नामदेव ने तो कुत्ते में भगवान को देखा हम लोग संत के अंदर भगवान को देखने की कोशिश करते हैं श्री राम शम नामदेव ने रोटी बना के रखी क अंदर गया कमरे में कुत्ता और रोटी उठा के ले भागा नामदेव कटोरी लेकर के नाथ रूखी ना खाइयो सर जायो प्रभु रुख ना खाइयो मेरे नाथ रुक ना खायो ठर जा और भागा लेकिन नामदेव का दृढ़ विश्वास था कुत्ते के अंदर भी छुपा हुआ परमात्मा तो है ही मुह खोला दर्शन दे भावो ही विद्यते देव भाव में देव छुपा है लम की पत्तियों में चित्रों में आसक्ति
और काम विकार होता है तो शरीर का पतन कर देता है मन का पतन करता वेदांत दर्शन के अनुसार जो परमात्मा तो सब में है सर्वत्र है जिसम भावना दृढ़ होती है वहां से लाभ होता है स्वामी राम तीर्थ कभी कभी व ब्रह्म परमात्मा के ध्यान में बैठ जाते और पत्नी को बोलते तने उस परमात्मा को नहीं देखा तो कोई हरकत नहीं चिंता की बात नहीं है तो परमात्मा भाव से मेरा पूजन करते को लाभ हो जाएगा और वो ऊपर उठ कभी-कभी हम लोग सोचते कि भगवान निराकार है निरंजन है उसको कैसे देखें जिनके हृदय
में व शांत स्वरूप परमात्मा प्रकट हुआ है कबीर जी बोलते हैं अलख पुरुष के आरसी साधु का ही देह लखा जो चाहे अलख को उन्ही में त लख हम लोगों की श्रद्धा भावना होती है उस अलक्ष पुरुष को निराकार को किसी महा उस में लखने का हम लोग प्रयास करते वरना संतो को तो पूजा क्या हार क्या पकार क्या यश क्या यश क्या संत तो ऐसी जगह पर होते हैं जहां वाणी का गम वाणी पहुंच नहीं सकती तो व्यवहार क प फ भी जिस क्ण हम लोगों का भाव होता है और संत परब्रह्म परमात्मा के
मस्ति में होते हैं हम लोगों को लाभ हो जाता है य आचार्य पाद सेवन जो परंपरा है व किसी एक व्यक्ति ने या किसी बु व्यक्ति ने चलाई नहीं य ऊची कक्षा पर पहुंचे हुए ऋषियों ने प्रारंभ किया इनको तत्व का साक्षात्कार हुआ जो मरने के करीब थे राजा परीक्षत व बोलते नाथ जरा ठहरो गुरुदेव मुझे आपके चरणों का अर्ग पाद से पूजन करने शंकर भगवान पूजन शि जी ने किया वशिष्ठ जी का पूजन अर्ग पास से भगवान राम ने किया भगवान राम ने पूजन किया है गुरु का भगवान कृष्ण ने पूजन किया है भगत
तो सब होते हैं कोई रुपयों के भगत होते कोई बच्चों के भक्त होते शिशुपाल जैसे कोई यश के भक्त होते कोई धन के भक्त होते हैं कोई गुरु के भक्त होते बोले कोई भगवान के भक्त होते भगवान के जो भक्त है वो गुरु के होंगे और जो गुरु के भक्त है वो भगवान के होंगे क गुरु और [संगीत] भगवान मूर्ति भेद से दो दिखते हैं वरना उसी तत्व की पूजा है उस आत्म तत्व की पूजा है उस परमात्मा की पूजा है गुरु में अथवा ईश्वर में जो चमक रहा है जो प्रकट हुआ है वो तो
