आप यह हाथ यह पैर यह सिर यह मन यह बुद्धि यह सब बदलता है उसको जानने वाला कौन है वह कभी बदला [संगीत] क्या यह और वह दिखेगा तो मैं से ही यह चाहे वह दिखेगा मैं से और मैं को शुद्ध रूप में जान लिया यह माना है मैं ब्राह्मण हूं मैं फलाना हूं मैं फलाना हूं यह तो मैं के ऊपर शरीर का आरोप कर दिया दुख का भाव आया तो मैं दुखी सुख का भाव आया तो मैं सुखी यह भी आरोप कर दिया लेकिन वास्तविक में अर्जुन का जग गया तो अर्जुन कहता है नष्ट
मोह स्मृति लब्ध मुझे अपने शुद्धम की स्मृति आ गई मैं तो था ही पहले लेकिन अब स्मृति आई नष्ट मोह स्मृति लब्ध कैसे बोले तव प्रसादा आपके प्रसाद तव प्रसादा माया स्थिर अस्म गत संदेह अब मैं स्थिर हो गया हूं अपने आप में संदेह चला गया अब मुझे पता चल गया पाप बाप नहीं लगेगा अपना कर्तव्य करूंगा करि से वनम तव तुम्हारे वचनों का पालन करूंगा तो भगवान ने स गीता का उपदेश में यह कहा मा मनु सुमर युद्ध स्व मेरा सुमर कर मेरा सुमर माना जहां से मैं मैं होता है ना मेरा स्मरण य
साढ़े फीट वाली आकृति मैं नहीं मैं जहां से उठता है उस मैं का स्मरण कर और युद्ध कर तो तेरे कर्मों में भी निखारा है और युद्ध का कर्म बंधन भी नहीं लगेगा ध्यान देना गिने गिनाए लोग होते हैं ना तो बहुत पक्के मजबूत लोग होते गिनाए गिनाए बहुत ऊंची बात समझ सकते हो राजा को श्राप मिला परीक्षित को सातव दिन तुम्हारी मृत्यु होगी राज पाठ दिल्ली का छोड़कर शुक्रताल चले गए मुजफ्फर नगर से 30 किलोमीटर के अंतर पर गंगा किनारे कई साधु आए संत आए ऋषि आए मुनि आए राजा बेचारा धर्मात्मा था सात में
दिन मृत्यु है लेकिन परीक्षित अन्न जल छोड़कर बैठा था कि ऐसा कोई महापुरुष मिल जाए कि मौत के पहले मुझे अमरता का अनुभव कर जिस संकल्प से बैठा था तो सृष्टि में आपका स्वास व्यापक से भरपूर है तो आप संकल्प लेकर बैठो कि मैं यहीं बैठकर [संगीत] खाऊंगा मांगने नहीं जाऊंगा तो आपको खिलाने वाला आना चाहिए जितना बलवान संकल्प उतना जल्दी लेकिन होगा क्योंकि व्यष्टि यह मेरी उंगली पूरे शरीर से जुड़ी मेरा अंगू अथवा शरीर का कोई भी अंग शरीर समष्टि है और यह व्यष्टि है व्यष्टि समष्टि से जुड़ी है व्यष्टि में कोई तकलीफ होती
तो समष्टि उसको मदद करने आ जाती है तो ऐसे ही आपने आपका श्वास व्यष्टि स्वास है लेकिन समष्टि से जुड़ा हुआ है और आप सात्विक भाव से बैठे हैं तो आपका संकल्प वहां पूरा होना चाहिए तो परीक्षित राजा सात्विक भाव से बैठे थे कि मुझे महापुरुष मिल जाए सुखदेव जी को स्पूर्ण हुआ कि इधर को मैं जाऊं समाधि छोड़कर चलते गए तो लोगों ने बाबा लंगोटिया फला पत्थर कंकड़ मारे मन में शोभ नहीं हुआ जब परीक्षित वहां पहुंचे लोगों ने उनकी समता देखी तो ऋषि मुनि साधु संत और राजा परीक्षित उठकर खड़े हो गए सोने
का सिंहासन बना था कोई महापुरुष मिलेगा तो बिठाए सुवर्ण के सिंहासन पर राजा परीक्षित ने सुखदेव जी को बिठाया और कठोती में उनके च धोए पैर पहुंचे तिलक किया फूलमाला पराई आरती की इसको बोलते अर्घ पाद से पूजन किया आज्ञा हो निवेदन करो राजन पूछ मनुष्य को अपने जीवन काल में क्या करना चाहिए और मृत्यु निकट हो तो क्या करना चाहिए सुखदेव जी कहते हैं कि राजन तुमने प्रश्न बहुत ऊंचा किया है तुम्हारी बुद्धि का हम अभिवादन करते हैं यह तुमने अपने लिए नहीं मानव मात्र के लिए पूछा है मनुष्य को जीवन काल में भगवान
तत्व का ज्ञान पा लेना चाहिए दुनिया भर का जो भी पाते ना उसे से कोई सार फल नहीं मिलता कितना भी पीएचडी कर दो किसी सभी सब्जेक्ट पर फिर भी अंत में निराश होकर दुखी होकर मरेगा जीवन में मनुष्य को परमात्मा ज्ञान पा लेना चाहिए परमात्मा स्मृति पा लेनी चाहिए तस्मा सर्वा आत्माना राजन जो सर्वा आत्मा भगवान है सबके अंतःकरण में अंतर जो व्याप रहा है तस्मा सर्वात्मक में सुनो कीर्ति तस्य उसके कीर्तन उसके गुण गान करो सुमत भगवन नाम सतव्य कीर्ति तव्य सुमत भगवन नाम मनुष्य को भगवान के विषय में सुनना चाहिए उसकी कीर्ति
का गान करके उस उ उसके भाव से एकाकार होना चाहिए और भगवान की स्मृति करनी चाहिए तो भगवत ज्ञान भगवत प्रीति और भगवान की स्मृति करके भगवान में विश्रांति गहरी नींद में हम तमस की चादर ओड़कर भगवान के करीब विश्रांति पाते हैं तभी भी हमारा मन बुद्धि साफ सुथरा हो जाता है शरीर थकान से रहित हो जाता है अगर हम भगवान के स्वरूप का ज्ञान सुनते सुनते उसकी स्मृति और कीर्ति का अनुसंधान करते करते ध्यान में जाएं तो हमारा चित्त भगवता का हो जाएगा शत्रु को देखते तो चित्त शत्रु का हो जाता है मित्र को
