हरि [हंसी] [संगीत] ओम भजन किसे कहते हैं जिससे भगवत रस उत्पन्न हो उसे भजन कहते हैं रसन लक्षणं भजन उस भजन में प्रेम की प्रधानता और त्याग की प्रधानता होती है जिससे प्रेम करते उसके प्रति अहो भाव होता है और संसार की आसक्ति का त्याग करने में मर्द बनना पड़ता है मर्द किसे कहते हैं जो विकारों की और आसक्ति को का मर्दन करने में सक्षम हो जाए वह मर्द मर्दन मर्द शिव जी को मर्द कहा क्योंकि काम का मर्दन किया कृष्ण मर्द है राम जी मर्द है ब्रह्मज्ञानी संत मर्द है और संतों का सच्चा शिष्य
भी मर्दों का शिष्य मर्द बन जाता है तो महाराज जो शिव है कृष्ण है राम जी वे मर्द है और ऐसे मर्दों का भगत भी मर्दी लाता है तो कैसे लाए हम तो संसारी है नानक जी कहते हैं गुरु के गृह सेवक जो रहे गुरु के घर गुरु के द्वार गुरु के आश्रम जो मान लो गुरु के गृह सेवक जो रहे गुरु की आज्ञा मन माही सहे गुरु की आज्ञा को मन में उतारे मन में गुरु की आज्ञा का महत्व रखे गुरु के संकेत का महत्व रखे ऐसा नहीं कि गुरु को अपने मन की करवाए
नहीं गुरु के संकेत के अनुसार अपने मन को ढाले तो मर्द हो जाएगा नहीं तो जैसे बच्चे को जिधर घुमाओ घूम जाता है ऐसे हमारा मन मूर्ख बच्चे केना कभी इधर कभी उधर हमको भटका देता है गुरु के गृह सेवक जो रहे गुरु की आज्ञा मन माही सहे आपस को करी कछु न जनावे मैं ऐसा हूं वैसा हूं त्यागी हूं गृहस्ती हूं सावकार हूं माई हूं भाई हूं लाचार हूं ऐसा हूं नहीं मैं प्रभु तेरा हूं गुरु का आपस क करी कछु न जत नावे हरि हरि नाम हदय सद दवे भगवत नाम का ध्यान करें
भगवत नाम के अर्थ का विचार करें और भगवत स्वभाव का भगवत स्वरूप का ज्ञान सुने गुरु से जैसा सुनता है ऐसा सोचता है और जैसा सोचता है ऐसी वृत्ति बनती है तो नश्वर राग की द्वेष की मेरी की तेरी की उसका नाक ऐसा है उसकी आंख ऐसी उसका मकान ऐसा है उसका सोफा ऐसा है ये तुच्छ चीजें भर भर के तुच्छ मगज ना करें लेकिन भगवान आनंद स्वरूप है भगवान ज्ञान स्वरूप है भगवान चैतन्य स्वरूप है और भगवान शाश्वत भगवत सत्ता का जन्म नहीं होता भगवान की मृत्यु नहीं होती और वह भगवान हमारा आत्मा होकर
बैठा है तो हमारा भी जन्म नहीं होता शरीर का जन्म होता है शरीर की मृत्यु होती है मन की वृत्तियां बदलती लेकिन आत्मा भगवान उनको जानने वाला है उनको जानने वाला है वह अभी कह रहे हैं लेकिन जब गुरु की आज्ञा के अनुसार मर्द बनेंगे तो पता चलेगा कि उनको जानने वाला वह भगवान मुझसे अलग नहीं और मैं उससे अलग नहीं वो थिन मुझसे दूर ना मैं उनसे दूर था आता ना था नजर तो नजर का कसूर था गुरु रूपी मर्द की ज्ञान धारा से हमारी आंख खुली समझ खुली गौरांग से प्रश्न किया गया चैतन्य
महाप्रभु से कि गृहस्थ लोग इतना सेवा पूजा जप तप करते फिर भी प्रभु रस का निश्चित रूप से साक्षात्कार क्यों नहीं कर पाते बोले थोड़ा बहुत करते हैं और बाद में फिर विकारी जीवन में ब जाते हैं और मन के कहने में तो फिर नष्ट कर देते फिर थोड़ा कुछ करते फिर इसी विकारों में मन मुक्ता में अपनी क्षमताएं खो देते हैं गुरु के ग्रही सेवक रहे गुरु की आज्ञा मन मही सहे आपस क करि कछु न जनावे हरि हर नाम हृदय सत्यावे मन बैचे सतगुरु के पास तिस सेवक के कारज रास सतगुरु के ज्ञान
में सतगुरु की निष्ठा में सतगुरु के देवी कार्य में सतगुरु के सतगुरु तत्व मन को मिलाता जाए बेचता जाए मन सतगुरु के पासी तिस सेवक के कारज राश मन उनको सौंप देंगे तो अपनी चिंता और अहं नहीं रहेगी तो विश्रांति मिलेगी मन को और मन की विश्रांति सामर्थ्य लाएगी आलस्य में और विश्रांति में क्या फर्क है आलस्य में व्यक्ति वस्तु और परिस्थिति का चिंतन करता है या तो फिर निद्रा में डूब जाता आलसी पराधीन हो जाता है और विश्रांति वाला स्व के आधीन हो जाता है स्व के सुख में जगता है आलसी पतन के तरफ
जाता है और विश्रांति वाला परमात्मा सुख के तरफ जाता है चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है प्रभु सामर्थ्य की जननी है शुभ संकल्प सामर्थ्य की जननी तो अगर भगवान को या भगवत प्राप्त गुरु को मन अर्पण किया तो मन की उधेड़ बूंद कम होती जाएगी और विश्रांति मिलेगी तो विश्रांति साधना का एकदम सार में सार सोपान है आप ध्यान भजन करो उसके पहले आप कोई काम करो उसके पहले काम पूरा करो उसके पहले क्या होता है विश्रांति होती है लेकिन वो विश्रांति आलस्य रूप जाती कल्पना रूप हो जाती है नहीं अब व विश्रांति समर्पण
रूप हो जाए प्रेमा भक्ति रूप हो जाए तो चित्त में विश्रांति आएगी विश्रांति से शरीर का तो थकान और तनाव मिटेगा मन की थकान और तनाव भी मिटेगा और भावनाओं की थकान और तनाव भी मिटने लगेगा उस विश्रांति में प्रवेश पाने के लिए आप ईश्वर को अपना माने और ईश्वर को सर्व समर्थ माने ईश्वर को परम सुहृद माने और ईश्वर को शाश्वत माने और ईश्वर को लोक लोका में ना माने और कभी कबार मिलेंगे नहीं मेरा मन विश्रांति हुआ तो ईश्वर में तो होगा और कहां होगा विश्रांति कहां मिलेगी बिनु हरि पद की जर्नी न
