उसने करोड़ों रुपए कमाने के बाद अपनी डायरी में सिर्फ एक लाइन लिखी और अगले ही दिन अपनी पूरी कंपनी बेच दी। सवाल है उस एक लाइन में ऐसा क्या लिखा था? उस दिन पूरी दुनिया यही समझ रही थी कि उसने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी है। न्यूज़ चैनल्स उसे पागल कह रहे थे। इन्वेस्टर्स हैरान थे। उसके अपने दोस्त भी एक ही सवाल पूछ रहे थे। जब सब कुछ मिल गया था तो फिर सब कुछ छोड़ क्यों दिया? लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि उस डायरी की एक लाइन ने सिर्फ उसकी कंपनी नहीं उसकी पूरी जिंदगी की परिभाषा बदल दी थी और यहीं से शुरू होती है एक ऐसी यात्रा जो आपको सक्सेस के उस सच तक ले जाएगी जिसके बारे में ज्यादातर लोग पूरी जिंदगी नहीं जान पाते। इस वीडियो में हम समझेंगे कि क्यों कुछ लोग बार-बार गिरकर भी इतिहास बना देते हैं। जबकि कुछ लोग हर सुविधा होने के बावजूद वहीं के वहीं रह जाते हैं। आप जानेंगे [संगीत] कि आपका माइंड कैसे बिना बताए आपके हर डिसीजन को कंट्रोल करता है। डर कैसे आपके भविष्य को चुपचाप चुरा लेता है। डिसिप्लिन क्यों मोटिवेशन से कहीं ज्यादा ताकतवर है और वह एक मानसिक बदलाव क्या है?
जिसके बाद सफलता सिर्फ एक सपना नहीं रहती बल्कि आपकी पहचान बन जाती है। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य अभी बाकी है क्योंकि उस डायरी में लिखी वह एक लाइन शायद आपकी जिंदगी भी हमेशा के लिए बदल दे। चलिए उस कहानी की शुरुआत करते हैं। चैप्टर वन सक्सेस बिगिंस इन द माइंड। बारिश इतनी तेज हो रही थी कि सामने लगी स्ट्रीट लाइट भी धुंधली दिखाई दे रही थी। रात के करीब 11:30 बजे शहर के सबसे बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस के बाहर एक लड़का अकेला खड़ा था। उसकी शर्ट पूरी तरह भीग चुकी थी। हाथ में एक छोटा सा एनवेलोप था जिसके अंदर सिर्फ एक कागज रखा था। उस कागज पर लिखा था वी रिग्रेट टू इनफॉर्म यू। यह उसकी सातवीं रिजेक्शन थी। उसने धीरे से वह लेटर मोड़ा, जेब में रखा और सड़क किनारे बैठ गया। उसके सामने से महंगी कार्स गुजर रही थी। उन कार्स के अंदर बैठे लोग शायद उसी बिल्डिंग से निकल रहे थे जहां वह बार-बार रिजेक्ट हुआ था। उसने सिर झुकाकर खुद से सिर्फ एक बात कही। शायद सक्सेस कुछ लोगों के लिए ही बनी होती है। मेरे लिए नहीं। उसी समय उसके बगल में एक बुजुर्ग सिक्योरिटी गार्ड आकर बैठ गया। उसने बिना कुछ पूछे सिर्फ इतना कहा। हार तुम्हें किसी कंपनी ने नहीं दी। हार तो तुमने अभी अपने दिमाग में मान ली है। लड़का चुप रहा। कुछ सेकंड बाद गार्ड मुस्कुराया और बोला, "मैं पिछले 25 साल से इस बिल्डिंग के गेट पर बैठा हूं। हर दिन सैकड़ों लोग अंदर जाते हैं। कुछ पहली बार में सक्सेस पा लेते हैं। कुछ 10 बार गिरते हैं। लेकिन मैंने एक चीज नोटिस की है। जो लोग बाहर हार कर भी अंदर से नहीं टूटते। वही एक दिन इसी बिल्डिंग के सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर बैठते हैं। उस रात वह लड़का घर तो चला गया लेकिन पहली बार उसके दिमाग में एक नया सवाल पैदा हुआ। क्या सच में मेरी सबसे बड़ी प्रॉब्लम दुनिया है या मेरी अपनी सोच? यहीं से उसकी असली यात्रा शुरू हुई। हम में से ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी की कहानी परिस्थितियों से लिखने की कोशिश करते हैं। अगर सैलरी कम है तो हम कहते हैं कि सक्सेस मुश्किल है। अगर बिजनेस फेल हो गया तो हम मान लेते हैं कि किस्मत खराब है। अगर लोग सपोर्ट नहीं करते तो हम अपने सपनों का आकार छोटा कर देते हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। इंसान की जिंदगी उसके आसपास की परिस्थितियों से कम और उसके भीतर चल रहे विचारों से ज्यादा बनती है। दिमाग एक ऐसे सॉफ्टवेयर की तरह है जिसे आप हर दिन अपने शब्दों, अपने अनुभवों और अपने विश्वासों से प्रोग्राम करते हैं। अगर आप बार-बार खुद से कहते हैं मैं एवरेज हूं। मैं नहीं कर सकता। मेरे पास रिसोर्सेज नहीं है तो आपका माइंड उसी हिसाब से काम करना शुरू कर देता है। फिर आपको हर जगह मुश्किलें दिखाई देती हैं। हर ओपोरर्चुनिटी रिस्क लगती है। हर चैलेंज असंभव लगता है। लेकिन जिस दिन वही व्यक्ति अपने माइंड को नया कमांड देता है, मैं सीख सकता हूं। मैं बदल सकता हूं। मैं फिर से शुरुआत कर सकता हूं। उसी दिन से उसकी रियलिटी बदलनी शुरू हो जाती है। वह लड़का भी धीरे-धीरे बदलने लगा। उसने सबसे पहले जॉब्स ढूंढना नहीं बदला। उसने खुद से बात करने का तरीका बदला। पहले वह हर सुबह उठते ही सोचता था। आज भी शायद कुछ नहीं होगा। अब उसने खुद से कहना शुरू किया। अगर आज नहीं हुआ तो मैं कल पहले से बेहतर कोशिश करूंगा। सुनने में यह बदलाव बहुत छोटा लगता है। लेकिन यही छोटे बदलाव बड़े परिणामों की नींव बनते हैं। धीरे-धीरे उसने नोटिस किया कि अब वह इंटरव्यूज में पहले जैसा डरा हुआ नहीं जाता। अब रिजेक्शन उसे तोड़ता नहीं था। अब वह हर फेलियर के बाद खुद से सिर्फ एक सवाल पूछता था। इस बार मैंने क्या सीखा? यही सवाल उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। कुछ महीनों बाद वही कंपनी जिसने उसे सात बार रिजेक्ट किया था। फिर से हायरिंग कर रही थी। उसके दोस्त हंस पड़े। उन्होंने कहा इतनी बार मना कर चुके हैं। अब क्यों जा रहे हो?
