एक है प्रक्रिया ग्रंथ और दूसरे हैं सिद्धांत ग्रंथ जैसे केजी से फिर एक कड़िया बगड़ा तिगड़ा ऐसे करते करते आदमी चले विचार चंद्रोदय विचार सागर पंचक पंचदशी यह सब प्रक्रिया ग्रंथ है छोटा छोटा समझा फिर बड़ी बात फिर उससे बड़ी फिर उससे बड़ी फिर उससे बड़ी उनको प्रक्रिया ग्रंथ कहा जाता है दूसरे होते हैं सिद्धांत ग्रंथ सिद्धांत जो लक्ष्य है उसको समझाने के लिए ऐतिहासिक कथाएं कहेंगे पुराणिक कथाएं कहेंगे लेकिन फिर कह के बोले चित्त के फने से प्रतीत होता है चित्त का शांत होने से कुछ बना नहीं हे राम जी जगत तीनों काल में
बना नहीं अध्या रूप अपवाद ब्याम निश प्रपंच में प्रपंच की कल्पना करें क्योंकि हम लोग कल्पना में जीते हैं कहानियों में जीते हैं हमारा जीवन भी तो कहानी है तो हमारा जीवन कहानी तो हमको कहानियों में रस आता है तोय कहानियां घटनाए तो हमारा जीवन भी घटनाओ और कहानियों में जीता तो फिर वो तत्ता महापुरुष उस प्रकार की बातें उस प्रकार की कहानियां कथाएं सुनाकर फिर बोलेंगे कि यह सब स्वपना मात्र है सब बीत गया राजा वण के शरीर से डंग से राज पुत्र की प्राप्ति हुई उसने राज्य किया राजा रहु गण ने राज्य किया
अमरीश ने राज्य किया फलाना किया लेकिन हे राम जी बना कुछ नहीं सब स्वपन हो गया श्री कृष्ण आए और अर्जुन को विषाद योग हुआ और श्री कृष्ण ऐसा कहेंगे ऐसा कहेंगे और अर्जुन फिर ऐसा पूछेगा यह पूरा भविष्यवाणी वशिष्ठ ने बता दी फिर कहा के राम जी बना कुछ नहीं वही आत्मा कृष्ण होकर मुस्कुरा रहा है वही आत्मा मलिन सममित है श्रोता बनी हुई है शुद्ध सममित है वक्ता बनी हुई है यह सब संवित का विलास मात्र है बाकी एक ही परम सत्य अद्वैत परब्रह्म परमात्मा है पूरी वार्ता कहेंगे कर्कट राक्षसी ने तप किया
हिमालय गई ब्रह्मा जी ने वरदान दिया फिर दूसरों के हृदय में घुस जाती थी खून पीती थी और जो ओम का जप करता था उसका वह पिंड छोड़ देती थी इस प्रकार लोगों के हृदय का रक्त पान करती करती करकटी राक्षसी आखर परेशा हो गई फिर उसने जाकर हिमालय में समाधि की व करकटी राक्षसी सूक्ष्म शरीर से किसी गीद में घुस गई उसके स्वास के द्वारा नासा पुट से और गीद को प्रेरित करके हिमालय ले गई और उसको फिर वहां अंदर खड़ बराट करके उल्टी करा दी उस और उल्टी में बाहर निकली गद तो चला
गया गीद पक्षी ग फिर उसने वहा समाधि की ध्यान किया ध्यान करते करते उसको शुद्ध संवित में विश्रांति मिली ब्रह्मा जी आए वरदान देने को अब उसकी कोई रुचि नहीं रही ब्रह्मा जी ने कहा कि बेटी तू बैठी थी जिस हेतु से वह इच्छा तेरी पूरी होगी बोले अब पितामह मेरे को कोई इच्छा नहीं है ब्रह्मा जी ने कहा जब तक शरीर है ज्ञानी का अज्ञानी का तो शरीर का आहार व्यवहार उसको चाहिए तो राक्षसी तेरा भोजन मनुष्य है तेरा भोजन मांस है पहले आसक्त होकर खाती थी वासना तृप्त करने को खाती थी खाने के