क है गुरु और ईश्वर दो ढंग से देखते हैं ईश्वर गुरु रात्म मूर्ति भेद वि भागि तम देवाय तस्म से गुरु जैसे यो माना आकाश आकाश व्यापक है ऐसे ही परमात्मा परब्रह्म परमात्मा व्यापक है व्यापक परमात्मा जैसे आकाश जितना पहले घड़े में उतना ही दूसरे घड़े में जो पहले घड़े में है वही दूसरे घड़े में उतना शायद ना भी दिखे घड़ा छोटा होने पर लेकिन जो सोने के घड़े में है वही मिट्टी के घड़े में है वही काही ऐसे जो सगुण साकार में है चैतन्य परमात्मा वही गुरुओ के देह में है हम लोगों के देह
में है हम लोगों के देह में प्रकट हो उसी लिए गुरुओ के देह में परमात्मा की भावना की जाती और गुरु फिर बताते कि तू भी वही है ओम ओम ओ देह छता जनी दशा ते देहाती ते ज्ञानी ना चरण मा हो वंदन ओ ओ रुपए देकर जो आप नहीं खरीद सकते हैं वह चीज प्रकट होती रुपए देकर आप परमात्मा को नहीं खरीद सकते हैं रुपए देकर आप संतो के प्रेम को नहीं खरीद सकते रुपए देकर आप आत्म साक्षात्कार नहीं कर सकते रुपए देकर आप जन्म मरण से पार नहीं हो सकते रुपए देकर आप मोक्ष
नहीं पा स लेकिन आप समय देकर साधन भजन करते हैं तो मोक्ष आपके हृदय में प्रकट [संगीत] होने करोड़ों अरबों रुपया लुटाने पर जो चीज नहीं मिलती है वोह साधन भजन से प्रकट होती लिए कबीर जी ने कहा प्रेम न खेतो उपजे प्रेम न हाट बिकाय राजा च हो प्रजा चाहो शीष दि ले जाए हमारे और ईश्वर के बीच अहंकार का पदा है अहंकार बाधा है साधन भजन से वो अहंकार विसर्जित होता है जीवन में भीतर सरलता छलकती है जैसे आप और हमारे बीच में ये पर्दा है नहीं दिखता इसके तंतु निकलते जाएंगे तो पर्दा
होते हुए भी कुछ कुछ झलक आएगी तंतु सब सफा हो गए तो आपके और हमारे बीच का पदा हट जाएगा ऐसे ही परमात्मा और हमारे बीच में अहंकार का पर्दा है साधन भजन सत्संग करते करते वो धुंधला होता है हल्का सा होता जाता है एक घड़ी ऐसी आती कि बचा खुचा तत्व मसी के महावाक्य के उपदेश से ससक जाता है वही जीव परमात्मा का साक्षात्कार करके परमात्मा मय हो जाता है फिर उसम और परमात्मा में उसम और ईश्वर में दूरी नहीं रहती ओम ओम ओम ओ ओ लिए कबीर जी ने कहा सतगुरु मेरा सूरमा व
जो मेरे सतगुरु है वो सूरमा है तलवार लेकर रण के मैदान में शत्रु को मार देना कोई बड़ी बात नहीं है लाय बंबा लेकर अग्नि बुजा देना ये कोई बड़ी बात नहीं लेकिन हृदय की अशांति अथवा हृदय में छुपे हुए जो शत्रु है अज्ञान आवरण [संगीत] विक्षेप अविद्या अस्मिता राग द्वेष काम क्रोध लोभ मोह म मास ये ना तलवार से भागते ना लाय बंबे से भागते हैं ये संतों की मती कृपा होती तब धीरे धीरे खत्म होते है कामन क्रोध न लोभ न मोह कछु एकल भला अनी साधक ऐसा चाहे जैसा बन कासी कबीर जी
