फिर लोग कहेंगे हाय हाय मोदी। अमीर और गरीब के बीच में सेपरेशन बढ़ गया है। की भाई मैंने ना 100 करोड़ की कंपनी बेची है और मैंने एक कोर्स बनाया है की तुम भी किस तरीके से 100 करोड़ की कंपनी बना के भेज सकते हो? अभी जॉइन करो, मेरा सा मानना एक स्किल को ना सीखने में टाइम लगता है। लोग क्या करते हैं, डिजिटल मार्केटिंग कोर्स को देख लेते हैं। बस देख लिया, मेरे को आ गया जब अभी जो स्कैम्स वगैरह थोड़े हुए कोर्स बेचना चाहिए, कोर्स बेचना कोई गलत बात नहीं है। झूठा कोर्स बेचना
बहुत खराब थी। सवाल ये भी है कि कोर्स लेके ठप्पा मार के नहीं रखना, मैंने देख इसका कोर्स ले रखा है। बट कहानी यही होगी कि ए आई की वजह से बहुत बड़ा सेपरेशन बढ़ेगा। अमीर और अमीर होगा और जो जिसका पैसा नहीं होगा ना वह बर्बाद हो जाएगा। एक रील देख रहा था निखिल कामत जी की जो सबसे ज्यादा बोरिंग बिज़नेस होते हैं वह सबसे ज्यादा प्रॉफिट बनाते हैं।वो उनकी लाइफ का एक्सपीरियंस ऐसा है की उन्होंने ऐसा देखा जो बोरिंग बिज़नेस होते है, वो पैसा कमाते है। अगर हम कहे की वो पैशनेट नहीं थे
अपने बिज़नेस को लेके तो ये झूठ है तो आपको ऐनालिटिक्स में तो दिखाई दे रहा होगा ऐट परफॉर्म नहीं करिए बट एक मार्केटर का दिल कह रहा है यार ये चलेगी मतलब गुट फीलिंग कह लो कुछ भी कह लो एक्सपीरियंस कह लो।इस साल हम देखे की एजेंट्स आएँगे ये एजेंट्स आएँगे इसको हम टास्क देंगे, वो टास्क कर देंगे पूरा पूरा जब इसी साल हम एजेंट्स इस लेवल पे देखेंगे और मान के चलोगे भगवान ना करे एजेंट्स अगर फ़ोन में आ गए अब लोकल ही चैनल लग गए फिर क्या होगा? कैसे हो आप बात बहुत बढ़िया,
आप बताओ।मैं भी ठीक हूँ, आपने जब स्टार्ट किया था काफी टाइम पहले स्टार्ट किया था डिजिटल मार्केटिंग तो वो टाइम पे तो इतना डिजिटल मार्केटिंग ये नहीं रहता था तो आपको पता कैसे चला था?यार मेरी अगर जर्नी की बात बताऊँ तो जब मैंने डिजिटल मार्केटिंग की शुरुआत करी थी तो मुझे पता ही नहीं था मैं डिजिटल मार्केटिंग कर रहा हूँ, बात है इंजीनियरिंग के टाइम की तो मेरा एक दोस्त था, वो मेरे पास में आया और मतलब वो बाहर का दोस्त था, क्रिकेट खेलता था हमारे साथ में तो वो आया कहता भाई वेबसाइट बनवानी थी
बन जाएगी।तो मुझे वेबसाइट बनानी नहीं आती थी। उस टाइम पे बट मेरे को कंप्यूटर इंजीनियरिंग का शौक था, मैं करना कंप्यूटर इंजीनियरिंग चाहता था। बट मतलब मेरे घर वालों का फुड, केमिकल का काम हैं तो इसलिए मैंने सोचा की फुड केमिकल का करेंगे और केमिकल इंजीनियरिंग करेंगे तो मैं गया था। केमिकल इंजीनियरिंग करने पर इन्ट्रेस्ट था। कंप्यूटर का ना हो जाएगा, कोई दिक्कत नहीं हैं अब।ऐडिया ये था कि मेरे कुछ दोस्त थे जो कंप्यूटर इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे तो मेरा ऐडिया ये था कि उन्हीं का उन्हीं से करवा लूँगा और बीच में प्रॉफिट रख लूँगा।
सिंपल सा मैथ्स था। जब मैं उनके पास गया तो पता लगा उनको भी नहीं आती है। फिर हम दोनों ने मिलजुल के मतलब हम तीन चार लोग थे हम सबने मिलजुल के कर दिया। इंटरनेट से सर्विस करके बना दिया वेबसाइट अब सामने वाला खुश हो गया। अब उसने आगे भी हमको काम देना शुरू कर दिया। रेफरल का काम भी आना शुरू हो गया तो धीरे धीरे करके काम होना शुरू हो गया। बट हमको पता नहीं था हम ये डिजिटल मार्केटिंग कर रहे हैं।हमारा लॉजिक ये होता था वेबसाइट बनाते हैं, सुओ करते हैं हम बीच में
हमने अड्स का काम उठाया था पर हमारे से अड्स हो नहीं पाए। बट मेजोरली हम वेबसाइट और सुओ का काम करते थे।इंजीनियरिंग खत्म होने के बाद जब एमबीए की तरफ गया, मैं तो मेरे को मार्केटिंग मार्केटिंग थोड़ी पढ़ाई लिखाई करी, क्योंकि साइंस बैकग्राउंड से ऐसा तो कभी मार्केटिंग पड़ी नहीं थी तो उसके अंदर थोड़ी सी मार्केटिंग वाकेटिंग पड़ी तब समझ में आया कि भाई ये जो प्रोब्लम्स आ रही थी अड्स चलाने के टाइम पे वो इसलिए आ रही थी। तो फिर अड्ज़ के काम हमने बीच बीच में पकड़े थे, बट मतलब वो मज़ा नहीं आया
था जो हम गैरॅन्टी से कह सकते थे ना? वेबसाइट में भगवान थे की आप कुछ भी दे दो हम कर लेते थे बट अड्ज़ में वो चीज़ नहीं होती थी तो एमबीए के ड्यूरेशॅन में ही मेरे को समझ में आ गया कि हम गलतियाँ कहाँ कर रहे हैं। हमने उसको रेसोल्वे करना शुरू कर दिया और रिजल्ट्स आने शुरू हो गए। तो फिर ये मेरे को समझ में आया था कि जो मैं कर रहा हूँ, ये एक बड़ी चीज़ है, डिजिटल मार्केटिंग है, वगैरह वगैरह और जो मेरे को मजोरली समझ में आया था ना कि जो
मैंने करा है, जो अभी तक किया है वो बहुत बड़ी चीज़ है। वो यूट्यूब चैनल शुरू करने के बाद समझ में आया।मैंने यूट्यूब चैनल शुरू किया है, स्टार्टिंग के अंदर वीडियो कॅन्टेंट बना रहा था, कभी डिजिटल मार्केटिंग के बारे में ज्यादा बात नहीं करी। बोलता था मैं कभी कभार बोला होगा कि मेरी डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी भी है। बट कभी ये नहीं था कि डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी यूट्यूब से भी बढ़ सकती है। बट ये मान लो कि जब शुरू किया। एक इन्स्टिट्यूट होता था। नाम नहीं लेता उसका मैं जो की एक पॉपुलर इन्स्टिट्यूट था दिल्ली एन
सीआर के अंदर जो बहुत पैसा खर्च कर रहा था, डिजिटल मार्केटिंग ट्रेनिंग का तो बहुत ज्यादा ऐड चलाते थे। कहते थे हमने अफ़िलीएट मार्केटिंग से ₹1,00,00,000 कमाया, ये किया, वो किया, वो किया अब जब मैंने उसको देखा, स्टडी किया तो मैंने कहा ये सब कुछ तो मैं कर रहा हूँ।पूरा करीकुलम उनका देखा। मैंने कहा ये तो कुछ भी नहीं है। ये तो बहुत बेसिक्ली चीज़ है। फिर मैंने यूट्यूब पे कहा, भाई जो भी डिजिटल मार्केटिंग है वो मैं फ्री में बढ़ाऊंगा। फिर मैंने यूट्यूब पे फ्री वीडियो बनानी शुरू करी। फिर डिमॅंड आई की ऑफलाइन भी
बढ़ा दो। फिर ऐसे ऐसे जर्नी शुरू हुई। बट ये मान के चलो मुझे एमबीए तक तो पता भी नहीं था।ढंग से कि मैं डिजिटल मार्केटिंग कर रहा हूँ, हाँ, इंटरनेट मार्केटिंग एक बार को कह सकते थे कि मैं इंटरनेट मार्केटिंग कर रहा हूँ मजोरली हम करते ही दो काम ईमेल मार्केटिंग का हमने थोड़ा सा काम किया है। बट यही काम करते थे। बाद में समझ में आया कि भाई ये कंप्लीट मार्केटिंग पैकेजेस भी होते हैं। और ये जब स्टार्ट किया होगा, जब तो मतलब ऐसे बक्स वक्स बहुत सारे आए या बहुत अच्छी बन गई थी,
वो टाइम के हिसाब से बहुत बढ़िया बन गई थी। टाइम के हिसाब से अगर देखा जाए तो मतलब कहानी क्या थी? की एससी एम एल वेबसाइट ही थी तो उसमें बक्स क्या आने थे?एक स्टैटिक वेबसाइट थी। हेच टी एम एल पे बना दी। हमने मोबाइल रिस्पांसिव बनानी थी वो बाद में हमने देख देख के मोबाइल रिस्पांसिव बना दिया तो एस इन कोई बग्स नाम की चीज़ नहीं थी। आप ये कह सकते हो जो बाद में हमने वो फॉर्म वाला सीन शुरू किया था। पी हेच पी इंटिग्रेशन के साथ में फॉर्म बनाए गए वहाँ पे हमको
समझ में नहीं आ रहा था ये फॉर्म स्टोर कैसे होते हैं?उसमें थोड़ा हमने दिमाग लगाया था। मतलब दिमाग क्या लगाया था? हमने थोड़ा टीचर्स की हेल्प ली थी, बट ठीक था, मतलब मेरे को लगता है कि हमको उतने चैलेंजेस नहीं देखने पड़े। शायद हम बहुत अर्ली थे। उस टाइम पे लोगों को भी नहीं पता था उनको क्या चाहिए? तो अगर आप उनको एक बेसिक प्रॉडक्ट भी डेलिवर कर देते तो वो खुश हो जाते थे।और हम उतना ज्यादा चार्ज भी नहीं करते थे तो उनको भी ज्यादा एक्स्पेक्टेशन नहीं होती थी हूँ और वो टाइम पे ऐसे
