[संगीत] [हंसी] [संगीत] हेमलता कैलाश जी न्यू दिल्ली से राधे राधे राधे राधे प्रणाम गुरुजी गुरुजी हमारे दोनों बच्चे यंग एज में एक्सपायर हो गए थे अभी तक हमारी समझ में ये नहीं आ रहा कि कैसे रोए कब तक रोए कैसे हंसे कब तक जिए मन विचलित अशांत है हमारा जी हम पति-पत्नी का मार्गदर्शन देखो इसमें रुदन करने की आवश्यकता इसलिए नहीं है आज का सत्संग सुना था क्या सत्संग सुना हिरण कश्यप रणा के वध के बाद अपने भाई की बधु और पुत्रों को सबको संबोधन करके कह रहा था कि रोने की जरूरत नहीं जैसे हम
सब पानी के प्याऊ में एकत्रित होते हैं जैसे में एकत्रित होते हैं अपनी अपनी टिकट का ही अपना अपना काम किया चल दिया कल चित्र केतु का चरित्र पीछे भागवत में उसमें था कि चित्र केतु अपने पुत्र के वियोग में इतने मूर्छित हो रहे थे रो रहे थे तो देवर श नारद जी और अंगिरा जी ने आकर के उनको फिर संभाला और उस जीवात्मा को बुलाया और कहा देखो तुम्हारे पिता माता इतना रो रहे हैं बेटा आओ और हम तुम्हें आयु देते हैं अपने शरीर में तो उन्होंने मना कर दिया उन्होंने कहा एक जो रो
रहा है अपने को बाप समझता है ये कितनी बार मेरा क्या-क्या बन चुका है मैं कितनी बार इसका बाप बन चुका हूं मैं कितनी बार इसकी इसका पति बन चुका हूं यह तो जीव अपने कर्मानुसार आता है देवर्ष नारद जी मैं इस शरीर में नहीं रहूंगा मेरा बस इतना ही कर्म था इस शरीर में और मैं जा रहा हूं मैं किसी से प्यार नहीं करता मेरा कोई कुछ नहीं जब यह आवाज सुनी तो उनका मोह नष्ट हो गया वो जीव आपके लिए एक सेकंड भी नहीं सोच रहा होगा और को वर्षों हो रहे हैं आप
उनके प्रति रो रहे हो यही अज्ञान है यही माया का भगवान का प्रभाव है आप भगवान से क्यों नहीं प्यार करते हो मनुष्य जीवन भगवान के प्यार के लिए शं नहीं होता लगता ही नहीं है किसी भी चीज में यही अज्ञानता है ये अज्ञानता के कारण बाहर ना अंदर कहीं भी भ्रमण करने जाते हो हां बात सही है आपकी हम बिल्कुल सपोर्ट करते हैं ये माया का प्रभाव ही ऐसा है अविद्या का कि हमें लगता है मेरा पति मेरा पुत्र मेरा परिवार मेरा अमुक और जब मेरा परिवार चला गया तो अ हृदय जलता रहता है
यही अज्ञान का खेल है अगर हम भगवान का नाम जप करें और भगवान को पुकारे और वो कृपा कर दे तो रोना बंद हो जाए नहीं तो आज नहीं कभी जन्म जन्मांतर में रोना बंद नहीं होगा यही होगा यही होता रहा है जन्म जन्मांतर से हमें मिलते रहे बिछड़ते रहे मिलते रहे जन्मते रहे मरते रहे इस परंपरा को नष्ट करना है तो भगवान श्री राम जी कह रहे हैं जननी जनक बंधु सु दारा तन धन धाम शहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनही बांध बर डोरी अब हम तो ममता में इतना फंसे कि
भगवान के चरणों की तरफ अपनी ममता लगा ही नहीं पा रहे इसीलिए रोना आ रहा है मेरा पुत्र भगवान ने क्यों छीन लिया आपका ना था ना है ना रहेगा वो भगवान का अंश है कर्म के दुख को भगाने के लिए वो आपके यहां पुत्र बना के अब चला गया व आपका पुत्र नहीं था अगर आपको सुख देने वाला पुत्र होता तो आजीवन रहता आपको सुख देता लेकिन आपके दुख को भगाने के लिए वो जीवात्मा पुत्र बना और पुत्र बन कर के एक हम दृष्टांत संतों के द्वारा सुना हुआ सुनाते हैं दो मित्र थे एक
गांव से शहर गए काम करने के लिए अब वहां धीरे-धीरे दोनों मित्रों ने मिलकर के पैसा कमाया फिर वहीं होटल खोला छोटे होटल से एक बड़ा होटल धीरे-धीरे 20 वर्ष में बहुत अब बड़े मित्र के मन में आया कि यार हम दोनों यहां आए हैं इतना रुपया कमा चुके अगर एक को मार दे तो पूरे अधिकारी हम बन जाएंगे तो जहर देक मार दिया और उसके शरीर का अंत संस्कार एकांत में ऐसे कर दिया और जब गांव आया तो गा गा वाले ने पूछा कि तो जो तुम्हारे साथ गया था बोले व तो हमारे साथी
अलग हो गए थे अब वो कहां गए हमें पता नहीं अब वो तो बड़ा धनी हो गया क्योंकि दो मित्रों की कमाई अकेले अपने जमीन गांव में खरीदी बड़ी अन्न धन और बढ़िया ब्याह हुआ और देर ना लगा कुछ दिनों में एक लड़का हो गया अब तो बहुत सुखी अपने लड़के को खूब स्वस्थ खवाना पियाना और अमेरिका पढ़ाने के लिए भेजा खूब महंगी पढ़ाई लाखों करोड़ों खर्चा हो गए थे तब तक जब लड़का नौ किशोर हुआ अमेरिका जाने के लिए योग्य हुआ वहां पड़ा अब वहां बीमार शुरू हुआ अमेरिका में डॉक्टरी शुरू हुई अब यहां
से खेती बिकना शुरू हुआ व्यापार आभूषण खेती सब चौपट हो गए अब यह हालत हो गई कि लाखों करोड़ों कर्जा हो गए कि किसी तरह बच्चे की जान फिर भी ठीक नहीं अब अमेरिका से वापस भारत लाए और भारत में जब वो गोद में लेकर पिता रो रहा था और कह रहा था बेटा बूढ़ा हो गया जैसे तैसे करके क्या-क्या नहीं कमाया आज सब चौपट हो गया अब मैं तुम्हें बचा नहीं सकता कैसे दवा कराऊं और बहुत रोए तो हंसा वो हंसा बालक और कहा दोस्त पहचाने नहीं अपना सब पूरा हिस्सा और तुम्हारी बेईमानी का
सब सब नष्ट करके और मैं अब ऐसे जा रहा हूं कि जिंदगी भर तुम रोते रहोगे और मर गया चला गया कौन आया था हां दोस्त आया था हिसाब किताब अपना पूरा अब हम लोग अज्ञानी जीव हैं तो हम जानते नहीं भाई किसी ना किसी जन्म में उस जीवात्मा के साथ हमारा कोई ना कोई ऐसा रहा जो आए और नौजवान में हमारे चित्त को चुराकर हमें दुख देकर रुला कर के चले गए नहीं तो अगर हमारे कर्म होते तो हमें सुख देने वाला बेटा होता और सही बात पूछो ये बेटा ये पत्नी ये पुत्र ये
