[संगीत] [हंसी] [संगीत] जितेश राजपूत जी राधे राधे गुरुदेव गुरुदेव सत्य की राह पर चलने वाले इंसान को भगवान जी इतनी परीक्षा क्यों लेते हैं आर्मी के आदमी को दौड़ना सीखना पड़ेगा आर्मी के आदमी को ट्रेनिंग के जितने सूत्र हैं सब उतारने पड़ेंगे तभी वो आर्मी फौज में हो जाएगा समझ रहे हो ना भारत का एक सैनिक बनने के लिए कितनी कसौटी चाहिए आप देखते हो ना इतनी ऊंचाई इतना ये इतना निरोग इतना ये तो भगवान का पार्षद बनने के लिए कितनी कसौटी चाहिए वही कसौटी होती है सत्य के मार्ग पर चलने वाला कभी ये प्रश्न
ही नहीं कर सकता कि इतनी कसौटी क्यों ली जाती है नहीं नहीं आर्मी में जो जाने की कोशिश करता है वो उत्साहित होकर सुबह रोज दौड़ लगाता है व रोज वो हर प्रयास करता है जानकारी करता है कि आर्मी वाले को क्या-क्या सीखना पड़ता है तो ऐसे हम भगवत प्राप्ति करना चाहते तो हमको जितनी भी कसौटी है वह हास कर के पार करना है भाई पीएचडी तक जाना है तो आपको हर क्लास पास करना है यह बहुत बड़ी ऊंची स्थिति भगवत प्राप्ति इसमें सत्य में चलने अभी सत्य को समझा नहीं जैसे हम सरा को बदलते
ना महाराज तो हमें कोई ना कोई कोई गलत रास्ता ही नजर ता है कोई बाहरी बाहरी वे हां तो हमको अपनी कसौटी पर रहना हमें सही चलना है हमें थोड़ी गलत रास्ते में झुक जाना है यही तो हमारी बात है जैसे हम किसी के साथ सही करते हैं ना तो लोग हमसे हमको मतलब गलत ही बताते हैं तो लोग बताएं गलत आपको तो पता चल रहा है आप सही चल रहे फिर क्या है अगर लोग आपको सही कह रहे हो आप गलत कर रहे हो तो हमारा भारतीय कानून आपको जेल में बंद कर देगा हमारा
भागवत कानून आपको नरक भेज देगा और आप सही चल रहे हो लोग आपको गलत कर रहे हैं इससे क्या होना है क्या फर्क पड़ना है आपको तो आनंद मिलेगा ना आप तो सच्चिदानंद को प्राप्त हो जाएंगे ना तो आपको दूसरों के दूसरों के मुंह के अनुसार सुनकर हम थोड़ी चलते हैं हम तो शास्त्र और संतों के मुख्य अनुसार सुन सत्य मार्ग दूसरों से नहीं बातिल भूत विवस मतवारे ते नहीं बोले वचन विचारे तिनक कहा सुने नहीं काना ऐसे माइक जो माया में फंसे हुए लोग हैं इनकी सलाह मानी जाती है क्या हमको इनकी बातें थोड़ी
माननी है हमको गंदे आचरण का त्याग करके और सत मार्ग में चलना चाहे सब हमारी निंदा करें चाहे सब हमारी वंदना करें इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता हम अपने मार्ग में अटल है ऐसे चला जाता है इस मार्ग में हमारे पास एक ही उत्तर है बिना भजन के कुछ नहीं होगा बिना भगवान के भजन के कुछ नहीं होना नाम जप करो बुद्धि शुद्ध हो जाएगी आत्म बल प्राप्त होगा सही चल पाओगे हम अनुभव की बात कहते हैं समस्त संसार को सुख शांति और दुखों से निवृत्ति का एक मात्र उपाय है भगवान के नाम का
जप अगर नाम जप नहीं कर रहा कोई भी हो कहीं भी हो असंतुष्ट होगा चिंतित होगा शकित होगा दुखी होगा कुछ भी कर ले य हम अपने अनुभव अपने संत गुरुजन शास्त्र और गुरुवाणी महापुरुषों के वचनों के अनुसार करह रहे बिना नाम जप के बिना संतों के संग के इन दुखों से पार नहीं पाया जा सकता नाम जप करते हो हां उसी को और बढ़ाओ कोई नशा तो नहीं करते होता नाम हां चलते फिरते भी कोई पैसा लगता है चलते फिरते उठते बैठते नाम जप करो और जो लोग तुम्हें गलत ए तो उस समय तुम्हें
और पुष्ट हो जाना चाहिए जहां फिसलन होती वहा पैर मजबूती से रखा जाता है सा ते हां तो तुम कह रहे हो ना कि हमको लोग गलत खींचना चाहते सा सही करते गलत बता तो आप सही करते रहो व गलत बताते रहे तो कोई फर्क नहीं पड़ता आप गलत मत कीजिए ना उसके प्रति गलत सोचिए वैसे आप कितना सही करते हैं क्या सही करते हैं जसे ब सही सोचते हैं हमें किसी के बारे में सोचने का मतलब क्यों है क्यों है जैसे हमने किसी सा सही किया क्या किया मतलब की जैसे अच्छा होता है ना
ज्ञान वगैरा मतलब नहीं आप वगैरा वगैरह क्या आप किया क्या हम बताओ ना देखो ऐसा इसलिए हम पूछ रहे हैं कि अभी आप थोड़ा ब्रह्माम हो कि आप कुछ कर सकते हो किसी का हित कर सकते हो किसी को मंगल कुछ नहीं कर सकते अगर किसी का मंगल होता है तो भगवान तुमसे करवा रहे हैं ऐसा बात सोचो तो तुम दुखी नहीं होगे और जब तुम अपने को कर्ता मानोगे तो दुखी आ जाएगा नहीं तुम क्या कर सकते हो बच्चा किसी का मंगल क्या कर सकते हो तुम अपना मंगल नहीं कर सकते अगर तुम कुछ
कर सकते हो तो अपना विनाश ही कर सकते हो अपना पतन ही कर सकते हो अगर तुम्हें कोई उठा रहा है तो किसी संत की वाणी भगवान की कृपा यह बात सोचो ना तो तुम्हें दुख नहीं होगा तुमको सोचना है जो आदमी गलत सलाह दे रहा है भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं मुझे पुष्ट होकर चलना है मुझे गलत मार्ग में नहीं चलना अगर किसी का हित हो गया तुम्हारे द्वारा तो सोचो भगवान की बड़ी कृपा जो मेरे द्वारा इसका हित करा दिया अब वो पलट कर तुम्हें थैंक यू धन्यवाद बोले ये ऐसी आशा मत
