आज से तकरीबन 1500 साल पहले जब अरब में इंसानियत खत्म हो चुकी थी लोग गुलामों को हकीर समझते थे छोटी बच्चियों को जिंदा दफन कर दिया जाता था और बुतों की पूजा आम थी यहां तक कि काबा में भी बुत रखे हुए थे उस वक्त यहूदियों को पता था कि बहुत जल्द एक नबी आने वाला है जो कि इस पूरी दुनिया में इंसाफ कायम करेगा क्योंकि बाइबल में यह लिखा था कि अहमद नाम का एक नबी इस दुनिया में आएगा जो कि आज भी बाइबल में लिखा है यहूदी उस वक्त नबी पाक सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम
का इस तरह से इंतजार करते थे जिस तरह आज हम इमाम महदी का इंतजार करते हैं आखिरकार 570 ईसवी को नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पैदा हुए और इसी दिन काबा में रखे सारे बुत खुद से टूटने लगे और पारसियों के मंदिर में लगी आग जो के हजारों सालों से जल रही थी जिसे एक बार भी बुझने नहीं दिया गया वह भी अचानक से बुझ गई और इसी तरह बहुत से मजज हुए क्योंकि यह कुफ्र के जवाल का ऐलान था नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बचपन से ही बहुत सच्चे और ईमानदार इंसान थे अरब के
लोग नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इन्हीं खूबियों से बहुत इंप्रेस थे और वह नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बहुत इज्जत करते थे फिर नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का की एक इज्जतदार औरत हजरत खदीजा रजि अल्लाह ताला अन्हा की तिजारत का काम संभालने लगे हजरत खदीजा रजि अल्लाह ताला अन्हा नबी पाक सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम के नेक दिल और ईमानदारी से बहुत मुतासिर हुई और उन्होंने नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को निकाह का पैगाम भेजा नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस पैगाम को कबूल किया और हजरत खदीजा रजि अल्लाह ताला अन्हा से शादी
कर ली इसके बाद नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी जिंदगी गुजारने लगे लेकिन जैसे ही नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम 40 साल की उम्र में पहुंचे आपका इस दुनिया से दिल उठने लगा और आप अक्सर शहर से दूर गार में इबादत करने जाते थे फिर एक दिन नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर पहली वही नाजिल हुई नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नबूवत पर सबसे पहले इमाम अली और हजरत खदीजा रजि अल्लाह ताला अन्हा ईमान लाए लेकिन दूसरी तरफ वो लोग जो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इज्जत क्या करते थे वह सब आपके दुश्मन
बन गए और आपको मारने की धमकी तक देने लगे अरब के लोग सिर्फ नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ही नहीं बल्कि जो भी इस्लाम लाता उसे मारते पीटते और जुल्म करते थे जैसा कि अबू सुफियान और अबू जहल यहां तक कि एक बार तो मक्का के सारे लोग नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मारने आपके घर तक आ गए लेकिन नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचा अबू तालिब और हजरत खदीजा रजि अल्ला ताला अन्हा आपके साथ खड़े रहे क्योंकि नबी अलैहि सलाम बचपन में ही यतीम हो चुके थे इसलिए आपके चचा अबू तालिब
ने आपकी हिफाजत की लेकिन फिर 619 ईसवी में एक ही साल में नबी अलैहि सलाम के चचा अबू तालिब और हजरत खदीजा दोनों वफात पा गए और अब नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फिर से अकेले पड़ गए अरब के लोगों ने इसका फायदा उठाया और नबी अलैहि सलाम को मारने की साजिश की तो अल्लाह ने नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मदीना की तरफ हिजरत करने का हुक्म दिया उस वक्त सिर्फ 100 से 200 लोगों ने ही इस्लाम कबूल किया था जहां मक्का में लोग नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शहीद करने की साजिश कर
