सुमति कुमति सबके उरर वेद पुराण निगम असक वेद भी कहते हैं पुराण भी कहते हैं निगम शास्त्र भी कहते हैं कि सबके अंदर शुभ अशुभ छुपा रहता है संत समागम हरि कथा से शुभ हिस्सा विकसित होता है तो अशुभ को पनपने का अवसर नहीं मिलता अगर संत समागम और हरि कथा हरि का नाम नहीं है तो अशुभ पनपता है शुभ को अवसर नहीं मिलता अशुभ को पनपना आसान है शुभ के पन पाने में पुरुषार्थ है जैसे बरसात पड़ती है तो फालतू घास कंठी के लिए वृक्ष अपने आप फल जाते लेकिन गुलाब के पौधे अपने आप
नहीं फलते उसकी कलम लगानी पड़ती है गुड़ाई करनी पड़ती है तब गुलाब के फूल खिलते हैं तो जो कीमती चीज है वह अपने आप नहीं पनब जाती है उसके लिए धरती को संस्कार करना पड़ता है भूमि को संस्कार किया जाता है फिर उसमें बीज बोया जाता है ऐसे ही हमारे अंतःकरण को सत्संग से संस्कार किया जाता है गुरु दीक्षा से साधना का बीज बोया जाता है और साधना और नियम के जल और खाद से उसे सींचा जाता है तो हमारे हृदय रूपी भूमि में भगवत प्राप्ति रूपी वृक्ष पनपता है फलता है फलता है और मोक्ष
के फल लगते हैं मोक्ष का मतलब क्या है कि सब बंधनों से सदा के लिए मुक्ति बंधन कोई चाहता नहीं है सब बंधनों से सदा के लिए मुक्ति जन्म का बंधन बुढ़ापे का बंधन व्याधि का बंधन मौत का बंधन इस बंधन से सभी बंधे घट यंत्र की नाही हम भटक रहे हैं बुद्ध कहा करते थे कि यह जो पहाड़ है वह तुम्हारी एक एक भिक्षुक तुम्हारे जन्मों के सारी हड्डियां खड्डी कट्ठी कर दे तो इस पहाड़ को मात कर देगी तुमने इतने जन्म पाए और हर जन्म में बीवी बच्चे पुत्र परिवार सजाया संजोया अंत में
शरीर को संभाला वह शरीर भी मर गया उस की हड्डिया अगर कट्ठी कर दी जाए हर जन्म की तो यह जो हिमालय पहाड़ दिखता है उसको भी लांग जाएगा तुम इतने युगों से जन्मते मरते आए हो हर जन्म में तुमने आंसू बहाए वे आंसू अगर कट्ठे कर दिए जाए तो यह सरोवर को मात कर देंगे इतने तुमने आंसू बहाए इसलिए अभी थोड़े सावधान हो जाओ सत्संग का आश्रय लो और हृदय रूपी भूमि में परमात्मा प्राप्ति रूपी बीज बोध दुनिया की कोई भी चीज प्राप्त किया तो वह टिकने वाली नहीं है लेकिन ईश्वर को एक बार
पाया तो मिटने वाला नहीं क्योंकि ईश्वर अमिट सकता है और संसार मिटने वाली चीज है जो मिटता है उसे माया कहते हैं जिसे जो अमिट है उसे परमात्मा कहते हैं जो परमात्मा है उसी का अंश अपना आत्मा है बचपन आपका मि लेकिन आप नहीं मिटे शैशव आपका मिट गया आप नहीं मिटे जी वानी कईयों की मिट गई आप नहीं मिटे बुढ़ापा मिट गया मौत आई फिर भी वह व्यक्ति मिटा नहीं स्वर्ग में है या तो नरक में है या तो किसी जन्म में है तो जो जन्म के बाद भी रहता है वह जीवात्मा अमिट है