लेकिन इस बार वह मुस्कुराया क्योंकि इस बार वह जॉब लेने नहीं जा रहा था। वह यह साबित करने जा रहा था कि उसका माइंड अब पहले वाला नहीं रहा। इंटरव्यू रूम में उससे वही मुश्किल क्वेश्चंस पूछे गए। लेकिन इस बार उसके जवाब बदल चुके थे। उसके चेहरे पर डर नहीं था। उसकी आवाज में घबराहट नहीं थी क्योंकि उसे पहली बार एहसास हुआ था कि कॉन्फिडेंस किसी रिजल्ट से नहीं आता। कॉन्फिडेंस उस विश्वास से आता है कि चाहे जो हो जाए मैं सीख कर वापस उठूंगा। कुछ दिनों बाद उसके फोन पर एक ईमेल आया। कांग्रेचुलेशंस। [संगीत] यू आर सिलेक्टेड। उसने स्क्रीन को कुछ सेकंड तक देखा। उसकी आंखों में आंसू थे। लेकिन वह आंसू उस जॉब के नहीं थे बल्कि उस इंसान के थे जो कुछ महीने पहले सड़क किनारे बैठकर खुद को फेलियर मान चुका था। उस दिन उसे समझ आया कि सक्सेस का पहला दरवाजा किसी ऑफिस, किसी बिजनेस या किसी बैंक में नहीं खुलता। वह आपके अपने माइंड के अंदर खुलता है। जिस इंसान ने अपने विचारों को जीत लिया उसे दुनिया देर से सही लेकिन एक दिन जरूर जीतने देती है। याद रखिए दुनिया आपको उतना नहीं रोकती जितना आपका अपना माइंड रोकता है। और जिस दिन आपने अपने माइंड को अपना सबसे बड़ा दुश्मन नहीं बल्कि सबसे बड़ा साथी बना लिया उसी दिन आपकी सक्सेस की कहानी सच में शुरू होती है। चैप्टर 2, डिसिप्लिन क्रिएट्स द पर्सन सक्सेस फॉलोज़। सुबह के ठीक 4:30 बजे अलार्म बजा। पूरा शहर गहरी नींद में था। बाहर हल्की ठंड थी और खिड़की के शीशे पर धुंध जम चुकी थी। कमरे के अंदर बिस्तर पर लेटा आरव धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलता है। उसका हाथ अलार्म बंद करने के लिए बढ़ता है। लेकिन अगले [संगीत] ही पल उसका अंगूठा स्नूज़ बटन पर रुक जाता है। उसके दिमाग में दो आवाजें लड़ रही थी। पहली आवाज कह रही थी। आज मत उठो। [संगीत] सिर्फ 5 मिनट और कल से शुरू कर लेना। दूसरी आवाज बिल्कुल शांत थी। यही 5 मिनट तय करेंगे कि तुम वही इंसान बने रहोगे या बदल जाओगे। आरव ने गहरी सांस ली [संगीत] और बिस्तर छोड़ दिया। उसे नहीं पता था कि उस सुबह उसने सिर्फ बिस्तर नहीं छोड़ा था। उसने अपने पुराने वर्जन को पीछे छोड़ने का पहला फैसला लिया था। कुछ महीने पहले तक उसकी जिंदगी बिल्कुल अलग थी। बड़े-बड़े गोल्स बनाना उसकी आदत थी। न्यू ईयर पर डायरी भर जाती थी। फोन में मोटिवेशन वीडियोस की लंबी प्लेलिस्ट थी। लेकिन हर प्लान का अंत एक ही जगह होता था। कल से शुरू करूंगा। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन आलस नहीं था। बल्कि वह झूठ था जो उसका माइंड हर दिन उसे बोलता था। अभी सही समय नहीं है। थोड़ा मूड आ जाए फिर करेंगे। जब मोटिवेशन आएगी तब पूरी ताकत से काम करेंगे। यही झूठ सालों तक उसकी जिंदगी को रोकता रहा। एक दिन उसकी मुलाकात एक ऐसे बुजुर्ग धावक से हुई जिसकी उम्र लगभग 70 साल थी। हर सुबह वह बिना एक भी दिन मिस किए दौड़ने आता था। आरव ने हैरानी से पूछा, आपको कभी मन नहीं करता कि आज रेस्ट कर लूं? बुजुर्ग [संगीत] मुस्कुराए। उन्होंने कहा, हर दिन करता है। लेकिन मैंने अपने मन को बॉस बनाना बहुत पहले छोड़ दिया। अब मेरा डिसिप्लिन फैसला करता है। मेरा मूड नहीं। यह एक साधारण सा वाक्य था। लेकिन आरव के भीतर कुछ बदल गया। उसने पहली बार समझा कि दुनिया के ज्यादातर लोग इसलिए नहीं हारते क्योंकि उनमें टैलेंट कम होता है। वे इसलिए हारते हैं क्योंकि उनका भविष्य उनके मूड के भरोसे चलता है। अगर मूड अच्छा हुआ तो काम होगा। अगर मूड खराब हुआ तो सपना रुक जाएगा। लेकिन सक्सेस कभी मूड देखकर नहीं आती। सक्सेस सिर्फ उन लोगों के दरवाजे पर दस्तक देती है जो हर दिन बिना बहाने के काम करते हैं। उस दिन के बाद आरव ने अपनी जिंदगी बदलने के लिए कोई बड़ा रेजोल्यूशन नहीं लिया। उसने सिर्फ एक रूल बनाया। मैं हर दिन अपना वादा निभाऊंगा। चाहे कितना भी छोटा क्यों ना हो। पहले दिन उसने सिर्फ 10 मिनट पढ़ाई