क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं? इस इंसान को हल्के में मत लेना। व्हाट्स योर फेवरेट पिक अपन? ऑनलाइन अनवेरिफाइड सोर्सेस इनके आईक्यू को 257 बताते हैं। विटाैलिक ब्यूटेरिन जिसने सिर्फ 19 साल की उम्र में सेकंड लार्जेस्ट क्रिप्टो नेटवर्क इथेरियम बना लिया। विटा ब्यूटीन हैज़ बीन कॉल्ड वर्ल्ड्स यंगेस्ट क्रिप्टो बिलियन। विटा बूटरिन। अ विज़नरी हू रिडिफाइंड [संगीत] द फ्यूचर ऑफ़ ब्लॉकचेन। एंड आई थिंक जस्ट अर्ली 20 मोस्ट पावरफुल डिसेंट्रलाइज टेक्नोलॉजी पर जब ये लोगों के बीच होता है तो ऐसा दिखता है क्वेश्चन पर्सनल कनेक्शन [संगीत] [हंसी] पर यू नो व्हाट विटालिक अकेला बिल्कुल भी नहीं
है। यह देखो ईलॉन मस्क बीच फंक्शन में अपना सॉफ्टवेयर अपडेट कर रहे हैं। सॉफ्टवेयर अपडेट वन और सॉफ्टवेयर अपडेट टू। मार्क ज़करबर्ग को भी कई लोग रोबोट क्यों बुलाते हैं? आपने अपने स्कूल, कॉलेज या ऑफिस में भी नोटिस किया होगा। जो लोग बहुत ही इंटेलिजेंट टाइप के होते हैं, वह सोशली काफी वियर्ड होते हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। नेचर का एक सीक्रेट कोड है जो आपकी पर्सनालिटी और दिमाग की वायरिंग के बारे में बहुत कुछ बताता है। मगर यहीं से कहानी डेंजरस हो जाती है। क्योंकि इंटेलिजेंस कोई तोहफा नहीं बल्कि दो धारी तलवार है।
एक अपने आप पर पॉइंटेड भरी हुई बंदूक है जो कभी भी आप पर फट सकती है। और इतिहास कई बार इस चीज को दोहरा चुका है। जैसे यह केस स्टीव जॉब्स, आर्टिस्टिक जीनियस, सोशल मोज़ार्ड जिनकी वजह से आज हर किसी के हाथ में एप्पल मास्टर पीसेस हैं। पता है कैंसर के इलाज के लिए क्या कर रहे थे? एक्यूपंक्चर और फ्रूट डाइट डॉक्टर्स के वर्न करने के बाद भी जॉब्स [संगीत] रिजल्टिक कैंसर। फर्स्ट रिएक्शन वास टू ट्राई टू फाइंड वेल विथ अल्टरनेटिव। अल्टीमेटली कैंसर का आखिरी स्टेज आ गया और तब जाकर इन्हें अपनी गलती रियलाइज़ हुई।
एक इतने जीनियस इंसान की मौत इतने बड़े पछतावे के साथ। 17 जून 1952 पैसोना की एक लैब में एक धमाका होता है। धमाके के मलबे के अंदर छुपा था एक राज, जो दुनिया के सामने खुलने वाला था। नासा का सबसे काबिल इंजीनियर जैक पार्संस जिसके बिना नासा चांद तक जा ही नहीं सकती थी। अपने इक्वेशंस और इंजंस के पीछे एक अजीब सा सच छुपा रहे थे। दिन में वो रॉकेट्स बनाते ताकि इंसान आसमान को छू सके और रात को उसी आसमान से किसी को बुलाने की कोशिश करते। थलीमा धर्म की रानी पाप की देवी बैबलोन।
उनका घर ऑलमोस्ट एक मंदिर बन गया था। हवा में धुआं और दीवारों पर लिखे मंत्र और फिर एक दिन घर में धमाका होता है। कुछ कहते हैं साइंस एक्सपेरिमेंट गलत हो गया। कुछ कहते हैं कोई रिचुअल अधूरा रह गया। सच क्या था आज तक कोई पक्के तौर पर नहीं जानता। पर असली सवाल यह था क्या एक हाई आईक्यू पैटर्न ऑब्सेस दिमाग कभी कभार कुछ ऐसे कनेक्शंस भी देख लेता है जो असलियत में मौजूद ही नहीं होते। यह वो साइंटिस्ट थे जिन्होंने नासा का जेट प्रोपल्शन लैब फाउंड किया था। सो ये जादू टोने जैसे अंधविश्वासों में