तो इस अमिट जीवात्मा का अमिट परमात्मा से जब तक सहयोग नहीं होगा ज्ञान नहीं होगा तब तक बेचारा हर जन्म में सुखी और आनंदित सुखी और शांत होने के लिए सब प्रयत्न करता है लेकिन यह प्रयत्न सब कुसंग के हैं बाहर के हैं इसलिए बाजी हार जाता है चाहे हिटलर बन जाए चाहे सिकंदर बन जाए चाहे क्रूर कंस बन जाए चाहे रावण बन जाए चाहे कुछ बन जाए अंत में पश्चाताप आद लगता है शिष्य ने पूछा गुरुदेव कि करण इतना दानी था और दोस्ती निभाने में अव्वल नंबर था और पांडवों का छठा भाई था फिर
भी करण मारा गया और परास्त हुआ और अर्जुन जीता इसका क्या कारण गुरु जी ने कहा ऋ श वने के बेटा चिंतन की धारा विपरीत थी वो कौरवों को साथ दुर्योधन को साथ दे रहा था इसलिए उसकी चिंतन की धारा उसी प्रकार की थी और अर्जुन श्री कृष्ण का साथ ले रहा था सत्संग ले रहा था दुर्योधन के पास सैन्य बल था राज्य बल था था कपट बल था लेकिन जहां भगवत बल और अपना पौरुष होता है वहां विजय होती है यत्र योगेश्वर कृष्ण यत्र पार्थ धनुर्धर तत्र श्री विजय भूति ध्रुवा नि तिति मे मती
तो कबीर जी के ये वचन सभी के जीवन में सार्थक हो जाए कबीरा मांगे मांगना प्रभु दीजो मोहे दो मुझे दो चीज देना संत समागम हरि कथा मो और मेरे हृदय में निशदिन हो [संगीत] गए हरि का ज्ञान नहीं होगा तो जगत के ज्ञान से बड़ा हुआ दिल दिमाग उलझ जाएगा तो जगत का ज्ञान जैसे कानों के द्वारा दिल दिमाग में घुसता है ऐसे भगवत तत्व का ज्ञान घुस तो वो जगत के ज्ञान के प्रभाव को हटाकर अपना सत्य का प्रभाव जगाए कुमती को हटाकर सुमति को गा कुसंग को हटाकर सुसंग [संगीत] को धन्ना जाट
सत्संग मिल गया भगवान के दर्शन करने तक की योग्यता खेली शबरी भीलन शदी के फेरे फिर रहे थे और पंडित ने कहा सावधान शबरी ने देखा कि संसार में फस जाएंगे छेड़े खोल के चल दिया मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी को सत्संग मिला शबरी के खानदान में कोई कल्पना नहीं कर सकता कि एक भीलन इतनी प्रसिद्ध होगी कि बड़े-बड़े संत भी उसकी गाथा गाएंगे और राम उसके झूठे बैर खाएंगे तो शबरी में जो सत्संग का अंश छुपा था मतंग ऋषि के संपर्क से साधना से शबरी के हृदय की भूमि खेड़ी गई और भगवत प्राप्ति
का बीज डाला गया और शबरी ने उसे सींचा सीधा गणित उसी पुस्त ऋषि के कुल में पैदा हुए रावण और कुंभकरण और विभीषण कुंभकरण का अपना चिंतन की धारा है रावण के चिंतन की धारा अपनी है लेकिन विभीषण की धारा ऊंची थी तो ईश्वर प्राप्ति में सफल हो ग विषण तो आपके माता पिता ऊंचे होते हुए भी आपके चिंतन की धारा हल्की है तो परिणाम हल्का आए इसीलिए माता पिता अच्छे हैं अच्छा है कुटुंब अच्छा है तो अच्छा है कुटुंब छोटा है तो भी कोई फिक्र नहीं आपके चिंतन की धारा अच्छी हो जाए संग अच्छा
हो जाए आजकल के जो बच्चे [संगीत] हैं नया जनरेशन च न की धारा बहुत छोटी हो गई आपके बाप दादा में जो सहन शक्ति और कार्य कुशलता और मजबूती थी वह अपने में नहीं और जो अपने में है वह अपने बेटे बेटियों में नहीं पाई जाती चिंतन की धारा बहुत छोटी हो गई बच्चे बच्चियों [संगीत] की अभी जो पुराने लोग है 80 साल के 90 साल के देखे जाते हैं लेकिन आने वाला जनरेशन 80 साल का जीवन जिएगा कि नहीं इस प्रश्न है बड़ा तन की धारा ऊंची हो तो एक होता है सामाजिक चिंतन भा
