ओम शांति नारायण नारायण नारायण सब आनंदित हो प्रसन्न हो समय को इधर उधर में गप सप में नहीं गवाना है स्वासो स्वास की उपासना ईश्वर की और पुस्तक जरूर पढ़ते रहना जीवन विकास मन को सीख व्यसनों से मुक्ति आदि जिसको जो दोष हो मन में वो निकालने का प्रयास करना और भगवत सुख भरने के लिए अवसर मिला है अलग-अलग दिन में पेड़ के नीचे शाम को दूर कहीं घूमने करने चले गए ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम श्री परमात्मने नमः ओ श्री परमात्मने नम जीव मात्र सुख स्वरूप ईश्वर की सत्ता में से पूरित हुआ जैसे समुद्र
से तरंग ऐसे ही सच्चिदानंद परमात्मा से यह जीवात्मा जो अपने असली स्वभाव को नहीं भूले वे ईश्वर कोटि में माने जाते हैं जैसे श्री भगवान ब्रह्मा भगवान विष्णु महेश्वर भगवती देवी सूर्य भगवान वासुकी देव और सब जो अपने असली सच्चिदानंद आत्म स्वभाव को भूल गए वे फिर शरीर में आसक्त हो गए देखकर सूंघ कर चक कर सुनकर और स्पर्श संभोग आदि करके सुखी होने की वासना में से नीचे आते गए आते गए फिर कुछ सावधान हुए तो अपने सत्व गुण को बढ़ाकर देवत्व को प्राप्त हुए स सजते ज्ञानम ज्ञान की आखरी तक नहीं करे तो
देवलोक तक गए तो तू करता तू भया मुझ में रहीन हूं वारी तेरे नाम पर जित देखू तित तू जब भगवन नाम मिलता है उसका जप वखरी से हो फिर धीरे-धीरे मध्यमा से फिर पश्यति से फिर परा से तो यह जीवात्मा की मड़ता की जो पढ़ते हैं वह धीरे-धीरे कम होती जाएगी तो जीवात्मा फिर अपने ईश्वरीय स्वभाव और आनंद को प्राप्त होता है जैसे कल थोड़ा सा अभ्यास किया तो अंतर का सुख मिला तो इस प्रकार अंतर का सुख शांत भाव से बढ़ता जाए तो फिर परम स्थिति हो जाती परम सुख मिल जाता तो जीव
का उद्गम स्थान सुख स्वरूप है जैसे पानी का उद्गम स्थान समुंद्र है ज्योत का अग्नि का उद्गम स्थान सूर्य है दिया किसी के घर में भी जलाओ कहीं भी जलाओ बाती को उल्टी करो तभी भी लो तो ऊपर ही चली जाएगी क्योंकि उसका उद्गम स्थान ऐसे ही जीव का उद्गम स्थान सत चित और आनंद सच्चिदानंद परमात्मा इसलिए जीव सदा रहना चाहता है साठ वाला 7 देखना चाहता 70 वाला 80 देखना चाहता 80 वाला 90 साल जीना चाहता 90 वाले से भी पूछो तो बोले मरी जेतु नहीं रात पर मृत्यु आवे तो बचवा माटे वो बचने
के लिए प्रयत्न करेगा क्योंकि एक ऐसी चीज है जिसने मौत कभी देखी नहीं तो मरने वाले शरीर को भी वह अमर रखकर जीना चाहता है ये उसकी सच्चिदानंद स्वभाव की सच्चाई और चैतन्य ये क्या हुआ वो क्या हुआ कोई भी आता है तो बुड्ढे भी सुथा कौन था फलाना तो ये आपके आत्मा का स्वभाव है सत्य आत्मा का स्वभाव है चित्त और आपके आत्मा का स्वभाव है आनंद तो आप आनंद चाहते हैं डॉलर इकट्ठा करके भी आप आनंद चाहते हैं रुपए इकट्ठा करके भी आनंद चाहते हैं रुपयों का सदुपयोग करके भी आप आनंद चाहते हैं
