क्यों एक भोली भाली औरत अपने पति की मूर्ति के साथ जलकर अपने प्राण त्याग देती है क्यों राजा विक्रमादित्य को एक चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी किसी दूसरे राजा के यहां नौकरी करनी पड़ती है क्या राजा विक्रमादित्य एक मरी हुई औरत को फिर से जिंदा कर पाएंगे जानने के लिए देखिए यह जबरदस्त कहानी एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ उज्जैन नगर में रहता था ब्राह्मण की पत्नी सुशीला बड़ी पतिव्रता स्त्री थी ब्राह्मण कहने के लिए तो राजा के यहां नौकर था परंतु राजा विक्रम ब्राह्मण से कोई कार्य नहीं कर वाते थे बस हर माह घर
बैठे उस ब्राह्मण की तनख्वाह भेज दिया करते थे ब्राह्मण को राजा की तनख्वाह खाते-खाते जब काफी अरसा हो गया तो एक दिन वह अपनी पत्नी से बोला भाग्यवान राजा का धन खाते-खाते काफी लंबा समय हो गया किंतु राजा ने बदले में मुझ से कोई काम नहीं लिया इस भार से मैं कैसे कर्ज मुक्त हो सकूंगा अंततः पत्नी से विचार कर वह राजा के पास पहुंचा और बोला राजन आपकी रकम खाते-खाते मुझे काफी समय हो गया लेकिन आपने मुझसे कोई काम नहीं लिया इस प्रकार मैं कैसे कर्ज मुक्त हो सकूंगा मेरी इच्छा है कि आप मुझसे
कोई काम लें ताकि मैं आपके राण से मुक्त हो जाऊं ब्राह्मण की बात सुनकर राजा बोला हे ब्राह्मण मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं किसी ब्राह्मण से काम नहीं लेता पर फिर भी आपकी यही इच्छा है तो मेरे कहने से गंगा स्नान कराओ और एक कलश गंगाजल मेरे लिए भी लेते आना यही है आपका कार्य राजा के वचन सुनकर ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न होकर अपने घर आया और सारा हाल अपनी पत्नी से कह सुनाया वह बोली स्वामी आप चले जाओगे तो मैं आपके पीछे अन्न जल कैसे ग्रहण करूंगी मेरा तो यह नियम है कि बिना आपके दर्शन
किए अन्न जल ग्रहण नहीं करती ब्राह्मण बोला मैं अपनी मूर्ति बनवाकर घर के अंदर स्थापित कर दूंगा तू उसके दर्शन करके अपना गुजारा कर लेना यह कहकर उसने अपनी मूर्ति बनवाई और घर में स्थापित करवा दी और आवश्यक सामान ले राजा के पास जाकर बोला महाराज अब मैं जा रहा हूं मुझे आज्ञा दीजिए और मेरे पीछे से कृपा करके मेरी पत्नी की खैर खबर लेते रहना उसको अब मैं आपकी शरण में छोड़े जा रहा हूं ब्राह्मण के वचन सुनकर राजा विक्रमादित्य बोला हे ब्राह्मण आपके किसी बात की चिंता ना करें और निश्चित होकर जाएं आश्वासन
देकर राजा ने उसे मार्ग व्यय के लिए धन देकर विदा कर दिया ब्राह्मण के गंगा स्नान पर जाने के बाद ब्राह्मणी हर रोज पहले उसकी मूर्ति को भोग लगाती और बाद में खुद खाती एक दिन ब्राह्मण के पड़ोस में आग लग गई वह आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते ब्राह्मण ब्राह्मणी के घर तक आ पहुंची ब्राह्मणी अपने घर में लगी आग देखकर अपने पति की मूर्ति से कहने लगी हे स्वामी घर में आग लग गई है कृपया बाहर चलो जल्दी ही आग ने पूरे घर को अपने चपेट में ले लिया परंतु ब्राह्मणी