रहे थे वही मदीना में औस और खजर कबीले नबी अलैहि सलाम के पास आए और उन्हें मदीना आने की दावत दी क्योंकि मदीना के लोग यहूदियों से बहुत सालों से यह सुनते आ रहे थे कि इनका एक नबी आने वाला है इसी वजह से मदीना के लोगों को जैसे ही यह पता चला कि मक्का में एक नबी आया है तो उन्होंने फौरन इस्लाम कबूल कर लिया नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हिजरत करके मदीना जाने का फैसला किया और आहिस्ता आहिस्ता मक्का के सारे मुसलमान मदीना शिफ्ट हो गए फिर एक दिन अबू सुफियान कुछ लोगों
के साथ नबी अलैहि सलाम के घर आया आपको शहीद करने के लिए लेकिन उन्होंने देखा कि बिस्तर पर इमाम अली अलैहि सलाम सुए हुए हैं क्योंकि नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इमाम अली अलैहि सलाम को मक्का के लोगों की अमानत वापस करने के लिए छोड़ा था और नबी अलैहि सलाम हजरत अबू बकर रजि अल्लाह ताला अन्हा के साथ मदीना रवाना हो चुके थे लेकिन नबी अलैहि सलाम ने मदीना जाने से पहले तीन दिन गार सोर में कयाम किया ताकि कहीं अबू सुफियान के लोग इन्हें रास्ते में पकड़ ना ले तीन दिन बाद नबी अलैहि
सलाम मदीना रवाना हुए और मदीना पहुंचते ही वहां के लोगों ने नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बहुत अच्छे से इस्तकबाल किया और जो मुसलमान अपना सब कुछ मक्का छोड़कर मदीना आए थे उन्हें भी अंसारे मदीना ने खूब सपोर्ट किया यहां तक कि कुछ लोग अपनी बीवियों को तलाक देने तक के लिए तैयार हो गए ताकि यह उनसे शादी कर सके जब नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना पहुंचे तो आपने सबसे पहले मदीना के यहूदियों के साथ एक डील की कि अगर मदीना पर कोई हमला होता है तो हम अपनी दु दुश्मनी भूलकर एक होकर
मदीना को डिफेंड करेंगे मदीना हिजरत करने के 2 साल बाद इस्लाम की सबसे पहली जंग हुई जिसे जंगे बद्र कहा जाता है जब मुसलमान अपना सब कुछ मक्का छोड़कर मदीना आए तो मक्का के लोगों ने मुसलमानों का सब कुछ अपने कब्जे में कर लिया तो अल्लाह ने इन्हें इजाजत दे दी कि अब वह मक्का के लोगों के काफिले लौट सकते हैं तो मुसलमान बगैर कोई खास हथियार लिए बस कुछ तलवारों के साथ अबू सुफियान के काफिले को लूटने निकल पड़े क्योंकि मक्का के काफिले मदीना से होकर गुजरते थे लेकिन रास्ते में ही अल्लाह ने नबी
पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दो ऑप्शंस दिए कि या तो वो अबू सुफियान का काफला लूट ले या फिर जंग होगी उस वक्त मुसलमानों को सबसे बेहतर ऑप्शन यही लग रहा था कि अबू सुफियान का काफला लूटा जाए क्योंकि इससे मुसलमानों के पास माल आता और दूसरी तरफ जंग का ऑप्शन मुसलमानों के लिए मौत को गले लगाने जैसा था क्योंकि इनके पास सिर्फ आठ तलवारें और दो घोड़े थे लेकिन फिर भी मुसलमानों ने कहा कि या रसूल अल्लाह आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा क्योंकि अल्लाह मक्का के काफिरों को इन 300 तेरा मुसलमानों के हाथों
कत्ल करके मजज जाहिर करना चाहता था तो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जंग का ऑप्शन चुना अबू सुफियान को इस बात का पता चल चुका था कि मुसलमान इनका काफिला लूटने के लिए तैयार बैठे हैं तो इसने एक शख्स को मक्का भेजा मदद के लिए जैसे ही उस शख्स ने मक्का जाकर सब कुछ बताया तो मक्का से अबू जहल 1000 लोगों का लश्कर लेकर निकल पड़ा और अबू सुफियान भी समंदर के रास्ते से मक्का सेफली पहुंच गया मुसलमानों ने मदीना के साउथ वेस्ट में बद्र नाम की एक जगह पर अपना पड़ाव डाला इसी वजह
से इसे जंगे बद्र कहते हैं अगले दिन अबू जहल हजार लोगों के साथ इस जगह पहुंचा अब दोनों फौज आमने-सामने आ चुकी थी इसी वक्त अबू जहल की फौज में से एक कुतबा नामी इंसान अपने भाई और बेटे के साथ सामने आया और उसने मुसलमान फौज को ललकारा कि कोई आकर इसका मुकाबला करें तो मुसलमानों की फौज से तीन लोग सामने आए एक नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चचा हजरत हमजा दूसरे हजरत उबी द और तीसरे मेरे मौला अली और इन तीनों ने उतब को खत्म कर दिया इसके बाद मुसलमानों और काफिरों के साथ