परिवार ये भगवान की दी हुई वस्तु है और जितने दिन के लिए दिए उतने दिन तक ही आप साथ रह सकते हो लाख उपाय करो आप साथ नहीं रह सकते हो ये संसार बिल्कुल एक प्याऊ जैसा रेलवे स्टेशन जैसा है अपनी गाड़ी आई जब तक गाड़ी नहीं आ रही तो चाय पी रहे राधे राधे बात कर रहे हैं और गाड़ी आई तो चाय छोड़कर भागे उस परे बैठ गए चले गए फिर नहीं पूछेंगे कि तुम कैसे हो नहीं पूछेंगे इसलिए भाई नाम जप करो भगवान का आश्रय लेकर उनकी लीला कथा सुनो मन को बांटो अब
समय रोने में मत नष्ट करो क्योंकि तुम्हारी भी वही दशा होने वाली है मृत्यु तो हम सबकी आने वाली है ना य बात तो समझ आगाई लेकिन ये आगे के दिन कैसे निकलेंगे नाम नाम खूब नाम जप करो चिंता मत करो देखो आप लोगों को भगवान का भरोसा नहीं इसलिए आपको लग रहा है कि मेरे बेटे नहीं है तो मेरा बुढ़ापा कैसे कटेगा अरे व अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान उसके सहारे हो जाओ वो ऐसी व्यवस्था कर देगा आप देखते र सोच नहीं सकते भगवान के सहारे इसलिए आप चिंता ना करो कि आप दोनों बूढ़ों
की व्यवस्था कौन करेगा आप उनके भरोसे हो जाओ देख लो कोई ना कोई ऐसा निकल आएगा रास्ता कि उस पूरे विश्व का भरण पोषण अरे वो खुद आ जाएंगे बहाने से किसी ना किसी और आपकी सेवा कर जाएंगे आप जान नहीं पाओगे हां अपने कोशिश तो खूब करते हो इस स्थिति से निकलने की नाम जप करो बस जी नाम जप एक वो रास्ता है जो आपको निकाल देगा हमारी प्रार्थना मान लो जो नाम आपको प्रिय हो राधा राधा राम राम कृष्ण कृष्ण हरि हरि नाम जप करो यह आपको उबार देगा आप नाचने लगोगे आप आनंदित
हो जाओगे नरसीह मेहता जी का पुत्र पधारा तो करताल लेकर नाच रहे भला किया भला किया गोविंद भला किया हां श्रीवास जी का पुत्र पधारा चैतन्य महाप्रभु आंगन में नृत्य कर रहे हरे कृष्ण हरे कृ नाच रहे हैं आनंदित हो रहे हैं देखो हम लोग कहीं ना कहीं माया में फंस गए हैं और माया से मुक्त करने के लिए जा सुनाम भो भे सज हरण घोर त्र सूल भगवान का नाम ही इस भौ रोग की अचूक औषधि इसलिए नाम जप करो जो नाम प्रिय हो और बात मानो भगवान को अपना मान लो तो निहाल हो
जाओगे उनको पुत्र मान लो उनको पिता मान लो गुरु मान लो जो मान लो वो सब कुछ तैयार है और आप देख लेना अब मान के तो देखो उनको अरे कैसे तुम्हें बताए मान के तो देख लो निहाल कर देंगे य परलोक सकल सुख पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संच इस लोक में और परलोक में भी परम आनंद मिलेगा यदि नाम जप करोगे भगवान की लीला कथा सुनो अधिक समय चर्चा सुनो क्योंकि मन पुत्र राग से युक्त हो चुका है तो चर्चा सुनने से मन में बैराग्य आ सकता है अन्यथा अगर वही चिंतन करोगे
तो फिर रोना आएगा परेशानी आएगी और यही लगेगा अब हमारा जीवन किस काम का नहीं नहीं अभी एक साथी जिसको तुम नहीं जानते अभ ज्ञात सखा भगवान श्री हरि ठीक है अर्पित गुप्ता जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी भक्ति और मुक्ति में भक्ति को प्रधान माना जाता है तो मन का भक्ति करके मुक्ति की चाह रखना उचित है भक्ति सर्व समर्थ है मोक्ष भी प्रदान कर देगी और प्रेम भी प्रदान कर देगी जो चाहोगे तो पहले भक्ति का स्वाद आवे फिर बताना कि मोक्ष चाहिए कि नहीं
किसका फ भाई जैसे स्थिति है ना तो स्थिति में जब भक्ति के पहुंचे तो वहां धर्म ना अर्थ ना काम रुचि गति न च हो निर्वान जनम जनम रति राम पद यह वरदान ना आन व स्थिति है जिसमें ना धर्म ना अर्थ ना काम न मोक्ष जैसे श्रीमद राधा सुधा निधि में लिखा है धर्मार्थ चतुष्टय विजयता किम तद ब्रथा वार्ता या बोले धर्म अर्थ काम मोक्ष की वार्ता बेकार की मेरे सामने क्यों करते हो क्योंकि वो प्रियालाल के के प्रेम में डूबे हुए हैं जैसे भरत जी राम जी के प्रेम में डूबे हुए हैं तो
जब संगम पहुंचते हैं तीर्थराज प्रयाग से उनसे कहते हैं कि आप में चार पदार्थों से भरा हुआ भंडार मुझे दिखाई दे रहा है धर्म अर्थ काम मोक्ष और मैं सूर्यवंश में प्रकट हुआ हूं जहां ऐसा करना निषेध है ऐसा नहीं क्षत्रिय वंश में जन्म लेकर और भीख मांगना सबसे बड़ा अधर्म है आरत काह न करे कुकर्म मांगो भीख त्याग निज धर्म मैं अपने धर्म का त्याग करके तुमसे भीख मांगता हूं हे तीर्थराज प्रयाग क्या यह भीख मांगता हूं ना धर्म ना अर्थ ना काम रुचि गति न चाहो निर्वान जनम जनम रतिराम पद यह वरदान मैं
ना धर्म मांगता हूं ना अर्थ मांगता हूं ना मैं कामना की पूर्ति चाहता हूं ना मैं मोक्ष चाहता हूं मैं केवल इतना चाहता हूं भरत जी महाराज कह रहे हैं कि बार-बार हमारा जन्म हो हमारे प्राण प्रिय भगवान श्री राम में मेरी प्रीति हो बार-बार मेरा जन्म हो मेरे कर्म के अनुसार लेकिन मेरे प्रभु में प्रीति हो तो जो प्रीति प्राप्त महापुरुष है उनको मोक्ष की परवाह नहीं है अपने तो बंधन से युक्त है अपने को तो परवाह है ना जब हम काम से बने क्रोध से बने लोभ से बने मोह तो हमको जरूरत है
मोक्ष की इनसे मुक्त होने की लेकिन जब वो भक्ति की उत्तम अवस्था आ जाती है तो वह मुक्त पुरुष है वह काहे को मोक्ष चाहेगा वह तो प्रेम में दीवाना है उसको तो कोटि कोटि बंधन भी मुक्त ही लगते हैं कोटि कोटि बंधन भी मोक्ष ही लगते हैं जो प्रेमी जन होते हैं उनको प्रेम जनित पीड़ा दी जाए तो वह उसे अपना सौभाग्य समझते हैं जैसे पपीहा पी पी पुकार रहा था और मेघ गर्जना करके ओले बरसा रहा था तो दूसरे पक्षी ने कहा देख तुझे क्या मिला पी पी पी पी पुकार रहा है तेरा
प्र प्रतम मेघ स्वाती का बूंद ना देकर ओले बरसा रहा है और गर्जना कर रहा है तो तुझे अपने प्रीतम में दोष नहीं दिखाई दे रहा क् तुझे डांट रहा है पत्थर मार रहा है तो बोले तुम प्रेमी नहीं हो इसलिए तुम्हें दोष दिखाई मुझे लग रहा है कि मेरा प्रीतम य जो गर्जना कर रहा है ना ये मेरे प्रेम की विजय की गर्जना कर रहा है और जो ओले स्पर्श हो रहे हैं ना मुझे लग रहा मेरा प्रीतम मेरा आलिंगन कर रहा है तुझे ओले पीड़ा दे रहे लेकिन प्रेमी चातक क कि मुझे लग
