आपका फ्री विल यानी आपकी खुद की इच्छा शायद से आपके हाथों में है ही नहीं। लेटेस्ट साइंटिफिक डिस्कवरीज के अनुसार अगर मैंने अपने हाथों में यह फोन लिया तो मुझे या आपको भले ही ऐसा लगे कि मैंने अपनी इच्छा से अपने हाथों में यह फोन लिया लेकिन शायद यह इच्छा, यह मर्जी, यह फ्री विल बस एक छलावा है। और असली फ्री विल तो हमारे हाथों में है ही नहीं। मतलब मैंने अपनी मर्जी से यह हाथ में लिया ही नहीं है। कुछ ऐसा ही दावा कर रहे हैं लेटेस्ट साइंटिफिक डिस्कवरीज। दिमाग चकराने वाली बात है। राइट?
बट एज यू नो साइंटिस्ट बिना कोई सबूत के बिना प्रूफ के हवे में तीर तो नहीं छोड़ते। तो किन सबूतों के आधार पर वो इतने बड़े दावे कर रहे हैं? [संगीत] अभी हाल ही में कुछ एक्सपेरिमेंट्स ने दिमाग घुमाने वाले खुलासे किए। जब भी हम कॉन्शियसली सोच समझकर कोई भी एक्शन लेते हैं। जैसे मैंने मोबाइल हाथ में उठाने वाला एग्जांपल दिया था। तो इस एक्शन को परफॉर्म करने का जो सबसे पहला ख्याल यानी कि थॉट हमारे माइंड में आता है ना उस पहले ख्याल से भी एटलीस्ट आधे सेकंड पहले हमारा दिमाग ऑलरेडी यह डिसाइड कर
चुका होता है कि वो हमसे क्या करवाने वाला है। यानी कि सिंपली पुट आपने जब कॉन्शियसली कोई डिसीजन लिया तो उससे एटलीस्ट आधे सेकंड से लेकर 5 सेकंड पहले तक आपका दिमाग सबकॉन्शियसली ऑलरेडी वो डिसीजन आपके लिए ले चुका होता है। और आप जो फ्री विल यानी खुद की मर्जी एक्सपीरियंस करते हो ना, आप खुद 100 अलग-अलग ऑप्शंस में से चूज़ करके डिसाइड कर रहे हो कि कौन सा एक्शन लेना है, वो महज बस एक फॉर्मेलिटी जैसी होती है। सो अब मेन सवाल यहां पर यह आता है कि हम खुद अपने दिमाग को कंट्रोल नहीं
कर रहे क्या? तो एकदम फंडामेंटल लेवल पर हमारे दिमाग में जो इलेक्ट्रिकल फायरिंग्स हो रही है, उसे कौन कंट्रोल कर रहा है? वेल, इससे भी गहरी चीज तो यह है कि एक कॉन्शियसनेस यानी कि चेतना जिसके वजह से हमें फ्री विल का एहसास भी होता है। वही आखिर क्या है? इंसानी शरीर एक बायोलॉजिकल मशीन है। राइट? तो क्यों हम खुद को जिंदा महसूस कर पाते हैं? यानी कि हमें हमारे वजूद का और इस दुनिया का भी एहसास हो पाता है। जबकि कोई और मशीन जैसे कि ये फोन वही एहसास नहीं कर पाती। एंड व्हाट अबाउट
पेड़ पौधे या मछलियां? क्या वह भी कॉन्शियस है, सचेत है या फिर माइक्रो ऑर्गेनिज्म्स जैसे कि बैक्टीरिया और वायरस जिनका तो दिमाग भी नहीं है तो क्या उन्हें भी कॉन्शियस बुलाया जा सकता है? और क्या उनमें भी फ्री विल होता है? वेल इन्हीं सभी सवालों के जवाब दे पाने के लिए ना हमें एकदम फंडामेंटल यानी कि बेसिक लेवल पर समझना होगा कि ये कॉन्शियसनेस कि आखिर होता क्या है इन द फर्स्ट प्लेस? क्योंकि इसे लेकर बहुत सारे रोंग और अंधविश्वासी कांसेप्ट्स हैं। क्या यह कॉन्शियसनेस कोई मेटाफिजिकल या स्पिरिचुअल चीज है जिसे हम देख और मेजर
नहीं कर सकते या फिर यह एक फिजिकल क्वांटिटी है जिसे पॉइंट आउट करना या मेजर कर पाना बिल्कुल पॉसिबल है। इंटरेस्टिंग क्वेश्चन राइट आई एम श्योर आपके दिमाग में भी यह सवाल कभी ना कभी जरूर आया होगा। सो हमारे खोज की कहानी शुरू होती है आज से दो दशक पहले जब दो वर्ल्ड फेमस न्यूरो साइंटिस्ट क्रिस्टॉफ कोच और जलियू टोनोनी कॉन्शियसनेस को गहरे स्तर पर समझने की कोशिश कर रहे वह बेसिकली यह समझना चाहते थे कि एक कॉन्शियसनेस क्रिएट ही कैसे होता है दिमाग में। उनके नजरिए में क्योंकि कॉन्शियसनेस एक एहसास है जो किसी तरह
शरीर में क्रिएट हो रहा है। तो इस क्वांटिटी को हम किसी तरह मेजर कर पाने चाहिए। और इसीलिए इन्होंने कॉन्शियसनेस को समझने के लिए एफएमआरआई, पेट स्कैन, ईजी जैसे अलग-अलग ब्रेन स्कैनिंग इक्विपमेंट्स का इस्तेमाल करना शुरू किया दिमागी एक्टिविटीज को मेजर करने के लिए। बेसिकली कॉन्शियसनेस को एक्सप्लेन करने के लिए उन्होंने एक थ्योरी बनाई थी कॉल्ड इंटीग्रेटेड इंफॉर्मेशन थ्योरी। जो थ्योरी एक बहुत ही अजीब प्रेडिक्शन कर रही थी जिसे वो एक्सपेरिमेंट करके टेस्ट करना चाहते थे। सो इस थ्योरी के अनुसार हमारी इंद्रियां यानी कि हमारे सेंसरी ऑर्गन्स जितना भी इंफॉर्मेशन अंदर लेते हैं ब्रेन में