शोपीफी वगैरह ये सारी चीजें नहीं थी नहीं यार, उस टाइम पे वर्डप्रेस था।उस टाइम पे बाकी और कुछ नहीं था। वर्डप्रेस तो आज बहुत पावरफुल हो गया, उतना पावरफुल भी नहीं था। वर्डप्रेस हमने तो एसटीएमएल से शुरुआत करी थी, हमको तो पता भी नहीं था। सही बताऊँ तो ये सारी दुनिया के बारे में हमारा तो सीधा सा लॉजिक था एसटीएमएल से बना के बना के दे देंगे। जब अपने ये करने लगे तो ऐसे कब लगा कि अभी मेरे को यही करना है? आगे ये करियर ही बढ़िया है। आगे ये करना है आप कह सकते हो
इंजीनियरिंग के बाद मतलब इंजीनियरिंग में बेसिकली क्या था? हम सब फ्रीलैन्सिंग एक तरह से कर रहे थे। सारे के सारे दोस्त है, काम में लाता था।करते हम सब कुछ थे सब में मिलके इंजीनियरिंग के बाद में मेरे को एमबीए करना चाहता था और मेरे लिए एकदम नई फील्ड थी इंजीनियरिंग मैंने करी थी घरवालों के चक्कर में एमबीए मैं खुद करना चाहता था इसलिए मेरा दिमाग था कि मैं बहुत पढूंगा तो क्लियर था कि मैं तो टाइम नहीं दे पाऊंगा तो मैंने उनको एक ऑफर दिया। मैंने उनको कहा कि भाई तुमको फिक्स देता हूँ मैं।क्यों फालतू
का काम आएगा? इसपे कर रहे हो, मैं तुमको फिक्स देता हूँ, तुम काम संभाल लिया करो, काम आएगा मैं तुमको दे दूंगा, मैं टेंशन फ्री रहूँगा। वो लोग भी एग्री कर गए तो एक तरह से वो मेरे पहले ही एम्प्लोयी बन गए। पहले हम एक तरह से पार्टनर थे, वो धीरे धीरे करके एक तरह से एम्प्लोयी बनना शुरू हो गए। काम ये था क्योंकि रिटेनर के थे सारे क्लाइंट्स रिटेनर मतलब अगर आपने किसी की वेबसाइट बनाई है तो वो आपको पैसे देता रहेगा क्योंकि उसकी वेबसाइट में चेंजेस करवाने होंगे या कोई कुछ करवा रहा है
तो वो बार बार आपको पैसे महीने के देता था तो रिटेनर जानते थे हमारे उस टाइम पे हम इसको बोलते थे रिकरिंग, रिकरिंग में पैसा आ रहा है। क्योंकि रिटेनर वर्ड तो मुझे बाद में पता लगा। इसको रिटेनर कहते हैं टेक्निकल लैंगुएज पे एमबीए के अंदर ही जब मुझे पता लगा कि यार ये काम बढ़िया हो गया है, मेरे बिना मतलब टीम ही मैनेज कर रही थी, काम आ रहा था, मैं उधर ट्रांसफर कर रहा था कभी वॅन्स इन ए व्हील चार 5 घंटे हफ्ते के अंदर दे दिए तो दे दिए। और काम हो रहा
है तो फिर रिअलाइज हुआ यार ये सेकेंडरी बिज़नेस तो बन ही सकता है। एमबीए के बाद भी ऐडिया तो मेरा यही था कि मैं अपना केमिकल का काम ही संभाल लूँगा। पापा का काम था केमिकल का ऐडिया यही था उसी को नेक्स्ट लेवल ले के जाएंगे। बट शायद रहा कुछ और चाहती थी। केमिकल का काम किया मैंने मतलब हमने एक नई कंपनी शुरू करी। 2000 यूट्यूब शुरू करने से थोड़ा सा पहले 2016 के शायद एंड के टाइम पे हमने कंपनी शुरू करी जहाँ पर अलग तरीके से काम शुरू किया। मतलब मेरा भाई और मैंने शुरू
किया था वो सेटअप हुआ ड्युरिंग चोविद् मुझे रियलाइज हुआ की यार।मुझे उतना मज़ा नहीं आता उस काम में और मेरा जो मार्केटिंग वाला काम हैं वो बहुत बढ़िया हो गया हैं। तो मैं फालतू की अपनी एनर्जी उस काम में क्यों लगाऊं जो मेरा भाई भी कर सकता हैं? तो इसलिए मैंने वो काम छोड़ दिया और मैं अपने डिजिटल मार्केटिंग में आ गया। अभी भी इक्विटी तो हैं मेरे पास, कंपनी की मेजर इक्विटी होल्डर मैं ही हूँ बट वो ये फैम्ली बिज़नेस हैं तो मेरे को कुछ नहीं चाहिए।सब मेरा भाई देखेगा और वो टाइम पे ऐसे
मतलब अगर किसी को बोलते थे कि मैं डिजिटल मार्केटिंग करता हूँ तो आज तो मतलब लोगों को समझ जाते हैं क्या करते हैं? लेकिन वो टाइम पे ऐसे बोलते थे तो कुछ रिएक्शन आता था कैसे रिएक्शन करते थे क्या क्या रिएक्शन मैं किसी को मैं किसी को बोलता ही नहीं था। अच्छा? मैं ये सिंपल सी बात वो एक फ्रीलैन्सिंग काम था, मेरे पास अडिशनल इन्कम आ रही थी, किसी को बताने की जरूरत क्या है? मेरा तो ये लॉजिक था वो पैसा आ रहा है, वो अय्याशी करो जो करना है करो किसी को क्यों बताना है?
फालतू को बताओगे तो शेयर करना पड़ेगा तो इसलिए मैंने तो कुछ नहीं फैलाए।शायद मैंने अपना घर के अंदर सबसे पहला काम किया होगा। अपने खुद की वेबसाइट के अलावा मतलब पापा वाली जो काम था उसकी वेबसाइट के अलावा वो मेरे मामा का काम किया था। बस बाकी रिश्तेदारों में मैंने फैलाई नहीं है वो वाली बात, वो तो अभी पता लग गया उनको ज्यादा उससे पहले तो उनको कुछ पता ही नहीं था। हाँ यूट्यूब के बाद इन फॅक्ट यूट्यूब शुरू करने के टाइम पे भी उनको ही लगता था कि मैं केमिकल का काम कर रहा हूँ
और मेरा ना वेबसाइट बनाने का काम है। बस उनको ये पता था। फिर अभी जब छप गई खबरें कंपनी भेज दी, सब कुछ कर दिया तब सबको पता लगा अच्छा ये भी हो गया ये भी हो गया ये भी हो गया।मतलब उनको कोविद के बाद से ही कोविद के आस पास पता लग गया था। मैंने पापा का काम बिल्कुल छोड़ दिया था ना तब उनको लगा कि इसका काम कुछ हो गया होगा तभी अलग किया है प्लस इनको सबको लगता था कि यूट्यूब से ही सब कुछ कर रहा है। ये डिजिटल मार्केटिंग बिज़नेस में सबसे
हार्ड चीज़ क्या है? एजेंसी चलाने में? एजेंसी चलाने में प्रॉफिटेबिलिटी क्या होता है? सबको लगता है काम लाना मुश्किल है या आसान है। मेरे हिसाब से काम आ जाता है। उसके बाद कई लोगों को लगता है काम करना मुश्किल है। बहुत लोग देश में बेरोजगार बैठे जो काम कर देंगे। जिनका स्किल सेट भी है तो काम करना भी प्रॉब्लम नहीं है। काम लाना भी प्रॉब्लम नहीं है। बट मेहनत है जीस रेट पे आप काम लेके आए हो उससे कम रेट में वो काम करके दे देना और प्रॉफिट बचा लेना देखो एस ए क्लाइंट।एस ए क्लाइंट
हमेशा चाहेगा आपको जितना तोड़ सकता है उतना तोड़ेगा एम्प्लोयी भी चाहता है वर्क लाइफ बैलेंस उसको क्या लेना देना? आपने क्लाइंट से कितने रुपए में चार्ज किया? वो तो आराम से अपना काम करेगा। अगर कल को बीमार हो गया तो बीमार हो गया। तो इसके बीच में जो प्रॉफिट निकल के आता है ना वो ही फंसा देता है। बहुत सारी एजेंसी को ना वो अपना राइट नहीं निकाल पाते। मतलब ऐसे ऐसे मैं पर्सनली लोगों को जानता हूँ, जो की मान के चलो अच्छी खासी नौकरी कर रहे थे। डिजिटल मार्केटिंग के अंदर अब उनको लगा की
भाई मेरा स्किल सेट अच्छा हो गया है। मैं अच्छे बहुत सारी टीम को मैनेज करता हूँ। मैं अपना काम शुरू करता हूँ।यूट्यूब में बहुत सारे लोगों ने उनको प्रोमोट कर दिया। उनको लगा हाँ हाँ भाई मैं भी कर लूँगा। अब जब वो बिज़नेस के अंदर उतरते हैं तो वो पूरा सिस्टेमेटिक तरीके से काम करते हैं। कहते हैं कंपनी भी कर रही थी। यही सेम तरीके से मैं भी करूँगा। अब जब वो शुरू करते हैं काम तो उनको समझ में आता है की यार भाई बिल्डिंग का रेंट भी देना है।बिजली का खर्चा भी देना है। टूल्स
के खर्चे भी देने हैं ये खर्चे तो कभी सोचे ही नहीं थे। उन्होंने सोचा था क्लाइंट आएगा इतने रुपए इसको दूंगा, इतने रुपए मेरे पास आएँगे। बस प्रॉफिट बन गया और जैसे ही फिक्स एक्स्पेन्सस बढ़ने शुरू होते हैं ना समझ में आता रहे ये भी तो खर्चे हैं यहाँ पे भी देना पड़ेगा फिर कुछ कुछ। अनफोर्सेन चीजे हो जाती है जैसे कि एम्प्लोयी बीमार हो गया, कोविद टाइप की जैसी चीजे हो गई थी। इंटरनेट में इश्यू आ गया। जैसे फेसबुक के अंदर कई बार क्या होता है? कुछ बग्स आ जाते है, गूगल ऐड में बग्स
आ जाते है। सामने वाले का अकाउंट सस्पेंड हो गया। जब तक तुम नौकरी कर रहे थे, तब तक तो तुम कोई लेना देना ही नहीं था। बट अब क्या हुआ? क्लाइंट का अकाउन्ट सस्पेंड हो गया। अब तुम उस अकाउन्ट को सही करने की कोशिश कर रहे हो। कुछ भी करने की कुछ कर रहे हो। उसमें टाइम वेस्ट हो रहा है टाइम वेस्ट मनी क्योंकि सैलरी जा रही है। बस प्रॉफिट की बैड मच गई। वैसे बहुत सारी चीजें होती है। मेरे हिसाब से सब से थोड़ा चैलेंज ही प्रॉफिट मेंटेन करना है जितना मैंने देखा है मेरे