नौकरी करके भी आप आनंद चाहते हो रिजाइन करके भी आप आनंद चाहते शादी करके भी आनंद चाहते डावर्स देकर भी आनंद चाहते चोर चोरी करता है तो भी आनंद के लिए भले तरीका गलत है तो सभी जीव प्राणी मात्र सुख आनंद चाहते तो सच्चा आनंद नहीं मिलता इंद्रियों के विषयों के आनंद को ही सुख को ही आनंद मानकर जीव नीचे गिरते जाते हैं तो एक होता है विषय सुख जिसको आनंद मानते संसारी विषय सुख विषय सुख होता है दूसरा होता है भावना का सुख तीसरा होता है बुद्धि जन्य तत्व ज्ञान का सुख और चौथा होता
है जीवन मुक्ति का नित्य नवीन रस वह आखिरी है पराकाष्ठा है तो विषय सुख में सारा संसार दिवाना है विषय सुख में क्या होता है कि चार भेद होते हैं उसमें भोग जन्य सुख होता है खा के मजा लिया देख के मजा लिया सूंघ के मजा लिया संभोग से मजा लिया इसको बोलते भोग जन्य सुख भोग जन्य सुख जितना अधिक भोगे उतना ही खाने का मजा लेगा तो स्वाद स्वाद में ज्यादा खा लेगा संभव का मजा लेगा तो तिथि तवार नहीं देखेगा जल्दी बीमार पड़ेगा मरेगा देखने का सुख का मजा लेगा टीवी आदि तो जल्दी
आंखें खराब होगी तो भोग जन्य सुख है विषय भोग जन्य सुख दूसरा है अभिमान जन्य सुख मेरे दो मकान है पांच मकान है मेरा इतना धंधा है इतने बच्चे हैं ऐसी कुर्सी है ऐसा है वस्तु कुर्सी पैसा तो पड़ा है धरती पर लेकिन अभिमान है कि मेरे पास दो करोड़ है पा करोड़ है तो छोटों को देखकर मज आएगा कि हम कुछ है बड़ों को देख सुख करता रहे यह अभिमान जन्य सुख है तो विषय सुख अभिमान जन्य सुख तीसरा होता है मनो राज्य का सुख मन ही मन में अपने सुख की कल्पना में घूम
रहा है जैसे मजूर घी का मटका लेकर जा रहा है बोले य सेठ मेरे को तो अच्छी मजूरी देंगे मजूरी देंगे तो फिर मजूरी क्या करना अच्छी पैसे मिलेंगे कि इसके बेटे की शादी है और घी खरीद के मटका भर के ले जा रहे हैं तो फिर मैं मुर्गियां लाऊंगा मन ही मन मुर्गिया लाऊंगा तो वह बच्चे देगी अंडे देगी वह बेचूंगा बहुत सारी मुर्गिया हो जाएगी फिर बहुत सारी मुर्गियां थोड़ी बेच के भैंसे लाऊंगा भैंसे दूध देगी और कर कसर से बेचूंगा तो भैंसे बढ़ जाएगी फिर भैसे बेच के दुकान करूंगा दुकान भी चलेगी
तो आगे दुकान पीछे मकान फिर शादी करूंगा शादी करूंगा दूर जाना आना नहीं पड़ेगा कि भ अमेरिका से अमेरिका में दुकान है और हिंदुस्तान में बापू के पास आए हे भाई दर्शन करने को दिलीप तो ऐसा तो रहेगा नहीं आगे दुकान पीछे मकान तो बचत हो जाएगी किराया बराया भी गाड़ी मोटर का पेट्रोल का डीजल का कोई खर्च नहीं होगा पैसे खूब ढेंगे तो फिर ब्याज ब्याज पर लाकर तो धंधा करने वालों को पीछे कर दूंगा मैं रोकड़े प लाऊंगा बेचूंगा लगेगी लाइन फिर मैं बिजी रहूंगा तब छोरा छोरा आएगा बेटा पिताजी पिताजी चलो भोजन
करने अब वो गिरा क्यों ग दूसरे तरफ छोरा बोलेगा पिताजी देर हो गई भोजन करने चलो ठ बाद में आता हूं मन ही मन ऐसा सोचा तो हाथ पर जो मटका था ना सिर पर मटका था हाथ से पकड़ा था बाद में आता हूं बाद में आता हूं करके यूं झटका मारा सिर का मटका गिर गया धड़ा और सेठ बोला अरे क्या करा तूने तो मेरा खाना खराब कर दिया पूरा घी का मटका ढोल दिया बोले सेठ जी आपका तो खाली घी डूला मेरा तो सब चौपट हो गया बोले क्या हुआ बोले मैं तो मुर्गिया