उसकी प्रोसेसिंग होने के बाद फाइनल आउटपुट इनिशियली अंदर लिए गए टोटल इनपुट इनेशन से ज्यादा ही होना चाहिए। और अगर वो ज्यादा निकलती है तो यही एक्स्ट्रा इंफॉर्मेशन जो प्रोसेसिंग के वक्त ऐड ऑन हुई है वही जन्म देती होगी हमारे थॉट्स, आइडियाज, इंट्यूशन और अवेयरनेस जिसे एब्स्ट्रैक्ट पहलुओं को जिन्हें ही हम एक कॉन्शियस एक्सपीरियंस या कॉन्शियसनेस कहते हैं। सो क्या स्कैन्स में वही पैटर्न्स नजर आए जो उन्होंने प्रेडिक्ट किए थे? वेल एब्सोलुटली वो सही थे। कॉन्शियसनेस को एक तरह से मेजर उन्होंने कर लिया। बट यह तो सिर्फ शुरुआत थी। एक बहुत ही इंटरेस्टिंग खोज की।
सो उन्होंने बेसिकली यह देखा था कि जब भी वह पार्टिसिपेंट्स को कुछ टास्क दे रहे थे, तो जितनी इंफॉर्मेशन उनके ब्रेन में इनपुट हो रही थी, उसके टोटल अमाउंट से ज्यादा इंफॉर्मेशन ब्रेन में पैदा हो रही थी। और जब उन्होंने देखा कि एक्टिविटी दिमाग के किन-किन हिस्सों में ज्यादा हो रही थी, तो पता चला इसमें दिमाग के चार मेजर हिस्से इनवॉल्व थे। लॉजिकली सोचने वाला और फ्यूचर विजुअलाइज करने वाला प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स। पास्ट में मिले रिवॉर्ड्स और पनिशमेंट से सीखने वाला स्ट्राइएटम और सेंसरी ऑर्गन से मिली इंफॉर्मेशन और हमारे शरीर की खुद की पोजीशन को साथ
मिलाकर सेंस बनाने वाला हिस्सा पेराइटल कॉर्टेक्स और थैलेमस। ये चार हिस्सों में उन्होंने देखा इंफॉर्मेशन एक्स्ट्रा जनरेट हो रहा है और एक्टिविटी बहुत ज्यादा हो रही है। तो इसका मतलब इन चार मेजर हिस्सों का जो कॉम्प्लेक्स इंटरप्ले चलता है वही कॉन्शियसनेस यानी कि चेतना और उसके अलग-अलग पहलुओं को जन्म देता है इन अ वे। लेकिन सिर्फ ब्रेन में हो रहे इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी से तो हम पूरी तरीके से कॉन्शियसनेस को एक्सप्लेन नहीं कर सकते। राइट? आई मीन आप फोन या कंप्यूटर का ही एग्जांपल ले लो। इसमें भी तो डिफरेंट हार्डवेयर्स के बीच में इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी और
इनेशन ट्रांसफर होता है। बट हम यह तो नहीं कहते ना कि कंप्यूटर कॉन्शियस है। एग्जांपल के तौर पे एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट करते हैं। आपकी नजरें स्क्रीन पर रखना और जरा देखना कि उसमें क्या लिखा हुआ है। अब उसे जरा एक-दो सेकंड तक ऑब्जर्व करना और मुझे बताना कि दिमाग में क्या पिक्चर बनता है। कुछ ऐसा पिक्चर बना होगा। राइट? बट मैंने तो सिर्फ वर्ड ऑक्टोपस ही लिखा था। राइट? तो ऑक्टोपस का यह आईडिया आपके दिमाग में कैसे बना? क्लियरली ऑक्टोपस फिजिकली तो आपके दिमाग में प्रेजेंट नहीं है। राइट? और इवन स्क्रीन पे भी नहीं
था। स्क्रीन में तो बस सिर्फ वो रिटन वर्ड था। इस फिक्शनल आईडिया ने आपके दिमाग में जन्म आखिर कैसे लिया? और इसी फिक्शनल आईडिया ने फिर आपके दिमाग में एक सब्जेक्टिव एक्सपीरियंस भी क्रिएट किया। अब इसी तरह एक और एक एक्सपेरिमेंट करते हैं। अब की बार अपनी आंखें बंद करना जरा और इमेजिन करो कलर रेड। क्या आप रेड कलर को दिमाग में इमेजिन कर पा रहे हो? सो सब कुछ ब्लैक होते हुए भी आप रेड कलर के आईडिया को अपने दिमाग में क्रिएट कर पा रहे होंगे। अब माइंड यू ये पूरा एक्सपीरियंस सिर्फ और सिर्फ
आपके दिमाग में हो रहा है। जबकि यह फिजिकल रियलिटी में है ही नहीं। तो यह सब्जेक्टिव एक्सपीरियंस ही कॉन्शियसनेस है। वो आइडिया अपने शरीर में हो रहे सेंसेशंस का या फिर बाहर दिखे किसी चीज के परसेप्शन का को ही कॉन्शियसनेस कहते हैं। वो आईडिया जो कि इलेक्ट्रिकल एक्टिविटीज हमारे दिमाग में जनरेट कर रही है ना कि वही इलेक्ट्रिकल एक्टिविटीज खुद। सो क्लियरली यह इंटीग्रेटेड इनफेशन थ्यरी जो कि कॉन्शियसनेस पर वन ऑफ दी लीडिंग साइंटिफिक थ्यरीज है यह भी अनफॉर्चूनेटली कहीं ना कहीं कॉन्शियसनेस को पूरी तरीके से डिफाइन नहीं कर पाती। कॉन्शियसनेस इज नॉट ओनली इनेशन
या इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी इनसाइड द ब्रेन। इट इज अ कंप्लीट एक्सपीरियंस सेंसेशंस अपने बॉडी में और परसेप्शनंस बाहर की दुनिया का जो एक जीव महसूस करता है, लिव करता है जो उसे कॉन्शियस बनाता है। अब एक और एक काफी इंटरेस्टिंग एक्सपेरिमेंट है जिससे आपको कॉन्शियसनेस के विचित्रपन का अंदाजा लगेगा। इसमें एक एक्सपेरिमेंटर पहले एक रबर का हाथ आपके आंखों के सामने रखता है। फिर एक कपड़ा और एक कार्डबोर्ड से आपके असली हाथ को छुपाता है। देन वो आपके उस छुपाए हुए हाथ और उस रबर के हाथ को एक साथ स्टिमुलेट करता है ताकि आपका दिमाग उस
नकली हाथ को अपना शरीर का एक अंग मांगने लग जाए। डू यू फील दिस? यस। डू यू फील दिस? यस। एंड देन जैसे ही कनेक्शन एस्टैब्लिश हो जाता है वो आपके साथ ये करता है। [संगीत] यू आर गुड डोंट वरी क्या आपने देखा इट इज लिटरली क्रेजी जिस तरह से हमारा दिमाग हमारे लिए एक झूठा पेन एक झूठी रियलिटी ही बून देता है। दर्द हमारे शरीर में नहीं है। बस वो हमारे दिमाग में है। वंस अगेन। सो, कॉन्शियसनेस इज मोर लाइक एन आइडिया एन ऑपरेटिंग सिस्टम इंसाइड योर ब्रेन दैट इज बीइंग क्रिएटेड ड्यू टू दी
हार्डवेयर ऑफ योर ब्रेन। अब आपको तो मेरे बारे में पता ही है। गेट सेल्फ फ्लाई में हम कभी भी जवाब नहीं पता होने सेड ही नहीं होते। रात को नींद ही नहीं आती। इसीलिए हम जितना हो सके डीप में घुसते हैं सच्चाई की खोज में। और तभी मेरे दिमाग में एक सवाल आया कि अगर हमें कॉन्शियसनेस को सच्ची में एकदम फंडामेंटली समझना है तो हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि कॉन्शियसनेस का जन्म ही आखिर कहां और क्यों हुआ था इन द फर्स्ट प्लेस। क्योंकि क्लियरली अगर आप दुनिया भर में नजर फिराओगे तो हर एक
जीव की जो भी विशेषता आज वो पोज़ेस करता है उस विशेषता से उसे किसी ना किसी प्रकार का कोई ना कोई सर्वाइवल एडवांटेज जरूर मिलता है। इसी वजह से वो ट्रेट इवॉल्व हुआ और कभी विलुप्त नहीं हुआ। इसे ही नेचुरल सिलेक्शन का लॉ कहते हैं। तो कॉन्शियसनेस से भी किसी जीव को किसी ना किसी प्रकार का फायदा जरूर मिला होगा। ओवर वो जीव जिनके पास कॉन्शियसनेस नहीं है। यानी नॉन कॉन्शियस लाइफ कॉन्शियस लाइफ में तभी तब्दील हो पाई जैसे ही उन्हें कॉन्शियस होने से सर्वाइवल में एडवांटेज मिलने लगा। इस गु्थी को अगर हमने सुलझा दिया
ना तो हम कॉन्शसनेस का जन्म क्यों हुआ था? उसे समझ के हम फंडामेंटली यह समझ पाएंगे कि कॉन्शियसनेस नाम की मिस्टीरियस और यूनिक चीज आखिर है ही क्या? क्या इसे साइंस एक्सप्लेन भी कर सकता है या सिर्फ स्पिरिचुअलिटी से ही हम इसे समझ सकते हैं और इवन यह भी कि क्या सिर्फ हम में ही या फिर वो सूक्ष्म जीवों में भी कॉन्शियसनेस है और अल्टीमेटली क्या हम जैसे सचेत जीवों में क्या वाकई में वो फ्री विल वो हमारी खुद की मर्जी भी है क्या या फिर फ्री विल महज बस सिर्फ एक छलावा है तो देखो
कॉन्शियसनेस का जन्म ना मोस्टली सभी साइंटिस्ट ही एग्री करते हैं एक बेसिक नीड की वजह से हुआ था एक जानवर ताकि खुद को फूड यानी कि एनर्जी के पास स्वयं लेकर जा सके और उसे कंज्यूम कर सके। अगर आप एकदम बेसिक जीव देखोगे ना जैसे बैक्टीरिया हो गए। यह कॉन्शियसली अपने मोशन या डायरेक्शन को फूड की आशंका के हिसाब से डायरेक्ट नहीं कर सकते। और इन्हें अगर देखा जाए तो एक्चुअली में इस चीज की इतनी जरूरत भी नहीं है क्योंकि इनकी एक्सट्रीमली एक्सट्रीमली ज्यादा तादाद और इनके इस रैंडम बिहेवियर की वजह से इन्हें फूड आसानी
से मिल जाता है और आज तक ये बिलियंस ऑफ इयर्स से सर्वाइव और रिप्रोड्यूस भी कर पा रहे हैं। जो कि किसी भी लिविंग ऑर्गेनिज्म का बाय द वे अकॉर्डिंग टू बायोलॉजी अल्टीमेट गोल होता है। सर्वाइव करो और अपनी कॉपीज बनाओ। अब सर्वाइव करने के लिए इन्हें अपने आसपास के वातावरण में हो रहे इंटरेक्शंस से पॉजिटिव और डैमेजिंग इंटरेक्शंस को भी आइडेंटिफाई करने की एबिलिटी होना जरूरी है। जैसे फॉर एग्जांपल किसी केमिकल से इनका पाला पड़ता है जो कि सेल के लिए सही नहीं है तो वो डिस्ट्रक्टिव हो सकता है और सेल को खत्म कर