सद व्यवहार करें सब ईश्वर का रूप है अपने आत्मा रूप है सबसे प्रेम से करें ठीक है दूसरा है दैविक चिंतन और तीसरा है तात्विक चिंतन तो तात्विक चिंतन करते करते तत्व स्वरूप में टिक गए तो पार हो गए अर् तात्विक चिंतन निश्चिंता ले आता है एक है प्रकृति और दूसरा है पुरुष एक है माया और दूसरा है अधिष्ठान राम ब्रह्म परमार्थ रूपा श्री रामचंद्र जी कैसे हैं कि ब्रह्म स्वरूप राम नाम जिम जपही जाग जोगी प्रपंच रंच रंच वियोगी ब्रह्म सुख अनुभव अनूपा अथन अनामय नाम नरूपा जो ब्रह्म सुख है उस ब्रह्म सुख की
प्राप्ति जब तक नहीं हुई तब तक कितना भी धन कमा ले मजूरी हाथ लगेगी संभालने की कितनी भी सत्ता कमा ले पा ले लेकिन मिथ्या शरीर का नाम नाम का नाम होगा हमें क्या मिल जाएगा मेरा बड़ा नाम है मेरे बड़े आश्रम है मेरी बड़ी गदिया है मेरे बड़ी फैक्ट्रियां है मेरी बड़ी पोस्ट है मैं बड़ा प्रधानमंत्री हूं लेकिन भैया यह शरीर का नाम थोपा हुआ है माया के ऊपर नाम का नाम हुआ आपको कुछ नहीं मिला धोखे के सिवाय आजकल तो उसी में लोग लगे मैं कुछ दुनिया में नाम कर जाऊ नाम कर जाऊ
लेकिन मैं क्या हूं उसको तो खोज लाला आपको क्या क्या अनुभव होते इसका कोई महत्व तात्विक जगत में मेरे को कृष्ण के दर्शन हुए मेरे को स्वपने में ऐसा दिखा गुरुजी ऐसे दिखे ऐसे शेष नाग दिखे इसका कोई तात्विक जगत में ज्यादा मूल्य नहीं अनुभव क्या क्या हुए उसका मूल्य नहीं लेकिन अनुभव किसको हुआ उसको खोजा आपने तो वाह वाह धन्य हो आप अनुभव जिसको होते वह मैं कौन हू ऐसे ही उपासना का फल क्या है कि किसी देवी देवता को प्रकट करना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है दुश चरित्र से चित्त उपरा हो जाए यह उपासना
का फल है विक्षेप से विक्षेप के समय भी चित्त में समता शांति बनी रहे य उपासना का फल है तो कुछ भी करके हमारे चित रूपी भूमि में सत्संग के बीज जाए सं कादी ऋषि चार थे जन्म जात सिद्ध पुरुष थे उसमें से तीन श्रोता बनते थे और एक वक्ता ब्रह्म चर्ता करते तात्विक चर्चा करते श्रोता बनते तो नीचे बैठते तो नीचे बैठने में अपने में हीन बुद्धि नहीं होती है सत्संग और ऊंचा बैठकर जो सत्संग करते उनमें अहम बुद्धि नहीं होती यह सत्संग की विशेषता है जो ऊंचे बैठे हैं मैं विशेष हूं और जो
नीचे बैठे हैं हम हीन है ऐसी भ्रांति नहीं होती भगवत चर्चा का ये एक महत्त्वपूर्ण प्रसाद है तो यह सत्संग से मिलता है और सत्य एक परमात्मा है सत्य अपरिवर्तनीय मिथ्या है दुख सुख मिथ्या है मान अपमान मिथ्या है जन्म मरण मिथ्या है लेकिन मेरा आत्मा सत्य स्वरूप है जहां से मैं उठती है वह चैतन्य सत्य स्वरूप है फिर मैं फलाना हूं यह माया है सुनकर मैं मनुष्य हूं मैं गुजराती हूं मैं फौजी हूं मैं खोजी हूं मैं प्रधानमंत्री हूं यह सब माया का रूप है तो मैं कौन हूं उसको खोज लिया बाह वा उसने
