[संगीत] पुरी गीता का डाली गोल चंद्र ने गोल चंद कृष्णा को एकदम तो एकांत में रहने लगे तो एक किसान उनको भजन दिया के खिलाफ प्रसाद आया हमारे पास सभी के हम सभी कल तो मैं किसी जरूरी कम से जाऊंगा तो कल दोपहर के भजन का आपका क्या होगा बोले गुलचंद लेगा सभी को खिलता है गोलचंद पानी में रस देता है पृथ्वी में गंद देता है आकाश में आप यानी शक्ति व्यापिनी शक्ति थोर देने की शक्ति सब गोल चांदी तो है गुलचंद आएगा गुलशन को खिलाएगा कैसे खिलाएगा कैसे अरे अपना कम करो किसान दूसरे दिन
जाना तो था नहीं चुप कर बैठ गया कहानी भजन करने के समय के थोड़ा पहले की देखें इनका गूलचंद कैसे आता है कहानी जान वाले तो है नहीं और पास में कोई गांव नहीं है मेरे गांव से तो हम लोग आएंगे कोई आएगा नहीं पता चलेगा गोल चंद गोल चंद गोल चंद रात लगाकर बैठे हो चुप के निहार तारा भजन का ठीक समय हुआ उससे दो मिनट पहले एक बुढ़िया ही हाथ सर पे हांडी लेक बढ़िया उबला हुआ दूध जिसमें इलायची आदि पड़ी है शक्कर की पुड़िया अलग से साधु बाबा साधु बाबा खोलो माताजी क्यों
बोले हमने मेरी गे भी आई थी जब तक पीने के काबिल नहीं था तब तक पीने के काबिल होगा तो पहले साधु बाबा को पिलाऊंगी मेरी मानो तिथि और मेरे को प्रणाम [प्रशंसा] वह जो था किसान उसका पहले नाम था रामनाथ रामनाथ चुप कर देख रहा था ही खिलाता था हम सोते की हम नहीं होंगे तो बेटी का क्या होगा विवाह कौन करेगा बेटे का क्या होगा पत्नी का क्या होगा ये हमारा टच अहंकार होली के उसे रंगों में हरि के रंग में रंग जाए अथवा तो फिर होली का के उसे दहन क्रिया में ही
डैन हो जाए प्रार्थना करो चिंतन करो चिंता ना करो यह अभी तुम्हारा बेटा तुम्हारी बेटी करोड़ जन्मों से उसे गोलचक्म की अथवा परमात्मा की वो बेटी है वह उसका ख्याल रखेगा तुम थोड़ा निमित्त बन जाओ बाकी टेंशन [प्रशंसा] मेरा चित हो तुलसीदास जी ने कहा तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत हुई सोए अनहोनी होनी नहीं अनहोनी तो होने वाली नहीं और जो होने वाली है वह तेरे से रुकेगी नहीं होने वाली को तो रोक रोक के रोकने वाले मर गए होने वाले तो हो रही है मृत्यु होने वाली कोई मैं का लाल आज तक उसे मृत्यु
को रोक सका क्या तो जिसने जन्म दिया है और मृत्यु होने वाली है दुख ना जाने पर भी आने वाला आता है ऐसे आप सुख ना चाहो तो अभी भी सुख के पदार्थ सुख के निमित्त ए जाते खामखा सुख के लिए लालायित होती और दुख से घबरा रहे हो दुख भी आकर चला जाता है सुख भी आकर चला जाता है फिकर की होली कर ले तो तेरा अंतर लाज की नहीं तुलसी भरोसे राम के निश्चिंत हुई सोए अनहोनी नहीं ऐसा क्यों नहीं हुआ वैसा क्यों नहीं हुआ ऐसा हो तो अच्छा है वैसा हो तो अच्छा
है ये वासना का पुतला बनकर तू कब तक परेशान होगा तो हिरण आकर्षक होगा साथी बनकर कब तक तू अपनी हेकड़ी तो खींचेगा आखिर तो तुझे प्रहलाद का परम बरस पर महात्मा होगा पर हाई के मां में कोई अपमान कर देता तो दुख नहीं मानते बोले बड़ी कृपा करते मेरे डे में अगर हम रहा हो तो मेरे को हम अपमान का दुख हो अगर मां कर देते और हर्ष नहीं होता है की हर्ष भी तो दे में आम का होता है हर्ष सिख जाके नहीं बेरी मीत समाज बड़े बंधन में तप रहा है दुखी हो
