पहला लेसन प्रतिक्रिया नहीं जवाब देना। रिसॉन्ड डोंट रिएक्ट। हमारी जिंदगी में रोज ऐसी सिचुएशंस आती हैं जहां कोई हमें कुछ गलत कह देता है। कोई गुस्सा दिला देता है या हालात हमारे कंट्रोल से बाहर लगने लगते हैं। ऐसे मोमेंट्स में ज्यादातर लोग तुरंत रिएक्शन दे देते हैं। रिएक्शन मतलब बिना सोचे समझे किया गया जवाब, गुस्से में चिल्लाना, कटु शब्द बोल देना या कोई ऐसा फैसला लेना जिसका पछतावा बाद में होता है। यही वजह है कि अशांत लोग अक्सर एक ही गलती बार-बार दोहराते हैं। रिएक्शन हमेशा इमोशन से आता है। लॉजिक से नहीं। जब कोई हमें
इंसल्ट करता है तो ईगो हर्ट होती है और हम तुरंत जवाब देना चाहते हैं। उस समय दिमाग नहीं फीलिंग्स कंट्रोल संभाल लेती हैं। नतीजा यह होता है कि बात छोटी थी लेकिन रिएक्शन ने उसे बड़ा कॉन्फ्लिक्ट बना दिया। बाद में हम सोचते हैं काश उस समय चुप रह जाता या थोड़ा सोच कर बोलता। इसके उलट जो लोग शांत होते हैं वे रिसोंड करते हैं। रिएक्ट नहीं। रिसोंड करने का मतलब है रुकना, समझना और फिर सोच समझकर एक्शन लेना। वे तुरंत जवाब नहीं देते बल्कि सिचुएशन को ऑब्जर्व करते हैं। वे खुद से पूछते हैं क्या अभी
बोलना जरूरी है? इसका लॉन्ग टर्म इंपैक्ट क्या होगा? इमोशन बोल रहा है या बुद्धि? जब हम रिसोंड करते हैं तब हमारे शब्दों में क्लेरिटी होती है। वहां गुस्सा नहीं अवेयरनेस होती है। रिसोंड करने वाला इंसान जानता है कि हर बात का जवाब उसी समय देना जरूरी नहीं होता। कई बार साइलेंस ही सबसे पावरफुल रिप्लाई बन जाता है। मान लो किसी ने वर्क प्लेस पर तुम्हारी मेहनत का क्रेडिट ले लिया। रिएक्शन होगा। गुस्से में सबके सामने लड़ लेना। लेकिन रिसोंड करने वाला इंसान फैक्ट्स कलेक्ट करेगा। सही समय देखेगा और कैमली अपने मैनेजर से बात करेगा। रिजल्ट
रिस्पेक्ट भी बनी रहती है और प्रॉब्लम भी सॉल्व हो जाती है। रिएक्शन शॉर्ट टर्म सेटिस्फेक्शन देता है लेकिन लॉन्ग टर्म डैमेज करता है। रिस्पॉन शॉर्ट टर्म अनकंफर्टेबल हो सकता है पर लॉन्ग टर्म पीस देता है। यही फर्क है इमोशनल पर्सन और मैच्योर पर्सन में। शांत लोग वीक नहीं होते। वे बस अपनी एनर्जी वेस्ट नहीं करते। उन्हें पता होता है कि हर बैटल लड़ना जरूरी नहीं है। कुछ लड़ाईयां छोड़ देना ही असली जीत होती है। जब तुम रिसोंड करना सीख जाते हो तब बाहरी लोग तुम्हें कंट्रोल नहीं कर पाते क्योंकि कंट्रोल अब तुम्हारे अंदर होता है।
इस हैबिट को डेवलप करने के लिए एक सिंपल रूल अपनाया जा सकता है। पॉज बिफोर यू स्पीक। बस 5 से 10 सेकंड्स रुक जाओ। इतना सा पॉज तुम्हारे पूरे लाइफ डिसीजंस बदल सकता है। यही पॉज रिएक्शन और रिस्पांस के बीच की लाइन है। धीरे-धीरे जब तुम प्रैक्टिस करोगे, तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारा स्ट्रेस कम हो रहा है। रिश्ते बेहतर हो रहे हैं और सेल्फ रिस्पेक्ट बढ़ रही है। क्योंकि अब तुम हालात के स्लेव नहीं हो बल्कि कॉन्शियस डिसीजन मेकर बन चुके हो। याद रखो रिएक्शन आपको कमजोर बनाता है। रिस्पांस आपको पावरफुल। जो इंसान खुद पर