कैसे बिलीव कर सकते थे। इसका रीजन सिर्फ एक इन सबका एक ब्लाइंड स्पॉट था जो इन्होंने मिस कर दिया और आपका भी है। इंटेलिजेंस के बारे में आप जो कुछ भी जानते हो वो डेंजरसली इनकंप्लीट है। प्रकृति ने हमारे दिमाग को बनाया इस तरीके से कि सबको यूनिक खूबी दी मगर साथ में एक यूनिक ब्लाइंड स्पॉट भी क्रिएट किया। यह कोई थ्योरी नहीं है। हार्ड कोर न्यूरोबायोलॉजी है। आपके दिमाग में भी छुपी एक बड़ी खूबी है जिसके साथ एक बड़ा ब्लाइंड स्पॉट। आज का हमारा मकसद बिल्कुल साफ। साइको मोड ऑन करो। रियलिटी का कोट समझो।
अपने ब्लाइंड स्पॉट को पहचानो और दिमाग के इस ग्लिच को रिवर्स करो। लाउडस का वो फेमस कोट है ना ही हु नोस अदर्स इज वाइस। [संगीत] बट ही हु नोस हिमसेल्फ इज एनलाइटेंड। दिमाग सबके पास है पर जो इसे समझदारी से यूज करता है। इतिहास की गूंजे उसका नाम चिल्लाती है और जो नहीं वो खामोशी में ही खुद खत्म हो जाता है। सो लेट्स डिकोड द कोड ऑफ रियलिटी। चलो इतिहास में आज से 2 मिलियन से 2 लाख सालों के बीच जंगल का अंधेरा रातें लंबी चारों तरफ मौत का खौफ 50 जंगली पूर्वजों का कबीला
दिमाग में बस सिर्फ एक ही मकसद [संगीत] जिंदा रहना जिस मकसद को हासिल करने के लिए प्रकृति ने इनके दिमाग में भरा एक पावरफुल सॉफ्टवेयर डर डर हमें हरदम चौकन्ना रखता बेचैन करता रातों की नींदें उड़ाता और हमें सोचने पर मजबूर करता प्रेडिक्ट करने पर मजबूर करता। डर प्रकृति का वो प्रेशर कुकर था जिसने हमारे पूर्वजों के दिमाग को मजबूर किया खुद की जान बचाने के प्रेशर में अलग-अलग बिहेवियर्स और रोल्स अपनाने के लिए। इवन आज भी डर बाय फार सबसे पावरफुल इमोशन है जो आपके बिहेवियर को इन्फ्लुएंस और परमानेंटली चेंज कर सकता है। एक
घंटे का मोटिवेशनल स्पीच उतनी गहराई नहीं छोड़ता जितना एक्सीडेंट का बस सिर्फ एक सेकंड। अब इमेजिन करो जब 24 घंटे यही डर हो तो आपका दिमाग इससे राहत पाने के लिए क्या कुछ नहीं करेगा और इसीलिए इंसानी दिमाग प्रकृति के खिलाफ लड़ने के लिए चार अलग तरीकों से विकसित होना शुरू हो गया। पहली कैटेगरी बनी हमारे पूर्वजों की जो चौकन्ने ऑब्जर्वर्स बनने लग गए। नदी किनारे एक बड़े जीव के पैर के निशान दिखे मतलब खतरा। नुकीली चीज दिखी मतलब हथियार। चहकती पंछियां दिखी मतलब पानी। यह वो कैटेगरी होने वाली थी जो लॉजिक पैटर्न रिकॉग्निशन और
टेक्निकल बारीकी देखने और समझने वाला दिमाग बनेगी। इन्हें हम कहेंगे द टेक्निकल ब्रेंस। ये लोग फ्यूचर के न्यूटन, टेस्ला रामानुजन बनने वाले थे। दूसरी कैटेगरी बनी हमारे पूर्वजों की जो साथी बनाना सीख गए। इन्होंने इमोशंस को पढ़ना सीख लिया। इन्हें हम कहेंगे द सोशल ब्रेस। वो पूर्वज जो चेहरा पढ़ सकते थे, जज्बात महसूस कर सकते थे, अलायंसेस बना सकते थे और पावर में आ सकते थे। फ्यूचर के पॉलिटिशियंस, एक्टर्स और लीडर्स तीसरी कैटेगरी बनी उन पूर्वजों की जो डर को लांघ कर नए रास्ते खोजना सीख गए। यह खतरों से भरे अनजान रास्ते लांगने लगे। जो
पूरे कबीले को खाने, पानी और सुरक्षा तक पहुंचा सकता था। यह लोग अक्सर भटक जाया करते थे। बट इनके भटकने से ही कबीला अपने ठिकाने तक पहुंच पाता था। यह थे द एक्सप्लोरर्स। यू कैन आल्सो कॉल द नोवेल्टी चेजर्स, द रिस्क टेकर्स। और फाइनली चौथी कैटेगरी जो इनकी टोटल ऑोजिट थी। इनके लिए नए रास्ते ढूंढने से कई ज्यादा इंपॉर्टेंट एकिस्टिंग जिम्मेदारियों को निभाना था। ड्यूटी इनकी भाषा थी और डिसिप्लिन इनका कोड। यह ध्यान रखते कि रात भर आग जल रही है। हथियारों की नोक अभी भी धारधार है। खाने-पीने का बंदोबस्त हर किसी के लिए हो
