आजकल भाई फिल्म धुरिंदर के बहुत चर्चे हैं। जहां हीरो 10-12 लोगों को टपकाने के बाद मुस्कुरा कर कहता है रहमान डकैत की दी हुई मौत बड़ी कसाईनुमा होती है। लेकिन काश इंडिया वाले कराची की लेरी में शूट कर लेते तो पता चल जाता कि असल धुरिंदर कौन है। यहां विलेन हाथ में गन पकड़ कर डायलॉग नहीं मारता। अगर तुम लोगों के पटाखे खत्म हो गए, तो मैं धमाका शुरू करूं। यहां हीरो बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहनते। [संगीत] यहां रहमान डिकैत जैसे किरदार जीप में बैठकर कहते हैं। अगर वोट कहीं और दिया तो अपनी कब्र खुद
खोद लेना। जब रियासत ने फैसला किया कि बस अब बहुत हो गया तो चौधरी असलम जैसे असल हीरो को लिया भेजा गया। जहां शेर की बीवी भी शेरनी है। चौधरी असलम के सामने कोई विलेन नहीं था। उसके सामने लियारी गैंग ने औरतों और बच्चे [संगीत] ढाल बनाकर खड़े किए। लियारी की गलियों में ग्रेनेड फेंके जा रहे थे। [संगीत] छतों से रॉकेट लांचर मारे जा रहे थे। गलियों में कलाशन कोफ [संगीत] के शेल गिरने की आवाजें थी। फिल्म के दरमियान डायरेक्टर कट तो बोल देता है लेकिन लियारी में कट सिर्फ तब लगता था जब किसी की
जिंदगी खत्म हो जाए। आज हम आपको वो रियल क्राइम स्टोरी सुनाने जाएंगे जिसे सुनकर धुरिंदर पुलिस गिरी जिला गाजियाबाद इस जैसी सारी फिल्में आपके सामने फ्लॉप होंगी। मैं हूं कोमल अब्बासी और आप देख रहे हैं [संगीत] थिंक क्राइम की एक और थ्रिलिंग एपिसोड। [संगीत] 1970 की दहाई [संगीत] लिया की गलियों में खौफ फैल चुका था। मंशिया, जुआ और भत्ते का राज और उस राज का बादशाह था हाजी लालू। [संगीत] हाजी लालू के साए में पैदा हुआ अरशद पप्पू सख्त, तेज और खतरनाक हद तक बेरहम। लोग आंख मिलाने से भी डरते [संगीत] थे। क्यों? क्योंकि उसके
पीछे खड़ा था हाजी लालू। अरशद पप्पू ज्यों जवान होता गया। लियारी [संगीत] के चौक, गलियां, मोहल्ले उसके नाम से लरजने लगे। लेकिन पहली बार किसी ने अशरद पप्पू को लियारी में [संगीत] टक्कर दी। यह नाम था बाबू डकैत जिसने रहमान डकैत के बाप को कत्ल किया। बाबू डकैत ने एक एंपायर खड़ी कर ली और उसने जो है वो रहमान के बाप को कत्ल कर दिया अपनी एंपायर को मजबूत बनाने के लिए। हम बाबू डकैत का मामला यह था कि वह आप देखें कि वह बताया यह जाता है कि वह एमएससी था और वो इंग्लिश में
बात करता था। बाबू डकैत [संगीत] मंसियात, जुआ, भत्ता, एक कारोबार और इसी कारोबार ने दुश्मनियां [संगीत] पैदा की। और उन दुश्मनियों का अंजाम 1996 में हुआ। जब बाबू डिकैत ने दादिल [संगीत] को कत्ल किया। जब रहमान ने अपने बाप की लाश देखी, उस वक्त रहमान की उम्र सिर्फ 19 से 20 साल थी। लेकिन उसकी रगों [संगीत] में सिर्फ एक ही चीज दौड़ रही थी। बाप की मौत का बदला और लियारी में बदला तन्हा नहीं लिया जाता था। [संगीत] यहां उसे सहारा दिया हाजी लालू ने। हाजी लालू का रहमान को सहारा देना यह सिर्फ हमदर्दी नहीं
