जादू जिन्नात क्या है? असेब क्या है? नज़रे बद क्या है? जादू और जिन्नात के जो मरीज हैं वो 10% से ज्यादा नहीं होंगे। सूरज जब ज़बाल के टाइम पे हो तो नीचे पानी का एक गिलास रखें और आपको सूरज नीचे पानी में नजर आए उस सूरज की तरफ देख के पढ़ना है। 50% लोग जिन्हें मर्ज कोई नहीं। वो अपनी बदमालियों की वजह से जकड़े हुए हैं। शेख ये फरमाइए कि जो 10% तो आप फरमाया कि जादू के भी हो सकते हैं ये नज़रे बदस आपने फरमाया कि वो अपनी बदमालियों बाकी जो 40 फीस कुछ तो
ड्रामा ज्यादा है और जो हकीकत है वो कम है। कोई उंगली को पकड़ के दबाते हैं, कोई अंगूठे को पकड़ के दबाते हैं। बाज जो आमिल है ना वो मरीजों को मरीज बनाने के लिए जाते हैं। आगे एक बंदा सोच में वो परेशान है। उसको जाके बंदा कह दे कि तेरी फैमिली के साथ000 जिन है। हदीस है ना कि जो बंदा घर आता है और घर आते दरवाजे पे सलाम नहीं करता और बगैर बिस्मिल्लाह दुआ पढ़े वो घर के अंदर घुस जाता है। तो शैतान जो उसके साथ होता है ना वो उसे पीछे वाले शैतानों
को बुलाता है। कहता है आ जाओ भाई। आज हमारा खाना भी इधर है और रात हमारा यहां पर कयाम भी इधर ही है। जादू का असर उस वक्त तक नहीं होता जब तक बंदा उस जादू की वजह से परेशान नहीं होता। [संगीत] बिस्मिल्लाह रहमान रहीम। अस्सलाम वालेकुम नाजरीन। नाजरीन आज हम जो पडकास्ट करने जा रहे हैं ये बहुत दिलचस्पी भी होगा और बहुत मालूमाती भी होगा। हमारे पास आज जो मेहमान शख्सियत हैं वो मारूफ है जादू जिन्हात के हवाले से और नज़रे बद के हवाले से। असेब का इलाज करने के हवाले से। तो आज हमने
स्टूडियो में दावत दी है एक ऐसी शख्सियत को जो हमें यह बताएंगी कि यह जादू जिनात क्या है? असेब क्या है? नज़रे बद क्या है? और इसके साथ और जो नफसियाती मसाइल है हमारी जो अपनी घरेलू जो इशज़ होते हैं उसके अलावा हमारी जो जिस्मानी बीमारियां हैं कोई वहम हो गया हमें इसके दरमियान हम फर्क कैसे करें और हम किस तरीके से जो है वो अपने मॉलज का इंतखाब करें कि हमने ये जो हमें तकलीफ है जो हमें मज़ है यह वाकई जादू जिनात की वजह से है। कोई असेब है, कोई नज़रेज़ बद है या
यह कोई जिस्मानी बीमारी है। हमें किसी डॉक्टर के पास जाना चाहिए। हमें उसका इलाज करवाना चाहिए। तो इस हवाले से हमारी शख्सियत जो है जिनको हमने आज मधू किया है। हाफ़िज़ अब्दुल हमीद सलफी साहब हमारे साथ मौजूद है स्टूडियो में। उनसे मुलाकात करते हैं। जानते हैं इस हवाले से। अस्सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह बरकात। वालेकुम अस्सलाम रहमतुल्लाह बरकात। साहब आपका बहुत शुक्रिया। आप इस्लामाबाद से तशरीफ़ लाए। आपने वक्त निकाला और हमारे नाजरीन से आप ये मालूमात सारी जो है वो हम शेयर करेंगे इंशा्लाह ताला सबसे पहले तो अपना तारफ करवाइए कि आपने जब आगाज किया जिंदगी का
तो तालीमी सफर आपका कैसे शुरू हुआ पिंडी के करीब एक जगह है कोलिया हमीद के नाम से चकरी के नाम से मशहूर है वो हमारा अबाई गांव है वहां पे ही मैंने परवरिश पाई और फर्स्ट जनवरी 1973 7 में मेरी तारीख पैदाइश है। इब्तदाई तालीम स्कूल की वहां गांव के एक छोटे से स्कूल में ही शुरू की। लेकिन अल्लाह को शायद इसी तरह मंजूर था के हमारे एक जानने वाले मौलाना अनायतुल्लाह। वो हमारे वालिद साहब के बहुत अच्छे करीबी दोस्त थे। तो उन्होंने वालिद साहब को फोकस किया कि आप इन बच्चों को दीन के लिए
छोड़ें। तो उनके कहने पर पहले बड़े भाई को जो कि हाफिज अब्दुल हफीज हैं और फिर उसके बाद मेरे छोटे भाई को वो आजकल टीचर हैं अब्दुल रऊफ के नाम से और फिर मुझे भी पिंडी में एक मदरसा है जिसका नाम था जामिया मदरसा तालीम उल कुरान के नाम से चेक बाजार सदर में तो वहां हिफज के लिए छोड़ा गया मौलाना मुजफ्फर अब्दुल्लाह मुजफ्फर रहम्लाह वहां पर थे और हमारे वहां पर उस्ताद कारी अमीर साहब थे। तो शुरू में जो स्कूल की छुट्टियां होती हैं उन छुट्टियों में ले जाया गया कि अगर इनका दिल लग
गया वहां पे तो ठीक है नहीं तो छुट्टियों में वापस आ जाएंगे। तो अल्हम्दुलिल्लाह जब वहां पे गए तो वो मौलाना अब्दुल्ला मुजफ्फरगढ़ रहमतुल्लाह अल बहुत शफीक तबीयत के मालिक थे। तो उन्होंने मेरे वालिद साहब को कहा कि भाई यह बच्चे हमने आपको वापस नहीं देने। अच्छा। ठीक है। तो आप इन्हें बस अब वापस नहीं लेके जाएंगे। यहां पे ही पढ़ेंगे। तो अल्हम्दुलिल्लाह वहां पे बड़े भाई ने भी हिफज़ किया। फिर मैं भी उसी हिफज़ के मैदान में। लेकिन कुछ टाइम के बाद मेरा एक्सीडेंट हुआ और बहुत बड़ा एक्सीडेंट था के ट्रक मेरे ऊपर से
गुजरा बाजू से और फिर एक यानी वो मौत की कशमकश से अल्लाह ने मुझे दोबारा जिंदगी दी तो ये सन 84 की बात है जब मेरा एक्सीडेंट हुआ तो जब एक्सीडेंट हुआ तो वो सारी चीजें मुझे जो हिफज़ किया हुआ था वो भूल गया ना दोबारा से सारा कुछ भूल गया था यहां तक कि नमाज भी भूल गई थी तो अल्हम्दुलिल्लाह दोबारा नए सिरे से पढ़ना शुरू किया। फिर वहां से हिफज़ के बाद अल्लाह ने अगली मंजिलों को आसान किया। बड़े भाई भी छोटे भाई भी क्योंकि जामेल असरिया जेलम जो है मौलाना अब्दुल गफूर साहब