सारे काम कर लिए और उत्तम तरीका है उत्तम साधक के लिए तात्विक साधक के लिए के आकाश पर दृष्टि को स्थिर करे एकांत में इससे मानसिक शांति और आंतरिक बल आकाश जैसे सबको ठोर दे रहा है ऐसे परब्रह्म परमात्मा चदा काश सबको ठोर दे रहा है तो जिनकी उत्तम स्थिति होती आकाश की तरफ एक टक देखे देखे देखे अथवा स्वासो शवास को शांति का अनुभव करते तो जितनी शांति अंतरात्मा में लेंगे उतना ही चित्त में संकल्प सामर्थ्य फलता है जितना ववा पीडो भवती सिद्ध जितना कष्ट साते धर्म पर अडिग रहते उतना संकल्प बल बढ़ता है
जितना सत्संग में चित रहता है उतना सहज समाधि का सुख प्राप्त होता है बिन सत्संग विवेक न हो गई हजार वर्ष की समाधि कर ले उससे भी दो क्षण सत्संग तात्विक ऊंचा है तुलसीदास जी ने कहा तन सुकाय पिंजर कियो धरे रैन दिन ध्यान तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान तो सत्संग हमें प्रेरणा करता है क्या आप विचारों के दुख किसको होता है दुख आए तो दुख में बहिए मत मान आए तो मान में भूलिए मत अपमान आए तो अपमान में दब मत यह किसको होता है तो तात्विक चिंतन है यह तात्विक चिंतन आपको
बहुत ऊंचा बना देगा दूसरा है कि सुबह नींद में से उठे तो जहां भूमध्य के बीच में तिलक करते हैं वहां थोड़ा स्पर्श कर दे मथा टेक के पड़े रहे थोड़ी देर तो जो जीवनी शक्ति है ओरा ऊर्जा व शिव नेत्र में आएगी हां से विचार की सुंदरता जिसे अभी विज्ञान ने कहा पिनिल ग्रंथि का विकास होता है विज्ञानी भी लगे भारतीय योगियों के खोज अनुभवों की महता को जानने को यह पिनल ग्रंथि में पावर है ऐसा विज्ञानी बोलते हैं विज्ञानियों ने दूसरा भी एक बढ़िया काम किया कि वोह बोलते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी
में दो मस्ति है एक सूर्य नाड़ी से संचालित ता तो दूसरा चंद्र नाड़ी से और दोनों मस्तिष्क में दोनों मगज के बीच शरीर में लगभग 10 अरब जितने मतलब हजार करोड़ जितने न्यूरॉन्स है अभी विज्ञानी बोलते हैं कि हमारी खोपड़ी में 10 अरब मलब हजार करोड़ जितने न्यूरॉन हैं विज्ञानियों की भाषा लेकिन अपना योग दर्शन कहता है कि 10 से भी ज्यादा 11 12 अरब तक भी यह सूक्ष्म कोष है वह एक एकक कोष मतलब एक एक न्यूरॉन्स आपके ग्रह नक्षत्र का मॉडल है प्रतिनिधित्व कर सकता है आप अगर साधना करके क् न्यूरॉन्स को विकसित
करते हैं तो आपके संकल्प के अनुसार ग्रह नक्षत्र चांद सितारे में उथल पाथल हो सकती है और वृक्षों में फलों में फूलों में वस्तुओ में उथल पाथल हो सकती है ऐसे एक मेरे मित्र संत है जो य मेरे को दिखाते लोगों को भी दिखाते देखो ये अंगूठियां एक सरदार था तो लोहे का कड़ा पहनते मुले मेरे को बताया देखो इसको सोने का बना देते अपन तो यूं करके हाथ घुमा के सोने का बना दिया चांदी की अंगूठी ली किसी की उसकी सोने की बना दी तो यह यह न्यूरॉन विक्षित होते हैं तो पदार्थों में परिवर्तन