कहते सतगुरु मेरा सूरमा करे शब्द की चोट मारे गोला प्रेम का हरे भर्म की कोट जो भरम घुसा है दे को मैं मानकर संसार में सुख खोजने का व भरम दूर हो जाता है और जहां सुख स्वरूप परमात्मा है उधर आदमी की यात्रा होने लगती है कबीर जी कहते यह तन विष की बेलरी य हमारा शरीर है विष का बेला सुंदर मिठाईया जिसको कंदोई के पास अगरबत्ती का धूप दिया जा रहा था शाम को रात को घर ले आए खाई सुबह उनकी क्या बुरी हालत होती है सोने के बर्तनों में पूरी पकवान बासुदे का भोग
लगाया लेकिन सुबह उसकी क्या हालत होती सब जानते सोने की थाली सोने की प्याली सोने का चमचा सोने के बर्तनों में ऊंचे से ऊंचा भोजन पिरो एक चम्मच मुह में डाला दूसरी चम्मच उठा रहे और कोई साधु आया तो आप कह नहीं सकते कि महाराज इसमें भोजन करि क्योंकि झूठा हो गया इसलिए कबीर जी बोलते तन विष की बेलरी इसको कोई भी पवित्र चीज मिलती तो पवित्र बना देता है तन विस की बेलरी गुरु अमृत की खान जो साक्षात्कारा रज भी पूजी जाती यतन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान सर दीज सतगुरु मिले तो
भी सस्ता जा तुलसीदास जी ने कहा तुलसी तुलसी क्या करो तुलसी बन की घास कृपा भई रघुनाथ की तो हो गए तुलसीदास सत्संग में बड़ी शक्ति है और जो आदमी जैसा होता है उसका वैसा वातावरण उसके हर इंसान एक पावर हाउस है पावर हाउस से बिजली डिस्ट्री ब्यूट होती ऐसे हर आदमी से अपने विचार और अपने आंदोलन अपने वाइब्रेशन फैलते हैं एक्टर के करीब बैठते हैं तो उसके आंदोलन में उसके रेंज में आते तो वैसे वातावरण पैदा हो हमारा चित्त भी ऐसा ही हो जाता हम थिएटर में नाटक में बैठते हैं तो उस उधर की
रेंज का वातावरण हमारे चित्त को प्रभावित करता है ऐसे हम संतों के करीब बैठते तो हमारे चित्त में तो जैसे भूमि में तमाम प्रकार का रस छुपा है इन बाई आंखों से नहीं दिखता है वही कैनाल का पानी और वही एक ही नंबर 15 बीगा का एक जगह पर मिर्च हो रहा है दूसरे जगह पर गन्ना बन रहा है तीसरे जगह पर अदरक तैयार हो रही है चौथे जगह पर बाजरी के कुछ पौधे खिल रहे हैं पांचवी जगह पर सूर हो रहा छठी जगह पर बटाका हो रहा है पानी वही का वही जमीन वही की
वही लेकिन जैसा उसको सहयोग मिलता है ऐसा सर्जन होता है ऐसे हमारे में भी अनंत अनंत रस है अनंत क्षमता भरी है हमको जैसा बाहर से वातावरण मिलता है जैसा संग मिलता है जैसा बीज पड़ता है उसी प्रकार की अंदर से चा तो आपके पास धन कितना है यह कोई मूल्यवान प्रश्न नहीं है आप कितना बा जगत का नॉलेज रखते हैं इसका कोई ज्यादा चिंता की बात नहीं है आपका शरीर कितना थल है मजबूत है यह भी ज्यादा प्रश्न नहीं क्योंकि आपके पास अंदर से बहुत पड़ा है आपके पास बाहर का धन कितना है रूप
कितना है सत्ता कितनी है परिचय कितना है यह प्रश्न नहीं पूछता परमात्मा आपके पास प्यास किस चीज की है आप क्या चाहते हैं किसको चाहते हैं श्वर को चाहते कि शाश्वत को चाहते हैं गगो को विकसित करना चाहते हैं कि को को विसर्जित करना चाहते जन्म मरण की यात्रा का अंत करना चाहते कि जन्म मरण का सामान बनाना चाहते आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है आप क्या है आप क्या है आप जिज्ञासु है भक्त है साधक है इस संसार के मजदूर है सब कई जन्मों में इकट्ठा किया बनाया और झटका या मृत्यु का