रहम्लाह अल्लामा मदनी हाफिज अब्दुल हमीद आमिर साहब जो वहां मदरसे के अमीर और रईस हैं। मोहतमिम हैं। तो वहां पे चले गए। तो बड़े भाई की फरागत भी वहीं से हुई है। छोटे की भी वही से हुई है। और मैंने अपनी जिंदगी के पांच साल दरसे निजामी के लिए वहां पे गुजारे हैं। और फिर 5 साल के बाद अह मैं यहां पे अह जामिया इस्लामिया गुजरावाला मौलाना अबुल बरकात रहम्लाह ताला उनके मदरसे आया और यहां पे हमारे जो शेख थे मौलाना मोहम्मद आजम साहब और मौलाना फारूक अहमद राशिदी हाफिज्लाह ताला हयात हैं। अल्लाह उनकी उम्र
में बरकत दे, सेहत वाली जिंदगी दे। तो यहां पे फिर दरसे निजामी मुकम्मल किया। वफाकल मदारिस किया अल्हम्दुलिल्लाह। और इसी दौरान जो हमारे शेख फारूक अहमद राशिदी साहब थे जी जिनसे हमने ये आलमिया की काफी सारी किताबें पढ़ी जिनमें बुखारी मुस्लिम भी है और दीगर कुछ किताबें भी। तो वो क्योंकि यह काम करते थे ना छोटे लेवल पे कह लें यानी अमलियात वगैरह अमलियात में कोई मरीज मदरसे में आते किसी को बेहोश उठा के लाते कोई तो शाख उसे दम करते तो वो ठीक हो जाता या किसी को दौरा पड़ा हुआ है तो उस पे
इलाज करते तो वो यानी इतना ही दम था उनका ना यानी मुख्तसर लेकिन वो मारूफ थे अपने इस फील्ड में इलाके में कि वो इलाज करते थे और अल्हम्दुलिल्लाह अभी भी वो अपनी सेहत के हिसाब से वो करते हैं। लेकिन काफी सारे मरीज मेरे पास भेजते हैं। तो उन्हीं दिनों में जब मैं आया वहां पे तो यहां पे शेखूपुरा मोड़ पे एक डिवीजनल लेवल पे तकरी मुकाबला हुआ सीरत के किसी मौजू पे तो जामिया की तरफ से मेरा नाम दिया गया कि आप उर्दू में तकरीर वहां पे करें। हिस्सा लें क्योंकि आप उधर से आए
हैं जेलम से तो यहां पर उर्दू खतीब इतने कोई नहीं है। तो जब वो तकरी मुकाबला के लिए मैं गया तो क्योंकि मेरी उम्र अभी इतनी नहीं थी तो वहां तो बड़े-बड़े जो है ना वो कद आवर और बड़े-बड़े उलमा मदारिस के बड़ी-बड़ी कद काठ वाले लड़के आए हुए थे। लेकिन मेरा क्योंकि तजुर्बा था तकरी मुकाबला में तो जामिया उलम असलिया में बाकायदा हर महीने वो तकरी मुकाबला होता था तो मुझे यह पता था कि जब तकरी मुकाबला में अगर 3 मिनट दिए जाते हैं तो 3 मिनट से पहले पहले अपनी गुफ्तगू को खत्म करना
होता है। तो वो 3 मिनट का वो तकरी मुकाबला था तो मैंने 2 मिनट की तैयारी की। तो जो तीन मिनट से बढ़ जाता था उसके नंबर काट दिए जाते थे और उसे पकड़ कर ना इज्जत के साथ मैग से उतार के दिया जाता था कि बस जी आप जाए तो मैंने दो मिनट में अपनी गुफ्तगू को खत्म कर दिया यानी वो दो बेल होती थी पहली बेल से पहले ही मैंने खत्म कर दिया तो अल्लाह ने मुझे वहां पे वो पोजीशन दिलवाई जामिया का नाम रोशन हुआ तो इस खुशी में जामिया के जो शय
थे वो मेरे साथ बड़ा लगाव उनका प्यार था हम तो वो शेख जो थे ना वो मुझे गाना वो चीजें सिखाते सिखाना शुरू हो गए इसी वजह से तो लेकिन मैं उस पर तवज्जो नहीं देता था। जाहिर है वो बच्चे जब मदरसे से छुट्टी के टाइम पे खेलने जाते तो शेख मुझे बुला लेते कहते हैं बेटा इधर आओ। तो वो मुझे कुछ पास बिठा के कुछ सिखाते। लेकिन वक्त गुजर गया वहां पे जो दरसे निजामी थी आखिरी साल मुकम्मल किया वफाक मदारिस के लिए फारग हो गए तो मैं चला गया अपने गांव में वापस उन्हीं
दिनों में अल्लाह ने कोई एक ऐसा केस भेजा कि कोई खातून आई और उसकी बेटी की नजर का कोई मसला था तो उन्होंने कहा जी को आप कोई बच्ची को दमशम करें मेरी जो बच्ची है ना इसको डॉक्टरों ने कहा है कि इसकी नजर नहीं आ सकती। तो वो बच्ची छोटी सी थी अभी तो आप अभी पढ़ के आए हैं आप कोई दीन के बारे में तो आप कोई दम करेंगे तो शायद अल्लाह ताला कोई शिफा दे दे। तो मैंने उस बच्ची को दम किया तो उसकी नजर ठीक हो गई। माशा्लाह ये वो वाकया है
जो मुझे इस तरफ दोबारा लाया है। यानी उससे पहले मेरा कोई इरादा यानी उस्तादों की ख्वाहिश के बावजूद आपने कभी तवज्जो नहीं की। ख्वाहिश नहीं थी। फिर मैं दोबारा शेख के पास आया। महीने में एक दो दिन आना शेख से किताब लेके पूछना और फिर उनकी चीजें नोट करना उस मौजू पे मैंने बुक खरीदी ठीक है जादू जिन्नात के मौजू पे काफी सारी किताबें उन्हें अपने मुताले में लाया फिर वो चीजें शेख से डिस्कस करता रहा फिर मैं अमली जिंदगी में उसे अपने गांव में अप्लाई करता शुरू कर दिया अल्हम्दुलिल्लाह और इसी दौरान मेरा एक
जगह अपार्टमेंट हो गई अरबी टीचर के लिए उस टाइम नौवा से खेल था शायद तो तकरीबन तीन महीने चार महीने मैं वहां पे सुबह जाता स्कूल में जो सरकारी जॉब थी और फिर शाम को वापस आ जाता स्कूल के बाद तो इरादा बना कि हमने दीन पढ़ा है तो हम क्योंकि जो दीन का इल्म हासिल किया हमने उसे आगे पहुंचाना भी तो क्यों ना यहां अपने इलाके में एक मस्जिद बनाई जाए। तो गांव में इरादा किया मस्जिद बनाने का। तो फिर अल्लाह ने उसके लिए जराय पैदा किए। हमने मस्जिद शुरू कर ली। मस्जिद बन गई।