सकता है। या फिर कोई फूड सोर्स है तो वो एक पॉजिटिव इंटरेक्शन हो सकता है। तो उस फूड सोर्स से उन्हें इंटरेक्ट करना चाहिए। और यहीं से कॉन्शियसनेस इवॉल्व होना स्टार्ट हुआ एकदम बेसिक लेवल पर जो कि शुरुआत में बस सिर्फ एक रिफ्लेक्स एक्शन की तरह था। यानी कि जैसे ही सिंपल एनिमल्स को कुछ एनवायरमेंटल ट्रिगर मिलता उसका एक रिस्पांस बिहेवियर क्रिएट होता जो डिपेंडिंग अपॉन आउटकम धीरे-धीरे इस तरह से कोऑर्डिनेट होने लगा कि ऐसे सेल्स डेवलप होने लगे जो पॉजिटिव ट्रिगर पर एक पर्टिकुलर बिहेवियर रिपीट करने का रिएक्शन देते और गलत ट्रिगर को अवॉइड
करने के लिए एक अलग रिएक्शन देते। जैसे फॉर एग्जांपल इस वन ऑफ द मोस्ट सिंपल एनिमल सेल ट्राइकोप्लेक्स एेररेंस का एग्जांपल ले लो जो कि फूड के नजदीक जाते ही स्लो हो जाता है और फूड नहीं मिलने पर तेजी से इधर-उधर दौड़ने लगता है। इसे हम कॉन्शियसनेस का लेवल वन कह सकते हैं। बट जैसे-जैसे जानवर और कॉम्प्लेक्स होते गए। जैसे अगर हम बात करें थोड़े और कॉम्प्लिकेटेड जीव, फिशेस और रेप्टाइल्स की, तो इन्हें अपने खाने की तरफ खुद स्वयं जाने की जरूरत होती है और खुद खाना ना बने इसीलिए शिकारियों से दूर भागने की। तो
ऐसे में क्लियरली सिर्फ रिफ्लेक्स एक्शंस ही काफी नहीं है। जरूरत है इंफॉर्मेशन स्टोरेज की जिससे वो जीव याद रख सके और अंदाजा लगा सके कि कौन से बिहेवियर्स रिवॉर्डिंग है और कौन से बिहेवियर्स पनिशिंग होंगे। अब ये इंफॉर्मेशन स्टोरेज एक फीलिंग एक सेंसेशन के रूप में होने लगा जिससे कि वो जीव पहले से ही फील या महसूस कर पाए कि किसी पर्टिकुलर बिहेवियर में इनवॉल्व होना चाहिए या फिर नहीं। जैसे एक मछली दूसरी बड़ी मछली को देखकर एक फियर का सेंसेशन फील करती है और अवॉइड करती है उस डायरेक्शन में जाने से और फूड को
देखकर एक पॉजिटिव सेंसेशन फील करती है। लेवल वन कॉन्शियसनेस में जैसे हमने जाना कोई सेंसेशन कोई एक्सपीरियंस नहीं है। यानी कि कॉन्शियसनेस एज वी नो इट बिल्कुल भी नहीं है। बट लेवल टू में यह एक्सपीरियंस एकदम बेसिक स्टेज में डेवलप होना शुरू हो गया था। बट यहां तक भी यह जीव जो पानी में रहते हैं या इवन रेप्टाइल्स दुनिया को उस तरह से फिर भी एक्सपीरियंस नहीं कर पा रहे थे जिस तरह से हम दूसरे मैमल्स और इवन बर्ड्स आज करते हैं। यू सी आज से बस सिर्फ कुछ ज्यादा नहीं। 200 मिलियन सालों पहले कॉन्शियसनेस
के एवोल्यूशन में एक बहुत बड़ा माइलस्टोन आया। इतना बड़ा कि बस कुछ 100 या हजार सालों में एकदम से ऐसे जीव डिवेप होने लगे जो कॉन्शियसनेस में काफी एडवांस थे। इसके पीछे दो बहुत ही अहम रीज़ंस थे। नंबर वन, जैसे ही लाइफ समुद्र से बाहर निकली, वार्म ब्लडेड एनिमल्स पैदा होना शुरू हुए। अब जहां पर कोल्ड ब्लडेड एनिमल्स जिसकी क्रोकोडाइल्स या फिश की बॉडीज टोटली एनवायरमेंट और उसके तापमान पर ही डिपेंडेंट रहती है। तो उन्हें कोई जरूरत ही नहीं थी खुद को एक अलग एंटिटी, एक अलग बॉडी समझने की। जो कि कॉन्शियसनेस का एक बहुत
ही इंपॉर्टेंट रेट है। बिकॉज़ कॉन्शियसनेस का दूसरा नाम ही तो मैं है। मैं जो इस दुनिया को महसूस कर पा रहा हूं और खुद को महसूस कर पा रहा हूं। बट जैसे ही वार्म ब्लडेड एनिमल्स आए वो अपने शरीर को ही खुद एक चलता फिरता एनवायरमेंट बनाने लगे। बाहर चाहे जो भी तापमान हो अनलाइक कोल्ड ब्लडेड एनिमल्स जो अगर बाहर ठंड है तो अपने टेंपरेचर को भी कूल डाउन करके सुस्त हो जाएंगे। यह वार्म ब्लडेड एनिमल्स इवन अगर बाहर 20 डिग्री टेंपरेचर भी चल रहा है तो भी अपने शरीर का तापमान वो 37 से 38
डिग्री सेल्सियस ही रखेंगे। इस बदलाव ने उन्हें दूसरे जानवरों की तुलना में ज्यादा इंडिविजुअलिटी और सेंस ऑफ सेल्फ डेवलप करने में हेल्प किया। वो अपने शरीर को अपने एनवायरमेंट से डिफरेंशिएट कर पाने लगे। नंबर टू, जैसे ही वार्म ब्लडेड एनिमल्स में शरीर का तापमान इनक्रीस हुआ, नर्व सेल्स और न्यूरॉन्स की ट्रांसफर स्पीड्स एटलीस्ट तीन गुना ज्यादा बढ़ गई। इससे ब्रेन के न्यूरॉन्स में फास्टर फीडबैक लूप्स क्रिएट होने लगे जो कि फटाफट सारे सेंसरी ऑर्गन्स से मिले डेटा को प्रोसेस करके वो यूनिक सेंसरी एक्सपीरियंस क्रिएट करने लगा जिसे आज हम कॉन्शियसनेस कहते हैं। और इसीलिए कॉन्शियसनेस