रहा है। यह बेसिकली कबीले को आपस में ग्लू की तरह जोड़कर रखते थे। अपने ड्यूटी और डिसिप्लिन से। अब सबसे इंटरेस्टिंग चीज देखना। यह सारे ट्रेड्स प्रकृति ने इंसानी दिमाग में एक साथ एज अ पैकेज डेवलप नहीं किए बल्कि ट्रेड ऑफ्स में किए। यानी कि एक ट्रेड ज्यादा मिला तो दूसरा ऑटोमेटिकली कम। प्रकृति ने स्पेशलाइजेशन को फेवर किया, जनरलाइजेशन को नहीं। इस एवोल्यूशन के प्रिंसिपल को कहा जाता है द कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ। यह कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ ही है दिमाग का ब्लाइंड स्पॉट नंबर वन। स्पेशलाइजेशन के चक्कर में आज जब पैसों के डिसीजंस लेने होते हैं,
तो काफी लोग अपने इमोशनल ब्रेन को स्विच ऑफ ही नहीं कर पाते। और रिजल्ट इन्वेस्टमेंट लॉजिक से नहीं बल्कि इंस्टिंक्ट से हो जाता है। बट सीरियस इन्वेस्टर्स इमोशंस पर नहीं सिस्टम्स पर रिलाई करते हैं। इसी माइंडसेट के लिए प्लेटफार्म जैसे कॉinडीसीएक्स एकिस्ट करता है। क्रिप्टो ट्रेडिंग डायवर्सिफिकेशन का एक वैलिड ऑप्शन हो सकता है। अगर आप एक ट्रस्टेबल एफआईयू रजिस्टर्ड प्लेटफार्म पर ट्रेड करें। कॉinडीएक्स इंडिया के फाइनेंसियल इंटेलिजेंस यूनिट से रजिस्टर्ड है और उसके ग्लोबल इन्वेस्टर्स में से एक है कॉइन बेस दुनिया का लीडिंग क्रिप्टो एक्सचेंज। ट्रांसपेरेंसी के लिए कॉin डीसीएक्स का प्रूफ ऑफ रिजर्व्स पब्लिकली
अवेलेबल है। बट द प्लेटफार्म के पास उतने ही क्रिप्टो एसेट्स रियल में मौजूद है जितने यूज़र्स को दिखाए जाते हैं जो कि इंडिपेंडेंट थर्ड पार्टी ऑडिटर्स से वेरीिफाइड भी है। सो यहां पर ट्रस्ट अस का सवाल ही नहीं आता सब कुछ खुद वेरीफाई कर सकते हो। अब बिगिनर्स के लिए क्रिप्टो का सबसे बड़ा बैरियर होता है डर और कंफ्यूजन। इसीलिए कॉin डीसीx का इंटरफेस डेलीिबेरेटली सिंपल और बिगिनर फ्रेंडली रखा गया है। जिससे आप बिटकॉइन और इथेरियम जैसे एसेट्स को डायरेक्टली आईएआर में बाय और सेल कर सकते हो। हैवी इन्वेस्टमेंट की भी जरूरत नहीं है। आप
एज लो एज ₹100 से भी स्टार्ट कर सकते हो बिना कोई प्रेशर के। और जो लोग क्रिप्टो को लॉन्ग फॉर्म डायवर्सिफाइड इन्वेस्टमेंट के तौर पर देखते हैं उनके लिए क्रिप्टो एसआईपी का भी ऑप्शन अवेलेबल है जो कि बिल्कुल म्यूच्यूल फंड्स की तरह ही होता है। एक बार प्लान सेट करो और एक फिक्स्ड अमाउंट ऑटोमेटिकली इन्वेस्ट होता रहेगा डिसिप्लिन के साथ। इवन अगर आप ट्रेडिशनल गोल्ड की स्टेबिलिटी चाहते हो क्रिप्टो की कन्वीनियंस के साथ तो कॉin डीसीएक्स पर पैक्स गोल्ड भी अवेलेबल है। गोल्ड बैक क्रिप्टो जिसका वैल्यू डायरेक्टली फिजिकल गोल्ड से लिंक्ड है। नेक्स्ट ट्रेडिंग का
सबसे बड़ा चैलेंज है मल्टीपल स्क्रीन स्ट्रगल करना। एग्जैक्टली यही प्रॉब्लम सॉल्व करता है कॉin डीसीx का ट्रेड ऑन चार्ट्स फीचर। डायरेक्टली चार्ट से ही बाय और सेल करो। नो नीड टू स्विच स्क्रीन्स। टेक प्रॉफिट, स्टॉप लॉस और लिक्विडेशन लाइंस चार्ट पर क्लियरली विज़िबल रहती है। तो रिस्क मैनेजमेंट गेस वर्क नहीं रियल टाइम कंट्रोल बन जाता है। प्लेटफार्म फीस या कमीशन के कंफ्यूजन की वजह से कई बार प्रॉफिट्स का एक ह्यूज अमाउंट तो प्लेटफॉर्म्स पर ही खर्च हो जाता है। इसीलिए कॉin डीसीएस की फीस स्ट्रक्चर स्ट्रेट रखी गई है। 0.02% मेकर और 0.05% टेकर यानी आपका