तो फिर मैंने वो जो नौकरी थी ना मेरी अरबी टीचर की उससे मैंने रिजाइन कर दिया। अच्छा। उसकी दो वजह थी। एक वजह यह थी कि मस्जिद बनाई है तो हमने यहां पे काम करना है। अगर मस्जिद में काम करेंगे तो वह हरज होगा अगर उधर जाऊंगा तो। तो दूसरी एक और मेन वजह थी कि जब वह सर्विस बुक उसे फिल करने के लिए वह स्कूल का जो हेड मास्टर था वो मुझे अपने साथ लेके वहां पे जो अकाउंट ऑफिस है पिंडी में जहां पे वो पेपर बनते हैं तो मुझे साथ लेके गया तो जब
उसे फिल कर रहा था तो मुझे कहता है कारी साहब यह आप जो वो कम्यूट होता है वो जो पेंशन होती है वो आप सूद के साथ लेंगे या बगैर सूद के अच्छा तो थोड़ी देर मैं सोचा तो फिर मैंने कहा बगैर सूद के वो रुक गया ना कहता है कैसी बातें करते हैं अगर आप बगैर सूद के लेंगे तो अगर एक मुलाजिम ढाई 3 लाख लेके आता है पेंशन जो इकट्ठे पैसे मिलते हैं तो आपको तो उसमें से 25300 ही मिलेगा तो ये आपका फैसला गलत है। मैंने कहा अगर आप मुझे ना पूछते तो
मुझे तो पता ही नहीं था। इसमें क्या होता जिस तरह लोग ले रहे हैं मैं भी ले लेता लेकिन अभी आपने पूछ लिया है तो अब मैंने नहीं लेना वो अल्लाह बखशे वो अकाउंट ऑफिस में एक बड़े अफसर थे अब्दुल समी के नाम से वो मुझे पकड़ के उनके पास ले गया कहता है ये देखो कारी साहब क्या कहते हैं उसने कहा कारी साहब ने अब कह दिया है ना तो ये ऐसे ही होगा अब बगैर सूद के ही लिख दो तो एक वो वजह थी कि मैंने फिर उसके बारे में दिल मुतनफर हुआ और
मैं तो उसे छोड़ तो फिर मैं मुकम्मल तौर पे ना इस तरफ तम शुरू किया अल्हम्दुलिल्लाह और मैं समझा कि यह एक तबबलीग का बहुत बड़ा रास्ता है। लोगों के साथ तावुन तो है ही है लेकिन लोगों के अकायद को सही करने में एक बहुत बड़ा जरिया है ये। अच्छा शाह ये फरमाइए के कोई जो आमिल होता है उसको खुद भी कोई अकार वगैरह की पाबंदी करनी पड़ती है या उस्तादों ने कोई सिखाया था कि यह कम से कम आपने जरूर पढ़ना है। इसको नहीं छोड़ना अब। हां जी। अगर आप जादू सीखते हैं तो जादू
में आपको रोजाना की बुनियाद पर कोई चिल्लाकशी करनी पड़ती है। ठीक है? अगर आप रूहानियत में जो जायज और मसनून आमाल हैं यानी आप अगर शरी ऐतबार से सही इलाज करना चाहते हैं, फील्ड में आना चाहते हैं तो फिर आपको अकार की पाबंदी करनी पड़ेगी। और वो अल्लाह का जिक्र कसरत से करना, नमाज की पाबंदी करना, वजू में रहना और अल्लाह की जात पर अपने तवकुल को मजबूत कर लेना। यानी ये मेन चीजें हैं एक मुलज के लिए। बिल्कुल सही। जो शरी ऐतबार से सही इलाज करने वाला है। हम कि वो सबसे पहले अल्लाह की
जात पे अपने तवक्कुल को मजबूत कर ले। उसे पता हो कि मैं जो कह रहा हूं ना। ठीक है? यह ऐसे हो जाना है। हम यानी फातिहा तो सारे ही पढ़ते हैं ना। हां। लेकिन व्लाह आप यकीन नहीं करेंगे कि कितने ही ऐसे लालाज मरीज थे तो उन्होंने आकर जब अपनी मज़ बताई बड़ी से बड़ी मज़ थी और वो मुझे बता रहे हैं कि जी डॉक्टरों ने लालाज कर दी है सिर्फ फातिहा पढ़ी है दम किया है कहा जी बस जाए जी अल्लाह शिफा दे देगा और अल्लाह शिफा दे देता है यानी जब बंदा अल्लाह
की जात पे तवकुल और भरोसा करके कोई बात कर देता है ना बंदा जो कहता है फिर अल्लाह उस बंदे की ला कोई शक नहीं ठीक है और हदीस में भी आता है के अल्लाह अपने बंदे के गुमान के साथ होता है जितना उसका जैसा गुमान होता है अल्लाह की जात पेसा फरमा वैसे ही वो अल्लाह अच्छा कोई मैं जानना चाहता था कोई मखसूस अकार के ये तो लाजमी पढ़ने हैं यानी ये 100 दफा ये हजार दफा या 500 दफा या आप जैसे फरमाया ना कि वो चिल्लाकशी करनी पड़ती है अगर जादू सीखते हैं तो
मसनून इलाज में कोई मखसूस ऐसे अकार हैं जो आप समझते हैं कि इसकी पाबंदी जरूरी है जो मसनून है वो तो आपने खुद ही मसला हल कर दिया है ना अच्छा एक तो सुबह शामून मसनून वही है जो नबी ससल्लम से साबित है सही और आप ससल्लम ने किए हैं और उनकी तादाद भी रसूल्लाह ससल्लम ने बता दी है ठीक है आप हदीस की किताबें देखें उस पे जो अजकार हैं वो एक-एक दफा तीन दफा पांच दफा चार दफा या कुछ सात दफा कुछ है 10 दफा कुछ 100 दफा जी ठीक है एक वाहिद जिक्र
है दद शरीफ का जो हजार दफा भी आता है। सही। यानी यह वो मसनून आमाल है। बिल्कुल सही। ठीक है। अब जो खराबी पैदा होती है ना वो यह होती है कि लोग कोई जिक्र देते हैं और उसे कहते हैं कि ये सवा लाख निकालना है। हम एक मखसूस जगह पे बैठ के। ठीक है? किसी से बात किए बगैर इसको सवा लाख दफा पढ़ना है। एक टांग पे खड़े हो के पढ़ना है। पानी पे खड़े होकर पढ़ना है। या जो है ना वो सूरज जब ज़बाल के टाइम पे हो तो नीचे पानी का एक गिलास
रखें और आपको सूरज नीचे पानी में नजर आए तो उस सूरज की तरफ देख के पढ़ना है। यानी ये मुख्तलिफ तरीके हैं लोगों के जो खुद से बनाए हुए उन्हें मसनून नहीं कहा जा सकता। और जब बंदा इन अकार की तरफ जाता है ना जो मसनून नहीं है। रसूल अल्लाह की हदीस के मुखालिफ है दूसरे लफ्जों साबित नहीं है। साबित नहीं है तो फिर बंदे को नुकसान होता है। हदीस में वही मसनून अजकार है। अगर आप ज्यादा करना चाहते हैं तो कसरत से पढ़े। जिस तरह अस्तकफिरुल्लाह है। आप उसे बहुत ज्यादा पढ़े। इसकी बहुत बरकतें