जाई इस जीवात्मा की दौड़ भाग इस जीवात्मा की तपन बिनु रघुवीर पद उस भगवत पद में विश्रांति पाए बिना य जीव की तपन और दौड़ भाग नहीं मिट सकती इसीलिए चित्त की विश्रांति की एक सुंदर साधना सीख लो एक सुंदर उपाय सीख लो कर करा के फिर छोड़ दो कुछ नहीं कर करना है बस में तेरा तू मेरा जैसे जहाज में बस में गाड़ी में बैठते हैं फिर वहां दौड़ना धूप नहीं है खाली कुछ नहीं करना है अपने आप मुसाफ होती है ऐसे ही साधन भजन की जगह पर बैठे थोड़ा बहुत कर करा के बाहर
की दौड़ धूप आप धापी से थोड़ा मन शांत हुआ फिर कुछ नहीं करना है शांति स्वास गिनते गिनते मन शांति पाए विश्रा श अगर नींद आती है अथवा थकान होती तो शरीर को खींचे ढीला छोड़े नींद आए तो गहरा श्वास लेकर थोड़ा भगवत उच्चारण जोर से करें फिर विश्रांति सुबह यह अभ्यास बढ़ाता जाए विश्रांति का नींद ना आ पाए उसका ध्यान रखें दोपहर को ये अभ्यास करें और शाम को या रात को लेटे लेटे कर और नींद आ जाए तो कोई हरकत नहीं इस विश्रांति को प्रसाद कहा गया है श्री कृष्ण ने कहा प्रसादे सर्व
दुखा नाम हानि रस्य प जायते प्रसन्न चेत सोयास बुद्धि परिवश इस विश्रांति से जो सुख मिलेगा जो समझ मिलेगी जो पुण्य मिलेगा यज्ञ करता भले यज्ञ करते रहे तप वाले भले तप करें संसार के आपाधापी से सुखी होने वाले भले संसार के पीछे भागते रहे लेकिन संसार तुम्हारे पीछे भागने को राजी हो जाएगा यज्ञ का फल तुम्हारी सेवा में लगने को मौका खोजे तप का फल तुम्हारे को खोजने के लिए तैयार रहेगा आप ऐसी जगह पर आसानी से पहुंच सकते हैं ये जेट युग है ये जमाना तेज जमाना है ऐसा साधन ऐसा उपाय हो कि
मन को जल्दी परमात्मा के रस का थोड़ा सा चस्का लग जाए लोग बोलते हमारा मन ऐसा है हमारा चित ऐसा है हमारा चित स्थिर नहीं रहता हमारा चित ठहरता नहीं अरे यह उसका सदगुण है दुर्गुण नहीं है भैया चित्त ठहरता नहीं यह उसका सद्गुण है आप अनर्थ ना करो इसके साथ अगर ठहर जाए तो प्रगति कैसे करेगा चित चैतन्य से उभरा है तुम कहां कहां चित्त को ठहरा होगे कहीं नहीं ठहरेगा वो तो भागेगा भागेगा जब उसकी मूल जग आएगी तभी ठहरेगा मेरा मन कहीं लगता नहीं सत्संग सुनता हूं उसके बाद इधर मन मेरा कहीं
लगता नहीं मेरा चित कहीं लगता नहीं अब चित्त कहां लगे चित है चैतन्य की धारा क्या जड़ में रहेगा विजातीय संबंध में कब तक रहेगा सूरज और एक रा रात और अंधेरा अंधेरा और प्रकाश कब तक रहेगा सज्जनता और दुर्जन कब तक साथ में रहेगी अपनी अपनी प्रकृति अपने अपने परमाणु अपने विचार का तो पराया भी मित्र हो जाता है और अपने विचारों से विरुद्ध है तो अपना भाई भी अपने को अच्छा नहीं लगता तो अपने विचार जो चैतन्य से चित उपरा है वह एक जगह ठहरेगा कैसे बिनु रघुवीर पद जी की जर्नी न जाए
चित का न ठहरना यह दोष नहीं चित का ठहर जाना दोष हां चित अपने चैतन्य में विश्रांति पाएगा फिर विश्रांति पाकर फिर उठेगा तो चैतन्य को एक जगह नहीं फिर सब में उस चैतन्य के रस को निहारे चैतन्य की सत्ता को देखेगा बल्ब अलग है ट्यूबलाइट अलग है एंपलीफायर अलग है तो कैमरा अलग है पंखा अलग है लेकिन सत्ता सब में विद्युत की ऐसे अलग-अलग वस्तुएं अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियां में एक रस सब में सत्ता स्फूर्ति चेतना देने वाला तू ही तू चलो तो चले जरि जरा दरिया देखें दरिया सब लहरियां लहरियों का लाल भी
तू तेरा मकान आला जहां ता बसा है तू चलो तो चले जरा बाजार देखें बाजार में बड़ राहिब बाजार में मिले राहिब राह पर चलने वाले लोग राहिब का रब भी तू तेरा मकान आला जहां त बसा है तू चलो तो चले बाहर जरा देखें आकाश को निहारे आकाश में सब तारे और तारों का चांद भी तू तेरा मकान आला जहां त बसा है तू फिर जहां त कभी आपको अपना प्रिय मित्र मिल जाता है प्रिय वस्तु मिलती है तो कितना आनंद होता है अब जब जहां त आपको प्रिय मिलता रहे प्रिय दिखता तो आनंदमय
हो जाएगा जीवन तो जहां त बसे हुए प्रिय को पहचानने के लिए पहले अपने दिल में प्रिय में विश्रांति पाए विश्रांति वाली उपासना साधना मन को एक बार चस्का लगवा दो लोग बोलते हैं मन हमारा ऐसा है वैसा है वैसा मैं बोलता हूं हजार दोष है हम मानते लेकिन एक ऐसा भारी गुण है कि उन दोषों की तैसी मन को एक बार जच जाए पान मसाला मजा आता है फिर नुकसान कैंसर का नुकसान सह लेगा नालतली का सिगरेट पिएगा पान मसाला खाएगा न करने जैसा काम करेगा उसके मन को जच गया तो मां रोके बाप
रोके कायदा रोके फिर भी गुजरात में छुपके दारू पीते लो क्योंकि उनके मन को जच गया है ऐसे आपके मन को मेरा परमेश्वर का सुख ज जाए एक बार फिर तो है एक बार मन को चस्का लग जाए ठीक से विश्रांति से हरिरस से एक बार मन को जरा थोड़ा सा ठीक से चस्का लग जाए फिर कच्चा चस्का हो ना जैसा कच्चा शराबी तो शराब छोड़ देता है कच्चा भेड़ी भांग छोड़ देता है कच्चा जुआरी जुआ छोड़ देता है और कच्चा पक्का एक आद बार पान मसाला खाते छोड़ देगा लेकिन उसकी थोड़ी आदत बढ़ा दो