लिए पर्सनल लेवल पे चैलेंजेस उतने ज्यादा नहीं है। शायद मैं लकी रहा। मैं हमेशा से बोलता हूँ की मेरे को चैलेंज शायद इसलिए नहीं देखने पड़े। मैं टु अर्ली था। थोड़ा बिज़नेस बैकग्राउंड से बिलौंग करता था। पैसे डे वॅन से ही कम थे, बूट स्ट्रैप था तो इस चक्कर में ना धीरे धीरे करके ना पैसे की वैल्यू समझ में आने लग गई और बिज़नेस बनता चला गया। बट आज के टाइम पे क्या हो गया? लोगों को ना बहुत सारी नॉलेज मिल गई है अलग अलग जगहों से। जिसके चक्कर में वो स्क्रैच से शुरू नहीं कर
रहे है वो एक लेवल से शुरू कर रहे है।जब एक लेवल से शुरू कर रहे है तो उनको स्क्रैच के अंदर जो प्रोब्लम्स आ सकती है उसके बारे में पता ही नहीं है। तो इसलिए शायद मैं लकी ना आज के टाइम पे चैलेंजेस यही है क्योंकि मेरे बहुत स्टूडेंट्स को पढ़ाया है। सबको मैंने यही देखा है कि अगर वो एजेंसी बंद करते हैं तो इसलिए बंद करते हैं क्योंकि।पैसे नहीं बन रहे होते या फिर जितनी सैलरी ले रहे थे उतना भी पैसा नहीं बन रहा होता और जो जगह से अगर जैसे सीख रहे है आपसे
भी स्टूडेंट सीखते होंगे तो उससे फर्क पड़ता है। मतलब जैसे उनका सक्सेस रेट ज्यादा होता हो, उनके ज्यादातर सारे लोगों की एजेंसी चलती हो। अच्छे से सीख गए पहले।मैं अपने कोर्स को कभी प्रोमोट नहीं करता। इस तरीके से की भाई सक्सेस रेश्यो बढ़ा दूंगा, ये कर दूंगा वो कर दूंगा बट मैंने मेक शुर ये किया है अपने कोर्स के अंदर मैं बाकी कोर्स के बारे में नहीं बोलता की जितनी भी चीजों की रेक्विरेमेंट है, एक एजेंसी रन करने के लिए जीतने भी स्किल्स चाहिए एक टॉप लेवल स्केल एजेंसी रन करने के लिए।मतलब अगर आपके पास
में क्लाइंट का बजट आ रहा है एक मिलियन डॉलर का तो भी आप ऐड रन कर सको। उस लेवल के कैंपेन हैंडल करना भी मैंने सीखा दिया तो मैंने तो अपने हिसाब से सब कुछ सिखाया है। बट कहानी ये है कि कौन किस तरीके से करना चाहता है जैसे मैं अपने कोर्स का बताता हूँ हमने कोर्स में क्या किया? मतलब?बहुत टाइम हो गया ना पढ़ाते पढ़ाते तो मेरे को समझ में आ गया लोग कहाँ भागते हैं, कहाँ दिक्कत आती है, कहाँ आती है तो हमने ना कोर्स में ना वो कर रखा है ड्रिपिंग अब कोर्स
देखो, थोड़े टाइम के बाद में अगला मॉड्यूल अनलॉक होगा, फिर कोर्स देखो फिर थोड़े टाइम के बाद में अगला मॉड्यूल अनलॉक होगा। तो हमने कैसे किया है मेरा ऐसा मानना एक स्किल को ना सीखने में टाइम लगता है। लोग क्या करते हैं? डिजिटल मार्केटिंग कोर्स को देख लेते हैं। बस देख लिया, मेरे को आ गया, बट अक्चवली आपको देखना है उसको फिर प्रैक्टिस करना है। फिर आपको उसकी प्रोब्लम्स आएगी फिर उसको रेसोल्वे करना है तो मैंने तो अपने कोर्स के अंदर इन चीजों का ध्यान दे रखा है कि पहले आपको एक वीडियो दिखेगी जिसमें आपको
टास्क मिलेगा, समझ में आएगा ये है।फिर कुछ टाइम के बाद में अगली वीडियो अनलॉक होगी ताकि आपके पास सोचने का प्रैक्टिस करने का टाइम मिले। वरना क्या होगा मतलब? कोर्स हमारा होगा। 100 घंटे के आस पास मान लो अप्प्रोक्स 100 घंटे का कोर्स है 100 घंटे अगर बंदा खत्म करना चाहे तो हफ्ते दो हफ्ते में खत्म कर देगा आराम से। पर क्या हफ्ते दो हफ्ते में कोर्स खत्म करके वो डिजिटल मार्केटर बन जाएगा?नहीं बन पायेगा। हमने तो मान के चलाया की ऐडियल ड्यूरेशॅन इस 6 टु 7 मंथ्स कम से कम अगर बंदा दिन रात मेहनत
कर रहा है तो छह से सात महीने लगेंगे। उसको ढंग से सब को सीखने में बट क्या है? लोगों को शॉर्टकट चाहिए। हाँ फुल डॅडी की यार सिंपल सी बात कोई मजाक तोड़ना है। अगर मैं इंजीनियरिंग की बात करके चलु तो इंजीनियरिंग में तो 4 साल लगते है ना? और इंजीनियरिंग से निकलने के बाद भी कुछ नहीं आता आता लोगों को या कोई भी ग्रेजुएशन प्रोग्राम मान लो तो कोई शॉर्टकट टु सक्सेस नहीं है। की ओवरनाइट सोये और सुबह आ गया काम। देखो कुछ कुछ चीजें होती है आप मान सकता हूँ कोई बंदा बहुत ब्रिलियंट
हो, चीजों को बहुत जल्दी समझ जाता है, उसका दिमाग बहुत तेज काम करता है तो वो उसको थोड़ा जल्दी कर लेगा। बट हमने मान के चलाया की ऐडियल ड्यूरेशॅन इस 6 टु 7 मंथ्स।और अगर कोई नॉर्मल बंदा है, कोई स्लो भी है तो उसको आठ से नौ महीने तक लग सकते हैं। कोई काम करते करते, फ्रीलैन्सिंग करते करते मतलब कुछ भी करते करते करने का प्लान कर रहा है तो उसको 1 साल लग जाएगा। बस इतने टाइम में काम हो जाना चाहिए जितना जीस तरीके से हमने।कोर्स को प्लान किया है। क्योंकि बात क्या है? हमारी
120 मिनट की वीडियो होगी। उसमें मेरी पूरी स्ट्रेटेजी बता दी। स्टेप वॅन ये करना है, स्टेप टू ये करना है, स्टेप थ्री ये करना है स्टेप फोर ये करना है ये करना है और 20 मिनट वो पांच स्टेप बता दिए मैंने करके दिखा दिए अब क्या करोगे तुमको लगेगा आ गया पर अक्चवली जब करोगे ना तुम खुद ही स्टेप बोलने लग जाओगे।या फिर तुम खुद के पैटर्न्स बनाने लग जाओगे क्योंकि कॉपी पेस्ट नहीं है ना? मार्केटिंग की सबसे बड़ी बात यही है ना की कॉपी पेस्ट नहीं है की अगर मैं किसी प्रॉब्लम को सोच रहा
हूँ, जरूरी नहीं है, सामने वाला भी उसी प्रॉब्लम को उसी तरीके से सोचेगा। एक ही प्रॉडक्ट को बेचने के अलग अलग ऑफर्स हो सकते हैं तो यहाँ पे थोड़ा क्रियेटिविटी भी आती है। राइट अभी मार्केट में तो कोर्स का रेपो भी एकदम।खराब बना हुआ है। अभी जो स्कैम्स वगैरह थोड़े हुए हो रहे हैं तो लोग जैसे बोलते जो लोग भी कोर्स बेच रहे हैं, मतलब वो सारी तो कैसा लगता है? आपको कोर्स बेचना चाहिए। यार देखो ये अलग अलग मैएंड सेट वाली बात है। कोर्स बेचना कोई गलत बात नहीं है।झूठा कोर्स बेचना बहुत खराब चीज़
है आज के टाइम पे अगर मैं डीजल मार्केटिंग की बात करके चलूं तो बहुत सारे ऐसे इंस्टिट्यूट्स वगैरह है, जहाँ पर ट्रेनर्स जो पढ़ा रहे हो, वो ₹3000 की नौकरी कर रहे हैं, तो जो बंदा ₹3000 की नौकरी कर रहा है वो तुमको कितना बेहतरीन बनना सीखा देगा? लॉजिक्ली ना तो तुमको भी ये सोचना है की तुम किस बंदे से सीख रहे हो। अरे कोई बंदा है जिसने कुछ पहले से कर लिया है और आपको अपना वो एक्सपीरियंस शेयर कर रहा है तब वो मेक सेंस करता है या फिर मान लो कुछ ऐसे लोग भी
है जो बहुत अच्छे है, जिनको पता है की क्या कर रहे है, बट वो सिखाते ही नहीं है?की अपने कोर चीजें क्यों सिखाई जाए? वरना कोई मुझसे आगे निकल जाएगा। अगर वो ट्रेनर ही इस टाइप का है तब उससे सीख के चीजें खराब हो जाएगी। और सिंपल सी बात आप लॉजिक सोचो आज के टाइम पे ना लोगों के पास पैसे तो है नहीं उतने लोगों को चाहिए ₹500 में कोर्स अगर कोई एक बढ़िया बंदा होगा, जिसके पास अच्छा खासा एक्सपीरियंस होगा।अगर वो अपनी लाइफ का सारा एक्सपीरियंस शेयर कर रहा होगा तो ₹500 में बेच देगा,
क्यों सिखाएगा? वो बेचेगा ही नहीं ना ₹500 वो सेंस ही नहीं है। फिर लोग कहते हैं बहुत महंगा कोर्स है। अगर कोई बंदा अपना एक्सपीरियंस शेयर कर रहा है तो तो भाई पैसे तो लेगा ना, उसके मार्कअप तो चार्ज करेगा।अगर मैं अपनी इंजीनियरिंग की बात करके चलूं सस्ते टाइम पे मेरी इंजीनियरिंग शायद साढ़े चार ₹5,00,000 में पड़ी थी 4 साल का जब मैंने अपनी इंजीनियरिंग साढ़े ₹4,00,000 में करी है कोई कैसे एक्सपेक्ट कर सकता है कि कोई एक अच्छा होर्स जो उसकी लाइफ चेंज कर सकता है अक्चवली जिससे अक्चवली वो पैसा कमा सकता है, वो