की। दूसरे दिन 15 मिनट। तीसरे दिन 20 मिनट। कोई चमत्कार नहीं हुआ। कोई अचानक करोड़पति नहीं बना। लेकिन एक चीज धीरे-धीरे बदल रही थी आरव का कैरेक्टर। और यही सबसे बड़ी जीत थी। क्योंकि आदतें सिर्फ आपका स्ेड्यूल नहीं बदलती। वे आपकी पहचान बदल देती हैं। हर बार जब उसने नींद पर जीत हासिल की, उसका माइंड उसे एक नया मैसेज देता था। मैं अपने शब्द का पक्का हूं। हर बार जब उसने बहाने छोड़कर एक्शन लिया। उसका आत्मविश्वास थोड़ा और मजबूत हो गया। यही कारण है कि अनुशासन का सबसे बड़ा इनाम पैसा, प्रमोशन या फेम नहीं होता। उसका सबसे बड़ा इनाम होता है। एक ऐसा इंसान बन जाना जो खुद पर भरोसा करता है। करीब एक साल बाद उसी शहर में एक स्टार्टअप कंपटीशन आयोजित हुई। हजारों लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। आरव भी वहां [संगीत] पहुंचा। इस बार उसके पास सबसे ब्रिलियंट आईडिया नहीं था। उसके पास सबसे ज्यादा एक्सपीरियंस भी नहीं था। लेकिन उसके पास एक ऐसी चीज थी जो बाकी लोगों के पास नहीं थी। हर दिन की गई छोटी-छोटी जीतों से बना हुआ कैरेक्टर। जब दूसरे कंटेस्टेंट्स प्रेशर में टूट रहे थे। आरव शांत था। जब दूसरे बहाने ढूंढ रहे थे। वह सॉलशंस ढूंढ रहा था और आखिर में विनर का नाम घोषित हुआ। आरव मल्होत्रा स्टेज पर खड़े होकर उसने ट्रॉफी को देखा। फिर उसे उस सुबह का अलार्म याद आया। उसे समझ आ गया। उसकी जीत आज नहीं हुई थी। उसकी जीत उस दिन शुरू हो गई थी। जब उसने पहली बार स्नूज़ की जगह एक्शन चुना था। याद रखिए सक्सेस कभी एक बड़े फैसले से नहीं बनती। वह हर सुबह लिए गए उन छोटे-छोटे डिसीजन से बनती है जिन्हें कोई देखता भी नहीं। क्योंकि अंत में दुनिया आपकी टैलेंट को नहीं आपकी कंसिस्टेंसी को रिवॉर्ड करती है और जिस दिन आपका डिसिप्लिन आपके इमोशंस से ज्यादा मजबूत हो जाएगा उसी दिन आपकी सफलता सिर्फ एक सपना नहीं रहेगी। वह आपकी पहचान बन जाएगी। चैप्टर थ्री फियर इज द इनविज़िबल प्रजन। रात के 9:58 हुए थे। एक विशाल ऑडिटोरियम लोगों से खचाखच भरा हुआ था। हजारों आंखें सिर्फ एक ही दिशा में देख रही थी। स्टेज की तरफ। पर्दे के पीछे खड़ा कबीर अपनी हथेलियों का पसीना बार-बार पोंछ रहा था। अगले 2 मिनट में उसे मंच पर जाकर अपनी कंपनी का सबसे बड़ा प्रेजेंटेशन देना था। अगर वह सफल होता तो करोड़ों का इन्वेस्टमेंट मिल सकता था। अगर असफल होता तो 5 साल की मेहनत एक पल में खत्म हो सकती थी। उसका नाम अनाउंस हुआ। तालियां बजने लगी। लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए। उसी पल उसके दिमाग ने फुसफुसाया। अगर सबके सामने गलती हो गई तो अगर लोग हंस पड़े तो अगर तुम असफल हो गए तो उसने एक कदम आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन डर ने उससे पहले ही उसे रोक दिया। फिर अचानक उसकी नजर पहली रो में बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी। वह बच्चा मुस्कुरा रहा था जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि कबीर जीत कर ही लौटेगा। कबीर ने एक गहरी सांस ली और स्टेज पर चला गया। उस रात उसने परफेक्ट प्रेजेंटेशन नहीं दिया। बीच में उसकी आवाज भी कांपी। एक स्लाइड भी गलत खुल गई। लेकिन जब वह नीचे उतरा तो उसे पहली बार महसूस हुआ कि सबसे कठिन काम जितनातना [संगीत] नहीं था। सबसे कठिन काम डर के बावजूद पहला कदम उठाना था। यही डर हर इंसान की जिंदगी में अलग-अलग चेहरे पहन कर आता है। कभी वह फेलियर बनकर आता है। कभी लोगों की राय बनकर, कभी पैसे खोने का डर, कभी रिलेशनशिप टूटने का डर और सबसे खतरनाक अपने ही सपनों के लायक ना होने का डर। डर की सबसे बड़ी चाल यही है कि वह आपको रोकता नहीं। बल्कि आपको यकीन दिला देता है कि रुकना ही समझदारी है। यही कारण है कि लाखों लोग अपने सपनों को इसलिए नहीं छोड़ते क्योंकि वे असंभव हैं। वे उन्हें इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उनका माइंड हर दिन उन्हें