तो जैसे भंगड़ा दारू वाला दारू नहीं छोड़ सकता ऐसे प्रभु वाला प्रभु का रस ना छोड़ सके ऐसा भी तो मन बन सकता [प्रशंसा] है न चलती भगवत पदार विंदा लव मर्दम मप सब वणवा ग्रह जो भगवत पद से एक लवलेश निमित्त भी दूर नहीं जाता वह वैष्णव में भक्तों में संतों में सर्वोपरि माना जाता है भगवान कहते मैं संतन के पीछे जाऊं जहां जहां संत से धारे धव मो संत अति प्यारे मौलाना जलालुद्दीन रूमी दुन भी सुखों की तो कमी नहीं थी लेकिन हृदय में कोई प्यास थी चित कहीं ठहरा कई सूफी फकीरों के
हिंदू संतों के और दूसरों के लेख हस्तलिखित लेख पढ़े ये है तो वही अल्लाह का सुख जिसको हिंदू राम कहते हैं वही रोम रोम में रम रहा लेकिन मिले कैसे उसकी खोजबीन करते करते कहीं तो अफगानिस्तान के तो कहीं कहीं के तो कहीं हिंदुस्तान के साधु संतों के पुस्तक कट्ठे करते पढ़ते जो अच्छा लगता उसको अंडरलाइन करते फिर उन्हीं में से संकलन करके एक पुस्तक लिख रहे थे अपना शाही महल था नवाबी ठाट से रहते थे लिखते तो हस्तलिखित अपना पुस्तक की पन्ने कुछ लिखे सहाई खत्म हो गई एक सुबह को स्विमिंग पूल के पास
बैठकर लिख रहे थे अंदर स्याही लेने गए तो समस्त बेज नाम के अपने स्वरूप में विश्रांति पाए हुए संत वहां आ गए और उठाकर हस्तलिखित लिपि पानी के कुंड में फेंक दी जलालुद्दीन रोमी देखता है कि मेरी जीवन की कमाई वाला हस्तलिखित पुस्तक कहां एक अनजान आदमी खड़ा है बोले तुमने लिया क्या उसने भव के इशारे से कहा कि वो पड़ा है पानी में पड़ा है इशारे से पानी में हस्तलिखित अपनी पुस्तक को देखकर व विचलित हो गया और समस्त बश सुनाने लगा तुमने मेरा सर्वनाश कर दिया मैंने जीवन भर जो संचित किया था संकलन
करना चाहता था और आगे फेंक दिया तुम कौन हो कहां से आए मेरा सब कुछ तुमने गवा दिया वो फकीर कूदा विश्रांति में अच्छी गति थी संकल्प किया वो कूदा स्विमिंग पूल में और उठाकर परते दे दी फकीर तो भेगा है लेकिन हस्तलिखित कागज कोरे के कोरे मौलाना जलालुद्दीन रोमी देख रहा ये क्या बात जिस फकीर की कोई समर्थ संत की खोज करता था वो घर बैठे अल्लाह ने भेज दिया चरणों पर गिर पड़ा और फिर उस फकीर का थोड़ा सत्संग थोड़ा साधन सीखकर मौलाना जलालुद्दीन रोमी को अपने चित्त में चैतन्य स्वरूप अल्लाह की परमेश्वर
की मस्ती का एहसास हुआ फिर तो वह लिखा पहले तो इधर उधर से चुराकर किताब बना रहा था अब तो जो बोले वह शास्त्र बन जाए जलालुद्दीन में लिखता है कि इंसान तो अगर पत्थर है तो फकीर के संग में त मणि बन जाएगा हीरा बन जाएगा पारस बन जाएगा अगर तू हीरा या मणि पारस है तो फकीर के संग में तू बेदा हुआ पारस मिल जाएगा और मालिक के गले की माला में तू चमचम चमकेगा 50 वर्ष की तेरी इबाद तों से भी दो क्षण स संतों का मुलाकात और सत्संग तेरे लिए ज्यादा हितकारी
होगा मौलाना जलालुद्दीन रोमी तो अभी कहते हैं लेकिन श्री कृष्ण ने तो 5226 वर्ष पहले कह दिया भागवत में लिखा है 50 वर्ष की निष्कपट भक्ति से भी दो क्ण संत समागम हृदय का अज्ञान मिटा देता है इसलिए हे सत्पुरुष मुझे चरण धोने दो कितनी नम्रता ये महानता की पहचान है नम्रता प्रसन्नता उदारता और समता जो लेना ही लेना जानता है वह संसार में फंसे और जो देना जानता और लेने की परवाह नहीं परमात्मा के रास्ते सफल हो जाएगा उदार व्यक्ति बने फल की इच्छा ना प्रेम पूर्वक कर्म करें यज्ञो दानम तपस चर्या पावना मनिष
यज्ञ करना और यज्ञ ना करो तो जप यज्ञ करो यज्ञ करना दान करना और तप करना यह भगवान की प्रीति के निमित्त करो तो भगवान मिलेंगे और संसार की प्राप्ति के लिए करो तो संसार मिलेगा किया हुआ कर्म व्यर्थ नहीं जाता सतयुग गया तो सत गया त्रेता गया तो तप गया द्वापर गया तो यज्ञ गया दानम केवलम कलि जुगे राजा जनक बड़े दानवीर थे बड़े विचार वान थे और वह भी खोजते थे कोई संत मिल जाए और अष्टावक्र मुनि जब मिले तो राजा जनक उनके चरणों में नतमस्तक होकर कहता यह ब्रह्म विद्या यह विश्रांति परमात्मा
सुख प्राप्ति की ऐसी महिमा है कि काला कलू रंग ठना और सावना सावरा स्वरूप टेढ़ी मेढ़ी टांगे आठ आठ खड़ खा पड़ वाले अष्टावक्र को भी यह विश्रांति परमात्मा ब्रह्म विद्या ने इतना महान बना दिया कि जनक उनके चरणों में दंडवत प्रणाम करता है और जनक कह 12 वर्ष के अष्टावक्र को विशाल राज्य विशाल धन विशाल काय का धनी नन्य मुन्ने आत्म रामी अष्टावक्र को 12 वर्ष के अष्टावक्र को दंडवत प्रणाम करके कहता है कि कथम ज्ञानम मापन द अपने परमेश्वरी स्वभाव का जहां से चत उठता है जहां से जगत को सत्ता स्फूर्ति और चेतना
मिलती है जहां से कर्म का करने का सामर्थ्य मिलता है जहां से कर्म की प्रेरणा मिलती है जहां से कर्म की साक्षी तोव की खबरें आती है और जहां कर्म का निर्वाह होता है और जो कर्म के फल का दाता है वह हमारे साथ हमारे पास छुपा है उसका हमें ज्ञान नहीं हम बाहर भटक रहे हैं वह ज्ञान कैसे मिले कथम ज्ञानम मापन द गुरुवर वो ज्ञान कैसे प्राप्त हो कथम मुक्तिर भविष्यति कैसे मुक्ति होगी जन्म मरण के चक्रों से और संसार के सभी दुखों से मुक्त कब होंगे कैसे होंगे यह बताने की कृपा करो