₹500 का होगा? तो ये एक्स्पेक्टेशन रियलिटी के चक्कर में इतना ज्यादा बवाल हो रहा है, रियलिटी बताता हूँ 1 साल हो गया हमको कोर्स बेचते हुए ठीक है और हमारा कोर्स इतना सस्ता भी नहीं है, अच्छी टिकट साइज का है, फिर भी मैं कंप्लीशन रेट नहीं देखता हूँ। लोगों का मतलब क्या होता है?लोग आते हैं, कोर्स लेते हैं। स्टार्टिंग के अंदर उनको जोश होता है। सात 810 दिन देखते हैं उसके बाद गायब फिर चार पांच महीने का फिर हो जाता है। फिर थोड़ी सी देखते है। वीडियो फिर गायब ये कोई जिम की मेम्बरशिप थोड़ी ना
है की न्यू ईयर के टाइम पे फोकस होने के लिए वेइट लॉस करने के लिए ले ली।उसके बाद में भूल गए। फिर याद आया, जब ताने पड़े तो फिर एक बार फिर से ले ली तो मतलब वही है, मैं वही कह रहा हूँ। करियर के तरीके से अगर कोई सोच के करेगा तब तो सारे कोर्सस अच्छे हो सकते हैं, अगर कोई ढंग का बंदा सीखा रहा होगा और अगर कोई करियर पॉइंट ऑफ क्यूँ नहीं सोच रहा? कोई सोच रहा है कि भाई?बस दो वीडियो देख ली और मेरी ज़िन्दगी रातों रात ओवरनाइट करोड़पति बन जाऊंगा। तू
तो ये फिर बंदा ही की एक्स्पेक्टेशन ही खराब है और कोई ये सोच के बैठा है की 200 ₹500 के कोर्स से वो करोड़पति बन जाएगा तो फिर अगेन वो बंदा बेवकूफ है। तो जो स्कैम स्कैम वाली बात हो रही है और स्कैम स्कैम वाली बात ही इसलिए हो रही है। क्योंकि ना कुछ लोगों ने समझ लिया है, वो ₹500 वाले ना लोग बहुत बैठे हैं, जिनको ₹500 वाला कोर्स चाहिए। ओवरनाइट रिसाल्ट चाहिए तो वो क्या करते है? वो ओवरनाइट रिसाल्ट की गैरॅन्टी बोलते है। ₹500 का कोर्स बेचते है, लोग ले लेते है। अब मैं
तो ये बोलता हूँ कि ठीक है, वो बंदा स्कैमर होगा, वो बंदा गलत चीज़ बेच रहा है। बट जो खरीद रहा है वो भी तो फ्रॉड है, वो अपनी ज़िन्दगी के साथ फ्रॉड कर रहा है। ₹500 में कैसे मिल सकती है? कोई चीज़? तुम अगर 11 ट्वेल्फ्थ की कोचिंग करने के लिए भी जाते हो? टियर टू टियर थ्री सिटीज़ में भी टियर टू टियर थ्री सिटीज़ की बात कर रहा हूँ मैं।क्या ₹500 में कोई 11 ट्वेल्फ्थ की पूरी साइंस पढ़ा देगा? तुमको खुद सोचो जब नहीं गांव के अंदर कोई ₹500 में पूरा कोर्स कराने के
लिए तैयार नहीं है, महीने के ₹500 लेगा, कोई सस्ते से सस्ता जाएगा तो जिसमे ग्रुप में बढ़ाएगा।और तुम एक्सपेक्ट करके बैठे हो। ₹500 में ओवरनाइट जिंदगी रेवोल्यूशन रैसे हो जाएगी तो ये तो खुद की बेवकूफ़ है ना तो ऐसे इन्वेस्टमेंट देखनी चाहिए। हाँ, ऐसे इन्वेस्टमेंट देखो और इन्वेस्टमेंट तब देखो जब तुम मेहनत करने के लिए तैयार हो।सवाल ये भी है की कोर्स ले के ठप्पा मार के नहीं रखना? मैंने तो इसका कोर्स ले रखा है, कोर्स ले के उसको खत्म भी करना है और साथ में प्रैक्टिस भी करनी है। खाली ये भी नहीं करना की
नेटफ्लिक्स की तरह संडे लगाएंगे। जी दो हफ्ते के अंदर खत्म करेंगे और भाई हमको कोर्स आ जाएगा। ज्यादातर जो स्किल्स होते हैं, उसमें प्रैक्टिस ही जरूरी होती है। अभी तो ₹500 से भी अभी तो मैं अड्ज़ देखता हूँ यूट्यूब पे तो ₹1010 में भी स्टार्ट हो रहा है मतलब जैसे ₹10 भरो और बाकी का फिर जैसे जैसे दिल लेते जाओ, लेते जाओ पैसे।ये वो फनल का पार्ट यही तो है ना फनल। यही तो मैं कह रहा हूँ लोगों को नहीं समझ में आ रहा है ना। यही तो बात समझ में नहीं आ रही क्योंकि सिंपल
सी बात क्या हो रही है, देखो जो कुछ ऑनेस्ट लोग है, जो अक्चवल कोर्स बेच रहे हैं, उनका पहले से प्रॉडक्ट बना हुआ है, अब उनके पहले से प्रॉडक्ट करो, उनको ना देखो जिसका कोर्स में दम होगा ना वो ज्यादा ढिंढोरा पीठ के कोर्स नहीं बेचता।उसको कुछ शर्म आती है कि राइट रॉंग ऑडिएंस ना आ जाए। जैसे मुझे पर्सनली अपना कोर्स बेचने में बहुत अजीब लगता है कि ये ना हो कि मैं अपने कोर्स को इतना ज्यादा मार्केट कर दूँ जिसकी वजह से वो लोग लेने लग जाए जो सोच रहे हैं नेटफ्लिक्स की तरह देख
के करोड़पति बन जाएंगे। मैं हर बार जब भी कोई कोर्स की बात करता है, मेरे कोर्स के बारे में हम ये बोलते हैं कि भाई हम कोई ब्लैक मैजिक नहीं करते। ओवरनाइट सक्सेस की कोई गैरॅन्टी नहीं है। आपको मेहनत करनी पड़ेगी, हम आपको राइट टूल सिखाएंगे और आपको मेहनत करनी पड़ेगी। कहीं अटको के तो हम बैठे हैं तब जाके आपकी लाइफ चेंज हो सकती है। तो जो ढंग के बैठे हैं वो ऐसी बात करेंगे और ये जो मैसेज है एस ए मार्केटर अगर सोचा जाए तो सही नहीं है ना सही तो मुझे ये करना चाहिए
ना जैसे अपनी बात करके चलु तो मैं ये बोलेंगे की भाई मैंने ना 100 करोड़ की कंपनी बेची है। और मैंने एक कोर्स बनाया है कि तुम भी किस तरीके से 100 करोड़ की कंपनी बना के भेज सकते हो। अभी जॉइन करो, है ना? या अब ये ऑफर अच्छा लग रहा है तो पर ये बात सही नहीं है ना मैंने बनाके भेज दी कि कोई गैरॅन्टी नहीं है कि मेरा कोई भी स्टूडेंट बनाके भेज देगा और मेरी वजह से भेज पाएगा।अगर वो बेचेगा तो अपनी ही वजह से बेच पाएगा क्योंकि उसके साथ में और कुछ
भी दिमाग में चीजें हुई होगी। आपको किसी को भी नहीं बेचना है। सिर्फ आपकी जो राइट ऑडियंस है उसी को देना है। हाँ, मैं तो जब भी मैसेज मार्केट भी करता हूँ, मैं यही बोलता हूँ हमेशा ना की भाई जरूरत है तो ले लेना।एक बार लैंडिंग पेज जरूर पढ़ लेना। उसमें सब लिखा हुआ हमने एक बार लैंडिंग पेज जरूर पढ़ लेना। हमेशा लैंडिंग पे लैंडिंग पे ही बोल दो क्योंकि उसमें ना सब डाल रखा है कई बार क्या होता है? बोलते बोलते मैं भूल जाता हूँ की यार ये भी बोलना था ये भी बोलना था
मगर लैंडिंग पेज में हमने सारे क्वेश्चन्स के ऑसर दे रखे है। उसमें हर चीज़ लिखी हुई हमने इन फॅक्ट वीडियो के नाम उसकी ड्यूरेशैन तक डाल रखी है।ताकि कल को किसी को ये ना लगे कि भाई कोर्स में देखो, ये नहीं मिला। कोई एक ऐसा ऐड कैंपेन है जिसमें पूरे आपके पूरे करियर में, एक्सपीरियंस में कि जिसमें मतलब बहुत अच्छा एक्सपीरियंस हुआ हो और बहुत मज़ा आया वो करने में या फिर एक ऐसा एक्सपीरियंस दोनों ही बताना है। के जो बहुत बुरा हो, जिसमें मतलब ले के लगाओ कि यार ये नहीं लेता तो बेटर रहता
है। इससे तो अच्छा यार मज़ा तो बाद में बहुत आया, मतलब जीतने भी कैंपेनस हमने रन करे क्योंकि क्या होता था जब क्लाइंट को 1 साल डेढ़ साल हो चुका है ना, वैसा रिटेनर में उसको जो बोल रहे हो वो मान रहा है।तो बहुत मज़ा आता था। उस टाइम तो सही बताऊँ तो बढ़िया रिजल्ट्स आते थे। उसके तो हर बार नए चैलेंजेस होते थे। इसलिए अगर मैं दूसरे साइड में बात करके चलूं, मज़ा नहीं आया? वो मैं कहूंगा अर्ली टाइम पे जब मैंने इंज्यूरिंग के टाइम पे क्लाइंट्स लिए थे, उस टाइम पे ऐड रन करी
थी उस टाइम पे। ऐसा लगता था अक्सरकि ये क्या कर लिया भाई ये क्या हो गया कोई ऐसी है पर्टिकुलर एक क्लाइंट की कोई स्टोरी या ऐसे कुछ जिससे लगा हो जिसमें के यार पता है क्या? मैंने ना इतना काम कर दिया ना मुझे कुछ कुछ याद नहीं रहता। अब मैं ये नहीं चाहता कि बीच बीच की कहानी सुनाऊं। बट कहानी यही थी, मतलब ये मान के चलो।हमने क्लाइंट की ऐड उठा ली की चलायेंगे। ऐड चला के देखी तो रिसाल्ट ही नहीं आ रहे थे रिसाल्ट इन दी सेंस की हम उसको प्रॉफिटेबली काम नहीं करवा
पा रहे थे और हमको समझ में नहीं आ रहा है ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि हम को आता ही नहीं है रीसन ही नहीं पता थे।हम हिट एंड ट्राई इंटरनेट से सर्च मार रहे हैं। कोई कह रहा है ऐसा कर लो, कोई कह रहा है ऐसा कर लो ऐसा कर लो हम सब करके देख रहे हैं। रिसाल्ट ही नहीं आ रहा। मैंने कहा भाई ये तो गलत हो रहा है तो फिर पता नहीं था वो क्यों हो रहा है क्योंकि अक्चवली मार्केटिंग खाली ऐड चलाना नहीं है। ना ऑफर क्रियेशन भी है प्रॉडक्ट को बेटर