एक झूठ सुनाता है। अभी सही समय नहीं है। थोड़ा और तैयार हो जाओ। जब कॉन्फिडेंस आएगा तब शुरुआत करना। लेकिन सच बिल्कुल उल्टा है। कॉन्फिडेंस पहले नहीं आता। एक्शन पहले आता है। कॉन्फिडेंस एक्शन का रिवॉर्ड है। कंडीशन नहीं। कबीर ने भी यही समझा। उसने महसूस किया कि वह सालों से प्रेजेंटेशन से नहीं डर रहा था। वह लोगों के जजमेंट से डर रहा था। उसे फेलियर से नहीं उस लेबल से डर लगता था जो लोग उसके नाम के साथ जोड़ सकते थे और जिस दिन उसने यह पहचान लिया। उसी दिन डर छोटा होने लगा। उसने अपने लिए एक नया रूल बनाया। हर दिन एक ऐसा काम करूंगा जिससे थोड़ा डर लगता है। पहले दिन उसने एक अनजान व्यक्ति से बात की। दूसरे दिन उसने अपनी टीम के सामने अपनी गलती स्वीकार की। तीसरे दिन उसने एक नया आईडिया शेयर किया जिसे वह महीनों से छिपा रहा था। धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि डर हर बार आता था। लेकिन हर बार थोड़ा कमजोर होकर लौटता था। क्योंकि डर अंधेरे की तरह है। जैसे ही आप उसके अंदर कदम रखते हैं, उसका आधा असर वहीं खत्म हो जाता है। कुछ महीनों बाद वही इन्वेस्टर इवेंट फिर से आयोजित हुआ। इस बार कबीर फिर उसी स्टेज के पीछे खड़ा था। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार भी उसका दिल तेज धड़क रहा था। लेकिन अब उसने मुस्कुराकर खुद से कहा, "डर का मतलब यह नहीं कि मैं रुक जाऊं। [संगीत] डर का मतलब है कि मैं कुछ बड़ा करने वाला हूं। वह स्टेज पर गया। इस बार उसकी आवाज में भरोसा था। उसकी आंखों में घबराहट नहीं, उद्देश्य था। प्रेजेंटेशन खत्म हुई। कुछ सेकंड तक पूरा हॉल शांत रहा। फिर अचानक जोरदार तालियां गूंज उठी। इन्वेस्टर्स खड़े होकर उसकी ओर बढ़े। लेकिन कबीर जानता था उसकी सबसे बड़ी जीत करोड़ों का इन्वेस्टमेंट नहीं था। उसकी सबसे बड़ी जीत उस [संगीत] अदृश्य जेल से बाहर निकलना था जिसमें वह सालों से कैद था। याद रखिए डर कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। लेकिन जब आपका सपना आपके डर से बड़ा हो जाता है तब डर आपका दुश्मन नहीं रहता [संगीत] बल्कि यह साबित करता है कि आप अपनी सीमाओं से आगे बढ़ रहे हैं। क्योंकि जिंदगी में सबसे बड़ा पछतावा असफल होना नहीं होता। सबसे बड़ा पछतावा यह होता है कि डर की वजह से आपने कभी कोशिश ही नहीं की। चैप्टर फोर फोकस इज योर ग्रेटेस्ट सुपर पावर। शहर की सबसे ऊंची इमारत की 28वीं मंजिल पर बैठा विवान अपने लैपटॉप की स्क्रीन को लगातार घूर रहा था। सुबह के सिर्फ 10:00 बजे थे। लेकिन उसके सामने पहले से ही 126 अनरीड ईमेल्स, दर्जनों नोटिफिकेशंस और पांच [संगीत] अलग-अलग प्रोजेक्ट्स खुले हुए थे। उसका फोन हर 2 मिनट में वाइब्रेट हो रहा था। वह एक काम शुरू करता बीच में मैसेज आ जाता। मैसेज का जवाब देते-देते उसे दूसरी [संगीत] मीटिंग याद आ जाती। मीटिंग के बीच किसी ने नया टास्क भेज दिया। शाम तक वह पूरे दिन बिजी रहा। लेकिन जब उसने अपनी टूडू लिस्ट [संगीत] देखी तो सबसे जरूरी काम अब भी अधूरा था। उसने कुर्सी पर सिर टिकाया और धीरे से कहा। मैं इतना काम करता हूं। फिर भी आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा? उसी शाम वह अपने पुराने कॉलेज के प्रोफेसर से मिलने गया। प्रोफेसर ने उसकी बातें ध्यान से सुनी। [संगीत] फिर बिना कुछ कहे उसे अपने स्टडी रूम में ले गए। कमरे में सिर्फ एक लकड़ी की मेज थी। उस मेज पर एक आवर्धक कांड [संगीत] यानी मैग्नीिफाइंग ग्लास रखा हुआ था। प्रोफेसर ने खिड़की से आती धूप को उस ग्लास के जरिए एक सफेद कागज पर केंद्रित किया। कुछ सेकंड बाद कागज से धुआं उठने लगा। फिर उसमें आग लग गई। प्रोफेसर मुस्कुराए और बोले सूरज की रोशनी पहले भी उतनी ही थी। लेकिन जब तक वह बिखरी हुई थी, उसने कुछ नहीं किया। जैसे ही वह एक जगह केंद्रित हुई, उसने आग [संगीत] पैदा कर दी। इंसान का माइंड भी बिल्कुल ऐसा ही होता है। विवान कुछ देर तक उस जलते हुए