लाया मनराज से भैंसे लाया भैंसे बेची फिर माखन दुकान लिया शादी किया चुकरा बकरा मेरा तो मनही मन सब संसार बन गया था चल हटने तो मेरा सब चौपट कर दिया यह है मनराज का सुख ऐसे स्वपने में भी मनो राज का सुख आता है छ तो बठिया रो पर के राजा राजा ने ब ठट माट थ पता पथ सुतो प मारे प्रवे स्वपना मा बठिया है तो बठिया है तो भट्ठी का धंधा करने वाला लहार का बच्चा व सपने में देखता है कि मैं तो राजा हो गया हूं यह डॉक्टर राधा कृष्ण ने दृष्टांत
दिया दार्शनिक थे राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्ण तो है तो बठिया लेकिन स्वपना राजा होने का देख रहा है और स्वपने अपने में बाथरूम जाने को आंखें बंद और अपने बिस्तर से चला तो बटटी के अंगारे पड़े अरे तेरे क्या मेरा राजपाट चोपट हो गया और पैर जला तो यह भटियार को राजा होने का मनुराज का सुख स्वपने में मिल जाता है कईयों को मिल जाता है स्वपने में ऐसा हो गया ऐसा हो गया मजा आता है बिछड़े हुए मित्र से मिल गए अरे वल तो स्वपने में मनुराज का सुख आता है मानसिक स्वपन में ऐसे यहां
भी ऐसा होगा ऐसा यह है मनो राज जन्य सुख दुख फिर तीसा चौथा होता है अभ्यास जन्य सुख जो कसरत करता है पहलवान बराबर कसरत कर लिया भूख लगी खाया के मजा आया आसन प्राणायाम रोज करते तो नियम हुआ आसन प्राणायाम का तो मजा आया नियम में गड़बड़ हुई तो मजा गया तो अभ्यास जैसा है पढ़ने का पढ़ाने का यह वो तो मजा प नाथी तो जरा मजा तो यह अभ्यास जन्य सुख है इन चार सुखों में संसारी लोग बिचारे खप जाते हैं कोई अभ्यास जन्य सुख में मतलब क्रिकेट वाले को क्रिकेट देखने का करने
वाले को करने का भाषण करने वाले को भाषण करने का भाषण सुनने वाले को सुनने का मजा यह सब अभ्यास जन्य सुख है तो मनो राज्य जन्य सुख अभिमान जन्य सुख और विषय विकार जन्य सुख चार प्रकार के सुखों में जीवात्मा फसे हैं बंदे जैसे कोयल को अभ्यास है कह कह किया मजा आया बस पूरा होया कोल को पता नहीं कि टुंका कहां कौन सी सत्ता से आती है संचालक है तो संचालन का अभ्यास हो गया नर्मदा किनारे जाने का रकू होने का अभ्यास हो गया तो बस मैं नर्मदा किनारे जाऊ मैं इधर जाऊं मैं
उधर जाऊं तो यह अभ्यास जन सुख में मन हावी हो जाता है और रखड़े आदमी हो जाते किसी को वाहवाही सुनने का अभ्यास होता है तो बस वाहवाही के लिए ही अपना भाषण करते रहते हैं इधर से उधर विमोचन उद्घाटन यह अभ्यास जन्य सुख किसी को कोई सुख कोई हाल मस्त कोई माल मस्त कोई तूती मैना सुए में देख पट कितना बढ़िया है खाया पिया ठीक ठाक रहा मजा आया लेकिन ये मजा आया असली आत्मा परमात्मा का मजा खोजने पर तो पर्दा पड़ गया भाई सुनाई पड़ता है कोई हाल मस्त कोई माल मस्त माल पानी