हैं। दद शरीफ है उसे बहुत ज्यादा पढ़े। ला हौला वला कुत इल्ला बिल्ला है। इसे बहुत ज्यादा पढ़े। तो यह ऐसे अकार है जो इंसान को ना कहीं से कहीं पहुंचा देते हैं। यानी अस्तकफिल्लाह का विद जो है यह ऐसा है कि जो इंसान की सोच से ज्यादा इंसान को बुलंद कर देता है। यानी आप अगर कसरत से अस्तकफरुल्लाह का विर्द करते हैं ना चलते फिरते में तो अल्लाह आपकी दुनिया की हर हर हर ख्वाहिश को पूरा कर देता है। दुनिया के अंदर से आपके अंदर से हर किस्म का खौफ अल्लाह खत्म कर देता है।
तो बस वही मसनून अजकार हैं जो मैं भी करता हूं और हर एक इंसान को करने चाहिए। नबी ससल्लम भी वही अकार करते थे और उन अकार के बारे में जो हदीस में आता है आप सल्लम ने फरमाया कि जो बंदा मुख्तलिफ अकार के बारे में जो बंदा ये अकार कर लेता है अल्लाह ताला उसके लिए मुसल्ला फरिश्ते उसके साथ छोड़ देते हैं गार्ड के तौर पे हालांकि फरिश्तों को असले की क्या जरूरत है लेकिन अल्लाह ताला उस बंदे के साथ मुसल्ला फरिश्ते छोड़ता है जो सुबह से शाम तक उसकी हिफाजत करते हैं और जो
रात को पढ़ता है वो रात से लेके सुबह तक अल्लाह ताला उसकी हिफाजतों के फरमा दीजिए जो कौन से कलमात तो बिस्मिल्लाहदी शमा व अलीम ये जिक्र में बहुत बड़ा जिक्र है। तो ये पढ़ने से अल्लाह जमीन और आसमान के दरमियान की हर शय से अल्लाह ताला उस बंदे को महफूज़ कर देता है। इसी तरह और हदीस में काफी सारे अकार है। ताम्मा कुल शैतान कुल लाम्मा वदी इसी तरह मसनून अजकार में आपल मुस्लिम का मुताला अपने रूटीन में लाएं इंशा्लाह वो पढ़ने से एक तो इंसान की हिफाजत होती है। दूसरा अल्लाह की जात पर
तवकक्कल बढ़ना पड़ता है। शेख ये फरमाइए कि आपके पास जो मरीज आते हैं उनमें से रेशो क्या होती है? जो वाकतन मरीज होते हैं जिनको समझ जादू जिन्नात का असेब का या नज़रेबद का मसला है और या मतलब के उनको कोई और जिस्मानी बीमारी है या कोई नफसियाती मसला है ये अब बात अगर मैं आपको कहूंगा तो आपको अजीब लगेगी क्योंकि मैं एक मुलज हूं। जी जी तो अगर आप जादू और जिन्नात वाले बंदे को मरीज कहते हैं तो मैं क्योंकि अरसा 25 साल से 25 26 साल से इस फील्ड में हूं और लोगों का
ट्रीटमेंट कर रहा हूं और डेली के तकरीबन अगर ज्यादा नहीं तो 80 से 100 मरीज मेरे साथ जो है ना वो इलाज के लिए आते हैं आते हैं और हफ्ते में मैं पांच दिन बैठता हूं तो मैं ये कहूंगा कि जादू और जिन्नात के जो मरीज हैं वो 10% से ज्यादा नहीं होंगे। अल्लाहू अकबर। अच्छा हां ये भी अगर मैं कहूं ज्यादा है तो यकीनन बाकिया जो 90% है वो आपको आप समझते हैं कि हां बाकिया के बारे में जो है ना वो उनमें 50% आप निकाल दें। सही। उन्हें ना कोई जादू है, उन्हें ना
कोई तावीज है, उन्हें कोई नजर भी नहीं है। उन्हें कुछ भी नहीं है। वो अपनी बदमालियों की वजह से जकड़े हुए हैं। अच्छा। उनके आमाल उन्हें लेके बैठे हुए हैं। यानी अल्लाह से टूट गए हैं। अल्लाह ने उन्हें भुला दिया है। और यह बहुत काबिल गौर बात है इंसानों की इस्लाह के लिए। जो सामन सुनने वाले हैं वो इस बात को गौर से सुने के 50% लोग जिन्हें मर्ज कोई नहीं है। वह अपनी बदमालियों की वजह से जकड़े हुए हैं। कुरान में है कि जो बंदे अल्लाह के जिक्र से गाफिल होते हैं। अल्लाह ताला अपनी
तरफ से एक शैतान जिन उन पर मुसल्लत करता है। वो अल्लाह का मुसल्लत किया हुआ वो किसी के दम से, किसी की तावीज से, किसी के इलाज से ठीक नहीं होता। जब तक अल्लाह की तरफ राब्ता मुकम्मल ठीक नहीं होता। ठीक है? तो लोग अपने अल्लाह से अपने राबते को मजबूत कर लें। वो 50% लोग इसी तरह ठीक हो जाएंगे। उन्हें कहीं जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। हमारे पास भी लोग आते हैं। हम उनकी तशकीस करते हैं, पूछते हैं। मैं हलफन यह बात आपको कहता हूं। अक्सरियत मरीजों की ऐसी है कि जब मैं उन्हें
पूछता हूं कि घर में कुरान पाक की तिलावत का क्या मामूल है? तो रमजान के अलावा घर में तिलावत नहीं होती। हम नमाज़ का पूछता हूं तो वह कहते हैं बस दुआ करें अल्लाह तौफीक दे। तो मैं फिर अब मज़द बात को ना आगे बढ़ाता हूं। चले जी मैं दुआ कर देता हूं। अल्लाह आपको तौफीक दे। लेकिन मुझे बताएं कि आपने कब से नमाज नहीं पढ़ी। तो वो जाहिर है वो ना पढ़ने वाला शर्मिंदा होता है। तो वो बताता नहीं। तो फिर मैं खुद पूछता हूं अक्सर मरीजों से के इस हफ्ते में कोई नमाज़ पढ़ी
है? अल्लाहू अकबर। तो वह आगे से ना का जवाब मिलता है। फिर मैं पूछता हूं इस महीने में कोई पढ़ी है? तो महीने में भी कोई नमाज नहीं पढ़ी होती। ठीक है? कईयों को मैं साल में पूछता हूं तो वो कहते हैं हां रमजान में पढ़ी थी या जुमे के दिन सिर्फ पढ़ी है। यह इंसान की जिंदगी को नीचा कर देने वाला अमल है। इंसान को अल्लाह ने अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। जिन्नों और इंसानों को जब बंदा अपनी जिंदगी का मकसद उससे दूर हो जाता है तो फिर अल्लाह के अज़ाबों में आजमाइशों