कागज को देखता रहा। उसे पहली बार एहसास हुआ। समस्या उसकी मेहनत नहीं थी। समस्या यह थी कि उसकी ऊर्जा हर दिशा में बिखरी हुई थी। आज की दुनिया हमें एक झूठ सिखाती है कि जितने ज्यादा काम एक साथ करोगे उतने ज्यादा प्रोडक्टिव [संगीत] बनोगे। लेकिन सच यह है कि मल्टीटास्किंग अक्सर बिजी बनाती है। सक्सेसफुल नहीं। हर बार जब आप एक काम छोड़कर दूसरे काम पर जाते हैं, आपका माइंड अपनी [संगीत] पूरी गति खो देता है। आपका ध्यान टूटता है। आपकी सोच बिखर जाती है और धीरे-धीरे आपको लगता है कि आप बहुत मेहनत कर रहे हैं। जबकि आपकी सबसे कीमती ताकत यानी आपका फोकस हर मिनट कमजोर हो रहा होता है। विवान ने अगले दिन एक अलग एक्सपेरिमेंट किया। उसने अपना फोन साइलेंट पर रखा। सोशल मीडिया बंद कर दिया। [संगीत] लैपटॉप पर सिर्फ एक ही विंडो खुली छोड़ी और खुद से कहा अगले 90 मिनट सिर्फ एक काम शुरुआत आसान नहीं थी हर कुछ मिनट में उसका हाथ फोन उठाने की कोशिश करता दिमाग बार-बार कहता बस एक नोटिफिकेशन देख लो लेकिन उसने खुद को रोका धीरे-धीरे उसका माइंड शांत होने लगा विचार पहले से ज्यादा साफ आने लगे जो काम पहले 4 घंटे में भी पूरा नहीं होता था वह अब डेढ़ घंटे में खत्म हो गया। उस दिन उसे समझ आया कि फोकस सिर्फ समय बचाने की कला नहीं है। फोकस सोचने की गुणवत्ता बदल देता है। अगले कुछ महीनों में विवान ने अपनी पूरी रूटीन बदल दी। उसने कम काम करना नहीं सीखा। उसने एक समय में सिर्फ एक काम करना सीखा। धीरे-धीरे उसके रिजल्ट्स बदलने लगे। उसकी परफॉर्मेंस बेहतर हुई। क्लाइंट्स [संगीत] बढ़े, स्ट्रेस कम हुआ और सबसे बड़ी बात अब उसे हर रात यह महसूस होता था कि उसने सच में कुछ मीनिंगफुल किया है। एक साल बाद उसी कंपनी की एनुअल मीटिंग में उसके नाम का ऐलान हुआ। उसे परफॉर्मर ऑफ द ईयर चुना गया। स्टेज पर जाते समय उसे प्रोफेसर की वही मैग्नीिफाइंग क्लास याद आई। उसे समझ आ गया। उसकी सफलता किसी नई स्किल की वजह से नहीं आई थी। वह इसलिए आई क्योंकि उसने अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को एक दिशा देना सीख लिया था। याद रखिए दुनिया में ओपोरर्चुनिटीज की कमी नहीं है। कमी है उस माइंड की जो एक समय में सिर्फ एक अपॉर्चुनिटी पर पूरी ताकत लगा सके। जब आपका ध्यान हर तरफ बढ़ जाता है तो आपकी क्षमता भी बढ़ जाती है। लेकिन जिस दिन आपका फोकस एक लेजर की तरह एक ही लक्ष्य पर टिक जाएगा उसी दिन आप ऐसे परिणाम पैदा करेंगे जिन्हें [संगीत] देखकर लोग टैलेंट कहेंगे। जबकि सच सिर्फ इतना होगा आपने अपने माइंड को भटकने नहीं दिया। चैप्टर फाइव कंसिस्टेंसी वंस व्हेन टैलेंट गिव्स अप शहर के सबसे बड़े मैराथन की सुबह थी। हजारों लोग स्टार्ट लाइन पर खड़े थे। कैमरे फ्लैश कर रहे थे। भीड़ तालियां बजा रही थी और हर चेहरे पर जीतने की इच्छा साफ दिखाई दे रही थी। उन्हीं लोगों के बीच एक दुबला पतला लड़का भी खड़ा था। ईशान उसके पास ना महंगे रनिंग शूज थे [संगीत] ना कोई प्रोफेशनल कोच। उसके कपड़े भी बाकी खिलाड़ियों जितने आकर्षक नहीं थे। कई लोग उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे। जैसे पहले ही तय कर चुके हो कि यह लड़का ज्यादा दूर नहीं जाएगा। लेकिन उन्हें एक बात नहीं पता थी। पिछले दो सालों से ईशान हर सुबह [संगीत] ठीक 5:00 बजे उठता था। चाहे ठंडी हवाएं चल रही हो, चाहे तेज बारिश हो, चाहे उसका मन बिल्कुल ना हो। वह दौड़ता था। कभी 5 कि.
मी. कभी सिर्फ दो। लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं था जब उसने खुद [संगीत] से किया हुआ वादा तोड़ा हो। उसके दोस्तों ने कई बार कहा इतनी मेहनत से क्या होगा? तुम्हारे पास टैलेंट ही नहीं है। ईशान हर बार सिर्फ मुस्कुरा देता क्योंकि उसे एक बात समझ आ चुकी थी। दुनिया टैलेंट की तारीफ करती है। लेकिन इतिहास हमेशा कंसिस्टेंसी लिखती है। रेस शुरू हुई। पहले 5 किलोमीटर में कई तेज धावक उससे बहुत आगे निकल गए। 10 कि.