कंट्रोल सीख लेता है, दुनिया अपने आप उसके कंट्रोल में आने लगती है। दूसरा लेसन ऊर्जा की बचत, सेविंग एनर्जी। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी थकान ज्यादा काम करने से होती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी ज्यादातर एनर्जी काम से नहीं इमोशंस से खत्म होती है। गुस्सा करना, बेवजह बहस करना, छोटी-छोटी बातों पर घबराना और हर चीज को लेकर ओवरथिंक करना। यह सब हमारे शरीर और दिमाग दोनों की एनर्जी चूस लेते हैं। दिन भर कुछ खास काम ना करने के बावजूद अगर हम एग्जॉस्टेड महसूस करते हैं तो उसका रीजन फिजिकल नहीं बल्कि मेंटल होता
है। जब हम गुस्सा करते हैं तब सिर्फ मूड ही खराब नहीं होता बल्कि हमारी बॉडी भी अलर्ट मोड में चली जाती है। हार्ट बीट तेज हो जाती है। दिमाग के हो जाता है और पूरा सिस्टम अननेसेसरी स्ट्रेस में आ जाता है। यही प्रोसेस बहुत ज्यादा एनर्जी कंज्यूम करता है। बहस में पड़ना भी ऐसा ही है। सामने वाले को जिताने या हराने की कोशिश में हम अपनी शांति और ताकत दोनों हार जाते हैं। शांत लोग इस बात को अच्छे से समझते हैं। वे जानते हैं कि हर बात रिएक्शन के लायक नहीं होती। इसलिए वे खुद से
पूछते हैं क्या यह सच में मेरी एनर्जी के लायक है? अगर जवाब नहीं होता है तो वे उस बात को छोड़ देना बेहतर समझते हैं। यह कमजोरी नहीं बल्कि इंटेलिजेंस है। एनर्जी एक लिमिटेड रिसोर्स है। सुबह उठते समय हमारे पास एक तय मात्रा मेंटल और फिजिकल एनर्जी होती है। अगर हम उसे सुबह-सुबह ही नेगेटिविटी, कंप्लेंट्स और आर्गुमेंट्स में खर्च कर देंगे तो दिन के जरूरी कामों के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। इसलिए शांत लोग अपनी एनर्जी को प्रोटेक्ट करते हैं। जैसे कोई कीमती करेंसी हो। वे बहस जीतने से ज्यादा अपने गोल जीतने पर फोकस करते
हैं। उन्हें दूसरों को प्रूव करने से ज्यादा खुद को इंप्रूव करना जरूरी लगता है। यही वजह है कि वे ड्रामा से दूर रहते हैं। टॉक्सिक लोगों से डिस्टेंस बनाते हैं और अननेसेसरी डिस्कशंस में नहीं उलझते। घबराहट यानी एंजायटी भी एनर्जी की सबसे बड़ी थीफ है। बार-बार फ्यूचर के बारे में सोचना। अगर ऐसा हो गया तो जैसे सवाल दिमाग को थका देते हैं। शांत इंसान प्रेजेंट मोमेंट पर टिके रहते हैं। वे जानते हैं कि चिंता करने से प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होती बल्कि एनर्जी खत्म हो जाती है। जब आप अपनी एनर्जी बचाते हो तब आप उसे सही
जगह इन्वेस्ट कर पाते हो। अपने स्किल्स पर, अपने हेल्थ पर, अपने ड्रीम्स पर। यही सेव्ड एनर्जी धीरे-धीरे डिसिप्लिन बनती है, फोकस बनती है और कंसिस्टेंसी में बदल जाती है। आपने देखा होगा कि सक्सेसफुल लोग ज्यादा शोर नहीं मचाते। वे चुपचाप काम करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि नॉइज़ एनर्जी लेता है। साइलेंस एनर्जी देता है। अगर आपको हमारी फ्री समरी अच्छी लगती है तो आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं। हमारी मेंबरशिप खरीद सकते हैं या हमें यूपीआई के थ्रू सपोर्ट कर सकते हैं। अब समरी पर वापस चलते हैं। उनका काल एटीट्यूड उनकी सबसे