समझना भी है। 10 चीजें सर्विस बिज़नेस, वर्सस प्रॉडक्ट, बिज़नेस सर्विस, बिज़नेस सर्विस, बिज़नेस प्रॉडक्ट बिज़नेस मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है क्योंकि करके देख लिया ना केमिकल का काम प्रॉडक्ट बिज़नेस ही था। मैं ये नहीं कह रहा कि वो प्रॉफिटेबल नहीं होता। उसमें ये नहीं होता। मुझे पर्सनली वो समझ में नहीं आता।क्योंकि वहाँ पर डेलिवरी मेरे हाथ में नहीं होती है, डेलिवरी इन दी सेंस की मान लो, मैंने किसी को माल भेजा मान लो ट्रक पलट गया। रस्ते में कुछ जाम हो गया। उस चक्कर में प्रॉडक्ट रुक गया। अभी किसान आंदोलन शुरू हो जाएगा। किसान आंदोलन
के चक्कर में डेलिवरी रुक गई।लॉजिस्टिक वाले ने रस्ते में माल बदल दिया, कस्टमर प्रॉडक्ट पहुंचा और उसने कहा भाई ये वाला प्रॉडक्ट नहीं है, कोई और प्रॉडक्ट है, प्रॉडक्ट को स्टोर करके रखना है, कहीं पर खत्म हो जाए तो पीछे से फिर रेपलेनिश करवाना है। रेपलेनिश के अंदर भी कोई ना कोई इश्यू आ गया तो वो दिक्कत है।प्रॉडक्ट क्वालिटी को कन्सिस्टन्ट्ली मेंटेन करना रीलेटिवली मुझे मुश्किल लगता है सर्विस के अंदर ये सारी चीजें ना हाथ में है। डेलिवरी हाथ में है, इसलिए मुझे सर्विस पसंद है। सर्विस बिज़नेस मुझे बेटर समझ में आता है। मतलब सीधी
सी बात समझ में दोनों आते हैं क्योंकि दोनों करके देखें।एजेंसी में हमने प्रॉडक्ट को ही स्केल किया है। मजोरली सर्विस वाले रीलेटिवली बहुत कम क्लाइंट्स रहे। हमारे पास बट हमने दी तो सर्विस ही है। ना तो डिजिटल प्रोडक्ट्स प्रोडक्ट्स होते हैं नहीं। क्लाइंट्स के प्रॉडक्ट, क्लाइंट्स, क्लाइंट्सज्यादातर डी टू सी ब्रांड्स ही होते थे या कोई इकॉमर्स ब्रांडी होता था। ऐसे ऐसे ब्रांड्स होते थे, उन्हीं की मार्केटिंग कम नहीं होती थी। कुछ बी टू बी क्लाइंट्स होते थे, उनकी मार्केटिंग कम नहीं होती थी तो उनके तो प्रॉडक्ट बिक रहे हैं, वो तो प्रॉडक्ट बेस बिज़नेस है।
बट हम तो सर्विस दे रहे थे ना उनको हेडेख किसमे ज्यादा होते हैं? बी टू बी में बी डी टू सी में। अगर एस ए खुद बिज़नेस ऑपरेट करना है, हाँ आपने मतलब जैसे आप करते हो हेड अप हेड अप डी टू सी में ज्यादा टेंशन है, डी टू बी में उतनी टेंशन नहीं है। प्रॉडक्ट वाइज अगर देखा जाए तो अच्छा डी टू सी वाले ज्यादा तंग करते।ये डी टू सी में नंबर ऑफ कस्टमर्स बढ़ गए। ना जितना नंबर ऑफ कस्टमर बढ़ गए उतनी ज्यादा परेशानी बढ़ गई। बी टु बी के अंदर नंबर ऑफ कस्टमर
कम है तो उतनी कम परेशानी है। टॅच पॉइंट्स बहुत कम हो जाते हैं जीस चक्कर में इन्ट्राक्ट करना आसान हो जाता है जैसे हमारा केमिकल वाला काम होगा। 4050 कस्टमर्स हो गए मैक्सिमॅम 4050 कस्टमर्स को हैंडल करने के लिए आपको बहुत बड़ी सेल्स टीम बहुत बड़ी कस्टमर सर्विस टीम नहीं चाहिए। आपको मजोरली क्या चाहिए होता है? बी टु बी के अंदर लेबर, लेबर केन्द्रिक बहुत ज्यादा है। मतलब डिपेंड्स की काम क्या क्या है? बट जैसे हमारा केमिकल काम है वहाँ पे लेबर केन्द्रिक बहुत ज्यादा काम है। ट्रक आना, ट्रक जाना, माल लोड होना, अनलोड होना
ये वाली टेंशन है। निष एक पर्टिकुलर निष को चुनना जरूरी है। जैसे डिजिटल मार्केटिंग में कुछ लोग सारी सर्विस देते हैं। कुछ लोग सीओ देते हैं या डी टू सी का ही काम करेंगे। निष इडली मेरा ऐसा मानना है कि अच्छी चीज़ है निष आज के टाइम पे, क्योंकि आज के टाइम पे कॉम्पिटिशन बहुत बढ़ गया है। आप अपने आप को स्टैंड आउट कैसे करोगे? स्टैंड आउट करने के लिए एक अच्छा तरीका हो गया है नी सेलेक्शन अभी जैसा एग्ज़ैम्पल के लिए एक बंदा है जो कहता है मैं डिजिटल मार्केटिंग करता हूँ और दूसरा बंदा
कहता है मैं खाली। डी टू सी ब्रांड्स के लिए डिजिटल मार्केटिंग करता हूँ तो अगर किसी का डी टू सी ब्रांडी होगा तो किसको ज्यादा वो देखेगा? इससे क्या होता है? नी सेलेक्ट करने से कहीं ना कहीं आप अपने आप को डिफ्रेंशीएट कर पाते हो जिसकी वजह से आप आराम से लोगों को कॉनवर्ट कर पाते हो। अगर मैं सर्विस पॉइंट ऑफ़ क्यूँ से बात करूँ? कई के लोग कहते हैं कि खाली मैं वेबसाइट का काम करता हूँ। एस यु का काम करता हूँ, गूगल ऐड का काम करता हूँ। मुझे पर्सनली लगता है स्टार्टिंग के लिए
किया जा सकता है, पर लॉन्ग टर्म में कभी भी आलू, टमाटर, प्याज बेच के आप बड़ा बिज़नेस नहीं बना पाओगे। बिज़नेस तो बनेगा दाल मखनी, चाय, पनीर बेच के मतलब एक कंप्लीट पैकेज भेज के एक बिज़नेस आया है, उसकी प्रॉब्लम है ग्रोथ। आप उसको ग्रोथ सॉल्व करके दे रहे हो, चाहे उसके लिए वेबसाइट बने, लैंडिंग पेज बने, गूगल ऐड चले, फेसबुक ऐड चले, व्हाट्सएप मार्केटिंग को कुछ भी हो, हम सब करेंगे तो अगर नी सेलेक्ट करनी है।प्रॉडक्ट मतलब सर्विस पॉइंट ऑफ क्यूँ से नीच ना सेलेक्ट करके इंडस्ट्री पॉइंट ऑफ क्यूँ से अगर नीच सेलेक्ट करी
जाए तो ज्यादा बेटर है स्टार्टिंग ऑफ दी करियर आप चुन सकते हो की हाँ, मैं खाली वेबसाइट बनाऊंगा वेबसाइट के बाद में फिर मैं वेबसाइट के अंदर ही सु कर दिया करूँगा। उसके बाद फिर मैं लोकल एसीयू की तरफ जाना शुरू कर दूंगा। क्योंकि वो साथ में लिंक्ड चीज़ है। फिर मैं गूगल सर्च ऐड शुरू कर दूंगा। गूगल सर्च ऐड के बाद में फिर मैं डिस्प्ले में जाऊंगा, डिस्प्ले के बाद में फेसबुक ऐड्स भी शुरू कर दूंगा। फेसबुक ऐड्स के साथ साथ में सोशल मीडिया मार्केटिंग भी शुरू कर दूंगा, उसके बाद में इन्फ्लुयेन्स ऑफ मार्केटिंग
भी शुरू कर दूंगा।फिर मैं ब्रांडिंग का पूरा पैकेज भी बनाना शुरू कर दूंगा। प्रॉडक्ट की पैकेजिंग वगैरह वगैरह। बट ये तो एक ग्रोथ प्लान है कि जीस तरीके से आप ग्रो करोगे, उस हिसाब से बता रहा हूँ, बट नहीं सेलेक्ट करना हमेशा से ही बेटर है। आज के टाइम पे हमारे टाइम पे कोई नीच नहीं होती थी, क्योंकि कॉम्पिटिशन ही नहीं होता था।हमारा तो काम ये था मतलब सिंपल सी बात हम लोगों को प्रॉफिट डेलिवर करके देते थे। बात खत्म अब वो प्रॉफिट डेलिवर कैसे कर रहे हैं, क्या चला रहे हैं? क्या नहीं चला रहे
हैं वो बाद की बात होती थी। अब इसके चक्कर में हमारा मार्केट में ट्रस्ट था तो लोग रेफर भी कर देते थे। एक दूसरे को। उनकी कोई जान पहचान वाला, कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार कोई शुरू करता था तो आगे रेफर लग जाता था। क्यों की उनको पता है हम प्रॉफिट कमा के देंगे और इंटरनेशनल्ली लोगों को प्रॉफिट ही चाहिए होता था की भाई मैं इतने रुपए लगा रहा हूँ, मुझे कितने रुपए मिलेगा? बस मैथ्स हो मेरे लिए, क्लियर मैं लगाता जाऊंगा। इंडिया के अंदर प्रॉब्लम मैंने पर्सनली देखी है कि वो दूसरे के प्रॉफिट पे नजर
मारते हैं कि मैंने इतना कमाया नहीं। तुने कितना कमाया ये बता बस मेरा गाना ही है और सही सेलेक्ट भी करने आना चाहिए यानी मतलब।निष तो सेलेक्ट कर लिए या मान लो किसी ने गलत ही सेलेक्ट कर लिया तो एक तो बहुत ही स्पेसिफिक हो गए और जो बिज़नेस बाकी चीजों से आ सकता था, वो भी हाथ से गया को क्या सेलेक्ट करना है वो मुझे लगता है थोड़ा डिटेल्ड टॉपिक है।सबसे पहले आपको आइडियली कोशिश करनी चाहिए। नीच वो सेलेक्ट करो जिसमे आपको खुद मज़ा आये। जो चीज़ आपको चमकती हो ठीक है, दूसरा उसका टाइम