मिल गया पैसे क अब आराम से भजन करेंगे भजन आराम से क्या करेगा आराम के पैसे तो तमस होगा सोएगा खाएगा दूसरे जन्म में बनेगा बैले भैसा बनेगा शारीरिक सुविधा वाला आराम वाला कोई भजन होता है भजन तो अंतर आत्मा का सुख जगाने के लिए तितिक्षा से होता है पैसे बैंक में जमा है एक दो नौकर रख लिया आराम से अपना भजन करते हैं य आराम से भजन नहीं हुआ शरीर का आराम मिला आत्मा का आराम नहीं मिलेगा आत्मा का आराम तो गुरु के द्वारा घड़ाई हो साधन हो तब मिलेगा नहीं तो राजा महाराजा आराम
से भजन करते क्यों जख मार गुरु के द्वार गए भिक्षा मांगने जाते अभ्यास करते अनेक जन्म का ये अनेक जन्म का विषय विकार आदत है तो उसको हटाना है और आत्मा सुख को बढ़ाना है तो उसके लिए भगवत आश्रय चाहिए गुरु की कृपा चाहिए और अपना पुरुषार्थ गुरु की कृपा और भगवत आश्रय तो है अपनी कृपा अपना पुरुषार्थ नहीं करा तो किसान पानी भी है व सा सूर्य ना किरण पण श उपजे ध आवे कई ना पते पुरुषार्थ करे बरसाद न उपयोग करें बरसात का उपयोग करें सूर्य के किरणों का उपयोग करें झाड़ी हो गई
तो छटाई करके सूर्य के किरण पड़ तब खेत लह लाएगा ऐसे ही जो आदत पड़ गई है जो आत्म खेती के ऊपर आदत का सुख है अभिमान का सुख है भोग जन्य सुख है मनराज जन्य सुख है तो खेती को ढाक दिया जंगल बन गया से ऊपरना झावा जम फोरी नाखवा पड़े खेत ने आजूबाजू ना झावा छड़ा हटा देवा पड़े आप य बैठा बैस मा लीड़ा सारा खेती करवी हो तो बटा देवा पड़ ऐसे ही अभ्यास जन्य सुख में संसारी सुख में पड़े हैं तो ठीक है सेट हो गया बेटे सेट हो गए फलान सेट
हो गया चलो आखरी में बुढ़ापा हो गया सुख सुविधा में मरे लेकिन मरेंगे तो फिर दूसरे जन्म में क्या पता घोड़ा हाथी बनते के कुत्ता बनते ईश्वर को तो जाना नहीं देवता बनते तो देवता बनेंगे तो पुण्य का फल भोग के गिरेंगे और घोड़ा गरा बनेंगे तो पाप का फल भोग के फिर कुछ बनेंगे किसी के गर्भ में लटक तो दुख तो चालू रहा ना दुख का चक्र तो नहीं टूटा ना तो दुख का चक्र तोड़ने के लिए मनुष्य जीवन है इसके लिए सत्संग है साधन है सतगुरु है अपना पुरुषार्थ है सार तापे तपता नाम
योगो परम औषध संसार के विविध ताप में तपने वालों के लिए भगवत योग भगवत मेल ही परम औषध है अब जात्रा में जाऊं इधर जाऊं उधर जाऊं तो मन में जैसा है ऐसे करते रहेंगे तो मनोरा जन्य सुख मिलेगा विषय जन्य सुख विषय जन्य सुख तो थका देगा कितने जन्मों में कितने जन्मों में यात्रा की कितने माता के गर्भ में किया कितने माता पिता के शरीर से यात्रा की कितनी बार संसार देखा संसार जिससे दिखता है उस परमेश्वर को देखो उर्स गच्छति सतवा सतो गुण बढ़ गया तो उर्द लोक में जाता है मध्य तिति राजसा
रजोगुण है तो फिर जन्म मरने के बाद संसार में आएगा अधो गच्छति तामसा जिनके स्वभाव में खानपान में तमोगुण ज्यादा है सूर्य उगने के बाद भी ते रहते हैं संध्याकाल में भोजन करते ऐसे लोगों को तो फिर पशु योनि में जाना पड़ता है गांधी जी कितने महान संकल्प के धनी जुवानी में ब्रह्मचर्य व्रत का धारण कर लिया अब फिर युवतियों के साथ रहते फिर भी उनका मन फिसलता नहीं ऐसे ऐसे भगवान के भक्ति का आश्रय था उन्हें गीता का आश्रय राम नाम का आश्रय और प्रार्थना नहीं करे तो उनको न नहीं पड़े प्रार्थना से बड़ा