बड़ी स्ट्रेंथ होता है। असली पावर ऊंची आवाज में नहीं स्थिर दिमाग में होती है। जो इंसान अपनी एनर्जी को बचाना सीख लेता है, वही उसे सही दिशा में इस्तेमाल कर पाता है। याद रखो गुस्सा एनर्जी जलाता है। शांति एनर्जी बचाती है और जो इंसान एनर्जी बचा लेता है, वही अपने गोल्स तक सबसे तेज पहुंचता है। तीसरा लेसन अनहा दबाव, द पावर ऑफ साइलेंस। हम अक्सर सोचते हैं कि ताकत शब्दों में होती है। जोर से बोलने में, तर्क देने में या बहस जीतने में। लेकिन असल जिंदगी में कई बार चुप्पी शब्दों से कहीं ज्यादा पावरफुल होती
है। साइलेंस वह हथियार है जो दिखाई नहीं देता पर उसका असर गहरा होता है। शांत लोग इसी ताकत को समझते हैं। इसलिए वे हर समय बोलने की जरूरत महसूस नहीं करते। जब बातचीत या बहस के दौरान कोई व्यक्ति लगातार बोलता रहता है तो वह अपनी सारी बातें बाहर निकाल देता है। लेकिन जो इंसान सही समय पर चुप रहना जानता है वह सामने वाले पर अनकहा दबाव बना देता है। यह चुप्पी सामने वाले के दिमाग में सवाल पैदा करती है। यह कुछ बोल क्यों नहीं रहा? क्या इसे सब पता है? क्या मैंने कुछ गलत कह दिया?
यही क्वेश्चंस सामने वाले को अनकंफर्टेबल कर देते हैं। इंसानी दिमाग साइलेंस को आसानी से हैंडल नहीं कर पाता। जब जवाब नहीं मिलता तो मन खुद ही गैप्स भरने लगता है। इसी बेचैनी में कई लोग जरूरत से ज्यादा बोलने लगते हैं और यहीं से उनकी असली सोच, सच्चाई या कमजोरी बाहर आ जाती है। शांत लोगों की चुप्पी डरावनी नहीं होती लेकिन असरदार जरूर होती है। वे जानबूझकर साइलेंस का इस्तेमाल करते हैं ताकि सामने वाला खुद अपनी बात खोल दे। कई बार बिना एक शब्द बोले ही सामने वाले का कॉन्फिडेंस टूटने लगता है। मान लो कोई व्यक्ति
तुम पर आरोप लगा रहा है। रिएक्शन यह होगा कि तुरंत खुद को डिफेंड करना शुरू कर दो। लेकिन रिसोंड करने वाला इंसान कुछ पल चुप रहता है। आंखों में स्थिरता रखता है और बिना घबराए सामने देखता है। यह साइलेंस सामने वाले के लिए भारी पड़ जाती है। वह खुद ही अपनी बात बदलने लगता है या अननेसेसरी डिटेल्स जोड़ देता है। साइलेंस का मतलब डर नहीं होता बल्कि सेल्फ कंट्रोल होता है। जो खुद को कंट्रोल कर सकता है, वही हालात को भी कंट्रोल कर सकता है। लगातार बोलते रहना अक्सर इनसिक्योरिटी का साइन होता है। जबकि चुप
रह पाना इनर स्ट्रेंथ का। शांत लोग जानते हैं कि हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं होता। हर आरोप का डिफेंस देना भी जरूरी नहीं। कई बार चुप रहकर सामने वाले को बोलने देना ही सबसे स्मार्ट स्ट्रेटजी बन जाती है। आपने नोटिस किया होगा इंटरव्यू, नेगोशिएशन या सीरियस कॉन्वर्सेशन में जो व्यक्ति कम बोलता है, उसकी बातें ज्यादा वेट रखती हैं। उसकी साइलेंस अथॉरिटी क्रिएट करती है। सामने वाला उसे हल्के में नहीं ले पाता। साइलेंस आपको मिस्टीरियस बनाती है और मिस्ट्री हमेशा पावरफुल होती है। जब आप कम बोलते हो और ज्यादा सुनते हो तब आप सामने