छोड़ के चल दिए अभी भी ऐसा कुछ मित्र कुटुंबी संबंधी साथी सबको ठीक रखा खुश रखा मृत्यु का झटका आया सब य है संसार का मजदूर आप संसार के मजदूर हैं या संसार को साधन बनाकर उपयोग करके अपनी यात्रा तय करने वाले पथिक हैं या परमात्मा को जानने की जिज्ञासा है या भगवान से मिलने की तड़फ है या गुरुमुख होकर ज्ञान पाना चाहते हैं आप क्या है आपके पास क्या है ये कोई बड़ी बात नहीं आप क्या है जिज्ञासु है अगर नहीं है तो हो जाइए संसार के मजदूर से तो जिज्ञासु बहुत ऊंचा है इसलिए
सूफी फकीर कहते हैं कि सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है न जाने कब रुला दे और संतों के साथ भिक्षा मांग के खाना भी अच्छा है ना जाने कब मिला दे तो संतों का संग का रंग लगता है हम लोगों को बालिया लुटारा को भी संतो का संग का रंग लगा तो वाल्मीकि ऋषि बन गया सदना कसाई रविदास चमार जैसे व्यक्ति भी आज शास्त्रों में उल्लेखनीय स्थान पर है बाकी तो गट बनाया सोने की लंका बनाए एक तोला एक रत्ती वो सोना ले गया नहीं रावण बेचारा कबीर जी बोलते हैं क्या करिए क्या
जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी सब जात है लेह गेह धन राज देह को शरीर को घर को धन को राज्य को सब छोड़ छोड़ के जा रहे हैं क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काट सब चला चली का मिला है जिनकी नौबत से गूंजते थे आसमान वो खुद बेदम हो गए अब ह ना हां कुछ भी नहीं जो मिटने वाला है छूटने वाला है मरने वाला है व्यवहार शरीर उससे एक अमर आत्मा की यात्रा कर ले तो कर ले शरीर खाक में मिलने वाला है शरीर खाक में मिले उसके पहले अपने पापों को खाक
में मिला दे तेरे हाथ की बात है कुटुंबी अर्थी पर बिठाकर शमशान में छोड़ के आए उसके पहले अपन आप समझ बूझ के अपने आप को भगवान के चरणों में सौप दे अपने मन को आंखों की रोशनी कम हो जाए अंधे होने लगे उसके पहले भीतर की आंख खोल दे बेड़ा पार हो जाए बूढ़े होंगे बहुए और पुत्र मुह मोड़ लेंगे उसके पहले हम अभी से ईश्वर के तरफ मुह कर दे तो बुढ़ापे में पश्चाताप नहीं होगा हमारे पास क्या हैय कोई बड़ी बात नहीं है हम क्या चा ते हैं सूक्ष्म रूप से तो सब
प्रकार का रस भरा है अब चाहे जीजर को लगा दे चाहे हरि भजन कर चाहे विषय कमा चाहे तो परमात्मा का भजन करके परमात्मा मय हो जा मुक्त हो जा अपना एकल का उद्धार कर ले चाहे तो फ हाय हाय हाय हाय करके जगत की चीजों को सवारो बटो अंत में मृत्यु का झटका आए और छोड़ बोले तो जगत का व्यवहार तो करना चाहिए ना बाबा जी नौकरी धंधा तो करें भैया नौकरी धंधा का मना नहीं है लेकिन य ये सब करके अपनी आवश्यकता पूरी करो इच्छाएं पूरी करने के पीछे मत लगो आवश्यकता पूरी करने
