[संगीत] हरि [संगीत] ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] ओम जय हो जय हो [संगीत] हरि ओ हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि बोल हरि बोल हरि ओम हरि ओम हरि ओम [संगीत] राम ओ राम ओ हरि ओ हरि ओ हरि ओ हरि ओम हरि ओम ओ हरि ओम ओम हरि ओम ओ ओ सर्व स्तर तु दुर्गानी सर्व स्तर तु दुर्गा सर्वो भद्राणि पश्तो सर्व भद्रा पत सर्व सद बुद्धि मापन त सर्व सद बुद्धि मापन
त सर्व सर्व नंद तो सर्व सर्व नंद हम सबको सद बुद्धि प्राप्त हो सर्वत दुर्गानी हम सब अपने अपने दुर्ग से दायरे से संकीर्णता से बाहर आ जाए उतर जाए सर्व स्तु दुर्गानी सर्वो भद्राणि पत हम सब मंगलमय देखें सृष्टि में अगर दुख शोक पाप [प्रशंसा] ताप या अमंगल देखते रहेंगे तो अपना चित ही अशुद्ध हो जाएगा सुनो तात माया कृत गुण अ दोष अनेक गुण देखें दोष न देखें उभय देखें अविवेक अपने हृदय को हम ऐसा बनाए कि संसार की चोटे हमारे चित्त को चलित ना करें सर्वस तु दुर्गानी सर्वो भद्राणि पश्तो [संगीत] हम
सब मंगलमय देखे सब मंगलमय देखने से चित्त जल्दी शुद्ध होगा प्रसन्न होगा मधुर होगा देवलोक में चर्चा हुई कि सब में मंगल देखने वाला ऐसा कौन सा जति जोगी [संगीत] है कई बुद्धि मानों का नाम है तपस्वी जतियो का लेकिन सर्वोपरि नाम श्री कृष्ण लिया गया कितना भी अमंगल अशुद्ध हो उसमें श्री कृष्ण मंगल और शुद्ध देखते हैं इसलिए कृष्ण सदेव प्रसन्न रहते हैं जो अशुद्ध और दुख देखता रहता है अपवित्र देखता रहता है उसका हृदय पवित्र कैसे रहेगा शास्त्र में तो यहां तक है कि रास्ते जाते कोई अपवित्र चीज दिखे तो आपके चित्त पर
अपवित्र का असर पड़ेगा तुरंत पवित्र करने वाले सूर्यनारायण को देख अग्नि को देख लो मंदिर के कलश को देख लो अथवा तो इष्ट मंत्र जप लो या कोई संत महात्मा का दर्शन कर लो रास्ते में जाते कोई गंदी चीज पड़ी कुछ भी ऐसा वैसा आपके चित्त को ज्यादा देर अशुद्ध या अपवित्र में मत बैठने दो रक्षता रक्षता कोष नाम मप हदय कोषम तिन रक्षित सर्वम रक्षित इदम रक्षा कीजिए रक्षा कीजिए कोषों का कोष जो हृदय कोष है उसकी रक्षा कीजिए अपना किचन गंदा नहीं रखना चाहते अपना बाथरूम गंदा रखना नहीं चाहते लेकिन हृदय गंदा हो
रहा है उसका ख्याल नहीं रखते सर्व भद्राणी पश्तो सर्व सद बुद्धि मापन तु बुद्धि तो सबके पास है लेकिन सद बुद्धि से सत्य स्वरूप ईश्वर का दीदार होता है बुद्धि तो जजों के पास भी है वकीलों के पास बस्टर के पास बुद्धि मानों के पास बुद्धि तो है लेकिन सत्य को पाने वाली बुद्धि की मांग है यहां वेद में सर्व सद्बुद्धि मापन त सर्व सर्वस्व नंद त हम सब एक दूसरे को मदद रूप हो स्वर्ग की सभा में सर्वोपरि प्रसन्न रहने वाले गंदी से गंदी व्यक्ति गंदी से गंदी परिस्थिति गंगे गंदे से गंदे पशु पक्षी
में भी श्री कृष्ण अच्छा ही देख लेते भुरी भुरी प्रशंसा हुई देवेंद्र ने कृष्ण की भुरी भुरी प्रशंसा की एक देवता को शंका हुई गंदे से गंदी व्यक्ति पशु पक्षी कृष्ण कैसे देख लेते होंगे अच्छाई उनकी श्री कृष्ण जहां से पसार हो रहे हैं वहां सकड़ी गली में देवता कुत्ते का रूप लेकर आ गिरा वहा पूछ कटी है शरीर में पीप बह रहा है रक्त बह रहा है बैया भंडारा करती है बुरी बदबू आ रही है वाल मित्र पसार हुए कृष्ण के साथ अरे कृष्ण देखो तो कितना अभागा प्राणी है ना मरता है ना जीता
है कितना इसके दुष्कृतम् कृष्ण ने कहा पागल हुए हो उसके दांत चमक रहे ये उनको उसके पुण्य का फल तुमको नहीं दिखता है इसके दांत चमक रहे हैं ये उसके पुण्य का फल है ऐसे जब कुत्ते के चमकते दांत कृष्ण को पुण्य का फल दिखता है तो रे कुटुंब में पड़ोस में भी किसी ना किसी के दांत तो चमकते ही होंगे या तो बाल चमकते होंगे या तो उसका चेहरा चमकता होगा या बुद्धि चमकती होगी हजार हजार दोषों में भी एक निर्दोष चमकती होगी उधर नजर करो तो तुम्हें सत बुद्धि प्राप्त करने में हृदय शुद्ध
करने में सुविधा हो जाएगी क्या करें भैंस काली कल उठ कौन रखे उसे और गाय ठीक से दूध नहीं देती नि कमी और घोड़ा घोड़ा तो चुल्लू भर भी दूध नहीं देता गाय सवारी के काम नहीं आती और तो क्या बताए कुत्ता अपवित्र संसार बड़ा बुरा है नहीं नहीं घोड़े से घोड़े का काम लो कुत्ते से कुत्ते का काम लो गाय से गाय का और फैट वाला दूध चाहिए तो भैंस का काम लो शरीर में अंग भिन्न भिन्न है अच्छे अंग भी है और मलिन निकालने वाले अंग भी है लेकिन कुल मिलाकर मैं हूं अपने
आप को मानते हैं ऐसे सृष्टि में न जाने कितना कितना वैचिंग खाकर देखोगे किसकिस को नींबू चाटते हुए देखो कि अर ऐसा हो गया अरर ऐसा हो गया अर ऐसा हो गया पोलूशन तो बहुत है हरर है तो है अरर करके और उसको बढ़ाते क्यों अपने मन [संगीत] में मिटाने की योग्यता है जरूर मिटाओ लेकिन मिटाने की जहां योग्यता नहीं पहुंच नहीं वहां वहां से मन हटाकर जहां से तुम्हें आनंद मिले प्रसन्नता मिले माधुर्य मिले वही उस सत्य में में प्रवेश पाने की सत बुद्धि का आप विकास करो अंतःकरण शुद्ध होगा पवित्र हो जाएगा हृदय