रहा है कि मेरा आलिंगन कर रहा है तो प्रेमी कभी बंधन से मुक्त होना नहीं चाहता और तुम्हें बिल्कुल सार बात बता दे मोक्ष है जैसे दो चीटा है तो एक चीनी में कड़ा में मिलकर चीनी बन गया यह है मोक्ष और एक चीटा दाने में लग कर के आनंद ले रहा है तो तुम निर्णय करके बताओ इन दो चीट में सौभाग्यशाली कौन चीटा है जो चीनी बन ग जो चीनी का आनंद ले रहा है हां जो चीनी का स्वाद ले रहा है वह चीता ज्यादा सौभाग्यशाली वह तो उसी में चीनी बन गया तो चीनी
बन गया अर्थात ब्रह्म वि ब्रह्म भवती और एक है ब्रह्म का आनंद ले रहा है ब्रह्मानंद ले रहा है भगवद आनंद ले रहा है इसलिए प्रेमी जनों ने मोक्ष स्वीकार नहीं किया प्रेमी हम और तुम यह स्वीकार करते हैं और जब गाढ़ प्रेम हो जाता है तो हम खो जाता है केवल तुम ही तुम रहते हो प्रेमी की जो स्थिति होती है और जो मोक्ष है उसमें लीन हो जाना है तरंग समुद्र में लीन हो गया अस्तित्व खत्म हो गया इसलिए हमारे महाप्रभु हरिवंश महाप्रभु कहते विभ क वलता मोक्ष से मुझे भय लगता है इसकी
तो वार्ता मत करो क्योंकि मेरी प्रियाज मेरे से छूट जाएंगे मेरी प्रियाज छूट जाए से मुझे मोक्ष को नहीं चाहिए मे प्रियाज चाहिए मुझे प्रियाला और जब प्रेम होता है ना तो प्रेम एक मस्ती होती प्रेम में लाज लोकन की न वेद को कह करे न संक भूत प्रेत की न देव जते डरे सुने न कान और की दृश न और इच्छ ना प्रेमी एक अलबली स्थिति होती है किसी भी तरह की कोई परवाह नहीं ना मोक्ष की ना लोक निंदा की और अपने प्यारे की प्रीति में अपने को बलिदान कर दे ये उनका है
और यह सबके बस की बात नहीं है नहीं इसीलिए प्रेम सबसे दुर्लभ बात है प्रेम तो कुछ नहीं चाहता पानी है इसमें पानी पीना मना है मुंह में लगाना क्योंकि डायलिसिस के लिए पानी मना है तो बहुत थोड़ा-थोड़ा बाणी से बोलने पर प्यास लगती है तो ये गीला करके पानी से ऐसा रखा ऐसे कर लेते हैं सुबह से बोलना शुरू होता है 4:1 बजे से जी इनकी दृष्टि गई तो सोच रहे होंगे कोई जी दृष्टि गई थी सुबह वीडियो में आप जब वीडियो देख रहा था सुबह में तो मैंने भी देखा था बार बार आप
कर रहे थे तो अब थोड़ा सा इससे आपने स्पष्ट कर दिया हां वो पानी इसमें गीला करके के पानी से रखा जाता है अब हमें प्यास लगती है और पानी हमको जैसे कभी पीने को भी हुआ तो एक छोटा सा पात्र है इतना बड़ा उसमें दिया जाता है अब इतना बड़े शरीर में और पानी की प्यास ये है यह पात्र है जिससे पानी दिया जाता है हमें पीने के लिए एक के बाद दूसरे में लोग हाथ रोकने लगते हैं और जब तीसरा मांगते हैं तो ये लोग मना कर देते हैं तो अब उसके लिए कपड़ा
रखा है पानी का गीला ऐसे कर लिए तो जो बोलने से प्यास लगती थोड़ी तसल्ली होती इसलिए जैसे एक दो की दृष्टि गई कि कौन सा इसमें मतलब क्या है इसमें इसम पाली है जी नीलम चावला जी राधे राधे गुरुदेव आपके चरणों में सादर प्रणाम मराज जी मैं अपने परिवार सहित लगभग दो वर्ष से सत्संग सुनती आ रही हूं और प्रभावित होकर मैं अपने पति के साथ हर दो ढाई महीने में यहां आकर आपके दर्शन और सत्संग मेरा प्रश्न है कि सत्संग सुनते और अमल करते रहने के अभ्यास से ग्रस्त में होते हुए विरक्त भाव
से इतने इतना भर जाती हूं कि सब कुछ छोड़ के नहीं नहीं वही हम कह रहे थे छोड़ने की लेज लेकिन कभी-कभी कुछ स्थिति परिस्थिति आने पर मन परेशान हो जाता है डोल जाती हूं क्या करूं आप मुझे समाधान दीजिए कि ताकि गृहस्थ में रहकर विरक्त भाव से रहने की आद गह और विरक्त ये केवल दिमाग की बात है हमारी बात हमसे बड़ा गृहस्थ कौन होगा आप विरक्त देख रहे हैं एक गृहस्थ के चार पांच लड़के होते हैं हमारे चार 500 लड़के हैं वाह 4 500 और तुम अपने बच्चे को जैसा प्यार करते हो उससे
लाख गुना बढ़कर हम प्यार करते क्योंकि यह अपने माता-पिता परिवार को छोड़कर आए हैं तुम केवल शरीर संबंधी प्यार कर सकते हो और हम शरीर और परमार्थ दोनों प्यार करते हैं अच्छा आपको कितने की जिम्मेवारी होगी यह तो केवल बच्चे हैं और भी तो है ना हर व्यवस्था भागवती है तो अगर हम कहे कि गृहस्थ हमें उने वाली बात लगती है तो आप फिर यह सोचो कि इतना बड़ा परिकर और सुबह हम रात्रि के 12 बजे उठते हैं और अपनी दिनचर्या करके दो बजे रोड में आ जाते और तब से अभी तक व्यवहार ही तो
चल रहा है आप लोगों से मिलना आप लोगों से प्रश्न उत्तर करना यही तो चल रहा है उना नहीं होता है कभी कभी कोई बात ऐसी हो जाती है कि उस मन दुखी होता है कि हम उधर के भी नहीं रह रहे और इधर के भी पूरे कोई खुश मतलब दुनिया में भी कोई खुश नहीं होता और हम पूरे भगवान की तरफ भी नहीं जा नहीं क्यों पूरे भगवान की तरफ क्यों नहीं है भगवान की तरफ जाने के लिए कोई कपड़ा बदलना या कोई मतलब व्यवस्था छोड़ना ऐसा बिल्कुल नहीं सब दिमाग की स्तर छोड़ दीजिए
रुपया पैसा भोग सामग्री यही दिमाग में छाया है ना तो इसी को पाखंड कहते हैं चाहे लाल पहन लो चाहे पीले पहन लो चाहे काले पहन लो चाहे जो पहन लो और सलवार कुर्ता में पेंट शर्ट में और भगवान से प्रीति करते हो परिवार को भगवान का जन मान का सेवा करते हो बढ़िया संत हो हम संत होकर के जो संत की बात है व हम आपको बता रहे हैं अगर भगवान से प्रीति नहीं तो कुछ नहीं और भगवान से प्रीति है तो विभीषण जी शदी वर्दी में है कोई पोशाक उनकी संत भेष नहीं और