हमारे लिए सिर्फ ब्रेन में वो इंफॉर्मेशन प्रोसेसिंग नहीं है बल्कि वो पूरा मेंटल एक्सपीरियंस है जो हमारी बायोलॉजी आज सपोर्ट कर पा रही है हमारे करोड़ों सालों के एववोल्यूशन की वजह से। यस, बैक्टीरिया और प्लांट्स भी कॉन्शियस है। बट उनका कॉन्शियसनेस हमारे कॉन्शियसनेस से बहुत ही डिफरेंट है। उनके कॉन्शियसनेस में वो एक्सपीरियंस, वो रंगीन सेंसेशंस और मीनिंग नहीं है जो ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड लाइफ में है। और उन्हें शायद हमारे लेवल के कॉन्शियसनेस की जरूरत भी नहीं है अपने सर्वाइवल के लिए। जैसे-जैसे ब्रेन और न्यूरल सर्किटरी किसी जीव की कॉम्प्लिकेटेड होती जाती है, उसी के साथ उस
जीव के कॉन्शियसनेस का एहसास, वो एक्सपीरियंस, वो मीनिंग, वो सेंसेशंस, वो परसेप्शंस और भी ज्यादा डीपर और रिचर होते जाते हैं। कॉन्शियसनेस न्यूरॉन्स के कलेक्टिव स्टोर डेटा और एक्सटर्नल सेंसरी इनपुट्स का एक मैथमेटिकल वैल्यू है जो जितना ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड उतना रिचर एक्सपीरियंस देता है। अगर मैथमेटिकली देखा जाए तो कॉम्प्लेक्सिटी से डायनामिक और केओटिक सिस्टम्स बनते हैं जो मैथमेटिकल अट्रैक्टर्स का काम करते हैं। यानी कि बेस्ड ऑन सेंसरी इनपुट कॉन्स्टेंटली डायनेमिक वैल्यूस क्रिएट करते हैं जिसे ही हम डायनामिक एक्सपीरियंस के रूप में फील करते हैं और जिसे ही हम कॉन्शियसनेस बुलाते हैं। अब याद रखना कॉन्शियसनेस
का जन्म ही क्यों हुआ था इन द फर्स्ट प्लेस। एक बॉडी को अपने एनर्जी सोर्स तक प्रोएक्टिवली लेकर जा पाने के लिए। और इसी वजह से आज करोड़ों सालों के न्यूरोलॉजिकल एवोल्यूशन के बाद भी हमें फ्री विल महसूस होता है। हमें ऐसा फील होता है कि हम अपने मर्जी के मालिक हैं कि हम कॉन्शियसली अपनी मर्जी से एक पर्टिकुलर एक्शन को करने का चूज़ करते हैं। जहां मन चाहे वहां पर हम जा पाने का, अपने आप को डायरेक्ट कर पाने का हम चूज़ करते हैं। ऐसा महसूस होता है ना? मगर यहां पर अब आता है
एक दिल तोड़ने वाला ऑब्जरवेशन। एक ऐसा ब्रेन एक्सपेरिमेंट जो कि कई बार कई साइंटिस्टों द्वारा रिपीट किया गया। फिर भी रिजल्ट्स हमेशा यही निकले कि हमारे पास कॉन्शियसनेस तो है मगर शायद वो फ्री विल नहीं जो हमें महसूस होता है कि हमारे पास है। शॉकिंग राइट? एक्सपेरिमेंट में आखिर इन्होंने ऐसा क्या डिस्कवर किया? वेल 1980 में बेंजामिन लिबेट ने कुछ पार्टिसिपेंट्स के दिमागी एक्टिविटीज को मेजर करने के लिए उनके सर पर ईजी मशीन के इलेक्ट्रोड्स लगवाए। उन पार्टिसिपेंट्स को एकदम रैंडमली अपना हाथ हिलाना था जब भी उनकी मर्जी हो। इसी दौरान लिवट ने एक इंटरेस्टिंग
ऑब्जरवेशन नोट किया। जब भी कोई पार्टिसिपेंट कॉन्शियसली अपने हाथ को हिलाता उससे कुछ ऑन एन एवरेज आधे सेकंड पहले ईजी मशीन ब्रेन एक्टिविटी को कैद कर लेता था। यानी कि ब्रेन के जो अनकॉन्शियस पार्ट्स हैं वो पहले से ही लाइट अप हो जाते और फिर आधे सेकंड बाद कॉन्शियस पार्ट्स को खबर पड़ती और इवन तभी जाके उस इंसान को खुद भी पता चलता था वो इंसान खुद भी कॉन्शियस होता था कि उसने वो एक्शन परफॉर्म करने का डिसीजन लिया। मतलब एक तरह से अनकॉन्शियस एक्टिविटीज दिमाग में एक्शंस को जन्म दे रही है। कॉन्शियस एक्टिविटीज को
जन्म दे रही है और ना कि कॉन्शियस दिमाग जैसे कि हमें फील होता है। हमें लगता है कि हम कॉन्शियसली डिसीजंस ले रहे हैं। लेकिन हमारे अनकॉन्शियस ब्रेन प्रोसेससेस का मेजर रोल होता है यह डिक्टेट करने में कि एक्शन क्या होगा। अब यह माइंड ब्लोइंग था। लिबेट को खुद इस पर बिलीव नहीं हो रहा था। और उन्होंने सोचा कि हो ना हो ऐसा होता होगा कि हमारा अनकॉन्शियस दिमाग डेफिनेटली काफी हद तक एक्शन को इन्फ्लुएंस करता होगा। एक इंपल्स सा क्रिएट करता होगा। लेकिन हमारे कॉन्शियस दिमाग के पास अल्टीमेट पावर होती है कि उस एक्शन
को एक्सेप्ट या रिजेक्ट करने की। जैसे फॉर एग्जांपल अगर आपका अनकॉन्शियस माइंड एक स्ट्रांग इंपल्स क्रिएट करता है Instagram खोलने का। बट वहां पर आपका कॉन्शियस ब्रेन विल पावर की मदद से उस इंपल्स को रिजेक्ट कर सकता है। या फिर नहीं भी वो फाइनल अथॉरिटी आपके कॉन्शियस ब्रेन के पास है। यह एक्सप्लेनेशन कन्वीनिएंट इसीलिए है क्योंकि हमारा फ्री विल में दोबारा से विश्वास रीस्टेट कर देता है। बट क्या मामला वाकई में इतना सिंपल है। आई मीन थोड़ी और गहराई में जाने से एक कंप्लीटली न्यू दुनिया आ जाती है जो उस न्यूरॉन्स की दुनिया से भी