वाले को समझ पाते हो। उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसके डर, उसकी कंफ्यूजन। याद रखो शब्द बहस पैदा करते हैं। चुप्पी सच बाहर लाती है। जो इंसान साइलेंस को अपना लेता है, वह बिना लड़ाई लड़े भी स्थिति अपने पक्ष में मोड़ सकता है। कभी-कभी सबसे जोरदार आवाज छुपी की ही होती है। चौथा लेसन मुश्किल समय में भरोसा। ट्रस्ट इन चॉइस। जिंदगी हमेशा शांत नहीं रहती। कभी अचानक प्रॉब्लम्स आ जाती हैं, कभी प्लांस फेल हो जाते हैं और कभी हालात ऐसे बनते हैं जहां चारों तरफ केस ही केओस होता है। ऐसे समय में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं।
कोई पैनिकिक करता है, कोई ब्लेम गेम शुरू कर देता है और कोई डर के कारण गलत फैसले लेने लगता है। लेकिन इसी भीड़ में एक व्यक्ति अलग दिखाई देता है। जो शांत खड़ा रहता है। जब सब लोग घबराए हुए होते हैं तब इंसान अनजाने में उसी की तरफ देखने लगता है जो स्टेबल दिखता है। कारण बहुत सिंपल है। डर के माहौल में दिमाग सुरक्षा ढूंढता है और शांत व्यक्ति अपने बिहेवियर से यह सिग्नल देता है कि सब खत्म नहीं हुआ है। हम संभाल सकते हैं। यही वजह है कि क्राइसिस के समय कोई जोर से बोलने
वाला नहीं बल्कि शांत सोच वाला इंसान लीडर बनता है। उसे लीडर बनने के लिए मंच या पद की जरूरत नहीं होती। उसका सेल्फ कंट्रोल ही उसकी अथॉरिटी बन जाता है। जब हालात बिगड़ते हैं तब इमोशंस बहुत तेज हो जाते हैं। लोग डर, गुस्सा और कंफ्यूजन में बहने लगते हैं। लेकिन जो इंसान खुद पर काबू रखता है वही सिचुएशन को समझ पाता है। उसका दिमाग पैनिक मोड में नहीं बल्कि स्यूशन मोड में काम करता है। ऐसे व्यक्ति की बातों में जल्दबाजी नहीं होती। वह कम बोलता है। पर जो बोलता है साफ और कॉन्फिडेंट होता है। यही
कॉन्फिडेंस दूसरों को काम करता है। लोग सोचते हैं अगर यह इतना शांत है तो शायद रास्ता निकल ही आएगा। आपने देखा होगा एक्सीडेंट लॉस या अचानक आई परेशानी के समय भीड़ किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करती है जो क्लियर माइंड से डायरेक्शन दे सके। उस समय नॉलेज से ज्यादा मेंटल स्टेबिलिटी काम आती है। शांत व्यक्ति यह दिखावा नहीं करता कि उसे डर नहीं लग रहा बल्कि वह डर को कंट्रोल करना जानता है और यही स्किल उसे अलग बनाती है। क्योंकि कओस में वही इंसान आगे बढ़ पाता है जो अंदर से टूटा नहीं होता। ट्रस्ट ऐसे
समय में पैदा होता है जब शब्द नहीं बिहेवियर बोलता है। कोई अगर खुद घबराया हुआ है और दूसरों को समझाने की कोशिश करता है तो उसकी बात असर नहीं करती। लेकिन जो खुद स्थिर है वही दूसरों को स्थिर कर पाता है। लीडरशिप का असली मतलब आदेश देना नहीं बल्कि उम्मीद बनाए रखना है। जब हर तरफ अंधेरा हो तब शांत व्यक्ति एक जलते हुए दीपक की तरह होता है। छोटा सा लेकिन दिशा दिखाने वाला। यही कारण है कि मुश्किल समय में लोग उसी पर भरोसा करते हैं जो कंट्रोल में दिखता है। ना कि उस पर जो
