जाए पति गवाया गाड़ी गवाई ऐसी चोट खाई कि साल भर से यहां दुखी हो हम तुम्हारा दुख मिटाने को आए थे लेकिन तुम ऐसे सत्संग के प्रभाव से ऊंचाई पर हो कि हमारा दुख अब आएगा तो हम तुम्हारे सत्संग को याद करके निर्द दुख नारायण में विश्रांति [प्रशंसा] पाएंगे सत्संग से कोई घटनाएं बंद हो जाएगी सत्संग रा तो क्या खाना पीना बंद हो जाएगा क्या देखना सुनना बंद हो जाएगा नहीं खाने पीने की ममता और बेवकूफी कम हो जाएगी
देखने सुनने की आसक्ति कम हो जाएगी जिससे दुख बनते हैं जिससे जिम्मेदारियां बनती है चिंताएं बनती वह बेवकूफी हट जाती है सत्संग से बिना सत्संग के वह दिव्य विवेक मिलता नहीं इसलिए शिव जी कहते बार बार बर मांगू हर्ष दियो सिया रंग ऋषि मुनि मिलते हैं तो शिवजी स्वयं सत्संग में बैठ जाते और पार्वती जैसी सत्संग सुनने वाले मिल जाते और कोई ऋषि मिल जाते उनको शिव जी सुनाते तपस्या ध्यान से जो भी कुछ लाभ होता है उससे सत्संग से कई गुना ज्यादा लाभ होता है संयम नियम जप ध्यान से तो कमाई करके करोड़पति होना
है लेकिन सत्संग करने से तो अरबपति के गोद में चले गए सीधे हम अगर अपनी कमाई और तपस्या में लगते तो अभी जितनी ऊंचाइयां मिली गुरु कृपा से उन ऊंचाइयों को पाने के लिए ना जाने कितने जन्म चले जाते मैं ईश्वर की खोज में तड़पता था तीर्थों में इधर उधर जहां साधु संत तो पता चला कि अयोध्या में 5000 संत महात्मा रहते 5000 में से चार बड़े उच्च कोटि के संतों का मैंने पता लगा लिया उसमें भी एक महापुरुष है जो घास पूस की कुटिया बना के सरजु के किनारे रहते और दूध पर ही रहते
हैं फलहारी है मैं कहा चलो उनके पास जाए ईश्वर प्राप्ति के मैं तो प्रणाम किया कुर्ता और पजामा पहनता था ईश्वर प्राप्ति के लिए व सब हटा के साधु ताई का पचिया और थोड़ी लि मैं चरणों में पड़ा महाराज ईश्वर प्राप्ति और कुछ नहीं चाहिए वो बड़े खुश हो गए और उन्होंने मुझे बताया प्रेम से बोले मंत्र अमुक मंत्र बताया बोले इस मंत्र का 12 साल तक नाभी में जप करो मूलाधार में 12 साल स्वधन में 12 साल विशुद्ध आख्या केंद्र और 12 साल फिर ऊपर फिर ईश्वर मिले मुझे थी तड़प में क्या है बार
ब 3 चार बे साल के बाद ईश्वर मिलेंगे जनक राजा को तो रकाब में पैर डालते डालते मिल गए परीक्षित राजा को तो सुखदेव जी की कृपा कटाक्ष सत्संग से ही ईश्वर प्राप्ति होगी मैं 48 साल यह करूं उसके बाद भगवान मिलेंगे इतना इंतजार तो नहीं कर सकते महाराज जी का प्रणाम करके विदाय ले ली मैं बिल्कुल घटित घटना बताता हूं आपको गुरु चरणों में पहुंचे लीला श प्रभु जी के पास और जो बात थी 40 दिन का अनुष्ठान किया और बापू जी के चरणों में गए मध्यान ढाई बले आ सोद सुद दो दिवस संवत
बी स की मध्यान ढाई बजे मिलाई स देह सभी मिथ्या हुई स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर कारण श स्थूल शरीर में प्राण है भूख प्यास लगती सूक्ष्म शरीर में स्वप्ने आते हैं कारण शरीर में नींद आती यह आ आके चली जाती और मैं नित्य रहता हूं फिर पता चला मैं सो गया हूं मैं सो गया था मैंने स्वपना देखा मैं गहरी नींद में था यह तो तीन शरीर थे मैं तो उन सभी से निपट निराला असंग अयम पुरुष मैं तो असं पुरुष था ये तो प्रकृति में है देह स मिथ्या हुई जगत हुआ निसार गुरुवर जगत