का बाबा लोग मना नहीं करते शास्त्र मना नहीं करते ऋषि ने मना नहीं कि आवश्यकता है तो पूरी हो सकती है आसानी से लेकिन इच्छाएं बढ़ाकर फसने की मना है शास्त्र आवश्यकता है स्वास्थ लेने की बिना परिश्रम के पूरी होती है आवश्यकता है पानी पीने की स्वाभाविक मिल जाता है आवश्यकता है पेट को खाडा भरने की भोजन की वह भी थोड़े आया से मिल जाता है लेकिन आवश्यकता है कुछ शरीर की रक्षा करने के लिए मकान में रहने वोह भी हो सकता है वस्त्र की आवश्यकता है वह भी मिल सकता है उसमें ज्यादा समय नहीं
देना पड़ता लेकिन इच्छा बढ़ जाती है बढ़िया मकान हो सुंदर थाली हो बढ़िया बढ़िया पाटला हो दो चार सब्जियां हो रोटली चोपड़ी हुई हो अमुक हो अमुक हो यह है इच्छा य नखरे है शरीर को लाड लड़ाने के जिस शरीर को जला देना है उसी के लाड़ लड़ाने की इच्छा हो जाती और जो लाड़ लड़ा रहे उन्हीं की हम कॉपी करते हैं जिन्होंने शरीर का सदुपयोग किया उनकी कॉपी करे तो हमारा कल्याण हो जाए सुखदेव जी महाराज की कॉपी करें भगवान बुद्ध की कॉपी करें महावीर की कॉपी करें कबीर जी की कॉपी करें नानक देव
की कॉपी करें तुकाराम की कॉपी करें जनक राजा की कॉपी करें राम तीर्थ की कॉपी करें ऐसों को हम अपना ल उद्देश्य बनाए उनकी ऊंचाई को देखकर हम अपना स्वभाव बनाए तो आसानी से हम मुक्त हो सकते हैं तुलाधार व्यापारी दुकान करियाणा का धंधा करते करते इतना महान ऊंचा हो गया कि काल पड़ा तो बरसात कर दी उसने ऐसी बरसात की कि राजा को तीन दिन उसके द्वार पर बैठा रहना पड़ा हस्तिनापुरी दिल्ली की बात धंधा व्यापार करने का शास्त्र ने मना नहीं किया नौकरी करने का शास्त्र ने मना नहीं किया आजीविका तो पाने के
लिए मना नहीं कि आवश्यकता पूरी हो सकती है तो जो अत्यंत आवश्यक है उसको पूरा करो पूरा करने में समय लगा और जो निरर्थक जितना कट हो सके उसको काट दो तो तटस्थ हो के खोज तो आपकी स इच्छा तो 100 के कर दोगे सा 40 तो ऐसे ही है कि जिसको नहीं हो तो भी चले 100 आवश्यकता दिखती है तटस्थ होकर अगर ईमानदारी से खोजो ना तो 40 कट जाएगी व्यर्थ मालूम होगी घर में रसोड़ा 100 की कर दो 60 अगर जल्दी से परमात्मा का दर्शन करना है तो इच्छाओं को 100 की कर दो
60 आधा कर दो काट 10 पूरी करेंगे 10 कराएंगे और 10 को हाथ [संगीत] जोड़ेंगे च की कर दो सा आधा कर दो काट 10 पूरी करेंगे 10 कराएंगे और 10 को हाथ जोड़ेंगे 10 को हाथ जोड़ देंगे 10 काम चल सकता श्रीराम जी सकते हमलोग अगर मुक्ति चाहिए तो अनंत ब्रह्मांड को चलाने वाला परमात्मा के साथ एक होने की गग है तो 10 आवश्यकता है 90 नखरे ओम ओम ओ ओ हम तो अपने शरीर को समाज से और अपने अहम को बचाना चाहते हैं का को छोड़ा उसे लोग क्या बोलेंगे उसकी चिंता है और