फोकस चार्ट्स पर रहे, चार्जेस पर नहीं। इस सबके बावजूद जब मार्केट अनस्टेबल हो जाता है तब इंटेलिजेंस से ज्यादा सिस्टम रिलायबिलिटी मैटर करती है। सो यहां कॉin डीसीएक्स के स्टेबल आईएआर रेल्स आपको कंट्रोल देते हैं कि आप इमीडिएटली यूपीआई, आईएमपीएस और एनईएफटी के थ्रू इंस्टेंट डिपॉजिट्स और विथड्रॉवल्स कर सको। नो वेटिंग, नो प्रोसेसिंग टुमारो। जस्ट काम कंट्रोल। ट्रेडिंग ऑप्शंस भी इंटेंशनली सिंपल रखा गया है। स्पॉट ट्रेडिंग में सीधा बाय या सेल बिना फोर्स रिस्क के। फ्यूचर्स ट्रेडिंग भी अवेलेबल है 100 एक्स लेवरेज के साथ लेकिन सिर्फ एक्सपीरियंस स्टेटस के लिए डिजाइन किया गया है क्योंकि
लेवरेज का सही यूज़ मतलब पावर और गलत इन एक्सपीरियंस्ड यूज़ मतलब बिग प्रॉब्लम। नेक्स्ट क्रिप्टो ऑनबोर्डिंग आमतौर पर स्लो और कंफ्यूजिंग होता है। लेकिन कॉin DCX ने इस फ्रिक्शन को कॉन्शियसली रिड्यूस किया। मतलबस्ट केवाईसी, स्मूथ ऑनबोर्डिंग 247 कस्टमर सपोर्ट, स्ट्रिक्ट सिक्योरिटी प्रोटोकॉल्स और एक डेडिकेटेड इंश्योरेंस फंड के साथ। सो कॉin DCX को एक्सप्लोर करने के लिए नीचे डिस्क्रिप्शन में दिए मेरे रेफरल लिंक से साइन अप कर सकते हो। गेट 20% ऑफ द ट्रेनिंग फीस फॉर योर फर्स्ट 30 डेज। और अब वापस चलते हैं अपने कोर आईडिया पर। कैसे प्रकृति ने जनरलाइजेशन को नहीं बल्कि स्पेशलाइजेशन
को प्रेफर किया। द कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ दिमाग का लूप होल नंबर वन जिसकी बदौलत इंसानी दिमाग के दो अलग स्पेक्ट्रम्स क्रिएट हुए। एक ट्रेड में दिमाग स्ट्रांग तो दूसरे में थोड़ा वीक। कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ सिर्फ पर्सनालिटी ही नहीं बल्कि दिमागों में एक्चुअल स्ट्रक्चरल डिफरेंसेस क्रिएट करता है। न्यूरॉन्स जितने ज्यादा एक काम के लिए ऑप्टिमाइज्ड होते हैं, उतना ही दूसरे पाथवेज के न्यूरॉन्स ऑटोमेटिकली ट्रिम हो जाते हैं, प्रून हो जाते हैं। इसे कहते हैं कॉम्पिटिटिव न्यूरल एलोकेशन। इसी ट्रेड ऑफ के चलते दिमाग दो स्पेक्ट्रम्स में विकसित हुए। पहला स्पेक्ट्रम एक तरफ टेक्निकल ब्रेन तो ऑपोजिट साइड
में सोशल ब्रेन। जितना ज्यादा दिमाग लॉजिकल रीजनिंग और टेक्निकल पैटर्न समझने में अच्छा होगा तो उतना ज्यादा वो नेचुरली सोशल स्मार्टनेस में वीक होगा एज अ ट्रेड ऑफ और वाईसीवरसा। अच्छा एक इंपॉर्टेंट नोट यहां पर ये है कि ऐसा नहीं है कि दोनों का सीलिंग मिलाकर 100 ही है। जैसे मैंने कहा सोशल इंटेलिजेंस और टेक्निकल इंटेलिजेंस डिमेंशंस है। सो ऐसा नहीं है कि अगर टेक्निकल पैटर्न हंटिंग अगर 80 है तो सोशल इंटेलिजेंस ऑटोमेटिकली 20 हो जाएगा। बट मोस्टली वो सिग्निफिकेंटली लेस डोमिनेंट होगा। इसे आज हम द सिस्टमाइजिंग ब्रेन वर्सेस मेंटलाइजिंग ब्रेन कहते हैं। यह दो