प्रसन्न हो [संगीत] जाएगा श्रीमद् भागवत की कथा आगे चलती है कि पांडव राज्य करने लगे श्री कृष्ण जब विदा ले रहे थे तो कुंता जी को पूछा बुआ जी क्या चाहिए कुंता कहती है कि प्रभु केशव लोग तो बोलते हैं कि तुम धरती का भर उतारने आए योगेश्वर कहते हैं कि हमारे योग में पुष्टि देने आए पौराणिक कहते हैं कि वासुदेव देवकी ने अगले जन्म में तप किया था और आपसे आप जैसा ही पुत्र मांगा था इसलिए आप आए यदुवंश की शोभा बढ़ाने को आए लेकिन हे केशव मैं तो यह समझती हूं कि आप मेरे
लिए ही धरती पर अवतरित हुए हैं जब जब हमको दुख पड़ा तो कृष्ण तुम आए लाक्षा ग्रह से रक्षा तुमने हमारी करवाई द्रोपदी की भर सभा में दुशासन उसको नगन किया जा रहा था तुम इह साड़ियों का अवतार लेकर कृष्ण हमारी रक्षा की दुर्वासा के हिसाब से तुमने हमको बचाया और द्रोपदी के पांचों पुत्र अ माने माथ उस अधम को पकड़ के तुम ही लाए हे केशव जब जब विपत्ति पड़ी दुख पड़ा तो तुम जल्दी आए अब हमें राज्य मिला है सुख मिला है तो तुम जा रहे हो हम तो तुमसे दुख ही मांगते इस
बहाने तुम्हारा दीदार होता रहे तुम्हारा सानिध्य मिलता रहे संसारी सुख भोगने से तो मन खोखला हो जाता है लेकिन आत्मा का सुख भोगने से मन प्रभावशाली हो जाता है संसारी वस्तु का उपयोग करो लेकिन इसमें सुख बुद्धि सुख भोग बुद्धि निकाल दो फिर राज्य या वैभव या फ्लैट या तुम्हारा हिक वैभव तुम्हें फसाए नहीं श्री कृष्ण से कुंता ने जो मांगा है शायद किसी महिला ने मांगा हो श्री कृष्ण द्वारका गए अपनी लीला संके [संगीत] ली पांडवों को भी लगा कि अब संसार में मानो सत्व चला गया है जैसे सूर्य के जाने से कमल मुन
जाते हैं ऐसे हृदय कमल सबके संकुचित हो गए वह प्रसन्नता कहां वह माधुर्य कहां वह आनंद कहां जो केशव के होने से होता था पांडवों ने स्वर्ग ण का निर्णय करा और अधिकारी अपने पौत्र परीक्षित को राज अभिषेक किया परीक्षित ने राज काज अच्छा चलाया विचरण करने जाते लोग बोलते यह वही राजा परीक्षित है जिनकी गर्भ में भगवान ने रक्षा की थी जिसकी मां भगवान को कहती थी कि मुझे मेरे प्राण चले जा तो चले जाए लेकिन मेरे पेट में आपके भक्तों का वंशज है आप अपने भक्त वंशज की रक्षा करें कैश और भगवान ने
रक्षा की जिस परीक्षित की वोह राजा परीक्षित आरहे अरे इनकी दादी भी भगवान की भक्त इनके दादा भी भगवान के भक्त इनकी मां भी भगवान के भक्त और कुंता जीी भी भगवान के भक्त भीम भी भगवान के भक्त ऐसे राजा परीक्षित को देवतुल्य लोग आदर देते थे परीक्षित विचरण करते करते जहां भगवान की चर्चा करने वाले संत सज्जन मिलते वहा भाव विभोर हो जाते अत आत्मा का सुख लेते भक्ति रस का सुख लेते विषय विकारों की सुख की विषय विकारों की खाई में अपने को नहीं गिरने देते थे राज्य वैभव तो था कोई साधारण राज्य
नहीं था एक छत्र सम्राट थे छोटे मोटे राजाओं पर तो उनकी हुकूमत च चल ही थी विजेता हुए थे लेकिन कलयुग पर भी उनकी हुकूमत चलती थी ऐसे भी राजा थे और परीक्षित ने हाथ जोड़कर सुखदेव जी मुनि को प्रार्थना की के प्रभु मनुष्य को अपने जीवन काल में क्या करना चाहिए और मृत्यु निकट हो सात दिन में मरना हो तो उसको क्या करना चाहिए मनुष्य का हित किसम है मनुष्य का वास्तविक में मंगल किसम है अल्पम के प्राणी तो मन में जैसा आता है ऐसा ही करते हैं मन में जैसा आता है ऐसे पतंगी
करते हैं दिए के आगे आनंद लेने मजा लेने जाते जल मछली को मन में आता है ऐसे ही जाती है कुंडे में फस मारती ऐसे जीव एक एक विषय के सुख में जैसा मन को आता है वहां करने लग जाते और आयुष नष्ट हो जाती है मुनीश्वर अली पतंग मृग मन गज एक एक रस आच तुलसी तिनकी कौन गति जिनको बापे पांच पतंग रूप देखकर खप जाता है भरा रस में ही फस मरता है सुगंध में फस मरता है मछली जीव के स्वाद में फस मरती है हाथी स्पर्श के सुख में फस मरता है हिरण
गीत के ध्वनि के सुख में फस मरता है शिकार हो जाता है उसका एक एक इंद्रिय की आसक्ति में जीव फस मरता है तो मनुष्य पांचों इंद्रियों में रम रहा है उसका कल्याण कैसे हो सुखदेव जी महाराज कहते हैं कि जो बुद्धिमान है जिनको मौत दिखती है शरीर की मौत होने वाली है आयुष का काहा एक एक दिन बीत रहा है ऐसा जिनके पास विवेक है हे परीक्षित तुम्हारे जस्सों के लिए सात दिन काफी है लेकिन जिनको इंद्रियों के सुख भोग भोग कर अपने को खपा है उनके लिए तो सात जन्म भी कम है बुद्धिमान
के लिए संसार सागर तरना गौ पद कीना जैसे गौ के खुर का खड्डा लांना कोई कठिन नहीं है और मूर्ख के लिए जो संसार को सत्य मानकर मजा लेकर सुखी होना चाहते हैं उनके लिए तो संसार महा गंभीर सागर है पहले स्कं में परीक्षित के सुंदर सुंदर प्रश्न है सुखदेव जी महाराज उसकी सुंदर मति का बखान करते कि तुमने लोक हित के बहुत अच्छे प्रश्न पूछे आत्म कल्याण के अच्छे प्रश्न पूछे राजन सुखदेव जी के परीक्षत के प्रश्नों का उत्तर जब सुखदेव जी देते हैं वहां से दूसरा स्कंध प्रारंभ हो जाता है सुखदेव जी महाराज
