महाभारत के भीषण युद्ध के पश्चात पांडवों के हृदय में गहरी पीड़ा और अपराध बोध ने घर कर लिया था अपने मन की अशांति से मुक्ति की तलाश में उन्होंने श्री कृष्ण से तीर्थ यात्रा पर जाने की अनुमति मांगी कृष्ण ने बिना साथ आए उन्हें आदेश दिया मेरा तुंबा लेकर चलो और जहां-जहां स्नान करोगे उसे भी पवित्र जल से स्नान करवाना पांडवों ने विभिन्न तीर्थों की यात्रा की पवित्र नदियों में स्नान करने से उनके शरीर पर शुद्धता आई पर मन के अंदर छुपे दुलक और पाप का बोज दूर ना हो सका जब वे वापस लौटे तो
कृष्ण ने तुंबे को पीसकर उसका चूर्ण बना दिया और प्रसाद स्वरूप प्रदान किया पांडवों ने चूर्ण चखा पर उसका स्वाद कड़वा था श्री कृष्ण ने गंभीर स्वर में समझाया बाहरी स्नान से केवल शरीर निर्मल होता है परंतु आत्मा की शुद्धि तभी संभव है जब मन भी भीतर से शुद्ध हो असली तीर्थ यात्रा आत्मचिंतन और आंतरिक परिवर्तन की है इस संदेश ने पांडवों के हृदय को छू लिया और वे सच्ची आंतरिक शांति की ओर अग्रसर हो गए शेयर योर थॉट्स इन द कमेंट बॉक्स