नमस्कार दोस्तों डेट आज के देखो 24 फरवरी 2025 है स्वागत है आपका एटल डिस्कशन में आज देखो तीन इश्यूज हम डिस्कस करेंगे और तीनों के तीनों डिटेल्स है सबसे पहले आर्टिकल हम डिस्कस करेंगे इंडियन इंडस्ट्रीज की सबसे बड़ी कमी जानते हो क्या है आज भी इंडियन इंडस्ट्रीज जो हैं वो सस्ती वेजेस पर ज्यादा डिपेंड कर रहे हैं ग्रोथ रजिस्टर करने के लिए लेकिन सस्ती वेजेस पर डिपेंड करना ग्रोथ रजिस्टर करने के लिए यह सस्टेनेबल नहीं है इवन चाइना को यह पहले से समझ में आ गया था इसलिए चाइना जो एक समय में सबसे ज्यादा पॉपुलेशन वाला देश था चाइना ने इनोवेशन पर फोकस करना स्टार्ट कर दिया था एक्सपोर्ट पर फोकस करना स्टार्ट कर दिया था मैनेजमेंट प्रैक्टिसेस को इंप्रूव करने पे ध्यान देना स्टार्ट कर दिया था बट इंडियन इंडस्ट्रीज आज भी सस्ती वेजेस पर डिपेंड कर रहे हैं तभी तो एलएनटी के चेयरमैन और फोसिस के फाउंडर नारायण मूर्ति वो सब बोल रहे हैं एक हफ्ते में ज्यादा काम करना चाहिए यह इशू डिटेल से डिस्कस करेंगे फिर दूसरा आर्टिकल हम डिस्कस करेंगे टैलेंट शॉर्टेज से संबंधित ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज है और इंडिया कैसे इसे फुलफिल कर सकता है एड्रेस कर सकता है ग्लोबल टैलेंट सोटेस को तीसरा इशू हम डिस्कस करेंगे इंडियन एक्सप्रेस का रैगिंग से संबंधित तो चलिए डिस्कशन स्टार्ट करते हैं आज के डिस्कशन में जो फर्स्ट इंपोर्टेंट आर्टिकल है वह देखो आईआईटी दिल्ली के एक प्रोफेसर जयं थॉमस ने लिखा है राइटर इस आर्टिकल में बताते हैं कि इंडियन इंडस्ट्री के सामने क्या-क्या रोड ब्लॉक्स हैं क्या चैलेंज हैं कैसे इंडियन इंडस्ट्री ग्रोथ के रास्ते पर आगे बढ़ सकती आप सिलेबस में जीएस पेपर थ के इस टॉपिक से आर्टिकल को रिलेट कर सकते हो सबसे पहले देखो राइटर एक इंपोर्टेंट बात बोलते हैं हमारी जो इंडियन इंडस्ट्रीज है ना वह एक ही चीज पर अटकी हुई है कि इंडिया में लेबर सस्ती है इसका फायदा उठाया जाए लेकिन देखो यह सस्टेनेबल नहीं है लॉन्ग टर्म में जितना फायदा उठाना था इंडियन इंडस्ट्रीज ने सस्ते वेजेस का वह उठा लिया अब अगर इडियन इंडस्ट्रीज को ग्रोथ के रास्ते पर आगे चलना है ना तो देखो इनोवेशन पर फोकस करना पड़ेगा बेटर मैनेजमेंट प्रैक्टिसेस पर फोकस करना पड़ेगा हाल फिलहाल में देखो इंडियन इंडस्ट्रियलिस्ट के ना काफी सारे बयान वायरल हुए जैसे एलएनटी के चेयरमैन थे उनका बयान वायरल हुआ कि घर में क्या पत्नी की फोटो देखते रहोगे मतलब देखते रहोगे पत्नी को इससे अच्छा काम पर रहो इवन नारायण मूर्ति जो थे इंफोसिस के उन्होंने भी यह बात बोली कि एक हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए वर्कर्स को तो यह वही मानसिकता है कि सस्ते वेजस पे वर्कर से ज्यादा काम करवा लो और इससे इंडस्ट्रीज जो हैं वह ग्रोथ रजिस्टर करेंगी उनका प्रॉफिट इंक्रीज होगा बट देखो यह सस्टेनेबल नहीं है लॉन्ग टर्म में जैसे राइटर ना एग्जांपल देते हैं यूएसए और दूसरे कुछ जापान जैसे देशों का जो यूएसए जैसे डेवलप कंट्रीज है ना वहां पे एवरेज जो वीकली वर्क आवर्स है ना वह कितने हैं 38 हैं और जापान में कितने हैं जापान में तो उससे भी कम कम है 36. 6 है और इंडिया में कितने हैं इंडिया में है 46. 7 आवर्स राइटर बोलते हैं देखो आप लुधियाना में ना एक सर्वे कंडक्ट किया गया था उसमें ना यह पता लगता है कि ना फैक्ट्री वर्कर्स रोज 11 से 12 घंटे काम करते हैं और जब डिमांड ज्यादा होती है मतलब ऑर्डर्स जैसे ज्यादा आ गए तो बिना ब्रेक के दिन भर काम करते हैं हम सिर्फ घर से फैक्ट्री आना फैक्ट्री से घर जाना यानी कमटिया इसके अलावा और किसी पर्सनल एक्टिविटी के लिए उनके पास में टाइम बचता ही नहीं है यह सर्वे कंडक्ट किया गया था लुधियाना में आप एक चीज यह देखिए हमारे देश में ना 2023 24 का पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे का डाटा है सिर्फ 21.