थी। यह एक पुराना हिसाब था जो हाजी लालू को रहमान से पूरा करवाना था। हाजी लालू को रहमान में [संगीत] ताकत, गुस्सा, जुनून और मुस्तकबिल का गैंग लीडर नजर आया। लालू ने रहमान को अपने साथ में लाया और पहली बार रहमान डकैत और अरशद पप्पू एक ही छत के नीचे आ [संगीत] बैठे। एक दूसरे की ताकत, एक दूसरे का खून और एक दूसरे का बदला और फिर यह लियारी पर कहर बनकर टूट पड़े। रहमान और उसकी फैमिली ईरानी बलोच थे। [संगीत] रहमान के वालिद का नाम दादा मोहम्मद बलोच था। मुकामी लोगों के मुताबिक दादा मोहम्मद
की तीन शादियां [संगीत] थी और रहमान उनकी तीसरी बीवी की औलाद में से थे। रहमान का बाप लियारी के गैंग वॉर के नतीजे में मारा गया और उसको मारने वाला कोई और नहीं बल्कि बाबू डकैत था। रहमान एक तरफ गैंगस्टर था। खूनखराबा भत्ताखोरी इगवा तो दूसरी तरफ इसका दूसरा चेहरा एक मसीहा [संगीत] एक हीरो। रहमान दूसरों के लिए जैसा भी हो। मगर बलोचों का सरदार था। उसने अपनी कम्युनिटी के लिए बहुत से वेलफेयर के काम किए। लड़कियों की शादियां करवाई, बेसहारा औरतों को सहारा दिया। [संगीत] स्कूल्स भी बनवाए, ईदगाह भी बनवाई, पार्कक्स बनवाए, कंप्लेन सेंटर्स
बनवाए जहां सुबह शाम लोगों के मसाइल सुने जाते। इसलिए अब यह सरदार अब्दुल रहमान बलोच बन गया। लालू, रहमान, अरशद पप्पू यह गैंग लेयारी की तारीख का सबसे खतरनाक इत्तेहाद था। रहमान को बाप की सीट मिली, ताकत मिली। लेकिन उस ताकत ने उसके अंदर के इंसान को मार दिया। फिर जो हुआ वो बहुत खौफनाक था। रहमान ने अपनी ही मां को चाकू [संगीत] से वार करके बेदर्दी से कत्ल कर दिया। क्यों? यह आपको आगे पता चलेगा। लेकिन उससे पहले अरशद पप्पू और रहमान की कहानी का चैप्टर क्लोज कर लेते हैं। हाजी लालू अब [संगीत] बहुत
बूढ़ा हो चुका था। यहां तक कि वो बिस्तर से उठ भी नहीं पाता था। इसीलिए धंधे के सारे मामलात अब अरशद पप्पू के हाथ आ गए। अरशद पप्पू और रहमान शुरू में तो साथ-साथ काम कर रहे थे। मगर रहमान ने तो कुछ और ही दिमाग में सोच रखा था। रहमान अंदर ही अंदर क्या प्लान बना रहा था? खैर, रहमान ने लेरी पर अपना कदम जमाना शुरू किया। भत्ता, अखवा और दुनिया को एक नया अंडरवर्ड डॉन मिल गया। पकोड़ों के ठेले से लेकर बंदरगाह तक बड़े-बड़े [संगीत] ताज्जुर उसके नाम से कांपने लगे। हर मां रहमान के
बोलने से पहले भत्ता रहमान की टेबल पर पहुंच जाता। फी कंटेनर फी दुकान फी मोहल्ला अगवा बराए तावान। तो उसके घर की खेती थी। रहमान लेरी पर अपने पंजे [संगीत] गाड़ चुका था। 2008 में रहमान ने पीपल्स अमन कमेटी के नाम से तंजीब बनाई। एमकेएम के तर्ज पर यूनिट्स, सेक्टर, दफातर, इलाकी जिम्मेदारान सब कुछ वही ढांचा बस रंग लेरी का था। कराची के कारोबारी इलाकों में खारा दर, मीठा दर, सराफा बाजार, खजूर बाजार, चूड़ियां बाजार, हाजी कैंप, टंबर मार्केट इन सब जगहों पर कारोबार करने वालों को एक ही नाम पर भत्ता देना पड़ता था। रहमान
बलोच। 2006 तक रहमान के पास 150 एकड़ जमीन, 33 घर, 34 दुकानें, 12 प्लॉट और ईरान में जायदाद [संगीत] यह सिर्फ 2006 तक थी। 2008 के बाद यह दौलत दुगनी हो गई। याद है बाबू डकैत? जी हां, वही बाबू डकैत जिसने रहमान के बाप को मौत के घाट उतार दिया था। रहमान अब बाप का बदला लेने के लिए बेताब था। 2004 में हमें इतना मिली कि बाबू डकैत जो है कोर्ट जा रहे हैं रिश्ते में। तो हम लोग पहले ही बैठ गए वहां रास्ते में। जैसे ही वो आया हम लोगों ने उसके टी और कोला