टोटली डिफरेंट ब्रेन के स्ट्रक्चर और न्यूरल नेटवर्क्स हैं। एक चीजों के बीच के रिलेशंस पकड़ता है तो दूसरा लोगों के इंटेंशंस के बीच। इसी तरह एक तरफ एक्सप्लोरर ब्रेन बना डोपामिन हैवी दिमाग तो दूसरी तरफ स्टेबिलाइजर ब्रेन बना सेरोटोनिन हैवी दिमाग। जितना ज्यादा एक्सप्लोरेशन का इंस्टिंक्ट उतना कम उन्हें स्टेबिलिटी पसंद और वाइससीवरसा। अब इसकी गहराई को समझना। यह चारों ट्रेट्स मिलकर एक कॉग्निटिव ग्रेडियंट बनाते हैं। यह चार ट्रेड कैटेगरीज दिमाग के बॉक्सेस नहीं बल्कि डायरेक्शंस हैं या फिर डायमेंशंस कह लो। आज के मोस्ट ऑफ दिमाग इन चार एवोल्यूशनरी डायमेंशंस में ही स्ट्रेच होते हैं। आज
तक के सारे ब्रेनेंस आप, मैं, ईलॉन मस्क, जॉब्स, न्यूटन, डविची सब इसी फोर वे आर्किटेक्चर के यूनिक मिक्सचर हैं। बस इन्हीं चार कॉग्निटिव ग्रेडियंट्स के ऊपर लिटरली बिलियंस ऑफ यूनिक ब्रेनस बन सकते हैं। क्योंकि हमारे 100्स ऑफ कॉग्निटिव जींस अलग-अलग एनवायरमेंट्स, स्ट्रेस, ट्रेनिंग और लाइफस्टाइल में अलग-अलग तरीकों से एक्सप्रेस होते हैं और रीट्यून होते हैं। अपने वो दोस्त को याद करो जो जोक में भी लॉजिक ढूंढता है और 2 मिनट बाद हंसता है। टेक्निकल डोमिनेंट ब्रेन बट सोशियली ऑकवर्ड। वो आंटी को याद करो जो बात कम करती है बट लोग उनके तरफ देखकर अपना मुंह
जरूर खोलते हैं। सोशियली डोमिनेंट टाइप्स। और यहीं से जन्म होता है न्यूरो डायवर्जेंस का जो प्रकृति ने सर्वाइवल के खातिर एक डिजाइन की तरह विकसित किया। डिफेक्ट की तरह नहीं। आज जितने भी दिमाग हैं वो सही एनवायरमेंट के लिए हथियार है और गलत एनवायरमेंट के लिए लायबिलिटी। मगर आज सोसाइटी बन ही चुकी है इस तरीके से कि न्यूरो डायवर्जेंस को डिजाइन नहीं बल्कि डिफेक्ट की तरह देखा जाता है। जो दिमाग एक सिस्टम में फिट ना होता है जो सोसाइटी का करंट सिस्टम है उन्हें स्टूपिड कह दिया जाता है। इसीलिए कई जीनियसेस जो हाई न्यूरो डायवर्जेंस
दिखाते हैं उन्हें बचपन में या तो स्टूपिड कह दिया गया या वियर्ड। स्टूपिड तक तो ठीक है। डिसेबल्ड कह दिया जाता है। डिस्लेक्सिया फॉर एग्जांपल जिसे लर्निंग डिसेबिलिटी कही जाती है। बट कैसे हजम करोगे यह फैक्ट कि टॉप 35% कंपनीज़ के सीईओस कोई डिस्लेक्सिया है। यह कंपनियां चला लेते हैं मगर ठीक से पढ़ नहीं सकते। कितने तो एग्जाम्स में फेल होते थे। स्कूल आई नेवर फिनिश दपि। [संगीत] अच्छा ऑटिज्म को भी अक्सर डिसेबिलिटी कहा जाता है क्योंकि कुछ ऑटिस्टिक लोगों को नॉर्मल लाइफ जीने के लिए सपोर्ट लगता है। मगर ऑटिज्म भी फंडामेंटली हेल्दी न्यूरोडायवर्जेंस के
वजह से ही क्रिएटेड एक स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रम के कई ब्रेनेंस हेल्दी न्यूरोडायवर्जेंस दिखाते हैं। हेल्दी वेरिएशंस दिखाते हैं। मगर कुछ केसेस में जेनेटिक रिस्क ज्यादा होता है। हेल्दी ऑटिज्म परफेक्टली एडप्टिव है। इनफैक्ट उसे हाई फंक्शनिंग ऑटिज्म भी कहते हैं। ईलॉन मस्क, बिल गेट्स, मार्क ज़करबर्ग टाइप के लोग बस सिर्फ एनवायरमेंट उनके वायरिंग के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सेम विद एडीएचडी। इन्हें भी बस सही एनवायरमेंट चाहिए [संगीत] और हम इन सभी को न्यूरोटिपिकल्स की रेस में दौड़ा रहे हैं। आइंस्टाइन का वो कोर्ट याद है ना? इफ यू जज अ फिश बाय इट्स एबिलिटी टू क्लाइम