बल मिलता है दोष मिटते एक दिन गांधी जी जरखा दंगल देखने गए तो थके मादे आए थे कि मैं प्रार्थना करके सोऊ लेकिन जरा आडे पड़े तो टब से झट से जरा झुकाया टप से नींद आ गई लेकिन वो प्रार्थना नहीं की तो अचेतन मन में खटका होथा रात को 2 बजे उठे और अपराधी कीना क्षमा याचना करते करते प्रार्थना फिर चैन से सोए दूसरे दिन अपने भक्तों के बीच प्रायों के बीच कहा कि भाई मैंने बड़ा अपराध किया कल मैंने प्रार्थना बिना ही मैं सो गया तो बोले बाप मा मोटी बात तो था केला
तो उ अरे ना ना केला हो तो पने वालो स्वास दे जीवन दे तो न ने भूली ने सु जावा तो सेे तो थाक मता जनी शरण में जीव जाए थाक मटा नी शरण में जता पहला नी प्रार्थना ना करे तो मोटी मारो बहु अपराध मो अपराध गांधी जी एक दिन प्रार्थना नहीं की तो बड़ा अपराध मानते हैं कितने सजग पुरुष है और अपन कभी प्रार्थना नहीं करते तो भी अपने को अपराध नहीं लगता है भगवत प्रार्थना और भगवत जप करते करते फिर सो जाना चाहिए आज से अच्छा ठान लो तो फिर रात्रि को चेतन
मन में उसके संस्कार पड़ बड़ी मदद मिलेगी हम तो रात को सोते हैं तो कोई शास्त्र पढ़ता हो और हम सुनते हो और उसकी थोड़ी व्याख्या करते करते फिर सो जाते वह समझ जाता है शास्त्र पढ़ने वाला के बाप सो गए या तो भगवत विचार या तो भगवत नाम अब आपको कोई शास्त्र पढ़ने वाला नहीं मिले तो सत्संग की कैसे नहीं तो भगवन नाम तो आपके घर की मुड़ी है सुबह उठो तो 10 मिनट उच्चे स्वर से भगवान ना लेते जाओ थोड़ी देर भले मानसिक चले फिर ओ ओम हरि ओम अथवा जो अच्छा लगे देखो
फिर सुबह कितनी पवित्र जाती ऐसा नहीं कि दूसरे का ध्यान भजन में विघ्न हो हां दूसरे सोए तो भले भगवन नाम उनके कान पर पड़े मधुरता से इससे बहुत लाभ होता है और भगवान कहते हैं मम वानो जीव लोके जीव भूत सनातना दुकान मकान रुपया गहना ज्वेलरी नहीं कहती कि हम तुम्हारे यह तो बड़े बेवफा है लेकिन भगवान तो कहते कि हम तुम्हारे हैं तुम हमारे हो मकान नहीं कहता डॉलर नहीं कहते कि हम तुम्हारे हैं डॉलर तो टेंशन देते हैं भगवान टेंशन हारते हैं अभी तो विज्ञानी बोलते जो प्रार्थना करते अथवा भगवान नाम लेते
हैं उनको हाई बीपी कंट्रोल हो जाता है क्योंकि भगवत भाव से ऐसे वेव्स वाइब्रेशन बनते आपने सुना गांधी जी को हार्ट अटैक हो गया कभी सुना था क्या प्रार्थना करते थे नहीं तो गांधी जी का टेंशन जितना था उतना तो तुम्हारे 10 जन्म में भी नहीं होगा इतना गांधी जी से अंग्रेज लोग धोखेबाजी करते थे इतने गांधी जी के विषय गंदी गंदी अखबारों में बातों में छपते थे गांधी जी युवतियों के साथ रहते हैं ऐसा है वैसा है लेकिन गांधी जी की सच्चाई उन सभी को बकवास को पोक कर देती थी अपने शत्रु को भी