लोकेश्वर क्या बोलेगा कि इतनी इतनी बार मौका दिया और अभी तक मिला नहीं यह बात हम लक्ष में रखे तो बेड़ा पार हो जाए साधु वासवानी के पास एक कर्नल गया लेफ्टन कर्नल बोला बाबा लोग दया करें तो भगवान की मुलाकात हो सकती है आप जो भी बोलो मैं करने को तैयार हूं आज मेरे को भगवान का अनुभव कराओ जो सब सबके हृदय में है हृदय के धमका उसी परमात्मा की सत्ता से पड़ते हैं रक्त संचार उसी की सत्ता से होता है हमारी आंख उसी परमात्मा की सत्ता से देखती है हमारे कान उसी परमात्मा की
सत्ता से सुनते हैं हमारी जीव हिल चाल करती तो उसी परमात्मा की सत्ता से कर हमारा मन संकल्प विकल्प करता है तो उसी साक्षी सच्चिदानंद परमात्मा के सत्ता से करता हमारी बुद्धि निर्णय करती है तब भी उसी परमात्मा की सत्ता ये मंदिर है अच्छा है पगे लगो वो भी उस मंदिर की कृपा से ये मंदिर में पगे लग सकते हैं ये बाहर के मंदिर और मस्जिद और गिरजाघर और चर्चे जो बनी है वह उसी परमात्मा की सत्ता से बाहर खड़ी कर दी गई वरना वास्तव में पहले यह है बाद में वो है तो महाराज जो
सदा साथ में है और मंदिरों को भी बनाने वाला है भगवान की स्थापना करने वाला जो भगवान है खुदा की मौजूदगी खुदा की जो इस याद का पत्थर लगाने वाला है ना वो असली खुदा है पत्थर में ख दख नहीं जेरूसलम में खुदा नहीं है लेकिन जेरूसलम में पत्थर जिसने स्थित कर दिया काला वो खुदा है महाराज आप जो भी कहेंगे मैं करने को तैयार हूं लेकिन मेरे को भगवान का दर्शन करा आप बोलो तो मैं अपना जो फंड बंड आएगा वह आपके आश्रम के नाम कर दो आपके नाम कर अमुक किला पंजाब में जमीन
है य बगा बोलते व किला बोलते हैं ये भी आपको तन मन धन ंड अर्पण कीता गुरु बाबा मेरा ये शरीर मेरा धन मेरा मन आपको अर्पण के भगवान का दर्शन करा बोला कि भाई छोड़ो अब तन मन धन अर्पण करने की बात एक है और हो जाना दूसरी बात बोले नहीं बाबा जी आप जो भी कहेंगे मैं करने को तैयार ईश्वर का दर्शन होता है तो तन एक दिन जल जाएगा मन तो 84 लाख बार भटका रहा है और धन तो छोड़कर मरना है जो छोड़कर मरना है और जिस तन को जलाना है वोह
देते हुए अगर भगवान का दर्शन होता है तो सौदा सस्ता है बाबा ने कहा छोड़ो जाने दोय बात मैंने कहा नहीं गुरु जी आप मैं लिख देता हूं ले लिख क्या दो मेरी एक छोटी सी आज्ञा मानो ईश्वर का दर्शन हो जाए बोलो बोले बाबा जी एक आज्ञा नहीं मैं हजार आज्ञा मानू अगर आप ईश्वर का दर्शन कराते तो मैं हजार आज्ञा मानो हजार नहीं तो एक ही मान लो बाबा बो आज्ञा करो तो फिर पलटे का तो नहीं बोले नहीं गुरु जी आज्ञा आप आज्ञा करो बोले देखो जरा संभल के बोलो उसने सोचा बहुत