हुआ निसार हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया नारायण नारायण नारायण फिर हमारा उधर के तरफ जाना हुआ अयोध्या के तरफ एक दो साल के बाद तो वह महाराज मुझे पहचान नहीं सके कि यह लड़का गिड़गिड़ा रहा था ईश्वर प्राप्ति के लिए आसाराम बापू होके गए तो उन्होंने मेरा बड़ा स्वागत किया जिन्होंने साधना बताई थी 48 साल के बाद तुझे भगवान मिलेंगे उनकी उम्र 98 साल की थी अभी वो साधक ही थे 98 साल की उम्र तक वो साधक ही थे तो जिस रास्ते खुद चल रहे
थे वही मेरे को सिखाएंगे लेकिन मेरे सदगुरु तो पूर्ण तत्व को पाए हुए थे तो काम हो गया मेरा तो पूर्ण गुरु कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान आसुमल से हो गए साई आशर तो मैं गया तो बड़ा मेरे साथ नम्रता से प्रेम भरा सलूक करने लगे मेरे को बोला कि आप तो समर्थ है आप मेरे लिए कुछ कर सकते हो मतलब यहां कोई भंडारा भंडारा चलता रहे मेरे को थोड़ा आपकी मदद हो जाए तो य तो ऐसा हुआ कि जो सागर्द मास्ट के पास पढ़ने गया मास्ट तो एसएससी पढ़ा हुआ स्कूल चला रहा है
व शागिर्द इंस्पेक्शन करने वाला साहब हो गया अब वास्तव उसी विद्यार्थी को दूर कर रहा तो ये जरूरी नहीं कि इतने साल लगे यह साधन करे तब हो ईश्वर प्राप्ति की तड़प हो जाए और सुने हुए का बराबर आदर करें ज्ञान का आदर करें श्रद्धा में दृढ़ कर रहे और मिली हुई योग्यता का दुरुपयोग ना करें मिली हुई समझ का दुरुपयोग ना करें मिले हुए ज्ञान का दुरुपयोग ना करें अगर दृ श्रद्धा है तो भक्त की भक्ति सफल हो जाएगी कर्तव्य निष्ठा है तो कर्म योग हो जाएगा ज्ञान निष्ठा है तो ज्ञान योग हो जाएगा
या तो ज्ञान योग से भी ईश्वर प्राप्ति हो जाती है कर्म योग से भी ईश्वर प्राप्ति हो जाती है और प्रीति योग से भी ईश्वर प्राप्ति हो जाती और जिनको भी प्राप्ति होती है कर्म योगी को भी फिर आत्म रस प्रेम मिलता ही रहता है को ज्ञानम प्रेम मिलता है भक्त को भक्तिमय प्रेम मिलता है कर्मी को निष्काम कर्म का प्रेम मिलता है प्रेम ही तो परमात्मा का वास्तविक शुद्ध स्वभाव है भगवान है सत रूप भगवान है चेतन रूप भगवान है आनंद रूप और सर्वव्यापक सब में भरे हैं हकीकत में सर्वव्यापक कहना भी हमारी छोटी
मती है सर्व वही बने हैं जैसे तुम्हारा आत्मा रात्रि को स्वप्ने में सर्व बन जाता है अच्छे लोग भी बन जाता है बुरे लोग भी बन जाता है अच्छी बुरी वस्तुएं भी बन जाता है और देखने वाला भी बन जाता है ऐसे वासुदेव सर्व मिति ऐसा जिसको समझ आ गई गुरु की बात मान लिया और मानी हुई बात का आदर कर लिया वासुदेवा सर्व मिति स महात्मा सु दुर्लभ सु उपसर्ग है बहुत दुर्लभ है शी रामम सब जग जानी करू प्रणाम जोर जुग पानी वृति व्याप्त हो जाएगी अणु विभु हो जाएगा जैसे गुब्बारा होता है
ना तो उसमें आकाश है लेकिन गुब्बारा इतना सही है गुब्बारा अगर गुब्बारा अपना छोड़ दे तो महाकाश और व छोटा आकाश एक ही है ऐसे जीव अपना जीव तो भाव छोड़ दे मैं देह हूं मन में आने वाले विचारों के साथ जुड़े तो फिर जीव हो जाता है मन के विचार आए गए लोगों को बड़ा आग्रह होता कि मेरे को ऐसा होना चाहिए भक्ति ऐसी होनी चाहिए विचार ऐसा होना चाहिए बेटा ऐसा होना चाहिए घट में है सूझे नहीं नालतली ऐसे जीव को भयो मोतिया बन घट में है लेकिन अपना जीव तो बनाए रखे अपनी