रहा है धन भी है सत्ता भी है सुबह भी है खाने में चलने वाले भी हैं फिर भी सत्संग की सूझबूझ नहीं तो हिर्नाकश्पयू परेशान है और प्रहलाद को सत्संग मिला है मां के गर्भ में थे तब यादव के पेट में प्रहलाद पंच महीने के द और नारद ऋषि के आश्रम में मां रही थी मां को तो सत्संग याद नहीं रहा की क्योंकि ससुराल जाएंगे पति तब करने गया है डाइतिहार गए देता क्या करेंगे उसकी बुद्धि भट्टी हुई थी बिखरी हुई थी लेकिन प्रहलाद की बुद्धि तो गर्भ में कहां बिखरना है शांत बुद्धि में ब्रह्म
ज्ञान स्थित हो गया जैसे दही शांत होने से जाम जाता हैला तेरा तो क्या दूध फैट जाएगा ऐसे आप अपनी माटी को शांत होती है उसमें परब्रह्म परमात्मा रूपी दही जमा फिर आनंद कीजिए माधुरी का विश्रांति ओम शांति ओम शांति और व्यवहारिक जगत में सत्य का न्याय का सरलता का ईश्वर अर्पण भाव का विजय है और अहंकार का शोषण होने की बेवकूफी का पराजय दिवस है होली क्या करें बेटा मानता नहीं सोचा था बहू सुख देगी उसने भी कोई सुख नहीं दिया शरीर भी मोटा मोटा मैं बहुत दुखी हूं तो एक बेटा है दूसरा बेटा
है तो वो भी हमारे जैसा भीम सिंह ठाकुर सत्ता मुलाकात और हम घर बछड़े कड़वे और धूप में तप रहे या तो किसी कांटे की बढ़ पर या तो धरती पे पड़े रहते हमारी कोई कीमत नहीं क्या करें सोचा था सुख मिलेगा लेकिन हम लटके गए अंगूर हैदराबाद हम तो पड़े हमको कौन पूछे अंगूर थोड़े गंभीर हो गए क्या यह करेले की बेल अपने को कोष के परेशान हो रही है की बहन भी बहन तू चिंता कहे करे ही मोती तू कहे चिंता करे भीम सैनिक सुरमा तूने नाम सुना है कहे तू चिंता करें मुझे
कोई अधिक हो जाए लेकिन तुझे खाए तो डायबिटीज मिट जाए और स्वास्थ्य फायदे [प्रशंसा] तुझे कोई रोटी में कचुंबर बनाकर डालें और तो खाए तो रोटी का रंग बढ़ जाए सब्जी बनाकर खाए तो स्वाद ए जाए पंच रास्तों सभी खाते लेकिन तेरे बिना का रस अगर तेरे रस उसके जीवन में नहीं है तो उसके शाद रश्मि एक रस की कमी जीवन नीरस हो जाएगा बीमार पड़ता रहेगा इसलिए तेरे बिना तो स्वास्थ्य का कोई ठिकाना ही नहीं अंगूर ना खाए तो चल जाएगा क्योंकि मिठास तो शक्कर से भी ले लेंगे गुड से भी ले लेंगे फल
से भी ले लेंगे लेकिन गाना तो नीम और करेला और तुम दोनों अपने को को क्या करें मेरे भले से केवल केव्वु के कम आते हैं छोटी-छोटी पट्टी मेरी क्या कीमत है भैया तेरी इतनी कीमत के बड़े-बड़े और श्रद्धा क्या करें हमारी कीमत नहीं है अरे होली के का के दिवस में तुम्हारी कितनी कीमत और प्राचीन कल में ए पलाश के वृक्ष तुम्हारी कितनी कीमत थी की ब्रह्मचर्य व्रत विद्यार्थी पढ़ने जाता तो उसे दंड पकड़ा जाता था पलाश की लकड़ी का क्योंकि विद्यार्थी दरबार छोड़कर महा है गुरुकुल में आया उसका मां धार गंभीर रहे स्थिति