में, तकलीफों में, परेशानियों में मुब्तला होता है। और जब वह लोग हमारे पास आते हैं तो हम उनकी सुनने के बाद उन्हें कुछ पढ़ने के लिए देते हैं। तो साथ हम जाहिर है वह मैं मुलज हूं। तो मैं उन्हें कहता हूं कि यह अमल आपने नमाजों के साथ करना है। उन्हें नहीं बताता कि आप के अंदर यह कोताही है। लेकिन जो अजकार देता हूं वो कहता हूं ये नमाजों के साथ पढ़ने हैं। फिर लाल नमाज़ भी पढ़। जाहिर है वो नमाज भी पढ़नी पड़ती है उन्हें। तो वो जब दो हफ्तों के बाद मेरे पास आते
हैं ना दोबारा पांच टाइम नमाज पढ़ के नमाजों के साथ यह जिक्र करके फिर साथ मैं एक चीज और ऐड कर देता हूं कि हां भाई इस दौरान आपको ख्वाबें भी आएंगी हम तो वो ख्वाब भी आपने लिख के लाने हैं तो वो बंदा थोड़ा सा और उस पे ना फोकस उसका बढ़ जाता है कि जी मुझे ख्वाब भी आएंगे और फिर जब वो दो हफ्तों के बाद आता है तो कहता है कि जी वाह जी कमाल हो गई जी आप सल्फी साहब आपने तो कमाल कर दिया माशा्लाह ठीक ठीक है वो असल में कमाल
उसने खुद किया होता है। वो असल में वो कमाल मेरा नहीं है। वो कमाल उसका अपना है। अल्लाह से टूटा हुआ था। अल्लाह ने हमें जरिया बनाया। हमने अल्लाह की तरफ जोड़ दिया। तो अल्लाह तो इतने पे राजी हो जाता है। माशा्लाह जब वो अल्लाह के जिक्र के साथ जुड़ा है तो अल्लाह ने उसकी वो परेशानियां तंगियां खत्म कर दी। शेख ये फरमाइए कि जो 10स फरमाया कि जादू के मरीज हो सकते हैं ये नज़रे बद के। 50 आपने फरमाया कि वह अपनी बदमालियों का तो बाकी जो 40 फसल होते हैं। हां नज़र के मरीज
काफ़ी ज़्यादा है। ठीक है। बच्चों को नजर लगती है। अपनी लगती है। वालिदैन की लग जाती है। आप तैयार हो के बैठे हुए हैं। ठीक है। आईने के सामने जाते हैं। शरीयत कहती है दुआ पढ़ो। हमें दुआ नहीं आती। हम हम देख के अपने आप को खुश होते हैं कि यार आज मैं बड़ा जबरदस्त लग रहा हूं। अपनी नजर खुद लग जाती है। हम ठीक है। नजर के मरीज काफी ज्यादा हैं और वो होने भी चाहिए कि क्योंकि आजकल हमारा जो अमल है ना वो लोगों को नजर लगाने पे मजबूर कर देता है। अपने आप
को शो करना दिखाना। ठीक है? बच्चों को तैयार करके Facebook की ज़ीनत बना दिया। लोग देखने वाले नजर लगा देते हैं। ठीक है? बच्चे का रिजल्ट आया उसे Facebook पे लगा दिया। Twitter पे छोड़ दिया। YouTube पे लगा दिया तो वो बच्चों को नजर लगती है। ठीक है? नजर के मरीज बहुत ज्यादा है। तो हदीस में भी आता है कि रसूल्लाह ससल्लम ने फरमाया कि मेरी उम्मत के अक्सर अमवाद जो होंगी वो नजर के लगने की वजह सेगी। तो हमें अपनी जिंदगियों को जो है ना वो बेहतर बनाने के लिए इस चीज का खास ख्याल
रखना चाहिए। शेख आप जी कह रहे हैं कि अगर हम Facebook पे Twitter पे भी अगर हम अपनी कोई ऐसी चीज लगाते हैं तो उसको देख के भी फिजिक की नजर लग जाती है। खुदा हमारे ख्याल से अगर अभी लोग सामने देखेंगे तो फिर ही नजर लगेगी। तो ये तो यानी वर्चुअल है ना यानी वो सामने तो नहीं है। बंदा कहीं बैठा हुआ है वो कहीं बैठा हुआ है। लग जाती है नजर। अच्छा बिल्कुल Facebook पे देखने पे भी नजर लग जाती है। सही यानी वहां पे देख के तो असरात उस बंदे के ऊपर। आप
देखें ना कुरान की एक आयत है जो मक्के के काफिर थे वो नबी ससल्लम को नजर कैसे लगाते थे यानी उनकी ख्वाहिश होती थी कुरान की आयत है कि लस लिकरा मजनून यानी मक्के के काफिर भी नबी ससल्लम को नजर लगाने की कोशिश करते थे। ठीक है? तो नजर बाज दफा बगैर देखे उसका सोच पे भी लगाई जा सकती है और मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो पैसे लेके नजर लगाते हैं और उनकी नजर लगती है। अल्लाह मुआशरे में मशहूर है कि वो बंदा नजर लगाता है और वो पैसे लेके नजर लगाता है।
अच्छा ये पता चल जाता है उनको कि नजर लगती है और मैं नजर लगती। बिल्कुल। अच्छा और बाकी जो हदीस में भी है ना कि बाज दफा आपको पता है कि नजर किसकी लग गई है बच्चे को तो बकायदा उसका हदीस में इलाज भी मौजूद है। अगर पता है किसकी नजर है तो उसका तोड़ कैसे करना है हदीस में वो तरीका मौजूद है। अगर पता नहीं है नजर किसकी लगी है तो उसका भी हदीस में मौजूद है। अच्छा ये जरा फरमा दीजिए दोनों तरीके जो है अगर पता हो ना पता हो। नजर अगर लग जाती
है पता है कि नजर किसकी लगी है किसी बच्चे को या अपने को या किसी को भी तो हदीस कहती है कि उस बंदे को कहा जाए कि अपना वजू करें मुकम्मल और वो पानी सारा एक बर्तन में जमा कर ले और मुतासरा बंदे के सर पे डाल दे तो वो जब उसके सर पर डाल देंगे तो वो नजर खत्म हो जाएगी। अच्छा यह एक शरी हदीस का सही हदीस से यह मसला है और अगर यह पता नहीं है कि नजर किसकी लगी है तो हदीस में नबी सल्लल् की वो दुआएं मौजूद है कि नबी
सल्लल् हजरत हसन हुसैन रज़ अल्लाह ताला अन्मा को वो पढ़कर दुआ करते थेका कलमात्ला ताम्मा कुल शैत कुल लामा ये पढ़े सूर फलक और सूर नास पढ़े इससे नजर उतर जाती है या दीगर कुछ और दुआएं भी आती है मुख्तल हदीस में मुख्तलिफ अल्फाज़ के साथ तो वो पढ़ने से नजर खत्म हो जाती है। एक वो तरीका है जो हिंदुओं से हमें मिला है। वो मर्चों और धनी और वो तवे पे डाल के और वो सारा करना है। वो तवे पे मर्चें डालते हैं और वो धुआ नहीं निकलता या इस तरह का तो वो एक