देखते तो मित्रा का हो जाता है पत्नी को देखते तो पत्नी के विषय का ही मन बन जाता है ऐसे ही च चिंता का विषय होता है तो मन चिंता का बन जाता है तो यह जिससे बनता है वह वस्तु ज्यू की त्यों है लेकिन जो बनता है बन बन के बिगड़ जाता है दुख मना इसने ऐसा करा वैसा करा व दुख आके चला गया लेकिन जिस पर बना वो ज कात जिससे बना वो ज कते जैसे सुनार की रण होती है रण ज की त और किस्म किस्म के बने चले गए सड़क ज्यू की
त्यों और ट्रैफिक किस्म किस्म की पसार हुई ऐसे ही आपका परमेश्वर जो है वह अचल है उसी के सत्ता से चल मन चल बुद्धि चल तन बदल रहा है अचल जो का त्य है उस अचल को समझकर उसमें प्रीति करके उसमें विश्रांति पाए तो मन बुद्धि भी बड़ा प्रखर बन जाता है व्यवहार के सर्टिफिकेट कोई माना नहीं रखते तो मनुष्य को जीवन काल में भगवत ज्ञान भगवत कीर्ति और भगवत विश्रांति कितने भी मंदिरों में जाओ मस्जिदों में जाओ कहीं जाओ लेकिन घूम फिर करर अपने शुद्ध म में आना पड़ेगा कितने भी राज और संपर्क सब
लोग तुम्हारी सराहना करें विश्व भर के लोग आपको माने के श्रेष्ठ नेता है श्रेष्ठ व्यक्ति है फलाना लेकिन आखिर क्या शरीर स्वरूपम धनं मेरु तुलम शरीर सुंदर हो धन सुमेरू पर्वत जितना हीरे मोती लेकिन आखिर क्या च और राजे महाराजे तुम्हारे यशोगान करते हो ऐसे तुम चक्रवर्ती राजा हो लेकिन आयुष्य के दिन तो खत्म हो रहे आखिर क्या मिलेगा अपने मैं को शुद्ध रूप में नहीं जाना तो फिर जैसे वासना और संस्कार है वे लेकर जाएंगे और उसी के अनुसार फिर चंद्रमा के किरणों में आकर अन्न फल जल में गिरेंगे और व जीव भोजन करेंगे
उनके शरीर के द्वारा आप मां के गर्भ में जाएंगे गर्भ मिला तो ठीक है मेडकी का गर्भ मिला तो मेडक बनेंगे कुतिया का गर्भ मिला तो कुती बने कुत्ते बनेंगे घोड़ा भैंस का जो भी मिला घरवास कर्म के अनुसार वासना के अनुसार पैदा हुए कूदे फा दे फिर मरे फिर पैदा हुए मकान बनाया घर बनाया यह किया डिग्री ले अपना फोटो लगा दिया लेकिन वह फोटो देखता है कि मैं हूं शमशान में वह मैं रहेगा ही नहीं कब्रस्तान में जाएगा तो भी ऐसा नहीं रहेगा 25 साल पहले का तुम्हारा फोटो और अभी के फोटो में
परिवर्तन है तो वास्तव में आप तो वही के वही है यह परिवर्तन वाले यह को मैं नहीं मानू यह को मैं मान लिया फिर कितने भी तीर्थ कर लो थोड़ा बहुत पुण्य होगा लेकिन सत्संग नहीं हुआ वह को और यह को मैं नहीं माना जाता है मैं से यह अर् व दिखता है और उस मैं को असली रूप में समझो तो फिर भगवान आपसे अलग नहीं आप भगवान से अलग नहीं अपने मैं को शुद्ध रूप में जानो मनो बुद्धि अहंकार चित्तानी नाह अपने मैं को जानोगे तो राग मिट जाएगा भय मिट जाएगा जो अपना मैं
यहां है वही मैं मैं मैं मैं सब में पूरत हो रहा है भय चला जाएगा शोक चला जाएगा बीती हुई बात का ऐसा हुआ ऐसा हुआ शोक चला जाएगा भय चला जाएगा और ईश्वर से ईश्वर से दूर हूं यह भ्रम चला जाएगा मैं दुखी हूं ऐसा कभी नहीं लगेगा मैं सुखी हूं ऐसा कभी नहीं लगेगा दुख और सुख से बहुत ऊपर उठ जाओगे इसको समत्व योग अपने शुद्ध में को जाना आपके अंतक में समता का योग हो जाएगा मेरा परमात्मा सतर ूप है चेतन रूप है आनंद रूप मुझसे दूर नहीं यह नहीं वह नहीं जहां
से मैं होता है वही मैं मेरा आत्मा है ना दूरे दुर्लभा यह मिलेगा तो बिछड़ जाएगा वह मिलेगा तो बिछड़ जाएगा बिछड़ जाएगा तो पहले थे वैसे के वैसे हो गए जो कभी ना बिछड़े वह मेरा प्रभु मेरा आत्मा यह वह बिछड़ जाएगा मैं मैं बिछड़े का मेरे से कभी मैं स्वर्ग में हूं मैं नरक में हूं मैं पापी हूं मैं पुण्य मैं तो हूं उसम को ठीक रूप से जान ले हो गया साक्षात्कार ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष इसम को सतगुरु जी ने जताया नहीं था तब तक केदार नाथ गए तो