रखो तुम्हारी बढ़ाई करे ऐसी आशा मत रखो ये आशा तभी है जब तुम अहंकार से युक्त हो कि मैंने किसी का हित किया ये सबसे बड़ा दोष है भगवान हित करा रहे हैं अब तुम्हें कोई गाली दे तुम्हें कोई चाहे वंदना करे तुम्हें दोनों बातों में समान रहना है क्योंकि तुमने तो किया नहीं भगवान ने तुम्हारे द्वारा उसका मंगल करवाया हित करवाया ऐसे सोचा जाता है तब अहंकार रहित होकर भगवत मार्ग में आगे बढ़ा जाता है अगर ये आएगा हमने इसका हित किया हमने तो फिर देखो दुखी हो वो गाली दे ऐसा तो फिर आप
दुखी हो जाओगे नहीं जो दुख और सुख में समान होता है व भगवान का भक्त होता है आगे बढ़ो नाम जप करो और सत्संग रोज सुनते रहो गाली दे कुछ भी बोल कोई कुछ अरे गाली तो बच्चा तुम्हें क्या भगवान को भी देते हैं लोग नहीं है पूरी सृष्टि में अगर देखो तो हजार भगवान की पूजा करने वाले तो दो चार तो गाली देने वाले मिलेंगे ही भगवान को भी अगर आप देखो समाज में तो हजार लोग नमस्कार करने वाले तो 10 पाच तो मिलेंगे गाली देने वाले तो भगवान जब धूप देते हैं तो छाया
भी देते हैं जब दिन देते हैं तो रात भी देते हैं इसलिए दुख सुख में समान रहना तभी इस मार्ग में चल सकते हो नहीं तो और उसमें हमारा लाभ होता है जब हमको कोई गाली देता है तो हमारे पूर्व में जो पाप हुए हैं वो नष्ट हो जाते हैं इस ऐसा हर चीज का विधान है जैसे किसी ने आपको गाली आपके हृदय में ताप हुआ ना जलन हुई और आप सह गए तो आपके पाप नष्ट हो गए आपने पलट कर जवाब दे दिया गाली दे दी तो बात नहीं बनी तो हमको चुपचाप सह जाना
है जिससे हमारे पाप नष्ट हो जाएंगे हम भगवान के मार्ग में आगे बढ़ेंगे समझ पा रहे हैं आप रजनी अमित अग्रवाल जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी सब कहते हैं कि बिना गुरु के गोविंद नहीं मिलते क्या यह सच है कोई इसका प्रश्न रंगनाथ जी के दर्शन किए निधिवन राधा रमण सेवा कुंज हमारे वृंदावन में बहुत सी ऐसी जगह है इसके लिए गाइड की जरूरत है कि नहीं जरूरत है जिसने सब जगह देखा हो वह गाइड अगर हमें मिल जाए तो बिना किसी प्रश्न के हमको सहज में सब जगह दर्शन करा देगा तो इस
संसार समुद्र से मुझे पार करने वाला इस भव समुद्र में मैं फस ना जाऊं उसका ज्ञाता एकमात्र भगवान ही है वही भगवान जब जिस पर कृपा करता है तो गुरु बनता है बंदो गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि नर रूप धारण किया हरि ने कृपा करके और वही हमें उपदेश करते तो हम संसार से पार हो जाते हैं बिना गाइड के हम किसी जगह का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते तो हम बिना किसी जानकार के हम किसी वस्तु का सही बोध नहीं प्राप्त कर सकते तो सा अखिल ब्रह्मांड का रचने वाला अपने आप
से अपने आप में खेलने वाला जो अपने आप से अपने आप का सृजन करता है अपने आप से अपने आप का पालन करता है अपने आप से अपने आप का संघार कर ले उसके रहस्य को बिना उसके कौन जना देगा वही तो गुरु है जो जना दे वही गुरु है और जो जान गया वह उसी में लीन हो गया जानत तुम्ह तुम्ह होए जाई और सय जानो ज दे जनाई तो यह तो पक्की बात है बिना गुरुदेव के कैसे जान सकते हो कैसे जान सकते हो भाई किसी बात का रहस्य जानना है हम कह रहे
निशाना लगाना है तो हमें गुरु बनाना पड़ेगा किसी भी कार्य के लिए सारे गामा पध नहीं सीखना है तो हमें गुरु बनाना पड़ेगा और हम तत्व बध करना बिना तत्व बोध प्राप्त कि गुरु के कैसे हम जा सकते हैं कोई हमें बताए कि बिना गुरु के कौन सा कार्य हो सकता है एक आदमी पूरी इंजीनियरिंग पास किया जनरेटर की और इसके बाद एक जनरेटर की दुकान में गया जहा सैकड़ों जनरेटर थे बोले साहब यह हमारी इंजीनियरिंग की पूरी सर्टिफिकेट है आप हमें नौकरी दे और हम आपकी सेवा करेंगे बोले कहीं आपने किसी इंजीनियर के नीचे
आप रहे कभी आपने जनरेटर खोला बांधा सेवा की बोले ऐसा तो नहीं कि पर पूरा ज्ञान है हमको हमने पढ़ा है उनका एक जनरेटर हम खोल देते हैं आप बांध कर चला दीजिए आपको जो उचित होगा उतने पेमेंट में आपको हम रख लेंगे जनरेटर खोला पूरा उसने बांध दिया पढ़ाई की थी शास्त्रों से पढ़ाई की थी बांध इसके बाद जनरेटर स्टार्ट किया चलाने एक घंटा परेशान रहा उने कहा सर बारबार मैं देख रहा हूं कि जो मैंने पढ़ा है व मैंने पूरा हर बुलटू को जहां लगाना चाहिए वैसे पूरा सब तो उनका तुमने किसी इंजीनियर
के नीचे काम नहीं किया पढ़ाई तो की है काम नहीं किया इसलिए तुम जनरेटर पूरी शाम हो जाए तो नहीं चला सकते मैं जान रहा हूं क्या कमी है तुम पड़े हो कड़े नहीं हो उ साहब एक बार बता दीजिए गलती क्या हो गई उ इसकी गैस नहीं काटी तुमने ब गैस काटी चल पड़ा एक गैस ना काटने से पढ़ाई बेकार थी जनरेटर नहीं चल रहा था एक साधारण इंजन को चलाने के लिए एक चलाए हुए इंजन वाले व्यक्ति के नीचे कुछ दिन रहना पड़ेगा तो भगवत प्राप्त महात्मा के बिना भगवत प्राप्ति का मार्ग कैसे