कहते तस्मा सर्वा आत्मन राजन हरि अधिते सतव्य कीर्ति तव सुमत भगवत निनाम मनुष्य को सर्वकाल में भगवत तत्व का ज्ञान सुनना चाहिए भगवान की कथा सुननी चाहिए भगवान के स्वरूप का अनुसंधान करना चाहिए भगवान नाम का कीर्तन करना चाहिए जीवन काल में यह आदत डाल दे आपके मन में एक घंटे में पचास विचार उत्पन्न होते हैं लेकिन पचास विचार पचास संकल्प आप क्रिया मित नहीं करते उसमें जो प्रभावशाली होता है वही आपका क्रियान्वित होता है और उसी की स्मृति रहती है मानो आप 15 घंटे जगते हैं तो 500 संकल्प होते होंगे लेकिन उसमें जो प्रभावशाली
संकल्प है उन्हीं की स्मृति रहती है कल्पना करो कि 15 संकल्पों की स्मृति रही 15 रोज के तो हफ्ते के 120 नहीं हफ्ते में जो उनमें भी ज्यादा प्रभावशाली होंगे उन्हीं की आपको स्मृति रहती है मान लो कि हफ्ते में 50 रहे तो महीने में 200 संकल्पों की स्मृति रहेगी या प्रभाव रहेगा चिते पर नहीं उन दोषों में भी जो अधिक प्रभावशाली है वही रहेंगे मानो 60 रहे तो 12 महीने के 720 संकल्प या संस्कार दृढ़ रहेंगे नहीं उन सब में जो सार है उनकी स्मृति बनी रहेगी और उन जैसी वो क्रिया की है ऐसी
आदत बनेगी तो वर्ष में 5 25 जो संकल्प प्रभावशाली है उसकी स्मृति और आदत बनी आप 25 वर्ष जिए तो वर्ष के 25 तो 25 वर्ष के गिनो तो सब के सब संकल्प नहीं आपको आदत बनाएंगे उनमें भी जिसको आपने ज्यादा सहमति दी है जिसको ज्यादा सत्य माना है वही आपके स्वभाव को ढालेंगे और उसी की स्मृति बनेगी तो आप जिसको ज्यादा महत्व देते हैं ज्यादा सत्य मानते हैं ऐसा ही आपका स्वभाव और ऐसी आपकी स्मृति और मति बनती है और जैसी मति ऐसी गति होती है इसलिए आप स्मृति हरि की कीजिए प्रभाव हरि का
र और मति हरि में बनाइए तो मुक्ति का अनुभव हो जाएगा ये आपके हाथ की बात है को काह को नहीं सुख दुख करि दाता निज कृत कर्म भोगत नहीं ब्रता कोई किसी के सुख दुख का दाता नहीं है निमित भले कोई बन जाए लेकिन हमारे कर्म हमारे विचारों से हम सुखी दुखी होते रहते हैं और बंधन और मुक्त की रह यात्रा करते रहते हैं इसलिए हे राजन मनुष्य को चाहिए कि जीवन काल में श्री हरि की कथा सुने श्री हरि का ज्ञान श्रवण करें नहीं तो संसार का राग द्वेष घुसेगा जिन हरि कथा सुनी
नहीं काना श्रवण रंद्र ही भवन समाना जे नहीं करही राम गुण गाना जीह सुदा दुर जीह समाना जिसने हरि कथा अपने कानों में नहीं भरी उसने के कानों में तो संसार का विष जाएगा राग और द्वेष या तो अ संसार का चिंतन नहीं करेगा तो अपना चिंतन करेगा अपना अस्मिता आएगी वह भी दुख देगी इसलिए भगवान की कथा सुने तो भगवान का चिंतन होगा भगवान का चिंतन करेगा भगवान का स्मरण करेगा तो चित में भगवत भाव प्रकट होगा भगवत भाव प्रकट होने से राग द्वेष और अभिनिवेश यह बह जाएंगे और चित भगवान मय बन जाएगा
चित चेतन को ध्या चेतन रूप भ चित विषय को धाय विषय रूप भ है हम जब शत्रु का चिंतन करते हैं कुमारी भट्ट उच्चे विद्वान हो गए कुमारिल भट्ट लिखते हैं कि आप नहीं चाहते कि आपके नगर में आपका दुश्मन कट्टर दुश्मन आपके नगर में रहे आप नहीं चाहते आपके मोहल्ले में तो नहीं चाहते नगर में भी नहीं चाहते आप अपने मोहल्ले में भी नहीं चाहते आप अपने पड़ोस में भी नहीं चाहते आप अपने घर में तो शत्रु को नहीं चाहते हैं लेकिन शत्रु का चिंतन कर करते करते आप अपने दिल और दिमाग में शत्रु
को भरते हैं भगवान का चिंतन करके दिल दिमाग में भगवान को भरिए यह आपके हाथ की बात है परीक्षित ने सुखदेव जी महाराज के चरणों में प्रश्न रखा और सुखदेव जी ने उत्तर दिया यहां से दूसरे स्कंध का आरंभ होता है तीसरे स्कंध में तीन महिलाओं की बात आती है एक है जो दैत्यों की मां बनती है दूसरी जो है भक्त की मां बनती है और तीसरी भगवान की मां बनती है नारी में वह योग्यता है चाहे अपनी योग्यता को बिखेर के दैत्य जैसे पुत्रों को जन्म दे चाहे योग्यता का ठीक उपयोग करके देवता जैसे
बालकों को जन्म दे चाहे योग्यता को विकसित करके भगवान जैसे संतान को धरती पर अवतरित करे नारी में यह शक्ति है और तो क्या बता है पति अगर साथ नहीं दे तो बाबा नारी क्या करें बेचारी पति ऐसा हो तो फिर क्या करें तो उसकी बात भी बताते हैं कदू का पति रणा क शप बड़ा भयंकर था फिर भी कदू ने अपने गर ब से पहलाज जैसे आत्मा को अवतरित किया य कदु की कथा भी तुम सुनोगे कश्यप ऋषि यज्ञ मंडप में थे संध्या का समय था इसको प्रदोष काल बोलते हैं प्रदोष काल में भोजन