टोटे चबाने की अपेक्षा खीर खांड खिलाओ तो आपकी विजय होगी जैसे गांधी जी की हुई अंग्रेजों ने इतना जुल्म किया लेकिन गांधी जी ने बदले में टोटे नहीं चबाए अमृत दिया जय श्री कृष्ण ऐसे ही आप भी अपने जीवन में अपने मित्रों में कुटुंब में अंतरात्मा से हां ऐसा नहीं कि वह नास्तिक और आप उनके हा में हा भर के उनके वाइब्रेशन में अपनी भक्ति नाश करो नहीं उनका मंगल चाहो लेकिन अपने काज हमार होई हित तासु होई अपना काम हो ईश्वर प्राप्ति का और हित उनका हो मस शरीर सहस्त्र है मन प्रसन्न और बुद्धि
में भगवत प्रसाद की भूख जगे तो फिर परमात्मा प्राप्ति हो जाती है उंड स्वास खूब गहरा [संगीत] शवास मधुर शांति परमेश्वरी शांति गहरी शांति ओम शांति होते जा परमात्मा का होते जा दीनता हीनता को हरने में सक्षम है कोई हमारा दुख मिटा दे तो हम निर्द दुख हो जाते हैं कोई हमारा पाप मिटा दे तो हम निष्पाप हो जाते हैं लेकिन हमारा कोई पाप चुरा ले तो हम निष्पाप तो होते हैं लेकिन पाप चुरा लिया तो हम एहसानमंद नहीं रहते क्योंकि पता ही नहीं चला तो दुख और पाप को चुरा लेने वाला भगवान नाम है
हरि ऐसे ही ओम नमो भगवते वासुदेवाय जो नाम है वह भोग और मोक्ष देने में सक्षम है ओम माना वह परब्रह्म परमात्मा जिसकी सत्ता से उत्पत्ति स्थिति प्रलय भृकुटि विलास सृष्टि लय हो जाता है नमो उसे हम नमन करते हैं उसके हम शरण है उस समय हो रहे हैं ओम नमो भगवते जो भगवान है आदि नारायण का साकार रूप भी और भरण पोषण की सत्ता स्पूर्ति सबको देने वाला अंदर बाहर व्याप्त वासुदेव है जो सब में बसा है और मेरा अंतर आत्मा हो के बैठा है हम उसकी सत्ता में स्फूर्ति में पूर्ण निस्फ निर् दव
और निरामय पद के साथ एकाकार हो रहे हैं यह मंत्र योग और क्षेम का वहन भी करता है जिन वस्तुओं का आवश्यकता है उसका मिलाप करा देता है और जिनकी सुरक्षा उचित है वैसे सद्गुणों की सुरक्षा कराने में भी सक्षम है ध्रुव को नारद जी ने नन्ना मुन्ना समझकर यही मंत्र दिया था कि जंगल में अकेला भी रहे तो इसके योग सेम की फिक्र ना रहे किसी को तो अ से सुरक्षा भी की इस मंत्र से मंत्र ने और देवताओं के प्रलोभन से भी बचाया और ईश्वर से योग भी करा दिया और ईश्वर से प्रश्न
भी पूछ दिया ईश्वर से प्रार्थना भी करवा दी के प्रभु जिसमें मेरा हित हो तो भगवान ने कहा तुमने जिस भावना से जप किया है तो उस पिता की गद्दी पिता की गोद तो ठीक पिता की गोद तो खुली है लेकिन पिता का शासन का तखत भी तुम संभालोगे और अंत में तुम्हें संत मिलेंगे और मुझ परम पद को मुझ आत्मा पद को तुम पाओगे दत्तात्रेय और वामदेव मिले उनको और दुरु को आखिरी में ब्रह्म ज्ञान भी हुआ तो यह भगवत नाम मंत्र योग शेम की अर्थात आवश्यक परिस्थिति आवश्यक वस्तु आवश्यक सामग्री आवश्यक सूझबूझ को
देने वाला भी है और जो उचित है उसकी रक्षा करने वाला भी शरण जोग सुनी सरनी आयो कर कृपा प्रभ आप मिलायो शरणी योग्य वो सच्चिदानंद मिट गए वैर भय सब मिट गए व भय सब काज अनंत नाम साध संग लाईजे तो जो अनंत का नाम और साधु के संग में लेते हैं तो अपना चित्त पावन होता है योग क्म का मार्ग सब सफल होता है और जीवन में ईश्वरी रस पाने की क्षमता बढ़ती है इस संसार का रस चार प्रकार का है भोग का रस अभिमान का रस प्रमाद का रस और मनो राज का