प्रशस्त हो सकता है जो अव्यक्त है इंजन तो दिखाई दे रहा है परमात्मा तो दिखाई नहीं दे रहा ना दिखाई तो माया दे रही है ना व्यक्ति वस्तु स्थान दिखाई उस अव्यक्त को पाने के लिए बिना गुरुदेव के कैसे प्राप्त कर सकते हैं अब आजकल गुरु चेला का एक मतलब सांसारिक संबंध माना जाता है गुरु चेला का संबंध भागवत होता है उपदेश दिया उसके अनुसार तुम चलो दूर यह चिपकने वाला थोड़ी होता है दूर अपने मार्ग में तुम चलो अपने मार्ग में हम चलते तुम्हें मार्ग बता दिया तुम अपने मार्ग में चलो तुम्हें जब प्रश्न
हो तबी कर लेना चलो अपने अपने मार्ग में चलो ऐसा थोड़ी कि गुरु शिष्य का संबंध सांसारिक संबंध जैसे है नहीं गुरु शिष्य का संबंध भागवत है आपने सुना आपने प्रश्न किया हमारी बात मान लो आप परमात्मा को प्राप्त हो जाओगे उसमें जरूरी थोड़ी है कि भाई हम तो से पूरा का पूरा है बात मानना गुरु बनाना है बात ना मानो तो कंठी बंद वालो इससे कल्याण हो जाएगा क्या बात मानने से किसी भी संत महात्मा की वाणी में पावर होता है उसकी बात को मान ले आप देखो आपका कल्याण हो जाएगा बात ना माने
तो गुरु ऐसे बाहरी व्यवहार करने से भाई गुरु ने तिलक दे दिया कंठी बंधवा लि मन मानी पापा चरण करो तो नरक जाओगे भगवत प्राप्ति नहीं होगी और आपने कुछ नहीं किया केवल बात पर चल दिए उनकी लाखों लोग संतों की बात पर चल देते वो मिलने बाद में आते हैं जैसे यहां कई लोग आते हैं कि हम छ महीने से आपका सत्संग सुन रहे हैं हमारा सुधार हो गया है और मिलने छ महीने बाद आ रहे तो किसने सुधार किया वाणी ने शब्द ने सुधार कर दिया शब्द मानना ही गुरु के शब्द ही है
जिनको मानना ही गुरु मानना है हम उनकी बात मानकर अपना जीवन उनकी आज्ञा पर चला दिया हो गई बात द्रोणाचार्य ने शिष्य नहीं माना एकलव्य को एकलव्य ने द्रोणाचार्य को गुरु मान लिया तो अर्जुन से भी बड़ा धनुर्धर था मानने से होती बात मान लिया उनकी आज्ञा पर चल दिए गुरु भी ना माने शिष्य गुरु के माने थोड़ी होता है शिष्य के माने होता है हम आपको प्रभु मानते हैं हम आपकी बात पर चलेंगे हमने आपको अपना प्राणा राध मान लिया हो गई बात इसे कहते गुरु मानना जसे पहले सम उस मन भटकता नहीं था
अभी लोगों का मन इतना भटका हुआ है अभी जैसे आप लोगों का य प्रश् नहीं होता य अपना प्रश्न होता है देखो सत्संग और संतों से बात की जाती है डायरेक्ट हम लोगों को लेकर बात नहीं करते लोगों का अगर आप प्रधानमंत्री हो तो आप लोगों के क्योंकि पूरा राष्ट्र का भार आपके ऊपर है राष्ट्रपति हो तो आप प्रश्न कर सकते हैं देखो सत्संग अध्यात्म स्वयं सुधार के लिए होता है यदि हम अपने सुधार की बात करें तो लोगों का सुधार अपने आप होता चला जाएगा हमारे परमाणु ऐसे बनेंगे हमारा व्यवहार ऐसा होगा अगर हम
सुधर गए तो हमारे से दो चार सुधर जाएंगे और दो चार से 10 20 सुधर जाएंगे 10 20 से हो सकता है पूरा माहौल बदल जाए तो हम पहले अपना सुधार शुरू करें हम अपनी समस्या का समाधान करें तब बात बनेगी क्यों आप सुधर गए हो आप महात्मा हो आप भगवत प्राप्त हो तो नहीं तो आप अपने सुधार का प्रश्न करो लोगों के सुधार करें तब आनंद आएगा अब लोगों में आप कुछ भी पूछती चली जाओगी नहीं बनेगा आप अपनी पर्सनल बात पूछो और जिससे लोगों का सुधार होने वाला उत्तर मिल जाएगा अपने आप सत्संग
जो होता है आध्यात्म जो होता है वो अपने को लेकर प्रश्न किया जाता है कि मेरा मन बड़ा चंचल उसको कैसे हम समाहित करें तो सबका मन चंचल है अब उसके समाहित का उत्तर मिल जाएगा अब हम लोग क्या करते हैं अपने को छुपा कर के फिर तो हमारा उत्तर नहीं काम करेगा हमारा उत्तर डायरेक्ट काम करता है हमारे यहां प्रश्न होता है आपकी कमी के सुधार के लिए उसका लाखों लाभ ले ले वो बात अलग है प्रश्न आपका होगा कमी आपकी होगी सुधार लाखों का होगा समझ पा रहे हैं आप मेरे में तीव्र लगन
की बहुत कमी है तीव्र लगन की क तीव्र लगन हमारा मह हमारा महत्व प्रभु में लग जाए ना देखो जिस बात का महत्व जागृत हो जाता उसकी लगन लग जाती है और उसकी अगन लग जाती फिर चैन नहीं पड़ती अभी हम भगवान का महत्व नहीं समझ पा रहे अभी हम प्रभु के नाम जप का महत्व प्रभु के रूप का महत्व इस मानव जीवन का जो लक्ष्य है उसका महत्व नहीं जागृत हुआ अभी भोगों का महत्व है भोगेश्वर हत चेत साम व्यवसाया आत्मिका बुद्धि समाध न विधियर ने अपरत कर ली है जो ऐश्वर्य को सुख मान
रहा है वो कभी भगवत प्राप्ति की लगन वाला होता नहीं है इसलिए सुधार के लिए रात दिन ज्यास से नाम जप करो अभी लगन लग जाएगी जब दो लकड़ियां आपस में जोर से घर्षण की जाती तो आग नहीं शरू उसमें आ जाती अरण्य मंथन इसी को कहते हैं दो लकड़ियों के घर्षण से जब आग पैदा हो सकती है तो भगवान का नाम चिदानंद में है वो राम कहो कृष्ण कहो हरि कहो शिव कहो जब हम बार-बार अपनी जिव्या से रड़ते राधा राधा राधा राधा राधा तो दिव्य शक्ति हम में प्रकट हो जाती है हमारी नष्ट