जंग शुरू हुई काफिरों को लगता था कि वह आराम से जीत जाएंगे कहां 313 और कहां बाजार और वह भी घोड़ों और तलवारों के साथ लेकिन अल्लाह ने इस जंग में मुसलमानों की मदद के लिए फरिश्ते भेजे और इन फरिश्तों ने मुसलमानों के साथ मिलकर जंग लड़ी और काफिरों की फौज को बुरी तरह से हराकर भगा दिया और इसी जंग में मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन अबू जहल भी मारा गया और यह जंग मुसलमानों की नहीं बल्कि इस्लाम की बहुत बड़ी जीत थी और इसी तरह अल्लाह ने मुसलमानों की तलवारों से काफिरों को शिकस्त दी
इस हार के बाद काफिर अब मुसलमानों से बदला लेना चाहते थे क्योंकि मक्का के लोगों की पूरे अरब में इज्जत थी और अब सवाल इनकी इज्जत का था तो इस बार अबू जहल की मौत के बाद अबू सुफियान 3000 का लश्कर लेकर मुसलमानों के खिलाफ चल पड़ा जिसमें खालिद बिन वलीद भी शामिल थे नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यह जंग मदीना में लड़ना चाहते थे क्योंकि नबी अलैहि सलाम ने मदीना के यहूदियों के साथ डील की थी कि अगर मदीना पर हमला हुआ तो हम मिलकर मुकाबला करेंगे इससे मुसलमानों को एडवांटेज मिलता लेकिन मेजॉरिटी सहाबा
ने मदीना के बाहर रेगिस्तान में जंग लड़ने का फैसला किया तो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इनकी बात मान ली और 1000 मुसलमान 3000 के मुकाबले में थे जहां ओहद पहाड़ पर मुसलमानों का अबू सुफियान के लश्कर से सामना हुआ लेकिन इसी वक्त एक मुनाफिक अब्दुल्लाह इब्ने उब 300 लोगों के साथ यह जंग छोड़कर चला गया जिस मुसलमान अब सिर्फ 700 रह गए तो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक स्ट्रेटजी अपनाई आपने 50 तीर अंदाज को ओहद पहाड़ की बैक साइड पर खड़ा कर दिया और इन्हें सख्ती से हुक्म दिया कि यहां से
बिल्कुल ना हिलना चाहे मुसलमानों के जिस्मों को प्रिंदे भी खाने लगे फिर जंग शुरू हुई और मुसलमान हिम्मत के साथ इनका मुकाबला करते रहे और काफिर शहीद होने लगे और पीछे हटने लगे यह देखकर इन 50 तीर अंदाज को लगा कि मुसलमान जंग जीत चुके हैं और कहीं ऐसा ना हो कि इन्हें माले गनीमत ना मिले तो इन 50 तीर अंदाज में से 35 मुसलमान पहाड़ से उतर आए और इसी मौके का फायदा उठाकर खालिद बिन वलीद ने पहाड़ के पीछे से मुसलमानों पर हमला कर दिया अब आगे और पीछे दोनों तरफ अबू सुफियान का
लश्कर था और मुसलमान इन दोनों के दरमियान फंस चुके थे और इस तरह बहुत से मुसलमान शहीद होने लगे और इसी वक्त नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के भी दात मुबारक शहीद हो गए जिससे यह अफवाह फैल गई कि नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शहीद हो गए जब सहाबा ने यह सुना तो कई सहाबा यह सुनकर भागने लगे यहां तक कि हजरत उस्मान और हजरत उमर जैसे सहाबी भी जंग छोड़कर भाग गए लेकिन सिर्फ 12 लोग नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ बाकी रहे जिनमें इमाम अली अलैहि सलाम साद बिन अबी विकास जैसे सहाबी
थे तो बाकी बच्चे मुसलमान पहाड़ पर चढ़ गए जिसे देखकर अबू सुफियान पीछे हट गया जब वह वापस मुड़े तो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इमाम अली और बाकी कुछ सहाबा को इनके पीछे भेजा था कि यह पलटक हमला ना कर दें और इन सहाबा ने बड़ी बहादुरी दिखाई जिसकी अल्लाह ने कुरान में तारीफ की है इस जंग में मुसलमानों को बहुत नुकसान हुआ जैसे कि नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा हजरत हमजा रजि अल्लाह ताला अन्हा शहीद हो गए जो कि मुसलमानों के आर्मी चीफ थे ओहद की जंग के बाद अबू सुफियान
ने आखिरी कोशिश की मुसलमानों को खत्म करने की और इसने अरब के कई बड़े कबीलों को अपने साथ मिलाया ताकि इस बार वो एक बड़ी फौज के साथ मुसलमानों को खत्म कर सके उन्होंने 10000 का लश्कर तैयार किया जबकि मुसलमान टोटल 3000 थे वही दूसरी तरफ नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी इस बात का पता चल चुका था कि इनके खिलाफ साजिशें हो रही हैं तो नबी अलैहि सलाम ने सहाबा से इस बारे में मशवरा किया तो तो एक सहाबी जो कि पर्शिया को छोड़कर मदीना आए थे जिनका नाम हजरत सुलेमान फारसी था उन्होंने