टस से मस ना हुई और वह उस ब्राह्मण की मूर्ति के आगे वहीं शब्द दोहरा रही स्वामी घर में आग लग गई है बाहर चलो आखिर ब्राह्मणी आग में ब्राह्मण की मूर्ति के साथ चिपट जलकर मर गई जब राजा विक्रम को यह बात पता चली तो वह माथा पकड़कर बैठ गया और खुद से कहा यह तो बड़ा अनर्थ हो गया अब जब ब्राह्मण आकर पूछेगा तो मैं उसे क्या उत्तर दूंगा ब्राह्मण अपनी पत्नी को राजा के हवाले छोड़कर उसके कहने से गंगा स्नान करने गया था पर ब्राह्मणी तो उसकी मु मूर्ति के साथ जल चुकी
थी राजा विक्रम के दिन बड़े भारी हृदय के साथ चिंता में निकल रहे थे इसी बीच एक रोज ब्राह्मण भी वापस आ गया और घर में लगी आग और अपनी स्त्री के जल मरने का समाचार सुनकर वह आग बबूला हो उठा बोला ऐसे कैसे हो सकता है मैं तो राजा को अपनी ब्राह्मणी का ध्यान रखने के लिए बोलकर गया था उन्होंने उसका ध्यान क्यों नहीं रखा वह आनंद फानन में भागा भागा तुरंत राजा के पास गया और क्रोधित होकर पूछने लगा ऐ राजा मेरी स्त्री कहां है कहां है मेरी ब्राह्मणी राजा विक्रम ने भर हुए
हृदय के साथ ब्राह्मण को सारा हाल कह सुनाया और बोला हे ब्राह्मण देव क्रोधित मत होइए मैं किसी अन्य ब्राह्मण की योग्य कन्या से आपका पुनर्विवाह करा दूंगा यह सुन गुस्से में ब्राह्मण बोला हे राजा जहां से भी हो मेरी वही स्त्री मुझे लाकर दो जिसने मेरी प्रतिमा के साथ जलकर अपने प्राण त्याग दिए अन्यथा मैं यही आपके दरबार में अपना सिर पटक पटक कर अपनी जान दे दूंगा और याद रखना राजा तुम्हें एक नहीं बल्कि दो निरपराध लोगों की हत्या का पाप लगेगा तुम्हें एक ब्राह्मण का श्राप लगेगा राजा ने लाचार होकर कहा शांत
हो जाइए ब्राह्मण देव तनिक मेरी बात सुनिए और जो मैं कह रहा हूं वैसा करिए अपनी स्त्री के अस्थि अवशेष संचय कर उन्हें रख लीजिए और मुझे एक माह का समय दीजिए मैं तुम्हारी स्त्री को जीवित करने की कोई युक्ति करता हूं यह सुन ब्राह्मण कुछ शांत हुआ और जैसा राजा ने कहा था वैसा ही किया राजा विक्रम अपना राजकाज अपने मंत्रियों को सौंपकर सादे बाड़े में अमृत की तलाश में चल पड़ा चलते-चलते कई दिनों के बाद वह एक गांव में पहुंचा कई दिन चलने की थकान के कारण वो एक मका मकान के दरवाजे पर
पड़ी चारपाई देख थका मांधा उसी पर बैठ गया उस मकान में एक वृद्धा और उसकी पुत्र वधु रहती थी वृद्धा का बेटा बहुत दिनों से कहीं बाहर गया हुआ था उसी के संताप में उसकी पुत्र वधू और वह हमेशा दुखी रहती थी थोड़ी देर बाद जब वृद्धा की पुत्र वधु बाहर आई और उसने राजा को वहां बैठा देखा तो मन में सोचने लगी हो ना हो यही मेरा पति है इसकी सूरत और उम्र दोनों मेरे बहुत दिनों से बाहर गए पति से मेल खाती हैं यह बात मन में विचार करके वह भीतर गई और अपनी
से कहने लगी मां जी मुझको ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपका बेटा लौट आया है और बाहर द्वार पर बैठा है बहू की बात सुनकर बुढ़िया खुश हो दौड़कर दरवाजे पर आई जब उसने राजा विक्रम को देखा तो उसे भी वह बिल्कुल उसके बेटे की तरह जान पड़ा वृद्धा बोली बेटा तू बाहर क्यों बैठा है चल अंदर चल कहां था तू इतने दिनों से देख तेरी याद में तड़प-तड़प कर मेरी यह दुर्दशा हो गई और तूने एक बार भी मेरी शुद्ध नहीं ली वृद्धा की बात सुनकर राजा विक्रम हड़बड़ा या और सोचने लगा हे