भगवान केदारनाथ नहीं मिले उनका विग्रह मिला विंद्र बन गए तो कृष्ण नहीं मिले उनके मंदिर में मूर्ति मिली और पुजारियों के आधीन रहना पड़ा काशी गए तो काशी विश्वनाथ नहीं मिले उनकी मूर्ति मिली जब गुरुजी अपने म में ले गए तो जहां जाए वहां काशी विश्वनाथ जहां जाए केदार जहां जाए कृष्ण खाऊ पिऊ सो करूं पूजा हरू फरू सो करू परिक्रमा भाव न राखु दूजा साधो भाई सहज समाधि बली गुरु कृपा भाई जा दिन से दिन दिन आधिक का चली यह कर करा के फिर ऐसे बैठे रहे कुछ ना करें ना ध्यान करें ना कुछ
ना करें मैं स्वरूप ईश्वर में आत्मा में विश्रांति होने लगती साधन तो एक से एक है ईश्वर को पाने की तड़फ वाले बंदे मिल जाए काम कर और मुझे जितना करना पड़ा उसका हजार मा हिसाब भी आपको नहीं करना पड़ रहा है ऐसा सस्ता माल बना रहे आपको कहां हिमालय की पथरीली मिट्टी से बर्तन मांजने कहां सात साल तक अरे छ महीना आठ महीना लग गए कहां के कहां पहुंच जाओ मैं घर में था प्राप्ति के लिए तड़प थी इधर उधर तो एक संत थे वह भी बड़ी कठिनाइयों से संत बने थे उनका नाम था
चुनीलाल वह संत बनना चाहते थे मां बाप बोले बेटा शादी कर ले फिर जो भक्ति करना है तो कर तो अहमदाबाद में खाड़ी आ है उधर उनकी मंगनी हुई थी बारात वहां जानी थी बड़ौदा के पास जहां भी रहते थे अहमदाबाद स्टेशन पर उतरे फिर उस समय इतनी आटो वाटो नहीं थी आज से 70 साल पहले 60 साल पहले ऑटो वाटो इतनी नहीं थी 60 साल पहले थी नहीं टो मैं 10 साल का था तो ऑटो नहीं दिखी थी तांगे चलते थे और कार कैसी चलती थी हैंडल लगा के स्टार्ट करो ऐसी कार मैं जब
आ 10 साल का था ऐसी कार बैटरी से स्टार्ट होने वाली कार तो बाद में आई और चुनीलाल युवक को दुला बनाकर उसकी मां और उसके बाप और दो तीन व्यक्ति रेलवे स्टेशन से उतरे तांगे में बैठना था दलहा को और तीन व्यक्तियों को तांगे वाले ने पैसे ज्यादा कहे तो मां को बोला मां दे दे सामान सिर पर उठा दि दला बोले इतना तो चल लेंगे थोड़ा सिर पर सामान रखा हाथ में अटेची उठाई और दला जा रहा शादी करने को ऐसा कभी सुनाए का था एक सवा किलोमीटर स्टेशन से खड़िया होगा बोले इतने
काहे को देंगे पसीने के पैसे हैं बन बन के खेल सब स्वपना हो रहा है तो आत्म दृष्टि से देखो तो य जगत कोई माना ही नहीं रखता अ व्यवहार दृष्टि से देखो तो बड़ा विचित्र है तौबा कर जगत को सच्चा मानो तो तोबा करा दे और अपने को देखने वाले को सत्य मानो और इसको बदलने वाला मानो तो मौज करा देता है अगर सत्य को मैं को मैं रूप में सत्य को सत्य रूप में जानते हो तो जगत कुछ भी नहीं है जैसे बचपन में चनी के चॉकलेट हमको प्रभावित कर देते थे दो अनी
की चीज कोई छीन लेता तो हम दुखी हो जाते थे लेकिन आप देखो तो कुछ नहीं चनी दोनी अठनी रुपया दो रुपया कुछ भी नहीं लेकिन उस समय कितना महत्त्वपूर्ण लगता था आप उसको जानने वाला है लेकिन वह परिस्थितियां का कोई महत्व नहीं बचपन की कोई भी परिस्थिति का कोई महत्व नहीं ऐसे आज की परिस्थिति कुछ समय के बाद उसका कोई महत्व नहीं लेकिन जिसका महत्व है वह हमसे कभी बिछड़ता नहीं वह हमसे कभी दूर होता नहीं ना दूरा ना दुर्लभा ना दूर है ना दुर्लभा है सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को
दूरे उस साहिब को पाने के लिए ना किसी देश की जरूरत है कि फलाने देश में जाऊंगा तप करूंगा फिर मिलेगा ना किसी काल की जरूरत है कि अभी नहीं है वह परमात्मा अभी बिजी है जैसे साहब विदेश यात्रा गए आएंगे तब ऑफिस में बात होगी ऐसा वह साहब नहीं है अभी ऑफिस खुली नहीं है सोमवार को ऑफिस लेगी तब स समिट होगा हमारा विचार ऐसा भी नहीं है यहां तो 2400 घंटे ऑफिस खुली [संगीत] और सदा मौजूद है केवल उधर की नजरिया मिल जाए तो काम बन जाए वशिष्ठ जी कहते हैं हेराम जी फूल
पत्ते और टहनी मसलने में परिश्रम होता है क्योंकि वो बाहर मसलने में परिश्रम होता वो तो अपना आप है उस आत्म देव को उस मैं के शुद्ध रूप को जाने में क्या देरी है लेकिन पूर्व आग्रह है कि इतना करेंगे तब भगवान मिलेंगे इतना करेंगे तब मिलेंगे और फलानी जगह भगवान है उसी में लोग बेचारे उलझ जाते अथवा तो यह पा लू यह भोग लू यह कर लू ऐसा बनल ऐसा बन जाऊ इसीलिए वह दूर और दुर्लभ लगा है पौराणिक कथा [संगीत] है कि देव योग से भगवान नारायण किसी के आगे प्रकट हो गए उसने