अ ट्री इट विल लिव इट्स एंटायर लाइफ थिंकिंग इट टू बी स्टूपिड। मगर एक इंपॉर्टेंट सवाल। क्यों प्रकृति ने सारे ही ट्रेड्स हमारे दिमाग में एक साथ नहीं भर दिए? क्यों हमें पॉलीमैटिक जीनियस क्यों नहीं बना दिया? न्यूरो डायवर्जेंस को आखिर क्यों एज अ डिजाइन इवॉल्व होना पड़ा? व्हाई स्पेशलाइजेशन? व्हाई नॉट जनरलाइजेशन? वेल, दो क्रिटिकल रीज़ंस। सबसे पहला एनर्जी कंजर्वेशन लॉ। दिमाग शरीर का सिर्फ 2% मास होने के बाद भी 20% एनर्जी यूज करता है। और इसीलिए दिमाग एक ही खूबी में मास्टर हासिल कर सकता था। सब में नहीं। एक हार्डवेयर लिमिटेशन। ट्रेड ऑफ्स बहुत
ही कॉमन प्रिंसिपल है एववोल्यूशन में। आपने सुना ही होगा यूज इट और लूज इट वाला लॉजिक क्योंकि एनर्जी लिमिटेड है। नंबर टू द एवोल्यूशन लॉ। सर्वाइव करने के लिए इंसान को वैरायटी चाहिए थी। एववोल्यूशन का दूसरा नाम ही वेरिएशन होता है। एक कबीला जिसमें हर कोई एक्सप्लोरर हो भटक कर मर जाएगा या फिर सिर्फ स्टेबलाइजर हो सर्दियों में जम जाएगा। सिर्फ सोशल हो परभक्षी खा जाएंगे। सिर्फ टेक्निकल हो तो एकजुट होकर काम नहीं कर पाएंगे। न्यूरो डायवर्जन से इंसानों में कोऑपरेशन पॉसिबल हो पाया। आज बिजनेस पार्टनरशिप्स में भी इसीलिए आप यही कोऑपरेशन वाला डिजाइन देखोगे
टेक्निकल और मार्केटिंग कोफाउंडर की पार्टनरशिप का जैसे स्टीव जॉब्स प्लस स्टीव वजनियाक बिल गेट्स प्लस स्टीव बॉलमर एटसेट्रा न्यूरो डायवर्जेंस एक कोऑपरेशन का डिजाइन है और इसीलिए ब्रेंस में अलग-अलग स्पेशलाइजेशंस विकसित होना जरूरी था। सो अब आता है यहां पर सबसे मेन सवाल आप कौन हो? यह बस एक सवाल आपका सबसे बड़ा एनलाइटनमेंट आपका साइको मोमेंट क्योंकि अगर आपने अपने दिमाग का बेस कोड नहीं समझा तो आप वो मछली बन जाओगे जो जिंदगी भर पेड़ चढ़ने की कोशिश कर रहा है नेचर के खिलाफ कुछ ही साल पहले मुझे पहली बार यह पता चला था कि
मेरी कॉग्निटिव वायरिंग एस्पर्जस सिंड्रोम से काफी मेल खाती है। सिस्टमाइजिंग कोशंट में 90 ऑटो 150 एवरेज 40 है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम टेस्ट में 32 जो कि बॉर्डर लाइन पर है। न्यूरोटिपिकल्स का 18 होता है और सडनली मुझे अपनी पूरी लाइफ समझ में आ गई। एक कॉमर्स स्टूडेंट साइंस के क्रेजी वीडियोस क्यों बना रहा है? साइंस को अपनी लाइफ में ऑब्सेसिवली क्यों यूज़ करता है? जिंदगी भर मैं चीजों की गहराइयों में घुसता रहा। लॉजिक मेरे लिए ऑक्सीजन था। साइंटिफिक सोच मेरा ऑपरेटिंग सिस्टम। मेरा नसीब था कि मैंने अपने वायरिंग के हिसाब से सही करियर चुन लिया और
इसीलिए मुझे डिसेंट लेवल का सक्सेस मिल पाया। मुझे यह समझने में सालों लग गए कि मैं गलत नहीं हूं। गलत जगह था। मेरे काम में एस्पर्गर्स आज डिसऑर्डर नहीं बल्कि एडवांटेज है क्योंकि मैं रियलिटी के उन डीप लेयर्स को आपके लिए इजीली डिकोड कर सकता हूं। मगर मैं स्कूल्स में मेमोराइजेशन बेस्ड एग्जाम्स में बुरा था। बट मेरे जो सोशल स्किल्स हैं, मेरी स्टोरी टेलिंग एबिलिटी, बोलने का तरीका, लोगों में इमोशंस क्रिएट करने का तरीका। ये सब मेरे में नेचुरली नहीं था। मैंने ये डेवप किया ओवर अ पीरियड ऑफ़ टाइम। साइको माइंडसेट की वजह से। बट