मी. के बाद भी वह पीछे ही था। 20 कि. मी.
तक आते-आते कुछ रनर्स थकने लगे। किसी के पैर जवाब दे रहे थे। कोई पानी मांग [संगीत] रहा था। कोई धीरे-धीरे चलने लगा। लेकिन ईशान की स्पीड लगभग वैसी ही थी जैसी शुरुआत में थी। क्यों? क्योंकि उसने सिर्फ दौड़ना नहीं सीखा था। उसने लगातार दौड़ना सीखा था। जिंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही रेस है। शुरुआत में अक्सर सबसे तेज भागने वाले लोग [संगीत] आगे दिखाई देते हैं। वे अचानक मोटिवेशन से भर जाते हैं। नई किताबें खरीदते हैं। नई प्लानिंग करते हैं। नए गोल्स बनाते हैं। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनकी गति कम होने लगती है। [संगीत] फिर बहाने शुरू होते हैं। आज नहीं कल से अभी टाइम नहीं है और धीरे-धीरे सपना वहीं रुक जाता है। दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर दिन सिर्फ थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। उनकी प्रोग्रेस शायद किसी को दिखाई नहीं देती। लेकिन समय हमेशा उनके पक्ष में काम करता है। कंसिस्टेंसी का सबसे बड़ा जादू यही है। उसका असर एक दिन में नहीं दिखता। वह धीरे-धीरे आपकी आदतों में उतरती है। फिर आपकी आदतें आपके कैरेक्टर को बदलती हैं और एक दिन वही कैरेक्टर आपकी डेस्टिनी लिख देता है। ईशान को भी कभी-कभी दौड़ने का मन नहीं करता था। कई सुबह ऐसी थी जब उसका शरीर दर्द से भरा होता था। कई रातें ऐसी थी जब उसने सोचा क्या सच में यह सब करने का कोई फायदा है? लेकिन हर बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा। अगर आज रुक गया तो क्या मैं कल खुद की आंखों में देख पाऊंगा?
और हर बार जवाब एक ही था। नहीं। यही जवाब उसे फिर से ट्रैक पर ले आता। रेस अब अपने आखिरी 2 कि. मी. में पहुंच चुकी थी। भीड़ जोर-जोर से चिल्ला रही थी। जो धावक शुरुआत में सबसे आगे थे उनमें से कई अब पीछे छूट चुके थे। ईशान एक-एक करके सबको पार करता गया। फिनिश लाइन अब सामने थी। उसने अपनी आखिरी ताकत लगाई और कुछ ही सेकंड बाद वह फिनिश लाइन पार कर चुका था। पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा। उसने गोल्ड मेडल को हाथ में लिया। लेकिन उसकी आंखों के सामने मेडल नहीं था। उसे याद आ रही थी। वे सुबह जब कोई उसे देख नहीं रहा था। [संगीत] जब कोई ताली नहीं बजा रहा था। जब सिर्फ वह उसका अलार्म और उसका डिसीजन मौजूद था। उसे समझ आ गया। उसने रेस आज नहीं जीती। उसने रेस उन सैकड़ों सुबहों में जीती थी जब उसने हार मानने के बजाय उठना चुना था। याद रखिए सक्सेस किसी एक बड़े मोमेंट का नाम नहीं है। सक्सेस उन हजारों छोटे डिसीजंस का परिणाम है जो आप तब लेते हैं जब कोई आपको देख भी नहीं रहा होता। टैलेंट आपको शुरुआत दिला सकता है। लक आपको एक मौका दे सकता है। लेकिन अगर कोई चीज आपको मंजिल तक पहुंचाती है तो वह है कंसिस्टेंसी। [संगीत] क्योंकि अंत में जीत उसी की होती है जो रुकता नहीं। भले ही उसकी रफ्तार धीमी क्यों ना हो। चैप्टर सिक्स द सक्सेस माइंडसेट नेवर स्टॉप्स ग्रोइंग। शाम के 6:45 हुए थे। मुंबई के एक आलीशान होटल में देश के सबसे बड़े एंटरप्रेन्योर का एक एक्सक्लूसिव इवेंट चल रहा था। हॉल में बैठे हर इंसान की कहानी करोड़ों की थी। हर कोई किसी ना किसी कंपनी का फाउंडर, इन्वेस्टर या इंडस्ट्री लीडर था। लेकिन सबसे पीछे आखिरी रो में बैठा एक साधारण सा आदमी बार-बार अपनी छोटी सी नोटबुक में कुछ लिख रहा था। उसका नाम था वेदांत। उसके कपड़े बिल्कुल साधारण थे। कोई उसे पहचान नहीं रहा था। कई लोग उसे स्टाफ समझकर उसके पास से निकल गए। स्टेज पर एक सफल बिजनेस लीडर अपनी जर्नी सुना रहे थे। पूरा हॉल उनकी सक्सेस पर तालियां बजा रहा था। लेकिन वेदांत तालियां नहीं बजा रहा था। वह सिर्फ लिख रहा था। उसकी नोटबुक के हर पन्ने पर सिर्फ एक लाइन बार-बार दिखाई दे रही थी। मैं आज क्या नया सीख सकता हूं। ब्रेक के दौरान एक युवा एंटरप्रेन्योर उसके पास आया और मुस्कुरा कर बोला, सर आप स्पीकर हैं [संगीत] क्या?