से फायरिंग किया। उसमें जो बाबू डकैत और दो उसके काफी हलाक हो गए थे। और दो राहगीर उसमें जख्मी हो गए थे। रहमान ने बाबू डकैत के लोगों को चुनचुन कर मारा जो बाबू डकैत के [संगीत] वफादार थे और ताकतवर भी थे। उन्हें लालच देकर अपने गैंग में शामिल कर [संगीत] लिया। पहले हमारे बच्चे को लेके गया नौशाद बलोच का वो हबीब जान ने काम के लिए बुलाया। फिर बुलाया फिर उन लोगों को देखा। बोला हबीब जान नौशाद को उठा के लेके गया। फिर उन लोगों के पास हम गया। बोला हम काम के लिए बोला।
फिर हबीब जान के पास हम गया। हबीब बोलते हैं हमारे पास नहीं है। [संगीत] सारा दिन हम कमेटी में घूमते रहे थे ताने में तीन दिन से। फिर दूसरे दिन में उसको मार दिया फेंक दिया। नौशाद बलोच को चार बहनों का इकलौता भाई था। सबसे अहम बात जो मैं अब बताने लगी हूं। [संगीत] सुनिएगा। याद है रहमान ने अपनी मां का कत्ल किया था। असल में रहमान की मां पर इल्जाम था कि वो [संगीत] बाबू डकैत के साथ नाजायज ताल्लुकात में थी। वही बाबू डकैत जो रहमान के बाप का कातिल था। इसलिए वो कत्ल इसलिए
किया था कि इसकी मां के जो इसका बाप का कातिल था बाबू डकैत उसके साथ नाजायज ताल्लुकात। बाबू डिकैत के लोग तो पहले ही मर चुके थे। रास्ता साफ हो गया था। अब रहमान ने अपने बाप का बदला इस तरह लिया कि उसने बाबू डिकैत की पहचान ही छीन ली। बाबू डिकैत [संगीत] की मौत के बाद रहमान अब रहमान डकैत बन चुका था। लेरी में पैसा और पावर सिर्फ खून बहाने से मिलता है। भत्ताखोरी, इवा बराए तावान, टारगेट किलिंग, [संगीत] डर और खौफ पैदा करने के लिए इंसानी सरों से फुटबॉल खेलना पड़ता है। भाई इन
जुराइम से आने वाला पैसा वो दौलत है जिसे बैंक में नहीं रखा जाता बल्कि बंदूकों के साए में छुपाया जाता है। लेकिन जब पैसा बहुत ज्यादा हो जाए तो वह खुद अपने मालिक को खाने लगता है। यही हुआ रहमान डकैत के साथ। इतना पैसा, इतनी [संगीत] दौलत कि उसे संभालना मुश्किल हो गया। जाहिर है यह गैरकानूनी पैसा किसी बैंक में तो रखवा नहीं सकता था। फिर रहमान डिकैत ने एक गलती की। अरशद ये पैसा तुम्हारे पास एक अमानत है। वक्त आने पर मुझे मेरा पैसा वापस चाहिए। रहमान बेफिक्र हो जा। तुम्हारा पैसा मेरे पास अमानत
है। दोस्ती में दरारें शोर [संगीत] से नहीं पड़ती। दौलत की वजह से पड़ती हैं। रहमान और अरशद पप्पू की दोस्ती में भी यही हुआ। रहमान [संगीत] का पैसा अब अरशद पप्पू के पास था। लियारी में रहमान का अस्रो रुसूख बढ़ रहा था। पैसा और दौलत रहमान [संगीत] डकैत के पास ताकत रहमान डकैत के पास। डंडा और सियासी पावर भी रहमान डकैत के पास। अरशद पप्पू ने सोचा अगर यही रफ्तार रही तो अगला बादशाह वो नहीं रहमान डकैत होगा। फिर आया वो लम्हा जब हाजी लालू जेल चला [संगीत] गया। अब गैंग का सरबरा कोई नहीं था।