ध्यान भजन किया नारायण विचरण कर रहे थे देखा कि भजन कर रहा है चलो उसको दर्शन देही दे बोले मैं नारायण हूं भगवान हूं दर्शन कर लो उस आदमी ने आंख खोली बोले तुम कैसे भगवान हो क्या प्रमाण है क्या आप [संगीत] भगवान बोले प्रमाण तो क्या तू चाहे तो मैं तुझे अभी वैकुंट ले चलू वैकुंट दिखा दूं तो बोले वैकुंट देखने के लिए कुछ क्या करना पड़ेगा फरम घुस गया ना कि भगवान को पाने के लिए भी कुछ पड़ेगा इतना तप करू फिर भगवान आएंगे यह भ्रम गुसा था भगवान मुफत में मिल गए तो
बोले क्या प्रमाण है तुम भगवान हो भगवान को ऐसे मिल जाते हैं बहुत तप करना पड़ता है व्रत करने पड़ते हैं तपस्या करनी पड़ती तब कहीं भगवान आते तुम ऐसे ही आ गए तो हो सकता है कि ऐसे ही चतुर्भुजी बनकर कोई भूत प्रेत हो तो क्या भरोसा भगवान ने कहा नहीं मैं विश्वास पूर्वक कहता हूं ना भूत हूं ना प्रेत हूं और भूत प्रेत इतना मंगलमय पपू नहीं धारण कर सकता और इस तरह से आमने सामने शांति पूर्वक बात भी नहीं कर सकता बोले क्या पता य तुम कैसी कैसी बातें बनाते हो मुझे तो
पता भी नहीं तो ठोस प्रमाण बताओ बोले ठोस प्रमाण य कि तू चले तो मैं तुझे वैकु ले चलू तो बोले क्या देना पड़ेगा भगवान ने देखा कि यह कुछ लिए दिए बिना इसको कुछ भगवान स्वाभाविक मिलते हैं यह पता ही नहीं है यह समझता कुछ लेना देना पड़ेगा जैसे बाजारी चीज के लिए कुछ देना पड़ता है ऐसे भगवान के लिए भी कुछ देना पड़ेगा तो भगवान ने कहा तुम्हारे पास क्या है बोले यहां तो मैं बस साधना करा सिर पर टोपी थी भगवान ने कहा एक टोपी दे दो बस बोले कुछ तुम ठग मालूम
होते हो वो टोपी लेकर चले जा और वै कुट कुट करके कहीं फेंक दो मेरे को हम नहीं आते तो भगवान ने कहा चलो आज के बाद हम भी ऐसे तैसे नहीं मिलेंगे खूब रगड़ो मंदिरों में जाओ खूब ये करो खूब वो करो फिर भटक भटक के संतों के पास जाओ फिर नियम करो यह करो फिर कोई संत की कृपा हो जाए तब बताएगा कि भगवान यही है तब मैं तुम्हे मिलूंगा बेवकूफ कहीं के मुफत में मिलता हूं तो कदर ही नहीं करते हो जाओ खूब रगड़ो अपने को थको फिर किसी संत के निकटवर्ती हो
तो संत अगर खुश होकर पैकेज में मुझे दे देगा तब मैं तुझे हृदय में प्रकट होगा हमने भी पहले खूब पापड़ मेले लेकिन मेरे गुरु जी ने तो पैकेज में भगवान को ही फेंक दिया मेरे लो भया भगवान के अनुभव को अपना अनुभव हो जरा अरे मैं क्या तो यही था तो पहले तो मैं रोज मंदिर में जाता था और भगवान की पूजा किए बिना मैं नाश्ता भी नहीं करता अब अब नाश्ता करूं भोजन करूं सब पूजा ही पूजा है कभी मंदिर में जाने को मंदिर नहीं जाना यह भी नहीं और मंदिर जाना है यह
तो होता भी नहीं मन मन का उसकी माला है तन उसका एक शिवाला है जब देखो भोला भाला है निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है जहां इंद्रिया नहीं पहुंचती उस निरंजन आत्मा में संत अकेले खेलते खड़ माथे गौ वि आई नीचे के केंद्रों में जो वृत्ति विचार हाय हाय के थे वह चले गए ऊपर की वृति पर बखर माथे गौ भी आई उसका दूध बिलता है माखन माखन साधु खाए छाछ जगत को पिलाता है भगवत रस का माखन तो साधु खाता है लेकिन मक्खन वाली छास आए गए को वचनों के द्वारा पिला देता माखन
माखन साधु खाए छच जगत को पिलाता है तन की कुंडी मन का सोटा शरीर का तो एक शरीर को तो एक साधन समझते मन की कुंडी मन का सोटा हरदम बगल में रखता है मैं शरीर हूं ऐसा नहीं मानते यह शरीर है यह मन है जो यह है वह मैं नहीं होता और जो मैं है वह यह नहीं होता यह शरीर है यह मन है यह बुद्धि है वह मित्र है वह शत्रु है वह सुख है वह दुख है तो यह और वह मैं नहीं बनता मैं यह वह में नहीं होता मैं कभी अपने आप
को यह वह नहीं कह सकता यह शरीर है यह मन है यह बुद्धि है वह दुख है वह सुख है वह अपना वह पराया हो सकता है लेकिन मैं अपना हूं मैं पराया हूं मैं यह हूं मैं वह हूं ऐसा नहीं हो सकता मैं तो मैं ही हूं बात समझने वाले समझते होंगे मैं के आधार पर यह और वह होता है और मैं कितना दूर है कितना दुर्लभ है और कितने समय के बाद मिलेगा मेरे को मेरा मैं मैं तो ही हूं कितने समय का सवाल ही नहीं लेकिन मैं अहम रूप में अपने को मानता
हूं तो इसीलिए मैं एक जॉब करता हूं मैं फलाना हूं मैं फलाना हूं और मैंने अब गुरु कृपा से अपने अहम का पर्दा चीर दिया तो मैं हम है अपने आप हर परिस्थिति के बाद जैसे चादर उड़ा हुआ आदमी चादर हटाने में कितने कितना दूर जाएगा तब चादर हटेगी चादर हटाने में कितना समय चाहिए मैंने यह कर दिया पर्दा लगा दिया अब मुझे कहां जाना पड़ेगा पर्दा हटवाने के लिए कितना समय लगेगा और किसको बुलाऊंगा ना कहीं जाना है ना समय लगेगा ना बुलाना पड़ेगा खाली छोड़ दे अपनी जो पकड़ है ना ऐसा साक्षात्कार है