नबी अलैहि सलाम को बताया कि पर्शिया में हम अपने दुश्मनों से बचने के लिए खंदक खोदते हैं जिससे वो हम तक पहुंच नहीं सकते और हम इन पर तीरों के साथ हमला करते हैं तो नबी अलैहि सलाम को यह ऑप्शन ठीक लगा और आपने मदीना के फ्रंट पर खंदक खोदने का फैसला किया क्योंकि मदीना बाकी सभी तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ था तो फिर मुसलमानों नेने खंदक खोदना शुरू कर दिया यह खंदक खोदना ही मुसलमानों के लिए एक बहुत मुश्किल काम था क्योंकि मदीना एक पहाड़ी इलाका था और इस इलाके में खंदक खोदना कोई
आसान काम नहीं लेकिन फिर भी मुसलमान पूरी जान लगाकर खंदक खोदते रहे खंदक खोदते वक्त एक ऐसा पत्थर आया जो कि हजरत सलमान फारसी रजि अल्लाह ताला अन्हा से टूट नहीं रहा था तो सहाबा ने नबी अलैहि सलाम को जाकर यह बताया फिर नबी अलैहि सलम खुद आए और आपने इस पत्थर पर तीन बार हथोड़ा मारा जिससे वो पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो गया इस पत्थर को तोड़ते वक्त नबी अलैहि सलाम को एक रोशनी दिखाई दी और फिर आपने फरमाया कि पहली बार जब मुझे रोशनी दिखाई दी तो अल्लाह ने मुझे रोम आता किया और दूसरी बार
जब मुझे रोशनी दिखाई दी तो अल्लाह ने मुझे पर्शिया अता किया और तीसरी बार अल्लाह ने मुझे यमन भी अता कर दिया उस वक्त रोमन और पर्शियन एंपायर दुनिया की सुपर पावर थी जब [संगीत] मुनाफिकात और यह रोमन और पर्शियन एंपायर की बातें कर रहे हैं यह जंग मुसलमानों के लिए बहुत बड़ी आजमाइश थी क्योंकि इससे पहले जंगे वहद में मुसलमानों के साथ जो हुआ था उसके बाद अब दोबारा फिर 10000 का लश्कर इन्हें मारने आ रहा था और मुसलमान सिर्फ 3000 थे जैसे ही वह 10000 का लश्कर जंग लड़ने मदीना पहुंचा तो वह इस
खंदक को देखकर हैरान रह गए क्योंकि इन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था इनके पास दूसरा कोई ऑप्शन नहीं था तो उन्होंने खंदक के बिल्कुल सामने पड़ाव डाला लेकिन एक इंसान ऐसा था जिसने यह खंदक पार कर ली इसका नाम था अमर बिन अब्दे वद ये इंसान एक बहुत बड़ा जंगजू था जिससे पूरे अरब के लोग डरते थे क्योंकि यह सु आदमियों से अकेला लड़ता था जैसे ही यह खंदक पार करके मुसलमानों के सामने आया इसने मुसलमानों की पूरी फौज को चैलेंज दिया कि तुम तो कहते हो कि मरने के बाद हम सीधा
जन्नत में जाएंगे तो आओ मैं तुम्हें तुम्हारी जन्नत में पहुंचा दूं लेकि लेकिन इसे देखकर 3000 मुसलमानों में किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वो इसके सामने आकर इसका मुकाबला कर सके सिवाय एक 27 साल के लड़के के जिसका नाम था अली जैसे ही इसने मुसलमानों को ललकारा तो इमाम अली अलैहि सलाम खड़े हुए और आपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इजाजत मांगी लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इमाम अली अलैहि सलाम को बैठा दिया इसने दोबारा फिर ललकारा लेकिन कोई खड़ा नहीं हुआ सिवाय आए इमाम अली के लेकिन नबी अलैहि सलाम ने दोबारा
फिर इमाम अली अलैहि सलाम को बिठा दिया तीसरी बार जब इसने दोबारा फिर ललकारा तो नबी अलैहि सलाम ने इमाम अली अलैहि सलाम को रवाना किया एक तरफ अरब का मशहूर जंगजू जिसके पास सालों का जंगी एक्सपीरियंस था और दूसरी तरफ एक 27 साल का लड़का जैसे ही इमाम वली अलैहि सलाम इसके सामने गए तो अमर बिन अब्दे वद ने इमाम अली अलैहि सलाम को पहचान लिया क्योंकि इमाम अली के वालिद अबू तालिब इसके बड़े अच्छे दोस्त थे तो इसने इमाम अली से कहा कि मैं तुझसे नहीं लड़ सकता किसी और को भेज लेकिन इमाम
अली अलैहि सलाम ने कहा कि मैं तो तुझसे लड़ना चाहता हूं फिर इसने इमाम अली अलैहि सलाम से कहा कि मैं अपने हर मुखालिफ को तीन ख्वाहिशों का इजहार करने का मौका देता हूं तो इमाम अली अलैहि सलाम ने कहा कि मेरी पहली ख्वाहिश तो यह है कि तुम मुसलमान हो जाओ और दूसरी ख्वाहिश यह है कि तुम यह जंग छोड़कर वापस चले जाओ और तीसरी ख्वाहिश यह है कि तुम मेरा मुकाबला करो इस बात पर उसे गुस्सा आया और वह तेजी से इमाम अली की तरफ हमला करने बढ़ा तो मेरे मौला अली ने एक