भगवान कह रहे तुम सारी केे संत प्रिय मोरे धरम देह नहीं आन नि होरे तुम्हारे जैसे संतों के लिए मैं अवतार धारण करता हूं भगवान कहते हैं और विभीषण जी रावण के भाई हैं और राजमंत्री पद पर है और उसी पोशाक से आए हैं पोशाक नहीं है और पोशाक धारण करता कालनेमी और हनुमान जी पूछ में लपेट करके उसको मार डालते हैं कालनेमी धारण करता है पोशाक साधु वेष की अगर साधु वेश है और उद्देश्य ठीक नहीं है तो फिर वो पाखंड ही तो हुआ तो यह जो लोगों के मन में बैठा है कि हम
घरबार छोड़ देंगे कहीं चले क्या जानते बस बात केवल बदली है हमारा सब कुछ प्रभु का है हम सहित और आपका पर्सनल घर है आपका पर्सनल पति है आपका पर्सनल पुत्र है बस यही भाव समर्पित कर दो तो हो गया अब हमारे आप सब नहीं हो क्या पर हमसे ईमानदारी से पूछा जाए आपका कौन है तो भगवान के सिवा हमारा कोई नहीं आप सब भगवान के प्रेरित होकर के यहां आए हम भगवान के जन है तो हम आपको प्यार कर रहे हैं और गृहस्थ में केवल ये मान लिया जाता है मेरी पत्नी मेरा पुत्र बस
एक घेरा बना लिया गया इसलिए वो बंध गया अगर उस घेरे को तोड़ दे तो संत ही है वो घर में रहता हुआ संत है बात समझ नहीं है कहीं नहीं भागना और ये जो थोड़ी-थोड़ी बातों में थोड़े-थोड़े विपरीत काओं में उपदेश हैं ये भक्ति नहीं है भक्ति भारी से भारी परिस्थिति में नहीं उठती हर बात चाहूंगा और जिंदगी में किसी से क्या आपसे भी शिकायत नहीं करूंगा और पूरा जीवन पूरा जीवन कष्ट में लेकिन हर बात में हर स्थिति में मुस्कुराना सीखा है आपका दिया हुआ दुख मेरे लिए सुख से भी बढ़कर है बस
मस्ती मस्ती मृत्यु का दुख है लेकिन मस्ती है यही भगवान से प्राप्त किया है यही भगवान के चरणों से प्राप्त किया है कि हर परिस्थिति में मुस्कुराना हर परिस्थिति में आपकी जय बोलेंगे मरने जा रहे होंगे तो भी बोलेंगे आपकी जय और फिर प्राण त्याग मस्त रहना ये छोटी-मोटी बातें छोटे-मोटे दुख छोटी-मोटी घबराहट की बातें आई हमारी भक्ति क्षीण हो रही है हमारा भाव बिगड़ रहा है अभी मस्ती नहीं आई जब मस्ती आए हर दुखों को रोमते हुए अपने प्यारे की तरफ बढ़े उसी को मस्ती कहते हैं ना हां बिल्कुल मस्त रहो ये मनुष्य जीवन
हाय हाय करने के लिए नहीं मिला बहुत मस्त होने के लिए मिला मस्ती का राज है उस सच्चिदानंद में स्थित होकर के मस्त रहना उस सच्चिदानंद में ही आनंदित रहना हर परिस्थिति में आनंदित रहना ये गंदे नशा करने वाले गंदी बातें करने वाले गंदे आहार करने वाले ये मस्त थोड़ी होते हैं ना ना ना मस्त तो होते जो भगवान में अपना चित्त जोड़ते देखो हनुमान जी की मस्ती को देखो विभीषण जी की मस्ती को देखो ध्रुव जी की मस्ती को देखो प्रहलाद जी के विष पी गई मीरा जी मस्ती देखो पूरा रात र नाचती रही
मेरे गिरधर गोपाल यह मस्ती जहां विष हलाहल भी अमृत हो जाता है प्रहलाद जी को क्या-क्या कष्ट नहीं दिया गया आप पढ़ के देखो पाच वर्ष का बालक मस्त है ध्रुव जी मस्त है जो भगवान से जुड़े वो मस्त है जो माया से जुड़े वो मस्त नहीं है वो तो चिंता शोक भय उगन विषाद इसमें फंसे हुए हैं मस्त वही है जो भगवान से जुड़े हर बात को भगवान से जोड़ दो कि अगर भगवान की मेरी इच्छा ना होती तो दुख क्यों यह विपत्ति क्यों आती और जब मेरे भगवान मुझे दुख देना चाहते तो मैं
सुख क्यों चाहूं हम भगवान से प्यार करते तो आपका दिया हुआ दुख करोड़ों सुख से भी बढ़कर हमारे लिए है तब मस्ती आती है तब मस्ती आती है महाराज जी मैं स्वयं का भजन स्वयं सुनता था इसके बाद महाराज जी 10 साल से मेरा बंद हो गया और भजन बहुत कम भजन सिद्धों का चलता है साधकों को चलाना पड़ता है ना तो चलाओ तो चला फिर चलो कोई गलती हो गई हो महाराज उसका कोई उपाय बताए सि बाबा की कृपा हुई नहीं आप ये बताओ आपको किसी संत महात्मा के प्रति दोष दर्शन हुआ क्या महाराज
जी नहीं मैं तो नहीं करता नहीं करता सिद्ध बाबा की अ दसना करता हूं और उन्ही की कृपा हुई थी अगर स्वाभाविक भजन में जो प्रवृत्ति में अरुचि होती है उसके दो कारण होते हैं या किसी वैष्णव संत महात्मा का अपराध बन गया और या फिर अभ पदार्थ कोई भोजन जो फिर किसी महात्मा का अपराध अगर बन गया हो तो आप देखो कई तरह का अपराध होता है जैसे दोष दर्शन कर लेना उनकी निंदा कर लेना उनके प्रति लघु भाव आ जाना तो फिर इस हा लघु भाव तो हां तो उन्हीं को मानसिक प्रणाम करो
जिनके प्रति आया हो और आज से फिर फ्री हो जाओ फ्री हो जाओ हल्के हो जाओ यहां आए हो 18 घंटे भजन चुपचाप कहो मत अहंकार आ जाएगा डर जैसे नहीं भेड़िया आ जाएगा बच्चों को लेके ते ऐसे अहंकार आ जाएगा मैं 18 घंटे भजन करता हूं ऐसा अहंकार आ जाएगा और ये आ जाएगा तो चाट जाएगा भ महाराज जी से एकांत वार्ता करूंगा तो व्यवस्था बनाए हा हो गई व्यवस्था तुम अब कुछ कहने की जरूरत नहीं जाओ और जो संत भगवान के प्रति दोष दर्शन हुआ उन्हें मानसिक प्रणाम कर लो और फिर भजन में
लगो आज आप खुद देखोगे आपका अंदर का चैप्टर बदल जाएगा आप जाइए आप भजन में लगे शिवाजी बेंगलर से गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव मेरा प्रश्न है कि अगर भूलवश श्री जी की सेवा या साधना में त्रुटि हो तो उसका प्रायश्चित क्या कर नाम कीर्तन जब हम कोई भी सेवा में त्रुटि हो जाए या कोई पाठ में त्रुटि हो जाए या स्तोत्र में त्रुटि हो जाए तो उसकी नाम संकीर्तन से पूर्ति हो जाती है इसीलिए हम पाठ प्रारंभ करने के पहले नाम कीर्तन करते हैं और पाठ समाप्त होने के बाद नाम कीर्तन