ईश्वर यह क्या नई बला मेरे सिर आन पड़ी वह वृद्धा से बोला मां मैं तेरा बेटा नहीं हूं पर तू अपने बेटे का हाल बता मैं तुझे तेरे पुत्र से मिलाने की कोशिश जरूर करूंगा बूढ़ी औरत रोते हुए राजा को अपनी बात बताने लगी मेरा बेटा जब 12 वर्ष का था तब उसका विवाह हो गया था विवाह के कुछ ही दिन बाद वो कहीं चला गया आज 20 वर्ष होने को आए मगर उसकी कोई खैर खबर नहीं वह अब तक लौट कर नहीं आया उसकी पत्नी बेचारी चिंता में सूखकर कांटा हो गई है राजा बोला
बुढ़िया माई क्या तुझे उसके या उसके किसी पते के बाद बारे में मालूम है कि वह कहां है वृद्धा ने कहा मैंने कुछ लोगों से सुना है कि दक्षिण दिशा में वीरसेन नामक राजा राज्य करता है जो हर रोज गरीबों में सवा मन सोना दान करता है उसी राजा के महल में मेरा बेटा दुर्जन नौकरी करता है तब विक्रमादित्य ने कहा बुढ़िया माई अब तू किसी बात की चिंता मत कर ईश्वर चाहेगा तो तेरा बेटा शीघ्र ही तुझसे आकर मिलेगा इतना कहकर राजा विक्रम वहां से दक्षिण दिशा की ओर चल दिए कुछ दिनों की यात्रा
के पश्चात वे दक्षिण दिशा पहुंच गए विक्रम वहां से पूछ पूछते पूछते राजा के महल के द्वार पर पहुंचा और द्वारपाल से बोला भाई आप दुर्जन को मुझ पथिक का संदेश भिजवाने का कष्ट करें कि तुम्हारे गांव से एक आदमी आया है और वह तुमसे मिलना चाहता है द्वारपाल ने भीतर जाकर दुर्जन को विक्रम का संदेश दे दिया जिसे सुनकर वह द्वार पर आया और विक्रम को अपने गांव का निवासी समझकर उसे अपने डेरे पर ले गया विक्रमादित्य ने कहा भाई तुमको ऐसा नहीं करना चाहिए था जब से तुम आए हो तब से घर की
सूरत तक नहीं देखी तुम्हारे घर तुम्हारी माता और पत्नी रो-रो कर दिन बिताती हैं तुम्हा रे लिए उचित यही है कि जैसे भी बने शीघ्र ही उनकी सुध लो दुर्जन बोला भाई मैं क्या करूं विवश हूं ना तो महाराज मुझे छुट्टी देते हैं ना इस्तीफा लेते हैं फिर भला मैं किस प्रकार जा सकता हूं विक्रम बोला इसकी तुम चिंता ना करो तुम्हारे बदले में मैं नौकरी कर लूंगा अब दुर्जन ने राजा से कहा महाराज मेरा भाई गांव से आया है वह मेरे बदले आपके यहां नौकरी करेगा आप कृपा कर मुझे कुछ दिनों के लिए छुट्टी
दे दें क्योंकि मेरी मां व पत्नी मेरे लिए बहुत व्याकुल है राजा वीर सेन बोला अच्छा अपने भाई को को नौकरी पर छोड़कर तुम एक महीने के लिए अपने घर हो आओ यह सुनकर दुर्जन ने विक्रम को नौकरी पर छोड़ा और स्वयं राजा से विदा लेकर अपने घर को चल दिया और विक्रम उसके बदले नौकरी करने लगा खुद एक राजा होते हुए भी बड़े हृदय वाले राजा विक्रमादित्य दूसरों के दुख दूर करने के लिए राजा वीरसेन के यहां नौकरी करने लगे राजा वीरसेन का नियम था कि हर रोज वह आधी रात को शहर से बाहर