ही वार में इसे खत्म कर दिया यह देखकर सब हैरान रह गए क्योंकि यह किसी मोज से कम नहीं था इसके बाद काफिरों ने दोबारा खंदक पार करने की हिम्मत नहीं की फिर अल्लाह ने तेज आंधी चलाई जिससे काफिरों के खेमे उड़ गए और इन्हें बहुत नुकसान हुआ लेकिन काफिरों ने एक नई चाल चली उन्होंने मदीना में मौजूद यहूदियों को अपने साथ कर लिया और इनसे मदीना में दाखिल होने का रास्ता मांगा जबकि इन यहूदियों ने मुसलमानों के साथ डील की हुई थी फिर भी उन्होंने गद्दारी कर दी और इस तरह मुसलमान फिंस गए और
अब इन्हें अपनी मौत सामने नजर आने लगी क्योंकि मदीना में मुसलमानों की फैमिलीज भी थी अब सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि उनकी फैमिलीज की जान भी खतरे में आ चुकी थी उसी वक्त अल्लाह ने अपना एक और मोजा कर दिखाया एक इंसान जिसका नाम नोएम बिन मसूद था उस ने इस्लाम कबूल कर लिया और वो नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया उसने नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि मैंने इस्लाम कबूल कर लिया है लेकिन यह बात किसी को भी नहीं पता उसने अपना एक प्लान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने रखा
और आपने उसे इसकी इजाजत दे दी फिर वह सीधा यहूदियों के पास गया और उनका ब्रेन वाश किया उसने यहूदियों से कहा कि अगर यह जंग ना हुई तो मक्का के लोग तुम्हें छोड़कर भाग जाएंगे फिर तुम्हारी मौत पक्की है अगर तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं तो इनसे ट्रस्ट के तौर पर इनके आठ सरदार मांगो इसके बाद वह सीधा काफिरों के पास गया और उनसे कहा कि मदीना के यहूदी मोहम्मद के साथ मिले हुए हैं और वह मोहम्मद को अपना ट्रस्ट शो करने के लिए तुमसे तुम्हारे आठ सरदार मांगेंगे तो जैसे ही यहूदियों ने इनके
आठ सरदार मांगे तो इन्होंने साफ इंकार कर दिया इससे इनकी डील टूट गई अब काफिर फिर से अकेले पड़ गए थे और आंधी की वजह से उन्हें काफी माली नुकसान हुआ और उनका खाना भी खत्म हो गया फिर वो वापस चले गए इनके जाने के बाद नबी अलैहि सलाम अपनी जरह उतारने लगे इतने में ही हजरत जिब्राइल आपके पास आए और आपसे फरमाया या रसूल अल्लाह अभी यहूदियों से बदला बाकी है तो नबी अलैहि सलाम ने इमाम अली अलैहि सलाम की कयादत में एक फौज रवाना की और फरमाया कि असर की नमाज हम वही पढ़ेंगे
वहां पहुंचकर यहूदियों ने नबी अलैहि सलाम से कहा हमें आपका फैसला कबूल नहीं आप हमारे साथ जो चाहते हो वो करो लेकिन हमारा फैसला साद बिन मोआज रजि अल्लाह ताला अन्हा से कराओ क्योंकि साद बिन मुआद को वो जानते थे तो साद बिन मोआज ने उन्हीं यहूदियों की किताब तौरा से फैसला किया क्योंकि तौरा में गद्दारी की सजा मौत है इस वजह से फिर हजारों यहूदियों को कत्ल कर दिया गया सिवाय उनके बच्चों और औरतों के आज नॉन मुस्लिम्स इस इंसीडेंट को मुसलमानों के खिलाफ यूज करते हैं और नबी अलैहि सलाम के कैरेक्टर पर उंगली
उठाते हैं जबकि यही कानून आज पूरी दुनिया में फॉलो किया जाता है खंदक की जंग में जब अबू सुफियान अपना लश्कर लेकर चला गया था तो नबी अलैहि सलाम ने फरमाया था कि अब मुशरिक ने अरब आज के बाद तुम पर हमला नहीं करेंगे अब तुम उन पर हमला करोगे एक रात अल्लाह ने नबी अलैहि सलाम को ख्वाब के जरिए उमरा करने का हुक्म दिया तो नबी अलैहि सलाम तकरीबन 1500 सहाबा के साथ मक्का उमरा करने के लिए चले गए जब अरब के मुशरिकीन को इसका पता चला तो उन्हें लगा कि यह हम पर हमला
करने आ रहे हैं तो उन्होंने खालिद बिन वलीद को जासूसी करने भेजा खालिद बिन वलीद ने वापस आकर इन्हें बताया कि वह तो सिर्फ उमरा करने आए हैं तो अबू सुफियान ने कहा कि हम मक्का के सरदार हैं हमारी इजाजत के बगैर वो उमरा कैसे कर सकते हैं इसलिए इन्होंने मुसलमानों को उमरा करने से रोक दिया और एक शख्स जिसका नाम उरवा बिन मसूद था इसे नबी अलैहि सलाम के पास धमकाने के लिए भेजा उरवा ने आकर नबी अलैहि सलाम से कहा कि आपके यह साथी आपको छोड़कर चले जाएंगे और अगर आपको अपनी जान प्यारी