मुजर्रब कहा जा सकता है। लेकिन उसे नजर उससे भी उतर जाती है। यानी वो करने से भी नजर उतर जाती है। लेकिन वो तरीका हमें हिंदुओं से मिला है। तो बेहतर यही है कि मसनून आमाल हमारे पास मौजूद है। तो वो हिंदुओं के तरीके पर ना जाया जाए बल्कि मसनून तरीके से नजर उतारी जाए। अच्छा शेख ये फरमाइए के ये तो आपने फरमाया कि आपके पास लोग आएंगे। अभी माशा्लाह बहुत सी चीजें आपने बता भी दी। ये फरमाइए के अगर कोई शख्स उसको ये मालूम करना हो कि मेरे ऊपर नजर बद है या जादू है
या सेब है या नहीं है। उसके बारे में भी आप कोई बता सकते हैं तरीका। जी नजर का तो बंदे को वैसे ही पता चल जाता है ना नजर की अलामात है। आपकी आंखें पूरी नहीं खुलती। कई लोगों की नजर पुरानी हो जाती है। तो वो पहली नजर ही बंदा देख के उसे कहता है कि इसे नजर लगी है। यानी वो ऐसे है जैसे वो पूरी आंखें नहीं खोल रहा और उसका दिमाग जकड़ा हुआ है। ये एक नजर की अलामत है। फिर हदीस में नबी ससल्लम के घर में उम्मुल मोमिनीन की एक खादमा थी। वो
आपके घर में काम कर रही थी तो नबी ससल्लम तशरीफ लाए तो आपने उस बच्ची को देखा कि उसके चेहरे पे निशान बने हुए थे। ठीक है? तो आप ससल्लम ने फरमाया इसे नजर है। इसे नजर का दम करो। ठीक है? यानी कुछ चीजें हैं जो जाहिर है निशान की सूरत में वह भी बताती हैं कि नजर है। कुछ जिस्म की अलामात से पता चलता है कि नजर है। और नजर से इंसान को बुखार भी हो सकता है। नजर से इंसान को दौरा भी पड़ सकता है। अब आप कहेंगे जी दौरा तो जिन्नों से पड़ता
है। नजर से कैसे? तो उसका एक हदीस में वाक्या मौजूद है कि एक सहाबी अ बैठे हुए थे ऊपर ऊंची जगह पे और नीचे से नहर गुजर रही थी। पानी था तो एक दूसरे सहाबी आए। मुझे नाम जेहन में नहीं है। अ तो वो उन्होंने आके अपने कुर्ते को उतारा और डायरेक्ट उस पानी में छलांग लगा दी। तो जो ऊपर सहाबी बैठकर देख रहे थे ना उन्होंने उनको कुर्ता उतारते हुए देखा। तो उनकी जुबान से यह अल्फाज़ निकले। अल्लाह की कसम ऐसा खूबसूरत जिस्म तो मैंने किसी बाकरा औरत का भी नहीं देखा। इतनी बात उनके
करने की देर थी कि वो सबी पानी के अंदर ही गिर गए। उनके बेटे ने उन्हें उठाया बाहर निकाला। नबी ससल्लम के पास ले आए। तो आप ससल्लम ने वो बेहोश हुए सहाबी को देखकर फरमाया कि क्या तुम्हें शक है किसी पे? तो उन्होंने कहा अल्लाह के रसूल हां हमें शक है फला सहाबी पे के वो ऊपर बैठे हुए थे। उन्होंने यह अल्फाज कहे थे। आपने फरमाया बुलाओ उसे। उन्हें बुलाया गया तो नबी ससल्लम ने उन्हें देखकर कहा क्या आप अपने भाई को कत्ल करना चाहते हो? क्या अपने भाई को कत्ल करना चाहते हो? फिर
आपने रहनुमाई फरमाई कि जब कोई बंदा उसकी कोई चीज तुम्हें अच्छी लगे तो अल्लाह की तारीफ बयान करो। उसमें माशा्लाह को ठीक है? तो अल्लाह ताला आपकी नजरों से उसे महफूज़ कर देगा। तो फिर आपने उन सहाबी को फरमाया कि आप उसके लिए वज़ू करो और वो जो पानी था वो इकट्ठा किया और उन पे डाला तो वो ठीक हो गया। ठीक है। तो नजर देखने से लग जाती है और फिर उसका इलाज भी नबी ससल्लम ने हदीस की किताबों में बयान कर दिया। अच्छा ये जो अक्सर हम देखते हैं कि वो असेब आ जाते
हैं और फिर वो दौरे पढ़ते हैं। फिर वो चीची पकड़ के तो उसका उसे पूछते हैं कि तुम कौन हो? फिर वो बोलता है अंदर से। ये बात ठीक है दोस्त। कुछ तो ड्रामा ज्यादा है और जो हकीकत है वो कम है। कोई उंगली को पकड़ के दबाते हैं। कोई अंगूठे को पकड़ के दबाते हैं। कोई उंगलियों में पेन डाल के दबाते हैं। तो एक बड़ा दिलचस्प वाक्या है। पता नहीं अब टाइम आपका है या नहीं। मैं जल्दी से सुना देता हूं। सादकाबाद में गया रहीम यार खान में। मैं बड़े टाइम से ना तकरीबन 25
26 साल से मैं वहां एक जुम्मा पढ़ाता था और फिर मरीजों को भी देखता हूं। अभी आजकल थोड़ा सा उन्हें मैं टाइम लेट दे रहा हूं। तो वहां पे मैं गया तो एक बुजुर्ग आए तो वो मेरे सामने आके रोने लग गए। कहते हैं जी मैं बहुत परेशान हूं। जाहिर है मां-बाप जब औलाद का दुख देखते हैं तो परेशान होते हैं। तो मैं बहुत परेशान हूं। तो आप मेरा कोई साथ दें, मेरी हेल्प करें। मैंने कहा बुजुर्गों बताएं क्या मामला है? कहते हैं जी बच्ची बीमार है। मुझे दर दर पर उसने जो है ना वह
फिरा दिया है। लेकिन बच्ची ठीक नहीं हो रही। आप आए हैं तो आपको ऐसा करें कि अल्लाह मेरी बच्ची को शिफा दे दे। मैंने फला को दिखाया। फला को इतने पैसे दिए। फला को इतने पैसे दिए। कहता है अब तो पैसे भी नहीं है कि मैं किसी को दे के घर बुलाऊं। जिसको बुलाता हूं वो दम करता है आके और बच्ची को रुलाता है और फिर उसके बाद कहता है कि जी000 जिन थे 900 1000 से मैंने 100 खत्म कर दिया है बोतल में बंद कर दी साथ लेके जा रहा हूं पीछे बाकी रह गए