अरशद पप्पू गैंग का असली मालिक बन बैठा। अरशद पप्पू बतौर लीडर गैंग पर सख्तियां और हिसाब किताब में हाथ टाइट करने लगा। दूसरी तरफ लियारी में रहमान डकैत का बढ़ता अस्रो रसूख भी अरशद को चुभने लगा। रहमान डकैत को गुस्सा आ गया कि वो यह सख्तियां बर्दाश्त नहीं कर सका। फिर दोनों यानी अरशद पप्पू और रहमान डकैत में दरार पड़ना शुरू हुई। दोस्ती टूटी गोलियां चली। घर की खवातीन की इज्जतें लूटी गई और फिर [संगीत] लेयारी एक नई जंग में दाखिल हो गया। रहमान डकैत और अरशद पप्पू तो बहुत गहरे दोस्त थे। दोनों में लड़ाई
की वजह क्या बनी? [संगीत] क्या अरशद पप्पू ने रहमान डकैत के पैसे खाए थे? क्या अरशद पप्पू को रहमान डकैत का लेरी पर बढ़ता अस्रो रसूख बर्दाश्त नहीं हो रहा था? जो अमानतन इसने [संगीत] उसके पास रखवाई हुई अमाउंट थी जो 5 करोड़ की अमाउंट थी वो जब उससे लेने की बात की गई तो उसने देने से इंकार कर दिया बल्कि ना सिर्फ इंकार किया बल्कि इसको रहमान डकैत को गिरफ्तार भी करवा दिया। दुश्मनी [संगीत] इतनी बढ़ गई थी कि अरशद पप्पू ने एक-एक करके रहमान डकैत के साथियों को मारना शुरू कर दिया। पहले रहमान
डकैत अरशद पप्पू के साथियों को मार रहा था। अब पावर आते ही अरशद पप्पू रहमान डकैत के साथियों और घर की खवातीन को भी ठिकाने लगाने लगा। इस ममारी में लियारी की सड़कें खून से भर गई [संगीत] और रहमान डकैत के लड़के अंडरग्राउंड हो गए। जो बच गए वो मारे गए। इस कशमकश में एक रोज रहमान [संगीत] अपने अड्डे पर बैठा था। गैंग के लड़के भी मौजूद थे। फोन बचता है। रहमान तेरा मामू मेरे पास है। बचा सकता है तो [संगीत] बचा ले। पप्पू बैठ कर बात करते हैं। जो कहेगा करूंगा बस मेरे मामा को
छोड़ दे। फैजू मामा उर्फ़ फिरोज़ चाकीवाड़ा का रिहाइशी रहमान डकैत का सबसे मजबूत वफादार अरशद पप्पू के खिलाफ रहमान डकैत के लिए री की हड्डी के बराबर था। उसे मारकर पप्पू ने रहमान डकैत की [संगीत] गैंग वॉर के पूरे ढांचे को तोड़ दिया। इससे यह जाहिर होता है कि रहमान को इसका अंदाजा नहीं था कि इतना सख्त रद्दे अमल भी आ सकता है। उज़ैर बलोच भी ऐसा किरदार है कि जिसने कराची में जुराइम के पहाड़ तोड़े उस पर तो पूरी एक डॉक्यूमेंट्री बन सकती है। आप सुनना चाहते हैं तो नीचे कमेंट करें। खैर अभी वापस
आते हैं अपने टॉपिक पर। लियारी की गलियों में बारूद, खौफ और सियासत की मिलीजुली गैंग वॉर चल रही थी। लियारी की गलियों पर एक ही नाम छाया हुआ था अरशद पप्पू। मगर उसी साल किस्मत ने अचानक करवट बदली। वो कहते हैं ना वक्त आने पर बड़े-बड़े मुजरिम भी कानून के शिकंजे में आ जाते हैं। अरशद पप्पू भी शिकंजे में फंसने वाला था। हुआ कुछ यूं कि रात के सन्नाटे में पुलिस का छापा पड़ा। एसपी फयाज़ की कमान में अहलकार एक फ्लैट का दरवाजा तोड़ते हैं। अंदर अरशद पप्पू जिस पर कत्ल, अखवा, भत्ता, दहशतगर्दी, 50 से
ज्यादा मुकदमात दर्ज थे। लेकिन पहली बार उसका गुरूर हथकड़ियों में बंधा हुआ था। अरशद पप्पू गिरफ्तार हुआ तो लियारी गैंग कमजोर हो गई। पप्पू की गिरफ्तारी का सीधा फायदा सिर्फ एक शख्स को हुआ। वह नाम था रहमान डिकैत। वो खामोशी से लियारी में वापस दाखिल हुआ। इस बार उसके साथ सिर्फ असला नहीं सियासी सरपरस्ती भी थी। लियारी के लोग समझ चुके थे कि पर्दे के पीछे कुछ और ही चल रहा है। अब आपको ले चलते हैं दुरिंदर मूवी में। बेनज़र की तस्वीर लगाई गई। रहमान डकैत के कैरेक्टर में इंडियन एक्टर की एंट्री दिखाई गई। मगर