में हड्डी ग्रह वह दंड पकाने से स्थिति में अधिक रहने के करण उससे मिलेंगे यह सब रंगो का बैलेंस बना रहेगा विद्यार्थी विकसित ना हो इसलिए पलाश की लकड़ी का दंड दिया जाता था या अधिक लोग यज्ञ यज्ञ करते थे तो पलाश की लकड़ी और भजन ब्राह्मण करें तो आप बादल में खाखरा कहो पलस कहो के सूर्य के फूल जिसमें होते चांदी की थाली में भजन करने से जो लाभ होता है वही लाभ पलाश की बादल में धोने में होता है तो अपने को क्यों पूछता है तुम अपने चिंतन को बदलो आप कैसी भी स्थिति
हो आपके पास बहुत कुछ क्या करूं नौकरी नहीं है बेटा कहना नहीं मानता ऐसा है वैसा है फलाना है डिगना यह सब हमने मां लिया लेकिन मनुष्य जन्म है भारत में जन्म है लाख रुपया दे दे तो भी दो आंख कोई तो देगा क्या दो-दो आंख दे दे लाख रुपए ले लें तो लाखों की कीमत से भी ना मिले सी आंखें हैं कान है नाक है जीव है सोच विचार करने की डाटा ने माटी दे राखी है तो ऊंचे विचार कर मैं दुखी हूं मेरा कोई नहीं है ऐसा करके अपने को कोष मत जो हो
गया होली अब तो रंग जा राम नाम से हरि नाम से ज्ञान से तू रंग जा तक अपने को सेगा क्या करें रात को नींद नहीं आती तो होली खेल कप अधिक है गुनगुना पानी करे 1 लीटर थोड़ा सा नामक डाल दे 1 लीटर पर 10 ग्राम नामक डाल दे है पंजों के बाल बैठकर पी खूब पीठ पीठ पीठ भी इतना पी की वह पानी बाहर आना चाहे और फिर उंगली डालकर अथवा सुनो ये दातुन दाल के सर का सर पानी निकाल दे दवाइयां कप को इतना समाज नहीं करेगी जितना ये प्रयोग समाज करेगा और
ये सीजन है जिसको भी कब की तकलीफ है मोटापा है हैवी ड्यूटी है कोलेस्ट्रॉल है वो हफ्ते में एक बार ऐसा कर ले आराम से नींद आएगी ठीक और मीना में ऐसी नींद नहीं आई और सीजन में जैसी फागुन मास में से इस वसंत रितु में नींद बड़ी आई हूं मैं बसंत रितु मैं फागुन की पूर्णिमा चंद्रमा का प्रगति दिवस प्रहलाद की परमात्मा में भी शांति वाले के विजय दिवस और जिसके पास वरदान है ऊपर ना मारो नीचे एन मारूंगा धर्म उधर ना मारो फिर भी अपने अन्य और प्रभाव से विशेष होना चाहता सदा रहना
चाहता है उसकी पराजय हुई नरसी अवतार प्रकट हुआ और पड़ा हिल का साबुन तेरे सारे वरदान देख ले घर के अंदर एन बाहर ठीक हूं [प्रशंसा] उसे समर्थ की सत्ता जहां से आई उसमें विश्रांति पत्र तो प्रहलाद है समर्थ की सत्ता लेकर अपने एक पानी के बूंद को तो विशेष मनाने में तक जाएगा हर जाएगा किसी संत पुरुषों ने और कबीर जी ने भी गया होली के बड़े में पाप कपाट मालिक आवरण पांचों दो सत्ता जोड़ी है मेरी माटी देखो मैं माने की गलती करेगी तो पाप कपाट विषय विकार के चक्कर में पड़ेगी पाप कपाट
मालिक से आवरण पांचों ता जोड़ी अनुभव गुलाल की भरकर जेली झज बजे छम छम मां भर भाग्य कचोरी गलो होली कर लो होली विषय विकारों की होली रे ए सखी है बुद्धि है मेरी सखी निज आनंद में खेलो होरी विषय विकार मिट जाए सारा केट 84 की डोरी पाप कपट मालवीयक्ष आवरण पांचो तजुरी खेलो होरी होरी होरी खेले संत मतवाला आवा गमन का धोखा मिट गया पिया गुरु का प्याला [संगीत]