वैराग्यं च कथम प्राप्त में वैराग्य इंद्रियों के विषयों में संसारी तुच्छ चीजों में जीवन खत्म हो रहा है उनसे वैराग्य कब प्राप्त होगा त बहि मम प्रभु हे प्रभु हे गुरुवर आप य मुझे कहो हे स्वामी कैसे पुरुष ज्ञान को प्राप्त होता है और मुक्ति कैसे होगी वैराग्य कैसे प्राप्त होगा मुझसे कृपा करके बताइए तब मुनि सार्दुल अष्टावक्र कहते हैं मुक्ति मिसी चेता विषन विषव तज क्षमा आर्ज दया सोच सत्यम प्यूष भदम बजा हे प्रिय जनक यदि तू मुक्ति चाहता है तो विषय विकारों को विष जहर किनाई तक त्याग दे और क्षमा आर्जव सरलता दया
सत्य के अमृत को तू पिया कर सदा सेवन कर सत्य स्वरूप में विश्रांति पी खा जरा जरा बात में तू बदला लेने को करेगा तो ग्रहस्ती को तो दया रखनी पड़ती सहिष्णु होना पड़ता राजा को तो विशेष इसने ऐसा करा उसने ऐसा करा तो फिर तो चित उधर ही जाएगा उससे मन को हटाना है तो यह सदगुण भरो तो इधर उधर की भागदौड़ कम हो तो विषय देखेंगे नहीं क्या खाए नहीं सघे नहीं सुने नहीं स्पर्श नहीं करें हां विषय का एक होता है धेय त्याग दूसरा होता है नेह त्याग एकदम नहीं लेना यह धेय
त्याग है और आसक्ति बिना इसका उपयोग करना यह नय त्याग है भोजन तो करो स्वास्थ्य के लिए करो मजा के लिए दो ग्रास ज्यादा मत ठोको कपड़े पहनो अंग रक्षा के लिए पहनो कपड़ों से मजा लेने की बेवकूफी छोड़ो हमने यहां आकर तिलक लगाया चंदन का कहते हैं साधु का श्रृंगार है परंपरागत हम पहले ऐसे चंदन लगाते थे लेकिन खोजा कि साधुओ का श्रृंगार संत जब वक्ता की गदी पर आए और वो ललाट प चंदन लगाते इसके पीछे ऋषियों का रहस्य होगा और मुझे पता चला कि बोलने से प्राण शक्ति ऊपर को आती वायु प्रकोप
होने की संभावना होती और गर्मी भी होती तो चंदन शीतल है और चंदन में केसर मिला होता है व परम वायु नाशक है तो श्रृंगार का श्रृंगार और मस्तिष्क में ज्ञान तंतु की सुरक्षा की सुरक्षा दाढ़ी की दाढ़ी और बाबा का बाबा और तीसरे नेत्र पर ऊर्जा काम करती है अच्छा बोलने की कला में वृद्धि होती ऊंची बातें ले आने में उस तीसरे नेत्र को काम मिल जाता मदद मिल जाती फिर हम करने लग गए कैसी खोज चंदन का तिलक करने में कैसी खोज फिर बीच में लाल टिक्का करते तो वह पॉइंट है मेन पॉइंट
इधर उधर ज्ञान तंतु है लेकिन मुख्य उस पर भी वृत्ति जाए वक्ता की तो जाए लेकिन श्रोता वक्ता को बारबार देख रहा है तो श्रोता को भीय संस्कार मिले और आसानी से प्रजा का तीसरा नेत्र अर्थात समझदारी बढ़ती जाए नश्वर विषयों को विश्वत छोड़ने का सामर्थ्य बढ़ता जाए और शाश्वत अमृत को पीने की क्षमताएं निखरती जाए इसलिए सारे कर्म किए जाते [प्रशंसा] हैं परमात्मा प्रेम का एक बार ठीक से रस मिल जाए उसका उपाय क्या है अपनी आस्था को परमात्मने दे जाए श्रद्धा को दृढ़ बनाते जाए विश्वास को श्रद्धा के बिना धर्म लाभ नहीं होता
और विश्वास के बिना सिद्धि नहीं मलती श्रद्धा में और विश्वास में क्या फर्क है शत धा सत्य के तरफ धाने की चलने की जो रुचि प्रीति अथवा व्यवस्था है उसे श्रद्धा कहते हैं और विश्वास निश्वास हो गया आदमी मुर्दा ऐसे ही एक बार ठान लिया ऐसा पाना है करना है तो करना है यह हो गया विश्वास श्रद्धा में श्रद्ध की प्रधानता होती है हमारे भगवान ऐसे हैं हमारे गुरु ऐसे हैं ऐसे हैं ऐसे वो श्रद्धा तो बदलती जाती लेकिन श्रद्धा परिपक्व होकर जब विश्वास का रूप ले लेती है तो चाहे भगवान हमारे कैसे हो त्रिलोकी
नाथ हो कि गैया चराने वाले हो लेकिन गोपियों की श्रद्धा ने विश्वास का रूप ले लिया हमारे गुरु के लिए चाहे कोई कुछ भी बको मेरे गुरु कलाल खाने जाए तुम तो बोलते हो कि तुम्हारे गुरु फलानी माई के घर रात को ठहरे थे और राम कृष्ण तुम ऐसे गुरु के चेले क्यों बने जब जगदंबा माता से तुम बात कर सकते हो राम कृष्ण ने कहा तुम मेरे गुरु के लिए कुछ भी बको ग तो मैं बूंगा नहीं बूंगा शब्द मेरा मिलाया हुआ है राम कृष्ण ने कहा कि मेरे गुरु कलाल खाने जाए तो भी
मेरे लिए मेरे गुरु नंदराय है तुम कुछ भी उनके लिए कहो यह विश्वास है श्रद्धा ने विश्वास का रूप लिया श्रद्धा बिना धर्म ना होई है तो थोड़े से दाने चावल के लेकिन श्रद्धा से आप अर्पण करते हैं है तो हवन की सामग्री थोड़ी सी है तो चीज वस्तु रुपया पैसा नश्वर है हाथ का मैल लेकिन श्रद्धा भक्ति से आप किसी को अर्पित करते विशेष लाभ होता यश के लिए अर्पण करते तो राजसी लाभ होता है सत पात्र को अर्पित करते तो सात्विक लाभ होता है बिना धर्म न हुई और विश्वास के बिना सिद्धि नहीं
मिलती और आत्मीयता के बिना परमात्मा प्रेम नहीं उभरता तो भगवान को अपना माने सर्व समर्थ माने हितेश माने परम सुहृद माने और भगवान से बढ़कर संसार या संसार की चीज को महत्त्वपूर्ण ना माने सर्वोपरि है भग सुख सर्वोपरि है भगवत ज्ञान सर्वोपरि है भगवत आनंद सर्वोपरि है मेरे भगवान और मेरे गुरुदेव महाराज जो जो आत्मीयता बढ़ेगी त्यों त्यों प्रेम बढ़ेगा प्रेम पूर्वक की हुई भक्ति आपके बुद्धि में योग भर देगी ददा बुद्धि योगम तम यन माम उपया ते उन्हें मैं बुद्धि योग दे देता हूं जो मेरी प्रीति पूर्वक उपासना भक्ति करते हर व्यक्ति परम स्वाधीनता