यहां भी डायरेक्टर ने फिल्म में एक भंड मारा है। रहमान डकैत सियासी पार्टी के जुलूसों में स्टेज पर कभी दिखाई ही नहीं दिया। सियासी पार्टी का रहमान डकैत के साथ असल ताल्लुक क्या था? चलिए आपको बताते हैं। 18 अक्टूबर 2007 शहीद मोहतरमा बेनजीर भुट्टो जिला वतनी करके अपने वतन पाकिस्तान लौटी है। तो एयरपोर्ट के नजदीक अचानक उनके काफिले पर हमला हो गया। उस फ्लोट के अंदर यह दूसरा धमाका हो गया ना। 150 लोग मारे गए। उसी अफरातफरी में एक काले रंग की डबल कैबिन गाड़ी तेजी से आगे बढ़ती है। उसमें मौजूद था [संगीत] रहमान डकैत।
उसे मोहतरमा बेनजीर की सिक्योरिटी की जिम्मेदारी दी गई थी। रहमान डकैत ने मोहतरमा बेनज़ीर को महफूज़ तरीके से बिलावल हाउस पहुंचा दिया। उस दिन लियारी के लोग हैरान थे। एक [संगीत] गैंग का सरगना एक सियासी लीडर की जान बचा रहा था। एक तरफ रहमान डकैत का लियारी में उरूज था और दूसरी तरफ जेल की सलाखें फिर खुली। 2008 में अरशद पप्पू को रिहा कर दिया जाता है। क्यों? क्या उसकी वजह यह थी कि [संगीत] गवाह मुकर गए थे? डर गए थे या फिर गायब हो गए थे। लेकिन लियारी अब पप्पू का इलाका नहीं था। उसने
एमकेएम से हाथ मिलाने की कोशिश की। कामयाबी नहीं मिली। एमकेएम लंदन इसके ऊपर हाथ रखना शुरू हो गई थी क्योंकि लियारी पीपल्स पार्टी का गढ़ था। इनकी जानिब से अरशद पप्पू को सपोर्ट की जाती है। अरशद पप्पू इनकी हिमायत ले लेता है और यही अरशद पप्पू की गलती बनती है। [संगीत] कुछ वक्त के बाद अरशद पप्पू भी बुरी तरह मारा गया। ऐसी मौत के इंसान के रोंगटे खड़े हो जाए। क्या आप [संगीत] सुन पाएंगे? अरशद पप्पू को सबसे पहले अगवा किया गया। बुरी तरह तशद्दुद का निशाना बनाया गया। यहां तक कि उसका सर काटकर बाजारों
में घुमाया गया। फुटबॉल खेला गया। मसाजिद में ऐलान करवाया [संगीत] गया। हमने अपना दुश्मन मार डाला। जी हां, लियारी की गलियों में एक डॉन का सर फुटबॉल बन चुका था। लियारी अब जंग का मंजर पेश करने लगा। बच्चे, औरतें, बूढ़े, जवान, बेगुनाह सब [संगीत] इस गैंग वॉर में बिला वजह मारे जाते। हां। मैं कहता हूं अमन कमेटी वाले हमारे भाई हैं, दोस्त है, हमारे बच्चे हैं। रहमान डकैत लिया के लड़कों को लालच देकर गैंग में शामिल कर रहा था। किसी सियासी पार्टी काउंसलर या पुलिस की मजाल नहीं थी कि वो उन पर हाथ डाले। यहां
एक हीरो की एंट्री होती है। अगर मेरे साथ धक्काबाजी की ना तो मारने से पहले तुझे बना दूंगा। उमर जमील साहब आप खुद सी अरे भाई एडिटर ये वाला हीरो नहीं असली हीरो बुदिलाना कारवाइयां करा के मुझे डराना चाहते हैं कि मैं इन चीजों [संगीत] से बाज आ जाऊंगा मैं इनकी नस्लों को इन्होंने शेर के मुंह में हाथ डाला है। इनकी नस्लें भी याद रखेंगी कि इनको कौन मिला है। चौधरी असलम 2005 चौधरी असलम को लियारी टास्क फोर्स का चीफ बना दिया गया। रहमान डकैत की गिरफ्तारी के लिए मुखबरों को छोड़ दिया गया। फिर इतला