7 पर जो वर्कर्स हैं वह रेगुलर जॉब्स में हैं बाकी तो देखो कैजुअल वर्कर्स हैं या फिर सेल्फ एंप्लॉयड है यानी सिर्फ इतने परसेंट वर्कर्स के पास में 21. 7 पर पर वर्कर्स के पास में सोशल सिक्योरिटी है उन्हें एंप्लॉयर जो है जब मर्जी चाहे तब काम से नहीं हटाता कम से कम थोड़ा बहुत नोटिस दिया जाता है बाकी जो वर्कर्स हैं उनके पास में देखो ना तो कोई रिटर्न कांट्रैक्ट है ना ही उनको कोई पेड लीव मिलती है और ना ही उनके पास में कोई सोशल सिक्योरिटी है जैसे पेंशन या फिर इंश्योरेंस इत्यादि फिर इसके बाद नेक्स्ट पॉइंट राइटर यह देते हैं हमारे देश में ना 70 पर से ज्यादा वर्कर्स देखो छोटी-छोटी यूनिट्स में काम करती छोटी-छोटी यूनिट्स जैसे उन फैक्ट्रीज में काम करती है 70 से 70 पर से ज्यादा वर्कफोर्स जहां पर 10 वर्कर से कम वर्कर्स काम करते हैं मतलब ऐसी छोटी-छोटी फैक्ट्री हमारे देश में बहुत ज्यादा है जिस किसी में चार वर्कर काम कर रहे हैं किसी में छह किसी में सात किसी में आठ अब देखो यह जो छोटी-छोटी फर्म्स है ना क्या करती हैं यह देखो बड़ी फर्म्स के लिए ना कंपोनेंट वगैरह मैन्युफैक्चर करती है जैसे आपको छोटा सा एग्जांपल देता हूं एक मारुती की कार बनती है उसमें स्टेयरिंग बनता है ब्रेक होते हैं बहुत सारी चीजें होती हैं अब यह जो कंपनीज है ना आपको बहुत सारी छोटी-छोटी वर्कशॉप्स मिलेंगी जिनमें छोटे-छोटे पार्ट्स बनते हैं और यह पार्ट जो है बड़ी-बड़ी कंपनीज को सप्लाई किए जाते हैं अब राइटर यह बोलते हैं यह जो बड़ी कंपनी है ना जैसे मारुती जैसी है यह देखो अक्सर छोटी कंपनीज के साथ में ना फेयर नहीं होती जस्टिस नहीं करती जस्टिस कैसे नहीं करती जैसे देखो पेमेंट को ना महीनों तक डिले करती है आज छोटी कंपनी ने माल सप्लाई किया एक साल बाद छ महीने बाद पेमेंट की जाएगी और रॉ मटेरियल मैन्युफैक्चर करने की यानी छोटे कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चर करने की कॉस्ट काफी ज्यादा बढ़ गई है बट बावजूद इसके बड़ी कंपनीज ना अच्छा प्राइस नहीं देती छोटी कंपनीज को और छोटी फर्म्स जो होती हैं उनको आसानी से बैंक क्रेडिट भी नहीं मिलता बैंक आसानी से इनको लोन नहीं देते बड़ी कंपनीज को आसानी से लोन दे देते हैं इस वजह से देखो जो स्मल फर्म्स है ना छोटी कंपनीज हैं उनके ऊपर ना हमेशा फाइनेंशियल प्रेशर बना रहता है और इस वजह से वह वर्कर्स के वेजेस भी नहीं बढ़ाते तो यह पूरा पॉइंट हमने समझ लिया स्मल फर्म्स का एक्सप्लोइटेशन अच्छा पॉइंट है छोटी फर्म्स का एक्सप्लोइटेशन अब देखो नेक्स्ट पॉइंट राइटर देते हैं वह है कांट्रैक्ट वर्कर्स का बढ़ता इस्तेमाल 20111 के बाद देखो 57 56 पर नए जो वर्कर्स है ना वो कांट्रेक्चुअल बेसिस पर हायर किए गए हैं अब कंपनीज को फायदा यह होता है कि इन कांट्रेक्चुअल वर्कर्स को ना ना तो लेबर लास का प्रोटेक्शन मिलता है ना ही इनका जो कंपनसेशन है वह लेबर लास के अकॉर्डिंग होता है समझ गए ना ही जो राइट्स मिलते हैं वह लेबर लाज के अकॉर्डिंग मिलते हैं तो इस वजह से कंपनीज ज्यादा ना वर्कर्स को कांट्रेक्चुअल बेसिस पर हायर करना पसंद करती हैं ना कि रेगुलर बेसिस पे इसके बाद राइटर एक केस स्टडी डिस्कस करते हैं गारमेंट इंडस्ट्री की कपड़ा उद्योग अब वैसे देखो इंडिया लेबर में सरप्लस है आपको पता है काम मांगने वाले लोग ज्यादा है डिमांड उतनी ज्यादा नहीं है अब देखो इंडिया का गारमेंट इंडस्ट्री में ना एक्सपोर्ट 3. 1 पर था 20 साल पहले और आप मानोगे नहीं आज भी इंडिया का गारमेंट इंडस्ट्री में एक्सपोर्ट इतना ही है 3.