लिए जीती थी अब जीने के लिए तू भक्षण कर लेना अज्ञानी मुडो का भोजन करना ताकि वो अज्ञानी मुड जो है पृथ्वी पर बोजा है पाप पापा आचारी हैं उनका भोजन करने से वो भी पाप कर्म से छूट जाएंगे तेरा शरीर की भी रक्षा होगी उनकी भी थोड़ी बहुत सद्गति होगी इस प्रकार वरदान पाकर व कर्कट राक्षसी जंगलों में विचर लगी और वह सोचती थी कि ऐसे कोई भोजन करो जो अज्ञानी हो मो हो कभी ज्ञानी के ऊपर मेरा अन्याय ना हो जाए अमुक राजा राज रात को जंगल में गया और कर्कट राक्षसी ने अपना
विकराल रूप प्रकट किया भयंकर मानो एक विशाल काली सी बादली है काली लूट काली काली मैश जवी बत सेन मू हाथ लांबा लाबा नक लांबा लाबा डोया मोटा मोटा राजा ने बरावा लाग राजा को डराने लगे तब राजा ने कहा कि अरे जो तेरा इष्ट हो जो तुझे जरूर है वह बात कर ऐसा विविध स्वरूप बनाकर तोत क्या डराती है तेरे जैसी मक्खियों को तो कईयों को मैंने उड़ा दिया निदान इतनी विराट विविध स्वरूप धारण की हुई कर्कट राक्षसी को राजा ने जब ललकारा तो रा राक्षसी कहने लगी कि तुम मेरे भोजन हो मैं तुम्हारा
भक्षण करूंगी तू न्याय से हमारा भक्षण करेगी तो ठीक है अन्याय से हमारे पर हावी होगी तो तेरे सिर के हजार टुकड़े हो जाएंगे तेरे को चाहिए क्या बोले मेरे को चाहिए कि तुम अगर ज्ञानी हो मैं तुम्हारे से प्रश्न पूछती हूं अगर मेरे प्रश्नों का तुमने ठीक उत्तर दिया तो मैं तुम्हारे से मित्रता करूंगी तुम्हारी सेवा करूंगी और मेरे प्रश्नों का तुमने ठीक से उत्तर नहीं दिया तो मैं तुम्हारे को अज्ञानी समझकर भक्षण कर जाऊंगी जो अज्ञानी मूठ होते हैं उनको ही भूत प्रेत राक्षसों का प्रभाव पड़ता है और भूत प्रेत भी उन्हीं लोगों
को नचते हैं डाकिनी सा किनी उन्हीं लोगों को नोच सकती है ज्ञानवान को भी नहीं नचती और ज्ञानी गुरु का जिसने गुरु मंत्र उनके ऊपर भी भूत प्रेत का प्रभाव नहीं होता तो तुम अगर ज्ञानवान हो तो मैं तुम्हारे ऊपर कोई अपना जोर नहीं लगा सकते और अज्ञानी होंगे तो मैं तुमको खा जाऊंगी भरा धरा करके भस्म करू मेरे प्रश्न का उत्तर दो ऐसा कौन सा चि अणु है जो सब में समाया है और दिखता नहीं ऐसा कौन सा शु संवित है जिससे सारा जगत दिखता है लेकिन जहां से उठता है उसको नहीं देखता ऐसा
कौन सा त्रिश है कि जिस त्रिश से अनंत अनंत ब्रह्मांड पुरे हैं ऐसा कौन सा तत्व है जिसको जानने के लिए बड़े बड़े बुद्धिमान कोशिश करते हैं और हार जाते और जो पाते हैं वह समझते हमने पाया नहीं पहले से था ऐसा कौन सा वो चित वपु है कि जिसको पाए बिना जीवन में सब कुछ पाया तो व्यर्थ और जिसको पाने से कुछ भी ना पाया फिर भी व शहनशा दुनिया में हर इज्जत वाले से भी ऊंची इज्जत वह व्यक्ति पाता है जो उस तत्व को जानता है ऐसा कौन सा तत्व है जिसको न जानने