एक देवी के मंदिर में जाता देवी उसे पकड़कर तेल के खोलते कड़ा में डाल देती जब राजा उसमें भुन जाता तब वह उसे निकाल कर खा जाती तत्पश्चात उसकी हड्डियों को इकट्ठा करती फिर उन पर अमृत छिड़क देती इस प्रकार राजा पुनः जीवित हो जाता बाद में देवी अक्षय झांझर हिलाकर सवा मन सोना राजा को देती जिसे लेकर राजा वीरसेन चुपचाप महल लौट आता और प्रातः काल वही सोना ब्राह्मणों को दान कर देता एक दिन राजा विक्रम ने अपने मन में विचार किया कि राजा के पास इतना सोना कहां से आता है और हर रोज
आधी रात को वह कहां जाता है इसका भेद अवश्य जानना चाहिए दूसरे दिन आधी रात के समय जब वीरसेन ने देवी के मंदिर के लिए स्थान किया तो राजा विक्रम भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा मंदिर में एक तरफ छिपकर उसने खुलते तेल के कड़ा में जब राजा को भूते देखा तो विक्रमादित्य का हृदय द्रवित हो उठा सारा हाल देख वह भारी हृदय के साथ अपने स्थान पर वापस आ गया और विचार किया राजा बड़े कष्ट से सोना लाता है कैसे भी करके इसका दुख दूर करना चाहिए राजा विक्रम बाजार गया और हर तरह के मेवे
सुगंधित वस्तुएं और तरह-तरह के मसाले ले लिए जब आधी रात का समय नजदीक आया तो विक्रमादित्य ने अपने शरीर को जगह-जगह जगह से चाकू से चीर कर सभी प्रकार के मसाले और मेवे कटे हुए स्थान पर भर लिए अत्यंत पीड़ा सहन करते हुए राजा विक्रम चुपचाप राजा वीर सेन के कक्ष में गए और अपनी जेब से जादुई बीर निकाल उन्हें हुक्म दिया जब तक मैं ना आ जाऊं तब तक तुम राजा वीरसेन को ऐसी गफलत में रखना कि उसे होश ना आए खुद राजा वीरसेन की जगह देवी के मंदिर में पहुंच गया विक्रम जब देवी
के मंदिर में पहुंचा तो भूख से व्याकुल देवी ने उसे पकड़कर तुरंत कड़ा में डाल दिया जब वह भुन गया तो देवी ने उसे से निकाल कर खाया देवी ने इतना स्वादिष्ट गोश्त आज तक नहीं खाया था वो हर रोज वीरसेन को भूकर खाती थी और उसे जीवित कर देती थी राजा वीरसेन में ऐसा कुछ बचा नहीं था पर आज जब उसने तंदुरुस्त और एकदम हट्टेड विक्रमादित्य के ताजा और तरह-तरह के मसाले और मेवे से भरा मांस खाया तो उसका रोम-रोम खिल उठा लजीज गोश्त खा वो अत्यधिक प्रसन्न हो उठी पूरी तरह तृप्त हो उसने
रोज की तरह हड्डियां एकत्र कर घड़े से अमृत निकालकर उन पर छिड़क दिया अगले ही पल राजा विक्रम जीवित हो उठा तब देवी बोली मैंने आज तक इतना स्वादिष्ट मांस नहीं खाया आज मैं तुझ पर बहुत प्रसन्न हूं जो भी तुझे चाहिए दिल खोलकर मांग ले विक्रम बोला हे मां मुझे आपसे तीन वर चाहिए देवी प्रसन्न हो बोली दिए तुम्हें तीन वचन मांगो क्या चाहिए तब विक्रम ने कहा पहले वचन में मुझको आपका अमृत का पात्र चाहिए दूसरे वचन में मुझे आपकी अक्षय झांझर भी चाहिए ये दो वरदान मांगकर विक्रम ने सोचा कि इसका अमृत
यदि मैंने ले लिया और देवी ने राजा को नित्य की भांति भूनकर खाया तो फिर उसे जिंदा कैसे करेगी इसलिए तीसरे वचन में उसने सोचा कि ना देवी यहां रहेगी ना राजा की जान जाने का डर रहेगा अतः तीसरे वर में उसने देवी का वहां से चले जाना मांगा इस प्रकार तीनों वचन देकर देवी वहां से चली गई राजा विक्रम अमृत कलश और अक्षय झांझर ले वापस आ गया उसने सोते हुए राजा वीरसेन के पास से अपने जादुई बियर उठा ली थोड़ी देर में जब वीरसेन की आंख खुली तो समय देख वह घबराकर मंदिर की