वेदांत हंस पड़ा। नहीं मैं भी सीखने आया हूं। युवक ने हैरानी से पूछा। लेकिन आपकी उम्र तो लगभग 60 साल हो गई। अब भी सीखने की क्या जरूरत है? वेदांत [संगीत] कुछ पल चुप रहा। फिर उसने खिड़की के बाहर खड़े एक विशाल बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया। क्या तुम्हें लगता है कि यह पेड़ बढ़ना बंद कर चुका है? युवक ने कहा, शायद [संगीत] यह तो बहुत बड़ा हो चुका है। वेदांत मुस्कुराया। नहीं, इसकी जड़े आज भी फैल रही हैं। ऊपर से यह जितना मजबूत दिखता है, नीचे उतनी ही गहराई में बढ़ता रहता है। इंसान भी ऐसा ही है। जिस दिन सीखना बंद, उसी दिन बढ़ना बंद। उस एक वाक्य ने उस युवक को बिल्कुल शांत कर दिया। ज्यादातर लोग सक्सेस को एक मंजिल समझते हैं। वे सोचते हैं जब पैसा आ जाएगा [संगीत] तब सीखेंगे। जब बिजनेस बड़ा हो जाएगा तब आराम करेंगे। जब गोल पूरा हो जाएगा तब ग्रोथ की जरूरत नहीं रहेगी। लेकिन यही सोच इंसान को धीरे-धीरे पीछे धकेल देती है। दुनिया हर दिन बदल रही है। टेक्नोलॉजी बदल रही है। मार्केट्स बदल रहे हैं। लोगों की सोच बदल रही है। अगर आपका माइंड नहीं बदल रहा तो धीरे-धीरे आपकी सफलता भी रुकने लगेगी। वेदांत ने अपनी जिंदगी में एक अजीब रूल बनाया था। हर दिन सोने से पहले वह खुद से सिर्फ एक सवाल पूछता था। क्या मैं आज सुबह वाले इंसान से थोड़ा बेहतर हूं?
अगर जवाब हां होता तो वह चैन की नींद सोता। अगर जवाब नहीं होता तो अगले दिन का पहला काम सीखना होता। उसे कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि लोग उसे कितना सफल मानते हैं। उसे सिर्फ इस बात की चिंता रहती थी कि कहीं उसका माइंड सीखना बंद तो नहीं कर रहा। कुछ साल बाद वही युवा एंटरप्रेन्योर जिसने उससे सवाल पूछा था। अपनी कंपनी के साथ मुश्किल दौर से गुजर रहा था। इन्वेस्टर्स पीछे हट चुके थे। लॉस बढ़ता जा रहा था। टीम टूट रही थी। उसे लगा सब खत्म हो गया। तभी उसे वेदांत की नोटबुक याद आई। मैं आज क्या नया सीख सकता हूं। उसने हार मानने के बजाय सीखना चुना। उसने अपनी गलतियों का एनालिसिस किया। नई स्किल्स सीखी। बेहतर लोगों से सलाह ली, अपनी स्ट्रेटजी बदली। धीरे-धीरे कंपनी फिर खड़ी [संगीत] होने लगी। 2 साल बाद वही कंपनी करोड़ों की वैल्यू तक पहुंच गई। एक अवार्ड सेरेमोनी में जब उससे पूछा गया, "आपकी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ क्या है? वह मुस्कुराया और बोला, "मैंने कभी एक्सपर्ट बनने की कोशिश नहीं की। मैंने हमेशा स्टूडेंट बने रहने की कोशिश की।" हॉल [संगीत] तालियों से गूंज उठा और सबसे पीछे बैठा वेदांत आज भी अपनी वही छोटी नोटबुक में कुछ लिख रहा था क्योंकि उसे पता था जिस दिन इंसान को यह लगने लगे कि उसे सब कुछ पता है उसी दिन उसकी गिरावट शुरू हो जाती है। याद रखिए सक्सेस सिर्फ उन लोगों को नहीं मिलती जो मेहनत करते हैं। सक्सेस उन लोगों के साथ सबसे लंबे समय तक रहती है जो सीखना कभी बंद नहीं करते क्योंकि पैसा खोकर वापस कमाया जा सकता है। बिजनेस गिरकर फिर खड़ा किया जा सकता है। लेकिन अगर आपका सीखने वाला माइंड खो गया तो सबसे बड़ी दौलत भी आपको आगे नहीं ले जा सकती। इसलिए अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट किसी स्टॉक, प्रॉपर्टी या बिजनेस में नहीं। अपने माइंड में कीजिए। क्योंकि एक बढ़ता हुआ माइंड हर हार को लेसन हर चुनौती को ओपोरर्चुनिटी और हर नए दिन को एक नई शुरुआत बना देता है और यही वह मानसिकता है जो साधारण लोगों को असाधारण सफलता तक पहुंचाती [संगीत] है। चैप्टर से द पर्सन यू बिकम इज द रियल सक्सेस। रात के 11:40 हुए थे। पूरे शहर की लाइटें चमक रही थी। ऊंची इमारत की छत पर खड़ा अद्वैत नीचे फैले शहर को चुपचाप देख रहा था। कुछ ही घंटे पहले [संगीत] उसकी कंपनी को देश की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल किया गया था। मीडिया इंटरव्यू ले रही थी। लोग उसे ओवरनाइट सक्सेस कह रहे थे। लेकिन उस शोर से दूर वह अकेला खड़ा था। उसकी जेब में एक पुरानी मुड़ी टुड़ी तस्वीर थी। तस्वीर में एक छोटा सा किराए का कमरा था। टूटी हुई कुर्सी, पुरानी मेज और दीवार पर चिपका एक कागज जिस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी। एक दिन मैं खुद को साबित करूंगा। अद्वैत ने तस्वीर को देखा और उसकी आंखें