करते हैं इसलिए हम भगवत सेवा प्रारंभ करने के पहले नाम कीर्तन और भगवत सेवा समाप्त होने पर विश्राम होने पर भी नाम कीर्तन नाम कीर्तन से उसकी पूर्ति होती है कोई मंत्र आता हो ना आता हो जैसे मंत्र है अक्षम पदम भ्रष्ट मात्रा हीनम च लेकिन नाम संकीर्तन राधा राधा राधा राधा राधा उससे सब की पूर्ति हो जाती है समझ पाए श्रद्धा व्यास जी श्री हरिवंश गुरुदेव गुरुदेव जब अनेकों बार वृंदावन आने का प्रयास करने पर भी ना आ पाए तो कैसे पता करें कि कोई अपराध बना है या हमारे द्वारा कमी है या फिर
श्री दे कोई अपराध कोई कमी की बात नहीं है कई ऐसी परिस्थितियां होती है जो धाम तो वृंदावन नहीं आ पाए तो चिंतन तो जा रहा है ना वृंदावन वृंदावन को चिंतन यह दीप उर बार कोटि जन्म के तम अघ काट करे उजियार हम वृंदावन जाएंगे वृंदावन की परिक्रमा करेंगे सत्संग सुनेंगे यमुना रस रानी के पास बैठेंगे नाम कीर्तन करेंगे पूरा हमारा चिंतन चल रहा है ये चिंतन करोड़ों जन्मों के पापों का नाश कर रहा है हम वृंदावन आ पाए ना पाए हमारा मन वृंदावन आ गया हम रोज तैयारी करें भले ना पावे हम प्रतिदिन
यही मनावे कि कब मुझे वृंदावन वास मिलेगा भले जीवन में वास ना हो पावे तो हमारा मन तो वृंदावन की तरफ जा रहा है हमारा मन तो वृंदावन से प्रेम करने लगा हमें खास बात ये देखनी वहां अपराध हो ये सब बातें नहीं देखनी कई परिस्थितियां गृहस्थ में ऐसी होती है जिनके कारण नहीं आया जा सकता तो हम वृंदावन ना पावे तो वृंदावन आने की बात तो सोच ले जैसे कि कल वृंदावन चलेंगे और नहीं पहुंच पाए तो हम प्लान हमारा बना ना वृंदावन जाएंगे फिर ऐसा फिर ऐसा वो प्लान का हमें पुण्य मिलेगा हमारे
पाप नष्ट होंगे क्योंकि भागवत है ना हां तो हम रोज वृंदावन की तैयारी करें हम तो कहते हैं रोज वृंदावन आओ मन के द्वारा देखो 10 मिनट में वृंदावन में पूरी परिक्रमा लगा सकते हो यहां से राधा केल कुंज से फिर वहां गए फिर जुगल घाट फिर ऐसे केसी घाट ऐसे मन से घूमते पूरी वृंदावन परिक्रमा लगी फिर राधा वल्लभ जी दर्शन करने गए राधा रमण जी दर्शन जहां जहां गए वो अपने दिमाग में भर लिया और एकांत में बैठकर उसका चिंतन कर रहे हैं रोज वृंदावन वास का आपको लाभ मिलेगा क्योंकि रोज वृंदावन आए
रोज वृंदावन दर्शन यही तो मानसिक वृंदावन की परिक्रमा हो गई ना मानसिक वृंदावन की पूजा हो गई मानसिक वृंदावन आ गए जब शरीर से आने को मिले तो आओ नहीं मन से रोज वृंदावन आओ रोज वृंदावन की परिक्रमा लगाओ रोज संत दर्शन करो भाव से जा रहे हैं अब अंदर घुस गए बगीचे के अंदर जाकर वो सामने देखा प्रणाम थोड़ी देर बैठे फिर उठे चल दिए अब राधा रमण जी जा रहे हैं नाम जप करते हुए राधा ओ राधा रमण जी प्रणाम किया उनको थोड़ी देर वहां दर्शन कि चल दिए मानसिक आराम से आप 10
मिनट में बहुत बड़ा लाभ ले सकते हैं अगर आने को प्रकट मिले तो ठीक है ना आने को मिले तो भावना से रोज वृंदावन से जुड़ नाम रूप लीला धाम यही तो हमारी उपासना है धाम का चिंतन नाम का चिंतन रूप का चिंतन लीला का चिंतन यही तो हमारा जीवन है तो अब रूप और लीला य थोड़ा आगे की बातें हैं प्रियालाल के रूप का चिंतन और लीला का चिंतन य तो आगे की धाम और नाम यह दोनों पकड़ की चीज तो नाम का चिंतन करें और धाम का चिंतन करें ना पावे तो अपराध ना
सोचे कि कोई अपराध बन गया श्री जी बुला नहीं र ऐसा नहीं करुणामय बहुत कृपामई लाडली जो है अवगुण करे समुद्र सम गनत ना अपनो जान राई के सम भजन को मानत मेरु समान श्री जी बहुत कृपामई है पर गृहस्थ में संसार में बहुत सी ऐसी परिस्थितियां है जो हमें रोक सकती है हम नहीं जा पा सकते तो कोई अपराध थोड़ी शरीर नहीं जा पाया तो मन से हम चिंतन कर रहे हैं उनके हैं देखो यह बात अंदर से बैठा लोलो कि जहां राखो ता रहो मान सुखरास है जहां रखो गी प्रिया जू मैं आपके
द्वारा रखी गई हूं आप दिल्ली रखो कोलकात्ता रखो आप जहां रखो आपकी मौज है मैं आपकी हूं आपका चिंतन करूंगी आप जहां रखोगे उसमें राजी रहूंगी मांग रहूंगी कि वृंदावन मिल जाए तो अच्छा वृंदावन दर्शन कराऊं तो अच्छा ऐसी भावना से रहो दैन्य भावना समर्पित भावना तो देखो भाई जी हनुमान प्रसाद पुदार जी गोरखपुर गीता वाटिका वहीं से श्री जी के दर्शन कर रहे हैं वहीं से दिव्य लीला पूज्य राधा बाबा तो अगर आप वृंदावन नहीं आ पाते हो वृंदावन का चिंतन करते हैं तो वृंदावन आपके हृदय में वहां प्रकाशित हो जाएगा हमारे उर वृंदावन
और हमारे हृदय में वृंदावन चिदानंद है वो जहां भी आप होगी वहीं पर शित हो जाएगा तो ऐसे भाव से रहो नहीं तो आपको बार-बार हृदय में जलन होगी दुख होगा कि पता नहीं कौन सा पाप बन गया हम धाम नहीं जा पा रहे तो ऐसा ना सोचिए भजन करने वालों में भी ऐसी परिस्थितियां ऐसी आती हैं व्यवस्थाएं जो धाम की तरफ आने का प्रयास करने पर भी असफल हो जाते हैं बहुत से ऐसे ग्रस्त है तो वहा अपराध की भावना नहीं करनी वहां प्रिया जू का चिंतन करके वृंदावन का चिंतन प्रारंभ कर दे वो
वास जैसा ही फल मिलता है चिंतन से जी जी आपकी कृपा से आपकी कृपा लाडली जो की कृपा से ठाकुर जी कृपा से भागवत हम करवाने जा रहे हैं कहां करवा चंडीगढ़ में जी ऐसी कृपा हुई के सभी संतों को बहुत सुंदर है आपका केवल आशीर्वाद लेने आए हैं हम तो वृंदावन से जा प्रवक्ता कौन है प्रधान इंद्रेश उपाध्याय जी ऐसी कृपा ई है लाडली की कि अपने आप हमें नहीं पता कि कैसे हो रहा कृष्ण चंद्र जी के बेटा बहुत सरल मूर्ति है बहुत पवित्र कुल परंपरा से बहुत पवित्र हमें नहीं पता महाराज जी
कैसे होगा कैसे नहीं होगा पर सब ठकुर जी पर छोड़ दिया हा बिल्कुल नहीं बहुत सुंदर यह बहुत मांगलिक अनुष्ठान है और अधिक से अधिक संतों को बुलाओ सब संतो को उपस्थित उनके बीच-बीच में प्रवचन रख दो बहुत मंगलमय रहेगा बहुत अच्छे प्रवक्ता है मतलब हृदय से भगवान की चर्चा करते हैं एक होता है ना वाणी की प्रवीण पवित्र हृदय पवित्र वाणी बहुत प्रवीण है ठाकुर जी लेकर के आए थे य बोले हमारे ठाकुर जी यह देना चाहते ठाकुर जी जी जी जी बहुत अच्छे बहुत अच्छे और ये बहुत उत्तम कार्य है और हृदय से