हैं वो अगले चक्कर में करेंगे अगले चक्कर में आता है तो वो कहता है जी वो तो हजार और आ गए हैं यानी हम इसी कशमकश में हैं। जुमे की नमाज के बाद मैंने वो एक साथी को साथ लिया तो मैं उनके घर चला गया। घर उनका छोटा सा था। जो ही मैं घर के अंदर गया ना तो वह बच्ची देखते ही वह अंदर बेड के नीचे घुस गई और साथ बोलने लगी के मैं जा रहा हूं मैं जा रहा हूं वापस नहीं आऊंगा वापस नहीं आऊंगा मुझे माफ कर दे छोड़ दें ला इलाहा इल्लल्लाह
मोहम्मद रसूल्लाह यानी बच्ची पे इस तरह का खौफ था कि वो खौफ मैं आपको बयान नहीं कर सकता बहाल मैं ना उस कमरे में जाके बैठा और मैंने वो बच्ची को पूरा एतमाद में लेके उसे मैंने कहा बच्चे बाहर निकलो बैठ के बताओ क्या हुआ है कौन है तुम कौन जा रहा है कौन आ रहा है और आप फिर नहीं आओगे मुझे बताओ क्या मामला है अच्छा वो मैंने 1520 मिनट उस बच्ची को ना एतमाद में लिया फिर मैंने उसे बड़े प्यार से मैंने कहा तुम्हें क्या मसला है क्यों ये बातें कर रही हो कहती
है वो जो आते हैं ना वो कारी साहब वो मेरे यहां पे उंगलियों में पेन डालते हैं और उसको दबाते हैं और फिर कहते हैं निकल जा तो मुझे तकलीफ होती है। तो मुझे उसने हाथ दिखाया तो उसका हाथ जख्मी था। कहती है वो तकलीफ मुझे बर्दाश्त नहीं होती। और वो फिर मुझे इतना तकलीफ होती है और फिर वो कहते हैं हां भाई इस बोतल में आजा। तो फिर मैं उन्हें कहती हूं हां मैं बोतल में आ गया हूं। हां भाई तू भी आजा तू भी आजा। यानी वो कहती है मैं ही कह रही होती
हूं। हम ठीक है। वो 1000 में से 100 को बोतल में बंद करके चला जाता है। अगली दफा कहता है कि जी इतने और आ गए हैं। ठीक है? तो मैं इसी तरह की जिंदगी में वक्त गुजार रही हूं और मैं बहुत परेशान हूं। तो मैंने उसे थोड़ी देर में दमशम करके मैंने कहा बेटा अब कोई आपके साथ जिन्न नहीं है। यानी उसका तवक्कल थोड़ा सा मजबूत किया। उस बच्ची को मजबूत किया। ठीक है। यहां तक कि मैंने उसे कुछ जिक्र अकार पढ़ने के लिए दिए। मैंने कहा आज से वो सारे जिन तेरे बोतल में
बंद है। कोई भी नहीं है आपके साथ। अल्लाह ने किया कि वो पहले दम से ठीक हो गए। अल्हम्दुल्लाह ठीक है। बाज़ जो आमिल है ना वो मरीजों को मरीज बनाने के लिए जाते हैं। यानी वो आगे ही एक बंदा सोच में वो परेशान है। उसको जाके बंदा कह दे कि तेरी फैमिली के साथ000 जिन है। हां तो सारी बात वो तो तौर पे हो गया ना मरीज। तो वो तो उसका हमेशा के लिए मरीज बन गया ना। अबज़ जिन वो खत्म नहीं होंगे। 100 खत्म करेगा तो000 और आ जाएंगे। हम तो अल्लाह बचाए बस
आप दुआ किया करें शेख आप ये फरमाए कि ये जो अभी आपने देखा वाकया सुनाया है फरमाए के लोग ऐसे लोगों के पास जाते हैं पैसे भी देते हैं जैसे आपने फरमाया तकलीफ भी सहते हैं वक्त भी जाया होता है क्या मशरा देते हैं आप किस तरह इसको अगर कोई मसला हो तो क्या करें घर में क्या करें ताकि वो असरात कम होना शुरू हो जाए वो इससे पहले जिक्र कर चुके हैं कि घर में बच्चों को दुआओं पे लगाएं अजकार की पाबंदी करवाएं। जो शरीयत ने हर मौके की दुआ बताई है ना उसमें बड़ी
हिकमत है। उसकी कोई वजह है फिर हां जी। वो वजह समझाएं बच्चों को कि आप खाना खाने लगे हैं तो खाना खाने से पहले आपने बिस्मिल्लाह पढ़नी है। क्यों पढ़नी है? नहीं तो शैतान शरीक हो जाएगा साथ। अगर आप बिस्मिल्लाह नहीं पढ़ेंगे तो वो चीजें शैतान मखलूक जो आपको नजर नहीं आती वो आपके खाने में आपके साथ शरीक हो जाती। ठीक है? अगर दरमियान में पढ़ेंगे तो वह उल्टी करके भाग जाता है। यानी अपने साथ खाने में शैतान को शरीक ना करें। घर के अंदर आ घर के अंदर आके अस्सलाम वालेकुम कहें और दुआ पढ़
के घर के अंदर आ रात को सोने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ के दरवाजे को बंद करें। ठीक है? यह वो चीजें हैं जो हमारी तरबियत में होनी चाहिए। यानी यह यह हकीकत है। हम सुन उसको बड़ा गैर अहम समझते हैं। मामूली समझते हैं कि चलो पढ़ लिया पढ़ लिया नहीं पढ़ लेकिन उसके असरात हैं। फिर वो बाद में वो असरात भुगतने पड़ते हैं। हां वो जो हदीस है ना कि जो बंदा घर आता है और घर आते दरवाजे पे सलाम नहीं करता और बगैर बिस्मिल्लाह दुआ पढ़े वो घर के अंदर घुस जाता है। तो शैतान
जो उसके साथ होता है ना वो उसे पीछे वाले शैतानों को बुलाता है। कहता है आ जाओ भाई आज हमारा खाना भी इधर है और रात हमारा यहां पे कयाम भी इधर ही है। इस घर में हमारी दावत है आज। तो अगर वो बंदा बिस्मिल्लाह पढ़ के घर में दाखिल होता है दुआ पढ़ के सलाम करके तो शैतान दरवाजे पे जो साथ आया होता है दरवाजे पे खड़ा हो जाता है। कहता है कि आज आपके लिए यहां पे खाना भी कोई नहीं है और रात गुजारने की जगह भी कोई नहीं है। वापस चले जाओ। हम
ठीक है। इसी तरह आप दीगर कई चीजें हैं जिस आप बाजार जाते हैं तो बाजार की दुआ पढ़ें। घर में आते हैं तो घर में जाने की पढ़ें। बाहर वाशरूम जाते हैं। अल्लाह इनिकाल खुबस व खवास ये दोनों जमे बयान की यानी एक जिन नहीं है आपके वाशरूम में। खुबस भी जमा है खबा खबास भी जमा है। जिन्न और जिनिया जो है ना जिन और जिन्निया वहां पे मौजूद हैं। वो आपको नजर नहीं आ रही। लेकिन अगर आप यह दुआ के अल्फाज़ पढ़ लेंगे तो अल्लाह ताला उन जिन्नों को आपसे और आपको उन जिन्नों से