अब मुझे बताओ विटालिक ब्यूटेरिन जैसे पर्सनालिटीस कहां पर फॉल करते हैं? ऑब्वियसली हेवीली ऑन द टेक्निकल साइड। बंदे ने 19 साल की उम्र में सेकंड लार्जेस्ट क्रिप्टो नेटवर्क क्रिएट कर लिया यार। इतना इंटेंस टेक्निकल दिमाग कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ की वजह से सोशल स्पेक्ट्रम में कॉम्प्रोमाइज हो ही जाएगा। अंटिल एक स्पेशल तरीके से कंपनसेेट ना किया जाए। ईलॉन मस्क ने भी खुद एक्सेप्ट किया है कि उन्हें भी एस्पर्जस सिंड्रोम है। जिस कंडीशन में बंदा हैवीली टेक्निकल फोकस्ड होता है और सोशल स्किल्स कॉम्प्रोमाइज हो जाते हैं बचपन से। एक्चुअली मेकिंग हिस्ट्री नाई एस द फर्स्ट पर्सन विथ
एस्बर्गर टू होस्ट। बिल गेट्स की भी डॉटर ने ये कंफर्म किया कि उन्हें भी एस्पर्श है। और इसीलिए घंटों तक नहीं बल्कि दिनों तक टेक्निकल काम कर सकते हैं। सोशली अच्छा रामानुजन को भी मैथ्स के पैटर्न्स दुनिया में इंट्यूटिवली दिखते थे। मगर लाइफ में वह अकेले थे। अकेलेपन की बात करें तो न्यूटन और टेस्ला ना आए। यह दोनों भी पैटर्न ऑब्सेस्ड थे। मगर दूसरी तरफ शाहरुख खान का यह क्लिप देखना। पीपल लाइक यू शुड नॉट आइडेंटिफाई विथ एंड एडवरटाइज चिल्ड्रन सी यू एंड स्टार्ट ड्रिंकिंग इट देमसेल्व्स। आई वुड आई वुड अपील टू एनी अथॉरिटी लाइक
दैट बैन इट। यू आर नॉट स्टॉपिंग इट बिकॉज़ इट गिव्स यू अ रेवेन्यू। डोंट स्टॉप माय रेवेन्यू। जो बोला क्या बोला? दिल जीत लिया। मगर क्या वाकई में लॉजिकल था? फैक्ट यह है कि आपको स्टार जनता ने बनाया है। गवर्नमेंट ने नहीं। तंबाकू के ऐड से कैंसर भी जनता को ही होगा जिन्होंने आपको स्टार बनाया। क्या एक रिस्पांसिबल एक्टर चाहेगा लाखों को कैंसर हो? यू सी गवर्नमेंट का लॉजिक इररेलेवेंट था। बट जिस तरीके से शाहरुख खान ने रिप्लाई दिया इतना कैरिस्मैटिक था कि मोस्ट ऑफ लोग कॉन्फिडेंस को सच्चाई के लिए कंफ्यूज कर जाएंगे। एवोल्यूशन ने
हमें ऐसा ही बनाया कि हम कॉन्फिडेंस को सच्चाई से ज्यादा तवज्जो देते हैं। बेस्ट एग्जांपल है पॉलिटिशियंस। सारे पॉलिटिशियंस सोशली इंटेलिजेंट होते हैं। तभी तो जनता को गोल-गोल घुमाकर चुनकर आ जाते हैं। पैराडॉक्स यह है कि सोशली इंटेलिजेंट लोग अपनी कैपेसिटी से कई ज्यादा इंटेलिजेंट लग सकते हैं और टेक्निकल पैटर्न हंटर्स अपने कैपेसिटी से कई ज्यादा बेवकूफ लग सकते हैं। ऐसा उल्टा है कुछ माजरा। अब दूसरे स्पेक्ट्रम की अगर बात करें तो वो है एक्सप्लोरर्स वर्सेस स्टेबलाइजर ब्रेन। एक्सप्लोरर ब्रेन के एक्सट्रीम पर है नील आर्मस्ट्रांग, अर्न, शकल्टन, कोलंबस, डार्विन जैसे लोग जो डिस्कवरी के किक
के लिए अपनी जान जोखिम में भी डाल सकते थे। रिस्क लेना इनके लिए कॉमन सेंस है क्योंकि इनका दिमाग सेफ सुनते ही बोर हो जाता है। एडीएचडी इसी स्पेक्ट्रम के एक्सट्रीम में आता है। सारे एडवेंचर स्पोर्ट्स एथलीट्स भी यहीं पर आते हैं और हैवी रिस्क टेकिंग एंटरप्रेन्यर्स भी। और इसके ऑोजिट स्पेक्ट्रम में आ जाते हैं सारे सरकारी कर्मचारी जिनके लिए स्टेबिलिटी सबसे पहले यह स्टेबल ऑपरेटर्स, डिसिप्लिंड एथलीट्स और कंसिस्टेंट रूटीनाइजर्स की जगह है। एक्सप्लोरर्स दुनिया बदलते हैं तो स्टेबलाइज़र्स दुनिया चलाते हैं। सो अब सवाल यहां पर आता है कि आप कौन हो? टेक्निकल ब्रेन या