हो जाता है राम कृष्ण को किसी ने पूछा कि प्रभु आप कहते हैं कि सब में एक परमात्मा है एक सत्ता है यह एक सत्ता ही हम कैसे जाने कैसे माने हमको तो विश्वास नहीं होता कि सब में एक सत्ता है राम कृष्ण ने कहा भाई है बोले महाराज आप कोई कृपा करिए हमें कोई प्रमाण मिलेगा कोई व्यक्ति वहां से गाय ले जा रहा था और उसने गाय को पीटा तो राम कृष्ण ने उस गाय के पीटने के निशान अपनी कमर पर अपने पीठ पर दिखाया कि बोले देखो वो एक कत्व है किसी ने कहा
कि जब संत के संकल्प में इतना बल है जैसे ईश्वर सृष्टि करता है तो संत भी ईश्वर के साथ जुड़कर सृष्टि में कुछ भी कर सकते होंगे बोले होता है व तो योग का सामर्थ्य होता है तो क्या महाराज यह सफेद फूल गुलाबी हो सकते हैं बोले भाई ईश्वर की सृष्टि में असंभव क्या है तो जो फूल सफेद जो पौधा सफेद फूलों का था सुबह वो आया तो उसने देखा कि इस पौधे को कुछ सफेद फूल लगे और कुछ गुलाबी हुए बोले ये क्या है ठाकुर जी बोले तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है तो मेरा कहने
का तात्पर्य नहीं कि आप सफेद फूलों के पौधे को गुलाबी कर दीजिए अथवा आप लोहे के कड़े को सोने का कर दीजिए एक कोई बड़ी ऊंची बात नहीं है आखरी बात नहीं ऊंची बात तो यह है कि आप अपने से अभिन्न जो परब्रह्म परमात्मा है आप जो चाहते हैं वो पा लीजिए ऊंची बात ये है तो बाबा जी हम तो चाहते हैं बेटे की शादी गलत बात है हम प्रमोशन चाहते हैं गलत बात है आप यह नहीं चाहते प्रमोशन से शादी से त्याग से वैराग से राग से आप दो ही चीज चाहते हैं एक तो
चाहते आनंद और दूसरा चाहते शांति अर्थात रस और शांति चाहते हम यह नहीं कहते कि भगवान को पालो मनुष्य की मांग का नाम है परमा मनुष्य की मांग है शांति और आनंद वह शांति और आनंद ज है वही परमात्मा है परमानंद है इसलिए थोड़ा थोड़ा आनंद के लिए भटक भटक के माया में हमारी जिंदगिया बीत गई नानक ने कहा पूरा प्रभु आराध पूरा जा का नाम नानक पूरा पाइए पूरे के गुणगान तो कबीर जी कहते हैं कबीरा मांगे मांगना प्रभु दीजे मोहे दो संत समागम संत मतलब जिसके जन्म मरण का अंत करने वाली मति जागृत
हो गई जिसकी वासनाओं का अंता ममता का अंत हो गया जिसको अंतक और शरीर से मैं मानने का अंत हो गया वह संत समागम हरि कथा संत का समागम और हरि की कथा यह दो चीज प्रभु मुझे दीजिए तो आदमी भले इतनी ऊंचाई त्याग की इतनी ईश्वर प्राप्ति की ललक ना हो फिर भी कम से कम भगवन नाम जपे और भगवत प्रीति के लिए जपे तो भगवन नाम से जो रस आएगा वह बुद्धि को शुद्ध करता जाएगा नाम जपत मंगल दि सदस नाम प्रसाद शंभु अविनाशी तो नाम जपने की भी रीत शुरू शुरू में वखरी
से जपे फिर धीरे-धीरे मध्यमा से जप फिर पति से फिर परा से नाम के अर्थ में विश्रांति तो भगवत रसा आने लगेगा भगवत सामर्थ्य जगेगा और भगवत प्रसाद की प्राप्ति होगी गीता ने कहा प्रसादे सर्व दुखा नाम हानि रस पजत प्रसन्न चेत सयास बुद्धि परतित फिर वो बुद्धि उसमें बैठेगी परब्रह्मा पर फिर आपकी बुद्धि बुद्धि नहीं रहेगी रितम भरा प्रज्ञा हो जाएगी रित माना वो सत्य सत्य से भरी हुई मति हो जाएगी जैसे लोहे की पुतली जंग लग गई नाली में आपने उठाकर साफ करके अलमारी में रख दी लेकिन वहां भी समय पाकर जंग लगने