1 पर ही है क्यों चाइना हमसे आगे वियतनाम हमसे आगे क्यों क्योंकि इंडिया गारमेंट इंडस्ट्री में इनोवेशन ही नहीं लेकर आया कुछ वैसा का बस सस्ती लेबर का फायदा उठा रहा है प्रॉफिट बल्कि गवर्मेंट इंडस्ट्री में इंक्रीज हो गया है यह देखो प्रॉफिट कहां पर गया यह रहा प्रॉफिट 201920 में 31. 6 पर था जो 202122 में बढ़ के 464 पर हो गया लेकिन बावजूद इसके एक्सपोर्ट नहीं बढ़ पाया क्यों नहीं बढ़ पाया जो मैंने आपको बताया कोई इनोवेशन नहीं वर्कर्स के वेजेस उतने ज्यादा नहीं बढ़े वर्क वर्कर्स की जो वर्किंग कंडीशंस हैं उतनी ही खराब हैं आज ना आप आईटी कंपनीज देख लीजिए हमारे देश की जो यह बड़ी आईटी कंपनीज है ना जैसे टीसीएस है इनोसिस है अब देखो कहने को यह कंपनी बहुत बड़ी हैं बट एक चीज आप भी मानोगे यह कंपनी जो है कोई बहुत बड़ी इनोवेशन नहीं लेकर आ रही हैं यह आज भी उसी कांसेप्ट पर चल रही है कि इंडिया में लेबर सस्ती है जैसे सिंपल कोडिंग वगैरह है या फिर जो कोड लिखा गया है उसकी टेस्टिंग है अब फॉरेन कंट्रीज में इस प्रकार के कोड लिखना बहुत महंगा होता है तो ना जैसे यूके की सरकार है या फिर यूएस की बड़ी कंपनीज हैं या फिर सरकार है वो छोटे-मोटे मैनुअल काम को ना टीसीएस और फोसिस जैसी कंपनीज को आउटसोर्स कर देते हैं तो ये काम कर रही हैं टीसीएस और फोसिस जैसी कंपनीज ये वो काम नहीं कर रही है जो माइक्रोसॉफ्ट कर रहा है या फिर मेटा कर रहा है इनोवेशन पर ध्यान नहीं दे रही है बस यूं है कि इंडिया में सस्ती लेबर है उसका फायदा उठा लिया जाए बट देखो वर्कर्स लंबी ड्यूरेशन तक काम करते हैं ना उसका एक बड़ा नेगेटिव इंपैक्ट होता है वर्कर्स की प्रोडक्टिविटी गिरने लगती है एक समय के बाद में बल्कि आउटपुट और ज्यादा कम आती है अब मैं आपको एक और इंटरेस्टिंग आंकड़ा बताता हूं देखो ऑलमोस्ट 1415 साल हो गए शुरुआत में कॉलेज में ना मेरी प्लेसमेंट हुई थी टीसीएस कंपनी में शुरुआत में पैकेज था 3. 1 का इतना ही था 31000 के आसपास आज आप किसी ना टीसीएस के न्यू जॉइनी से पूछेगा पैकेज कितना है ऑलमोस्ट उतना ही मिलेगा आपको न्यू जॉइनी का पैकेज बढ़ा ही नहीं है पिछले 1415 सालों में इन कंपनीज ने पैकेज ही नहीं बढ़ाया है बढ़ा होगा तो नाम मात्र का 3.
5 कर दिया होगा 3. 6 कर दिया होगा मतलब यह तो बल्कि कुछ महीनों पहले काफी सुर्खियों में भी आया था कि इंफोसिस का न्यू जॉइनी का पैकेज जो है वो बिल्कुल फिक्स्ड है पिछले 15 सालों से जबकि देखो इंफ्लेशन आ जाती है हर साल 5 पर के आसपास तो तो राइटर बोलते हैं आप वर्कर्स को लो वेजेस दोगे ना लो वर्क लो वेजेस दोगे तो फिर इकॉनमी में कंजप्शन कैसे बढ़ेगा डिमांड कैसे बढ़ेगी और डिमांड नहीं बढ़ेगी तो फिर कम एक कंट्री जो है वह ग्रो कैसे करेगी तो यह पूरा आर्टिकल हमने डिस्कस किया मेन मेन पॉइंट्स जो निकल के आते हैं सस्ती लेबर का फायदा आप अनलिमिटेड टाइम तक नहीं उठा सकते आपको इनोवेशन और बेटर मैनेजमेंट प्रैक्टिसेस पर फोकस करना होगा वर्कर्स के वेजेस को इंक्रीज करने पर फ फोकस करना होगा तभी देश को फायदा होगा अदर वाइज नहीं होगा तो यह पूरा आर्टिकल हमने डिस्कस किया चलते हैं आगे इसके बाद नेक्स्ट आर्टिकल देखो रैगिंग से संबंधित है बहुत सेंसिटिव टॉपिक है आप सिलेबस में जीएस पेपर सेकंड के इस टॉपिक से आर्टिकल को रिलेट कर सकते हो देखो कुछ एक्सपर्ट्स ना रैगिंग को जस्टिफाई करने लगते हैं वह यह बोलते हैं कि ना रैगिंग से सीनियर्स का ना इंटरेक्शन होता है जूनियर्स के साथ में रैगिंग के माध्यम से सीनियर्स जो हैं जूनियर्स को गाइड कर देते हैं दोनों के बीच में बोलचाल स्टार्ट हो जाती है सीनियर्स बता देते हैं जूनियर्स को कि कॉलेज के क्या कस्टम्स हैं क्या प्रैक्टिसेस हैं और कौन-कौन सी फैसिलिटी हैं आप कैसे यूज कर सकते हो तो रैगिंग के माध्यम से ना एक कोहेसिव कम्युनिटी बनती है कॉलेज में हायर एजुकेशन संस्थान में और यह कम्युनिटी जो है वह सभी स्टूडेंट्स के लिए एक्सपोर्ट का काम कर करती है बट देखो इस आर्टिकल में यह बोला गया है आजकल देखो रैगिंग की वजह से हो क्या रहा है जूनियर