है तो वापस चले जाएं इस बात पर सहाबा को बहुत गुस्सा आया वो इसे दिखाना चाहते थे कि हम नबी अलैहि सलाम से कितनी मोहब्बत करते हैं थोड़ी देर बाद जब नमाज का वक्त हुआ तो नबी अलैहि सलाम वजू करने लगे और आपके 1500 सहाबी आपके वजू का पानी भी जाय नहीं होने दे रहे थे जब उरवा ने यह देखा तो इसने वापस जाकर अबू सुफियान को यह सब बताया इसने कहा कि मैं बड़े-बड़े बादशाहों के दरबार में गया हूं लेकिन मैंने कभी किसी भी बादशाह के साथियों को मोहम्मद के साथियों की तरह नहीं देखा
इनके साथी इनके वजू के पानी तक के लिए एक दूसरे से लड़ते हैं और जैसे ही मोहम्मद के मुंह से अल्फाज निकलते हैं यह उसे पूरा करने के लिए फौरन दौड़ते हैं यह कभी भी मोहम्मद को अकेला नहीं छोड़ेंगे इसलिए तुम्हारे लिए बेहतर यही है कि इनके साथ महिदा कर लो तो मुशरिक ने अरब ने नबी अल सलाम के साथ डील कर ली इस डील में कुछ शर्तें ते हुई पहली शर्त यह कि अगर कोई शख्स मक्का छोड़कर मदीना जाएगा तो उसे वापस करना होगा लेकिन अगर कोई शख्स मदीना छोड़कर मक्का आएगा तो उसे वापस
नहीं किया जाएगा और मुसलमान इस साल नहीं बल्कि अगले साल से उमरा कर सकते हैं और 10 साल के लिए अब कोई जंग नहीं होगी इस डील में सारी शर्तें मुशरिकीन के हक में थी और मुसलमानों के हक में कोई शर्त भी नहीं थी इसी वजह से नबी अलैहि सलाम के सहाबा ने यह डील करने से आपको रोका लेकिन नबी अलैहि सलाम ने फिर भी यह डील कर ली लेकिन कमाल यह हुआ कि जिस शख्स ने यह मुहि लिखा था इसका अपना बेटा नबी अलैहि सलाम के पास इस्लाम कबूल करके आ गया और आप से
कहा कि मुझे इन काफिरों के पास मत भेजें नबी अलैहि सलाम ने बहुत कोशिश की लेकिन मुह हो चुका था इसी वजह से उसे वापस भेजना पड़ा लेकिन कुछ टाइम बाद एक शख्स मदीना आया जिसका नाम अबू बसीर था लेकिन नबी अलैहि सलाम ने महदे के तहत इसे भी वापस भेज दिया और मुशरिकीन इसे वापस ले गए लेकिन इसने रास्ते में ही इनको कत्ल कर दिया और मक्का जाने की बजाय उसने मदीना के बाहर एक जगह पर पड़ाव डाल लिया इसके बाद जो भी लोग मक्का से इस्लाम कबूल करके आते वह वापस मक्का जाने की
बजाय इसी जगह रहने लगे और कुछ ही वक्त में यहां अच्छी खासी आबादी हो गई और यह वही जगह थी जहां से मक्का के काफिले गुजरते थे और मक्का की पूरी इकॉनमी इन काफ पर डिपेंडेंट थी फिर इन लोगों ने मक्का के काफिरों से बदला लेने के लिए इनके काफिले लूटने शुरू कर दिए जिससे मक्का के काफिरों को बहुत नुकसान होने लगा और उन्होंने तंग आकर इस डील को खत्म कर दिया और नबी अलैहि सलाम से कहा कि अब जो भी इस्लाम कबूल करके आपके पास आए तो आप उसे अपने पास ही रखें ताकि उनके
काफिले बच सकें इस तरह यह मुहि जो काफिरों ने अपना फायदा सोच कर किया था वो उल्टा इन्हीं के खिलाफ हो गया सुला हुदबे खैबर था यह यहूदियों का बहुत बड़ा और अमीर किला था खैबर के यहूदियों ने कुरेश और मुसलमानों के दूसरे दुश्मनों को कई बार सपोर्ट किया था और इनके कुरेश के साथ भी बड़े अच्छे रिलेशंस थे इसलिए इनको हराना बहुत जरूरी था तो नबी अलैहि सलाम 1600 मुसलमानों के साथ खैबर पहुंच गए लेकिन यहूदियों को कुछ मुनाफिक ने यह खबर पहले ही दे दी थी वैसे भी यहूदियों को लगता था कि वो
ये जंग आसानी से जीत जाएंगे क्योंकि इनकी तैयारी पूरी थी और इनके पास एक जंगजू था जिसका नाम मरहब था मरहब पूरे अरब में मशहूर था और इसके लेवल का कोई भी जंगजू पूरे अरब में नहीं था नबी अलैहि सलाम ने कई सहाबा को यह किला फता करने भेजा लेकिन किसी से यह किला फता नहीं हुआ फिर नबी अलैहि सलम ने फरमाया कि कल में यह झंडा उस इंसान के हाथ में दूंगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल भी उससे मोहब्बत करते हैं सारे सहाबी इस उम्मीद में
थे कि यह झंडा उन्हें मिले यहां तक कि हजरत उमर को तो उस रात नींद भी नहीं आई लेकिन अगले ही दिन नबी अलैहि सलाम ने फरमाया अली को बुलाओ इमाम अली अलैहि सलाम की आंखें दर्द में थी नबी अलैहि सलाम ने अपना लुआ इनकी आंखों में लगाया और इनके लिए दुआ की इमाम अली अलैहि सलाम ने फरमाया कि मैं आखिरी दम तक लडूंगा तो नबी अलैहि सलाम ने फरमाया अली पहले इन्हें इस्लाम की दावत देना अगर कोई एक इंसान भी इस्लाम ले आया तो यह तुम्हारे लिए सुर्ख ऊंटों से बेहतर होगा इमाम अली अलैहि