सबसे ज्यादा बोल रहा हो। केओस में कॉन्फिडेंस कंटेजियस होता है। जैसे डर कंटेज होता है। याद रखो जब हालात बेकाबू हो तो खुद पर काबू ही सबसे बड़ी ताकत होती है। जो इंसान केओस में भी शांत रहना सीख लेता है वह अनजाने में ही दूसरों का सहारा बन जाता है और वहीं से सच्ची लीडरशिप जन्म लेती है। पांचवा लेसन साफ सोच क्लेरिटी ऑफ माइंड। हमारी जिंदगी में अक्सर ऐसे पल आते हैं जब चारों तरफ शोर और तनाव होता है। डेडलाइंस, रिस्पांसिबिलिटीज, सोशल प्रेशर और अनएक्सेक्टेड प्रॉब्लम्स मिलकर दिमाग को कंफ्यूज कर देते हैं। ऐसे समय में
इंसान जल्दी थक जाता है। डिसीजंस गलत लेने लगता है और छोटी-छोटी बातों पर उलझकर एनर्जी वेस्ट करता है। यही वजह है कि बहुत से लोग केस में सही कदम नहीं उठा पाते। लेकिन शांत रहने वाले लोग अलग होते हैं। उनका दिमाग क्लियर और फोकस्ड रहता है। वे नॉइज़ और डिस्ट्रैक्शंस में भी अपनी सोच को धुंधला नहीं होने देते। उनका सीक्रेट यह है कि वे अपने इमोशंस और रिएक्शंस पर कंट्रोल रखते हैं। जब कोई प्रॉब्लम आती है तो वे तुरंत पैनिकिक नहीं करते बल्कि सिचुएशन को ऑब्जर्व करते हैं। फैक्ट्स को समझते हैं और फिर एक्शन लेते
हैं। क्लेरिटी ऑफ़ माइंड का मतलब यह नहीं कि कोई प्रॉब्लम उन्हें अफेक्ट नहीं करती। बल्कि इसका मतलब यह है कि वह प्रॉब्लम के बीच भी काल में रहते हैं। जैसे कोई स्टॉर्म में जहाज चला रहा हो। बाकी लोग पानी और हवा देखकर घबरा रहे हो। वहीं शांत व्यक्ति अपने कंपास और मैप को देखकर सही डायरेक्शन चुनता है। यही स्किल उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। शांत लोग अक्सर स्यूशन ओरिएंटेड होते हैं। वे सिचुएशन के पीछे के रूट कॉज को ढूंढते हैं ना कि केवल सरफेस पर दिख रहे सिम्टम्स को। भीड़ में सब सिर्फ कंप्लेंट कर
रहे होते हैं, क्रिटिसाइजिंग कर रहे होते हैं। वहीं काल माइंड वाले लोग क्वाइटली सोचते हैं कि मैं इसे कैसे फिक्स कर सकता हूं और वही एक्शन उन्हें रिजल्ट्स दिलाता है। साफ सोच होने का मतलब यह भी है कि आपका दिमाग क्लटर फ्री होता है। जब माइंड क्लटर्ड होता है तो थॉट्स टैंकल्ड हो जाते हैं और डिसीजंस स्लो और फ्लोडेड होते हैं। काम व्यक्ति अपनी प्रायोरिटीज और गोल्स को क्लियर रखता है। वे अननेसेसरी डिस्ट्रैक्शंस में एनर्जी नहीं वेस्ट करते। उनकी सोच जैसे लेजर की तरह फोकस्ड होती है जो तुरंत सही स्यूशन तक पहुंचती है। क्लेरिटी ऑफ
माइंड के फायदे सिर्फ प्रॉब्लम सॉल्विंग में ही नहीं रिलेशनशिप्स और कम्युनिकेशन में भी होते हैं। शांत व्यक्ति दूसरों की बातों को अच्छे से सुनता है, समझता है और फिर जवाब देता है। उनके शब्द थॉटफुल और इंपैक्टफुल होते हैं। वहीं इंपल्सिव और स्ट्रेस्ड लोग जल्दी बोल देते हैं। अक्सर रिग्रेट के साथ। यह हैबिट डेवलप की जा सकती है। इसके लिए सिंपल टेक्निक्स जैसे मेडिटेशन, डीप ब्रीथिंग, शॉर्ट पॉजेस बिफोर रिएक्टिंग और जर्नलिंग मदद करते हैं। यह टूल्स दिमाग को क्लटर फ्री रखते हैं और फोकस बढ़ाते हैं। धीरे-धीरे आप नोटिस करेंगे कि आपका डिसीजन मेकिंग फास्ट और एक्यूरेट