स्टूडेंट्स को डराया जाता है उनको धमकाया जाता है उनको बुली किया जाता है उनको हमिलिएट किया जाता है कई बार उनके अपीयरेंस का मजाक उड़ाया जाता है काफी बार उनकी कम्युनिकेशन स्किल्स का मजाक उड़ाया जाता है काफी बार उनकी आइडेंटिटी का जैसे कास्ट का इन सब चीजों का मजाक उड़ाया जाता है तो रैगिंग आज के समय में ना एक स्टिव कम्युनिटी नहीं बनाता बल्कि जूनियर स्टूडेंट्स के हरासमेंट का एक टूल बनक रह गया है रैगिंग हाल फिलहाल में देखो कुछ ऐसे केसेस रैगिंग से संबंधित सामने आए हैं जिससे बल्कि देखो सीनियर स्टूडेंट्स की ना क्रिमिनल इंटेंट का पता लगता है वह नुकसान पहुंचाना चाहते थे जूनियर स्टूडेंट्स को ना कि इंटरेक्शन करना चाहते थे इंट्रोडक्शन करना चाहते थे जैसे कुछ केसेस का जिक्र किया जाता है केरला में हालही में कोटाया नर्सिंग कॉलेज और करियावटम में रैगिंग के इंसीडेंट सामने आए जिसमें जूनियर छात्र की मौत भी हुई इसके अलावा देखो 2001 में 2001 में अगर आपको याद हो तो जादवपुर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट की एक डेथ हो गई थी जिसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस इंसिडेंट के बाद में एंटी रैगिंग गाइडलाइंस इशू की थी विश्व जागृति मिशन केस में तो इस केस का जिक्र आप जरूर कीजिएगा लेकिन देखो 2001 के जादवपुर इंसिडेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विश्व जागृति मिशन में गाइडलाइंस तो इशू की रैगिंग के अगेंस्ट लेकिन फिर 2009 के आसपास एक और केस सामने आया अमन काचर का अमन काचर का जो केस था जहां तक मुझे याद है यह हिमाचल प्रदेश का केस था और इस केस में भी स्टूडेंट की डेथ हो गई थी तो उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिर से आठ सालों बाद एक कमेटी बनाई राघवन कमेटी राघवन कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी ने 2000 न में एंटी रैगिंग रेगुलेशंस जारी की थी फिर देखो इसके बाद में 2022 में भी एक केस सामने आया था आईआईटी खड़कपुर में उस समय केस था फैजान अहमद का फैजान अहमद का केस था य तो रिसेंट था 222 का केस था पहले इस केस को सुसाइड माना गया था और अब देखो एलीड मर्डर बन गया है यह केस तो यह सारे इंसीडेंट्स है दो तीन इंसिडेंट आप जरूर जैसे जादवपुर यूनिवर्सिटी का केस आप याद रखिए अमन काचर का केस आप याद रखिए यह बहुत फेमस केस थे जिसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक्शन लिया और अब एक बार फिर से दुखद केसेस सामने आए हैं केरला से भी तो राइटर बोलते हैं देखो एक चीज साफ है काफी सारे रूल्स रेगुलेशंस बनाए गए हैं रैगिंग को रोकने के लिए बट कहीं ना कहीं वह जो केसेस वो जो रेगुलेशंस है वो जो रूल्स है रैगिंग को रोकने के लिए वह सफल साबित नहीं हो पाए हैं उनका इंफोर्समेंट ठीक से नहीं हो पाया है और उनकी वजह से सीनियर स्टूडेंट्स में डर पैदा नहीं हो पाया है तभी तो आज भी केरला जैसे केसेस सामने आ रहे हैं राइटर बोलते हैं देखो 2012 से 2023 के बीच में 78 स्टूडेंट्स की डेथ हो चुकी है रैगिंग की वजह से हजारों स्टूडेंट्स ऐसे हैं जिनको रैगिंग की वजह से मेंटल और फिजिकल ट्रामा का सामना करना पड़ा समझ गए राइटर अपनी तरफ से कुछ सजेशंस देते हैं राइटर बोलते हैं रैगिंग को रोकना है ना आपको कंपलीटली सिस्टम चेंज करना पड़ेगा जैसे सबसे पहले तीन पॉइंट्स मेन देते हैं राइटर सबसे पहले ना बिहेवियरल असेसमेंट करो यह फर्स्ट पॉइंट है बिहेवियरल असेसमेंट मतलब सीनियर स्टूडेंट्स का ना रेगुलर आपना बिहेवियर मॉनिटर करते रहो और पोटेंशियल थ्रेट्स मतलब ऐसे सीनियर स्टूडेंट्स आपको लगता है कि यह रैगिंग करेंगे नुकसान पहुंचाएंगे जूनियर स्टूडेंट्स को उनको आप पहले से आइडेंटिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग काउंसलिंग एंड मॉनिटरिंग मतलब सीनियर्स को ना मेंटरशिप सिखाई जाए