यह मेरा वह मेरा यह मेरा यह यह व इसी में असली में ढका रह गया [संगीत] नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण असली मैं को जान लो तो संसार सारा तुम्हारी सरह ना करे तुम्हारे को अहम नहीं आएगा और सारे संसार के मिलकर साजिश रच रच कर तुम्हारे लिए कुछ का कुछ बोले बके तो तुम्हारे असली में पर कुछ ऐसा नहीं होती ऊपर ऊपर व्यवहार काल में शाबास को शाबाश खबरदार को खबरदार करोगे अंदर वही का वही उठत बैठ वही उठने कहत कबीर हम उसी ठिकाने असली मैं को जानने वाला महापुरुष कहा जाता है ब्रह्म ज्ञानी
कहा जाता है वश जी ब्रह्मज्ञानी और भगवान राम उनके [संगीत] चेले ब्रह्मज्ञानी तो ब्रह्मज्ञानी होना है मुडो को क्या पता गीता कहती विम नानु पसंथ अर्जुन ने असली में नहीं जाना था तो दुखी था और कृष्ण की कृपा हुई खड़े खड़े उपदेश सुनते सुनते नकली म का छोड़ दिया तो बोलता नष्ट मो स्मृति ल अर्जुन को कहां जाना पड़ा खाली पकड़ छोड़ देनी पड़ी बस वो भी युद्ध के मैदान में क्या देर लगी सुनते सुनते या तो सुनते सुनते छोड़ दे या तो खोजते खोजते अपने को खो दे ऐसा ईश्वर लेकिन यह मिल जाए जरा
ऐसा कर लू जरा वह सेट कर लू जरा यह संभाल ल जरा वह संभालू उसी में मैं ढका रह गया अहम के पर्दे में इसम क्या अहम का पर्दा हटाते ही मैं शुद्ध रूप में प्रकट फिर संसार का काम भी अच्छी तरह से हो जाता है एक यह लोक है दूसरा परलोक है जो परलोक परमात्मा को पाने का यत्न नहीं करता उसका यह लोक भी पीड़ा दई हो जाता है लेकिन जो परमात्मा लो लोग को पाता है उसके लिए यह लोक भी सुखदाई हो जाता है भले वातावरण पीड़ा वाला आ जाए लेकिन वहां सुख ही
सुख रहता है बाहर का वातावरण पीड़ा दई आ जाए फिर भी उस महापुरुष के अंतःकरण में चैतन्य का सुख शांति बरकरार रहती राम जी हाय सीते सीते आंसू बहा रहे भैया लक्ष्मण आंसू बाहर है मर्यादा के व्यवहार में भाव के जगत में लेकिन अंतःकरण में राम जी उस समय भी वही है हाय लक्ष्मण करके आंसू बहाते उस समय भी राम जी जानते हैं कि व्यवहार में मर्यादा में मन का भाव है चित्त की दशा है य तो आप भी जब भाव में आ जाते होंगे तो दिखता होगा कि यह भाव है आप भी कभी किसी
के लिए रोते हैं तो दिखता होगा कि य रुदन है और किसी के लिए खुश होते होंगे तो दिखता होगा कि यह खुशी है तो यह रुदन है यह खुशी है यह मैं के बिना दिखेगी क्या उस मैं के ऊपर जो आम का पर्दा है उसी को हटाना है और कोई मेहनत नहीं है व जरा गुरु की कृपा चा तो जरा अपना प्रयत्न है और गुरु की कृपा हट गया जा 40 दिन में कोई एमबीए हो सकता है क्या बीए हो सकता है क्या केजी पास कर सकता है क्या 40 दिन में लेकिन सारी पोस्टों
से ऊपर की पोस्ट 40 दिन में मिल सती है सात दिन में मिल जाती है सात दिन में परीक्षित को मिल गई हमको 40 दिन में मिल गई मैं तो कहता हूं 40 साल में भी मिले आत्म पदवी तो सौदा सस्ता है तो जब जगत को जगत की नजर से देखते तो बड़ा भारी विकट लगता है जाल दुखों का घर परेशानी परेशानी और जगदीश्वर जब पर्दा हो जाता है मैं तो लगता है कि जगत कुछ भी नहीं है यह आके चला गया यह आके चला गया यह अ आके चली गई ऐसी इस प्रकार की नहीं
दूसरे प्रकार की कई बार पहले भी आई आधि यह पहली आधी नहीं है य आंधियां एक से एक जो समय बीतता है त मजबूत मजबूत बड़ी बड़ी आधि जो समय बढ़ता है त बड़ी बड़ी आधि आती जैसे 100 किलो का वेट पहले स लिया तो 90 किलो का तो वेट लगेगा ही नहीं वो तो खिलवाड़ जब 100 10 का होगा व भी जब 200 का आएगा तब लगेगा कि आया कुछ 100 किलो का आया तो उसको तो नचाते नचाते रवाना कर दिया अब 90 का आया तो उसको तो मानेंगे नहीं कि कोई वजन है 110
का आएगा तो भी चला जाएगा जब 200 का होके आता है तो जरा उसको नचाना पड़ता है फिर वो भी चला जाता है अब फिर आएगा तो 200 तक का तो कैपेसिटी हो गई एक पहलवान था वो अपने कंधे पर व भैंसे के नीचे खड़ा हो जाता और फिर भैसे को कंधे पर लेकर दंड बैठक करता तल्ले प लोग हैरान होते हैं कि ऐसा पहलवान कहीं नहीं देखा भैसा तो समझते ना भैस का दूध होता है ना उसका बच्चा हुआ और वो खाते खाते खाते बच्चा बाप बन गया बूढा बन भैसा बन गया उसको उठा