हम आपके साथ है शरीर से बरवा नहीं पहुच पाएंगे महाराज जी वही चाहिए हम बस ये जो भक्ति का बीज आपने सब में अंकुरित करा है ना बस उसी का हा बहुत और यह महाराज जी ओपन टू ऑल है इसमें हमने कोई पास कोई एंट्री नहीं रखी जो आए वो नाम सुने बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल ठीक है बिल्कुल ठीक है और खानपान की भी व्यवस्था रखना जो जैसे बाहर से कोई आया हुआ भूखा हैक तो उसको भी भोजन की व हां ये बहुत क्योंकि जैसे कथामृत है ना कानों के द्वारा हृदय में गया तो उष्टा मृत
मुख के द्वारा पेट में गया इसकी भी व्यवस्था कर देना भोजन की व्यवस्था है हां जी हां जीहा बकुल प्रसादी है जी संतो के चरण रज में बहुत बड़ी सामर्थ्य है आप चिंता ना करो ठीक है सात दिन ऐसी भोजन व्यवस्था कि जो पाना चाहे जिनकी व्यवस्था है वो पाके आए और जो ऐसे लोग पाना चाहे तो भोजन व्यवस्था बिल्कुल महाराज बिल्कुल महाराज जी बिल्कुल ये हम अपनी श्री जी को अर्पित करवा दें उनको निमंत्रण अप श्री जी को दे आओ वही जानेगी वही देखेंगी महाराज जी आपकी कृपा चाहिए बस नहीं बहुत बड़ा कार्य है
एक भागवत ने धुंधकारी को भगवत पार्षद बना दिया था एक भागवत ने महाराज जी एक ये प्रसिद्ध सिंगर है पंजाबी जैस्मिन सैंडलस जी तो कुछ सुनाना चाहेंगे एक दो लाइन आप बिल्कुल घर जैसे बैठ के सुनाइए एकदम राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा अब इसे राग में ले जाइए ले जाइए डरो मत राधा राधा राधा [संगीत] राधा इतना ही काफी तुम्हारे उद्धार के लिए श हमेशा यही प्रार्थना है कि आपका स्वास्थ्य हमेशा ठीक रहे हमेशा इतनी आप पर इतने लोगों का जो लोगों की जो इतनी प्रार्थना आपके साथ
है महाराज जी पर अ ये क्या है कि जितने मिनट चल शरीर को उतने ही मिनट चलेगा मतलब अब वो जो जाने वाली चीज तो जाएगी जाएगी और जितने दिन हमारा शरीर सेवा में लगना है उतने दिन लगना है अब अपने बस का तो है नहीं मालिक जितने दिन रखेगा नौकरी में उतने दिन रखना है नहीं तो ट्रांसफर और अगर मालिक को फिर भेजना है तो नया शरीर फिर भेजेंगे वो नाम प्रेमानंद भले नहीं होगा लेकिन कोई भी नाम हो काम वही करेंगे जो अभी कर रहे हैं मालिक शरीर बदल सकता है अगर अपने पास
अपनी सेवा में रख लिया तो बाद अगर यहां है तो फिर य झंडा ऊंचा [हंसी] करेंगे धनवाद धनवाद भक्ति योग नाम जब से आएगी तद पिता अखिला चरिता त स्मरण परम लते थे यह भाव लाव समस्त आचरण भगवान को अर्पित करते श्री कृष्ण अनुक प्रतिकूल विसर्जन और निरंतर नाम का अभ्यास करो तीव्र भक्ति योग जागृत हो जाएगा तीव्र भक्ति योग का मतलब ही यही है अवि स्मरण निरंतर अखंड तैल धारा आवत भगवान की स्म कभी नाम कभी लीला कथा कभी हम उनके रूप में ऐसे डूबे हुए हैं तो तीव्र भक्ति योगन का मतलब एक भी
क्षण भगवान से विमुख ना जाना अब इसके लिए हमें प्रयास करना पड़ेगा अभ्यास योग युक्तेश्वर ने भी सुना है कि बहुत से बच्चे विविध प्रकार के नशा इंजेशन ये सब अब क्योंकि बुद्धि बच्चा जब भ्रष्ट हो जाती है तो यही सब लक्षण होते हैं अब सबसे पहली हानि ब्रह्मचर्य की हुई ना तो बुद्धि नष्ट हो जाती ब्रह्मचर्य हीन जीवन मरा जीवन होता है अब छोटे-छोटे बच्चे विविध प्रकार से व विचार प्रवृत्तियों में प्रवीण हो रहे हैं ब्रह्मचर्य तो है नहीं अब आनंद की खोज में अभी नई अवस्था में ब्रह्मचर्य क्षीण कर दिया अब उनके अंदर
जो उन्माद चढ़ रहा उसको रोकने के लिए उनको व्यसन चाहिए अब वो व्यसन के लिए अर्थ चाहिए अब अर्थ के लिए फिर चोरी छीना झपटी मारपीट माता-पिता परिवार बाहर जहां जैसा तो इससे हमारी नई समाज बहुत बिगड़ रही है बहुत बिगड़ रही कल कोई आए थे कि सनातन धर्म का हम तोमका सनातन धर्म का उत्थान करना तो पहले हमारे नई समाज को सुधारो जो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड लिविन रिलेशन व्यसन आदि में फस रही है इसको सुधारो तो सुधर सकती यही तो हमारे सनातन धर्म के आगे अब इनकी क्या दशा होगी जो इंजेशन से जी रहे हैं
नशे में जो पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि केवल भोग दृष्टि रख रहे हैं य क्या हमारे सनातन धर्म का व मतलब उत्थान करेंगे क्या हो गए तो खुद पशु की तरह अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं ये कई दिन मस्ती चलेगी ये कई दिन चल ज्यादा दिन जीवन नहीं रहता ऐसे लोगों के लीवर खराब हो जाते हैं बहुत तरह की बीमारियां ना आ जाए तो फिर इतना वो डिप्रेशन में पहुंच जाते हैं म जी जो पढ़ाई कर रहे हैं उसमें सभी डॉक्टर बनेंगे नहीं डॉक्टर का बनेंगे वई मतलब कोई परफेक्ट डॉक्टर तो नहीं
बन सकते समाज को सुख देने वाले जो व्यसनी है व्यभिचारी हैं वह डॉक्टर समाज सुख वाले तो नहीं बन सकते नहीं आप देखो ना नहीं आता डॉक्टर ने नर्स के साथ गलत आचरण किया डॉक्टर ने मरीज के साथ गलत आचरण किया डॉक्टर वो मर चुका है मरीज लेकिन फिर भी कह रहे कोशिश कर रहे हैं हम दो-तीन दिन अभी लगेंगे और उसके पैसे ले रहे हैं तो ये सब वही है नशेबाज व्यभिचारी लोग नहीं जब मरीज दसक कर दिया और प्राण तुम्हें समर्पित कर दिए और आप ले गए ऑपरेशन आदि के लिए या जहां अब