कि आपको ना मेंटर करना है जूनियर स्टूडेंट्स को सीनियर स्टूडेंट्स को ना इंक्लूसिव सिखाई जाए कि सबको साथ लेकर चलना है किसी को तंग नहीं करना अगर सीनियर स्टूडेंट्स का नेगेटिव माइंडसेट है तो काउंसलिंग के माध्यम से उनका माइंडसेट चेंज करके पॉजिटिव माइंडसेट बनाया जाए अब देखो यह बातें वैसे आपको आइडियल लगेंगी लेकिन जाहिर तौर पे अगर बताया जाएगा इन केसेस के बारे में सीनियर स्टूडेंट्स को थोड़ा तो उनके अंदर संवेदना आएगी तो यह दूसरा पॉइंट है काउंसलिंग एंड मेंटरिंग फिर राइटर देते हैं तीसरा पॉइंट तीसरा पॉइंट क्या है एडवांस एनालिटिक्स एडवांस एनालिटिक्स मतलब जैसे सोशल मीडिया है सोशल मीडिया के माध्यम से ना स्टूडेंट्स की एक्टिविटीज को ट्रैक किया जाए मतलब कौन से स्टूडेंट्स रैगिंग जैसी एक्टिविटीज में ज्यादा संलिप्त है सस्पिशंस एनालिटिक्स के माध्यम से पहले ही आइडेंटिफिकेशन इच्छुक रहे हमेशा उसके अंदर यह भाव होना चाहिए कि हां भाई साथी स्टूडेंट्स की सपोर्ट करना जरूरी है ऐसा इकोसिस्टम कॉलेज में बनाने की आवश्यकता है इसके अलावा रिस्पेक्ट और एंपैथी का कल्चर डेवलप करने की आवश्यकता है फिर राइटर यह बोलते हैं देखो कहीं ना कहीं ना आज रैगिंग के अगेंस्ट हर जगह कंप्लेंट बॉक्स आपको मिल जाएंगे बड़े-बड़े कॉलेजेस में लेकिन फिर भी रैगिंग होती है इसका मतलब कहीं ना कहीं कंप्लेंट वाला सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है तो होना यह चाहिए एक ना टाइम बाउंड न कंप्लेंट बेस सिस्टम होना चाहिए कि अगर कोई जूनियर स्टूडेंट शिकायत करे तो इतने दिनों के अंदर-अंदर कंप्लीट का रेजोल्यूशन होगा और यह पर्सन हैं इनसे आप कांटेक्ट कर सकते हो अगर कंप्लेंट का रेजोल्यूशन ना हो तो ऐसा प्रॉपर सिस्टम होना चाहिए सबके जिम्मेदार जो लोग हैं उनके नंबर्स हो जूनियर स्टूडेंट्स के पास में टाइमलाइन उनको पता हो इतनी टाइमलाइन के अंदर रेजोल्यूशन होगा और यह जो कंप्लेंट बेस सिस्टम है ना पूरा स्ट्रक्चर्ड मैनर में होना चाहिए जैसे सबसे पहले जो फ्रिलेस कंप्लेंट्स है जसे मतलब ऐसे ही कोई टाइम पास के लिए कंप्लेंट कर लिया उनको आइडेंटिफिकेशन है फिर मीडिएट एक्शन इस प्रकार से ना स्ट्रक्चर्ड मैनर में कंप्लेंट बेस सिस्टम होना चाहिए और किस टप पे किसकी जिम्मेदारी होगी पहले से सब कुछ डिफाइन होना चाहिए ऐसा नहीं कि कंप्लेंट आई और उसके बाद में कॉलेज की जो अथॉरिटी है उन्होंने एक्शन लेना स्टार्ट किया डिसाइड करने में टाइम लगा लिया कि कौन जांच करेगा ऐसा नहीं होना चाहिए रैगिंग के लिए देखो पूरी तरह से ना जीरो टोलरेंस पॉलिसी होनी चाहिए और हर एक इंस्टिट्यूशन की अपनी अलग से एंटी रैगिंग स्क्वाड होनी चाहिए तो कुल मिलाकर देखो राइटर ना कंक्लूजन में यही बोलते हैं रैगिंग के खिलाफ ना एक कलेक्टिव एक्शन की जरूरत है सिर्फ कुछ लोगों के एक्शन लेने से काम नहीं चलेगा इंस्टीट्यूशंस के कल्चर को ही बदलने की आवश्यकता है तो यह पूरा आर्टिकल हमने डिस्कस किया चलते हैं आगे इसके बाद नेक्स्ट आर्टिकल देखो ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज से संबंधित है आप सिलेबस में जीएस पेपर थ्री के इस टॉपिक से आर्टिकल को रिलेट कर सकते हो क्या कंटेस्ट है देखो एक नई रिपोर्ट सामने आई है फिकी केपीएमजी की यह देखो यहां पे फिकी केपीएमजी की ये जो नई रिपोर्ट सामने आई है जिसका नाम है ग्लोबल मोबिलिटी ऑफ इंडियन वर्कफोर्स इस रिपोर्ट के अकॉर्डिंग देखो 2030 आते-आते ना दुनिया भर में स्किल्ड वर्कर्स की डिमांड उसकी सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी मतलब वर्कर्स की डिमांड ज्यादा लेकिन सप्लाई कम और एस्टीमेट देखो यह है ऑलमोस्ट 85. 