के डंड बैठक करना कैसा लगे तो उससे पूछा गया कि भाई पहलवान तो हमने देखे सुने लेकिन भैसे को उठाकर ंड बैठक करे ऐसा पहलवान देखा क्या कभी तो बोले हमारी भैंस ने दिया था बच्चा तो हम उस समय युवक थे उसको कंधे पर उठा के ंड बैठ करते थे फिर यह बढ़ता गया तो हम थोड़ा ये कोई साधन बढ़ाते गए लकड़ा बकड़ा पाटिया ट ताक पूरा उठे ये बढ़ता गया तो हम रोज उठाते थे तो रोज बढ़ता जाता था रोज उठाते जाते तो तो उठाने की कैपेसिटी भी बढ़ती गई दूसरे पहलवानों के लिए बड़ा
कठिन लगता है लेकिन मैं तो रोज अभ्यास करता हूं ना मेरे लिए कुछ भी नहीं इसलिए आप लोग दूसरे पहलवान है तो आपके लिए आधी तूफान बड़ा वजन लगता है मेरा अभ्यास क्या हुआ है तो कई भैसे भाई दे राध नारायण हरि नारा हरि नारायण हरि ऐसे नानक जी का भी अभ्यास था तो नानक जी को जल में भी रख दिया तब भी नानक जी दुखी नहीं रहे होंगे और नानक जी अभी भी हृदय में है तो परमात्मा ज्ञान इतना ऊंचा होता है कि कभी पातक और कलयुगी लोग अत्याचार और अन्याय करे और अत्याचार य
उनकी हल्की मानसिकता से किसी महापुरुष का बाहर से अहित दिखे फिर भी महापुरुष का महापुरुष त्व कोई नहीं मिटा सका मनसूर को फांसी दे दी गई लेकिन मनसूर मिटे नहीं सुकरात को जहर दिया गया सुकरात मिटे नहीं कबीर को न जाने कितनी बार वैशा के द्वारा दूसरे लांछन के द्वारा भैसे उठवा गए लेकिन कबीर जी गए नहीं समाज में से हैं कबीर जी हैं कि गए कबीर जी गए कि हैं है मीरा के ऊपर कितने लांछन लगे और उनके जेठ ने ही लांछन लगा और सिर काटने की कगार पर आ गए मीरा के सामने तलवार
लेकर खड़े हो गए कि वो अकबर आकर तुम्हारे सत्संग में बैठा के साथ तुम्हारा गलत रिश्ता था इसलिए वह अपना माला ठाकुर जी को अर्पण किया और तेरे गले में पक्का प्रूफ है अब तो इस मेवाड़ की धरती पर पाप पाप मूर्ति है रहने के काबिल नहीं ऐसा कहकर उसकी हत्या करने को मीरा की हत्या करने को उतार हुआ था विक्रम राणा नहीं हुआ तो ऐसे भैंसे तो मीरा ने भी उठाए क्या ख्याल है बुद्ध कबीर नानक और जीसस को तो ठोक दिए गए खीले और बेचारे जीसस क्रॉस पर ही आखिरी शवास लिए आखिरी दम
थोड़े क्रॉस पर ही संसार जब सत बुद्धि से लोग देखते तो उनको राग द्वेष य मेरा तेरा करके दबोच के निचो के उठ खा के फेंक देता है जैसे बत्ती के आगे ब ट्रैफिक की बत्ती के आगे खेत खाली के पतंग या सच समझ के मजा लेने जाते हैं वही मजा उनको ले डूबता है नहीं कितने पतंगिया रोज बिचारे मजा मजा में तड़प तड़प के मरते े उनकी कोई गिनती नहीं कर सकता दुनिया के सब विज्ञानी मिलकर पक्का आंकड़ा नहीं बता सकते कि सड़कों पर रोज रात को कितने जंतु मजा लेने के बहाने छटपटा के
दुखी होकर कहरा हुए सुबह होते होते मरते हैं ब्रह्मा जी भी गिनती करके नहीं बता सकते जब संसार के सुखों को और संसार को सच्चा माना तो जैसे ट्रैफिक में खेत खली के पतंग आ आकर सता सता करर दुखी हो मर जाते ऐसे ही संसार के सभी लोग मरते हैं कोई पत्नी के दुख से पति के दुख से बीमारी के दुख से छटपटा के बुढ़ापे में मरते क्या ख्याल बेटे का क्या होगा शादी क्या है बचा हुआ कोई ना कोई छटपटाहट रहती सड़क पर ट्रैफिक प ट्रैफिक की लाइटों में आए हुए जंतु जो सुख लेने
आते हैं वे छट पटाए बिना नहीं मरते ऐसे य सारे धरती के मनुष्य भी छट पटाए बिना नहीं मरते इनकी कोई गिनती नहीं रोज कितने मरते हैं पक्का आंकड़ा मिलना मुश्किल है हिंदुस्तान में किस दिन कितने मरे व पक्का आंकड़ा निकालने में भी कसरत करनी पड़ेगी अनऑफिशियली भी मर जाते हैं अनऑफिशियली भी कहीं दफनाए जाते हैं तो धरती पर कितने लोग ऐसे छटपटा के मारते हैं उसकी कोई ज संसार को सच्चा माना तो छटपटा और मरो और संसार को सच्चा ना मानो यह और वह जिससे दिखता है उसम की सच्चाई को जान ले है हम
है अपने आप हर परिस्थिति के बाद चाहे हाय सीता हैय सीता कर के राम जी इधर उधर पुछा कर रहे हैं अथवा भाई लक्ष्मण करके रुदन कर रहे तब भी राम जी अपने आप में तृप्त है राज करे रमणी रमे के ओढ़े मृग छाल जो करे सो सहज में सो साहिब का लाल कभी राज करें कभी जगत का व्यवहार करें कभी मृगला उठ के पड़े सहज में महापुरुष उनके लिए जगत कुछ भी माना नहीं रखता जैसे संसार में यह त्रि श्रेणु क्या माना रखते हैं हवामान में कितने रज कण है और कितने त्रण है तैर