या प्रदोष काल में मैथुन शरीर को और बुद्धि को कमजोर बना देता है प्रदोष काल में मैथुन संसारी व्यवहार पति-पत्नी का व्यवहार नहीं करना चाहिए श्राद के दिनों में नहीं करना चाहिए पर्व के दिनों में नहीं करना चाहिए नहीं तो बुद्धि पर बहुत खराब असर पड़ता है मासिक धर्म में तो कतई नहीं करना चाहिए नहीं तो पुरुष की आयु और मति जल्दी क्षीण होती है कर्दम ऋषि कश्यप ऋषि यज्ञ मंडप में बैठे थे संध्या वंदन आदि का समय था वे नित्य कर्म में लगने वाले थे दती आई और अन अधिकार मांग करने लगी कि मैं
काम से पीड़ित हो रही हूं और मुझे काम सुख दो सेक्सी सुख की मांग की कश्यप ऋषि ने कहा देख इस समय यह व्यवहार करने का नहीं एक तो स्थान पवित्र है भजन करने की जगह है दूसरा संध्या काल है तीसरा शिव जी के गण और कभी कभार शिव जी भी सूक्ष्म रूप से विचरण करते हैं तो शिव जी की भी अवज्ञा होगी और चौथी बात धर्म के विरुद्ध है ये समय और पांचवी बात में पति हूं मना कर रहा हूं तू समझ जा लेकिन दती को काम ने ऐसा झपेटपुर दती के साथ संसारी सेक्सी
काम विकारी व्यवहार की तुरंत ना ध हो के शुद्ध कुछ शरीर को बल मिले ऐसा पे पदार्थ पवित्र पदार्थ पी लिया काम आता है तो मति को अंधा बना देता है जाता है तो जगा के जाता है काम बकार भोगने के बाद जो वैराग्य आता है जो विवेक आता है उसका अगर आदर करे तो सब महापुरुष बन जाए और महान देवियां बन जाए आप मेरे को ना मानो भगवान को ना मानो केवल अपने अनुभव को मानो तभी भी आप महान हो जाएंगे झगड़ा करने के बाद शरीर थक जाता है अशांति होती है लेकिन ध्यान करने
के बाद चित्त में शांति और मधुरता आती है काम भोगने के बाद शरीर निस्तेज और कमर कमजोर और मन खिन्न हो जाता है तो जो काम करने से हमको घाटा पड़ा ऐसा महसूस होता है उस काम को जल्दी जल्दी ना करें संयम रखे और जो काम करने से चित्त प्रफुल होता है पवित्र होता है मती शुद्ध होती है और भगवान की निकटता आती है ऐसा जो सत्संग ध्यान और भगवत कथा का अनुभव होता है उसी को अपने जीवन में लाओ तो कल्याण हो जाए महान बन जाए जहां राम तहां नहीं काम जहां काम तहां नहीं
राम तुलसी दोनों रह न सके रवि रजनी एक ठाम सियावर रामचंद्र की काम केंद्र सेक्सुअल केंद्र नीचे है जब आप भाव में आते तो आपका मन और प्राण चौथे केंद्र में होता है वहां राम का सुख मिलता है जब राम का सुख होता है तो काम का कीचड़ नहीं होता और जिस समय काम के कीचड़ में मन होता है तो उस समय हृदय का राम का सुख नहीं है रामायण की कथा एक छोटी सी कुंभकरण को रावण ने जगाया और सारी बात क सुनाई कि मैं सीता जी को लाया हूं और सीता किसी कीमत पर
मानती नहीं है अब बड़े-बड़े योद्धे मारे गए हैं नहीं तो मैं तुझे नहीं जगाता भाई मैं बड़े संकट में हूं और कैसे भी करके अब लंका की राज और तेरे भाई का जीवन तेरे हाथ में है कुंभकरण कहता है कि हम लोग तो रूप बदलने में सक्षम है रावण तुम तो जानते हो रूप बदलना यह विद्या तो है तुम्हारे पास तुम क्यों नहीं अपना रूप रावण जैसा बनाकर सीता के पास चले जाते और सीता तुमको उसी समय स्पर्श कर देगी तो सीता का सतीत्व नष्ट हो जाएगा राम तुरंत हार जाएंगे और सीता को फुसलाना क्या
बड़ी बात है तुम राम का रूप क्यों नहीं बनाते हो रावण कहता है कि छोड़ यह बात मैं सारे पापड़ वेल के थका हूं तब तुझे जगाया है बोले कैसे बोले मैं राम का रूप बनाने के लिए राम का चिंतन करता हूं जब राम का चिंतन करता हूं तो तेरी भाभी भी बहन जैसी लगती तो उधर कैसे जा सक सकता हूं राम के चिंतन का ऐसा प्रभाव [प्रशंसा] है राम शब्द का भी प्रभाव है राम के रकार से तुम्हारे सूक्ष्म शरीर में सूर्य तत्व डेवलप होता है राम शब्द के मकार से चंद्र तत्व क्रिएट होता
है जैसे सूरज और चंदा के किरणों से तुम्हारा अन्न औषधि पुष्ट होकर तुम्हारे शरीर को पुष्ट करता है ऐसे ही राम शब्द से तुम्हारा सूक्ष्म शरीर पुष्ट होकर डिप्रेसो हाई बीपी और लो बीपी को फाइट करके तुमको तंदुरुस्त बनाने में बड़ी मदद करता है ना आयम आत्मा बल हीने न लभ दुर्बल आदमी को य आत्म पावर आत्म ज्ञान नहीं मिलता है तो बल कैसे आता है कि अंतःकरण की शुद्धि से और बल आने पर आपके सामर्थ्य का आप सदुपयोग करेंगे आपके अंदर बल नहीं तो आपके सामर्थ्य को लोग चुरा लेंगे आपके धन को लोग हड़प
लेंगे आपके जमीन को लोग हड़प लेंगे आपके अधिकारों को लोग हड़प लेंगे अथवा बल नहीं है तो आपके अधिकारों का आप ही दुरुपयोग कर लोगे बल जीवन की मांग है दुर्बलता पाप है जय राम जी की दुर्बलता पाप है शरीर से दुर्बल मत होइए मन से दुर्बल मत होइए बुद्धि से दुर्बल मत होए तो शरीर को बल मन को बल और बुद्धि को बल जिस पिटारी से मिलता है उस परम पिटारी का नाम है परमात्मा जय राम जी की उस परमात्मा के साथ जोड़ने वाला जो साधन है उसको बोलते हैं मंत्र साधना मंतर मंतर जाए