महफूज़ कर देगा। इसमें तो फिर मुझे दो बातें समझ में आ रही है। एक तो ये है कि ये ना यानी सबसे इल्म की बात है कि आपको इस बात का इल्म हो कि किस मौके पे कौन सी दुआ पढ़नी है। फिर दूसरी बात है उस दुआ को याद करना। तीसरी बात उस दुआ को समझना। उस पे गौर करना। और चौथी बात उस मौके पे पढ़ना। और फिर पांचवी बात यह है कि इसका यकीन रखना कि जो बात रसूल ने फरमा दी है जो बात कुरान में आ गई है यह ऐसे ही है। इसके अलावा
यानी आप समझे ना कि ये कोई ठीक है अगर पढ़ लिया पढ़ लिया नहीं पढ़ लिया नहीं ऐसे नहीं है। ये जब तक उसको पढ़ेंगे नहीं इन चीजों के साथ उस वक्त तक जो है वो आपके वो असरात खत्म नहीं होंगे उसके आपके साथ। जी जी इसी तरह ही है। बस जिस तरह हम बच्चों को एक तरतीब बताते हैं ना कि तीन टाइम खाना है। सुबह नाश्ता करना है। दिन को खाना खाना है। रात को खाना है। फिर दरमियान में चाय भी पीनी है 4:00 बजे की। तो अगर वालिदैन अपने बच्चों की तरबियत में ये
चीजें रख दें के खाने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़नी है। हाथ धो के अपने मुंह के आगे से खाना है। फिर इसी तरह बाद की दुआ पढ़नी है। जब शुरू में वालिदैन अपने बच्चों की तरबियत इस तरह करेंगे तो वो आदत बन जाएगी इंशाल्लाह। और फिर इससे बढ़ के अकायद का मजबूत होना यह सबसे अहम चीज है। जादू का असर उस वक्त तक नहीं होता जब तक बंदा उस जादू की वजह से परेशान नहीं होता। उस वक्त तक एक मजबूत इंसान पे जादू असर ही नहीं करता। सही। जो अकीदे में जिस्मानी तौर पे मजबूत है। जादू
उस पर असर नहीं करता। औरतों पे जादू क्यों जल्दी असर करता है? क्योंकि वह ईमान में भी कमजोर होती हैं और जिस्मानी तौर पे भी कमजोर होती हैं। उन पे जादू जल्दी असर कर जाता है। अब जो लोग जिस्मानी तौर पर मजबूत है ना अकीदे पे मजबूत हैं तो पहले कोशिश होती है उन्हें जिस्मानी तौर पर कमजोर किया जाए। वो मैंने एक प्रोग्राम में बताया था कि वो पास से कोई चीज गुजरी हवा का झोंका या उसे किसी चीज ने हाथ लगाया टच किया या उसे कोई चीज हिलती जुलती नजर आई। कमरे में और कोई
नहीं है तो खौफ तो यह जादू नहीं है। यह वो जिन है जो उसे परेशान कर रहा है। उसे सोचने पर मजबूर कर रहा है। सोचो भाई कोई है हम आप क्यों नहीं इस तरफ तवज्जो कर रहे? अब जब वो तवज्जो करता है ना कि भाई कुछ है जो मुझे तंग कर रहा है। खौफ भी। अब वो तवज्जो उसकी करना उसके जिस्म को यहां से भारी करता है। ये वजन पड़ता है ना उस और यहां से वो जब मसल कमजोर होते हैं तो वो शैतान जिस्म के अंदर जाके उसके दिमाग का कंट्रोल हासिल करता है।
ठीक है? अगर वो उसको तवकल मजबूत है अल्लाह की जात पर तो असर ही नहीं करेगा। ठीक है। बच्चों को यह तरबियत दी जाए के वो हदीस भी है। रसूल्लाह की तरबियत में भी है कि वम अन उता लात अलाऊ का शम यऊ का कि अगर दुनिया सारी इकट्ठी हो जाए तुम्हें कोई चीज फायदा देने के लिए तो आपने कोई चीज फायदा नहीं दे सकती मगर उतना ही जितना अल्लाह ने तेरी तकदीर में लिख दिया हुआ है और अगर दुनिया इस बात पर इकट्ठी हो जाए कि वो तुझे तकलीफ देने पे आ जाए जर्रा बराबर
कोई दुनिया इकट्ठी होकर तकलीफ नहीं दे सकती मगर उतनी ही जितनी अल्लाह ने तेरी तकदीर में लिख दिया हुआ है। यानी सबसे पहले अकीदे की मजबूती मुवाहिद आदमी पर जादू काम असर करता है। ठीक है? जो मुशरिक है हर चीज से डर रहा है हां उस पे सॉरी उस पे असर करता है। जाहिर है वो बेस बनी हुई है। उसे थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ती है जादूगर को तो जादू असर कर जाता है। शेख आपका बहुत शुक्रिया। तशरीफ लाए। बड़ी माशा्लाह मालूमाती बातें बड़ी मैं समझता हूं कि ये ऐसी चीजें हैं कि अगर हमारे नाजरीन
इन बातों को सुने समझे इस पर अमल करें तो इंशा्लाह उनके बहुत सारे मसाइल जो है वो हल हो जाएंगे। उम्मीद है कि इंशा्लाह हम आपको वक्त वक्तन जहमत देते रहेंगे। आप तशरीफ लाएंगे। हमारे पास जो सवालात आएंगे हम आपसे आपसे वो भी शेयर करेंगे ताकि उनके जवाबात भी आपसे लिए जाए। आपका बहुत शुक्रिया तशरीफ लाने का। नाजरीन हमारे साथ मौजूद थे आज हाफज़ अब्दुल हम सल्लफी साहब। आप इस्लामाबाद से तशरीफ लाए हैं। वहां पे इनका इदारा है। इलाज भी करते हैं। तो मैं समझता हूं कि सबसे पहले दीन का वो इलम है जब हमें
होगा। जैसे आप साहब ने भी फरमाया के आपका अकीदा दुरुस्त हो। आपके जो है इबादत ठीक हो। खास तौर पर आपकी नमाज सही हो। वजू में आप रहते हो। अकार आप जो बकायदगी से पढ़ते हैं सुबह शाम के अकार हैं और मुख्तलिफ जो हमारे रोजमर्रा के अकार हैं मुख्तल मवाके के ऊपर उनको पढ़ने के हवाले से अगर पाबंदी हो तो इंशा्लाह ताला ये जादू जिन्नात नज़रे बद औरब के मसाइल जो हैं वो इंशा्लाह खत्म हो जाएंगे। इस उम्मीद के साथ कि हमारा आज का प्रोग्राम भी आप नाजरीन के लिए इंशा्लाह फायदे का बायस होगा। इजाजत
दीजिए। अल्लाह हाफिज। [संगीत] ्म [संगीत] हो [संगीत] [संगीत] य लव ले लिए फेमस [संगीत]