ज्यादा फंडामेंटल है। मैं बात कर रहा हूं क्वांटम मैकेनिक्स की दुनिया की जिससे ही यह न्यूरॉन्स और ब्रेन की बायोलॉजी उत्पन्न होती है। जिससे ही हमारा कॉन्शियसनेस और हमारी साइकोलॉजी इमर्ज होती है। चलिए समझते हैं क्वांटम मैकेनिक्स और हमारे दिमाग में हो रहे क्वांटम इंटरेक्शंस का क्या खुलासा है। क्योंकि यह हमारी दुनिया की सबसे फंडामेंटल रियलिटी है। चलिए समझते हैं क्वांटम लेवल पर क्या हमारे पास फ्री विल वाकई में है या फिर नहीं। वेल, आज से करीब 100 साल पहले क्वांटम मैकेनिक्स के वन ऑफ दी फाउंडिंग फादर्स सर रजर पेन्रोस ने कॉन्शियसनेस के पीछे के
फिजिक्स को पेश किया था। एंड ट्रस्ट मी यह तो उसके बायोलॉजी से भी ज्यादा इंटरेस्टिंग है। और अभी रिसेंटली हमें कई माइंड ब्लोइंग एक्सपेरिमेंटल प्रूफ्स भी मिले हैं। दरअसल कॉन्शियसनेस के फिजिक्स को लेकर अपनी किताब एपररर्स न्यू माइंड में पेन्रोस ने एक काफी सिंपल मगर इंटरेस्टिंग आर्गुमेंट दिया था। उनका अपनी किताब में यह कहना था कि ब्रह्मांड की वो सारी चीजें जो हमें पता ही नहीं एक्सिस्ट करती है और ना ही उसे मैथमेटिकली प्रूफ किया गया है। वो सारी चीजें या आइंस्टाइन वगैरह जैसे तेज तर्रार फिजिसिस्ट के दिमाग में पहले से ही ये कैसे इमेजिन
कर लेते हैं। हो ना हो हमारे दिमाग में जो सिग्नल्स दौड़ते हैं वो किसी कंप्यूटर की तरह एक सेट एल्गोरिदम के हिसाब से या एक सेट पैथ से नहीं गुजरते होंगे। जो सेट पैथ या सर्किट हमारे एववोल्यूशनरी पास्ट के वजह से बनी थी। हमारे दिमाग के सर्किट्स में डेफिनेटली कुछ ना कुछ रैंडमनेस का तो रोल जरूर होगा। इसमें कहीं ना कहीं क्वांटम मैकेनिक्स का तो रोल जरूर होना चाहिए। अब देखो ये स्टेटमेंट एक फिजिसिस्ट के मुंह से आना काफी बोल्ड था क्योंकि उनके पास इसे प्रूफ करने के लिए कोई एविडेंसेस नहीं थे। और ये इजीली
होम्सियन फैलेसी भी कहलाई जा सकती है। व्हिच बेसिकली मीन्स जस्ट बिकॉज़ हमारे पास कॉन्शियसनेस के रैंडमनेस को डिफाइन करने के लिए कोई दूसरा और एक्सप्लेनेशन नहीं है। तो हम सीधा उसे क्वांटम मैकेनिक्स के रैंडमनेस से एसोसिएट कर लें तो वो फैक्ट थोड़ी ना हो जाता है। हमें सबूत चाहिए इस क्लेम को जस्टिफाई करने के लिए। सबूत नहीं होने की वजह से यह आईडिया वहीं पर कुछ समय के लिए दफन हो गया। लेकिन अगले कुछ दशकों बाद एक चमत्कार सा ही हो गया। मिड 1900 में एक एनस्थेजियोलॉजिस्ट थे स्टॉर्ट हैमरॉफ नाम के। उन्होंने काफी फैसनेटिंग चीज
को ऑब्जर्व किया। उन्होंने अपने पूरे करियर में यह सीखा था कि जितने भी एनस्थेटिक्स यानी कि बेहोश करने वाले ड्रग्स होते हैं ना वो आपके दिमाग के किसी ना किसी केमिकल के साथ इंटरफेयर करते हैं और एग्जजेक्टली इसी वजह से इंसान बेहोश होता है। लेकिन फिर उन्होंने यह देखा कि जीनोन गैस जो कि एक इनर्ट गैस है यानी कि एक्सट्रीमली नॉन रिएक्टिव गैस और यह किसी भी चीज के साथ रिएक्ट नहीं करती। यह जीनोन गैस भी इंसानों को कुछ हद तक बेहोश कर पाती है। एंड नोबडी न्यू हाउ, दिस वाज़ अ मिस्ट्री। बाद में जाके
पता चला वो गैस किसी तरह हमारे न्यूरॉन्स के अंदर मौजूद एक स्पेशल स्ट्रक्चर जो रैंडमली वंस अगेन, हां, रैंडमली बनता है और बिखरता है उसे अफेक्ट कर रही थी। इस रैंडम स्ट्रक्चर का नाम है माइक्रो ट्युब्यूल्स। अब जिन्हें नहीं पता उन्हें बता दूं ये माइक्रो ट्युब्यूल्स काफी स्पेशल होते हैं। ये देखो ये एक तरह से आपके सेल्स के अंदर मौजूद जिप लाइंस होते हैं। जिन पर से प्रोटीनंस, केमिकल्स, सेल ऑर्गेनल्स, एटसेट्रा इन सभी चीजों को यहां से वहां मूव किया जाता है। यानी न्यूरॉन्स के बीच जो सिग्नलिंग केमिकल्स ट्रैवल करते हैं ना, वो भी इन्हीं
की मदद से ट्रैवल करते हैं। और आप देख सकते हो इनका बनना और बिखरना पूरी तरह से रैंडम है। पर क्या यह रैंडमनेस के पीछे कोई कॉज है? या फिर यह वाकई में क्वांटम मैकेनिक्स वाला एक्चुअल रैंडमनेस है जो कि प्रूव्ड है। ट्रू रैंडमनेस होता है विदाउट एनी कॉज। एंड यस बाय द वे अगर आपको नहीं पता क्वांटम ऑब्जेक्ट्स लेटेस्ट साइंटिफिक एविडेंसेस से यह प्रूव्ड है कि ट्रूली रैंडम तरीके से बिहेव करते हैं। उनके सबसे फंडामेंटल बिहेवियर के पीछे कोई कॉज ही नहीं होता। पर क्या हमारे दिमाग में बन रहे ये माइक्रो ट्युब्यूल्स जो हमारे