उस समय तुम भगवान हो उसके आप जीवन रक्षा के लिए पूरा प्रयास करो वो वो चीज डॉक्टर को भगवान माना जाता है हमारे यहां आज के बच्चे जो व्यसन करने वाले व्यभिचारी बच्चे हैं ना ये जब डॉक्टर मास्टर कुछ भी बनते हैं तो ये ऐसे ही बनते हैं जब उनके सामने समाज होती है तो समाज का शोषण करने वाले बनते हैं डॉक्टर का पद भगवान का पद होता है तुमको अपने पद का गौरव नहीं तो यह जब लोग डॉक्टर बने चाहे मास्टर बने चाहे जहां बने ये गंदगी ही फैलाए क्योंकि दिमाग गंदा है ना दिमाग
अस्वस्थ है स्वस्थ दिमाग जो है वो वही तो समाज की सेवा कर सकता है ये बीमार लोग हैं ये बीमार लोग है बीमार दिमाग के लोग हैं हां इनको जरूरत पड़ी तो यह किसी को जहर भी दे सकते हैं और जो वास्तविक स्वस्थ दिमाग के डॉक्टर हैं वह तुम पैसा से तोल दो तो भी मरीज के साथ धोखा नहीं करेंगे क्योंकि उनको अपने धर्म का ज्ञान है इस समय मरीज का जीवन हमारे हाथ में है हम ऐसा नहीं कर सकते पर प्राया बहुत कम ऐसे लोग हैं जो अपने धर्म को पहचानते पैसे में बिकने के
लिए सब तैयार है बच्चा बहुत कठिन बात है कैसे सुधारा जाए आप लोग स्वयं सुधरने की चेष्टा करें और बचने की चेष्टा करें तो हो सकता है पर नए-नए बच्चे नई उमंग तो उनको संतों की बातें सुनने में अच्छा नहीं लगता शास्त्र की बात सुनने में अच्छा नहीं लगता उनको तो लगता है नया जीवन है आनंद ले लो लेकिन आनंद का एक समय होता है जब आप पानी ग्रहण करें गृहस्थ में जाएं और फिर अपने अनुसार धर्म पूर्वक चले तो एक गृहस्ती का आनंद है आप पहले ही फसल के पहले ही आप फसल काट तो
दाना नहीं आएगा ऐसे नए जो 18 20 22 के बच्चे नाय अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं व्यसन और व्यभिचार से अरे एकही आ जाए तो नष्ट कर देता है फिर दो दो व्यसन और बचार तो हमें तो लगता है हमारी समाज को बहुत जरूरत है विचार मुक्त करने की और व्यसन मुक्त करने की अब भगवान किसको सामर्थ्य देते हैं वही मुक्त करेगा हम लोग तो बस केवल वाणी से बोल सकते हैं और कुछ प्रभाव तो पड़ ही रहा होगा वाणी का नहीं वाणी का प्रभाव तो पड़ ही रहा होगा हमारे नए भाई बहन
जो है ना व हमारी बात हमारी पीड़ा समझेंगे तो थोड़ा सा हमको सहयोग करेंगे जसे बच्चों को भी जब हम दिखाते हैं वो रील वगैरह तो देखने के बाद में प्रभावित होते हैं कि कम से कम उनका वृत्ति तो भगवान में लगे वृत्ति तो सत मार्ग में लगे बिलकुल बकुल ये आपके ही अगर वो बच्चे राधा राधा रटे और थोड़ा सत्संग सुने और थोड़ा स्ट्रांग हो कि व्यसन छोड़ सके तो बहुत ये जितने वशन है सब जीवन बर्बाद कर देते हैं सच्ची मानिए कुछ दिन तो आपको ऐसा लगेगा आनंद दे रहे हैं फिर वो व्यसन
तुम्हारा नाश शुरू करेगा कोई भी व्यसन हो तुम्हारे अंगों का तुम्हारे शरीर का तुम्हारे विचारों का सब नष्ट कर देते कोई व्यसन सही नहीं कोई भी व्यसन सही नहीं जो व्यसन मुक्त है वो बहुत बढ़िया देव जीवन जी रहा है जो व्यसन कर रहा है वो बहुत बुरा फस चुका है चाहे शराब हो चाहे मसाला हो ये मसाला में ऐसे-ऐसे केमिकल पड़ते हैं एक दिन एक डॉक्टर साहब आए थे तो वो बहुत पीड़ा से युक्त होकर कह रहे थे कि मसाला से ऐसे ऐसे कैंसर हो रहे हैं लोगों के मुख में कि बोले कीड़े निकलते
हैं और त्रा इमाम बोल रहे हैं बोले हम महाराज जी आप बोलिए कि लोग मसाला खाना बंद करें तो हम कहा भाई हमको तो नहीं पता था कि ऐसा हम तो समझ रहे हैं कि सुपड़ी पाड़ी है लोग खा रहे हैं चलो भाई क्या बोले नहीं इससे बहुत हानि है तो हमें लगा उस समय निर्णय में कि कोई भी व्यसन सही नहीं है कोई भी व्यसन स्वास्थ्य के लिए हमारे ठीक नहीं है हमारी बुद्धि को हर व्यसन अपने अधीन कर लेता है सबसे पहली पहली कमी होती है वह आपको बांधता चला जाएगा ऐसे हर व्यसन
है हमें सबसे प्रार्थना हाथ जोड़कर आप हिम्मत कीजिए और धीरे-धीरे व्यसन छोड़िए एकदम कसम खा के मत छोड़िए नहीं छोड़ पाएंगे चार दिन में आप लड़खड़ा के गिर जाएंगे पहले क्रमश धीरे-धीरे छोड़े तो उससे क्या एकदम शरीर जैसे आपका नश कि हैबिट पर गई है आप एकदम छोड़ोगे तो टूट जाओगे नहीं छोड़ पाओगे धीरे-धीरे छोड़िए आप जितना लेते हो उससे कम संख्या में आइए और एक महीने का टारगेट रख लीजिए कि हम एक महीने में इसको छोड़ देंगे तो आप धीरे-धीरे छोड़ सकते हैं इकट्ठे नहीं छोड़ने की बात हम नहीं कहेंगे क्योंकि नहीं छोड़ सकते
इकट्ठे अगर कसम खाए तो दो चार दिन में आप फिर कसम तोड़ देंगे क्योंकि इतना माइंड खराब उसको धीरे-धीरे लाइए धीरे-धीरे कम में लाइए और इतना कम में ला चले जाइए कि आप फिर एकदम छोड़ दे तो आपको कोई परेशानी ना हो भगवन नाम के वसन में भी अगर अपने आप को समर्पित कर दिया जाए नशे से ता ही हो जाएगा हा बिना भगवान के बल के नहीं होगा पर एक शरीर की हैबिट होती है जैसे आप अगर कोई तंबाकू खाता है 10 बार ना तो अब जब उससे एकम आज से कसम से तुम तमाखू
मत खाना अब हर समय उसको यही दिखाई दे अगर कोई दिखाई देगा तो फिर वो मतलब वो उसको यही लगेगा कि कहां फस गए तो वो धीरे-धीरे छोड़े हम हम किसी बात को बहुत समझ के कह रहे हैं कि व्यसन को धीरे-धीरे छोड़े एक महीना का टारगेट रख ले और धीरे-धीरे उसको कम करता हुआ छोड़ दे एकदम एकदम छोड़ने में व्यवस्था आ जाएगी और नाम जप करते हुए अगर हम ज्ञान पूर्वक छोड़ेंगे कि यह हमारे लिए हानिकारक है तो हम धीरे-धीरे उस पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो बच्चा अब हमारी बात प्रार्थना ही केवल है
आप सब विद्यार्थी जन नौजवान हमें सहयोग दें कि आप सब व्यसन मुक्त य विचार मुक्त हो तो आपका जीवन मंगल में हो जाएगा पियूष नाशा जी राधे राधे महाराज श्री महाराजी मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में हमें सिखाया जाता है कि सभी कर्मों को निष्काम भाव से भगवान को समर्पित करना चाहिए बिना परिणाम की आसक्ति के फिर भी इस यात्रा में कभी-कभी हम ऐसे निर्णयों का सामना करना पड़ता है जहां दो रास्ते या विकल्प सामने आ जाते हैं और हम किसी भी परिणाम की भविष्यवाणी नहीं कर सकते ऐसे क्षणों में हम कैसे यह पहचान सकते हैं