हो जाती है असद भावनाएं और सद भावना का प्रकाश हो जाता है आज तक कोई कितना भी बड़ा महात्मा हो उसके मूल में भगवत भजन है अगर भगवान का चिंतन नहीं भजन नहीं ब्रह्म चिंतन नहीं आत्म चिंतन नहीं कुछ नहीं है बाहर नाम जप करो चिल्ला चिल्ला के सबसे कहते हैं हमारे हर प्रश्न का उत्तर नाम जप है क्योंकि बिना नाम जप के कुछ नहीं नाम जप करो जो नाम प्रिय हो भगवान का वो नाम जप करो नहीं तो हम तो चिल्ला चिल्ला के कह रहे हैं कि हम तो राधा किशोरी के दास है राधा
राधा राधा राधा राधा आठो पहर जपो राधा राधा जपो कृष्ण कृष्ण जपो राम राम जपो शिव शिव जपो जो प्रि हो बिना भजन के वारी मथे ग्रत होय बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन न भव तरी या सिद्धांत अपील जो राम राम कहना नहीं जानते थे वह मरा मरा कह के ऐसे महान ऋषि हो गए तो तुम राम राम कहक कृष्ण कृष्ण कह के क्यों नहीं भगवत प्राप्ति कर सकती निराश होने की जरूरत नहीं थोड़ा लड़ाई लड़े अपनी जिव्या को थका है नाम जप करवाए भगवान की कथा सुने भगवान की महिमा सुने अभी
भगवान में लगन लग जाएगी लगन लग गई तो फिर जीवन का जो लाभ है वो मिल जाएगा नाम जप करो बिना भजन के सब बकवास तब ज्ञान पढ़ा लिखा व्यर्थ हो जाता है जब तक चिंतन ना हो चिंतन संसार का हो तो ज्ञान किस काम का चिंतन परमात्मा का हो और कोई ज्ञान ना हो तो सब ज्ञान जागृत हो जाएगा चिंतन का प्रभाव भगवान कह रहे हैं गीता जी में अनन्य चिंत तो माम येय जना पर पासत तेशाम नित्या भक्ता नाम योगक्षेमं भ्यम जो मेरा अनन्य चिंतन करता है उसके योग क्षेम का ठेका मैं लेता
हूं भगवान क तो जपो नाम जप करो भगवान का जो नाम प्रियो खूब रात दिन जपने का प्रयास करो सब भगवान की कृपा से ज्ञान हो जाएगा ऐसे संत मिल जाएंगे वैसे ही मार्ग दिखाई देने लगेगा वैसे शांति हो जाएगी सचिन शर्मा जी गाजियाबाद से राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके श्री मुख से सत्संग में सुना था कि यदि जीवन में किसी का भी अन्य आश्रय है तो श्री जी की प्राप्ति में बाधा है महाराज जी यह शरीर एक रोग के ग्रसित है जिसकी वजह से आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः इस
शरीर की पत्नी पर आश्रित है तो क्या ये मेरे जीवन में विचार करना चाहिए कि श्री प्रिया जू ने इसको निमित्त बनाया है प्रियाज ने निमित्त बनाया है हम प्रधानता प्रिया जोग रखें आ तो व्यक्ति से ही रहा है व्यक्ति ही दे रहे हैं भगवान थोड़ी प्रकट में आ कर के ये लो भगवान प्रेरित करके दे रहे हैं हम मान रहे हैं कि भगवान इसको भेजे मान लो आपने 00 रप निकाला तो भगवान ने इसको प्रेरित किया कि 00 रप दे तो 00 मिला तो हमारी दृष्टि भगवान पे आप पे नहीं है ऐसे ही भगवान
ने पत्नी को तुम जानते नहीं हो पूर्व में वह क्या थी और आगे वह क्या होगी तुम्हें पता नहीं लेकिन भगवान को पता है और उन्होंने आपका जीवन साथी आपके मंगल के लिए वो व्यवस्था करा दी तो आपको भगवान पर दृष्टि रखनी है और उस जो निमित्त बना है हम उसके प्रति नम्र रहते हैं पर भावना हमारी है कि यह व्यवस्था भगवान की है इसलिए हमारा अन्य आश्रय नहीं होगा हमारा अन्य आश्रय नहीं होगा जैसे अब हम आंख मूंद करके बैठे और सोचे कि हमारी व्यवस्था किससे चलती है हमारी सीधी दृष्टि में आना चाहिए प्रभु
वही सब कर रहे हैं चाहे वह पत्नी रूप ले ले चाहे व मित्र रूप ले ले भगत रूप ले ले कोई रूप ले ले वही कर रहे दूसरा कोई नहीं कर रहा ब यह भावना संभालने है कर तो कोई रहा है ही है ना किसी ना किसी रूप में आ रहा है वह उसी से व्यवस्था हो रही है लेकिन कोई जो दे रहा है वो हमारा भगवान है सिर्फ आप जैसे हमें लग रहा भगवान ने प्रित करके भेजा इसलिए ऐसा भगवान का भाव हमारा आंतरिक रहना चाहिए जैसे हमें किसी ने संभाला तो हम उसे साक्षात
भगवान देखते हैं अरे हम तो गिर रहे थे लेकिन यह जो दौड़ के आकर पकड़ा ये मेरे भगवान है हमारी दृष्टि व्यक्ति पर नहीं जाती वो भगवान पर जाती है कि अरे भगवान तो भगवान के सिवा व कोई है नहीं यह शास्त्रों में लिखा हुआ है तो फिर हम यही बात माने कि पत्नी में भगवान ही बैठकर तो हमारी सेवा कर रहे बस ये भाव रखना है एक बार हम ट्रेन में जा रहे थे भ्रमण कर रहे थे तो महोबा से किसी ने हमें बैठा दिया अब वो बेचारा मतलब जैसे श्रद्धा उसकी तो तीन स्टेशन
की टिकट जनरल डिब्बे की और ज्यादा हम अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं नहीं कक्षा नौ तक पढ़े तो अंग्रेजी का ज्ञान है नहीं तो टिकट मतलब टिकट और गांव में पैदा हुए तो हमको ये सब ज्ञान नहीं है और बैठा लिया हमको अच्छे वाले उसमें डिब्बे में क्या कहते हैं उसको हां अब वो जब टिकट चेक करने वाला तो दसव स्टेशन पार हो चुके थे महोबा से बनारस हमें जाना था तो उसने कहा टिकट तो उसने कहा ये टिकट तीन स्टेशन के और जनरल के है कहां जा रहे हो उका वाराणसी तो बड़े अभद्र तरीके से