का भय है उसी लोहे की पुतली को आपने पारस से स्पर्श करा दिया अब आप गटर में भी डाल दे तो सोने को जंग नहीं लगेगी ऐसे ही मति को कितना भी आप स्वच्छ करो कितना भी शुद्ध करो फिर भी उसको अशुद्धि की जंग लगेगी एक बार अपने परब्रह्म परमात्मा तत्व के साथ उसका जरा सा साक्षात्कार करा दो मिलन करा दो फिर आपकी मति संसार व्यवहार करें कोई फर्क नहीं पड़ता राजा जनक राज्य करते थे कबीर जी ताना बुनते और जीवन भर करते रहे रहत माया में फिरत उ दसी कत कबीरा में उसका दासी य
सत्संग की बलिहारी है उपनिषदों का ज्ञान अति उत्तम साधक के लिए तो उपनिषदों का ज्ञान हंसते खेलते उसे परमात्मा प्राप्ति करा दे आम आदमी के लिए तो जरा संयम नियम त्याग कठिन है लेकिन जिनके जीवन में त्याग है व उपनिषद के ज्ञान से छलांग मार के ज्ञात ज्ञ हो सकते हैं जिसको जानना चाहिए जान लेते जिसको पाना चाहिए पाले यत पदम प्रेप सबु दीना शक्रादय सर्व देवता अहो तत्र स्थि तो योगी हर्ष नप गच्छति जिस पद को पाए बिना इंद्रा आदि देव अपने को कंगाल मानते उस आत्म पद को पाकर वह महाप अहंकार नहीं करता
यह भी आश्चर्य है ऐसा शास्त्रों में आता तो जड़ भरत जा रहे हैं रहु गण को कहते हैं रहु गण कहता है हे बाबा मेरी पालखी उठा पालखी उठा ली सिंध सौप देश का मैं राजा हूं ठीक से चल तो तीन का चार का हर्थ एक बीमार पड़ गया दस्त हो ग तो जड़ भरत महापुरुष ऐसे फक्कड़ थे कोपन धारित शरीर टकट जंगल में वि चरते थे मोन रहते थे मौन से शक्ति का संचय होता है लेकिन सत्संग मिले तो मौन से भी ऊंची बात है मौन भी चार प्रकार का होता है वशिष्ठ जीने इसका
सुंदर वर्णन किया है जो सदा मौन स्वरूप है आत्म ज्ञान में पहुंच गए तो फिर सदा मौन है बोलते हुए भी आप मौन से ही जुड़े हैं नहीं तो वाणी काष्ट मोना मुख मोनी आदि होता है तो कहार की जगह पर जड़ भरत लगे जड़ भरत कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे जिनके नाम से तुम्हारे सिंध से जिसके नाम से अजनाभ खंड ये अपना देश का नाम था अजनाभ खंड और ऋषभ देव के पुत्र भरत ने जब संभाला और ऐसी सुंदर व्यवस्था की कि गायों के लिए चारा पानी और रहन सहन पक्षियों के लिए दाना पानी
पड़े ऐसी व्यवस्था और सके और लोक धर्म युक्त जी ऐसी सुंदर ऐसी सुंदर व्यवस्था की तो अजनाभ खंड का नाम भारतवर्ष पड़ा भरत के नाम से उस भरत ने देखा कि यहां तो लोगों के लिए शरीर के लिए व्यवस्था हो गई लेकिन शरीर तो इनका भी मरेगा मेरा भी मरेगा अंत में क्या मिला इतने बुद्धिमान भरत राज पाठ को त्याग करके एकांत में गंडकी नदी के किनारे चले गए कुटिया बना के रहते त्रिकाल संध्या करते सूर्य को अर्ग देते समय दोपहर को गर्भिणी हिरणी पानी पीने आई तो शेर ने ड़ लिया शिकार के लिए तो