बहुत तो बाबा जी धन मिलकर बाल बच्चे पुत्र परिवार कहेंगे अर्पण कर दो कर दूंगा पुत्र परिवार पत्नी चाकरी में रख दूंगा बेटे सेवा में रख दूंगा अगर भगवान का दर्शन होता है तो क्या बाबा ने कहा कुछ भी हो तो एक आज्ञा मान मैं तेरे ईश्वर का दर्शन करा दू बो बोले बाबा जी हजार मानो भाई करनाल अब जाओ तुम ड्यूटी प जाओ छोड़ो बात बोले नहीं बाबा आज मौका मिला है आज दया कर अरे कनाल चा जाने दो आपी संभालो जाके जा सलामी लाओ जाके लोगों की सलामी लो अपने ऑफिस वापिस जर बोले
नहीं बाबा जी आज तो बस अच्छा मनेगा क्या मन सोच लो य सोच ले कोई भी आज्ञा करो मानोगे जरूर मानूंगा बोले ऐसा करो मेरे को तुम्हारे जमीन भी नहीं चाहिए तुम्हारा फंड भी नहीं चाहिए तुम्हारी मिल्कत भी नहीं चाहिए यह तो हम तुच्छ समझ के छोड़ के तब बाबा बने यह हमको नहीं चाहिए तुम्हारे बाल बच्चों को चाकर रखो यह हमको नहीं हम स्वयं स्वतंत्र तो दूसरे को क्यों परतंत्र करू ले एक आजा मान हमारे और ईश्वर के बीच में जो अर्चन है उस अर्चन को हटा दे बोले बाबा जी आज्ञा करो सा क्या
करू ज्यादा सरदार जी तो ज्यादा जोर मारता है तो ऐसा करो ये ड्रेस उतार दो और लंगोटी चढ़ा दो और ये बाल बाल कटवा के मुंडन करके फिर जाके ऑफिस में काम करो बो बाबा जी ये कैसे होगा लोग क्या कहेंगे बोले तो बस इश्क करना जहां बचाना यह भी कोई हो सकता है आश के दिले मरीजे मर्ज वो भी कोई सुख सेस हो सकता है एक तो इश्क करते हो ईश्वर से मोहब्बत करते अपना ो संभाल के रखना लो मो भूत अटल तो जो घर में तो ऐसा तो टीवी तो चाहिए जरा थोड़ा सोफा
तो चाहिए लोग क्या कहे ईश्वर प्राप्ति के रास्ते चलते हैं व लोग क्या कहेंगे इस चिंता को छोड़ देवे ना तो लोगों को फर्नीचर से और चाय से और आइसक्रीम से प्रसन्न नहीं करो केवल आपके हाथ का पानी का प्याला भी लोग पिएंगे तब भी कृत कत हो जाए आप केवल कहेंगे कि आइए कमछ तभी भी वो धन्य धन्य हो जाए ईश्वर के लिए अगर कदम रखा तो लोग क्या कहेंगे उसकी परवाह मत करो आवश्यकता कम कर दो कम आवश्यकताओं में आप बादशा बन जाए और जो बचा समय ईश्वर में लगा देंगे महान बन जाए
एक आदमी 10 कर् मंडल एक आदमी 20 जोड़ी कपड़ा आ तो अरे कोपिन में महापुरुष लोग जी लिया यार यह बात भूल ग तो एक लंगोटी उसी में जीवन जीने वाले ने जी लिया पा लिया और लंगोटी का भी ठिकाना नहीं रहता था कभी तो खुल जाती थी तो पड़ र सुखदेव जी महाराज लोगों ने क्या करा अभी उसको नतमस्तक होते बड़े बड़े वक्ता सुकदेव जी सावधान करे कथा में सुखदेव जी मुनि का बार बार स्मरण करके वक्ता का हद हो जा जिन्होने आवश्यकता बढ़ाई वो सब ब्राह्मण के ना पाय माल हो गए क्या करिए
क्या जोड़िए थोड़े जीवन का छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धनराज हाड बड़ा हरि भजन कर द बड़ा कछु दे अकल बड़ी उपकार कर जीवन का फल चलते थे तो फूल बिच जाते थे राजाधिराज अन दता महाराज खममा गगन गामी जिनके कीर्ति के कीर्ति स्तंभ लगे ऐसे राजे महाराजे उनको कीड़े खा गए कबर में कहां चला गया सीजर रोम कहां चला गया रावण कहां गया कंस कहां गया बना पा सब स्वपना हो गया खाक की ढेरी हो गई ऐसे ऐसे नहीं रहे तो तुम हम क्या है कह रहा है आस्मा यह समा भी कुछ