भी ठीक ठाक हो। मतलब ज्यादा से ज्यादा मतलब उसके लोग भी हो जो आपकी सर्विस ले सकते है। मेरे को चमकता है रोड़ी पत्थर।अब मैं रोड़ी पत्थर वालों की मार्केटिंग करूँगा, बट रोड़ी पत्थर वाले तो मार्केटिंग कराएंगे, नहीं तो यहाँ बिज़नेस ही नहीं बन पाएगा तो मुझे उस तरीके से सोचना होगा कि जो मुझे पसंद आता है और उसका टाइम भी हो, मतलब वही मैं कह रहा हूँ ना ये 1 घंटे का टॉपिक है ये।नी सेलेक्शन की किस तरीके से करनी चाहिए, किस तरीके से नहीं करनी चाहिए? बट आइडियली मान के चलो स्टार्टिंग के लिए
जो मज़ा आ रहा है ना, वो शुरू कर दो। हमने अपने चैनल के ऊपर एक वीडियो भी डाल रखे है नी सेलेक्शन पे वो देख लेना जैसे बोलते हो आप मज़ा आना चाहिए। तो बिज़नेस करने में पैशन कितना जरूरी है?बहुत ज्यादा मेरा ऐसा मानना है। सबसे ज्यादा जरूरी वही है, देखो ऐसा नहीं है कि बिना फैशन के बिज़नेस नहीं होता। मैं बहुत सारे ऐसे लोगों को जानता हूँ जो रोते रहते हैं। हाँ मज़ा नहीं आता यार ऑफिस नहीं जाना यार मज़ा नहीं आ रहा, मज़ा नहीं आ रहा, मज़ा नहीं आ रहा, मज़ा नहीं आ रहा।पर
वो बंदे महीने का 303040 ₹40,00,000 का प्रॉफिट कमा रहे होते हैं। मज़ा ही नहीं आ रहा है और मैंने ऐसे लोग भी देखे जो के भाई बहुत मज़ा आ रहा है। भाई मज़ा आ रहा है, मज़ा आ रहा है वो ₹20,000 महीने का नहीं कमा पाते तो पैशन बहुत जरूरी है। बट।मतलब मेरा ऐसा मानना है कि पैसा तो एक बहुत अच्छी चीज़ है जिससे आप खुश रहते हो, क्योंकि ना सक्सेस की डेफिनिशन क्या है? खुश रहना ना की आप कितना कमाते हो अगर मैं कोई काम करता हूँ और मैं सुकून से सोता हूँ और सुकून
से काम करता हूँ ना तो मेरे लिए वो सक्सेस है। ये मेरी डेफिनिशन है सक्सेस की।तो अगर लाइफ में सुकून है तो मैं सक्सेसफुल हूँ तो अगर मैं ₹20,000 कमा रहा हूँ, ₹30,000 कमा रहा हूँ तो मैं सक्सेसफुल ही हूँ और अगर लाइफ में सुकून नहीं है और मैं ₹50,00,000 भी कमा रहा हूँ तो भी मेरे को सक्सेसफुल नहीं है क्योंकि मैं रोता ही रहता हूँ ज़िन्दगी भर। तो इसलिए मतलब मेरा ऐसा मानना हैं की दुनिया आपको कैसे प्रोसीड करती हैं वो इम्पोर्टेन्ट नहीं हैं। आप खुद को कैसे प्रोसीड करते हो वो इम्पोर्टेन्ट हैं? तो
अगर आप दुनिया के बारे में ज्यादा सोचते हो तो पैशन को किल करो उस डायरेक्शन में जहाँ ज्यादा पैसा कमा सकते हो? अगर आप दुनिया के बारे में नहीं सोचते अपने सुकून के बारे में।अपने बारे में ज्यादा सोचते हो तो फिर वो चीज़ करो जीसको आपको पैशनेट करती है, येट पैसा भी देती है, घर भी चलना चाहिए ना ऐसे पैशन का क्या करेगी? जीस से घर नहीं चलेगा, बट उतना पैसा आ जाए की पैशन भी रहे और खुशी भी रहे।उन चीजों के पीछे मत भागो जिसमें पैसा नहीं खत्म हो जाए। बहुत सारे लोग है ना
जो कॉर्पोरेट्स में जॉब कर रहे हैं, सुबह उठते हैं, रात को सो जाते हैं, उनको पता ही नहीं है। दिन भर में क्या हुआ? रोबोट्स की तरह काम कर रहे हैं। कहने को उनका पैकेज बहुत अच्छा है। डेढ़ लाख रुपए ₹2,00,000 महीना मिल रहा है उनका कंपनी से।वो डेढ़ ₹2,00,000 के लिए घिसे पड़े हैं, उनको पता ही नहीं है क्या हो रहा है ज़िन्दगी में तो मेरा मानना है कि उस डायरेक्शन की तरफ भी मत जाओ कि ज़िन्दगी बस बीत रही है, पैदा हुए हैं यार मज़े लेने के लिए ही हुए है ना तो लाइफ
को एन्जॉय तो करते रहना चाहिए।ये माइंडसेट नहीं होना चाहिए। भाई 40 साल के बाद जब रिटायर करेंगे तब जिंदगी के मज़े लेंगे। अभी लेते हैं ना? मज़े बाद में देखेंगे बाद में और मज़े ले लेंगे। अगर अभी बहुत मज़े लेंगे तो 40 के बाद और मज़े ले सकते हैं। इस मैएंडसेट से जियो राइट नहीं, ये इसके लिए भी पूछ रहा था।की मैंने जैसे दो चीजें सुनी है दो टाइप दो कैटेगरी है। एक तो मतलब जैसे आप बोल रहे हो के बिज़नेस में पैशन होना चाहिए। मतलब पैशन रहेगा तो क्या करने में मज़ा आएगा और काम
फटाफट होते रहेगा और पैसे भी आते रहेंगे और एक इसका ऑपोजिटजैसे सुना हुआ है। वह आता है कि काम है ना पैशन वाला नहीं होना चाहिए क्योंकि पैशन आज है कल चेंज हो जाता है जितना बोरिंग बिज़नेस जैसे मैं अभी एक रील देख रहा था निखिल कामत जी की तो उन्होंने बताया कि जोजो सबसे ज्यादा बोरिंग बिज़नेस होते हैं वो सबसे ज्यादा प्रॉफिट बनाते हैं। तो ऐसे होता है प्रॉफिट, ज्यादा बनाते हैं बिज़नेस बोरिंग वाले नहीं, उनकी देखो सिंपल सी बात बात तो यही है ना। बिज़नेस का सबसे बड़ी चीज़ ये है कि कोई सही
नहीं कोई गलत नहीं है।वो उनकी लाइफ का एक्सपीरियंस ऐसा है कि उन्होंने ऐसा देखा जो बोरिंग बिज़नेस होते हैं, वो पैसा कमाते हैं। अगर हम कहे कि वो पैशनेट नहीं थे, अपने बिज़नेस को लेके तो ये झूठ है। अगर आप निखिल कामत को देखोगे मतलब मैंने उनका इंटरव्यू लिया था। दोनों ने कंपनी शुरू करी।जो नितिन कामत थे वो ऑपरेशन देख रहे थे। निखिल कामत जो थे वो नौकरी कर रहे थे। मतलब वो ट्रेनिंग कर रहे थे। अक्टिव ट्रेनिंग से वो पैसा कमा रहे थे जिससे कंपनी चल पा रही थी। तो अगर बंदे का पैशन नहीं
होता, मज़ा नहीं आ रहा होता तो वो क्यों पैसे डालते? और आज भी वो कर रहे है। आज भी वो इन्वेस्ट कर रहे है अगर हम देखें रूल्स बदल गए इन्वेस्टमेंट के वो अब शायद ट्रेनिंग नहीं कर रहे है। अब वो स्टार्ट अप में इन्वेस्ट कर रहे है पर उनको पैसे से पैसा बनाने में मज़ा आता है ना? सबकी लाइफ की बात अलग है ना इट्स बेटर की आप लाइफ को खुद से एक्सपीरियंस करो और खुद से देखो की आपके लिए क्या चीज़ सही है। मुझे लगता है कि अगेन मैं लकी रहा। मेरे सही टाइम
पे सही चीजें पकड़ता चला गया जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता था। मुझे मज़ा भी आ रहा था। उस चीज़ के अंदर पैसा भी मिल रहा था।और वो करके इंडस्ट्री इतनी बड़ी बन गई कि भाई मैं मतलब वो पैशन के साथ में पैसा भी मिलने लग गया। इससे बढ़िया क्या है? बस मुझे नहीं पता था ना, पर मैं वही कह रहा हूँ की वो पाथ बना होता है। सबके लिए इट्स बेटर की किसी को रेप्लिकेट करने की जगह अपनी स्टोरी खुद बनाओ।सबके आइडियास लो सबके आइडियास समझो की कौन क्या कह रहा है, क्या कह
रहा है, क्या कह रहा है, क्या कह रहा है क्योंकि सबके एक्सपीरियंसेस है, बट हमारे अलग हो सकते है ना यार? जैसे नितिन गाहबत मान के चलते है और मैं अपने आप को मान के चलता हूँ। दोनों को कंपेर करते है, ठीक है तो ये नितिन गाहबत वगैरह जो थे।इन दोनों दोनों भाइयों ने साथ में काम किया। दोनों एक दूसरे को सपोर्ट किया तो दोनों का सपोर्ट था एक साथ में जिसकी वजह से बिज़नेस चल रहा था। इन्होंने एक भाई ने पैसे कमा के दूसरे बिज़नेस में डाले और दूसरे भाई को काम करने में मज़ा
आ रहा था। उसके बाद में बहुत है, नोटबंदी होती है। उसके बाद में आधार आता है। आधार आने के बाद में बेसिक्ली क्या होता था? पहले जो डीमैट अकाउंट खुलता था उसका प्रोसेसर होता था। तीन 4 दिन का बड़े डॉक्यूमेंटेशन होते थे। बहुत टाइम लगता था। पूरा फॉर्म भरने में आधार वेरिफिकेशन से क्या हुआ? मिनट्स के अंदर अकाउन्ट खुलने शुरू हो गए। अब लुक्किली इनके पास में एक बंदा आ जाता है जो की इनका बन जाता है और वो इनको वो टेक्नोलॉजी बना के दे देता है और वो सब कुछ जोड़ता चला जाता है और
आज इतना बड़ा बिज़नेस बन जाता है। देखा जाए तो उसमें कहीं ना कहीं लक फॅक्टर्स भी तो इन्वॉल्व लगते है। ना की अचानक ये चीज़े कैसे हो गयी? क्या हो गया, क्या नहीं हो गया?सिमिलरली मैं अपना चलता हूँ, मैं एक बिज़नेस फैम्ली में बड़ा हुआ, बचपन से बिज़नेस बिज़नेस सुना फनैन्शली उतने सही नहीं थे। इंजीनियरिंग करने गया तो पैसों का था। मैं क्रिकेट खेलने का शौक था। मैं बहुत अच्छा क्रिकेट नहीं खेलता था पर मुझे शौक था वहीं पे मैंने दोस्ती यारी कर ली क्योंकि मुझे बोलने का शौक था। एक बंदे ने मुझे काम दे