वो बात कर रहे थे मब साधु की वकत तो कोई श्रद्धावन जानेगा सांसारिक का में क्या वक्त जाने तो ऐसे अभद्र शब्दों का प्रयोग करके और खड़े हो हम खड़े नहीं हो पाए कि ऊपर एक आदमी सो रहा था वो नीचे उतर आया अंग्रेजी से बात की उनसे अब हमको तो पता नहीं क्या बात अंग्रेजी से की पैसा निकाला इतनी बड़ी कागज वाली टिकट हमको दी और कहा आप बैठ जाइए और उनसे कहा आप जाइए और वह चले गए और वह फिर लेट गया कोई राधेश्याम ने कोई मतलब ये कौन था ऐसे लोक दृष्टि से
देखा जाए तो दयालु व्यक्ति कोई था लेकिन हम जब अपनी दृष्टि से देखा तो मेरा भगवान था क्योंकि मुझे कुछ पता नहीं मैं उनके सहारे हूं य ये टिकट ले बैठा दिया और सारी बात उनसे करके उनको वापस कर दी भगवान हर घटना हर परिस्थिति में कोई व्यक्ति रूप होता है लेकिन हम व्यक्ति रूप देखते हैं तो संसार है हम व्यक्तित्व का नहीं देते हम उस समष्टि परमात्मा का देखते हैं पर इससे बड़ा क्या सम्मान होगा कि मुझसे व्यक्ति ना मानकर सीधे परमात्मा मान रहे हैं कि आज मेरे परमात्मा ने रूप धारण कर मेरी रक्षा
की आप समझ रहे ना इसे अनन्य होता कहते हैं हर वस्तु हर व्यक्ति हर स्थान हर घटना हर परिस्थिति में अपने भगवान को देखना यही अनन्य का इसका मतलब ये नहीं कि केवल सीधे भगवान थाली लेकर आवे तो हम पाएंगे नहीं तो हम नहीं पाएंगे ऐसा कभी नहीं किसी महात्मा के साथ हुआ आते हैं भगवान लेकिन किसी ना किसी रूप में आते हैं हमें पहचानना है ये सारे रूप उन्ही परमात्मा के उनके सिवा कोई नहीं है भाई यही बात जान लेना अनन्य है सो गति जाके अस मति न टरे हनुमंत मैं सेवक सच चर रूप
स्वामि भगवंत हे हनुमंत उसी को अनन्य भक्त कहते जिसकी यह मति रहती है कि मैं सेवक हूं चराचर जगत मेरे स्वामी का रूप है मेरे भगवान का रूप खत्म खे अनन्य में कभी कोई बाधा नहीं आप समझ पा रहे मोहित जी राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी पूज्य गुरुदेव आज से एक वर्ष पूर्व आज के ही दिन आपसे एकांतिक वार्तालाप में आपका दिव्य दर्शन व सानिध्य प्राप्त हुआ उसके बाद जीवन में काफी सुधार भी आया और व्यसनों से मेरे को मुक्ति मिली श्रब मास आदि मैंने छोड़ दिया और राधा नाम जप करने लगा गुरुदेव आपका दास
एक कपड़े का दुकानदार है आपके कहे अनुसार हिसाब में एक दाम में विक्रय करते हैं लेकिन हमें कपड़ा बेचने के लिए काफी प्रलोभन एवं लुभावनी बातें करनी पड़ती हैं ऐसे में हमसे कोई त्रुटि तो नहीं हो रही किसका प्र हां नहीं अपने सामान को बेचने के लिए प्रशंसा तो करनी है पर हमको घटिया सामान नहीं देने और झूठ नहीं बोलना जैसे कोई भी सामान है तो खरीदने वाला जानता है कि यह मुनाफा लेकर ही बेच रहा है और सबको ही जानता है कि दुकानदार का मतलब है कि वह अपना घर परिवार इसी से चला रहा
है बिजली खर्चा है नौकर का खर्चा है घर परिवार का खर्चा है तो लेने ही सी बात के लिए गया है वोह ऐसा नहीं कोई जानता है कि बिल्कुल जो खरीद के लाया उसी दाम में दे देगा तो जैसे कुछ लोग इसे झूठ बोलते हैं भाई हम आपके लिए कह रहे हैं बिल्कुल नहीं बच रहा है ऐसे बोलते हैं लोग कसम से बिल्कुल नहीं बच रहा यह सब नाटक बाजी करने वस्त्र बहुत बढ़िया हो उसकी कीमत फिक्स हो जैसे कोई कहे 130 का उधर मिल रहा था आप 160 का दे रहे हो हम यही 160
का देंगे 130 का मिल रहा है आदर से आप ले लीजिए जाके पाच पैसे कम नहीं बिल्कुल अपने पर टिके रहो झूठ बोलना नहीं कि भाई हम इतने का लाए हैं इतने कुछ नहीं सीधी बात है अच्छा कपड़ा रखो अच्छी क्वालिटी कर रखो जैसी जैसी क्वालिटी है उसके अनुसार उसका दाम अपना मुनाफा लगाकर फिक्स कर लो कि इसका अधिक से अधिक मुनाफा रप तो हम रप का मुनाफा ले रहे बताने की जरूरत नहीं उसको बोल दिया इसमें कोई हानि नहीं अपनी वस्तु बेचने वाला प्रशंसा करता है अपनी वस्तु की पर उसको झूठ प्रशंसा ना करें
जितनी क्वालिटी का है जितने दाम का है उससे हम प्लस करके अपना मुनाफा करके बेच र उसी के हिसाब से प्रशंसा कर रहे हैं अब घटिया माल को अच्छा माल बता कर के हमें नहीं देना है यह 4 मीटर का य 0 मीटर का है इससे कई गुना बढ़कर इसका सूत मजबूत है यह इससे कमजोर है तभी 0 मीटर है तभी 0 बिल्कुल झूठ तुम सत्य में फिक्स दाम पर अच्छी वस्तुएं दो जो अच्छे लोग हैं वो समझ जाएंगे इस दुकान में मूल भाव होने वाली बात नहीं है आप एक को अपने आप और सबसे
बढ़िया बात है कि धर्म से यदि आपको 00 मिल रहे हैं तो आपको सुख शांति मिलेगी आपके परिवार में दिमाग की उलझने नहीं रहेगी दिमाग से स्वस्थ रहेंगे अगर धर्म से कमा के ले जाओगे तो परिवार में ही दिमाग की उलझन बढ़ जाएगी दिमाग से अस्वस्थ हो जाएंगे लोग अस्वस्थ दिमाग का मतलब भाई भाई में लड़ाई पति-पत्नी में लड़ाई माता-पिता के प्रति अभद्र वहार यह सब दिमाग के बीमार लोग हैं जरा जरा सी बात में छोटा भाई बड़े भाई को मार रहा है बड़ा भाई छोटे भाई को मार रहा है यह सब दिमाग के बीमार
है यार उसी मां के गर्भ से पैदा हुई है अगर छोटी-मोटी वस्तु उसके हिस्से में चली जाती है तो कोई बात नहीं मेरा बड़ा है पिता की तुल्य है या मेरा छेटा है पुत्र के तुल्य खा मौज करो यार उसमें क्या लड़ाई झगड़ा लेकिन दिमाग के बीमार लोग छोटी छोटी वस्तु में छोटी-छोटी जगह में अपने भाइयों की हत्या तक कर डालते हैं आप तो समाज में सब देख रहे तो जो अधर्म की कमाई है वो इस तरह से हमें पीड़ा पहुंचाती है धर्म की कमाई में शांति रहती है सुख रहता है भगवान का भरोसा रहता