थॉट्स को शेप करते हैं। क्या वो वाकई में क्वांटम ऑब्जेक्ट्स है भी क्या? क्या वो एक्चुअल में क्वांटम प्रॉपर्टीज दिखा रहे हैं? इसके लिए हमें सबूत लगेंगे। राइट? जो सबूत अब तक हमारे पास नहीं थे बट अब सरप्राइजिंगली आ चुके हैं। अभी इसी साल 2024 में एक पेपर पब्लिश हुआ जिसने माइक्रो टुब्यूल्स में क्वांटम प्रॉपर्टीज को एक्सपेरिमेंटली ऑब्जर्व किया। बेसिकली क्वांटम मैकेनिक्स में एक फिनोमिनान होता है कॉल्ड एंटेंगलमेंट। यानी जो एक्सट्रीमली छोटे पार्टिकल्स होते हैं ना इलेक्ट्रॉन्स, प्रोटॉन्स, फोटॉन्स एटसेट्रा वो कई बार एक दूसरे से इस कदर कनेक्ट हो जाते हैं कि फिर अगर आप
उन्हें एक दूसरे से एक बिलियन लाइट इयर्स दूर भी रख दोगे तो एक पार्टिकल के साथ हुआ इंटरेक्शन दूसरे पार्टिकल को भी इन्फ्लुएंस करता है। यानी कि मानो जैसे वो 1 बिलियन लाइट इयर्स दूर एक इनविज़िबल धागे से कनेक्टेड है। और इसी क्वांटम एंटेंगलमेंट वाले फिनोमिनान को एक्सपेरिमेंटली ऑब्जर्व किया जा सकता है। दरअसल जब भी आप किसी ग्लो होने वाले साधारण चीज पर लाइट मारते हो तो उसके इलेक्ट्रॉन्स इंडिविजुअली उस लाइट के फोटॉन्स को अब्सॉर्ब कर लेते हैं। फिर कुछ समय तक वो उस एक्स्ट्रा एनर्जी से एक्साइटेड हो जाते हैं और फिर कुछ समय बाद
वो उसी एनर्जी को ग्लो के रूप में फिर से बाहर छोड़ने लगते हैं। एंड अल्टीमेटली इलेक्ट्रॉन फिर से अपने ओरिजिनल स्टेट में आ जाते हैं। अब नॉर्मल चीजों में जब ये फिनोमिनान देखा जाता है तो लाइट सोर्स के एब्सेंस में भी उस चीज का ग्लो काफी धीरे-धीरे फेड आउट होता है। एंड ओवरऑल उस ग्लो की ब्राइटनेस भी काफी कम होती है। ऑन दी अदर हैंड अगर कुछ इलेक्ट्रॉन्स लेट्स से एक दूसरे के साथ एंटेंगल हो गए तो देखा गया है कि वो सारे एक मिलकर एक सिंगल इलेक्ट्रॉन की तरह बिहेव करते हैं। जिससे लाइट सोर्स
के एब्सेंस में वो बहुत ज्यादा लाइट एक साथ बाहर फेंकते हैं। और इसीलिए जल्दी अपना ग्लो लूज कर देते हैं। इस क्वांटम फिनोमिनान को सुपर रेडियंस कहते हैं। अगर किसी माइक्रोस्कोपिक चीज में आपको यह सुपर रेडियंस दिखा तो समझ जाओ उसमें फंडामेंटल लेवल पर क्वांटम मैकेनिक्स काम कर रहा है। क्योंकि यह फंडामेंटली एक क्वांटम प्रॉपर्टी है। बट नाउ द बिगर क्वेश्चन क्या वैज्ञानिकों को हमारे दिमाग में कहीं पर यह सुपर रेडियंस दिखा क्या? वेल यस मिला है। बट आप गेस करो कहां पर देखने मिला होगा। वेल, जिन जिप लाइंस, जिन माइक्रो ट्युब्युल्स की हम बात
कर रहे थे ना, वह ऐसे छोटे-छोटे ट्युबुलेंट प्रोटीनंस की मदद से रैंडमली ऑन द स्पॉट बनते हैं। और इनके अंदर एक ट्रिप्टोफैन नाम का एक अमीनो एसिड या सिंपली एक केमिकल होता है। उसके इलेक्ट्रॉन्स सुपर रेडियंस दिखाते हैं। एंड देयर फॉर क्वांटम एंटेंगलमेंट दिखाते हैं। और वो भी सिर्फ तभी दिखाते हैं जब ये ट्रिप्टोफैन मॉलिक्यूल्स माइक्रो ट्युब्यूल्स का पार्ट हो। इंडिविजुअल ट्रिप्टोफेन मॉलिक्यूल्स में यह सुपर रेडियंस देखने नहीं मिला है। यानी कि जैसे 100 साल पहले रॉजर पेंड्रोस ने सजेस्ट किया था हमारे दिमाग में जन्म लेने वाले सभी थॉट्स प्री प्रोग्राम्ड सर्किट की वजह से
पैदा नहीं होते। इंस्टेड इनके पीछे क्वांटम मैकेनिक्स का भी एक रोल है। यानी कि जिस फ्री विल को हम समझ रहे हैं कि हम खुद इंडिविजुअली क्रिएट कर रहे हैं अपनी मर्जी से टर्न्स आउट उसमें रैंडमनेस का भी एक बहुत बड़ा रोल है। और जैसे हमने पहले जाना था हमारे सबकॉन्शियस और अनकॉन्शियस ब्रेन के हिस्सों का भी। बट इस न्यू रिसर्च के दो ड्रॉबैक्स हैं। यही कि यह इतना नया ऑब्जरवेशन है कि बाकी के साइंटिस्टों ने अब तक इसे रिपीट नहीं किया है। हमें और भी एक्सपेरिमेंट्स के कंफर्मेशन की जरूरत लगेगी इसे एक ठोस केस