दिया और मैंने हाँ भी बोल दिया जो की मुझे आता भी नहीं था, मैंने वो कर दिया आगे रेफरल आने शुरू हो गए, वो होता के चला गया। मुझे पता ही नहीं है मैं क्या कर रहा हूँ एमबीए करने गया, मुझे पता ही नहीं था कि मैं ये काम को कंटिन्यू भी करूँगा। मेरा तो दिमाग था कि केमिकल का काम करेंगे। एमबीए कंप्लीट करते करते मुझे रियलाइज हुआ ये काम में ठीक जा रहा हैं। भाई चलने दो, उसको भी बंद क्यों करना हैं? उसके बाद यूट्यूब शुरू होता हैं। फिर धीरे धीरे डिजिटल बूम आता हैं।
सब कुछ होता हैं और सब कुछ फिगर आउट हो तो चला जाता हैं। फिर एक बंदा आता हैं, कहता हैं भाई कंपनी मतलब एक वो होता हैं, हमारा क्लाइंट होता हैं, वो कहता हैं भाई कंपनी भेज दे और मैं कंपनी भेज देता हूँ।ऐसा थोड़ी ना होता है। अगर सोचोगे तो ये बहुत सारे लक हुए है ना फैक्ट अलग अलग चीजें हुई है ना तो मेरी स्टोरी के अंदर लक अलग अलग थे, अलग अलग ड्यूरेशॅन के अंदर थे। नितिन कामत के अलग अलग लक थे और अलग अलग ड्यूरेशॅन के अंदर था। ऐसे ही आपके साथ भी
होगा ना आपकी लाइफ अलग है। हमारे टाइम पे अलग चीजें थी। किसी के टाइम पे आज अलग चीजें है तो हम किसी को कॉपी ना मार के उससे इंस्पिरेशन ले के अपना पाथ खुद ढूंढे तो बेटर रहेगा। राइट। फ्यूचर में कौन सी नेशन ज्यादा चलने वाली है? डिजिटल मार्केटिंग में बहुत ग्रोथ आने वाली है। ए आई।मुझे लगता है ए आई मार्केटिंग बिज़नेस ऑटोमेशन ऐसी वाली चीज़ है की बिज़नेस के सिस्टम्स को कैसे हम ए आई से ऑटोमेट कर सकते है उनकी मार्केटिंग को कैसे ए आई से थोड़ा सिस्टेमाइज़ कर सकते है? सोल एजेंसीज हमको बढ़ती
हुई दिखाई देगी सोल एजेंसीज मतलब सोलो प्रिनर्स।अकेला एक बंदा पूरी एजेंसी रन कर रहा होगा। ये ए आई रेप्लस कर सकता है डिजिटल मार्केटर्स को कर देगा, कर देगा मतलब देखो सिंपल सी बात रिप्लेसमेंट की डेफिनिशन समझो।रिप्लेसमेंट की डेफिनिशन ये है जो 10 बंदे काम करते थे, आज वो एक बंदा काम कर पाएगा तो नौ बंदे तो रेप्लस हो गए ना? जॉब लेस्स हुआ हाँ तो एक बंदा रहेगा। ये नहीं होगा कि एक भी ना रहे एक रहेगा जो सब कुछ देखेगा, एग्ज़िक्यूट करेगा, मॉनिटर करेगा।इस साल हम देखेंगे, एजेंट्स आएँगे। ए आई एजेंट्स आएँगे, इसको
हम टास्क देंगे, वो टास्क कर देंगे। पूरा पूरा मतलब मैंने उसको बोला कि भाई ये क्लाइंट है इसकी फेसबुक ऐड रन कर दे तो अपने आप फेसबुक खोलेगा और फेसबुक ऐड रन कर देगा। हाँ, ये मैंने भी सुना है तो अगर ये मतलब ऐसा हुआ नहीं है अभी तक ए आई एजेंट्स पे। टूल्स बनते हुए दिखाई देंगे। ये एजेंट्स को जब स्केल हो जाएगा तो तो जब ये वाला सीन होना शुरू हो जाएगा तो ऐड तो रन कर ही देगा। अब हमको कौन बंदा चाहिए? हमको वो बंदा चाहिए जो देख पाए ऐड सही से चल
रही है या नहीं चल रही है। जो ए आई ने ऑफर क्रियेशन किया है वो सही किया है या नहीं किया लैंडिंग पेज क्रियेट किया है, वो सही किया है या नहीं किया?क्या प्रॉडक्ट को ढंग से समझ पाया नहीं समझ पाया अगर ऐड कहीं पे फट रही है या कहीं पे मतलब सिंपल सी बात है, फेसबुक तो ऐड चलाता रहेगा, तुम पैसे डालते रहो, चलता रहेगा हमको ऐसा मार्केटर पता है ना? कब पॉज़ करना है कब नहीं करना। कौन सी ऐड को पॉज़ करना है कौन सी ऐड को नहीं करना कई कई जगहों पे होता
है डेटा ड्राइवर डिसीजन भी नहीं होते। मतलब हम एक बार को ये कहेंगे डेटा ड्राइवन हमने कोई ए आई को सीखा दिया की इफ थिस हैप्पन्स देन स्टॉप थिस इफ थिस हैप्पन्स देन स्टार्ट थिस बट कई बार पता है क्या होता है? हम ऐड रन कर रहे होते है। मुझे लगता है यार ये ऐड परफॉर्म करनी चाहिए थी करी नहीं यार, मुझे लगता है ये गलत हुआ है कुछतो हम क्या करते हैं? उस ऐड को बंद करके उसको डुप्लीकेट करके फिर से स्टार्ट कर देते हैं, क्यों? मुझे लगता है यार ये बढ़िया थी ऐड मेरा
खुद खुद का मानना है ऐड बढ़िया थी, अब अब मैंने डुप्लीकेट करके स्टार्ट क्यों किया? ताकि नई ऑडिएंस डिस्कवरी हो बेसिक्ली ऐड को समझने की कोशिश करो। हो क्या रहा है?फेसबुक स्टार्टिंग में कुछ लोगों को आपके ऐड दिखाता हैं। वो लोग जैसे बिहेव् करते हैं, उसके हिसाब से आगे लोगों को दिखाता हैं। जो जैसे बिहेव् करते हैं उसके हिसाब से आगे लोगों को दिखाता हैं। क्योंकि सिंपल सी बात जब हम ऐड रन करते हैं तो हमको दिखाता हैं वो 15 मिलियन लोगों तक पहुँच सकते हैं। बट हमारे पास इतने पैसे थोड़ी ना होता हैं। 15
मिलियन लोगों तक पहुँचने केहम तो 1,00,000 लोगों तक पहुँच जाएंगे, 2,00,000 पहुँच जाएंगे, 3,00,000 पहुँच जाएंगे और अगर हम अक्चवली मार्केटिंग कर रहे हैं तो हमको 3,00,000 लोगों को भी दिन में पांच सात बार दिखानी है। अलग अलग ऐड्स तो इतना बजट तो होता नहीं है नॉर्मल्ली बन्दों के पास तो हम जब ऐड रन करते हैं तो कई बार क्या होता हैं? वो स्टार्टिंग की जो ऑडिएंस होती हैं वो गलत हो जाती हैं। फेसबुक के हिसाब से उसने ऐड रन करि उसने गलत ऑडिएंस में टेस्ट किया, जिसके हिसाब से गलत डेटा आ गए। जैसे एग्ज़ैम्पल
के लिए एक ऐड रन करि उसने, जिसमे 70 लोगों ने क्लिक कर दिया। स्टार्टिंग के पहले 70 ही सही हो गए तो आपको डेटा पॉइंट्स में अच्छा दिखने लग जाएगा।डेटा बहुत अच्छा चल रहा है। ऐड बहुत अच्छी चल रही है। बट अक्चवली वो शायद डेटा अच्छा ना हो डेटा या रिवर्स स्टार्टिंग में 200400500 बन्दों को फेसबुक ने ऐड दिखाई और गलती से फेसबुक ने ये सोचा कि ये देखेंगे और अक्चवली उन्होंने परफॉर्म ही नहीं किया। ऐड पे तो आपको ऐनालिटिक्स में तो दिखाई दे रहा होगा। ऐड परफॉर्म नहीं करि है।बट एक मार्केटर का दिल कह
रहा है यार ये चलेगी मतलब गुट फीलिंग कह लो कुछ भी कह लो एक्सपीरियंस कह लो उसको पता है यार चलनी चाहिए यार क्यों नहीं चली समझो? तो फिर वो जब डुप्लीकेट करके चलाता है तो एक नई ऑडिएंस के बाद फिर से टेस्ट होती है। फिर पता लगता है कि चली है या नहीं। चली तो ऐसे कई बार दो दो बार इटेरतीओन मार के भी ऐड चल जाती है। बेसिकली वही है की मार्केटर को भी एक्सपीरियंस होना चाहिए। ऐसा मतलब सिर्फ टूल सीखने से कुछ नहीं होता है। वो तो मैं हमेशा से बोलता हूँ की
टूल्स का कोई लॉजिक ही नहीं है। टूल्स तो जीपीटी अब जो मैं कह रहा हूँ ये एजेंट्स आ जाएंगे, वो कर देंगे टूल कोई प्रॉब्लम रही नहीं और टूल कभी भी प्रॉब्लम नहीं थी टूल तो।टूल सीखने के लिए कोर्स क्यों करना है? यार फेसबुक के जाओ फेसबुक के खुद का पूरा डॉक्यूमेंटेशन है, पढ़ लो उनसे बेटर तो कोई भी नहीं सीखा सकता। तुमको दुनिया में मैं भी नहीं सीखा सकता। कई बार मुझे भी नहीं पता होता ये चीज़ कहा है क्योंकि ये वाली चीज़ का मैं कहा यार यहाँ कही होगी क्योंकि कभी वो चीज़े गए
नहीं वहाँ तक। जैसे एग्ज़ैम्पल के लिए जब कोई क्लाइंट ऑन बोर्ड होता है, तो उसके लिए पिक्सेल सेटअप किया जाता है। अब पिक्सेल सेटअप करना इतना बेसिक चीज़ है अब जब आप बड़े हो मतलब जब आपकी टीम बड़ी हो जाती है, तो आप पिक्सेल सेटअप ही नहीं करते, कभी आपकी टीम करती है।अब कोई मुझसे पूछ ले अब तो चलो मुझे समझ में आ गया पढ़ा पढ़ा के बट स्टार्ट जब मैंने पढ़ाना शुरू किया था, बच्चे पूछते हैं भाई पिक्सेल कहा होता हैं भाई, देख लो यहीं कहीं होगा क्योंकि इतना बेसिक होता हैं टूल को यूज़