नहीं रो रही है शबन में यह निजारा कुछ नहीं जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानुष झाड़ उनकी कब्र पर है और निशान कुछ भी जिनकी नौबद से गूंजते थे सदा को आसमान वे खुद बेदम है अब ह नहा कुछ भी [संगीत] नहीं बच्चा पैदा होता है ना फिर शंका होती है कि पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा इसकी शादी होगी कि नहीं होगी य मां बाप की सेवा करेगा कि नहीं करेगा यह तो विचार हो सकता है लेकिन य मरेगा कि नहीं मरेगा यह संदेह होता ही नहीं मरेगा डेफिनेटली बाकी का होगा कि नहीं
होगा विकल्प पैसे वालो थन की नौकरी वा थन सावकार थन की कको थन यह तो बचार आ सकता है लेकिन य मरेगा कि नहीं मरेगा ऐसा विचार कभी नहीं आता मरेगा ही मरना डेफिनेट पक्का है बाकी का हो ना हो विकल्प शादी करेगा कि नहीं करेगा ये तो संदेह होता है लेकिन मरेगा कि नहीं मरेगा यह संदेह नहीं होता ओम ओम ओम ओ हम दिन दिन मर रहे हैं और क्या है महाराज तला सूख गया कब सूखा के अभी अभी नहीं रोज सक रहा था अभी देखा फलाना आदमी मर गया कब मरा के अभी अभी
नहीं म म रोज मर रहा था अभी पूर्णा होती ई हम लोग रोज मर रहे हैं घर से चले थे जितनी आयुष थी जितना स्वास का जत्था था अभी उतना नहीं है कल जितना हमारी उम्र थी आज इतनी नहीं है आज जितनी है उम्र वो आने वाले कल को नहीं रहेगी हम रोज मर रहे हैं हकीकत में हम लोग मर रहे हैं और कहते कि क्या हाल है बोले जी रहे हैं जैसा तैसा जी क्या रहे मर रहे हैं हजूर जी नहीं रहे मर रहे हैं मौत के करीब जा रहे हैं बढ़िया बात यह है
कि जिसने अपना काम बना लिया व निहाल हो गया मरने वाले तन से मिटने वाले व्यवहार से मिटने वाली वस्तुओं से और मरने वाले शरीर से जिसने अमर आत्मा की खोज कर ली व बाजी जीत गया बाके के सब गए बकरी डब्बे में ओम ओम तो हमारा मन व्यर्थ की चर्चा में व्यर्थ की तुलना में के व्यवहार में ऐसे जैसे खानपान और कपड़े और मकान इनमें कुछ अननेसेसरी कर लेते हैं ऐसे सोचने में भी हम अननेसेसरी करते बिन जरूरी सोचते हैं बिन जरूरी किसी की लफ में पढते हैं बिन जरूरी देखते हैं बिन जरूरी खाते
हैं बिन जरूरी जो बहुत जरूरी है वो जरूर करो मना नहीं है बिन जरूरी उतना समय अगर ईश्वर में लगाओ तो साक्षात्कार हो जाएगा बिल्कुल गारंटी शास्त्र प्रमाण है इतिहास प्रमाण है बिन जरूरी है ना वो बचा लो किसी के बारे में ऐसा है व ऐसा है ऐसा उसका उसका सोचना छोड़ो उतने ही वह सोचने का समय आत्मा के तरफ लगाओ बिन जरूरी घूमना है उतना ही अंदर यात्रा करने मिलगा