के कारण व्यक्ति की सारी बुद्धिमत्ता सारा अकल सारी होशियारी तुच्छ हो जाती और जिसको जानने के बाद बड़े बड़े होश अकलमंद बुद्धिमान से भी वह लोग वह व्यक्ति पूजनीय हो जाता है और उसे पूजने की कभी इच्छा ही नहीं होती ऐसा कौन सा तत्व जिसको पाने से कुछ पाने की इच्छा नहीं होती और कुछ खोने का भय नहीं होता जीने की इच्छा नहीं होती और मरने का भय नहीं होता आप तो अपना तो कल्याण कर लेता है अपना तो उद्धार हो जाता है लेकिन उस संपर्क में आने वाले व्यक्तियों का भी उद्धार हो जाता है
ऐसा कौन सा तत्व जिसको पाने से सब पाया जाता है इस प्रकार अपने ढंग के उसने प्रश्न पूछे तब राजा ने कहा कि अरे करकटी राक्षसी तूने एक ही उस परब्रह्म परमात्मा के विषय में अलग-अलग पॉइंट से अलग-अलग व्यू से प्रश्न पूछे वही चि अणु है जिसके फर्ने से सारा जगत भास है वही चैतन्य वपु है जिसको जानने से सब जाना जाता जिसको पाए से सब पाया जाता है तो करकटी ने प्रश्न किए और उन सब प्रश्नों का उत्तर राजा ने दिया ककती की मित्रता हो गई राजा उनको ले गया अपने राज्य में और जो
फांसी देने योग्य थे अपराधी थे उन मनुष्य को अर्पण कर दिया ककती जैसे बाज चिड़िया को ले जाता है ऐसे ही राक्षसी अपना शिकार लेकर जंगल में चले गए उनको भक्षण किया तक उसको फिर कुछ जरूरत ना पड़े इतना भोजन कर लिया फिर राजा के साथ ज्ञान की चर्चा करती ऐसे आती अपना आहार ले लेती ज्ञान चर्चा करती और समय बिताती हे राम जी एक बार ऐसा हुआ कि व करकट गई तो आई नहीं राजा ने देखा बहुत दिन हो गए आई नहीं सोचा कि करकट हिमालय में चली गई और पद्मासन बांधकर समाधि होकर देह
छोड़ दिया थी वो राक्षसी तो थी करकट करकट करक शब्द करके डराती थी हुंकार करके लोगों को डराती थी और डरा के बाद में शिकार करके खाती थी खाती थी फिर भी उनका मंगल करती थी अब वह चले गए तो राज्य के लोगों का कल्याण हो इसलिए उसकी स्मृति वे करते रहे इस हेतु से राजा ने दो मंदिर बनवाए हुकार करके लोगों का मनोबल हर लेती थी बाद में शिकार करती थी और शिकार करने के लिए पहले मनोबल हरना पड़ता है शेर जब शिकार करता है तो धारता है बंदर तो होते हैं पेड़ के ऊपर
डाली शेर की गुंजाइश नहीं जाने के व नीचे बैठ बैठे खड़े होकर धारता है तो एक धड़ाके में तो वोह लोग लेट्रिन बाथरूम कर देते हैं फिर धारता है तो उसमें जो कमजोर है वो डर के मारे उसकी नाड़ना शक्ति छोड़ देती है अपना अपना कार्य छोड़ देती है धड़क आप जब देखेंगे मंदिर को या किसी प्राणी को या गधे को या अमुक व्यक्ति को तो जो डर गया ना तो नाड़ना अपना काम छोड़ देती है उसको लेटन बाथरूम हो जाता है रोकने का जो काम है नाड़ियों का वो छोड़ देती है कभी कोई आदमी
जाता है हाथ में कुछ है और आपने जोर से आवाज दी छूट जाता है नाड़ना छोड़ देती डर में तो पहले भय तो हुकार करके वह राक्षसी भय भीत कर देती थी भयभीत करने के बाद भी उनका मंगल करती थी क्योंकि उसके तन में उनका मांस होता तो राक्षसी तो आत्मशांति थी तो उनका स सद्गति हो जाती इसलिए राजा ने उसके दो मंदिर बनवाए मंदिर के दो नाम रखे हिंगला देवी और मंगला देवी भूतपूर्व जो करकटी राक्षसी थी अभी हिंगला देवी और मंगला देवी के नाम से पूजी जाती है आपने हमने य नाम सुने माता