सोशल ब्रेन? एक्सप्लोरर या स्टेबलाइजर या एक रेयर हाइब्रिड जो इतिहास बना सकता है। कुछ ही पलों में मैं आपको एक टूल दूंगा जो आपकी बेस वायरिंग को डिकोड करेगा। बस दो सिंपल स्टेप्स और एक बड़ी अवेकनिंग। लेकिन उससे पहले एक वार्निंग दे दूं। अगर आपको लगता है कि आपकी बुद्धि, आपका इंटेलिजेंस आपको लाइफ में आगे बढ़ाता है तो आप बिल्कुल गलत हो। डेंजरसली गलत। बचपन से यह नैरेटिव हमारे दिमाग में डाला गया कि इंटेलिजेंस यानी कामयाबी। इंटेलिजेंस यानी पैसा, फेम और हैप्पीनेस। पर साइको नजरिया एक अलग ही सच्चाई बताता है। आपके इंटेलिजेंस के ऊपर अपस्ट्रीम
लेवल पर है कंट्रोल बटन जो यह डिसाइड करता है कि आप अपनी बुद्धि के वजह से दुनिया जीतोगे या फिर बर्बाद करोगे। आपको लगता है आप अपने थॉट्स और एक्शंस को डिसाइड करते हो। पर डिसाइड कोई और कर रहा होता है। और यह इनविज़िबल कंट्रोल बटन अच्छे-अच्छों का ब्लाइंड स्पॉट है। और इसीलिए तो स्टीव जॉब्स की एक गलती कैंसर ने उन्हें जकड़ लिया। नासा चीफ की एक गलती वो राख हो गई। इंटेलिजेंस बस सिर्फ एक मैग्नीिफायर है। असली कंट्रोलर कोई और है। [संगीत] इस सीरीज के अगले वीडियो में मैं आपके साथ एक ऐसा कांसेप्ट शेयर
करूंगा जो एक्सट्रीमली कम लोग जानते हैं। पर ये अकेला कांसेप्ट आपकी पूरी जिंदगी बदल सकता है। चाहे आपका गोल हो सक्सेस, हैप्पीनेस, पैसा, फेम या पीस सब कुछ बस इस एक बटन पर डिपेंड करता है। सो चैनल का नोटिफिकेशन बेल ऑन कर लो और साइको अवेकनिंग का इंतजार करो। और अब फाइनली आपके ब्रेन का कॉग्निटिव टाइप डिकोड करते हैं। स्टेप नंबर वन मैंने एक बेसिक स्क्रीनिंग टूल बनाया है साइंटिफिक ग्रेड क्वेश्चंस का। आपके थिंकिंग स्टाइल एलाइनमेंट को समझने के लिए। पहले सुन लेना फिर ही टेस्ट देना। इस टेस्ट के सारे क्वेश्चंस को आंसर करो और
एक फीडबैक आपको मिलेगा। दो चीजें याद रखना। नंबर वन क्वेश्चन ऑनेस्टली आंसर करना। नंबर टू, आप नेचुरली जैसे हो अनफिल्टर्ड वही ऑप्शन सेलेक्ट करना। ना कि जो बिहेवियर क्वालिटीज आप अपने आप पर फोर्स करते हो या आइडियलाइज करते हो। अब एक बेसिक स्क्रीनिंग का रिजल्ट आपको मिल जाएगा। आइडियली यह टेस्ट तीन बार दो अलग-अलग समय पर ताकि बायसेस कम हो सके। फिर उसके बाद टेस्ट नंबर टू जो डिपेंड करेगा टेस्ट वन के रिजल्ट्स पर। अगर आपके रिजल्ट में हाई न्यूरो डायवर्जेंस है जैसे एडीएचडी, ऑटिज्म, डिस्लेक्सिया एटसेट्रा। सो आपके लिए टेस्ट टू एक प्रॉपर साइंटिफिक ग्रेड
टेस्ट होगा। [संगीत] वेल एस्टैब्लिश साइकोलॉजिकल मॉडल से। स्क्रीन पर टेबल देखना। आपका टेस्ट वन में जो भी रिजल्ट आया होगा उसे और ज्यादा एक्यूरेटली स्क्रीन करने के लिए, नक्की करने के लिए मैंने सूटेबल टेस्ट लिख दिए हैं। इन सारे टेस्ट का लिंक डिस्क्रिप्शन में आपको मिल जाएगा। इन दोनों भी टेस्ट से मेरा अंदाजा है कि आप 60 से 70% तक अपना थिंकिंग स्टाइल प्रेडिक्ट कर सकते हो। बट अगर आपको हाई न्यूरो डायवर्जेंस आता है दोनों टेस्ट में और आपको 100% कंफर्म करना है कि आपको क्या कंडीशन है तो आप फिजिकली एक प्रॉपर क्लीनिकल असेसमेंट भी
करवा सकते हो। सो इन दो सिंपल स्टेप्स में आप अपने इंटेलिजेंस टाइप को समझ जाओगे और अपने लाइफ के डिसीजंस को 10x बेहतर ले पाओगे। क्योंकि याद रहे इंटेलिजेंस ऑब्जेक्टिव नहीं एनवायरमेंटल होती है। एग्जाम पेपर्स और आईक्यू टेस्ट आपके इंटेलिजेंस के जज नहीं प्रकृति है। रियलिटी है। मगर आपका इंटेलिजेंस जिस एक कंट्रोल बटन का गुलाम है। उस रेवोलेशन के लिए स्टे ट्यून फॉर द नेक्स्ट वीडियो।