ओर दौड़ा वहां जाकर उसने देखा तो कोई नहीं था कड़ा हा भी आधा पड़ा था यह देखकर वह बहुत घबराया और मन में सोचने लगा सुबह सोना कहां से दान करूंगा लोग कहेंगे कि राजा दिवालिया हो गया खजाने में धन नहीं रहा यह सोचते-सोचते वह घर आकर पलंग पर पड़ गया चिंता में उसे रात भर नींद नहीं आई करवटें बदलते बदलते ही सवेरा हो गया भिक्षुक पुकारने लगे महाराज प्रातः काल हो गया दान करने के लिए सिंहासन पर विराजी भिक्षु कों की पुकार सुनकर राजा अत्यंत दुखी हो रहा था महल के बाहर भिक्षुक चिल्ला रहे
थे राजा शर्म और शोक में डूबा भिक्षुओं की आवाज सुन रहा था राजा को शोक के समुद्र में डूबा देखकर विक्रम ने कहा हे महाराज सुस्त क्यों है सोना दान क्यों नहीं कर रहे वीरसेन ने आदि से अंत तक सारा हाल विक्रम को कह सुनाया और बोला आज यह ब्राह्मण वर्ग विमुख हो जाएगा तो बड़ा अन्याय होगा तब विक्रमादित्य ने राजा वीरसेन को अक्षय झांझर दी और कहा लो निकाल लो इसमें से और बांट दो इसके लिए अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है इसे अपने पास रखो अक्षय झांझर देख राजा वीर सेन ने
हैरान होते हुए पूछा यह झांझर तुम्हारे पास कैसे आई विक्रमादित्य ने राजा को सारा हाल कह सुनाया सब सुनकर राजा वीरसेन विक्रमादित्य के पैरों में गिर पड़ा और बोला आप धन्य हैं बंधु आप कौन हैं तब राजा विक्रम ने बताया मैं उज्जैन नगर का राजा विक्रमादित्य हूं अमृत की तलाश में था कि मार्ग में मुझे दुर्जन की माता मिली पुत्र की जुदाई में उसका बुरा हाल था मैं उससे मिलकर यहां दुर्जन को उसकी माता की दुर्दशा से अवगत कराने चला आया तब वीरसेन बोला आप धन्य हैं राजन जैसा आपके बारे में मैंने सुना था वैसा
ही आपको पाया वो झांझर वीर सेन को दे उनसे विदाई ले राजा विक्रम अपने राज्य की तरफ चल पड़ा महीना पूरा हो ने को आया था वायदे के मुताबिक तय समय में राजा विक्रमादित्य उज्जैन नगरी में पहुंच गए उन्होंने ब्राह्मण को बुलाकर उसकी पत्नी की अस्थियां मंगवा ली राजा ने ज्यों ही उनके ऊपर अमृत छिड़का त्यों ही ब्राह्मणी उठ खड़ी हुई ब्राह्मण ने खुशी से छलकते आंसुओं के साथ राजा विक्रमादित्य के पैरों में गिरकर उनका धन्यवाद किया और अपने बुरे व्यवहार के लिए उनसे क्षमा मांगी राजा विक्रमादित्य केवल एक महान योद्धा या शासक नहीं थे
बल्कि उन्होंने दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालने से भी परहेज नहीं किया उनकी अमृत की तलाश एक ब्राह्मण के दुखी परिवार को जोड़ने का संकल्प और राजा वीर सेन की समस्या को हल करने के लिए अपनी अद्वितीय योजनाएं यह दर्शाती हैं कि एक सच्चा राजा केवल अपनी प्रजा का भला सोचता है निष्कर्ष जब हम अंदर से किसी का भला सोचकर किसी कार्य के लिए प्रयास करते हैं तो वह चाहे कितना ही कठिन क्यों ना हो वह मालिक वह प्रभु हमारे लिए नए-नए रास्ते खोल ही देता है कहानी
अंत तक देखने के लिए आप सबका तह दिल से धन्यवाद