दूसरा अर्थ है अंतर में जिसका मनन करो उसको मंत्र बोलते हैं तुलसीदास ने मंत्र जाप को भक्ति का पांचवा सोपान कहा है मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा पंचम भक्त वेद प्रकाशा राम नाम की औषधि खरी नियत से खाए अंग रोग व्याप नहीं महा रोग मिट जाए सियावर रामचंद्र की जय डॉक्टर हरबर्ट बेंसन कहता है कि मंत्र जाप से बड़े-बड़े रोग मिटाए जा सकते हैं मंत्र जाप से केवल मंत्र जाप से बिना ऑपरेशन के बिना इंजेक्शन के बिना कैप्सूल के बिना और औषधियों के मंत्र जाप से रोग मिटाए जा सकते हैं और मंत्र जाप से निपट
को पुत्र दिए जा सकते हैं अब बशन कहता है लेकिन भारत के संतों ने तो 5000 वर्ष पहले आम का फल दे दिया माई ने नहीं खाया गाय ने खाया तो गाय के कुक से मनुष्य आकृति का बालक पैदा करके दिखा दिया है भाई हम उनको प्रणाम करेंगे जय राम जी बोस्टन की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी डॉक्टर हरबर्ट बेंसन ने वर्षों के अभ्यास के बाद यह सत्य का कुछ अंश पाया है दुनिया चकित हुई लेकिन सारा ब्रह्मांड चकित हो जाए ऐसे आविष्कार हमारे ऋषियों ने कर कर के छोड़ रखे हैं और वहां रुके नहीं है उससे भी
आगे चरेवेति चरेवेति ऐसे ऐसे जहाजों का वर्णन आता है उसमें पूरा पूरा नगर ही उड़ता फिरता था एक सम्राट ने तो जहाज में अपना राज्य स्थापित कर दिया तुमको चार फ्लैट मिल गए चा दो मकान मिल गए दो फैक्ट्री मिल गए आप इसी में खुश हो गए सिंधी में चया चरी रन भुंडे में ही खुश है चरी रन भुंडे में ही खुश जो पगली होती है ना उसको बोले तो खुश होती है वैसे हकीकत में है तो यह तो एक अपमान है लेकिन पागल उसी में खुश हो जाता है ऐसे कहां तो तुम्हारा मनुष्य जन्म
कहां तुम परमात्मा के अविभाज्य अंग परम तत्व का साक्षात्कार करने की योग्यता ईश्वर ने तुमको और तुम एक फ्लैट में राजी हो रहे हो दो मकान में अपनी जिंदगी खपा दिया 5 25 करोड़ में अपने को पूरा भाग्यशाली मानकर बैठ गए और 25 करोड़ से तुम अगर बड़े हो गए तो तुम्हारा बड़पन नहीं य 25 करोड़ का बड़पन है तुम्हारा बड़पन तो दब गया जिस दिन वह 25 करोड़ नहीं होंगे या 5 करोड़ उस दिन तुम वही के वही छोटे तुमको कुर्सी मिली तो तुम्हारा बड़पन तुम मानते हो तो कुर्सी चले गए तो तुम्हारा बड़पन
नष्ट हो गया तुमने अपने अपने बड़पन को नष्ट चीज होने वाली चीजों में बिखेर दिया मैं इतना बड़ा 6 फुट का लगता हूं थोड़ी हड्डियां बड़ी होने से तो अपने हड्डियों में बैठ गया मैं बड़ा थोड़ा मौस बढ़ा के मैं मोटा हूं नहीं मौस बढ़ने से तू मोटा नहीं हड्डियां लंबी होने से तू लंबा नहीं हड्डियां नाटी होने से तू नाटा नहीं धन बढ़ने से तू बड़ा नहीं और धन घटने से तू कंगाल नहीं और सत्ता मिलने से से तू बड़ा नहीं और सत्ता जाने से तू छोटा नहीं तू तो ऐसा है कि तमाम आंधी
तूफान चढ़ा उतारा है फिर भी एक तिल नहीं दूजा समा द तू ऐसा अमर आत्मा है अपने को पहचान यार कब तक अपने को सताएगा कब तक धोखा खाता रहेगा गोरखनाथ जी ने ठीक कहा है एक भुला दूजा भुला भुला सब संसार विन भुला एक गोरखा जिसको गुरु का आधार एक युवराज नया नया अभिषेक हुआ था पिता स्वर्गवास हो गया था मैं बड़ा भाग्यशाली हूं बड़ा राजा हूं महल में अपनी पत्नी के साथ बैठा था संध्या रात बीती बीतने को रात उतर आ रही थी संध्या के बाद कोई साधु आया उसने अपना कंबल बिछाया और
युवराज कहता है कि देख वो भी युवान साधु मैं भी युवान मैं तो महल में मौज कर रहा हूं और वो बेचारा मंदिर के प्रांगण में फुटपाथ जैसे एक चबूतरे पर सो रहा है देख मैं भाग्यशाली हूं व साधु कितना भागा है पत्नी से गप सब लगाते रात जैसे भी बेती सुबह हुआ व घोड़े पर बैठकर सैर करने गया और वह संत भी घूमते घाम उसी इलाके में पहुंचा उसने टोंट मारते हुए कहा क्यों महाराज रात कैसे बीती संत जान गए बोले बहुत बढ़िया कुछ तो तुम्हारे जैसी राजन बोले जानते हो मैं राजा हा हा
कुछ तो तुम्हारे जैसी और कुछ तुम्हारे से बढ़िया बोले व्ट यू से महाराज तुम क्या बोलते हो मैं सम्राट हूं और मेरे महल के सामने आप चबूतरे पर पड़े थे मेरे जैसी रात तुम्हारी कैसे बीत सकती है महाराज ने कहा ध्यान से सुनो गहरी नींद में बड़ा महल हो चाहे चबूतरा हो गहरी नींद में उसकी कोई स्मृति नहीं रहती गहरी नींद में जैसा तुम अविद्या व चिन्न चैतन्य में ऐसे हम गहरी नींद में तो तुम्हारी और हमारी एक जैसी स्थिति थी जब जब तुम जगते थे तो तुम चमड़े चाट कर सुख लेते थे अपने को
सता करर सुख लेते थे और जब मैं जगता था तो राम का चिंतन करके अपने आप में सुखी होता था बच्चे को जन्म देने के लिए संसार में उतरो शास्त्रों की मना नहीं है लेकिन एक दूसरे के शरीर को सता सता के जो सुखी होना चाहते हैं और फास्ट सुखी होना चाहते हैं उनके लिए एड्स भी खड़ी रहती है जय राम जी की उनके लिए और कमजोरी और बीमारियां भी सामने मुंह दिखाती रहती जितना मानिया खुशियां उतना भया रोग खलर खा दे जो मार पई तो गिर खा दे क्या होए दुनिया के जो मजे हैं