221400 जापान की जीडीपी के [संगीत] बराबर तो क्वेश्चन उठता है इंडिया इस गैप को कैसे फिल कर सकता है यही फोकस किया गया है इस आर्टिकल में देखो शुरुआत में इस आर्टिकल में यह बोला जाता है कि ना दुनिया में अब नई नई टेक्नोलॉजीज आ रही है जैसे एआई है ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी है इंटरनेट ऑफ थिंग्स है अब आज हम 2025 में खड़े हैं लेकिन 2030 आते आते देखो बहुत सारी जॉब्स ना आउटडेटेड हो जाएंगी मतलब एआई और नई नई टेक्नोलॉजी की वजह से वहां पर ह्यूमन बीइंग्स की आवश्यकता ही नहीं होगी तो इंडिया के पास एक बड़ा मौका है क्योंकि इंडिया के पास में ना यंग पॉपुलेशन है उनको अभी हम ट्रेन कर सकते हैं अगर हम अपने यूथ को सही ढंग से ट्रेन करें उनका सही ढंग से इस्तेमाल करें तो दुनिया की ग्लोबल स्किल शॉर्टेज को हम फुलफिल कर सकते हैं एड्रेस कर सकते हैं जो देखने को मिलेगी 230 आते आते जैसे देखो मैं आपको एग्जांपल देता हूं गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल है यहां पर कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्किल्ड वर्कर्स की आवश्यकता होगी 2030 तक यहां पर कंस्ट्रक्शन वगैरह बहुत ज्यादा चलता है ना दुबई में और अबू धाबी में फिर देखो यूरोप है यूरोप में जो पॉपुलेशन है वह एजिंग है मतलब बूढ़ी पॉपुलेशन ज्यादा है तो वहां पर सर्विस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की आवश्यकता होगी जैसे ऑस्ट्रेलिया है ऑस्ट्रेलिया में भी लैंड एरिया ज्यादा है जनता कम है तो वहां पर भी कंस्ट्रक्शन सेक्टर में माइनिंग में हेल्थ केयर सेक्टर में स्किल्ड वर्कर्स की आवश्यकता होगी वैसे देखो सरकार काफी कुछ प्रयास कर रही है कि हमारी जो वर्कफोर्स है वह दूसरे देशों में जाकर काम करें और इसके लिए सरकार क्या कुछ कर रही है जैसे सरकार ना फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स विभिन्न देशों के साथ में साइन कर रही है फॉर एग्जांपल हमने यूएई के साथ में साइन किया तो ऐसे जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स है ना वो हमारे वर्कर्स को और जिस देश के साथ में ये फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन हुआ है मतलब कोई बायलट एग्रीमेंट या फिर दूसरा एग्रीमेंट साइन हुआ है तो उस एग्रीमेंट के माध्यम से ना इंडिया अपने वर्कर्स के राइट्स को प्रोटेक्ट करने की कोशिश करता है तो एक तो स्टेप यह लिया है भारत सरकार ने दूसरा है स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम स्किल इंडिया जैसे जो मिशन है ना यह देखो ग्लोबल मार्केट की जो जरूरत हैं ना उनके हिसाब से ट्रेनिंग प्रोवाइड करता है स्किल इंडिया मिशन अब तीसरे नंबर पे है डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे देखो ई माइग्रेट जैसे जो प्लेटफॉर्म्स है ना वह लीगल और ट्रांसपेरेंट रिक्रूटमेंट इंश्योर करते हैं वर्कर्स का कि वर्कर्स का एक्सप्लोइटेशन ना हो तो यह कुछ स्टेप्स हैं जिनके बारे में आप लिख सकते हो फिर से बता देता हूं ई माइग्रेट सिस्टम सरकार का ट्रांसपेरेंट और लीगल रिक्रूटमेंट को इंश्योर करने के लिए स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स जैसे स्किल इंडिया मिशन ग्लोबल मार्केट के हिसाब से ट्रेनिंग दी जाती है फिर बायलट एग्रीमेंट एंड फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसा इंडिया ने यूएई के साथ में साइन किया इंडियन वर्कर्स के राइट्स को प्रोटेक्ट करने के लिए बट राइटर बोलते हैं यह सब होने के बाद भी ना कुछ चैलेंस हैं चैलेंस जैसे सबसे पहला है रेगुलेटरी और इमीग्रेशन बैरियर्स मैं यहां पर लिखता जाता हूं सबसे पहला चैलेंज क्या है सबसे पहला चैलेंज है रेगुलेटरी एंड इमीग्रेशन बैरियर्स इसमें आप देखो यह लिखोगे बहुत बार ना जैसे यूरोप में जाने के लिए ना वीजा आसानी से नहीं मिलता वर्क परमिट नहीं मिलता तो यह फर्स्ट प्रॉब्लम है फिर दूसरी प्रॉब्लम आती है रिक्रूटमेंट माल प्रैक्टिसेस रिक्रूटमेंट माल प्रैक्टिसेस