सलाम आगे बढ़े और सामने मरहब खड़ा था इसने कहा कि मेरा नाम मरहब है और कोई ऐसा इंसान नहीं जो मेरा मुकाबला कर सके तो इमाम अली अलैहि सलाम ने फरमाया मेरी मां ने मेरा नाम हैदर रखा और मैं शेर की तरह हमला करता हूं यह सुनकर मरहब आगे बढ़ा तो इमाम अली ने एक ही वार किया और इसके जिस के दो टुकड़े हो गए यह देखकर सारे यहूदी कांपने लगे फिर इमाम अली अलैहि सलाम आगे बढ़े और खैबर के 900 किलो के दरवाजे को उखाड़ कर फेंक दिया इसके बाद मुसलमानों ने हमला किया और
खैबर फतह कर लिया खैबर की जंग के बाद नबी अलैहि सलाम ने अपना एक रिप्रेजेंटेटिव बसरा के गवर्नर की तरफ भेजा ताकि इन्हें इस्लाम की दावत दे सके लेकिन उन्होंने ना सिर्फ दावत कबूल करने से इंकार किया बल्कि इस सहाबी को कत्ल कर दिया जो कि जंग का ऐलान था तो नबी अलैहि सलाम ने 3000 का लश्कर तैयार किया रोमन एंपायर से जंग करने के लिए नबी अलैहि सलाम ने इस फौज का सरदार जैद बिन हार सा को बनाया और फरमाया अगर यह शहीद हो जाएं तो तुम्हारा अगला सरदार इमाम अली के भाई जाफर बिन
अबी तालिब होंगे लेकिन अगर यह भी शहीद हो जाएं तो तुम्हारा अगला सरदार अब्दुल्लाह बिन रवा होगा इसके बाद मुसलमान रोमन एंपायर के खिलाफ जंग करने निकल पड़े जैसे ही मुसलमान मत के पहाड़ों पर पहुंचे तो सामने एक लाख फौज इनका इंतजार कर रही थी कहां 3000 और कहां 1 लाख लेकिन मुसलमानों ने फिर भी इन पर हमला किया यह जंग मूता के पहाड़ों के दरमियान लड़ी जा रही थी इसी वजह से इसे जंगे मूता कहा जाता है इस जंग में मुसलमानों की फौज के एक के बाद एक लीडर शहीद होने लगे पहले जैद बिन
हरसा फिर जाफर बिन अबी तालिब और उसके बाद अब्दुल्लाह बिन रवा हा और नबी अलैहि सलाम इनसे मीलों दूर मदीना में बैठे साबा को यह सब बता रहे थे नबी पाक अलैहि सलाम ने फरमाया जैद ने झंडा लिया और मारा गया फिर जाफर ने झंडा लिया और मारा गया फिर इब्ने रवा हा ने झंडा लिया और मारा गया जब नबी अलैहि सलाम लोगों से यह कह रहे थे तो आपकी आंखों से आंसू जारी थे और एगजैक्टली ऐसा ही हुआ मुसलमानों ने इन तीनों लीडर्स की शहादत के बाद अपना अगला लीडर खालिद बिन वलीद को चुना
खालिद बिन वलीद ने एक स्ट्रेटजी यूज की उन्होंने मुसलमान फौज को रीऑर्गेनाइज करके आ स्ता से पीछे हटने को कहा जिससे रोमन एंपायर को लगा कि यह मुसलमानों का कोई ट्रैप है और वह जंग छोड़कर वापस चले गए और इस तरह मुसलमान सेफली मदीना पहुंच गए जंगे मूता के बाद कुरेश के एक साथी कबीले बन बकर ने मुसलमानों के साथी कबीले बनू खुजा को कत्ल कर दिया जिससे मुसलमानों और मक्का वालों के दरमियान होने वाली डील सुला हु देबिल गई इस महिद में यह लिखा था कि मक्का वाले और मुसलमान 10 साल के लिए कोई
जंग नहीं करेंगे लेकिन इस कत्ल के बाद अब यह मुसलमानों के खिलाफ ऐलान जंग था तो नबी अलैहि सलाम ने मक्का से जंग करने के लिए 10000 का लश्कर सीक्रेट तैयार करना शुरू कर दिया लेकिन एक इंसान ने मक्का वालों को इसकी खबर देने के लिए एक औरत के हाथ खत भेजा जिसकी अल्लाह ने नबी अलैहि सलाम को खबर दे दी और नबी अलैहि सलाम ने इमाम अली अलैहि सलाम को भेजा इमाम अली ने इस औरत को पकड़ लिया लेकिन नबी अलैहि सलाम ने इस औरत को माफ कर दिया अबू सुयान को इस बात का
पता चल चुका था कि मुसलमान अब मक्का पर हमला करेंगे और अब मुसलमानों के पास बहुत ताकत है जिससे अब इनकी मौत पक्की है तो उन्होंने नबी अलैहि सलाम की बहुत मिनते की कि सुला हुदी बिया कायम रखें लेकिन आपने इनकी बात नहीं मानी इसके बाद नबी अलैहि सलाम 10000 का लश्कर लेकर मक्का पहुंचे जिसे देखकर मक्का वालों ने सरेंडर कर दिया और इस तरह सिवाय कुछ लोगों को कत्ल किए नबी अलैहि अ सलाम ने मक्का फतह कर लिया जिस से देखकर अबू सुफियान ने भी सरेंडर कर दिया और इस्लाम कबूल कर लिया नबी अलैहि