हरगिज कम ना होंगे चर्चे यही रहेंगे अफसोस हम ना होंगे हमारा शरीर मर जाए उसके पहले हमारा अज्ञान मर जाए यह गीता का उद्देश्य है ये सत्संग का उद्देश्य है अज्ञानी न आवृत ज्ञानम कृष्ण कहते हैं ना दत्तम कश्चित पापम मैं किसी को पाप देकर दुखी बनाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता हूं और किसी विशेष व्यक्ति को पुण्य देकर मैं सुखी बनाता हूं ऐसा नहीं है वो तो अपने ही अज्ञान से उनका ज्ञान ढक गया है और ऐसे कर्म करके बनाते हैं जैसे स्लाटर हाउस में बिजली की लाइन जाती है तो बिजली थोड़ी स्लाटर
हाउस के निर्दोष प्राणियों को कत्ल करने का संकल्प करती है अथवा बिजली थोड़ी यहां आती कि चलो बाबा जी की कथा हो रही है तो मैं यहां काम में लग जाऊं मेरे को पुण्य होगा नहीं एमप्लीफायर फिट कर दो तो ये आवाज करके सेवा करती है और स्लटर हाउस के वो तीक्षण इंस्ट्रूमेंट फिट कर दो तो हत्या करती बिजली इसमें क्या करे भगवान कहते मैं किसी को पाप के तरफ प्रेरित नहीं कर करता हूं ना दत्तम कश्चित पापम मैं किसी को पाप नहीं देता हूं दुख नहीं देता हूं ना दत्तम कश्चित पापम ना सुकृत विभो
हो अज्ञान न आवृत ज्ञानम तेन मोहंती जंत वाहा अज्ञान से उनका अपना असली ज्ञान ढक गया है इसलिए वे विमो त हो जाते हैं मोहित हो जाते बेचारा मोहित मतलब उल्टे ज्ञान के तरफ चले जाते हैं गीता उल्टा ज्ञान मिटाकर सही ज्ञान की दिशा देती है मशीन को काम दिया जाता इंसान को ज्ञान दिया जाता है और ज्ञान भी तीन प्रकार का होता है एक जो आजकल स्कूल कॉलेजों में सिखाया जाता है वह पेट भरने का ज्ञान हम बोलते उसको दूसरा योगियों के पास जो सिखाया जाता है उसमें अंतक में सामर्थ्य भरने का ज्ञान है
योग शक्ति के द्वारा जैसे तुम प्राण चलाते हो तो तुम्हारे प्राण का फोर्स अगर 11 उंगल पर रखो तो तुम्हारे हृदय में आनंद उल्लास प्रसन्नता आदि गुण प्रकट होंगे ऐसे वो जो योगिक परंपरा का ज्ञान है तो एक हिक ज्ञान दूसरा योग विद्या का ज्ञान और तीसरा हिक ज्ञान और योग विद्या का ज्ञान जहां से आता है उस परब्रह्म परमात्मा का ज्ञान उसको आत्म ज्ञान बोलते हैं तीन प्रकार का ज्ञान होता है पेट भरने के लिए तो हिक ज्ञान का उपयोग कर लो मना नहीं है लेकिन हृदय भरने का भी तो जरूरत है और हृदय
जिससे भरा जाता है उस परमेश्वर को भी अपने आप में भरो अपने को उसमें भरो तो बस ब्रह्म ज्ञान हो जाएगा परम ज्ञान हो जाएगा लब्ध ज्ञानम पराम शांति वो परम ज्ञान उपलब्ध होने से परम शांति हो जाती नहीं तो बचारी शातिया आती और भाग जाती दो प्रकार के व्यक्ति एक होते हैं जो एक की शरण जाते हैं उन्हें श्रद्धालु कहा जाता है मूर्ख लोग उन्हें अंध श्रद्धालु कह दे लेकिन शास्त्र उन्हें श्रद्धालु कहते हैं कृष्ण उनको प्रेम करते हैं श्रद्धावन लभते ज्ञानम श्रद्धालु ही वास्तविक ज्ञान को परम ज्ञान को उपलब्ध कर सकता है ऐसे
लोग होते हैं एक होते हैं श्रद्धालु जो एक की शरण जाते हैं दूसरे होते हैं नास्तिक आस्तिक एक की शरण जाते और नास्तिक अनेक की शरण जाते हैं हे सिगरेट तू सुख दे हे वाइन तू सुख दे हे डिस्को तू सुख दे हे पान मसाला तू सुख दे हे ऐसा तैसा तू सुख दे हजारों हजारों परिस्थितियों के पीछे घूमते फिरते सुख की भीख मांगते और जो श्रद्धालु है वो भगवान के नाते काम करते और भगवान से ही सुख मांगते और भगवान में ही सुखी अपने को जानते हैं ऐसे होते श्रद्धालू सुख सपना दुख बुलबुला सुख
सपना दुख बुलबुला दोनों है महमान दोनों है महिमा दोनों भी तन दीजिए दोनों भी तन दीजिए सो हमको पहचान सो हमको पहचान मह शक्ति का विकास विचार का उदय कर देगा विचार का उदय शक्ति का विकास कर देगा उस परमात्मा में प्रीति होने से आपको विचार उत्पन्न होगा क्योंकि वह ज्ञान स्वरूप है और विचार उत्पन्न होने से आपकी प्रीति दृढ़ होगी आप शरीर को खोजें नहीं तो आपको वैराग्य होगा और अपने को खोजो ग तो प्रेम होगा शरीर को खोजो ग तो कैल्शियम मिलेगा शुगर मिलेगा और अपने को खोजो ग तो अमरता चैतन्य आत्मा ब्रह्म
मिलेगा अपने को खोजो नानक जी ने कहा मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पछाड़ अपने मूल को खोजो अपने को सुखों में दबाओ मत और दुखों में अपने को पीसो मत आंख को मजा दिलाने के लिए बहुत दिखा है अभी तक उसको संतोष नहीं इस नाक के दो छोटे से नथु को सुगंधया कई परफ्यूम कई फूल कई दिखाया अभी तक संतोष नहीं इस जीव राणी को खूब खूब चरपे खट्टे मीठे स्वाद च खाए अभी तक इनकी गुलामी से जान नहीं छूटी इन कनों को कई शब्द सुनाए कई गीत सुनाए कई अभी तक संतोष नहीं इनके