इसमें आप क्या लिखोगे इसमें देखो आप यह लिखोगे बहुत बार ना जो एजेंट्स होते हैं जैसे अभी आपने देखा कि पंजाब में हरियाणा में बहुत सारे वर्कर्स को ट्रंप ने मिलिट्री प्लेन से वापस भेजा है तो यहां पर ना एजेंट्स ने मूर्ख बना दिया लोगों को कि तुम्हें मैं काम दिलवा आंगा यूएसए में और मूर्ख बनाकर पैसे लेकर उनको भेज दिया तरीके से वो पकड़े गए उनको वापस डिपोर्ट कर दिया गया तो एजेंट्स काफी बार पैसा लूट लेते हैं माल प्रैक्टिसेस है फिर है पॉलिसी एंड स्किल मिसमैच स्किल मिसमैच मतलब देखो जो इंडियन डिग्रीज है ना वो हर जगह एक्सेप्ट नहीं होती है जैसे यूरोप में इंडियन मेडिकल डिग्रीज को कई बार रिकॉग्निशन नहीं मिलता है तो यह है स्किल मिसमैच चौथा है लैंग्वेज एंड कल्चरल बैरियर लैंग्वेज एंड कल्चरल एलएनसी बैरियर तो इसमें क्या होता है देखो हर देश की आपको पता है अलग लैंग्वेज है अलग कल्चर है तो बहुत सारे लोगों को ना उस इकोसिस्टम में उस कल्चर में एडजस्ट करने में दिक्कत आती है वोह लैंग्वेज नहीं बोलनी आती जैसे फ्रांस में डॉक्टर्स की आवश्यकता है अगर हमारे देश से ऐसे डॉक्टर्स वहां पर काम करने जाएं जिनको फ्रेंच चाहती है तो उनके पास में बड़ा एडवांटेज है तो राइटर अपनी तरफ से कुछ सजेशंस देते हैं सजेशंस भी मैं आपको पॉइंट वाइज फॉर्म में बता देता हूं जैसे सबसे पहले ना आप सेक्टर स्पेसिफिक ट्रेनिंग दो सेक्टर स्पेसिफिक ट्रेनिंग मतलब जैसे देखो जिस फॉरेन कंट्री की डिमांड है ना आप उसके हिसाब से वर्कर्स को ट्रेनिंग दो और उसके बाद वहां पे भेजो तो यह पहला पॉइंट है दूसरा है रिक्रूटमेंट रेगुलेशन अभी जैसे इंडिया से वर्कर्स को रिक्रूट करके बाहर भेजा जाता है इस पूरी प्रोसेस को ना आप रेगुलेट करो ताकि भोले भाले लोगों को फंसा के एजेंट उनसे उनका पैसा ना लूट ले और जो लोग ऐसा करते हैं उनके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाए जो अभी पंजाब हरियाणा की सरकारें कर भी रही हैं तीसरा है क्वालिफिकेशन रिकॉग्निशन दूसरे देशों के साथ में ना भारत कोलैबोरेशन कर सकता है जैसे यूरोप के उन देशों के साथ में जहां पे इंडिया की जो मेडिकल डिग्रीज है वो रिकॉग्नाइज नहीं होती तो उन देशों के साथ में इंडिया कोई एग्रीमेंट साइन कर सकता है कोलबेन साइन कर सकता कोलबेन कर सकता है कि इंडियन वर्कर्स की जो क्वालिफिकेशन है ना वहां एक्सेप्ट हो उसे रिकॉग्नाइज किया जाए चौथा पॉइंट आता है पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पीपीपी पीपीपी मतलब प्राइवेट सेक्टर को ट्रेनिंग प्रोग्राम्स में ना इंक्लूड किया जाए उनको ग्राउंड लेवल का ज्यादा पता होता है इसके लिए उनको कुछ इंसेंटिव दिया जा सकता है जैसे टैक्स वगैरह में छूट पांचवा है सर्कुलर माइग्रेशन यह इंपोर्टेंट कांसेप्ट है इसके बारे में यूपीएससी पूछ सकती है सर्कुलर माइग्रेशन क्या होता है सर्कुलर माइग्रेशन मतलब टेंपरेरी वर्क वीजा दिलवाया जाए भारतीय वर्कर्स को ताकि वह कुछ सालों के लिए तो काम करें वहां पर फॉर एग्जांपल 3 साल के लिए 5 साल के लिए लेकिन नई स्किल्स सीखकर वह वापस इंडिया में लौटे और इंडिया को इससे फायदा हो तो यह है सर्कुलर माइग्रेशन का कांसेप्ट लास्ट में देखो राइटर यह बोलते हैं मैं निकाल लेता हूं लास्ट में देखो राइटर यह बोलते हैं देखो इंडिया के पास में ना एडवांटेज है हमारे यहां पर यूथ पॉपुलेशन ज्यादा है और अभी ज्यादा है लेकिन हमेशा ज्यादा नहीं रहेगी बोलते हैं ना कि दो 2060 के बाद में हमारी पॉपुलेशन कम होना स्टार्ट हो जाएगी और डेमोग्राफिक डिविडेंड की जो खिड़की है बहुत जल्दी बंद हो रही है ऑलरेडी टोटल फर्टिलिटी रेट हमारे देश में काफी कम हो चुकी है तो दुनिया भर में वैसे देखो इंडियन वर्कर्स की रेपुटेशन अच्छी है लेकिन हमें ना इलीगल माइग्रेशन को रोकना होगा इससे हमारी इमेज खराब होती है अरविंद