रहे हैं क्या माना रखते ऐसे ही अपना शुद्ध में दिखा तो ये संसार त्रण कीना लहराता हुआ देखेगा अपनी शुद्ध में को पाना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है उससे जितना दूर रहे उतना तड़प जल्दी जितना मिला उतना जल्दी काम हो हम सेवा कार्य करते अगर ईश्वर की प्राप्ति की तरफ नहीं लगते तो सेवा भी नहीं होती ईमानदारी नहीं तो सभी ऑफिसों में हमारा सेवा का सभी सेवा करते हुए देखते लेकिन ईश्वर की तड़फ से जो सेवा बनती है वह सचमुच में सेवा है बाकी सब दिखावा ईश्वर की प्राप्ति के निमित्त जो सेवा होती उस
सेवा का तो रंग और होता कोई बोले मुझे ईश्वर प्राप्ति हो जाए फिर मैं सेवा करूंगा फिर सेवा की जरूरत नहीं है फिर तो तुम्हारी रहमत हो गई फिर सेवा क्या है ईश्वर प्राप्ति के पहले सेवा है ईश्वर प्राप्ति के बाद सेवा नहीं है विनोद है तुम्हारा विनोद दुनिया की सेवा हो जाएगी तुम्हारा सहज में उठना बैठना बोलना चालना सोचना जगत की सेवा हो जाए लगता है कि मैं सेवा कर रहा हूं सत्संग लेकिन मैं अपने आप में यह नहीं महसूस कर रहा हूं कि मुझे कोई बोजा लग रहा मैं कोई सेवा करर सहज मनोरंजन
ज्ञानी का जगत की सेवा सूर्य का मनोरंजन दुनिया की सेवा हो जाती चंद्रमा का मनोरंजन दुनिया की सेवा हो जाती समुद्र का मनोरंजन दुनिया की सेवा हो जाती मेघ का मनोरंजन दुनिया की सेवा हो जाती परमात्मा का मनोरंजन जगत की उत्पत्ति स्थिति लय प्रलय हो जाता है क्या बात है जो मैं को शुद्ध रूप में जानता है उनके लिए तो मौज ही मौज है और जो मैं को अहम से ढका हुआ है और जगत को सच्चा मान के सुखी होने के लिए भटकता है वो ट्रैफिक के जंतु की नहीं तड़प तड़प के कुचल कुचल के
मार देता है अपने को चाहे फिर 30 लाख की सैलरी मिले चाहे 30 करोड़ की मिले लेकिन कुचला जाता है जगत की सत्यता है ना परमात्मा की सत्यता का साक्षात्कार नहीं हुआ ना चाहे कुछ भी मिले 20 हज करोड़ मुनाफा कर दो फिर भी तसल्ली नहीं रहेगी 5 हजार करोड़ कर लो फिर भी तसल्ली नहीं रहेगी का है उस परमात्मा में आ जाओ तो बड़ी-बड़ी आंधी तूफान बड़े-बड़े भैसे भी व पहलवान के लिए विनोद होता था लोगों के लिए बड़ा आश्चर्य होता था बड़ा भैसा ंड बैठक करे ले प बैसे लगा के धीरे धीरे धीरे
ऊपर चढ़ जाए ऐसा बनाया उसने जैसे ट्रक में नहीं गाय भैंसे ट्रक में भरते तो रप बना होता है ऐसे भैसे को लेकर धीरे धीरे कैसा लगता होगा कल्पना ही करो एक मनुष्य भैसा लेकर जब डंड बैठक करता होगा अपने आप में मैं भी कुछ हूं लेकिन वह पहलवान मर गया अपनी असली मैं को नहीं जाना कसरत कर कर के जो हाड मास की मैं बनी थी व मैं बड़ा पहलवान मारा गया मैं हरिद्वार में रहता हूं तो शाम को घूमने निकलता हूं सुबह तो एक लड़का है 20 एक साल का उसी आश्रम के नजदीक
कहीं रहता है शाम को वो भी घूमता अच्छा कदा 65 फीट 6 फीट का हाइट म कसरत करता है बाबा जी प्रणाम प्र धीरे धीरे बातचीत करते मैं क्या तुम्हारा उद्देश्य क्या है उसने बोला मैं अपना जीवन तब सफल मानूंगा कि ये गंगा किनारे जो कोई सबसे बड़ा पेड़ है उखाड़ के जिस दिन में बाहर ले जाऊंगा तब समझूंगा मेरा जीवन सफल है अब उस टोंट में बोला उस उस भाव में बोला कि उस समय उसको उपदेश की जरूरत नहीं थी धीरज की जरूरत फिर हम घूमते घाते एक साल दूसरे साल अभी यह तीसरा साल
हुआ कि दूसरा साल अब एक जगह बैठा था मैं वहां से गुजरा तो उठ के खड़ा हुआ प्रणाम कि फिर बातचीत करते करते मैं क्या कैसा तुम्हारा उद्देश्य तो बोले बाबा माफ करना है यह मेरी गलती थी यह भी एक आहम है अपने आप में जो कुछ कराता है वो कराता तो संयम में अकेले रहने में गंगा किनारे रहने में संत को प्रणाम आदि करने में विवेक का विकास हुआ अपने आप बोला के बेवकूफी थी मैं काहे को क त बेवकूफ है उस समय में बेवकूफ बोलता तो मैं ही बेवकूफ साबित होता हमने धीरज रख
दिया समय आकर सब कुछ संवार लेता है लेकिन सत्संग से जो फायदा होता है सत्संग से जो असली मैं का रस और ज्ञान होता है वो दुनिया की सारी कमाइयां उसके आगे दो कोड़ी की हो जाती इसीलिए राजे महाराजे राजपाट छोड़कर गुरु के द्वार पर झाड़ू बुहारी लगाते बर्तन माज हमने भी बर्तन माजे सौभाग्य हमने भी बुहारी लगाई हमने भी गुरु जी के खत पढे गुरु आश्रम में कोई भी सेवा ई तो हमने कर ली उसका आनंद और है गुरुद्वार पर सेवक होकर रहना भी सौभाग्य की बात है बजाय सम्राट होकर रहना सम्राट तो अहम