पीछे घिसे जाए इस चमड़े को शरीर को कई स्पर्श सुख दिखा दिलाए पति पत्नी का इसका उसका गद्दो का सोफा का उनका अभी तक यह त्वचा का सुख की आसक्ति नहीं गई नहीं आसक्ति से आसक्ति को काटो भगवान में और भगवान को पाए महापुरुषों में आसक्ति करो तो संसार की आसक्ति काटने में सब ल हो जाएंगे श्रीमद् भागवत में आता है कि भगवान कपिल माता देवती को कहते हैं कि आसक्ति बड़ा कठिन बंधन है लेकिन वही आसक्ति सत्पुरुष में वैष्णव में महापुरुषों में हो जाए तो मुक्ति का कारण होती है आसक्ति से आसक्ति को काटना
चाहिए जब भगवन नाम जप में आसक्ति हो जाए पांचों को उसकी असर पड़ती है और जब भी किसी ब्रह्म वेता महापुरुष के द्वारा दीक्षा मिल जाए और दीक्षा को दीक्षा मिली और जप करने का नियम बना ले काम बन जाता है अब हम पौराणिक जगत में चलते हैं थोड़ा सा पौराणिक कथा है के धर्म दत्त ब्राह्मण की पत्नी का नाम था कला जैसा नाम था ऐसा काम था वह कलह प्रिय थी दिन रात अकारण झगड़ा करती थी जो भी धर्म दत्त बोले उसे उल्टा ई करती थी धर्म द दुखी होकर अपने मित्र को मिला के
मित्र में तो मर गया मेरे घर में मौत साक्षात रहती है मैं जो कहता हूं उससे उल्टा काम करने वाली पत्नी मेरे लिए तो मौत है जो भी कहता हूं मैं कहता हूं कि आज चावल बनना चाहिए तो बोले चावल इतनी बेकल नहीं आज तो रोटी ही बननी चाहिए मैं बोलता हूं करेले की सब्जी होनी चाहिए तो बोले आज और करेला आज मंगलवार को करेला खाया जाता है बिल्कुल पागल हो आज तो बेसन की टिकिया बनाऊंगी अब मैं बोलू बेसन बना तो बोले बेसन आज नहीं हो सकता आज तो पुलावर भी होनी चाहिए जो भी
मैं कहता हूं बिल्कुल बिल्कुल उल्टा मैं कहता हूं दही ले आओ तो बस दूध लाएगी मैं बोलूंगा दूध लाओ तो दही ले आएगी मित्र ने कहा यह तो बहुत सीधी बात है तेरे को जो लेना है वो मत क उसके विपरीत कहा कर अपने आप मिलता रहेगा वक्र उक्ति विरोध युक्ति से युक्ति से निषेध युक्ति से कहो तुझे पानी नहीं चाहिए तो तुम बोलना पानी लाओ तो नहीं लाएगी और तुझे पानी चाहिए तो तू बोलना पानी नहीं चाहिए तो ने अब लाएगी उसको मिल गई अटकल निषेध युक्ति से उसने अपना काम शुरू किया होने लगा
इतने में धर्म दत्त ब्राह्मण के पिता का श्राद कल को है अब पत्नी से श्राद करवाना है बोले देख प्रिय कल तो मेरे पिता का श्राद्ध है लेकिन अपने श्राद्ध ब्रत करेंगे नहीं बोले डूब मरो जिस पिता ने इतना मकान जन्म दिया मकान दिया उस पिता का श्राद नहीं करोगे मनुष्य हो कि धन चक्कर हो मैं तो श्राद करूंगी बोले श्राद तो करना लेकिन ब्राह्मणों को मत बुलाना मैं तो ब्राह्मण को जरूर बुलाऊ ब्राह्मणों को तो बुलाया लेकिन बहुत बढ़िया बढ़िया पकवान मत बनाना मैं तो बनवाऊंगा बनवाया अच्छा पकवान खिलाए ब्राह्मण को तो तो तेरी
मर्जी है लेकिन उनको दक्षिणा मत देना बोले दान के ऊपर दक्षिणा नहीं देंगे तो दान नहीं फलेगांव करना है 00 तो पाच रुपया चार्ज भरनी पड़ती है ड्राफ्ट के लिए भी चार्ज भरना पड़ता है ऐसे ही दान के पीछे दक्षिणा होती है तभी फलता है मैं तो जरूर दान दूंगी बोले दान तो दे दे तो दे दे लेकिन कपड़े का टुकड़ा भी मत देना बोले मैं तो पूरी धोती द जा ब्राह्मण भीतर भीतर अपने मित्र को धन्यवाद दिया निषेध युक्ति बताने वाले मित्र को धन्यवाद दिया और सारा श्राद कर्म हो गया इस कथा के पीछे
तुमको इतिहास बता यह कोई कला कोई साधारण व्यक्ति नहीं है यह राम की मां बनती आगे चलकर जय राम जी बोलना पड़ेगा पुराण माना पुरानी कथा कथन करना ही है तो फिर अपने मन के विकारी कथन की अपेक्षा पुराना कथन करो महापुरुषों ने जो किया है ज्ञान बढ़ेगा सृष्टि की परिवर्तन का का ज्ञान होगा उस कलाने ब्राह्मण को खिला दिया ब्राह्मण ने जो पिंड दान कराए जो नवग्रह रखे अब पति खुशी खुशी में बुद्धू भूल गया बोले प्रिय जा इसको पास में तीर्थराज है गंगा जी बहती उसमें डाल देना तो जाके गटर में डाल के
आई गटर में डाल के आ ऐसा बोलती तो गंगा में डालती ओ ब्रह्मण ने कहा डाल के आए तीर्थ में बोले तीर्थ में क डाले जाते अब क्या उनसे लेना देना मैं तो गटर में ही डाल के आ नाली में डाल के आए बड़ा दुखी हुआ महाराज ऐसे कभी दुखी कभी सुखी ऐसे थप्पड़ खाते खाते समय की धारा में कला मर गई धर्म दत्त ने उसकी जो कुछ अंत करनी होती लेकिन उसका हृदय खुश नहीं था उसे कथा कहती कि कला मरी और उसका अवगत कैसे मरी कि धर्म दत्त के साथ नहीं बनता है और
धर्म दत को स्नेह चाहिए तो किसी पड़ोसी बहन से कोई बातचीत करता था और कल ने देख लिया धर्म दत्त के मन में तो कोई कु भाव नहीं था लेकिन कला ने सोचा कि अब मैं जान गई कि उस के साथ लगाए मैं फासा खाकर मर जाती हूं ताकि इसको राज दंड मिले कला आत्महत्या करके मर गई धर्म ब्राह्मण की थोड़ी निंदा या थोड़ा राज में थोड़ा खींचाव तना हुआ कैसे मरी क्या मरी लेकिन वो तो निर्दोष था छूट गया कला प्रेत बनी और भयंकर प्रेत योनि में दुख पाने लगी एक सुबह के समय भिक्षुक