भर आई। उसे याद आने लगा वह दिन जब उसके पास पैसे नहीं थे। वह दिन [संगीत] जब लोगों ने कहा था तुमसे नहीं होगा। वह दिन जब उसके सबसे करीबी दोस्त भी उसका साथ छोड़कर चले गए। और वह दिन भी जब उसने खुद आईने में देखकर कहा था। शायद सच में मैं इसके लायक नहीं हूं। लेकिन आज इतनी बड़ी सफलता मिलने के बाद भी उसके चेहरे पर सबसे ज्यादा खुशी किसी अवार्ड की वजह से नहीं थी। उसे खुशी इस बात की थी कि अब आईने में खड़ा इंसान वही नहीं था। यही वह सच है जिसे ज्यादातर लोग कभी समझ नहीं पाते। हम पूरी जिंदगी सक्सेस का पीछा करते रहते हैं। हम सोचते हैं जब बड़ा घर होगा। जब बैंक अकाउंट में करोड़ों होंगे। जब लोग हमारा नाम पहचानेंगे तब हम सफल कहलाएंगे। लेकिन अगर सफलता सिर्फ पैसा होती तो दुनिया के सबसे अमीर लोग हमेशा सबसे शांत और सबसे खुश होते। असलियत यह है कि बाहर की सफलता सिर्फ एक परिणाम है। सबसे बड़ी सफलता उस इंसान का निर्माण है जो उस परिणाम तक पहुंचता है। सोचिए अगर वही अद्वैत [संगीत] 5 साल पहले करोड़ों रुपए कमा लेता। लेकिन उसके अंदर डर, अहंकार, गुस्सा और अधैर्य वैसा ही रहता। तो [संगीत] क्या वह उस सफलता को लंबे समय तक संभाल पाता? शायद नहीं। क्योंकि इंसान उतना ही संभाल सकता है। जितना उसका [संगीत] कैरेक्टर संभालने लायक बन चुका होता है। सफलता पहले आपके बैंक बैलेंस को नहीं बदलती। वह आपके डिसीजन बदलती है। आपकी सोच बदलती है। आपका धैर्य बदलती है। आपकी आदतें बदलती हैं। और धीरे-धीरे आपकी पूरी पहचान बदल जाती है। अद्वैत की सबसे बड़ी जीत उसकी कंपनी नहीं थी। उसकी सबसे बड़ी जीत यह थी कि अब रिजेक्शन उसे तोड़ नहीं सकता था। क्रिटिसिज्म उसे रोक नहीं सकता था। फेलियर उसे डरा नहीं सकता था और सक्सेस [संगीत] उसे घमंडी नहीं बना सकती थी क्योंकि उसने अपने माइंड को परिस्थितियों से बड़ा बना लिया था। कुछ दिनों बाद एक कॉलेज ने उसे छात्रों को संबोधित करने के लिए बुलाया। एक छात्र ने खड़े होकर पूछा सर अगर आपको अपनी पूरी जर्नी सिर्फ एक वाक्य में बतानी हो तो आप क्या कहेंगे?
पूरा हॉल शांत हो गया। अद्वैत मुस्कुराया। उसने कुछ सेकंड तक सभी चेहरों को देखा और फिर धीरे से कहा मैंने सफलता का पीछा करना बहुत पहले छोड़ दिया था। मैंने खुद को बेहतर बनाना शुरू किया और फिर सफलता खुद मेरा पता ढूंढते हुए मेरे दरवाजे तक आ गई। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। लेकिन उन तालियों से भी ज्यादा गहरी आवाज हर उस इंसान के दिल में गूंज रही थी जो अपनी जिंदगी बदलना चाहता था। याद रखिए जिंदगी आपको हमेशा वही देती है। जिसके लिए आपका व्यक्तित्व तैयार होता है। अगर आप सिर्फ परिणाम बदलना चाहते हैं तो बदलाव कुछ समय का होगा। लेकिन अगर आप अपने विचार, अपनी आदतें, अपना अनुशासन, अपना साहस और अपना कैरेक्टर बदल देते हैं तो आपकी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। इसीलिए आज से सफलता के पीछे मत भागिए। हर दिन खुद का एक बेहतर वर्जन बनने की कोशिश [संगीत] कीजिए क्योंकि अंत में लोग आपकी दौलत नहीं याद रखते। वे याद रखते हैं कि आपने कितनीिंदगियों को प्रेरित किया, [संगीत] कितनी मुश्किलों में हिम्मत नहीं छोड़ी और कितनी बार गिरकर फिर उठ खड़े हुए। यही द साइकोलॉजी ऑफ सक्सेस का सबसे गहरा रहस्य है। सफलता कोई मंजिल नहीं है। सफलता वह [संगीत] इंसान है जिसमें आप हर दिन बदलते जाते हैं। फाइनल चैप्टर योर नेक्स्ट डिसीजन कैन चेंज योर लाइफ। रात के ठीक 12:00 बजे थे। पूरे शहर में नए साल का जश्न शुरू हो चुका था। आसमान रंग बिरंगी आतिशबाजियों से भर गया था। लोग एक दूसरे को गले लगाकर नई शुरुआत की शुभकामनाएं दे रहे थे। लेकिन उसी शहर के एक पुराने पुल पर एक आदमी अकेला खड़ा था। उसका नाम था निखिल। उसके हाथ में एक पुरानी [संगीत] डायरी थी। वह धीरे-धीरे उसके पन्ने पलट रहा था। पहले पन्ने पर लिखा था इस साल मैं अपनी जिंदगी बदल दूंगा। दूसरे पन्ने [संगीत] पर मैं रोज सुबह जल्दी उठूंगा। तीसरे पन्ने पर मैं अपना बिजनेस शुरू करूंगा। चौथे पन्ने पर मैं खुद पर विश्वास करना सीखूंगा। हर पन्ने पर एक सपना था। लेकिन हर सपने के नीचे एक खाली जगह थी। कोई तारीख नहीं। कोई पूरा हुआ गोल नहीं। सिर्फ अधूरे वादे। निखिल ने डायरी बंद की और खुद से पूछा। मैंने आखिर खोया क्या है?