हो रहा है। एनर्जी बच रही है और स्ट्रेस कम हो रहा है। याद रखो जब दिमाग साफ होता है तब रास्ता खुद दिखाई देता है। जो इंसान केओस में भी काम रहना सीख लेता है, वही दूसरों के लिए गाइडेंस बनता है। उनकी क्लेरिटी केवल उनके लिए नहीं बल्कि उनके आसपास के एनवायरमेंट को भी स्टेडी और पावरफुल बनाती है। काम माइंड सबसे बड़ा एसेट है। यही आपकी सोच को शार्प, डिसीजंस को स्ट्रांग और एक्शंस को इंपैक्टफुल बनाता है। छठा लेसन दुश्मन को उलझाना, कंफ्यूजिंग द अपोनेंट। जिंदगी में कभी-कभी हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो हमारी एनर्जी
चुराने, हमारी वीक स्पॉट को एक्सप्लइट करने या सीधे कॉन्फ्रंटेशन में डालने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में ज्यादातर लोग रिएक्ट कर देते हैं। गुस्सा, डर या जल्दी में जवाब। लेकिन जो इंसान काम और शांत रहता है, वह सिचुएशन को पूरी तरह कंट्रोल कर लेता है। यही स्किल उसे पावरफुल बनाती है और सामने वाले को कंफ्यूज करने की ताकत देती है। जब कोई आपसे लड़ने आता है, चाहे वह वर्क प्लेस कॉन्फ्लिक्ट हो, पर्सनल आर्गुमेंट हो या किसी तरह की कंपटीशन, तो उसकी स्ट्रेटजी एक चीज पर डिपेंड करती है। आपका रिएक्शन। वह उम्मीद करता है कि
आप तुरंत झुकेंगे, गुस्सा करेंगे या इमोशनल हो जाएंगे। लेकिन अगर आप शांत रहते हैं तो सामने वाला मेंटली स्टक हो जाता है। उसे समझ नहीं आता कि अगला कदम क्या होगा। आपकी कालनेस उसके लिए अनप्रिडिक्टबिलिटी क्रिएट कर देती है। कंफ्यूजिंग द अपोनेंट का मतलब यह नहीं कि आप अग्रेसिव होकर उसे ट्रिक करो बल्कि इसका मतलब है कि आप खुद पर कंट्रोल रखते हुए अपनी एनर्जी सेव करते हो और सामने वाले को ओवरथिंक करने पर मजबूर कर देते हो। जब सामने वाला आपकी कामनेस देखता है तो वह इंटरनली डरने लगता है। उसके कॉन्फिडेंस को सली तोड़ा
जाता है क्योंकि वह सोचता है यह इतना शांत है। क्या मैं सही स्ट्रेटजी सोच रहा हूं? हिस्ट्री और स्ट्रेटजी की दुनिया में यही कांसेप्ट बहुत फेमस है। चाहे वह बैटल फील्ड हो या नेगोशिएशन टेबल कार्ल और कंट्रोलोल्ड इंसान हमेशा एडवांटेज में रहता है। क्योंकि केओस में डिसीजंस जल्दी और गलत लिए जाते हैं। वहीं काल व्यक्ति पेशेंटली सिचुएशन को एनालाइज करता है और परफेक्ट मोमेंट पर मूव करता है। सामने वाला उसका मूव प्रेडिक्ट नहीं कर पाता। मान लो कोई कोवर्कर आपको ब्लेम कर रहा है या प्रवोक कर रहा है। रिएक्शन देने से आप उसी एनर्जी फाइट
में फंस जाते हैं। लेकिन काल में रहकर साइलेंस या थॉटफुल रिप्लाई अपनाना सामने वाले को मेंटली प्रेशर में डाल देता है। वह खुद अपने शब्दों और एक्शंस को रिथिंक करने लगता है। आपकी शांति उसकी असुरक्षा को बढ़ा देती