करना हैं वो तो पता हैं दिमाग पता होता हैं की क्या कहा होना चाहिए लिखा होता सामने।किसको यहाँ डाल दो इसको हेड में डाल दो इसको यहाँ डाल दो इसको वहाँ डाल दो टूल यूज़ करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। कई लोगों को मैंने देखा यूट्यूब पे कहानी मिलते हो की सर्वर साइड ट्रैकिंग करो, सर्वर साइड ट्रैकिंग करो अरे भाई टूल ही तो आता है, कुछ है थोड़ी ना सर्वर साइड ट्रैकिंग करना।एक टूल है, इंटिग्रेट करना तुमको बस बात खत्म सर्वर सर ट्रैकिंग शुरू हो जाएगी बट मेन प्रॉब्लम इस सोचना की क्या चलेगा, क्या
नहीं चलेगा? कोई चीज़ क्यों चल रही है? क्यों नहीं चल रही है मार्केटिंग इस ऑल अबाउट साइकोलॉजी? डीजिटल मार्केटिंग भी साइकोलॉजी ऑन ए डिजिटल प्लेटफार्म ही तो है। जो एक मार्केटर है, उसको लोगों की साइकोलॉजी समझ में आना चाहिए। बिलकुल अगर वो लोगों का बेहेवियर ही नहीं कर पाएगा तो।फिर वो अड्ज़ कैसे प्रेडिक्ट कर पाएगा की ऐड चलेगी नहीं चलेगी बेसिक्ली जो भी अपग्रेड हो जाएगा अपने आपको अपग्रेड करेगा, वो रहेगा बाकी सारे लोग का जॉब जाने वाला है।हाँ, वो तो मैं बोल ही रहा हूँ यार जो लोग नहीं समझेंगे ना ये जो बड़ा चेंज
आ रहा है ए आई की वजह से वो लोग बर्बाद हो जाएंगे। ए आई को इन जनरल कैसे देखते हो आप? बहुत सारे लोग बोलते हैं कि थ्रेट हैं, ह्यूमन्स के लिए और कुछ लोग बोलते हैं, बहुत बेनेफिशियल है कैसे नहीं मैं तो मैं देखता हूँ। बेनेफिशियली मानता हूँ पर्सनली मुझे लगता है कि अच्छा ही है कि हम लोगों का देखो सिंपल सी बात क्या है, जिनके पास पैसा नहीं है ना, उनके लिए थ्रेट क्रियेट हो जाएगा। मान के चलो आने वाले टाइम में तो सबको मैं यही बोल रहा हूँ कि ये दो ढ़ाई साल
हैं। जितना कमा सकते हो, कमा लो, जीस भी तरीके से कमा सकते हो छोटा बड़ा काम जो करना है कर लो यार क्योंकि कहानी क्या है? आने वाले टाइम में ए आइई एक रूल करने वाला हैं और ए आई महंगा होगा, सस्ता नहीं होगा जो नेक्स्ट लेवल चीज़े होगी। जैसे की मान के चलो टेस्ला अपना रोबो निकाल रहा हैं। जीस पे ए आई के लेयर हैं वो मेरी झाड़ू पोछे भी कर देगा मेरा खाना भी बना देगा मेरे घर का सारा काम कर देगा मेरे पेट्स को भी घुमाल आएगा। 14 ₹15,00,000 का हैं।तो फीज़बल है
ना? बहुत सारे लोग ले सकते हैं और कितने लोगों का काम खराब कर देगा? वो घर के अंदर आपकी हाउसवाइफ खत्म हो गई। सिक्योरिटी गार्ड की टेंशन खत्म हो गई। सारी चीजों की टेंशन खत्म हो गई तो उनके लिए तो बहुत प्रोब्लेमैटिक है चीज़। तो कहानी क्या है? आप जो इनके पास जो नहीं ले पाएगा? 14 ₹15,00,000 का रोबो उनको दिक्कत आएगी। मतलब एक एक एग्ज़ैम्पल दे रहा हूँ, मैं उनको दिक्कत आ सकती है या अगर इसको बिज़नेस पॉइंट ऑफ क्यूँ से बात करके चले? तो बहुत सारे ऐसे सीए एस है सीए के नीचे अकॉउंटेंट
काम करते है वो सारा प्रोसेसर ऑटोमेट होना शुरू हो जाएगा। तो अगर आपके पास पैसा होगा तो आप वो ऑटोमेशन खरीद पाओगे। अगर आप वो ऑटोमेशन खरीद पाओगे तो आप मैं कह रहा हूँ ना की ए आई 10 में से नौ लोगों की नौकरी खायेगा बट वो जो नौ नौकरी खायेगा उसके लिए आपको कोई टूल तो खरीदना पड़ेगा ना कोई प्रॉडक्ट सर्विस कुछ तो खरीदना पड़ेगा ना?वो एक्स्पेन्सिव होगा। उसको खरीदने के पैसे होने चाहिए। इंडिया में तो ऐसे भी बजट मार्केट है। मतलब ज्यादातर लोग अफ़ॉर्ड नहीं कर सकते। महंगी चीजें यार वो यही तो कह
रहा हूँ फिर फिर वो ना गैप बढ़ता चला जाएगा फिर लोग कहेंगे हाय हाय मोदी। अमीर और गरीब के बीच में सेपरेशन बढ़ गया हैं। बट कहानी यही होगी की ए आई की वजह से बहुत बड़ा सेपरेशन बढ़ेगा, अमीर और अमीर होगा और जो जिसका पैसा नहीं होगा ना वो बर्बाद हो जायेगा क्योंकि देखो ना गाड़ी ऑटो मशीन की तरफ जा रही हैं। ड्राइवरों की नौकरी जानी हैं। अभी जैसे मैं रोबो बता रहा हूँ, ऐसी चीजें बता रहा हूँ ये चीजें हॉउस, हेल्थ, सिक्योरिटी गार्ड्स इनकी नौकरियां खा जाएगी। थ्री डी प्रिंटिंग वाली जो चीज़ है
वो बढ़ती हुई जा रही है। अभी भी हमने देखा है घर प्रिंट होते हुए। तो क्या पता बिल्डिंग विल्डिंग भी कंस्ट्रक्ट उसी से होने लग जाए अब मान के चलो एक मशीन आ रही है जो की अभी ये पॉसिबल है ये हो रहा है ग्लोबली हो रहा है मान के चलो वो वाली मशीन आ रही है ₹10,00,00,000 की मेरे पास 10,00,00,000 में पड़े है मैंने मशीन खरीद ली। अब किसी को भी बड़ा घर बनवाना हैं, मेरी मशीन जाती हैं। 4 दिन में 7 दिन में घर बना के आ जाती हैं नॉर्मल्ली जीस प्रोसेसर को बनाने
में छह महीने लग रहे थे। मैं 6 दिन में बना के दे रहा हूँ वो घर मार्कअप भी चार्ज कर सकता हूँ उसका अच्छा खासा और खाली मैं ही कर रहा हूँगा तो पूरी मार्केट मेरे पास कैप्चर हो जाएगी। फिर लोग कह रहे हाय हाय टेक्नोलॉजी ने हमारा काम खराब कर दिया, बट इतनी अडवांस चीजें ऐसा लगता है जैसे बहुत ज्यादा लेट आएंगी। मतलब अभी जैसे ऐट लिस्ट नहीं आएगी। हाँ बात ऐसे लगता है नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, इतना टाइम नहीं लगेगा क्योंकि देखो ना अभी अभी आया था कोई ज्यादा टाइम थोड़ी ना हुआ है।अभी
हम बात कर रहे हैं इस साल एजेंट्स आने की एजेंट्स आने का। मतलब हम वेबसाइट के टास्क को ऑटोमेट कर पाएंगे। मतलब वो फेसबुक लॉगिन करके कुछ कर पाएगा। वो गूगल पे मेल भेज पाएगा? मतलब वो मेरा असिस्टेंट है। मतलब हो सकता है कुछ ऐसे एजेंट्स इसी साल देखिये मैं बड़ी बात भी नहीं कर रहा हूँ। इसी साल हम ऐसे एजेंट्स देखें जो मेरे सारे मेल्स रीड करेगा, उनको रिप्लाय करेगा और अगर कोई मीटिंग वीटिंग हो रही होगी, कुछ स्केडुयूल हो रहा होगा, वो मेरे कैलेंडर में ऐड भी कर देगा। एजेंट्स से पॉसिबल है तो
क्या होगा? फिर? जब इसी साल हम एजेंट्स इस लेवल पे देखेंगे और मान के चलोगे भगवान ना करें। एजेंट्स अगर फ़ोन में आ गए और लोकल ही चलने लग गए, फिर क्या होगा? क्योंकि आज के टाइम पे जो प्रोसेसर है, फ़ोन के प्रोसेसर है, वगैरह। वो अच्छे खासे पावरफुल है। फिर क्या हुआ?थिस इस वेरी स्केयरी सीधी सी बात ये है यही है जैसे मैं भी यूज़ करता हूँ तो कुछ चीजें वह ऐसी कर देता है 2 मिनट के अंदर जो मेरे को लगता है, अगर मेरे को करना होता तो मेरे को लगता कम से कम
10 दिन लग जाते। 5 दिन लग जाते 2 दिन लग जाते। ऐसी ऐसी चीजें वो 2 मिनट में करके सारी इन्फॉर्मेशन दे देता है या हम तो चार्ट के पीछे सारा मजदूरी का काम कराते हैं। अभी के टाइम पे जब कोई डेटा को ऑर्गनाइज़ करना होता है कोई एक्सेल शीट बनवानी होती है, कोई डेटा को एनालाइज करना होता है।वो सारी चीजें चार्जिंग से कराते हैं। जीसको खुद मैन्युअली करने में टाइम लगता था। हमारा जो डेवलपर है वो ऐप ऐप डेवलपमेंट के अंदर एआई का यूज़ कर रहा है। नेक्स्ट लेवल। और ये है की उसको भी
सही से खाली प्रॉम्प्ट देने आना चाहिए। यानी मैं कभी कभी जैसे उसको एक जनरल क्वैरी देता हूँ तो बहुत ही गंदा रिस्पांस आता है और मतलब मेरे को पूरी तरीके से नहीं आता है। मुझे लगता है की मुझे लगता है प्रॉम्प्ट भी बहुत इम्प्रूव हो गया। प्रॉम्प्टिंग का सिस्टम ना क्योंकि डेटा इंडिया में अच्छा आ गया। स्टार्टिंग के अंदर प्रॉम्प्ट डालना थोड़ा मुश्किल होता था। प्रॉम्प्टिंग करना भी रीलेटिवली आसान हो गया।अब तो ऑडियो का ऑप्शन आ गया यार अब तो ऑडियो में बोल दो और भाई क्या हाल है बता क्या चल रहा है? वो बताता
रहेगा और मेमॅरि का ऑप्शन है तो मेमॅरि से वो याद भी रखता है तो उसको पता लगता है आप किस कॉन्टेक्स्ट की बात कर रहे हो। अच्छा लगा आपने शो जॉइन किया। इन्फॉर्मेशन तो मेरे को भी काफी सारी मिली है। ऑडिएंस को भी सीखने मिला है ना बहुत।मज़ा आई है आपसे बात करके, थैंक यू, थैंक यू, थैंक यू।