कि कौन सा मार्ग ईश्वर इच्छा के अनुरूप है और कौन सा हमारे अपने व्यक्तित्व इच्छाओं या अहंकार से प्रेरित हो सकता है खासकर जब दोनों ही सत्य पर सही प्रतीत हो रहे हो कैसे कैसे हमें उ किसका प्रश्न कैसे आप हमें बताएं कि दोनों सत्य प्रतीत हो रहे हैं कैसे तब हम आपको बताए अपनी वासना है अपनी इच्छा है या भगवान की इच्छा है बताइए आप कौन सा कर्म आप ऐसा उदाहरण जैसे कि अगर हम अपने अपने कार्य में हमें डिसीजन लेना है कोई निर्णय लेना है बात पहले यहां समझनी है भगवान की इच्छा और
अपने कार्य ऐसा नहीं होता है भगवान की इच्छा का पालन करने के लिए पहले तन वांग मनो भी अमल सोहम त वासिता शरीर को मन को और वाणी को और आम को भगवान के चरणों में समर्पित करना होता है तो अपना तो कुछ बचा नहीं जब अपना कुछ अहम बचा नहीं तो उनकी इच्छा ही हमारे हृदय में इच्छा बन कर के स्फर होगी और जब तक अहम है तब तक स्वेच्छा है जब तक हमारा शरीर है हमारी वाणी है हमारा अंतःकरण है हमारा परिवार है तब तक य अहम का राज्य है ये अहम के राज्य
में स्वेच्छा उत्पन्न हुई है ना कि भगवत इच्छा भगवत इच्छा तो उस हृदय में उत्पन्न होती है जो इच्छा रहित होता है जो अहम रहित होता है तो अभी हमारी वासना एं ही है हमारी इच्छाएं ही है वो हम भगवान के चरणों में रखें हम भगवान के चरणों में मांगेंगे पर पूरी होना ना पूरी होना यह उनके ऊपर छोड़ दीजिए जिससे हमारा मंगल होगा वही वह कार्य करेंगे मंगल भवन है उनकी सामर्थ्य नहीं है क् हमारा मंगल कर सके जैसे सूर्य की सामर्थ्य नहीं व अंधेरा प्रकट कर सके क्योंकि जहां सूर्य वहां अंधेरा रह ही
नहीं सकता ऐसे मंगल भवन जहां श्री हरि है वहां मंगल हो ही नहीं सकता हो सकता है हमारी मांग के विपरीत दे दे लेकिन वह विपरीत ही हमें परम मंगल प्रदान करने वाली होगी और भगवान की इच्छा को वही जान सकता है जो अपनी इच्छाओं को मिटा दिया है या भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है जब तक अपनी इच्छाएं हैं तब तक अपनी वासनाओं के खेल खेलेंगे और उनका आरोप कर देंगे काल कर्म ईश्वर मिथ्या दोष लगाए काल के ऊपर कर्म के ऊपर ईश्वर के ऊपर हम दोषारोपण करते रहेंगे और इच्छा हमारी है
क्योंकि देहा अभिमानी जीव जब तक अभिमान और इच्छा को भगवान में समर्पित नहीं कर देता तब तक वो भगवत इच्छा को नहीं जानता क्योंकि भगवान की कोई इच्छा नहीं है भगवान पूर्ण काम है भगवान में इच्छा भक्त की पहुंचती है तो उनमें भूख पैदा कर देती है उनमें खेलने की इच्छा पैदा कर देती है जैसी भावना भक्त करता है वैसे ही भगवान चेष्टा करते हुए नजर आते हैं भगवान आमना है भगवान पूर्ण काम है भगवान इच्छा रहित है भगवान कोई व्यक्ति थोड़ी है कि उनको इच्छा होगी उनकी उपासना करने वाली इच्छा रहित हो जाते जाही
नन चाही कबहु कछु तुम सन सहज सने बसो निरंतर तासुर जिसने चाह मिटा दी भगवान से सहज प्रेम तो वहां भगवान विराजमान हो जाते हैं वहीं भगवान अर्जुन के जैसे घोड़े पकड़े बैठे हैं ऐसे हृदय में मन और इंद्रियों को पकड़ कर के जीव को परमात्मानंद प्रदान करते हैं अपना स्वरूप प्रदान करते हैं अभी हम लोग देहा भिमानी जीव हैं अभी हमारे अंदर ये बात आ गई नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेव समेत सुत नारी बिल्कुल एक चौपाई सहज में है नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी ये आ गई है अगर आ
जाएगी तो वह जो चीज अपनी चाहे ले ले आपको कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत अभी ऐसा नहीं है ना तो अभी कहीं ना कहीं मेरी इच्छा तो सब है ना तो हम भगवत इच्छा का निर्णय अभी नहीं कर सकते भगवत इच्छा की पहचान वही कर सकता है जो अपनी पहले इच्छाओं को मिटा दे समझ पा रहे हो अभी न केन प्रकार हमारी इच्छाओं का ही जाल बिछा हुआ है इसलिए नाम जप कीजिए और धीरे से समर्पण योग में आइए मैं परिवार सहित आपकी शरण में हूं प्रभु नाथ
सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी अब ये जिम्मेवारी आप देखो प्रभु मैं तो आपका केवल मुनिम हूं छोटा सा चार लोगों का मालिक आप हो इस घर के इस परिवार के मैं छोटा सा सेवक हूं जो आप देंगे आपकी सेवा करता रहूंगा आपके परिवार की सेवा करता रहूंगा जरूरत होगी तो मुनिम होने के कारण पचा आपको पकड़ा रहेंगे स्वामी आप है आप देखते रहिए आप बहुत आनंद में जीवन व्यतीत कर लेंगे अगर हमारी बात समझ पाएंगे और कर्ता बनते रहेंगे घर के मालिक बनते रहेंगे तो फिर परेशानी ही परेशानी और आप समझ नहीं
पाएंगे भगवान के विधान को और हो सकता है श्रद्धा भी डगमगा जाए क्योंकि खेल ऐसे हैं सर्जन पालन विनाश जैसे अभी आप रुदन कर रहे थे अब आपको लाख समझाओ लेकिन जो हृदय पर चोट लगी उसको कैसे कोई संभाल वो छाती जाने जिस मां का पुत्र गया हो वह मां जान सकती है हम लोग तो बाहर से ऐसे उपदेश दे सकते हैं अंदर का जब मोह नष्ट होगा तब इनको हमारी बात समझ में आएगी अभी हम कहते हैं सब भगवान का है अगर भगवान अपनी वस्तु ले ले तो अभी श्रद्धा खत्म हो जाएगी नहीं खत्म
इसका मतलब समर्पण नहीं था हम समर्पण योग की तरफ चले तो भगवान कहते योगक्षेमं वह भगवान का चिंतन करें और अपने आप को भगवान के हवाले कर दें तो जो अप्राप्य की प्राप्ति कराना और प्राप्ति की रक्षा करना वो सब कर लेंगे बहुत करुणामय भगवान है समझ पा रहे हैं आप