है और परिवार उन्नतशील होगा दीपक की तरह जलेगा लेकिन बहुत काल तक और यह अधर्मी लोग जो है य हाइलोजन की तरह बढ़ेंगे लेकिन फ्यूज हो जाएंगे घूस लेकर के नाना प्रकार के अधर्म आचरण करके दूसरों की हिंसा करके जो पैसा कमाया जाता है ना वो बहुत जल्दी विनाशकारी खेल में होता पूरा परिवार का परिवार गाड़ी में ही भ जाते हैं एक्सीडेंट में ही यह समझो यह कर्मों का फल है तो हम ज्यादा प्रलोभन में ना पड़े उचित मूल्य और निश्चित मूल्य और पवित्र आचरण और भगवान का नाम जब तो देन हार कोई और है
कहां से वह दे देगा तुम पक्का आनंदित हो जाओगे पक्का जान लो कि वह जब देता है तो कैसे वह बनाता है आप जान नहीं पाओगे ने लाखों कमाई जो है व बीमारी में ही चली जाती है व टेंशन में चली जाती है सब व्यवस्था है और बैर विरोध अशांति अगर पति पत्नी में य अशांति है अब क्या जीवन है क्या जीवन है घर में गए सब व्यवस्था ठीक लड़का बच्चा ठीक तो एक शीतलता घर में गए घोर अशांति घर जाने का मन ना हो तो क्या फायदा तुम्हारा बहुत बड़ा मकान बना बहुत बढ़िया गाड़ी
खरीद लिए सोने चांदी के आभूषण पहना दिए घर में लेकिन शांति नहीं तो किस बात वो शांति बुद्धि की आएगी धर्म के पैसे से मेहनत की कमाई से जो धर्म के द्वारा वो शांति प्रदान आजकल लोग बहुत जल्दी बड़े आदमी बन चाहते और वो रास्ता शॉर्टकट अपनाते हैं बेईमानी वाला तो फिर वो शर्ट कट में नष्ट हो जाते हैं यह भी बात समझो भगवान का जो विधान है अवश्य में भक्त कृतम कर्म सुभा सुभम धीरे से चलो दीपक की तरह जलो कुल परंपरा प्रकाश होता रहेगा धर्म पूर्वक चलो और अधर्म से चलने पर शांति नहीं
है अपनी वस्तु को बताने के लिए प्रशंसा की ही जाती है लेकिन इतनी असत प्रशंसा ना करें जो बिल्कुल ना हो हां कुछ तो प्रशंसा की जाती तभी तो सामने वाला खरीदेगा क्योंकि अपना व्यापार में तो हम असत्य ज्यादा ना बोले ज्यादा का मतलब बिल्कुल घटिया वस्तु है उसको बढ़िया करके बड़े पैसों में बेच रहे हैं तो भगवान को देखता रहे कि भगवान देख रहे हैं मुझे कुछ परसेंट में मुनाफा लेना सबको ई जानता है दुकानदार का यह धर्म है क्योंकि वो कैसे चलाएगा रात दिन तुम्हारा नौकर थोड़ी परिवार का पोषण करना हर व्यवस्था करना
उसी से होता है उसके लिए नहीं व्यापार बना ही है मुनाफे के लिए व्यापार बना ही है लाभ लेकर वस्तुओं को बेचना ये धर्म है आज तक कहीं ऐसा नहीं पाया गया कि जितने खरीद के लाए उतने का दे दो ये व्यापार का धर्म ऐसा नहीं व्यापार धर्म ही है कुछ परसेंट में मुनाफा लेकर दूसरों को बेचना वो सत्य विषय है तो उस विषय में कोई झूठ नहीं है पर बहुत अब जैसे स्वर्ण की वस्तु को नकली करके असली स्वर्ण बताकर धोखे में डाल दे फिर वो दुर्गति को प्राप्त हो म एकदम घटिया वस्तु को
एकदम बढ़िया करके ऐसा नहीं उचित दाम उचित मुनाफा और उचित प्रशंसा क्योंकि बहुत झूठ बोलने से लाभ नहीं मिलता है जो झूठ बोलता है उसका स्वभाव बन जाता है झूठ बोलना और नहीं असत्य सम पातक पंजा झूठ के बराबर पाप नहीं क्या लेना लेना देना क्या है लोग बहुत आजकल झूठे बोलने लगे झूठ बराबर पाप नहीं यह कई जगह पाया गया है नहीं असत्य सं पातक पंजा साच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप जाके हृदय सांच है ताके हृदय आप जगह जगह महापुरुषों ने कहा है तो हम व्यर्थ में झूठ के बोले तो बहुत बढ़िया
है आप उसको और थोड़ा संभाल लीजिए कि कोई ऐसी बात ना हो जो ना हो और वो हम कह रहे हो दोष दर्शन बहुत होते हैं जैसे कभी कभी जैसे बहुत कुछ दिखाया उसके बाद आखरी में ना लेना तो अरे वो आप ना ले पाओगे ये वो हां अब इसको इस तरह से ले अगर आपने कभी सुना हो हमने एकांतिक में भी और सत्संग में कहा कि व्यापारी को ग्राहक को भगवत स्वरूप देखना होगा मेरे भगवान आए तो अगर थोड़ी देर वो आपसे सब देखा और इसके बाद चल दिया और अगर आप यह माने कि
मेरे प्रभु इतनी सेवा ले ली चवन्नी का मुनाफा तो दिया नहीं तो मुनाफा देने वाले तो आप वो सेवा मेरी व्यर्थ नहीं जाएगी क्योंकि मैंने भगवान मान के आपका आपको यह समय दिया यह सेवा की तो आपको आनंद आएगा और गाहक मान कर के केवल देखोगे तो जलन हो जाएगी आधा घंटा से हर थान देख लिया एक मीटर भी नहीं लिया तो इस जलन से बचने के लिए भगवत भाव रखना पड़ेगा कि ग्राहक को देखते ही पहले कि प्रभु आप आए हो नाथ अब देखते हैं कि आप क्या सेवा लेते हैं हो सकता है आधा
घंटे दुकानों में नहीं आते ऐसे लोग तो अपनी सावधानी रखनी है और अपना भगवत भाव ना है अपने को क्लेश ना होने पावे संतुष्ट नवा मन को यदि संतुष्ट कर पाओ तो सबसे बड़ी साधना है कि मन जलने न पावे तो यह जो जलन है भगवत भाव से मिट सकती है यदि आप रखो य भगवत भाव है जैसे हम आपसे बात कर रहे हैं तो भगवत भाव से कर रहे अभ यहां से हटेंगे एक क्षण में सब डिलीट कर देंगे कि मेरे भगवान इतने इतने रूपों में आए ऐसी ऐसी बात की ऐसी हे भगवान ये