जी के इतना तो कह दिया फिर कहा कि राम जी सब स्वप्ने जैसे संसार में है तत्व से कुछ बना नहीं तीनों काल में लो आखी रामायण क दीी हिंगला नहीं मंगलानी करकट नहीं न सिद्धांत की बात समझाए जा रहे हैं कि कुछ बना नहीं ये तो व्यवहार में जब चित्त का फरना फरता है जगत सत्य भास है तब यह तुमको सच्चा ल है चित्त का फरना तुम्हारा शांत हो जाए रात्रि को तुम सो जाते हो तो कहां हिंगला कहां करकटी कहां मंगला कहां तुम और कहां हम चित्त की वृत्ति कंठ में आती है तब
स्वपना चित्त की वृत्ति हृदय में विश्रांति करती है तब नींद चित्त की वृत्ति नेत्रों में जब आती है तो जागृत ये है सवित का फर्ना मात्र ये फर्ना मात्र जगत है वैसा वास्तव जगत बना नहीं चित्त में फना आया सत्संग हल बने इतना लंबा चौड़ा सत्संग चित्त तो छोटा दिखता है अब य सत्संग हल बड़ा दिखता उसमें य शरीर छोटा और शरीर से भी छोटा अपने हृदय और हृदय में एक भाग में नाड़ी और नाड़ी में संकल्प उठा के सत्संग हल बने पुना तो छोटा था तो निराकार तत्व जो है ना वह आकृति में छोटा
है लेकिन सूक्ष्मता में सारे ब्रह्मांड में फैला है उसको जो जान लेता है वो कृष्ण को जान लेता है उस तत्व को जो मैं रूप में स्वीकार कर लेता है उसके लिए सारा ब्रह्मांड अपना स्वरूप हो जाता है ऐसा एक अद्भुत आत्मानंद में रमण करने वाला कोई ब्रह्म वेता था ब्रह्म ज्ञानी किसी सेठ को हुआ कि चलो ब्रह्मज्ञानी की सेवा सौभाग्यशाली को मिलती है नौकर को आदेश कर दिया किय बाबा जी को रोज शाम को दूध पिला के आया करो दिन को भोजन करते रात को नहीं करते तो दूध पीते होंगे दूध पिला के आया
करो निदान नौकर को काम सौंप दिया अब वो सेठ भी कोई होगा प्लास्टिक का बना हुआ ब्रह्म ज्ञानी की सेवा नौकरों से कराई नौकर क्या था नौकर भी कोई आधुनिक रहा होगा व क्या करता था कि दूध के पैसे तो जेब में डाल देता था छास मुफत में मिल जाती थी कहीं नमक मिर्ची मिलाकर छास का प्याला भर के बाबा जी को पिला के आता जय जय सेत घूमते घूमते एक बार दर्शन करने गए और गुरु जी को बोला महाराज जी को कि स्वामी जी हमारा नौकर आपको शाम को दूध पिला जाता है बाबा ने
सब स्वीकारा बोले हां पिला जाता है उसने पूछा दूध पिला जाता है स्वामी जी सेठ ने पूछा हमारा नौकर आपको दूध पिला जाता है बोले पिला जाता है सेठ ने पिला जाता है सुना क्या पिला जाता है कहीं विश्लेषण नहीं किया समय पाकर नौकर को कोड़ हुआ बीमारी हुई घर में कोई मांधा पड़ा समाज में बेज्जती होने लगी ब्रह्म वेता को तो कोई फरियाद नहीं लेकिन प्रकृति के से सहन नहीं हुआ तब किसी ने पूछा कि तेरे को चारों तरफ से मुसीबतों ने घेर लिया बात क्या है सच बता और तो कुछ नहीं मैंने किया