रस यह जीव को गिराने वाला है भावना का रस भगवत भाव का ध्यान का रस एकाग्रता का और तत्व ज्ञान का रस य जीव को मुक्त करने वाला तत्व ज्ञान वेदांत के शास्त्र पढ़ने मनन करने और मनन करते करते उसमें तदा होने से तत्व ज्ञान होता है तत्व ज्ञान मतलब आत्म साक्षात्कार व तत्व ज्ञान वैर झेर भय परिछन द्वेष आदि दोषों को दूर करने वाला ईश्वर की दूरी को मिटाने में सक्षम है तत्वज्ञान ईश्वर को या सुख को भविष्य में देखने की अविद्या हरने वाला है तत्त्वज्ञान मरने के बाद का वायदा नहीं जीते जी सुख
स्वरूप ईश्वर से एकाकार होने में है वेदांत का ज्ञान उस वेधांत के ज्ञान को निद धसन करने के लिए ध्यान बड़ा सहायक है ध्यान में चार बातें होती एक होता है कि अनुचित विचारों को निकाल फेंकना यह आत्मघाती विचार है नेगेटिव विचार सत्यानाश करने वाले विचार तो अनुचित विचार निकालना नकारात्मक विचार निकालना द्वेष के विचार निकालना किसी की निंदा के विचार करने की आदत निकाल एक तो अनुचित हानिकारक विचारों से पिंड छुड़ाना जिन विचारों से भय हो घृणा हो चिंता हो विकार पैदा होता हो उन विचारों को उठते ही जड़ से काट के फेंक देना
यह ध्यान में सावधानी दूसरी बात अच्छे विचार भरना सुख के विचार भरने का सफलता के विचार सामर्थ्य के विचार आपका अंतःकरण कल्प धम है कल्प वृक्ष है आप जैसे विचार करते हो वैसे ही रासायनिक परिवर्तन शरीर में होने लगता है और उसी प्रकार के विचार आप अगर चोर चोर चोर और डाकू डाकू के विचार से भरे तो चोर डाकू और जेब कतरे आपके तरफ आ ही जाएंगे और आपके करोड़ों पातक को नाश करने वाला अगर हम ब्रह्मस्मी का विचार भरते हो तो डाकू भी आपके आगे डाकू नहीं होंगे डाकू ने घेर लिया था अखंडानंद को
रात्रि के समय तो घबराए और दूर से बोले कि हम तो फलाने पंडित जी के पवित्र हैं अपने दादा का नाम ले अरे तो पाय लागू पंडित जी पाय लागू इस अंधेरी रात में आप कैसे इधर आ गए चलो हम आपको घर वापस छोड़ के आते हैं तो डाकुओं ने दादा का वैभव सुना था दादा का नाम सुना था अखंडानंद के दादा का ये वैभव है उनके नाम से ही काम हो गया तो ऐसे भगवान का भी वैभव है भगवान के नाम से भी काम हो जाता है और भगवान का नाम तो इतना व्यापक वैभव
है कि डाकू हमको ठग ठते फिर हमारे सुरक्षा बन जाते हैं काम क्रोध लोभ मोह मद मसर डाकू ही तो है लेकिन जब भगवत नाम कहा वैभव हम पुकारते चिंतन करते तो हमारे काम राम में बदल जाता है वैर समा में बदल जाता है भय निर्भयता में बदल जाता है इच्छा घृणा प्रेम में क्षमा में बदल जाती है तो भगवन नाम से दिव्य रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एक तो हीन विचार निकालना दूसरा दिव्य विचार भरना और तीसरा हीन विचार निकालना दिव्य विचार भरना फिर शांत आत्मा होना और अपने को खोजते खोजते नि संकल्प अवस्था
में जाना इससे अद्वैत ज्ञान मजबूत हो जाएगा