पानागढ़ या का यह कहना है कि देखो 2030 तक ना इंडिया की जीडीपी कितनी होगी 2030 आते-आते इंडिया की जीडीपी ना सिक्स 5 ट्रिलियन डॉलर से लेकर 9 ट्रिलियन डॉलर के बीच में होगी इंडिया की जीडीपी और देखो अगर हम ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज का सही ढंग से इस्तेमाल कर सके ना तो हमारी जीडीपी 9 ट्रिलियन डॉलर तक टच कर सकती है लेकिन जो ग्लोबल शॉर्टेज होगी ना टैलेंट का टैलेंट की इस चीज को हमें अच्छे से यूटिलाइज करना होगा तो ये पूरा आर्टिकल हमने डिस्कस किया ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज के बारे में यह लास्ट में अरविंद पना गड़िया वाला पॉइंट है तो यह थी हमारी आज की डिस्कशन लास्ट में जल्दी से मैं आपको बता देता हूं क्या-क्या हमने डिस्कस किया सबसे पहले हमने रैगिंग वाला पॉइंट डिस्कस किया था रैगिंग के इंसीडेंट्स हमने डिस्कस किए थे जादा पुर यूनिवर्सिटी अमन काचर दोनों के बाद में सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइंस इशू की लेकिन अभी तक रैगिंग रुकी नहीं है इसका मतलब यह गाइडलाइंस काम नहीं आ रही है सीधी सी बात है तो तीन पॉइंट्स राइटर देते हैं एक तो देखो राइटर बोलते हैं कि कौन सा पॉइंट था वो वाला बिहेवियरल असेसमेंट वाला सीनियर स्टूडेंट्स का बिहेवियर एसेस होना चाहिए सोशल मीडिया पर उनके एक्टिविटीज को आइडेंटिफिकेशन किए कंप्लेन रेजोल्यूशन सिस्टम सही होना चाहिए अभी क्या है डर नहीं है सीनियर स्टूडेंट्स को क्योंकि टाइम बाउंड कंप्लेंट्स का रेजोल्यूशन होता नहीं है तो सारे चीजें लिखी हुई होनी चाहिए कि इतने समय में हम कंप्लेंट को रिजॉल्व कर देंगे यह लोग जिम्मेदार हैं सब कुछ लिखा हुआ होना चाहिए फिर हमने ये वाला पॉइंट ये वाला आर्टिकल डिस्कस किया था ट्रैप ऑफ लॉन्ग आवर्स वर्सेस इनोवेशन हमारी जो इंडस्ट्रीज है ना अभी भी लॉन्ग ये सस्ती वेजेस पे टिकी हुई है लेकिन जब तक वो इनोवेशन नहीं लाएंगे वो ग्रोथ के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ेंगी लुधियाना वाला एग्जांपल हमने डिस्कस किया था कि वर्कर्स सर्वे हुआ था 1112 घंटे काम करते हैं ऑर्डर्स ज्यादा हो तो ज्यादा भी काम करते हैं अपने लिए उन्हें वक्त ही नहीं मिलता सिर्फ घर से आना जाना और खाना बनाना सिर्फ इन्हीं एक्टिविटीज के लिए टाइम बचता है और टाइम बचता ही नहीं है हमारे देश में अन ऑर्गेनाइज सेक्टर ज्यादा बड़ा है 70 पर वर्कर्स तो अन ऑर्गेनाइज सेक्टर में काम करते हैं छोटी-छोटी फर्म्स में जो बड़ी फर्म्स को माल सप्लाई करती हैं कंपोनेंट सप्लाई करती हैं लेकिन बड़ी फर्म्स इनके साथ में इंजस्टिस करती हैं यह सारे पॉइंट्स हमने डिस्कस किए फिर हमने एक पॉइंट यह भी डिस्कस किया कि हमारे देश में पर आवर पर वीक वर्किंग आवर ज्यादा है यूएसए जापान में नहीं है और चाइना ने ग्रोथ रजिस्टर की एक लेवल के बाद इनोवेशन लाक ना कि सती लेबर की सहायता से सस्ती लेबर आपको डेवलप नहीं बना सकती है गारमेंट इंडस्ट्री की के स्टडी हमने डिस्कस की कि कैसे गारमेंट इंडस्ट्री में इंडिया का एक्सपोर्ट में जो कंट्रीब्यूशन है वोह बढ़ा ही नहीं क्यों क्योंकि हम इनोवेशन नहीं लेक आए फिर यह टैलेंट शॉर्टेज वाला आर्टिकल हमने डिस्कस किया था कि 2030 आते-आते 85.
221400 कर रही है जैसे बायलट एग्रीमेंट्स एंड एफटीटीएस जैसे यूएई के साथ में साइन किया जैसे स्किल इंडिया मिशन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स फॉर एग्जांपल इ माइग्रेट बट अभी भी काफी सारी रुकावटें हैं जैसे वीजा प्रोसेस कई देशों कई सारे देशों के साथ में टफ है और हमारी वर्कर्स की डिग्रीज को रिकॉग्निशन नहीं मिलता कल्चरल बैरियर्स हैं स्किल मिसमैच है यह सब है तो यहां पर सरकार को काम करने की आवश्यकता है अरविंद पानागढ़ याया यह बोलते हैं वैसे देखो 2030 आते-आते हमारे देश की इकॉनमी 6.