चाहता है और स्वाधीनता सबका जन्म सिद्ध अधिकार है और मांग है कोई भी पराधीनता नहीं चाहता पिंजरे में पक्षी अनजाने गलती से आ जाए पिंजरा बंद करो खाना पीना और सुविधाओं को तु समझता पंख भड़काता है बाहर निकलने को फिर धीरे-धीरे रहते रहते लघु ग्रंथि में बंद जाता है उसका मन फिर भले पिंजरे में सड़ जाए पड़ जाए जीवन पूरा लेकिन शुरू शुरू में तो उसकी स्वाधीनता छटपटा आती सब स्वाधीनता चाहते हैं लेकिन स्वाधीन कौन बन सकता है स्वाधीन वही बन सकता है जो उदार है दे तो दे न लेने की इच्छा ना रखे स्वाधीन
होता जाएगा वह प्रेमी होता जाएगा स्वाधीन होने में और प्रेमी होने में जो लाभ मिलता है जो विश्रांति मिलती है उस कि बराबरी संकीर्ण और स्वार्थी होने वाला तो खोता है जो जो उदार बनेगा त्यों त्यों बहुतों के काम आएगा जो बहुतों के काम आएगा त्यों त्यों बहुत प्रकृतिक सामर्थ्य योग्यता उसके पास आता जाएगा तुम जितने जितने उदार बनते हो जितना जितने परोपकारी बनते हो उतनी उतनी तुम्हारी योग्यता निखरती है और तुम्हारे पास प्राकृतिक ऐश्वर्य ईश्वरी सत्ता के विधान है जैसे दीपक जलता है प्रकाश देता है तो उसे ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती वातावरण से मिलती
रहती जहां तपता है वहां से हवा उठ जाती तो दूस हवा आकर ताजी हवा वहां जगह भर लेती है ऐसे आप जो जो बहुजन हिता है बहुजन सुखाय ईश्वर के देवी कार्य करते रहोगे और उदार बनते रहोगे त्यों त्यों आपकी क्षमताएं और योग्यताएं और बुद्धि योग की रसधार और प्रेरणा उन्नत होती रहेगी उदार बनने में प्रेमी बनने में स्वाधीन बनने में बाधा क्या है बोले बुराई बाधा बुराई क्या है भूल बाधा है भूल क्या है बापू जी अपना मूल्य नहीं जानते और तुच्छ के मूल्य में अपने आप को फेंक देते हैं यह है भूल अपना
मूल्य बाबा जी क्या है आपका मूल्य धरती की कोई चीज तो क्या 14 ब्रह्मांड की चीज मिलाकर आपके मूल्य की बराबरी नहीं कर सकते ऐसे आप अनमोल हो और यह हार्ड मास का शरीर और आप जो अपनी चीजें मानकर बड़े बनते हो वह बहुत तुच्छ चीज है जो धन से अपने को बड़ा मानता है तो उसने अपना मूल्य खो दिया धन का मूल्य बढ़ गया अब धन है तो सेठ धनवान धन चला गया तो तुच्छ हो गया कोठी वाला तो कोठी के कारण अपने को बड़ा मानता है धन के कारण अपने को बड़ा मानता है
यश के कारण अपने को बड़ा मानता है गहने गांठों के कारण तू अपने को सुंदर मानती है हार्ड मास के चमड़े के कारण तू अपने को सुंदर मानती है नहीं तू तो देवी ऐसी सुंदर है ऐसी सुंदर है ऐसी सुंदर है कि सारे दुनिया के सौंदर्य जहां से आता है तू ऐसी अमर आत्मा परमात्मा की सनातन सुंदरी स्वरूपा है तू हाड मास के सौंदर्य को मूल्य दे दिया और अपना सौंदर्य भूल गए नश्वर धन को मूल्य दे दिया अपना मूल्य भूल गए इसका नाम है भूल भूल जभी आपन तभी होया खराब गुरुवाणी कहती ल ज
भी आपन तो अपने उस शाश्वत विश्रांति के सुख को भूला जीव तब तू खराब हुआ ये मिल जाए तो सुखी वो मिल जा तो आलसी में और विश्रांति वाले में यह फर्क है आलसी आदमी को वस्तु की व्यक्ति की परिस्थिति की गुलामी बढ़ती जाएगी और जो परमात्मा वि शांति पाएगा वह बाहर से भले ही शांत बैठा होगा कुछ ज्यादा प्रवृत्ति ना करता हो अपने लिए ना करता हो थोड़ा बहुत समाज के लिए करके वि शांति पाता हो तो वह स्वाधीन हो जाएगा उसे किसी व्यक्ति की वस्तु की परिस्थिति की गुलामी नहीं रहेगी वो ऐसे ही
सुखी रहेगा और जो ऐसे ही सुखी रहता है उसको देखकर सुखी हो जाते उसको सुनकर लोग सुखी हो जाते उससे मिलकर लोग सुखी हो जाते ऐसा आपके अंदर छुपा है अष्टावक्र के अंदर छुपा था आपके अंदर भी छुपा है उन्होंने उभारा लीलाशाह बापू ने उभारा साई टेराम ने उभारा सिंध देश में एक संत हो गए टेराम का नाम सिंधी भाई सभी उनका नाम जानते हैं और उनके पास हिंदू तो आते थे और मुसलमान भी उनकी प्रेमा भक्ति के रंग से अपने को रंगने में हिम्मत कर लेते थे रमजान नाम का एक मुसलमान लड़का उनका बड़ा
भगत बन गया बोले गुरु जी आप हमें मंत्र दीजिए गुरु ने कहा मैं मंत्र दूंगा और साधना बताऊंगा तो तेरे यह जो साथी हैं और मुल्ला मौलवी इनको बहका तेरे को मार पीट छोरा तू बोले कुछ भी हो जाए बाबा महाराज ने तो मंत्र दे दिया मंत्र से उसे जो शांति भजन का रस लगा व तो मौज में आ गया घर वालों को पता चला और मुल्ला मौलवियों को पता चला उसकी बराबर घुटाई पिटाई हुई रमजान की कमरा बंद कर दिया खाना पीना देते हैं और बंद कमरे में बस धमकी देते कि अभी भी सुधर