समझने के लिए। और नंबर टू हमें और क्वांटम प्रॉपर्टीज को माइक्रो ट्युब्यूल्स में टेस्ट करना होगा ताकि हम श्योर हो सके कि इस स्ट्रक्चर में वाकई में क्वांटम प्रॉपर्टीज है और यह सुपर रेडियंस बस कोई फ्लूक नहीं था। सो एट दिस पॉइंट हम बिल्कुल कह सकते हैं कि क्वांटम कॉन्शियसनेस को समझने की यह हमारी एक बहुत ही अच्छी शुरुआत है। एंड आई नो ये सब सुनकर मे बी आपको ऐसा लगेगा कि इतनी राम कहानी सुनाकर फिर ऐसा बोल रहे हो कि यार ये एक अच्छी शुरुआत है। इतना सब सुनाने के बाद भी ऐसा लग रहा
है कि हम कितना कम जानते हैं। वेल दिस इज द ब्यूटी एंड ह्यूमिलिटी ऑफ़ साइंस। कि साइंस कभी नहीं थकता और कभी सवाल पूछना नहीं छोड़ता। लेकिन फिर भी हम कॉन्शियसनेस को समझने के सफर में बहुत आगे आ चुके हैं। एटलीस्ट वी नो कि कॉन्शियसनेस सिर्फ एक किस्म का नहीं होता। एक बैक्टीरिया का कॉन्शियसनेस अलग है। एक पौधे का अलग है, एक मछली का अलग है, एक कुत्ते का अलग और एक बर्ड का अलग है। इवन हमारे खुद के दिमाग में भी सिर्फ एक कॉन्शियसनेस नहीं है बल्कि मल्टीपल मॉड्यूल्स हैं जो इंडिपेंडेंटली अलग-अलग किस्म के
कॉन्शियसनेस को जन्म देते हैं। जैसे दिमाग का राइट हेमिस्फयर सिर्फ किसी ऑब्जेक्ट को विजुअली प्रोसेस कर सकता है। विज़न के लिए ऑप्टिमाइज है। बट अगर वो लेफ्ट हेमिस्फयर से कनेक्टेड नहीं है तो वो लेफ्ट हेमिस्फयर का वर्बल और इंटेलेक्चुअल मॉड्यूल यूज नहीं कर सकता और कुछ दिखाने पर वो कभी भी एग्जैक्टली नहीं बता पाएगा कि उसने एग्जैक्टली क्या देखा क्योंकि वर्बल मॉड्यूल काम ही नहीं कर रहा। मगर उसी ऑब्जेक्ट के इमेज दिखाने पर वो पहचान जरूर लेगा। और एग्जैक्टली ऐसा ही देखा गया है उन पेशेंट्स में जिनके ब्रेन का कॉर्पस केसम वो पार्ट जो लेफ्ट
और राइट हेमिस्फयर को कनेक्ट करता है उसको काटा गया। यानी बेसिकली हमारे दिमाग के अलग-अलग पार्ट्स अलग-अलग किस्म के कॉन्शियसनेस को क्रिएट करते हैं। जो सब साथ में मिलकर एक फाइनल कॉन्शियसनेस का प्रोजेक्शन आगे करते हैं जो हमें मैं का अनुभव देते हैं कि मैं दुनिया से अलग हूं और दुनिया से इंटरेक्ट कर रहा हूं। इसी मैं के एहसास से हम ब्रह्मांड को अपनी यूनिक इंडिविजुअलिटी से अनुभव करते हैं। और यहां पर आती है एक फैसिनेटिंग सच्चाई कि एक तरह से अगर हमारे पास फ्री विल नहीं है तो हमारे पास एक तरह से फ्री विल
है भी। हमें यह बिल्कुल भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा दिमाग न्यूरोप्लास्टिसिटी के भी काबिल है। यानी कि हमारा सबकॉन्शियस हमारे दिमाग को इन्फ्लुएंस जरूर करता है। जैसे कि एक्सपेरिमेंट्स में हमने देखा मगर हमारे एक्सपीरियंसेस, हमारी लर्निंग्स और हमारा बाहरी एनवायरमेंट, हमारे ब्रेन में न्यू न्यूरोप्लास्टिक बदलाव क्रिएट करता है। जो कि फिर जाके हमारे अनकॉन्शियस और सबकॉन्शियस का पार्ट बनते हैं। ये भी साइंटिफिकली प्रूव्ड है। यानी कि हमारा अनकॉन्शियस हमारे कॉन्शियस को इन्फ्लुएंस कर सकता है और हम शियर विल पावर बेहतर चॉइससेस इन लाइफ और बेहतर नॉलेज से अपने अनकॉन्शियस और सबकॉन्शियस को भी इन्फ्लुएंस
कर कर सकते हैं। व्हिच इज फैसिनेटिंग इन अ वे। हमारे पास फ्री विल नहीं भी है और है भी। नो मैटर हाउ यू वुड वांट अ लुक एट इट। मैं पर्सनली इस चीज में 1% बिलीव करता हूं कि मैं कॉन्शियसली अपने सबकॉन्शियस और अनकॉन्शियस को धीरे-धीरे करके अपने लाइफ के इंपॉर्टेंट गोल्स के हिसाब से शेप कर सकता हूं। सो या पावर हमारे हाथ में है। हमारी सोच में है। और साइंस को तो हमें बस सिर्फ यूज़ करना है। खुद को एजुकेट करके खुद के दिमाग के और इस दुनिया के फंडामेंटल्स को समझकर अपनी लाइफ को
उस हिसाब से एलाइन करने में। आखिर साइंस के और जिंदगी के बड़े-बड़े सवालों के जवाब ढूंढने के फुलफिलिंग जर्नी के साथ हमें वो ज्ञान भी मिल सके जिससे हमारी जिंदगियां बेहतर हो। तो मेरे हिसाब से इससे बेहतर कोई और सफर हो ही नहीं सकता। सो उम्मीद है आज के इस वीडियो को देखकर आपको कॉन्शियसनेस का एक साइंटिफिक पर्सपेक्टिव मिल गया। इस वीडियो को कॉन्शियसली अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स के साथ जरूर शेयर करना ताकि हम सभी मिलकर हमारे कम्युनिटी का कलेक्टिव कॉन्शियसनेस बढ़ा सके। सी यू वेरी सून। जय हिंद जय विज्ञान।