कोई चोरी पाप तो नहीं किया न दूध के पैसे जेब में धरता था और बाबा जी को भीख मांग के छाछ पिला देता था तो जो प्रणव के वास्तविक स्वरूप को जानता है उसके लिए सब विकार है कोई आदर करो तो क्या कोई अनादर करो तो क्या कोई अपमान करो तो क्या कोई धोखा करो तो क्या अब बाबा जी के हृदय में पता चला होगा कि नहीं चला होगा कि दूध के बदले छाछ पिलाता है पता तो चला होगा हो सकता है लेकिन उसको महत्व नहीं दिया और हो सकता है पता ना भी चला हो
अगर पता चलाने का संकल्प करके एक क्षण के लिए शांत हो गए तो पता चल जाता है और पता चलाने का विचार ही नहीं किया तो पता नहीं भी चलता इसलिए ज्ञानी अंतर इन तु चीजों में नहीं हुआ करता अंतर में जो चैतन्य है उस चैतन्य स्वरूप आत्मा को म रूप से जो जान लेता है व फिर बाहर की तुच्छ तुच्छ चीजों को सबको जाने यह कोई जरूरी नहीं हे राम जी जगत सारा चित्त का विलास मात्र है और इस चित्त के विलास को चित्त का विलास समझकर जो पृथक हो जाता है वह भी वेदांत
के अनुकूल तत्व ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है जिज्ञासु के लिए दृष्टा और दृश्य ये दृष्टा और मैं मैं दृष्टा और ये दृश्य ऐसी भावना करके दृश्य में से राग हट जाता है दृष्टा स्वरूप में स्थिर हो जाता है दृष्टा स्वरूप में स्थिर हो जाने के बाद फिर उसके लिए दृश्य और दृष्टा दो नहीं बचता उसका तन मन उसका जीवन उनके लिए अणु अणु में परब्रह्म परमात्मा जड़ और चेतन जहां चैतन्य की घनीभूत अवस्था उसको जड़ बोलते हैं और जहां सूक्ष्म अवस्था उसको चेतन बोलते हैं तो ज्ञानी का शरीर फिर चिन्मय रूप में माना जाता
है ज्ञानी के चरण को छूकर जो रज आती है वो भी कल्याणकारी हो जाती है पवित्र हो जाती है ऐसा वो आत्मदेव है तो उस आत्मदेव को समझने के लिए प्रक्रिया ग्रंथ होते हैं और सिद्धांत ग्रंथ होते हैं किसी को सिद्धांत ग्रंथ से अनुकूल होता है किसी को प्रक्रिया ग्रंथ से अनुकूल होता है लेकिन ये प्रक्रिया ग्रंथ या सिद्धांत ग्रंथ की पद्धति से उस परमात्मा का ज्ञान मिल जाए तो उन्हीं लोगों को जल्दी ज्ञान हो जाता है जिनका अंतःकरण मलिन नहीं है जिनका अंतःकरण शुद्ध है जिनका मन पवित्र है उनको तो जल्दी ज्ञान हो जाता
है और जिनका अंतःकरण पवित्र नहीं है वे बार-बार सुनते हैं तो अंतःकरण पवित्र हो जाता है और मैं पवित्र आत्मा हूं ऐसा बार-बार विचार करते हैं मैं साक्षी हूं मैं चैतन्य हूं शुद्ध हूं बुद्ध हूं आत्मा हूं सर्व हूं सब में हूं सब हूं सर्व हूं सब में हूं सर्वो अह शांतो अह शुद्ध हम बुद्ध हम आनंद स्वरूपो हम प्रेम स्वरूपो अह मैं प्रेम स्वरूप हूं आनंद स्वरूप हूं शांत स्वरूप हूं मैं आत्मा हूं चैतन्य हूं इस प्रकार का जो चिंतन करते तुरंत पवित्र होने लगते और परमानंद उनके रुए रुए से फूट निकलता है तो
मैं चाहता हूं ऐसा थोड़ी देर के लिए खुली आंख रखें आदि बंद रखें आदि खुली रखें स्वाभाविक बैठे रहे तुम कुछ करो मत केवल इतना पवित्र सोचो कि जैसा आत्म ज्ञान पाने की पॉइंट पर आने वाले साधक सोचते हैं ऐसा सोचो मैं शांत हूं जगत बना नहीं सब स्वपना मात्र है सब कल्पना मात्र है सब मन का विलास है यह मन का फरना है दुख भी मन का फरना सुख भी मन का फर्ना इस प्रकार के जो जो तुमने वेदांत के पवित्र वचन सुने हैं उन वचनों को दोहराते दोहराते खुली आंख आप ज्ञान समाधि को