सलाम ने भी मक्का के लोगों को मुफ कर दिया फतह मक्का के बाद अभी भी अरब के कुछ कबीले ऐसे थे जिन्हें मुसलमानों की इस बढ़ती हुई ताकत से डर लगने लगा जो कि तायफ के हवाजन और सकी कबीले थे तो इन्होंने मुसलमानों के खिलाफ हमला करने का फैसला किया तो नबी अलैहि सलम 12000 का लश्कर लेकर इनके खिलाफ जंग करने तायफ निकल पड़े तायफ में हुनैन नामी पहाड़ों के दरमियान मुसलमानों का सामना यहूदियों से हुआ इसी वजह से इसे जंगे हुनैन कहा जाता है इस जंग में कुछ मुसलमानों के मुंह से कुछ जुमले निकले
इन मुसलमानों ने कहा कि बद्र में हम सिर्फ 313 थे और आज हम 12000 हैं जिसके मुकाबले में काफिर तो हमसे बहुत कम है यह जंग तो हम आराम से जीत जाएंगे जैसे ही इनके पास ताकत आई तो यह अल्लाह को ही भूल गए अल्लाह को इनका गुरूर पसंद नहीं नहीं आया इसके बाद जब जंग शुरू हुई तो काफिरों ने ऐसा हमला किया कि मुसलमान झेल नहीं पाए तो सारे मुसलमान वापस भागने लगे सिर्फ 80 लोग नबी अलैहि सलाम के साथ बाकी रहे और नबी अलैहि सलाम अकेले काफिरों की तरफ बढ़े और कहा बेशक मैं
नबी हूं इसमें कोई शक नहीं और अबू तालिब का बेटा हूं और फिर आपने अपने हाथ से मिट्टी उठाई और काफिरों की तरफ फेंकी और इस तरह सारे काफिर अंधे हो गए जिससे मुसलमान यह जंग जीत गए इस जंग से मुसलमानों को बहुत माल गनीमत मिला जंगे मूता के बाद जब खालिद बिन वलीद रजि अल्लाह ताला अन्हा मुसलमानों को सेफली मदीना ले आए तो इस बार नबी अलैहि सलाम ने रोमन एंपायर के खिलाफ दोबारा जंग करने का फैसला किया और कुरान में इस जंग से रिलेटेड साफ तौर पर फतवा आ गया था कि जो मुसलमान
इस जंग में शामिल ना हुआ वो मुनाफिक डिक्लेयर हो जाएगा यह मुसलमानों पर अब तक की सबसे बड़ी आजमाइश थी क्योंकि इस वक्त मदीना में खजूर की फसल तैयार हो चुकी थी और इसी वक्त मुसलमानों को जंग पर जाना था जिससे इनकी फसल जाय हो जाती और जंग भी उस वक्त की सबसे पावरफुल फौज रोमन एंपायर से थी जहां एक लाख फौज इनके इंतजार में बैठी थी जबकि मुसलमान सिर्फ 300 थे और यह जो तबू तक का सफर था यह भी बहुत ही डिफिकल्ट सफर था यह बहुत ही लंबा रास्ता था जबकि कुछ मुसलमानों के
पांव में जूते भी नहीं थे अब यह वो वक्त था जब नबी अलैहि सलाम के सच्चे सहाबा और मुनाफिक का पता चलना था इस जंग में ना जाने के लिए कई लोगों ने बहाने किए और वह मदीना में ही रुक गए तो नबी अलैहि सलाम ने मदीना की हिफाजत के लिए इमाम अली से कहा कि इस जंग में तुम नहीं जाओगे तो इमाम अली अलैहि सलाम यह सुनकर रोने लगे तो नबी अलैहि सलाम ने कहा कि तुम्हारी मेरे साथ वही निस्बत है जो मूसा की हारून से है लेकिन मेरे बाद कोई नबी नहीं तो इमाम
अली अलैहि सलाम मदीना में ही रुक गए जैसे ही नबी अलैहि सलाम 300 का लश्कर लेकर तबू जंग लड़ने पहुंचे तो रोमन एंपायर मुसलमानों की इतनी बड़ी फौज देखकर भाग गई यह अल्लाह की तरफ से एक मजज था और मुसलमानों के लिए आजमाइश थी नबी अलैहि सलाम 40 दिन तक तबू पर ठहरे रहे वहां रोमन एंपायर के आसपास के कई कबीलों ने आकर नबी अलैहि सलाम के साथ डील कर ली फिर जैसे ही नबी अलैहि सलाम तब से वापस लौट रहे थे तो 14 ऐसे मुनाफिक थे जो सिर्फ इसलिए आए थे ताकि वह नबी अलैहि
सलाम को शहीद कर सके इन लोगों ने एक तंग घाटी में नबी अलैहि सलाम पर हमला कर दिया लेकिन अमार इब्ने यासिर और हुजैफा बिन यमा ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिफाजत की इन 14 मुनाफिक ने अपने मुंह पर कपड़ा लपेट रखा था इसके बाद नबी अलैहि सलाम ने हजरत हुजैफा बिन यमा रजि अल्लाह ताला अन्हा को इन 14 मुनाफिक के नाम बताए और यह नबी अलैहि सलाम और हुजैफा बिन यमा रजि अल्लाह ताला अन्हा के दरमियान एक राज था वही मदीना में मौजूद मुनाफिक ने अपनी एक अलग मस्जिद बना ली क्योंकि उन्हें लगा
कि नबी अलैहि सलाम अब जिंदा वापस नहीं लौटेंगे और हम इस्लाम के सरदार बन जाएंगे लेकिन जैसे ही नबी अलैहि सलाम वापस आए आपने फौरन अल्लाह के कहने पर इस मस्जिद को तोड़ दिया इस जंग के बाद अब इस्लाम एक ग्लोबल पावर बन चुका था लेकिन यह नबी अहि सलाम की जिंदगी की आखरी जंग थी इसके बाद आप सल्लल्लाहु अहि वसल्लम वफात पा गए और यहीं से इस्लाम का सबसे कांसिल पीरियड शुरू हुआ