तुम धर्माचारी हो। गौ हत्यारे को मित्र कह रहे हो। गौ हत्या के समर्थन करने वाले को मित्र कह रहे हो। कैसे हम मान ले? आपको धर्माचारी। आप कहते हैं मैंने शास्त्र पढ़ लिए। शास्त्र में लिखा हुआ है कि जो विकलांग होता है उसको सन्यास का अधिकार नहीं है। उसके बाद भी आप दंड लेकर के सन्यासी बन करके घूम रहे हो लोगों के सामने। क्या वह पंक्ति आपकी दृष्टि में कभी नहीं आई? अंग विकला आपको अगर शास्त्र पढ़े होते आप आप कहते हैं सर्वस लोचनम शास्त्रम बिल्कुल सही है यस नास्त एव आप इस पंक्ति का उदाहरण
देते हो अपने वक्तव्य में कि जिसके पास शास्त्र का शास्त्र रूपी आंख नहीं है वो अंधा ही है तो ठीक है आपके पास यह बहुत आंख नहीं है उसके लिए हम कुछ नहीं कहते हैं वो तो उसके लिए कुछ नहीं कहा जा सकता। उसके लिए आपका हम कोई असम्मान नहीं कर रहे हैं। लेकिन आप यह दावा करते हो कि मेरे पास शास्त्र रूपी आंखें हैं। तो शास्त्र रूपी आंखें हैं तो शास्त्र रूपी आंख ने तो बताया है कि जो अंग विकल हो उसको सन्यास नहीं धारण करना चाहिए। तो आपने कैसे धारण कर लिया? शास्त्र विरुद्ध
कैसे आप सन्यासी बन के घूम रहे हो? बताओ आप तुलसीदास जी के विरुद्ध हो। आप रामानंदाचार्य जी के विरुद्ध हो। आप शास्त्र के उपनिषद के विरुद्ध हो। और आप उस पार्टी के नेता के पूरी तरह से पक्ष में हो। उसके लिए कभी आलोचना का शब्द आपके श्री मुख से अभी तक भूल से भी निकला नहीं है। पूरे सब आचार्य सब भक्त सब जो है सज्जन पुरुष आपकी दृष्टि में निंदा के पात्र हैं। और वो वो बड़ा संस्कृतज्ञ है ना। वो तो आपसे संस्कृत में ही बात करता होगा। इसीलिए तो आप बहुत गदगद है मुझसे। वह
कौन सी संस्कृत है जिसके कारण वह आपका सम्माननीय है और बाकी सब निंदा के पात्र हैं आपके लिए। तो इसलिए यह जो व्यक्ति है यह पूरी तरह से अशास्त्रीय कार्य करता हुआ केवल राजनीतिक साठगांठ से बड़े-बड़े पुरस्कार लेकर के अपने आप को और अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करता है। तुलसीदास जी जिनको सारा संसार विद्वान मानता है। वो कहते हैं कि सत्य कहूं उलगी कागद कोरे कवि तो विवेक एक नहीं मोरे। कोरे कागज पर लिख के कहता हूं कि मुझे कविता करना आता नहीं है। मैं विद्वान नहीं हूं। वो वो वो विद्वान अपने मुख से
थोड़े अपनी प्रशंसा की जाती है। विद्यमान रन पायर कत प्रताप जो कायर होता है वो अपनी प्रशंसा अपने मुख से करता है। अपने मुख से अपनी करनी बार अनेक भांति बहुनी अपने मुंह से अपनी प्रशंसा नहीं होती। रामानंदाचार्य जी जब दूसरे प्रशंसा आपकी करें तब आपकी प्रशंसा होती है। इसलिए हम तो केवल देखो भैया ज्यादा नहीं कहना चाहते। बहुत दिन से लोग कहते रहते थे। बार-बार दिखाते रहते थे इनके वक्तव्य। हम लोग कुछ नहीं बोलते थे। क्यों नहीं बोलते थे? क्योंकि विधर्मियों को यह कहने का मौका मिलता है कि देखो आचार्य लोग आपस में लड़
रहे हैं। तो ऐसा मौका हम क्यों दें? इसीलिए नहीं बोलते थे। लेकिन अब बिना बोले नहीं रहा जा रहा है क्योंकि अब आप आदि शंकराचार्य को बोल रहे हो। अब आप चारों पीठों के शंकराचार्यों को बोल रहे हो। आप जो है भक्त हृदय प्रेमानंद जी उनको बोल रहे हो और इसी तरह से जाने किसको किसको बोल रहे हो। किसी को आप छोड़ ही नहीं रहे हो। तो ऐसी परिस्थिति में जनता को जानकारी रहे इसके लिए बोल रहे हैं। आलोचना की दृष्टि से अभी भी हम नहीं बोल रहे हैं और अभी भी हम कह रहे हैं
कि उनके पास मौका है। उनके हजार दावों में से तीन दावे निकाल लिए। 23 भाषा का मुझे ज्ञान है। आप 23 भाषा के विद्वानों को हम भेजते हैं आपके पास। आप सूची दीजिए। आप उनसे 20 मिनट 40-40 मिनट संवाद करके दिखाइए। उन सभी भाषाओं में जिन भाषाओं का आप दावा करते हैं। हम खुद जयकारा लगाएंगे। आपकी इस प्रतिभा के लिए आप कहते हैं कि मुझे डेढ़ लाख पृष्ठ याद है वो डेढ़ लाख पृष्ठ निकाल के सामने रखिए उसमें से डेढ़ पृष्ठ केवल हम पूछेंगे और अगर आपने कंठस्थ सुना दिया हम खुद आपका जयकारा करेंगे और
नहीं और राम जन्मभूमि के बारे में हमने बता दिया झूठा दावा कर रहे हो अगर यह तीन आप नहीं बताते हो तो फिर आपकी कलई खुल जाएगी