जा कलमा पढ और मैं हिंदू संत को छोड़ता हूं फिर से अल्लाह को मानता हूं इस्लाम को मानता हूं बोले किसको छोड़ना किसको पकड़ना अपने को जानना है ऐसा गुरु ने कहा है मैं हिंदू भी नहीं बना और मुसलमान भी अपने को क्यों मानू मैं तो भगवान का भगवान मेरे में तो अल्लाह का अल्लाह मेरे है रमजान के बच्चे डांटते फटकार से धक्का मार के कमरे में डाल देते तीन दिन तक कमरे में बेचारा पड़ा रहा अंधेरी कोठी में खाना मिलता रोज बाहर निकालते थोड़ी देर समझाते खाने को देते फिर पूर देते तीन दिन के
बाद बोले बोल अब तू सुधर जा बोले आपकी तो बड़ी रहमत हुई कि तीन दिन में विश्रांति में चला गया अल्लाह ताला राम के रस में खोया रहा आप तो मुझे एक महीना तक पूर दोने रमजान कहता है कि मुझे एक महीने तक आप पूर दो कोटी में राम तीर्थ गाते थे भला होया मैं मेरा चरखा टूटिया जिंद सभा छुट्टी गहने गवाए हुई बेफिक्री बाह रही ना बुट्टी सालू सल चल गए सारे जिंद सभा छुट्टी भला होया मेरा चरखा टूटया अच्छा किया तो आपने तो धकेल दिया कमरे में अच्छा तो भाई और मुल्ला मौलवी और
भड़के और फिर पिटाई गुटाई एक बार वो भाग के साई राम के पास आया के बाबा मेरे को तो खूब मार पट लेकिन अंदर की खुशी और मौज ऐसी बनी रही कि शरीर को तो थोड़ा दुख हुआ लेकिन आपने जो नाम दिया और जो ज्ञान दिया बाबा मैं सुभान अल्लाह मैं कुर्बान जाऊं लेकिन जो उसका होकर निरपेक्ष निर् द्वंद घड़ियां गुजारता है भाई वो तो फिर वो हिंदू नहीं मुसलमान नहीं ईसाई पारसी नहीं वह तो ईश्वर का सनातन स्वरूप और वास्तव में सभी ईश्वर के सनातन स्वरूप है किसी भी जाति का शरीर आकृति हो लेकिन
यह सही साधना और सही ज्ञान मिलने के वजह मत पंथ मजहब और यह सारे धर्म स्थान एक प्रकार की रीत भात परंपरा बस रूटीन बन गया बस ध्यान बाबा जी नहीं लगता ध्यान कैसे लगे ध्यान का मूल मंत्र है प्रेम और प्रेम का मूल मंत्र है अपनापन जिससे अपनापन होता है ना उसके प्रति प्रेम होता है जिसके प्रति प्रेम होता हैना उसका ध्यान होता है मां बेटे के प्रति प्रेम करती गौ वत सला हजार गायों में बच अपनी मां को पहचान लेता और मां अपने बछड़े को पहचान लेती प्रेम तो है ऐसे आपका प्रेम भगवान
और भगवत प्राप्त महापुरुषों के प्रति जितना जितना बढ़ता जाएगा उतना उतना सहज में ध्यान होता जाएगा आंखें बंद करके बैठना ही ध्यान नहीं है जिनके प्रति अहो भाव है इधर उधर मन हाथ पैर और आंखें इधर उधर जाए लेकिन ध्यान किधर है जैसे गर्भिणी स्त्री घर का काम करती रोटी भी बनाती है बच्चों को स्कूल भी भेज रही है इधर फिर भी उसका पेट में जो शिशु है उसकी स्मृति रहती है अपने गर्भ की और संभलकर कदम रखती क्योंकि आठ 10 न 10 महीने के बाद व बालक को जन्म देगी उससे भी ज्यादा साधक को
संभल संभल के कदम रखना चाहिए गर्भिणी तो अपने हाड मास के शिशु को जन्म देगी लेकिन साधक तेरे दिल से तो दिलभर दाता को जन्म देना है तू जरा संसार में सावधानी से रहा इधर उधर की निंदा ना सुन इधर उधर का आकर्षण ना सुन इधर उधर की छोटी मोटी वस्तुओं की स्तुति सुनकर उसके पीछे मन ना लगा हरि ओम तत्सत और सब गप सब कश्मीर बढ़िया है अजी उथे बढ़िया है अजी उथे बढ़िया है वो चीज बढ़िया है बस व्यक्ति और परिस्थिति से सुख लेंगे तो आप आलसी भोगी विषय विकारी वाले बन जाएंगे सुमर
सेवा अवधार समर्पण और प्रभु को अपना मानकर अगर अंद का सुख लेंगे तो आप उदार बन जाएंगे आप ममता रहित बन जाएंगे आप देह अभिमान रहित बन जाएंगे आप पराधीनता के पा से छूट जाएंगे आप उदार बन जाएंगे प्रेमी बन जाएंगे स्वाधीन बन जाएंगे तो वाणी कहती है गुरु के गृह सेवक सेवक जो रहे गुरु की आज्ञा मन माही सहे आपस क करे कछु न जनावे हरि हरि नाम हदे सद त्या वे मन बेचे सतगुरु के पासी तिस से से के कारज राश सेवा करत ई न कामी सेवा तो करे लेकिन मेरा नाम हो मुझे
यह मिले सेवा को कीचड़ में ना डाले सेवा तो करे लेकिन फल की नहीं इच्छा बस सेवा का अपना ही आनंद बहुत है बस हमारी सेवा स्वीकार हो गई ना हमारी सेवा हमें सेवा का मौका मिला इतना पर्याप्त ऐसा मन बनाए सेवा करत ई नहीं कामी होत प्राप्त स्वामी सेवा करे लेकिन निष्काम भाव से करे रुबाब मारने के लिए नहीं दिखावे के लिए नहीं और कुछ संसारी नश्वर चीज के लिए नहीं बस सेवा के बिना विकास नहीं है चाहे आध्यात्मिक हो चाहे संसारी हो लेकिन कुछ ना कुछ त्याग बिना जो कर्म नहीं करता उसका विकास
संभव नहीं जो थोड़ा सा सेवा करके ज्यादा लाभ चाहते हो वो तो नेता छाप सेवा है अ नेता छाप सेवा की कोई विशेष कदर नहीं होती साधक छाप सेवा हो संत छाप सेवा टे राम एक संत के डेरे पर गए एकद दिन आत्माराम नाम के संत थे वहां गए अपने गांव से संत के डेरे पर गए वहां रहे बाजार घूमने गए तंबूरा देखा तंबूरे का मूल्य रप उस समय रप बड़े होते थे कहां से लाना लौट के आ रहे थे एक जगह पर कामकाज हो रहा था मकान चुनाई हो रहा था तो मजदूरों को पैसे
मिल रहे थे तो टेराम ने पूछा कि एक दिन का कितना पैसा देते बोले तुम करो हो ग काम रोज का एक रुपया मिलेगा नहीं तो यह जो ईट है ना यह सारी की सारी यहां बाहर है वो चुनाई की जगह पर ईट ढेर लगा दो बोलो कितने पैसे लोगे बोले र दे देना क्योंकि र का तंबू रहागा बजाऊंगा गीत परमेश्वर का गाऊंगा रस लूंगा और रस बाटूंगी तो सेठों का स्वभाव होता है जरा बारगेन करना अंजू बोले र नहीं र देंगे बोले अच्छा साथ सही लग ग टे उठाने बड़े स्फूर्ति से उत्साह से आधे