ब्राह्मण एकादशी का व्रत पूर्ण करके द्वादशी के समय सुबह बारस के समय मंदिर में जा रहा था प्रभात काल उस भिक्षुक ब्राह्मण को डरा रूप दिखाया प्रेत पहले डरावना रूप दिखाते सामने वाला डर जाए तब प्रवेश करते लेकिन वो थोड़े अशुद्ध हो तभी प्रवेश कर पाते हैं यह तो नादो के मंदिर में जा रहा था डराया लेकिन ये पूरा डरा नहीं फिर दूसरा रूप दिखाया डरा नहीं फिर भी डरा और डर डर में पूजा की जो थाली थी भगवान का नाम गुरु मंत्र लेकर पूजा की थाली दे मारी उसके ऊपर और पूजा की थाली में
जो अक्षत थे तिलक विलक पुष्प पुष्प थे भगवान की सामग्री और भगवान नाम जपता था उसके प्रभाव से कला का कुछ पाप कम हुआ और वह बोलने के काबिल हुई कि ब्राह्मण मैं तो तुमको डराकर तुम में हावी होना चाहती थी मैं प्रेत आत्मा के भटक रही हूं सोचा कि ब्राह्मण के घर ब्राह्मण के शर में जाकर कुछ आराम पाऊंगी अपनी वासना ऐसा खाऊंगी पिऊंगी लेकिन आप तुम्हारे इस पूजा और मंत्र के प्रभाव से मुझे पूर्व जन्म की स्मृति आती है मैं धर्म दत्त की ब्राह्मण की पत्नी थी और मैं उल्टा करती थी अपने झूठे
बर्तनों में पति को खिलाती थी और जो पति कहे उसे मैं उल्टा करती थी उनके अंतर में आत्मा परमात्मा है ऐसा सत्संग और ज्ञान मुझे नहीं था इसलिए पति को ठीक करूं पति को ठीक करू यह भी दिन के तारे देखे जो दूसरे को दबा के सुखी अपने ऊंचा होना चाहता है वह अपने लिए दुख पैदा करता है दूसरे को दबाकर ऊंचा मत बनो और दूसरे से दबकर नीचा मत बनो एक दूसरे के अंदर जो परमेश्वर है उसके साथ न्याय में व्यवहार करके उन अपने और दूसरे की ऊंचाई का सोचो तो तुम्हारा ऊंची यात्रा होती
है इस प्रकार का ज्ञान कला को नहीं था कला ने क कहा कि हे भिक्षुक ब्राह्मण अब तुम्हारे इस मंत्र से और पूजा के सामान के स्पर्श से मेरे को पूर्व जन्म की स्मृति आती है देव अब ऐसी कृपा करो कि मुझे इस प्रेत योनि से छुटकारा मिले मुझे यह भी सुमर है कि मैं मर के गई और यमराज ने मुझे कहा कि अभी तो तू प्रेत योनि में भटकेगी फिर तू सूरी बनेगी क्योंकि झूठे बर्तन में पति को खिलाने से सूरी बनने का दंड मिलता है फिर तो अनाप सनाप भक्ति थी लाते मारती थी
वाणी की तो लात मारने वाली गधी की योनि में तुझे जाना पड़ेगा अब इन योनियों की याद आते ही मैं कांपती हूं मेरे उद्धार का उपाय करो भिक्षुक ब्राह्मण ने अपने गुरु मंत्र का अवलंबन लेकर जप किया और जप करते हुए एकादशी के व्रत का फल उसकी सद्गति में लगाया और जप का फल उसको अर्पण किया इतने में कथा कहती है कि उसका प्रेत योनि छूटा और देव देही उसको धारण में उसने धारण कर ली विमान आए और विमान के पार्षदों ने कहा के हे भिक्षुक ब्राह्मण तुमने इस कला को दुर्गति से सद्गति के तरफ
की यात्रा कराई तुम पुण्य आत्मा हो अभी तो यह कला स्वर्ग में आ रही है समय पाकर तुम भी वैकुंठ में आओगे और तुम्हारी यह अर्धांगी होगी और तुम फिर थोड़ा तप करोगे और भगवान वरदान देंगे और फिर तुम राजा द बनोगे और तुम्हारी य कई कई रानी बनेगी वही भूत पूर्व कल कई कई बनी है कर्म की गति है उतार से चढ़ाव चढ़ाव से उतार तो कलह को कलह पहले था तो कई कई बनने के बाद भी कलह की चाबी मंथरा की कौशल को नहीं लगी सुमित्रा को नहीं लगी और जगह नहीं लगी कलह
में ही कलह की चाबी लगी क्योंकि पुराना स्वभाव कुछ अंश रहा हमारे पुराण का ने और ऋषियों ने कितना प्रकृति के साथ एक तांता सादी होगी मंत्र विज्ञान कितना उनका सूक्ष्म तम पहुंचा होगा कि कौन सा जीव कौन सी योनि में था और कहां-कहां से घूम के आया यह भी मंत्र दृष्टा महापुरुषों ने पुराणों में लिख रखा है मैं उन विज्ञानियों को धन्यवाद तो करूंगा लेकिन प्रणाम तो उन ऋषियों के ज्ञान को ही करता हूं जय राम जी रा मधुर नाम हरि ओम दिलों का दुलारा नाम हरि हरि ओम ओम भक्तों का सहारा नाम हरि
हरि ओम ओम ली का किनारा नाम हरि ओम आपका निवारक नाम हरि हरि हो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] तुम्हारी रग रग पावन हो गई है ना तुम्हारा रक्त का कण कण पवित्र हो रहा है ना और तुम उससे प्यार कर रहे हो तुम स्वयं प्यारे हो रहे हो [संगीत] मन पावन सना मधुर मधुर नाम ह हरि हो मधुर मधुर नाम ह हरि ओ दिलो का तुहारा नाम हरि हो पावन पावनम ह प्रेम से बोलो प्यारा नाम हरि हरि हो उम कली का किनारा नाम हरि हरि ओ ओम भक्तों का सहारा नाम हरि हरि ओ फिर से
बोलो कोही नाम ह हरि हो [संगीत] भय नास दुरमति हरण कली में हरि को नाम निस दिन साधक जो जपे सफल होई सबका [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] लो का तुहारा नाम ह हरि हो कलिका किनारा नाम हरे ओम पाप का निवारक नाम हरे ह राम बोले प्यारा नाम हरे हरे ओम गौरांग का सहारा नाम हरि हरि ओ ओम पावन पावन नाम ह हरि ओम मधुर मधुर नाम ह हरि [संगीत] ओम राम बोले प्यारा नाम हरि ओम गौरा का सहारा नाम हरि ओम नरसी बोले वही नाम हरि हरि ओ ओम ब्रह्मा का पियारा नाम हरि
हरि ह ओम दिलो का दुलारा नाम पावन पावन नाम हरि बोल [संगीत] [हंसी] [संगीत] रे [संगीत] सा [संगीत] [संगीत]