उपलब्ध हो सकते हैं ज्ञान की समाधि लगे तब लगे अभी हृदय शुद्ध हो सकता है पवित्र हो सकता है हजारों यज्ञ करने से जो चीज नहीं मिले व ऐसे पवित्र आत्म चिंतन करने मात्र से तुम्हारे हृदय में वह शांति मिलने लगेगी वह आनंद फने लगेगा मैं सब में हूं मैं सब में हूं जहां से शब्द उठते हैं मैं वही हूं जहां से मन उठता है मैं वही हूं जहां से बुद्धि के निर्णय उठते हैं मैं वही हूं जहां से ऋषियों को खबरें मिलती है मैं वही हूं जहां से श्री रामचंद्र जी चेष्टा करते हैं मैं
वही हूं जहां से रावण चेष्टा करता है मैं वही हूं जहां से कृष्ण श्री कृष्ण चेष्टा करते हैं मैं वही हूं जहां से श्री कृष्ण और कंस दोनों चलते हैं मैं वही आत्मा प्रणव अनाहत शब्द वाह वाह मेरा ही नाम आत्मा है मेरे को ही ब्रह्म बोलते हैं मैं ही चैतन्य आत्मा हूं इस प्रकार की पवित्र भावना करते करते देह नहीं है हम तो देह की भावना करने से देह का अध्यास आ गया आत्मा तो हम है ही है [संगीत] हृदय को खूब प्रेम से धन्यवाद से ब्रह्म भाव [संगीत] से भर जाने दो [संगीत] अपने
इष्ट को स्नेह करो आपकी जिसमें श्रद्धा भक्ति प्रीति हो उस उस देव को उस उस परमात्मा को भगवान को स्नेह करते करते तुम्हारा अहम बह जाए और ब्रह्म भाव रह जाए [प्रशंसा] रसो अहम अपस कते प्रभास में शशि सूर्य हो प्रणव सर्व वेदेश शब्द खय पुरुषम दशु हे अर्जुन मैं जल में रस हूं चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूं संपूर्ण वेदों में ओमकार हूं आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व यह विश्व सब है आत्मा ही इस भाति से जो जानता यश वेद उसका गा रहे है प्रारब्ध वश वह वर्त ऐसे विवेकी संत को न
निषेध है न विधान है सुख दुख दोनों एक से सब हानि लाभ समान है खूब समान सत्ता में अंत स्थल सत्ता में उस असीम आत्म सत्ता में हमारा मन शांत हुआ चला जाए हे मेरे मन तू बाहर कहां जाएगा कब तक भटके इस फर्ने [संगीत] के अनुसार तो तू कई सदियां बिता बिता कर फर्ने में फुर फराते जन्मता रहा मरता रहा अब तू अजन्मा आत्मा में विश्रांति कर मेरे मन जैसे राजा जनक आत्म शांति को उपलब्ध हुए जैसे तितल ऋषि के चरणों [संगीत] में भारत का विख्यात सम्राट भगीरथ आत्म शांति को उपलब्ध हुआ जैसे उदाल
[संगीत] ऋषि आत्म शांति में आरामीणता [संगीत] कर बाहर तेरे कोई शत्रु और मित्र सदा नहीं रहेंगे बाहर का शरीर तेरा सदा ना रहेगा बाहर का देह तेरा ना रहेगा लेकिन तेरा अंतर्यामी परमात्मा देह में रहते हुए भी विदेही देह से परे उस परमात्मा की भावना कर हे मेरे मन जैसे कीड़ा बमरी का चिंतन करते करते भमरी हो जाता है ऐसे ही है मेरे मन तू ब्रह्म का चिंतन करते करते तू ब्रह्म रूप हो [संगीत] जा जनक झरोखे में बैठकर अपने मन को समझाते हैं भगीरथ राजा तल ऋषि के चरणों में में गए तल ऋषि कहते