पकड़ जैसे सकड़े मुंह के बर्तन में धरती में गड़ा हुआ सकड़े मुंह का बर्तन उसको देखकर बंदर नीचे उतरते मूंगफली चने या और कुछ गुड़ के टुकड़े मुट्ठी बांध लेते फिर अपनी मुट्ठी सेही बंद जाते हैं ऐसे हम अपनी मान्यताओं से अपनी बेवकूफी से बंद जाते दुखों में अनुकूल परिस्थितियां नहीं आती तो हम दुखी होते और सोचते हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में इसने डाला उसको दुश्मन मानते हैं अनुकूल परिस्थितियों में जिसने सहयोग दिया उसको मित्र मानते हैं तो मित्रता से राग में बनते हैं शत्रुता से द्वेष में बनते हैं और अनुकूल परिस्थिति छाते हैं तो
आसक्ति से भविष्य के भावना से कल्पनाओं से बनते हैं अरे अनुकूलता आती है जाती है प्रतिकूलता आती जाती है दुखा आकार सुखा आकार वृतिया होती रहती है इन सबको जानने वाला मैं परम ज्ञान स्वरूप हूं नित्य चैतन्य हूं अमर हूं यह जरूरी नहीं कि आदमी पैसा होने से सुखी हो जाता है कई धनवान आपको दुखी मिलेंगे और पैसा ना होने से आदमी दुखी हो जाता है ऐसे लोग मिलेंगे जिनको दिन को खाने को नहीं रात की फिक्र नहीं ऐसे लोग भी मस्त फक्कड़ गंगा किनारे मिलते हैं और गृहस्थ में भी ऐसे लोग मिलते हैं कि
जमीन जायदाद बिक गई रोजी रोटी का मकान दुकान बिक गया किराए के मकान में रहते हैं लड़कियों की शादी में सब बिक गया एक लड़की को दो बच्चे हुए आपस में बने नहीं पति पत्नी बड़ी लड़की को चार बच्चे हुए छोटी को दो बच्चे हुए मजली को तीन बच्चे हुए एक एक करके तीनों लड़कियां मायके में आ गई और एक छोरा है लोफर जैसा हो गया अब बूढ़ा दुखी नहीं है रिश्तेदार मिलजुल के थोड़ा 50 रुपया चंदा कर देते रूखी रोटी जैसे भी है खाते और बच्चों के साथ वो बूढ़ा खेलने चला जाता है बूढ़ा
बार-बार बच्चों में खेलने को आता है और बड़ा हस्ता खेलता है तो उन बच्चों में अखंडानंद थे अखंडानंद ने किसी को कहा कि बूढ़ा हमारे साथ आकर खेलते अखंडानंद अपने आश्रम में भी आए थे तो ये मैं पुराने युग की बात नहीं कहता हूं अभी की बात कहता हूं अखंडानंद सरस्वती अपने आश्रम में भी आए थे मेरे साथ बैठे और सत्संग किया उन्होंने हमने भी किया तो वह जब विद्यार्थी थे और खेलते थे तो व बूढ़ा आक बैठ जा खेलने में लग जाता तो किसी संत को बोला कि हम लोग खेलते हैं तो यह बुड्ढा
ना जाने कहां से आके टपकता है बच्चों के साथ ह चि खोरिया मार कर हंसते खेलते हैं कभी घोड़े बन जाते हैं हम घोड़ा घोड़ा खेलते हैं जो हार जाए तो वो घोड़ा भी बन जाते हमको घोड़ा बनाना होता तो बोले चलो कोई बात नहीं दोस्त चलेगा यार चलेगा हमको तो माफ कर देते खुद घोड़े बन जाते हैं करते हैं हमको पता नहीं चलता कि कैसा बूढ़ा है कि बच्चों के साथ खेलता है बच्चों के लिए घोड़ा घोड़ा भी बन जाता है और खूब हंसता है बोले य बूढा कोई साधारण आदमी नहीं है इसकी तीन
कन्याए चार बच्चे तीन बच्चे दो बच्चे कुल नौ बच्चे ले आकर तीन वे इसके घर पर आद की छोरा इनका कहना नहीं मानता शादियों में जमीन जायदाद खेती की और मकान बिक गया किराय के मकान में रहता है लेकिन सत्संग के कारण यह खुश रहना जानता है दुखों के पहाड़ होते हुए भी सुखी आदमी है तो सत्संग से सुखी रहने की सूझबूझ बढ़ती सत्संग से कर्म करे लेकिन कर्ता पने से निर्लेप होने की सूझबूझ बढ़ती [संगीत] i