सब आपको समर्पित और खत्म हमारा चिंतन स्वरूप अगर व्यक्ति संबंध से चिंतन करें तब आएगा कि वो व्यक्ति अनुकूल बोल रहा था वो प्रतिकूल बोल रहा था वो तो बहुत ही दुष्ट था बहुत ही उण था अब फस गया चिंतन अब वो जलेगा अशांत होगा यह कला सीखनी संतों के पास जाते हैं संसार से युद्ध करके जीतने के लिए काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर अब ये जैसे वृत्ति है अब ये कितनी जला सकती है क्योंकि 10 गांह कैसे आ सकते हैं कि एक मीटर भी ना खरीदे और आपको 10 बार दिखाना पड़े दिखाना पड़ेगा
फिर आप बैठे जलो नहीं नहीं प्रभु की ऐसी इच्छा है देन हार तो व कहीं से भी देंगे और निश्चित समझो जिसको भरोसा प्रभु का है मालामाल हो जाएगा एक दिन एक दिन हो जाएगा पक्का विश्वास करो सुदामा जी को एक दिन द्वारिका पूरी बन गई खाने को भी नहीं मिलता था भिक्षा में एक दिन द्वारिका पुरी बन गई इसलिए विभीषण जी को रावण ने भगा दिया था कोई आश्रय नहीं था और लंकाधिपति बना दिया और परम सुख प्रदान किया भगवान की शरण में तक जो गया वह कोई ऐसा नहीं आप उदाहरण दे सकते कि
वह सदैव ही दुखी रहा हो हां प्रारंभ या मध्य लेकिन विश्राम परम सुख में हुआ है परम आनंद में हुआ है और जो प्रारंभ और मध्य में थोड़े कष्ट होते हैं हमारे कर्मों का फल होते हैं निखिल राज जी झांसी से राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी भारत देश में आप ऐसे संत हैं जिनको हर धर्म और वर्ग का व्यक्ति सुनना पसंद करता है कई लोग लोगों को आपका नाम नहीं पता तो लेकिन वह आपको पीले वस्त्र वाले महाराज जी किडनी फेल वाले महाराज जी कहकर पहचानते हैं और
आपकी तारीफ करते हैं वह कहते हैं कि वे आपको सुनते हैं प्रश्न पूछना पूछने तो सभी आते हैं और प्रश्नों का सिलसिला कभी खत्म भी नहीं होगा प्रश्न पूछना तो भक्तों का एक बहाना है हकीकत में है कि वह आपके साथ बैठने का एक गर्व महसूस करते हैं मैं भी गर्व महसूस करता हूं जैसे कोई बालक यह कहता है कि वह मेरे पिता हैं उनका मैं सुपुत्र हूं वो मेरे भाई हैं उनका मैं भाई हूं ठीक वैसे ही मैं दुनिया को बताता हूं कि महाराज जी मेरे गुरु जी हैं तब लोग का दृष्ट दष्ट कोन
एक अलग हो जाता है और एक सम्मान जनक दृष्टि से देखते हैं लोग और अधिक सम्मान देने लगते हैं जब उन्हें पता लगता है कि ये व्यक्ति महाराज जी से जुड़ा हुआ है मैं बताना चाहता हूं कि मैं आपके नाम का बहुत लाभ उठाता हूं क्या यह गलत है या सही नहीं लाभ भागवती उठाना तो सौभाग्य का विषय है अभी हो कि आप इससे पैसा कमा रहे हो तो बत निषेधात्मक हो है ना निषेधात्मक नहीं भागवत है ना तो लाभ सही पूछो तो संतों का जीवन दूसरों के लाभ के लिए ही होता है स्वयं का
कुछ नहीं है जैसे गंगा जी प्रवाहित स्वयं के लिए नहीं है जगत मंगल के लिए हैं ऐसे मुद मंगल में संत समाज जो जग जंगम तीर्थ राजु चलते फिरते तीर्थराज प्रयाग की उपमा गोस्वामी तुलसीदास जी ने संतो से दिए वैसे तो संत नहीं है उनके चरणों के दास हैं पर मार्ग तो वही है संतों का तो हमारा जीवन सर्व लाभ के लिए सबके लिए है वह लाभ दूषित भाव से ना लिया जाए अगर आप पर कोई कि आप प्रेमानंद जी के पास बैठते हैं मिलते हैं तो आपको आदर की दृष्टि से देखता है तो आपका
व्यवहार और सावधान हो जाना चाहिए कि मेरी छोटी सी गलती उनको गाली दिलवा देगी समझ रहे ना तो आप और अच्छे बनते चले जा रहे हैं आप और फिल्टर होते चले जा रहे हैं अपना ार करते यह है संत का लाभ कि मेरा नाम उनके नाम से जुड़ गया है मेरा जीवन उनके जीवन से जुड़ गया है अब मुझे और सावधान रहना मेरे से अगर कोई गलती हुई े यही प्रेमानंद का संग करते हो यही तुम्हें लाभ मिला है गाली मिलना शुरू हो जाएगी ना तो यह जो लाभ है यह आपके उत्थान के लिए है
यह आपके मंगल के लिए है इसको अंदर हर्षित होकर के नहीं भोगना है सावधान होकर के इसे स्वीकार करना है हे बहुत सावधानी रखनी कि मेरा नाम उनसे जुड़ गया है कहीं कोई ऐसी त्रुटि कहीं कोई ऐसी हमारी चेष्टा जो हमारे गुरु को या हमारे संत को गाली पहुंचा देय तुम इतना भी ज्ञान तुम्हें नहीं हुआ तुम उनके हो समझ रहे ना आपके अब आपको प्रेमानंद जी के इसके बाद कोई गंदे आचरण करते मिले तो आपको खुद मन शर्म में मैं नहीं ऐसा कर ये आपका उत्थान संबंध क्या कर रहा है उत्थान करवा रहा है
जै जसे रज जमीन में है मिट्टी लेकिन वायु के संबंध से आकाश को चूम लेती है ऐसे हम संबंध से भगवत प्राप्ति कर सकते हैं हम संबंध से महान हो सकते हैं भगवान के संबंध से ही तो महानता आती है कि भाई इस भगवान के भक्त है यह भगवान का भजन करते हैं ये भगवान के जन है तो बोले तो भगवान के समान है ऐसा हम भाव करने लगते हैं उनमें तो हमारा यह लाभ लेना बहुत सही है लेकिन उसका गलत ढंग से लाभ लेना दुरुपयोग करना वो ना होने पावे जीवन में हा तो यह