हैं कि हे राजन राज्य पाठ का त्याग करके शत्रुओं के घर की भिक्षा मांगकर फिर मेरे आश्रम में [प्रशंसा] आ मैं श्रेष्ठ हूं ऐसी तेरी कल्पना चली जाएगी राज्य का त्याग करने से शत्रुओं के घर भिक्षा मांगने से तेरा अहम गल [संगीत] जाएगा वे बड़भागी हैं जो परमात्मा के लिए राज्य को और अपने अहम को दाव पर लगा देते हैं वे सौभाग्यशाली हैं जो राज्य को और अहंकार को ईश्वर प्राप्ति के लिए दाव पर लगा देते हैं भगीरथ राजा ऐसा सौभाग्यशाली था राज्य पाठ छोड़कर शत्रुओं के घर भिक्षा मांगता मांगता गुरु के द्वार पर पहुंचा
है तल ऋषि कहते हैं कि राजन तेरा चित्त मान रहा था मैं राजा हूं राज्य मेरा है लेकिन हे राजन तेरे जन्म के पहले यह राज्य यहीं पड़ा था मरने के बाद भी रह जाएगा राज्य पुण्य से मिलता है और पुण्य अंतःकरण करता है सुख अंतःकरण को होता है राज्य पापों से छीना जाता है पाप अंतःकरण करता है दुख अंतःकरण को होता है इस और सुख और दुख दोनों को तू देखने वाला तू इन दोनों का स्वामी है राजन तू अपने स्वामी पद में जाग कब तक चित्त के संवेदन में अपने जीवन और मृत्यु के
गोते खाते खाते युग बिताए हे राजन तू अपनी आत्मा की ओर आजा तल ऋषि कहने लगे हे भगीरथ मनुष्य स्व है जो छोटी चीज को बड़ी में मिला दे जो अल्प जीवन को महान में बदल दे यही मनुष्य के पुरुषार्थ का लक्ष्य जिसने अपनी सेवा नहीं की जिसने आत्म सेवा कि वो दूसरों की सेवा करने पर अहंकारी हो जाएगा जो दूसरों की सेवा करता है आत्म सेवा के लिए ही आत्म भाव से वह आत्म विश्रांति पाकर अपने आप में जग जाता है हे राजन मोह निशा में सब लोग सो रहे हैं तू कब तक सोता
रहेगा वशिष्ठ जी कहते हैं राम जी इस प्रकार तल मुनि के उपदेश को प्राप्त करके भगीरथ राजा ज्ञात ग हुआ अज्ञानी की दृष्टि से आदमी अज्ञान मय सोचकर संसार में आवागमन में भटकता है ज्ञानी के अनुभव को भगवान के अनु को सुनकर सोचकर आदमी भगवान के अनुभव के अनुसार मुक्तता का अनुभव करता है भगवान को जैसा जगत दिखता है वह सच्चा होता है जीव को जैसा जगत दिखता है वह उसकी कल्पना होती है भगवान को जो दिखता है वह सही है संत को जो दिखता है वह सही है हमको जो दिखता है वह कल्पना मात्र
है त के उपदेश से भगीरथ ने अपनी कल्पना छोड़ी गुरु और भगवान के दृष्टि में अपनी दृष्टि मिला दी गुरु और भगवान को जैसा जगत दिखता है ऐसा ही वे जगत को निहार के अपने जगदीश्वर स्वभाव में जगने लगे भगीरथ ने बाद में ध्यान करके भगवान शिव जी को गंगा जी जटा में धारण करने के लिए प्रसन्न कर लिया स्वर्ग से गंगा जी को लाए जिसका एक प्रवाह पाताल में है एक स्वर्ग में है उसका एक प्रवाह मृत्यु लोक में भी लाकर जीवों का उपकार करने वाले भगीरथ राजा आत्म ज्ञान पाकर जीवन मुक्त होकर बचरे
ऐसे ही तुम अपने को आत्मा शुद्ध चैतन्य शांत निरामय आनंद स्वरूप प्रेम स्वरूप मानकर उस परमात्मा तत्व को जानकर अपने आप में आराम पाओ