गर्भिणी हिरणी घबराहट के कारण गंडकी नदी के उस छोर छलांग मारी तो भयभीत हिरणी गर्भिणी थी तो उसका बच्चा पानी में गिर गया और वो उस किनारे जा गिरी अपने ने लोत को घसीटते हुई किसी गुफा में जाकर दम तोड़ा उसने राजा भरत को अब महात्मा भरत कहेंगे अपन महात्मा भरत जी को दया आ गई कि इसका बचारी का कोई नहीं तो उस बच्चे को अपने आश्रम में लाए उसको चारा वारा खिलाते दूध बूत पिलाते हिरणी का बच्चा वैसे ही हिरना हिरण प्यारा लगता है वो बच्चा उनके कभी पीठ टता कभी खुजलाता अरे तू बैठ
गायत्री कर तू बैठ ध्यान करब मनुष्य का बच्चा भी ध्यान में नहीं बैठता तो हिरण का बच्चा कहां बैठेगा धीरे-धीरे उनसे ममता हो गई कुछ बड़ा उछला कूदा और कहीं जंगल में चला गया और इनके प्रारब्ध का वहां शरीर छूटने का अवसर तो हिरणी का चिंतन करते करते शरीर छूटा के उसको बगड़ा तो नहीं खा गया उसका तो कोई नहीं था माई बाप भी मैं ही था उसका मित्र भी में था अरे बेचारे हिर का उस हिरण का बच्चे का क्या होगा तो भरत जी भूल गए कि जो अनंत काल से सबका साथी है वह
अभी भी हिरण का है आपका है हमारा है लेकिन उसका थोड़ा चिंतन हो गया तो दूसरे जन्म में हिरण बन गए हिरण तो बन गए कहां तो अजना खंड के सम्राट और कहां चिंतन सत्संग के बदले हिरण संग का चिंतन हो गया आत्म चिंतन सोहम स्वरूप के चिंतन के बदले वो हिरण का चिंतन हो गया तो दूसरा शरीर हिरण का मिला लेकिन की हुई साधना व्यर्थ नहीं जाती हिरण के शरीर में भी उनको एकादशी की स्मृति हो जाती कि आज 11 से तो पत्ता तक नहीं खाते थे डीसा से भी आगे एक संग चला रामदेवरा
जाने को जोधपुर से आगे रामदेवरा तो आप जानते हैं रामापीर की समाधि कुत्ता भी उनके साथ हो चला कुत्ते को व दे तो कुछ ना खाए और 810 किलोमीटर का रन पैदल की यात्रा जो संघ चला था जब वहां पहुंचे तो कुत्ते की हालत अब मरू अब मरू ई तो संघ का जो आगे वान था वह जाकर राम देवरा के जो ट्रस्टी टी उनको कहा कि भाई साहब हम तो भले रात हो गई है कल दर्शन करेंगे लेकिन एक भगत राज है अगर उसने अभी दर्शन नहीं किया तो वो भगत राज रात को दम तोड़
देगा पाप लगेगा तो उन्होंने दरवाजा खोला चलो भाई कर लो राम पीर भगत राज कहां है तो ले आए भगत राज बोले यह भगत राज कुत्ता बोले भाई साहब इसने हमारे साथ एक दिन भी अन्न नहीं लिया है और वो रामदेव राज जी का दर्शन करके फिर बड़ा प्यार से करके बाद में कुछ उस दिखाया तो मानना पड़ेगा कि जैसे अ भी इस युग में हम देख रहे हैं तो भागवत की बात में तो संदेह करना अपराध है तो वो भरत हिरण बन गए हिरण के शरीर में एकादशी का व्रत करते थे तीन साल उस
शरीर में जिए बाद में उनका हिरण का शरीर अंत हुआ किसी ब्राह्मण के घर उनका जन्म हुआ और ब्राह्मण ने उनका नाम भरतरी रख दिया अब उनको अगले जन्म की स्मृति थी कि मैंने दोस्ती की और चित्त लगाया हिरण में तो हिरण का शरीर में भटकना पड़ा तो अब चित्त तो अपने अत आत्मा में सोहम स्वरूप में ही लगाएंगे तो वो जड़ जैसा व्यवहार करते स्कूल में कोई पढ़ा है तो बोले पढ़ना क्या है जिससे सारा पढ़ा जाता है उसी को तो पढ़ना है