मिली कि रहमान डकैत बलोचिस्तान [संगीत] हब के मुकाम पर छुपा हुआ है। 2005 में पुलिस अहलकार और चौधरी असलम भेष बदलकर गाड़ियों पर घास-फूस डालकर रात के वक्त हक के मुकाम [संगीत] पर पहुंच गए। रहमान डकैत पुलिस की मूवमेंट सीसीटीवी कैमरों में देख रहा था। उसने आसपास के हर जगह पर कैमरे लगाए हुए थे। रहमान डकैत ने जैसे ही चौधरी असलम को देखा, गोलियों की बारिश कर दी। और अब फायरिंग का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया है। आप देख सकते हैं कि आप देख सकते हैं दोबारा फायरिंग शुरू हो गई है और और ये चारों
तरफ से फायरिंग की जा रही है। आप देख सकते हैं कि ये रॉकेट फायर किए जा रहे हैं। ये रॉकेट से फायरिंग की जा रही है। भाई भाई भाई आप देख सकते हैं कि कुछ पता नहीं चलता। अचानक चारों तरफ से फायरिंग शुरू हो जाती है। जिसमें चौधरी असलम समेत कई पुलिस ऑफिसर जख्मी हो गए और रहमान डकैत फरार हो गया। चौधरी असलम ने रहमान डकैत को पकड़ना अपना मकसद बना लिया। गैर के मुंह में हाथ डाला है। इनकी नस्लें भी याद रखेंगी कि इनको कौन मिला है। 2008 में रहमान डकैत कोएटा जिना टाउन से
गिरफ्तार हुआ और कराची गार्डन पुलिस हेड क्वार्टर के खुफिया सेल में रखा गया। यहां चौधरी असलम को रहमान डकैत की खातिरदारी का ज्यादा मौका नहीं मिल सका। वो हेड क्वार्टर में पुलिस वालों को ही रिश्वत देकर फरार हो गया। दो दफा पुलिस की कस्टडी से भागने वाला रहमान डकैत जिसकी सर की कीमत ₹50 लाख थी। फिर एक दिन चौधरी असलम को खबर मिली कि रहमान डकैत कराची आ रहा है। फिर क्या हुआ? चौधरी असलम समेत तमाम अहलकारों ने रहमान की तलाश तेज कर दी। खबर मिली वो बलोचिस्तान से कराची वापस आ रहा है। पुलिस ने
जीरो पॉइंट पर नाकाबंदी लगा दी। सीनियर सहाफियो के मुताबिक यह अहलकार फौजी वर्दी में थे। जब रहमान की गाड़ी पहुंची उसने आर्मी की वर्दियां देख कर ड्राइवर औरंगजेब को कहा गाड़ी रोको। गाड़ी रुकी चारों तरफ सन्नाटा और धूलमट्टी थी। कैप्टन वर्दी में दो लोग [संगीत] सामने आए। इरफान बहादुर और उसके पीछे चौधरी असलम। चारों तरफ वर्दी में लोग असला [संगीत] गंस बचकर निकलना नामुमकिन हो गया। रहमान बलोच को गिरफ्तार कर लिया गया। अखबारों में खबर फैल गई। रहमान डकैत [संगीत] गिरफ्तार। लेकिन लेयारी में एक ही खौफ गर्दिश करने लगा। यह अदालत नहीं पहुंचेगा इसे मार
दिया जाएगा। और फिर अगस्त 2009 पुलिस मुकाबला हुआ। पुलिस का कहना था मुलजिमान [संगीत] यानी रहमान डिकैत और उसके साथियों की जानिब से फायरिंग हुई। हमने जवाबी कार्रवाई [संगीत] की। रहमान और तीन साथी मारे गए। और यूं सरदार अब्दुल रहमान बलोच का किस्सा हमेशा के लिए खत्म हो गया। यह मयत रहमान डकैत की है जो कराची पुलिस को 80 से जायद संगीन मुकदमात में मतलूब था। रहमान डकैत की जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी पर हुकूमत सिंध की जानिब से 50 लाख का इनाम मुकरर किया गया था। बहसियत एसएसपी ईस्ट इन्वेस्टिगेशन इस बात की तस्दीक करता हूं
कि यह रहमान [संगीत] [संगीत] [संगीत]