जो लाभ मिल रहा है यह तो स्वाभाविक है हम इसका दुरुपयोग ना करें दुरुपयोग करने से जैसे हम भगवान के नाम का दुरुपयोग भगवान की महिमा का दुरुपयोग तो पाखंड हो जाएगा ना फिर दंड मिल जाएगा माया दंड दे देगी अगर हम भगवान के नाम पर तो यह प्रभाव तो होगा ही भगवान बड़े हैं भगवान के भक्त बड़े उनसे हम जुड़ गए हमारी बड़ाई होने लगी नहीं होने लगी तो इसलिए हमें चाहिए कि ये तो सौभाग्य ठीक है ये दुरुपयोग नहीं लेकिन दुरुपयोग वाला हम बात ना करें तो ये हमें अध्यात्म में बढ़ाता चला जाएगा
गुरु जी किसी ने कहा था कि आप बुद्धि फेर देते हैं और अभी कल रात की बात है मैं कहीं चाट खा रहा था तो उन्होने कहा प्रेमा महाराज जी ऐसे महाराज जी हैं जो किसी की बुद्धि फेर द और ऐसा बुद्धि नहीं एक होता है बुद्धि फेर कर रुपया निकाल लेना एक होता है बुद्धि फेर करर पागल बला देना बुद्धि फेरने का मतलब है जो गलत मार्ग में बुद्धि चल रही है वो भगवान के मार्ग में चले एक ऐसा स्क हुआ था कि हमारा फोन गाड़ी में रखा हुआ था और वो किसी ने उठा
लिया फोन और फिर वो उसम आपकी फोटो लगी हुई है तो उसके इरादा था चोरी करने का लेकिन जब उसने फोन को देखा आपकी फोटो तो वहां रुका रहा और उसने मुझे फोन वापस दिया ये कहकर कि आपका फोन बच गया क्योंकि आपके गुरुजी ये हैं उसका मुझे ला नहीं व वो वो भगवाल भगवाल का खेल होता है भगवाल वहां पे कि हमारा फोन दूसरे ले जाए इसलिए खड़ा हां इसमें क्या होता है भगवान का खेल होता है करे करावे आप सब और जने बढ़ाई दे करने वाले भगवान है सारा खेल उन्हीं का होता है
वो अब जैसे हैं वैसे भगवान के है ना तो वही अपने जन की बढ़ाई कराते रहते हैं और वही ठोक बजा के भी देखते रहते हैं कि इस समय मटकी कैसी है झनझना तो नहीं रही है तो ठोक बजाने वाले भी निंदा करने वाले भी लगा देते हैं क्योंकि मटकी को बजा के दिखा जाता है बाजार में जब खरीदा जाता है तो भगवान दोनों रूप कराते हैं अपने भक्तों का यश भी फैलाते और भक्तों की निंदा भी देखो हिरण कश्यप के ही अंदर विरोध और प्रहलाद जी के अंदर भक्ति पिता ही विरोधी हो गया मीरा
जी के अंदर भक्ति तो देवर के अंदर ही विरोध नरसी जी के भक्ति तो उनकी भाभी भारी विरोध घर में ही तो भगवान का दोनों रूप समझना पड़ेगा निंदा करने वाले में भी भगवान अपना चमत्कार दिखा रहे हैं और प्रशंसा करने वाले में भी भगवान अपना दुलार दिखा रहे हैं तो हमको दो दोनों को पहचान कर प्रणाम करके भगवत मार्ग में चलना कभी हम केवल अनुकूलता ही अनुकूलता को कृपा ना माने कभी प्रतिकूलता भी हो सकती है उस समय भी हम कृपा को पहचाने कि प्रतिकूलता रूप में भी भगवान की कृपा रे देखो कभी-कभी कड़वी
दवाई भी बहुत जोर का काम करती है उस समय मीठी दवाई की जरूरत नहीं होती तो यह तैयार रहो कि कभी-कभी कड़वी दवा भी मिल सकती है जैसे तुम्हारी चार लोग प्रशंसा कर रहे थे इस बात से ऐसे एक रूप में भगवान तुम्हारी परीक्षा के लिए अब तुम्हें हृदय को बहुत शांत रखते हुए यह भगवान का ही पेरित आया है मुझे गुस्सा नहीं करना मुझे अपनी निष्ठा नहीं तोड़नी मुझे अपने भाव से चलना परमार्थ में दो बातें समझनी है कि निंदा और स्तुति दोनों में मुझे सम रहना है मान और अपमान दोनों में सम रहना
है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों में सम रहना है तो हम आगे बढ़ पाएंगे टूट जाएंगे अच्छा अच्छा ही मिलता रहे ऐसा नहीं आया सुबह राज तिलक होने वाला है चक्रवर्ती सम्राट पद पर भगवान श्री राम जी का और शाम के ही 14 वर्ष का बनवास तापस वेश विशेष उदासी 14 वर्ष राम बन भगवान की मुस्कुराहट में फर्क नहीं पड़ा तो हम उन्हीं के दास हैं हम उन्हीं के सेवक है हमको वैसे स्वभाव उन्हीं के बल से धारण करना है कि जय जय तो मुस्कुराहट और निंदा हो रही तो भी मुस्कुराहट हमको यह देखना है कि
हम में कमी तो नहीं अगर हम हम में झूठ है हम में छल है तो भगवान वहां से बोल रहे मुझे सुधार करना चाहिए अगर नहीं है तो मेरी परीक्षा हो रही मुझे शांत होकर उसका उत्तर देना चाहिए शांत ही उत्तर है शांत ही हो जाओ बस इसी का उत्तर अगर कोई कभी आपके इष्ट के आपके गुरु के आपके प्री की निंदा कर रहा हो तो उस समय शांत होकर उसका उत्तर यही वहां से चल दो ना लड़ना है ना जवाब देना ना प्रमाणित करना है क्योंकि प्रमाणित करने में लगोगे तो बकवास होगा प्रमाण कर
नहीं पाओगे संसार है मौन शांत चुप निकल गए तब आप सच्चे भक्त बन पाओगे केवल ये प्रशंसा ही नहीं है निंदा भी है भगवान की 100 भक्ति करने वाले हैं तो एक है जो गाली भी देने वाला है इस सृष्टि में है इसी सृष्टि में है ऐसे ही 100 प्रशंसा वाले तो चार निंदा वाले भी हैं तो अभी मान लो निंदा वाले ना मिले हो आपको और कहीं मिल जाए फिर आप आपकी श्रद्धा आपकी निष्ठा आपकी मुस्कुराहट तीनों बराबर बरकरार रख लिए तभी आप सच्चा सत्संग किए हो नहीं तो फिर टूट जाओगे नहीं टूट जाओगे
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा [संगीत] राधा राधा राधा [संगीत]