सजाए और भोग भोगे और सेवक अहम मिटाएगा और योग करेगा बोलो सेवक बढ़ा के सम्राट ब सम्राट तो अहम सज आएगा और भोग भोगे पुण्य और स्वास्थ्य बिगड़ेगा और सेवक अहम मिटाएगा और सेवा करेगा तो किसका भविष्य उज्जवल होगा अहम बढ़ाएगा और भोग भोगे उस समय तो बड़ा और सुखी दिखेगा और दूसरा अहम मिटा रहा है और सेवा कर रहा है उस समय बेचारा सादा सुदा दिखेगा य बिचारे साधक बिचारे तो हम अभी तो हमारे छोरे तो मौज में रहते हैं हम तो बिचारे होकर रहते थे हमारे छोरे जो आश्रम में ना वो तो ठाट
से रहते हैं हमको ऐसे कपड़ पहनने का तो ऐसी सुविधा नहीं थी अ निताल की कुटिया जैसे हमारे आश्रम में लाइट मकान छोटे से उसम रहते पानी भर के ले आते सब्जिया खरीद के ले आते हाथ से उठा के दो दो किलोमीटर ताल के बाजार से ज लाली और लिपस्टिक वालियों का दर्शन होता था ऐसे बाजारों से खरीदी करके और कुटिया में साधना करना सेवा करना तो उस समय तो हम बिल्कुल दया के पात्र लगते थे ये बिचारा नई नई शादी किया क्या पता इसको क्या हो गया है घर जाता भी नहीं जैसे लोग पागल
को समझाए ऐसा मेरे को समझाने को आते थे मानो वो सारे स्याने थे मैं ही अकेला पागल था घर में भी ससुराल वाले भी पड़ोस वाले भी और घर से छोड़ के गुरु जी के वहां गए तब भी वह भी वही सिलसिला चालू रहा तुम्हारे अकेले इधर रहने से इतने परिवार वाले दुखी होते हैं घर में भी रह गए तो भजन हो सकता हम भी तो देख आते जाते आगरा से आए मैं प्रैक्टिस करता हूं मैं डॉक्टर हूं साई को तो हम भी मानते तुम भी क्या क्या समझाए जो आते थे ना साधक दर्शन करने
को उनको फिर वह हमारे जो हरीफ होते थे ना भाई यह आ गया ना आ जाए उनको बोलते ये शादी सु करके इधर आ गया समर्पित हो जरा समझाओ फिर वह मेरे पीछे पड़ जाते आने वाले दर्शनार्थी मेरे को अकल देते कैसा गुजारा हुआ होगा एक तो गुरु जी का खास सेवक सीनियर था हम जूनियर थे तो हम टिक जाए तो उसका प्रभाव कम हो जा वो भगाने में लगा और फिर जो आश्रम में आते थे सब पुराने का ही आदर करेंगे और गुरु जी का क्लोज वही था हम तो बहुत दूर थे तो जो
भी आते थे उसी ग्रुप में होते थे हम अकेले ही और सारा ग्रुप का ग्रुप मेरे को अकल देता टोंट मारता विचित्र विचित्र सेवा पकड़ा देता ताकि भागे एक बार तो ऐसा किया कि न जाने क्या बंसी बजाई गुरुजी के पास और बाहर आया कि साई आज जल्दी जाओ अहमदाबाद पहुंचो मैं अरे साई ने आ कर दिया और मेरा बोरी बिस्तर बंद के मेरे सिर पर रख दिया और मैं व फिर उतरने को मजबूर कर दिया मैं पहाड़ी से उतरा और बस बस का अड्डा कहां नीचे सड़क पर बस रोके बस रोके तो बस तो
क्या रोके बारिश आए ऐसे करते करते काठ गुलाम पहुंचा और हनुमान के मंदिर की उसम रात गुजारा कि दूसरे दिन गाड़ी में य तो खेल कई बार तो इस प्रकार के तो भैसे उठा उठा के आए आंधियां तूफान तो तब से ही चले कंधे मजबूत होसी मेरे गुरु जी ने जो परमात्मा प्राप्ति के लिए सहा उसका सवा हिस्सा भी मैंने नहीं सहा फिर भी जो सहा उसका हजार मा हिस्सा भी आपको नहीं सहना पड़ेगा और मैं रब का रास्ता दिखा द किसी भी प्रकार की बातें बार-बार सुनने से आदमी उसी स्वभाव का बन जाता है
सत्संग की बातें सुनने से सत्संगी स्वभाव बन जाएगा बनिया गिरी की बातें सुनते व्यापारी बन जाएगा डॉक्टर की बातें सुनने और रटने से व हो जाएगा मीडिया की बातें बोलने सुनने में मीडिया का ही अच्छा अनुभवी बन जाएगा ऐसे ही चावल का बिजनेस वाला फिर चावल में ही जानेगा परिमल भाव बासमती य भाव जीरा सरय भाव फलाना यह भाव फलाना य भाव तो सत्य की बातें जो सुनता है विरता है वह असत जड़ दुख रूप संसार के बहाने वाली चीजों में सत बुद्धि नहीं करता संसार की चीजें कभी इधर कभी उधर मन भी कभी इधर
कभी उधर बुद्धि भी कभी इधर कभी उधर लेकिन जो सत्संगी है और वशिष्ठ जी कहते राम जी तुम मेरे वचनों के अधिकारी हो जो मूर्ख है ना डामाडोल हो जाते हैं वह संत वचन के पात्र नहीं होते हैं तो सत्संग का अमृत ढोल देते हैं जो पात्र होते हैं उनको पाकर वशिष्ठ जी प्रसन्न होते हैं कि तुम मेरे वचनों के अधिकारी हो