दिन में डेढ़ दिन का काम कर डाला फिर दूसरे दिन पूरा दिन किया तीसरे दिन थोड़ा दो दिन में सात मिल गए सेठ बोलता कि भाई तुम तो गजब का काम किया अब रह जाओ तुम्हें रोज एक रुपया मिलेगा चारना फालतू मिलेगा थोड़े दिन एक रुपए में काम करो बोले तीन दिन करूंगा ₹ चाहिए तीन दिन काम किया लेकिन उन तीन दिन में आत्माराम ने बोला जहां ठहरे थे कि तुम सुबह चले जाते हो फिर तुम देर से आते हो तो आश्रम में रहते हो तो आश्रम की सेवा किए बिना आश्रम की वस्तु का उपयोग
करोगे तो सिर पर बोजा चढ़ेगा आश्रम की सेवा लेते हो फायदा लेते हो और सेवा नहीं करते हो तो कैसे रहोगे आश्रम में बोले नहीं आप जो आज्ञा करें आश्रम की सेवा करूंगा ले आश्रम का पानी को से भर भर के बाल दिया आश्रम का टाकी भर लिया करो उस जमाने में पंप बंप या पाइपलाइन की व्यवस्था नहीं रही होगी सुबह 3:00 बजे उठते आश्रम की साफ सफाई और पानी वानी भर के फिर ध्यान में बैठते ध्यान भजन करके सूर्योदय होता और अपना काम पर चले जाते तीन दिन के तीन रुपए मिले फिर तो सेठ
बोले भाई तू सवार ले ले तू मेरे पासना बोले नहीं अब मेरा काम हो गया तो कब आएगा बोले अब देखेंगे मेरा तो हो गया व द रुप का तंबूरा लाए तंबूरा लाए और फिर आश्रम में गए तो उस समय व संत भजन सुन रहे थे तो तबल जी के पास से तमूरा लेकर बैठ गए साई टे राम सिंधी लोगों को मजा आता होगा साईं टेराम के भक्तों को 6 जुलाई 1887x तबल चियों के पास बैठे तो अच्छा कि तुम तंबूरा लाए क्या तुम भी भजन गाते हो बोले हां कभी थोड़ा बहुत गा लेता अच्छा
तो एक हमें सुनाओ तो भजन सुनाते सुनाते हो ज्ञान वैराग्य और आत्म सुख में डूबने के लिए भजन गाते आत्माराम जी तो गदगद हो गए तुम इतना बढ़िया भजन गाते हो एक भजन और सुना दो एक भजन और सुनाया गया जि में संसार की नश्वरता उर रही है और परमात्मा ही सार और शाश्वत है यही मिलन जी वेला रे मानक जन्म हीरो हाथ ना आवे फिर चरा लख फिर आजी फिर तो खुद गाते औरों को झुमा उसी अरसे में रमजान लड़का उनका भक्त बना और भी भक्त बने फिर तो तेव राम संत की संस्था भी
बनी अभी देश विदेश में हजारों लाखों सिंधी भाई साई तेव राम को मानते हैं उनका बाह्य चोला नहीं लेकिन उनके सिद्धांत और सत्संग की व्यवस्थाएं देश भर के सिंधी साई जानते हैं तो चित्त शुद्ध होगा एकाग्र होगा संसार की नश्वरता समझने से और भगवान की महानता समझने से अर्थात जितना वैराग्य होगा जितना विषय तुच्छ लगेंगे और भगवान रस में लगेंगे उतना ही चित्त भगवत रस से विश्रांति पाने में सफल हो जाएगा मुक्ति मिसी तात विषन विश्वत तज क्षमा आर्ज दया तोष सत्यम पियुष वद भया हे प्रिय यदि तू मोक्ष चाहता है तो विषय विकारों को
जहर समझ विष के समान छोड़ दे और क्षमा आर्जव दया सत्य रूपी अमृत का तू सदा सेवन कर तो तेरा मंगल हो जाएगा अष्टावक्र जनक को कहते हैं ते राम भजन के द्वारा भक्तों को कहते हैं और रमजान ने तो उनका फायदा उठाया एक दिन रमजान अपने दूसरे मित्र के साथ तेराम के पास आ गया बोले क्या बात है ये कौन है रमजान ने कहा यह मेरे मित्र है अब कुटुंब हों को हम भारी पड़ने लगे वह बोल बोल के थक गए हमको अपने कहने में चलाने और अपना जैसा जीने में लगाने के लिए लगे
एक तरफ सारी ब्रदर एक तरफ हम अकेला लेकिन महाराज तुमने जो रस दे दिया उस रस स्वरूपने ईश्वर ने अला ने हमारी रक्षा की अब हम उन कुटुं के धन से जागीर से सुख से हमारा कोई लेना देना नहीं हम अलग से मकान झोपड़ा बनाकर रहते थोड़ा बहुत काम कर लेते हैं और मेरा यह मित्र है वह भी मेरी बातों से प्रसन्न हो गया और वह भी भजन गाता है वह आपसे दीक्षा लेना चाहता है उस मित्र को भी दीक्षा मिली और दीक्षा तो वो थी कि सीधा अंतरमुखम अपने आत्मा परमात्मा में विश्वास रखे विश्वास
की बड़ी बलिहारी श्रद्धा विश्वास तक्षशीला पर शत्रु राजा ने घेरा डाल दिया दो शत्रु राजा मिलकर तक्षशीला पर आदम के सेनापति राजा को कहते कि राजन अपनी सेना तो एक राजा से भिड़ने में भी सक्षम नहीं और दो राजाओं की से सेना अपने राज्य की सीमाओं को घेर रही है राजन भागने या मौत के सिवाय कोई विकल्प नहीं किसी महात्मा को पता चला और महात्मा दौड़े दौड़े पहुंचे राजन तुम्हारा सैनिक कायर है तुम्हारा मनोबल तोड़ता है तुम्हारी श्रद्धा तोड़ता है तुम्हारा हौसला बुलंद करने के बदले तुम्हारे हौसले को बेवकूफी के अपनी रंगीन चादर उड़ाना चाहता
है राजन इस सेनापति की बातों में मत आओ एक दो दिन के लिए मुझे सेना पति का पद दे दो मैं आपको यूं जीत के बताऊं वो दोनों तो कपट करके बिना कहे तुम्हारे राज्य की सीमाओ पर आदम के और तुम उनका बुरा नहीं चाहते और वो तुम्हारा बुरा चाहते तो बुराई चाहने वाले का मनोबल और बुद्धि बल इतना नहीं होता जितना भलाई चाहने वाले का होता है राजा भगवान को साक्षी रख के मैं बोलता हूं कि मैं युद्ध तुमको जीत के दूंगा इसमें दो राय नहीं महात्मा का अधिकार पूर्ण वचन सुनकर राजा ने उस
सेनापति को किनारे कर दिया और राजा महाराज को कहा महाराज यह राज्य भी आपका है सेना भी आपकी है मैं भी आपका हूं जैसा आपको ठीक लगे करिए महाराज गए रण भेरी बजाई सैन्य को खड़ा कट्ठा कर दिया उत्साह के दो वचन भर दिए बोले चलो जवानों मेरे साथ लेकिन युद्ध पर पहुंचे उसके पहले मां के मंदिर की तरफ चलो और मेरे पास सिक्का है अगर मां की दुआ मिली तो हमारी फते फते और फतेह और सिक्का उछलते होता है ना बाग और कांटा सीधा और उल्टा अगर सीधा पड़ा तो हमारी सीधी अगर उल्टा पड़ा
तो हम उल्टे पैर भाग जाते हैं सेनापति की बात सच्ची करके सिक्का उछाला सीधा बोले चलो तीन बार उछलते दूसरी बार उछाला सीधा तीसरी बार ला सीधा आ सैन्य में तो बल आ गया और ऐसा आत्मबल श्रद्धा और विश्वास कि महाराज जैसे शेर हाथी के झुंड पर पड़े ऐसे देखते देखते बू डाला उन दोनों राजाओं की सेना को सिर पर पैर रख के भाग बाकी जो जिए दो दिन की तो बात क्या यह तो दोपहर से भी पहले विजय बनकर लौटे ने रहस्य खोला राजा ने महात्मा का सेना का अभिवादन किया कि महात्मा जादू कर
दिया महात्मा ने कहा इस सिक्के ने जादू कर दिया सुनो जवानों और सुनो असिस्टेंट सेनापति और राजा साब मैंने सिक्का बनवा रखा था दोनों तरफ से सीधा श्रद्धा और विश्वास तो सबके अंदर है लेकिन डगू मगु है इसलिए वे विफल हो जाते श्रद्धा और विश्वास पक्का हो जाए तो त्रिभुवन पति भी तो आ जाते तो यह क्या है यह सफलता आ गई तो क्या बड़ी बात मैंने सिखा ऐसा बनवाया था कि दोनों तरफ सीधा तो इनके अंदर जो छुपा हुआ श्रद्धा विश्वास था उसको दृढ़ बना दिया विजय हो अब मैं कौन सा सिक्का तुम्हारे लिए
बनवाओ कि तुम भी [प्रशंसा] अगर बनवा हूं तो अब ये पोल पट्टी चलेगी नहीं सचमुच में बनवा भी लू तो ये कथा तो तुमने सुन रखी है तो उसकी असर नहीं होगी फिर भी मेरे पास एक सिक्का है और उस सिक्के से ज्यादा सच्चा सिक्का है बना हुआ नहीं वास्तविक सिक्का है ध्यान योग शिविर और उसमें आपका अनुभव ही आपको यात्रा करने के लिए श्रद्धा और विश्वास देगा देगा दे क्योंकि आपका मन रस चाहता है आपका मन स्वस्थ जीवन चाहता है सुखी जीवन चाहता है सम्मानित जीवन चाहता है और थोड़ी मेहनत से ज्यादा आनंद और
अपने दिल का आनंद उधारा नहीं स्वतंत्र आनंद ये आप चाहते हैं और दिलाने की कुंजी मेरे पास है इसीलिए हम तो मुछ पर हाथ रख के घूमते मजे से [प्रशंसा] [संगीत] जय रमजान अपने साथी कादर भक्ष को लेकर साईं तेव राम से मंत्र दीक्षा लेता है साई टेराम के संपर्क में आता है धीरे-धीरे उनको स्वाद लगा रंग लगा बाहर से तो मुसलमान के घर पैदा हुए बच्चे लड़के युवक दिखे लेकिन भावनात्मक पिता तो टेराम हो गए और परमपिता का रस उनको मिला 6 जुलाई 187 में खंडू ग्राम में बालक का प्राग हुआ और उनका नाम
धीरे-धीरे संत टेराम के रूप में उभरा और आप भी विश्रांति पाए प्रसन्नता पाए दूसरे का आहित ना करें सामर्थ्य शली कौन है समर्थ वह नहीं जो दूसरे को दबोच दे समर्थ वह है जिससे किसी का आहित ना हो समर्थ वह है जो किसी वस्तु व्यक्ति की गुलामी के बिना प्रसन्न रह सके समर्थ वह है जो अपने आत्मा पर निर्भर रहे बढ़िया जगह मिल जाए बढ़िया भोजन मिल जाए बढ़िया कुछ मिल जाए तब सुख नहीं तो नहीं नहीं हर हाल में अपने हृदय की प्रसन्नता और विश्रांति बनाए रखे वह समर्थ है विकारों को और देह द्यास
को अहं ममता का मर्दन करने में जो सक्षम है व पूरे हैं वे मर्द जो हर हाल में खुश है मिला अगर माल तो उस माल में खुश है हो गए बेहाल तो उसी हाल में खुश है कभी उड़े टा टाट तो कभी बाट में खुश है पूरे हैं वे मर्द जो हर हाल में खुश [प्रशंसा] [संगीत] है 20 बव गुरु का मन माने सो सेवक परमेश्वर की गति जाने परमेश्वर की गति जानने वाला सेवक कैसे ऊंचा बन जाता है वि विश्वा से गुरु का मन माने स सेवक परमेश्वर की गति जाने सो सतगुरु की
जिस हृदय हरि नाम सतगुरु वो की जिसके हृदय में हरि का नाम हरि का अनुभव हरि का रास है अनक बार गुरु कहू बलि जाऊ ऐसे गुरु के चरणों में अनेक बार बलिहार जाए हमारी अंता ममता सर्व निधान जि का दाता आठ पैर पारब्रह्म रंग राता उसका मन आठों पैर परमात्मा के रंग में रहता है बोले आठ पैर बाबा जी वो सोएगा तब तो भगवान का क्या चिंतन करेगा अरे सोने के पहले भगवत चिंतन करता है तो अचेतन मन में भी ब्रह्म रस बना रहता है बिल्कुल पक्की बात है मेरे अनुभव की बात है कि
आठों पैर रह सकते हैं भंग बसुरी सुरा पान उतर जाए प्रभात नाम नशे में नान का छका रहे दिन रात ऐसे वैसे थोड़ी बोले हैं बिल्कुल रहता है आदमी छका रहता सामान्य आदमी नींद करता है ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म रस में सोता है सामान्य आदमी सो उठता है तु उसकी प्रधानता लेकर उठता है ब्रह्मज्ञानी जब उठता है तो सात्विक ब्रह्म सुख में से उठता है [संगीत]